कृष्ण काव्य में माधुर्य भक्ति के कवि/सूरदास का जीवन परिचय

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सूरदास उन कवियों में से हैं,जिन पर केवल वल्लभ सम्प्रदाय को नहीँ वरन हिन्दी साहित्य को गर्व है। इसी कारण इनके विषय में अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न हुआ है। इनके जीवन-चरित पर प्रकाश डालने के लिए साहित्य के इतिहासकारों तथा अनुसन्धान कर्ताओं ने अन्तः साक्ष्य और बाह्य साक्ष्य दोनों का ही आश्रय लिया है और जहाँ इनसे भी काम नहीं चला वहाँ अनुमान से सहायता ली गई। इसी कारण इनके जन्म संवत आदि के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है।

  • आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने सूरदास का जन्म-संवत १५४० विक्रमी और मृत्यु-संवत १६२० विक्रमी माना है। (हिन्दी साहित्य का इतिहास :पृष्ठ १६१ ) आचार्य शुक्ल की यह मान्यता मुख्य रूप से साहित्य लहिरी पर आधारित है।
  • आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के विचार में यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि साहित्य लहिरी के रचयिता यही प्रसिद्ध सूरदास थे या कोई अन्य। अतः उन्होंने आचार्य शुक्ल की मान्यता विवाद रहित स्वीकार नहीं किया (हिन्दी साहित्य :पृष्ठ १७६-७७).। स्वयं द्विवेदी जी ने सूरदास के जन्म-संवत आदि के विषय में कोई निश्चित मत नहीं दिया। किन्तु सूरदास के समय की जो रूपरेखा उनके इतिहास में मिलती है ~ वह प्रायः वही है जो आचार्य शुक्ल की है।
  • डा ० दीनदयाल गुप्त ने इनका जन्म-संवत १५५५ विक्रमी और मृत्यु-संवत १६ ३ ८ अथवा १६३९ है (अष्टछाप और वल्लभ सम्प्रदाय :पृष्ठ २१२ तथा २१९ )
  • डा ० मुंशीराम शर्मा का मत इन सभी विद्वानों से भिन्न है। उन्होंने सूर-सौरभ में प्रदत्त अन्तःसाक्ष्य और बाह्य साक्ष्य के आधार पर यह सिद्ध किया है कि सूरदास संवत १५५५ के लगभग उत्पन्न हुए और संवत १६२ ८ के आस-पास तक जीवित रहे। (सूर-सौरभ :पृष्ठ ५३ ) .
  • 'दो सौ चौरासी वैष्णवन की वार्ता ' के अनुसार सूरदास का जन्म स्थान रुनकता या रेणुका क्षेत्र है। श्री हरिराय जी की वार्ता से पता चलता है कि सूरदास दिल्ली से चारकोस (१२ किलोमीटर ) दूर सीही ग्राम के सारस्वत कुल में पैदा हुए थे। (गो ० हरिराय जी कृत सूरदास की वार्ता ;सम्पादक प्रभुदयाल मीतल :पृष्ठ १-२ ).
  • श्री वल्लभाचार्य जी की भेंट के समय मथुरा-वृन्दावन के बीच गऊघाट पर रहा करते थे। सूरदास स्वभाव से विरक्त थे अतः एकान्त में भगवान् के समक्ष अपने भाव व्यक्त किया करते थे। इनके इसी विरक्त-भाव से आकर्षित होकर इनके सेवक बन गए। उस समय के पदों में इन्होंने अपने आपको अशुची ,अकृती ,अपराधी आदि कहा है। पर वल्लभाचार्य से मिलने के उपरान्त सूर वास्तव में 'सूर' हो गए और अपनी भक्ति-निष्ठां तथा अनन्यता के आधार पर एक दिन भगवान् से यह कहने का साहस भी कर सके ~~
बाँह छुड़ाए जात हो निबल जानि के मोहि।
हिरदै तै जब जाहुगे मरद बदौंगो तोहि।।

कुछ विद्वानों का विचार है कि सूरदास जन्मांध थे,अन्य विद्वान इससे सहमत नहीं हैं। (हिन्दी साहित्य ;आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी :पृष्ठ :१७३-७४ ) दोनों मतों में से कौनसा ठीक है , यह निर्णय करना सहज नहीं है। किन्तु तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि आचार्य वल्लभ से भेंट के समय सूरदास चर्मचक्षुओं की सेवा से रहित थे। इसीलिये आचार्य को इनके अंतर्नयनोंं को खोल देने में विशेष असुविधा नहीं हुई तत्पश्चात सूरदास ने भगवान् की लीलाओं में ही अपने आप को लीन कर दिया।

  • गोकुलनाथ कृत वार्ताओं से पता चलता है कि सूरदास को महाप्रभु ने श्रीनाथ जी की कीर्तन सेवा सौंपी थी। अतः इसी सेवा के निर्वाह-निमित्त इन्होंने लीला-सागर की रचना की। किन्तु श्रीनाथ जी की इस सेवा को इन्हें विवश होकर शीघ्र ही छोड़ना पड़ा। तदुपरान्त ये भगवान् की रास-क्रीड़ा-भूमि परासौली गांव में चले गए और वहीं पर एक दिन अपनी चित्त-वृत्तियों को राधा-कृष्ण की प्रेम-लीलाओं में नियोजित कर यह गीत गाते हए~
बलि बलि बलि हो कुमर राधिका नंदसुवन जासों रति मानी।
वे अति चतुर तुम चतुर शिरोमनि प्रीति करी कैसे होत है छानी।।
वे जु धरत तन कनक पीत पट सो तो सब तेरी गति ठानी।
ते पुनि श्याम सहेज वे शोभा अंबर मिस अपने उर आनी।।
पुलकित अंग अब ही ह्वै आयो निरखि देखि निज देह सिरानी।
सूर् सुजान सखी के बूझे प्रेम प्रकश भयो बिहसानी।।
(अष्टछाप ;डा ० धीरेन्द्र वर्मा :पृष्ठ १७ )