पाश्चात्य काव्यशास्त्र/उत्तर-आधुनिकता

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आधुनिकता से विपरित उत्तर आधुनिकता केन्द्र के और उन्मुख नहीं होती वह हास्यों पर खड़े व्यक्ति, वस्तु ‌‌‌की ओर उन्मुख हैं। यही कारण है ‌‌‌‌कि हमें स्त्री विमर्श, दलित विमर्श आदि दिखाई पड़े। आधुनिकता पुनर्निर्माण पर जोर देता है किन्तु उत्तर आधुनिकता विनिर्माण पर जोर देता है। पुनर्निर्माण ‌‌‌‌के अन्तर्गत मूल्यों का नव निर्माण होता है किन्तु विनिर्माण विखण्डन पर‌ जोर देता है अर्थात किसी मूल्य को खंड-खंड कर एक नवीन मूल्य बनाना। आधुनिकता सार्वभौमिकता पर जोर देती है वे अपने सिद्धांतों और मूल्यों को सब के लिए उचित समझती है किन्तु उत्तर आधुनिकता स्थानीयता पर जोर देती है, वह मानता है कि एक मूल्य एक‌ ही समाज के लिए उपयुक्त हो सकती है। वे बहु संस्कृति को मानते हैं, वे मानते हैं कि दो विभिन्न संस्कृतियों के लोग साहचर्य से साथ रह सकते हैं, वे अपना-अपना सांस्कृतिक अस्तित्व साहचर्य के बाद भी बनाए रख सकते हैं क्योंकि अनेक संस्कृतियों से राष्ट्र बनता है।

उत्तर आधुनिकतावाद के मूल तत्व[सम्पादन]

यहाँ उन मूल तत्वों का उल्लेख किया गया है जिनपर उत्तर आधुनिकतावाद की विचार प्रणाली आधारित है।

विकेन्द्रीयता[सम्पादन]

उत्तर आधुनिकतावाद केन्द्र से परिधि की ओर यात्रा करता है। समाज के विभिन्न समूह जो हाशिये पर हैं या जिन्हें हाशियें पर धकेल दिया गया है, जैसेः- स्त्री या दलित अब वें महत्वपूर्ण हो गए हैं। उत्तर आधुनिकतावाद में पुराने एकीकृत केंद्रों के बजाय नए नए समीकरण वजूद में आ रहे हैं। ये समीकरण भी निरंतर बदलते रहते हैं।

स्थानीयता[सम्पादन]

विकेन्द्रीयता का प्रश्न स्थानीयता से संपृक्त है। उत्तर आधुनिकतवाद वैचारिकता तथा राष्ट्रीयता के बजाय क्षेत्रीयता तथा स्थानीयता पर अधिक बल देता है।

प्रभुत्व का संघर्ष[सम्पादन]

इसी महत्व के कारण विभिन्न समूहों में प्रभुत्व के लिए संघर्ष शुरू हो गया है। हम और अन्य में भेद होने लगे। अपनी पहचान को समाज में रहकर भी खत्म ना होने देने की भावना विकसित हुई। वे लोग जिनके हित तथा विचार एक दुसरे से टकराते हैं वे यह महसूस करते हैं कि कोई ऐसा सर्वमान्य व्यापक मुद्दा नहीं जिसके लिए सब एकमत हो। इसी से स्वायत्तता का प्रश्न भी जुड़ा है।

विभिन्नता[सम्पादन]

विभिन्नता तथा विकेन्द्रीयता का क्रियात्मक संबंध है। ये दोनों एक दुसरे पर आश्रित हैं तथा एक दुसरे को सुदृढ़ करती हैं। उत्तर आधुनिकतवाद इस बात पर बल देता है कि लोगों का एक समूह प्रायः दुसरे समूहों से अपनी मूल संरचनाओ(संस्कृति, संवेदना, रीति-रिवाज, परम्परा, भाषा, विश्वास आदि) के कारण भिन्न तथा अलग होता है।

युगल विपरीतता[सम्पादन]

युगल विपरितता का यह तात्पर्य यह है कि दो विपरित समूह एक-दुसरे से इस प्रकार जुड़े होते हैं कि इन्हें बिल्कुल अलग कर देना सम्भव नहीं। लेकिन इस जुड़ाव में एक समूह का दुसरे समूह पर वर्चस्व स्थापित होता है। जैसा कि स्त्री और पुरुष। इसमें स्त्री पर पुरुष का वर्चस्व है। अतः इस असमानता को समाप्त करना आवश्यक है।

कर्ता का अंत[सम्पादन]

उत्तर आधुनिकतवाद कर्ता के केन्द्रीय स्थान या महत्व को स्वीकार नहीं करता। अर्थात् अब मानव या मानव संवेदना का कोई अर्थ नहीं रह गया। मिशल फूको के शब्दों में "सागर के किनारे रेत पर बनाए गए चेहरे की भाँति मनुष्य का निशान मिट जाएगा।" उत्तर आधुनिकतावाद की इस विचार से प्रेरणा पा कर रोला बार्थ मानते है कि कृति करने के बाद लेखक की मृत्यु हो जाती है और यहीं पाठक का जन्म होता है। आगे ज्याँ लकाँ यह तक कहते है कि इतिहास की भी मृत्यु हो जाती है। अर्थात् कृति का ही महत्व रह जाता है।

चिन्हवाद[सम्पादन]

उत्तर आधुनिकतवाद यथार्थ की नई परिभाषा प्रस्तुत करता है। इसकी दृष्टि में कोई वास्तविक संसार नहीं। यथार्थ एक समाजिक अवधारणा है। एक प्रतिबिम्ब है। एक विभ्रम है, जिसकी सत्यता को प्रमाणित नहीं किया जा सकता, क्योंकि संसार एक ऐसा रंगमंच है जिसमें प्रत्येक वस्तु एंव विचार 'इमेज्ड, मैनेज्ड तथा मैनीप्यूलेटेड' है। हम वास्तविकता को कृत्रिमता अर्थात् चिह्नों तथा प्रतिबिम्बों द्वारा ही जानते हैँ। मार्शल ब्लावस्की के शब्दों में 'हम आकृतियों की दुनिया में जीने के लिए विवश हैं। हम यह भूल गए हैं कि कभी कोई वास्तविक आकाश भी था। वास्तविक आहार था। कभी कोई भी वास्तविक वस्तु थी।'

लोकप्रिय संस्कृति[सम्पादन]

उत्तर आधुनिकतावाद लोकप्रिय संस्कृति का समर्थन करता है। यह अभिजात्य कला को सामान्य कला से श्रेष्ठ स्वीकार नहीं करता। दरअसल उत्तर आधुनिकतावाद 'हाई आर्ट और लो आर्ट' में कोई भेद नहीं करता।

अंतर्विषयीय[सम्पादन]

उत्तर आधुनिकतावाद ज्ञान-विज्ञान और कला की सीमा रेखाओं को स्वीकार नहीं करता। दो या अधिक शास्त्र मिलकर नए-नए शास्त्रों को जन्म दे रहे हैं। फिल्म, फोटोग्राफी, फैशन, कथा साहित्य, काॅमक्सि, कंप्यूटर ग्राफिक्स, चिल्ला, सूचना, संगीत, रंगमंच, भाषा, वेशभूषा, विज्ञापन, इलैक्ट्रोनिक सम्प्रेषण अर्थात् प्रत्येक कलात्मक एवं सौंदर्यानुभूति अभिव्यंजना, जीवन का प्रत्येक क्षेत्र और समाज की हरेक वस्तु, विचार की हरेक धारा एक-दूसरे में घुल-मिल रही हैं। पद्य गत्यात्मक हो रहा है और गद्य काव्यात्मक। कथा साहित्य को इतिहास लेखन और इतिहास को फिक्शन का ही एक फार्म कहा जा रहा है।

अंतवाद[सम्पादन]

उत्तर आधुनिकतावाद को अंतवाद की संज्ञा भी दी गई हैं। क्योंकि इसमें प्रत्येक विचार, वस्तु तथा कला अभिव्यक्ति के अंत की घोषणा कर दी गई है। इसमें ईश्वर का निधन, मनुष्य (कर्ता) की मृत्यु, इतिहास का अंत, विचारधारा का अंत, आधुनिकता का अंत, कला और साहित्य तथा लेखन का अवसान शामिल है।

पूर्णतावाद का विरोध[सम्पादन]

उत्तर आधुनिकतावाद किसी प्रकार के पूर्णतावाद में विश्वास नहीं रखता। इसके अनुसार कुछ भी शश्वत, संपूर्ण, अंतिम तथा स्थिर नहीं। सब कुछ अनिश्चित और क्षणिक है। यहाँ तक की शब्दों के कोई स्थायी अथवा निश्चित अर्थ नहीं होते।

संदर्भ[सम्पादन]

1.हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली--डाॅ. अमरनाथ--पृष्ठ 77

2.साहित्य सिद्धांत और विचारधाराएँ(इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय विश्वविद्यालय की पुस्तक)--पृष्ठ 128