पाश्चात्य काव्यशास्त्र/रिचर्ड्स का संप्रेषण सिद्धांत

विकिपुस्तक से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ

भूमिका[सम्पादन]

Richards Theodore William desk.jpg

आधुनिक युग के पाश्चात्य समीक्षकों में आई. ए. रिचर्ड्स (1893 -1979 ई.) तक महत्वपूर्ण स्थान हैं। वह मनोविज्ञान के क्षेत्र से साहित्य में आए, अत: उन्होंने मनोविज्ञान की सहायता से कविता की साथकता तथा महत्ता के सम्बन्ध में नवीन तर्क प्रस्तुत किए हैं।उन्होंने कहा कि आज जब प्राचीन परम्पराएँ और मूल्यों का विघटन हो रहा है, ऐसे में सभ्य समाज कविता के सहारे ही अपनी मानसिक व्यवस्था बनाए रख सकता है। रिचडर्स ने मोवैज्ञानिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि अपनाते हुए भाषा पर सर्वाधिक गहनता के साथ विचार किया, साथ ही संवेदनों के संतुलन पर बल देते हुए एक नई समीक्षा पध्दति विकसित की। 'दि फांउडेशंस ऑफ ईस्थेटिक्स' नामक ग्रंथ (1922) में कहा गया,सौंदर्य की स्थिति किसी वस्तु में नहीं, बल्कि दर्शक के मन पर पड़ने वाले उसके प्रभाव में होती है। अर्थात् वे काव्य का सौंर्दय काव्य में देखने के बदले उससे उत्पन्न होने वाले भाव में देखने का प्रस्ताव करते हैं। 'दि मीनिंग ऑफ मीनिंग नामक दूसरी कृति (1923) में प्रकाशित हुई, इसमें अर्थ-संबंधी प्राचीन मतों का खंडन था।किंतु आलोचक के रूप में उनकी ख्याती दो ही ग्रंथों 'दि प्रिंसिपुल्स ऑफ लिटरेरी क्रिटिसिज्म' तथा 'प्रैक्टिकल क्रिटिसिज्म' के रूप में प्रतिष्टित हुआ। सांस्कृतिक, वैचारिक तथा शैक्षिक उद्देश्यों की सिध्दि के लिए 'प्रैक्टिकल क्रिटिसिज्म' की रचना हुई। रिचर्ड्स ने मनोविज्ञान से सम्बन्धित दो सिध्दान्त दिए है-१) मूल्य सिध्दांत २) संप्रेषण का सिध्दांत।

मूल्य सिध्दांत[सम्पादन]

मूल्य किसी वस्तु का वह धर्म (गुण) है, जिसमें उसका रूचि निहित होती है। किसी वस्तु की इच्छा हुई, फिर उसे प्राप्त करने की प्रवृति हुई, प्राप्त होने पर जो रूचिकर अनुभूति हुई वह हमारे लिए मूल्यवान बन गयी।सौन्दर्य को रिचडर्स ने एक मूल्य माना है। मूल्य सिध्दान्त को समझने के लिए उनके द्वारा परिकल्पित मानसिक प्रक्रिया का ज्ञान आवश्यक है। उनके अनुसार "आवेग मन की एक प्रकार की प्रतिक्रिया है, जो किसी उद्दीपन से उत्पन्न होकर किसी कार्य में परिणत हो जाती है। रिचडर्स का काव्य सिध्दान्त मनोविज्ञान से सम्बन्ध हैं। रिचडर्स के अनुसार कविता का मूल्य उसकी मन को प्रभावित करने की क्षमता पर निर्भर है। जो कविता पाठक या श्रोता के मन को जितनी अधिक प्रभावित कर पाएगी, जिसमें संप्रेषणीयता जितनी अधिक होगी, वह उतनी ही उत्कृष्ट कहलाएगी। रिचडर्स के अनुसार मनोवेगों के दो कोटियाँ है, एषणा (इच्छा Appetency) तथा विमुखता (द्वेषAversion)। प्रथम में हम कुछ पाने के लिए उधत हो उठते हैं, तो दूसरे में कुछ वस्तुओं के प्रति हमारे मन में विमुखता पैदा हो जाती है। प्रथम प्रकार के आवेग प्रवृतिमूलक होते हैं तो दूसरे निवृत्तिमूलक। रिचचडर्स उन एषणाओं को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानते हैं जो कम से कम अन्य एषणाओं को अवरूध्द किए बिना अपना अस्तित्व कायम रखती हैं। अनुभूति, मूल्य और संप्रेषण इन तीनों का संबंध मनोविज्ञान से है। किंतु मनोविज्ञान में कारण-कार्य की व्याप्ति सदा एक नहीं रहती; इसलिए वह आनुभाविक विज्ञान कहलाता है। जैसे गुलाब का फूल देखने पर हर आदमी के मन में एक ही प्रकार की प्रतिक्रिया हो, यह आवश्यक नहीं। कोई उस पर मुग्ध हो सकता है; कोई हल्की-सी प्रसन्नता व्यक्त कर सकता है; कोई तटस्थ रह सकता है। इसलिए वह सीमित अर्थ में ही विज्ञान है। अत: काव्य के प्रभाव और प्रयोजन के संबंध में रिचडर्स ने मूल्य बिषयक तीन सिध्दांत निरूपित किए हैं- १) कला अन्य मानव-व्यापारों से सम्बन्ध है, उनसे पृथक् अथवा भिन्न नहीं है। २) मानव की क्रियाओं में कला सर्वाधिक मूल्यवान है। ३) किसी भी मानव-क्रिया का मूल्य इस बात से निर्धारित होता है कि वह कहाँ तक मनोवेगों में सन्तुलन और सुव्यवस्था उत्पन्न करने में सक्षम है।

संप्रेषण का सिध्दांत[सम्पादन]

रिचर्ड्स की आलोचना पध्दति का दूसरा आधार स्तंभ 'संप्रेक्षण सिध्दांत' है। जो कविता पाठक या श्रोता के मन को जितनी अधिक प्रभावित कर पाएगी, जिसमें संप्रेषणीयता जितनी अधिक होगी, वह उतनी ही श्रेष्ठ मानी जाएगी। क्रोचे सम्ंप्रेषण को अनिवार्य नहीं मानता, वह उसे एक व्यावहारिक तथ्य मानता है और कहता है कि किसी अनुभव को सुरक्षित रखने अथवा उसका प्रचार-प्रसार करने की इच्छा से ही कलाकार अपने अनुभव का प्रेषण करता है।' रिचडर्स प्रेषक (श्रोता) को कला से बाह्य न मानकर उसे कला का तात्विक धर्म मानता है। कलाएं वह माध्यम हैं जिनके द्वारा कलाकार अपनी अनुभूतियों को दूसरों तक पहुंचाने का प्रयास करता है। अनुभूतियां मानव मात्र की होती हैं और किसी न किसी रूप में उन्हें दूसरों को संप्रेषित करते भी सभी हैं, क्योंकि लोक व्यवहार का वह अनिवार्य अंग हैं। राग-द्वेष, प्रेम-सहानुभूति पारस्परिक संप्रेषण के ही फल हैं, किंतु संप्रेषण की क्षमता सब में एक जैसी नहीं होती। कलाकर और जनसाधारण की अनुभूति में तात्विक अंतर नहीं होता। अंतर होता है- अनुभूति की अभिव्यक्ति में। बहुतों की अनुभूति गूंगे का गूड है; जिस तरह गूंगा गुड के स्वाद का अनुभव तो करता है, पर उसे कह नहीं पाता; जिसे वाणी का वरदान प्राप्त है। वह उसे कहता भी है। और इस तरह से कहता कि श्रोता या दर्शक उससे प्रभावित हो उठे, प्रभावी अभिव्यजंना को ही संप्रेषण कहते हैं। रिचर्ड्स के अनुसार, "संप्रेषण का अर्थ न तो अनुभूति का यथावत् (हूबहू) अंतरण है और न दो व्यक्तियों के बीच अनुभूतियों का तादात्म्य बल्कि कुछ अवस्थाओं में विभिन्न मनों की अनुभूतियों की अत्यंत समानता ही संप्रेषण है।"' इस प्रकार रिचडर्स के अनुसार संप्रेषणता के लिए निम्न बातें आवश्यक हैं- १) किसी वस्तु के पूर्ण अवबोध के लिए कवि या कलाकार में जागरूकता की शक्ति होनी चाहिए। २) कलाकार की कलाकृति (कविता) या अनुक्रियाए एकरस (समरूप) होनी चाहिए। ३) वे पर्याप्त रूप से विभिन्न प्रकार की हों, ४) वे अपने उत्तेजक कारणों द्वारा उत्पन्न किये जाने योग्य हों। ५) कलाकार में साधारणता का गुण होना चाहिए। रिचडर्स कवि या कलाकार में साधारणता के गुण को आवश्यक मानते हैं। यदि वह साधारण नहीं होगा तो उसकी मूल्यवान से मूल्यवान कृति भी सम्प्रेषित नहीं हो सकेगी। सम्प्रेषण में भाषा का विशेष महत्व है। रिचर्ड्स कहते हैं,"कविता के सम्प्रेषण का माध्यम भाषा है।" भाषा के दो भेद होते हैं- तथ्यात्मक और रागात्मक। उनका विचार है कि कवि वैज्ञानिक के समान तथ्यों का अन्वेषण नहीं करता, बल्कि रागात्मक अवस्थाओं का सर्जन करता है। भाषा कुछ ऐसे प्रतीकों का समूह है, जो श्रोता और पाठक के मन में, कवि के मन के अनुरूप मन:स्थिति को उत्पन्न कर दे। ...शब्द अपने आप में पूर्ण नहीं होते, न स्वतंत्र होते हैं। उनके साथ नाद, शब्द-पहचान, भाव-विचार, प्रसंग आदि भी जुडे़ रहते हैं। भाषा के प्रभाव-स्तर इनसे ही निर्धारित होते हैं।

संदर्भ[सम्पादन]

१. पाश्चात्य काव्यशास्त्र---देवेन्द्रनाथ शर्मा। प्रकाशक--मयूर पेपरबैक्स, पंद्रहवां संस्करण: २०१६, पृष्ठ--२३७-२७५

२. भारतीय तथा पाश्चात्य काव्यशास्त्र---डाँ. सत्यदेव चौधरी, डाँ. शन्तिस्वरूप गुप्त। अशोक प्रकाशन, नवीन संस्करण-२०१८, पृष्ठ--२५१-२५४

३. भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र की पहचान---प्रो. हरिमोहन । वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण-२०१३,पृष्ठ--१५१-१५४