सामग्री पर जाएँ

भारतीय साहित्य/रामविजय

विकिपुस्तक से
भारतीय साहित्य
 ← काबुलीवाला रामविजय सहायक पुस्तकें → 
रामविजय
शंकरदेव
                                                                    रामविजय (नाटक)
                                                                        श्लोक
                                                        यन्नामाखिल लोक शोक शमनं यन्नाम प्रोमास्पदम् । 
                                                        पापापारपयोधि तारणविधौ यन्नाम पीनप्लवः । 
                                                        यन्नाम श्रवणात् पुनाति श्वपचः प्राप्नोति मोक्षं क्षितौ। 
                                                        तं श्रीराममहं महेश वरदं वन्दे सदा सादरम् ॥
                                                                       अपिच
                                                        येनाभाजि धनुः शिवस्य सहसा सीता समाश्वासिता । 
                                                        येनाकारि पराभवो भृगुपतेर्व्वासक्त रामस्य च ॥ 
                                                        वैदेहीं विधिवद्विवाहमकरोत् निर्जित्य यः पार्थिवान् । 
                                                        युष्माकं वितनोतु शं स भगवान् श्रीरामचन्द्रश्चिरम् ॥
                                                                        गीत
                                                                 (राम सुहाइ-एकतालि )
                                         धु.     : जय जग जीवन राम। आपको मेरा प्रणाम ।


                                        पद      : जिनके गुण गाने से । 
                                                       पापी भी परम पद पाये॥ 
                                                       जिनका स्मरण करने से । 
                                                       अपार दुख मिट जाये ॥ 
                                                       जिन्होंने अजगब तोड़ा। 
                                                       जो जनक की पुत्री पाये ॥ 
                                                       वाणों से राजा नष्ट कराये। 
                                                       यह पद कृष्ण दास सुनाये ॥
                                           नान्द्यन्ते सूत्रधार :
                                                    प्रथमं माधवो-माधव इत्युक्तवा श्रीरामचन्द्रं प्रणम्य सभासदः सम्बोध्यहाः ।


पृष्ठ 199

[सम्पादन]
                                                                    श्लोक
                                                         भो भोः सामाजिक यूयं शृणध्वमधुना बुधा।
                                                         श्रीराम विजयं नाम नाटकम् मोक्षसाधकम् ॥
                                                 ऐ आदरणीय दर्शक, गुणी दर्शक, कृपया सुनें: यह नाटक जिसका शीर्षक 
                                                 श्रीराम विजय है मोक्ष प्रदान करने वाला है।
                                                                   भटिमा
                                                 जय जय रघुकुल कमल प्रकाशक     दासक नाशक भीति ।
                                                 जय जय निजजन यातन घातन       पातन पातक रीति ॥
                                                 हरक शरासन नाशन शासन         नृप सब बाण सन्धाने ।
                                                 छेदल भेदल खेदल दापे            तापे पलावत प्राणे ॥
                                                 भृगुवर रामक रामक कामक         कयलि दरप उपान्त ।
                                                 भवभय भजन सज्जन रज्जन         जीवन जानकी कान्त
                                                 योहि बनमाली बालक घालि         राजा करू सुग्रीव ।
                                                 याहेरि कोप कटाक्ष निरिक्षि         कम्पित जलधिक जीव ॥
                                                 समरक नागर नागर सागर         शिला सेतु कय बन्ध ।
                                                 भक्तक भीता सीता नीता          युधे बधिये दशकन्ध ॥
                                                 साफलाला बाणी जानि आनि        थापि विभीषण पाटा ।
                                                 जतित आतंका लंका शंका         कर्यालि पुन उत्पाता ॥
                                                 जगतक अन्तक सन्तक तन्तक      पूरल परमा काम ।
                                                 भूमिक भार उधारल तारल         सुर नर राजा राम ॥
                                                 ब्रह्मा महेश्वर किंकर जाकर         पड़ि पड़ि करतु सेवा।
                                                 त्रिभुवन कारण तारण मारण        जोहि देवका देवा ॥
                                                 सोहि महेश्वर रामक नाटक         सुन सब कर विश्वास ।
                                                 अहरे कथने मथने करई           कलिमल सकल विनाश ॥
                                                 असारत सारत कारत भारत        नर तनु विफलेहि जाय।
                                                 पद अरविन्द अनिन्द गोविन्द        हृदि पंकज धरु भाय ॥
                                                 धनजन जीवन जौबन बिजुरि        उजुरि देखा ने देखा।
                                                 जानव केशव देसा सेया           सोहि शिला करि देखा ॥
                                                 सब अपराधक बाधक साधक       सिद्धि करू हरि नाम् ।
                                                 कहे कृष्ण किंकर लोक निरन्तर     डाकि बोलहु राम राम 
                                  सूत्रधार  : हे सभासदो ! हे साधुजन! इस जगत के परम ईश्वर नारायण इस धरती 
                                                का भार हरणे के लिए दशरथ जी के घर में श्री राम के रूप में अवतार 
                                                लेकर आये हैं। वही प्रभु श्री राम इस सभा में प्रवेश करेंगे। इस नाटक

पृष्ठ 200

[सम्पादन]

में ये सीता के साथ विवाह रखेंगे ध्यान लगाकर देखिए तथा सुनिए ! सर्व प्रथम श्री राम के साथ लक्ष्मण जी का प्रवेश होगा। उसके पश्चात सीता जी का संधियों के साथ प्रवेश होगा। ध्यान से सुनिये और देखिए।

सूत्रधार संगी

(सखा से) हे संगी, हम कौन सा बाथ सुन रहे हैं? हे सखा! देवदुन्दुमि बज रही है। यह देखिए श्री रामचन्द्र जी प्रवेश कर रहे हैं।

,,""""""""""""""""""""श्लोक""""""""""""""""""

प्रवेशमकरोत् कामं रामो राजीव लोचनः । ससोदधानी रूपेणाप्रतिमो भुवि।

सूत्रधार :-हे सभासदो! जिनकी कथा में सुना रहा हूँ वे श्री राम लक्ष्मण के साथ आ रहे हैं।

(यह कहकर सूत्रधार प्रस्थान करते हैं)

गीत राग सिन्धुदा (एक ताल)

टेक : करते हैं प्रवेश परमेश रघुनाथ। संग में हैं सहोदर लेकर धनुष और बाण ।

पद : पीत वस्त्र, श्याम शरीर अति रूचिकर । पंकज नयन मंद-मंद मुस्कान ॥ मणिमय मुकुट और कुण्डल झूलें। उन्हें देख कामदेव को भी भूलें ॥ माणिक और मोतियों का हार । चमकें ज्यूँ गगन के तारे अपार

चरणों में मणि जडित कड़े हैं। यह कृष्ण दास, शंकर कहे हैं।

सूत्रधार:- इस प्रकार श्री रामचन्द्र का प्रवेश हुआ। अब सुनो-देखो सीता का प्रवेश ।

(संगी से) ऐ संगी यह कौन सा बाद्य बज रहा है? संगी : यह तो देव-वाद्य बज रहा है।

सूत्रधार :- हीवाह ! जनक की पुत्री सीता अपनी सखियों के साथ आ रही है।

"""'''''"""""श्लोक""""""""""

चकार जानकी कामं प्रवेशं सखी संगता। चिन्तयन्ती रामचन्द्र चरणौ रुचिरानना ।

एक

राग सुहाइ (एकताल)

आगे जनता का परदेश

माणिक मुकुट कुण्ड करु कान्तिदशनतम नद मोतिम ति इस हासि चान्दक रुचिरानी लक के कनक केयूर इनका रामकरन चिन्तित पदपंकज मणि मजिर रोल भूवन शंक हे सामाजिक जनक की पुत्री सीता जब अपनी सखियों संग करने लगी तब उसे पूर्व जन्म की कथा गाद आने लगी। वह द आते ही वह रोने लगी। तभी मदनमन्थरा और तीनों

टेक

सूत्रधार:-

ने उसे गले से लगाया और पूछा। राखी ऐ सखी तुम राजकुमारी ही कौन सी सम्पति तुम्हारे पास नहीं है। फिर किस कारण तुम विलाप कर

सखी दूसरीः प्राणों से प्यारी सक्षी, हम तुम्हारे पाँव पड़ते हैं, हमें बता दो कि कारण क्या है?

"""""""""""श्लोक"""""'"''"""""

ततः सीता विनिःश्वस्य चरिते पूर्व जन्मनः। सखीभ्यां वर्णयामास रुदती सुदती सती

सीता कुछ संभली, अपने आँसू पोंछ लिए, एक आह भरी और अपनी सखियों के साथ संताप करने लगीं।

सूत्रधार:-मेरी प्रिय थियो! में अभागन क्या कहूँ पूर्व जन्म में मैंने नारायण को अपने स्वामी के रूप में पाने की इच्छा की थी। कई जन्मों की मेरी इच्छा के कारण मैंने कई वर्षो तक तपस्या की तब मैंने एक आकाशवाणी सुनी, "ऐ कन्या! इस जन्म में तो नहीं परन्तु अगले जन्म में आपका विवाह श्री राम से होगा।" यह जानकर मैंने अग्नि में प्रवेश किया और प्राण त्याग दिए। मेरी सखियो ! लगता है कि वह देव वाणी विफल हो गई है। अभी तक इस जन्म में, श्री राम के चरणों की भेंट संभव नहीं हो पाई है।

पृष्ठ 202

[सम्पादन]
                                           गीत

राग सुहाइ - चुटिकला

ध्रु. : विलपति मैथिलि माइ नीर नयन झुराइ ।
            घन घन स्वास फोकारत तनु चेतन नाई ॥

पद : चिर विरहे दहे देहा दिश देख अन्धियारी। रमया बिने मन झामर परमरुचि कुमारी । हा हरि हरि जम्पय जीव यैचे नायाइ । राम चरणे लागु गति आवरि नाइ ॥

सूत्रधार : सीता को इस प्रकार विलाप करते हुए देखकर उनकी सखियों ने उन्हें सांत्वना दी और कहा

सखी : ऐ प्राणों से प्यारी सखी, भक्तों के बान्धव वे माघव तुम्हारा दुख दूर करेंगे। अवश्य ही तुम्हारी भेंट तुम्हारे स्वामी से होगी। इस कारण है सखी तुम यह ताप छोड़ दो।

सूत्रधार : हे सामाजिक! यह सुन जनक-पुत्री सीता कुछ स्वस्थ लगीं और अपनी सखियों के साथ एक तरफ की हुईं और राम के चरणों का ध्यान करती रहीं। उसके पश्चात् अब राजा दशरथ का प्रवेश देख लीजिए ।

                                         श्लोक

 प्रविशेष महातेजा राजा दशरथस्तदा । छत्र चामर संयुक्तो धनुष्पाणिनृपोत्तम ॥

                              गीत ( राग कानाड़ा-परिताल)

घु : आये दशरथ पृथिवी नाथ। ढुले चामर छत्र धरु माथ॥

पद : दुर्जय वीर धरिये शर चाप काम्पे रिपुसब याहे प्राताप ॥ त्रिभुवन ईश्वर रामक बाप

। याहे हेरि दूर होवय पाप॥ सूत्रधार : इस प्रकार राजा दशरथ ने हर्षित भाव से प्रवेश किया और आसन ग्रहण किया ।

                                                      श्लोक

शिश्येन साकमागत्य विश्वामित्रो महामुनिः ।
आशीर्वाद ददौ तस्मै राज्ञे मन्त्रमुदीरयन

सूत्रधार : उसके पश्चात् ऋषिराज कौशिक अपने शिष्यों के साथ पधारे तथा राजा दशरथ को आर्शीवाद दिया। उन्होंने क्या कहा देखिए और सुनिए तथा निरन्तर हरि का जाप करते रहें ।

पृष्ठ 203

[सम्पादन]
                             गीत (राग कनाड़ा-परिताल )

पु. : आवत कौशिक चण्ड माला माये हाथ धरु दण्डा

पद : लाइय बाहु हरि गुण गाया। सचकित नयन चतुद्दिके चाई ॥ शोभे सुललित तिलक कपाल हेरत कोपे कैसे यम काला

सूत्रधार इस प्रकार ऋषिराज ने आकर राजा को कैसे आर्शीवाद दिया, देखिए और सुनिए ।

                             श्लोक

चिरजीव चिरजीव चिरन्जीव जनाधिप ।
पुत्र पत्नी समयायुक्तः भक्तिमान भव मायदेश

कौशिक हे राजा दशरथ ! आप सपरिवार चिरंजीव रहें।

सूत्रधार राजा ने ऋषि को हाथ जोड़कर प्रणाम किया, आसन पर बिठाया और कहा-

दशरथ हे मुनिराज! आप के चरण के स्पर्श से हमारी अयोध्यापुरी आज पवित्र हुई। मेरा जन्म सफल हुआ। हे मुनिराज आज्ञा करें कि मैं क्या दान करूँ। इस सभा के सामने मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि आप जो माँगेंगे सो दे दूँगा।

कौशिक

(राजा के शब्द सुनकर उठ खड़े हुए। प्रसन्नता में नृत्य करने लगे) आज मेरा मनोरथ पूरा हुआ! (राजा को आर्शीवाद दिया) हे प्रिय नरेश आप पृथ्वी के कल्पतरु हैं। आप के यहाँ से कोई भी निराश होकर नहीं जाता है; यह मैं जानता हूँ, अब मेरी प्रार्थना सुनें। मैंने सिद्धाश्रम में यज्ञ आरम्भ किया था परन्तु दो राक्षस मारीच और सुबाहु उसमें विघन डाल रहे हैं। उस यज्ञ की रक्षा करने के लिए दोनों कुमार राम तथा लक्ष्मण मेरे साथ चलेंगे तो मेरा मनोरथ पूर्ण होगा।

                                 श्लोक

तन्निशम्याभवद्भीतः पपात मूच्छितो भुवि ।

करोति कातरं राजा विघृत्य चरणौ मुनेः ।/<Poem>

सूत्रधार ऋषि के यह वचन सुनकर राजा मूर्छित हुए थोड़ा संभल कर फिर ऋषि के चरणों में पड़े और कहा-

दशरथ हे मुनिराज ! हमारे पुत्र राम और लक्ष्मण बालक हैं। आप उन्हें राक्षसों को देना चाहते हैं यह कैसा व्यवहार है! हे ऋषिराज यज्ञ की रक्षा के लिए आप मुझे ले जाइए।

रामविजय (नाटक) 203

==पृष्ठ 204==
सूत्रधार :राजा के वचन सुन कौशिक ऋषि क्रोधित हुए और भर्त्सना करने लगे। कौशिक : ऐ असत्यवादी पापी, तुम राम और लक्ष्मण को नहीं भेजना चाहते?

सूत्रधार : यह कह कर, क्रोध से कंपित अपनी भुजाएँ उठाते हुए ऋषि वेग से चलने लगे। तब राजा आगे आए और उनके चरणों में गिर कर कैसे विलाप करने लगे देखिए और सुनिए। निरंतर हरि बोल बोलते रहिए।

गीत (राग सुहाइ यति ताल )

पद

करहु करुणा ऋषि सुत दान देह। कोन मुहे कहब रामक तुहु लेहु ॥ : नेहवि राम राक्षस लागि मागि। आहे अधिक हृदये दहे आगि । बालक राम किछुवे नाहि जाने। ताहे नाहेरि रहबि नाहि प्राणे ॥

दशरथ

हे ऋषिराज! आप कैसे राम को राक्षसों के सामने कर सकते हैं। यह उचित नहीं। ऐ पिता, राम को छोड़ दें मुझे ले जायें।

घु.

कौशिक : ऐ प्रिय दशरथ ! आप को राम के चरित्र के बारे में कुछ मालूम नहीं। 1 योग के कारण, इसके बल से मैं सब कुछ जानता हूँ। रामचन्द्र परम ईश्वर हैं और हरि के अवतार हैं। सभी असुरों और राक्षसों को मार कर ये भूमि का भार उतारेंगे। यह जानकर आपको कोई चिंता नहीं होनी चाहिए। आप राम और लक्ष्मण को मेरे साथ जाने दीजिए।

सूत्रधार राजा, ऋषि की बात सुनकर कुछ स्वस्थ हुए और उन्होंने राम तथा लक्ष्मण को कौशिक ऋषि के साथ जाने दिया। ऋषि दोनों राजकुमारों के साथ प्रसन्नतापूर्वक चलने लगे। देखिए और सुनिए तथा हरि बोल कहते रहें ।

पयार

(राग कानाड़ा)

चलल कौशिक साधिये काम। पाचु पाचु चलल लक्षमण राम देलहु धनुक दिव्य बाणा । लक्षमण राम पेखहि सब जाना ॥ आश्रम याइते ऋषिक उचाट । पेखिये ताड़का वेढ़ल बाट | मिलिल भय्य पिशाचिनी हासे । काम्पे कौशिक पड़िये तरासे ॥ राक्षसी खाइ राख रघुनाथे । शुनिये राम धरल धनु हाते ॥ बुलिये निर्भय जोरल बाण । ताडका हृदये करु सन्धान ॥ पड़ल पिशाची तेजि आटास । वज्रपाते यैचे लोक तरास ॥

==पृष्ठ 205== हृदये आनन्द मिलिल अधिक। साधु साधु रामक बोल कौशिक । हरिये शिहरे देहक लोग आश्रम पाई आरम्भल होम | देखिये धूम मारीच सुबाहु । चान्द गिलिते यैच आवल राहु ॥ त्रासे कौशिक कहय आरावे। पेखु पेखु दोहो राक्षस आवे। अब रघुनाथ करहु मोह त्राण । शुनिये राम धरल धनु बाण ॥ बिघल हृदय मरमक सन्धाने उडल राक्षस रामक वाणे॥ भेलि सुबाहु सागरत पात मारीच प्राण पड़ल लंकात ॥ नाश गेल अब दोहो पिशाचे कौतुक उठि कहु कौशिक नाचे ॥ रामक रंगे साधु साधु बोल जय जय राम करब घनरोल ॥ परम सन्तोष पा कर कौशिक ने राम को आर्शीवाद दिया।

सूत्रधार :

श्लोक

जय जय रघुनाथ पार्थकत्राण हेतुः रघुकुल कमलाली सूर्य्य वंशस्य देवः । हरतु दुरितमेषां नाम संकीर्त्तनः यः स्वजन सुत कलत्रैः जीवतु सः चिरायुः॥ रामचन्द्र जो सूर्य समान है, जिन्होंने रघुकुल का कमल खिला दिया वे

कौशिक :

सूत्रधार

पत्नी और पुत्र समेत चिरंजीव रहें यह हमारा आर्शीवाद है। : यह बोलकर ऋषि ने तुलसी दी और आर्शीवाद दिया। श्रीराम ने माथा झुकाकर आर्शीवाद लिया।

कौशिक हे

रामचन्द्र ! आपने हम पर बहुत उपकार किया। मारीच तथा सुबाहु जैसे राक्षसों को मारकर हमारा यज्ञ सिद्ध किया। आपके गुणों का क्या कहूँ। मैं प्रत्युपकार क्या कर सकता हूँ।

सूत्रधार कौशिक

यह बोलकर ऋषि ने कुछ विमर्श किया और पुनः बोले..... : हे प्रिय रघुनाथ! अच्छा प्रयोजन है। आज सीता का स्वयंवर है। हम जानते हैं कि जनक की पुत्री को वही पा सकेगा जो महेश का धनुष उठा पायेगा। वह भाग्यवती आपकी गृहिणी बनेगी तो मुझे परम आनन्द प्राप्त होगा। मैं योग बल से जानता हूँ कि सीता ने आपको पति के रूप में पाने के लिए बहुत तप किया है। इस जन्म में भी वह आपको पानें लिए सदा आपके चरणों का स्मरण करती रहती है। परम विरह में वह केवल आपकी ही प्रतीक्षा कर रही है। उनके सुन्दर रूप के बारे में बताता हूँ, सुनिए :

भटिमा

कि कहव रूप कुमारिका रामा। कनक पुतलि तुल तनु अनुपाम ॥ रतन तिलक लोले अलक कपोल । हेरिये भ्रूभंग त्रिभुवन भोल॥





==पृष्ठ 206==
देखिये वदन चान्द मेति ताज नयन निरिखि कमल जल माजा हेरिये भुज युग मिलल उसका ललित मृणाल भजल जलपंक॥ आस्तक करतल मुनिमन मोहा। कनक शलका आंगु करु शोहा॥ वन्दुलि अधिक अपर अरु कान्ति हामि निविड़ बीज दन्त पान्ति इषत पति मदन मोह याद नासा विलफुल कमलिनी माइ॥ नवयोवन तन बदरी प्रमाण उरु करिकर कटि डम्बरुक ठान॥ पद पल्लव नव पंकज कान्ति। चम्पक पापरि आंग लिक पान्ति ॥ नखचय चारु चान्द प्रकाश लहु लहु मत्त गज गमन विलास ॥ कल लावण्य विधि निरमिल जानि कोकिल नाद अमिया जुरे वाणी ॥ 1 तुहुँ सुकुमार रूपे नोह हीन राज कुमारीक वयस नवीन ॥ सोहि वर रमणी धरणी यब हुई तब गृहवास साम्फल तब हुई। कहलो स्वरूप वचन श्रीराम चलय अविलम्ब जनकक थाम॥ भावि अजगव धनुक लोलाये। शुनि सीता भजब तुवा पावे ॥ जानि हामि सत्य बाणी बोल। डाकि करहु नर हरि हरि बोल ॥

"""श्लोक"""""

सीतायाः- रूपलावण्यं एवं निशम्य राघवः ।

ऋषिमाभ्याष्य भगवन् जगाम मिथिलां प्रति ॥

सूत्रधार:-सीता की सुन्दरता तथा रूप का वर्णन सुनकर श्रीराम के मन में, मदनके प्रभाव में, सीता से मिलन की इच्छा जागृत हुई। जानकी से वियोग के कारण एक आह भरी तथा ऋषि से बोले

के प्रभाव में, सीता से मिलन की इच्छा जागृत हुई। जानकी से वियोग के कारण एक आह भरी तथा ऋषि से बोले ।

श्रीराम:-हे महा मुनिराज ! महेश का धनुष वज्र से भी कठिन है उसके लिए मेरी क्या योग्यता है तथापि आप की आज्ञा का पालन करना मेरा धर्म है, इस कारण हमें शीघ्र चलना चाहिए

हे महा मुनिराज ! महेश का धनुष वज्र से भी कठिन है उसके लिए मेरी क्या योग्यता है तथापि आप की आज्ञा का पालन करना मेरा धर्म है, इस कारण हमें शीघ्र चलना चाहिए।

सूत्रधार:-ऐसा कह कर श्री राम अपने भाई के साथ ऋषि के पीछे-पीछे मिथला की ओर चल दिए। देखिए और सुनिए तथा बोलिए हरि के बोल निरंतर ।





ऐसा कह कर श्री राम अपने भाई के साथ ऋषि के पीछे-पीछे मिथला की ओर चल दिए। देखिए और सुनिए तथा बोलिए हरि के बोल निरंतर ।

"""गीत""""

""""(राग माहूर ताल यति)"""""

घु:-: रमया चले मिथिलाक लाइ ।

राजीव लोचन श्याम सुन्दर सोदर संगहि जाए

पद:-: सुनिये रामणीक काहिनी मिलल होय मुरारि ॥ भाव भिन्न रीत भेति किंचित चित्त मदन बिगारि

==पृष्ठ 207==
वदन इन्दु मदन झामर काम पहिल प्रवेश। चलतु राघव काम कौतुक हरतु केशव क्लेश ॥

सूत्रधार :-इसके पश्चात, मिथिलापुर अपने भाई और ऋषि के साथ पहुंचकर श्रीराम ने राजा जनक की राज सभा में प्रवेश किया। हाथ जोड़कर अपने आसन से उठकर राजा ने राम लक्ष्मण सहित विश्वामित्र को आदर के साथ बिठाया। राजा जनक ने स्तुति की।

जनक :- हे ऋषिराज, आपके पधारने से आज हमारा मिथिलापुर पवित्र हो गया। मैं भाग्यशाली बना ।

सूत्रधार ऋषि ने आर्शीवाद देते हुए श्लोक पढ़ा।

""""श्लोक"""'"

ऋषि :- चिरञ्जीव चिरजीव राजन् सज्जन रज्जन । गज-वाजी महेश्वर्य भाय्र्यात्मज युतः सदा॥ हे महाराज जनक, आप पत्नी और पुत्र सहित सदा सुखी रहें। मैं आपके सत्कार से बहुत ही प्रसन्न हूँ ।

सूत्रधार:- राम और लक्ष्मण का सुन्दर रूप देखकर राजा जनक को आश्चर्य हुआ और उन्होंने पूछा।

जनक :-हे ऋषिराज, ये दो बालक इनका अद्भुत रूप देखकर आनन्द हुआ। कौन हैं ये, देव कि मनुष्य? मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है परन्तु इन्हें देख कर संतोष मिल रहा है।

सूत्रधार :-यह सुन, ऋषि ने श्लोक पढ़ा।

""""श्लोक"""""

विश्वामित्रः-सुतौ दशरथस्यैती आगती राम लक्ष्मणी ।

दुहितुस्तव सीतायाः स्वयंवर दिघ्क्षया ।। हे महाराज, आपका इनसे परिचय नहीं है। ये राजा दशरथ के पुत्र हैं, जो आपका परम मित्र है, और ये दोनों मेरे प्रिय शिष्य हैं। इनका नाम राम तथा लक्ष्मण है। ये यहाँ सीता का स्वयंवर देखने आये हैं। यह जानते हुए आप सभी को बुलवायें तथा महेश का धनुष भी शीघ्र से आने को कहें।

सूत्रधार:-राजा जनक ने राम और लक्ष्मण का आलिंगन किया और बोले ! जनक : धन्य ! धन्य हैं राजा दशरथ जिनके घर में ऐसे सुकुमार कुमार हुए हैं। कितने भाग्यशाली हैं वे जिनके परिवार में ऐसे सुन्दर राजकुमार हैं। सूत्रधार यह बोल कर राजा ने शंख नाद से उत्साहपूर्वक संदेश दिया और

/*208*/

मणिमंत को आदेश दिया।

जनक

ऐ मणिमंत, जो राजा यहाँ पधारे हैं उन्हें शीघ्र एकत्र कर सभा में

सूत्रधार यह सुनकर, मणिमन्त बाहर चले गये।

श्लोक

<Poem>निशम्य परमा रामा रामागमन कौतुकम् ।

सखी सम्प्रेषयामास जानकी कनकावतीम् ॥<nowiki>

</nowiki>

सूत्रधार उसके बाद, ढोल, डंका, शंख, गोमुख, मृदंग, ताल, करताल और काहात की उत्सव ध्वनियाँ सुन कर जानकी ने अपनी सखी से कहा।

सीता :हे कनकावती, किस कारण यह हर्ष का संगीत बज रहा है? राजसभा में कौन पधारे हैं जरा जानो तो! मेरे बायें अंग फड़क रहे हैं, कुछ शुभ होने का संकेत ही है, क्या होगा कुछ जानूं नहीं।

श्लोक

तस्याः कथामाकर्ण्य कौतुकात् कनकावती । ययौ राजसभां साच्ची सीतां नत्वाति सत्वरम्॥

सूत्रधार : सीता का यह आदेश सुनकर कनकावती ने प्रणाम किया और चली गई। देखें और सुनें और हरि बोल निरंतर बोलते रहें।

गीत

(राग धनश्री-एक ताल )

घु. कौतुहले चले मायि । राम परिचये लाइ । कामिनी कनकावती । याइ राजहँस गति ॥

पद : पावे समाक सती। देखल रघुपति॥ वैचन गगन माज। उदित नक्षत्र राज ॥ पेखि पायगु भेति पुलकित त झुरे नयनक नीर। तनु मन नोहे धीर ॥

सूत्रधार : सभा के बीच राम का रूप देखकर कनकावती विस्मित हुई और सीता के पास जाकर बोली।

कनकावती : हे प्राणसखी! तुम बहुत भाग्यशाली हो तुम्हारा महोदय मिल गया। सीता : हे प्राणसखी! तुमने जो देखा, जो सुना वह मुझे तुरन्त बता दो।

कनकावती ऐ जनक पुत्री! जिसके निमित्त, जिसके विरह में तुम यह जीवन बिता रही हो वह दशरथ कुमार जिसका रूप कोटि कन्दर्पो को मात दे, दही रामचन्द्र तुम्हारे स्वयंवर के बारे में सुनकर आये हैं। उनको देखकर ही

राजा जनक ने दुन्दुभि बजाई है। हे सखि श्री राम के मनुष्य रूप का क्या कहूँ, उनके एक अंग की मोहकता का वर्णन करते-करते सौ वर्ष लगेंगे। फिर भी मैं कुछ-कुछ कहूँगी, सुनो!

                भटिमा

शुनि सखि वचन स्वरूप। कि कहवा रामक रूप ।।

श्याम मुरति पीत वास । घने जैचे बिजुरी बिकाश ॥ 

मस्तक छत्रक वेश । नील आकुचिंत केश ॥ रुचिकर कर्ण अतुल नासा नीत ठिल फुल। वदन इन्दु परकाश । अरुण अधर मन्द हास ॥ ओतिम दशनक पान्ति । माणिक झिकमिक कान्ति ॥ मदन धनु ध्रुव भंग । भुज युग वलित भुजंग ॥ नयन पंकज नव पाता। करतल उतपल राता ॥ आंगुलि ललित अमूल। नखचय चान्दक तुल॥

सुन्दर उदर कटि बन्ध । शोहे सिंहबन्ध कन् ॥
उरु करि कर निरुपाम । चरण कमल केश श्याम ॥ 

पदतल रातुल कान्ति । ध्वज यव पङ्कज कान्ति ॥

मानुष एचन रूप। नाहि शुनि कहलो स्वरूप ॥ 

नवीन वयस सुकुमार । भेलि नारायण अवतार || किनो भेलि भाग्य तुहारि । तुहु नव तरुणी कुमारी ॥ विधि मिलावल आनि । तेरि मनोरथ जानि ॥ अब सब पूरब आस । विरह दुख गेल नाश||

पावल स्वामिक कोल। कर नर हरि हरि रोल ॥

कनकावती :हे सखी जिस महापुरुष को देखा, मैं जान गई कि वे स्वयं नारायण हैं, जो श्रीराम के अवतार में तुम्हारे साथ विवाह करने के लिए आये हैं। इस में तो कोई शंका ही नहीं है। सखी! तुम्हारा मनोरथ सफल हो रहा है।

                       श्लोक

श्रुत्वा सखीमुखाद्रामचन्द्रस्य चरितामृतम् ।

सूत्रधार :मूर्च्छिता पतिता सीता सुमहा हर्ष धर्षिता ॥

श्रीराम का परम चरित्र सुनकर सीता को अत्यधिक प्रसन्नता हुई। हर्षित होकर प्रेम की अकुलाहट में अचेत हुई। सुनिए और देखिए तथा हरि के बोल निरंतर बोलिए।

सूत्रधार:-मणिमंत को आदेश दिया। ऐ मणिमंत जो राजा यहाँ पधारे हैं उन्हें शीघ्र एक कर सभा में बुलाएँ।


यह सुनकर, मणिमन्त बाहर चले गये।

"" """"""श्लोक"""""""""""""""

निशम्य परमा रामा रामागमन कौतुकम् सखी सम्प्रेषयामास जानकी कनकावतीम्॥

उसके बाद, ढोल, डंका, शंख, गोमुख, मृदंग, ताल, करतात और का की उत्सव ध्वनियों सुन कर जानकी ने अपनी सखी से कहा सीता + हे कनकावती, किस कारण यह हर्ष का संगीत बज रहा है? राजसभा में कौन पधारे हैं जरा जानो तो मेरे बायें अंग फड़क रहे हैं। कुछ शुभ होने का संकेत ही है, क्या होगा कुछ जानूं नहीं।

श्लोक तस्याः कथामाकर्ण्य कौतुकात् कनकावती ।

यो राजसभां साधी सीतां नत्वाति सत्वरम् ॥

सूत्रधार सीता का यह आदेश सुनकर कनकावती ने प्रणाम किया और ची गई। देखें और सुने और हरि बोल निरंतर बोलते रहें।

गीत (राग धनश्री-एक ताल)

कौतुहले चले माथि राम परिचये लाइ कामिनी कनकावती याइ राजहंस गति॥


पद + पाये सभाक सती देखत रघुपति

पैचन गगन माज उदित नक्षत्र राज

पेखि रूप लावणु भेति पुलकित तनुम

झुरे नयनक नीर तनु मन नोहे थी।

सभा के बीच राम का रूप देखकर कनकावती विस्मित हुई और सीता के पास जाकर बोली। हे प्राणसखी ! तुम बहुत भाग्यशाली हो तुम्हारा महोदय मिल गया।



कनकावती सीता हे प्राणसखी! तुमने जो देखा, जो सुना यह मुझे तुरन्त बता दो। कनकावती ऐ जनक पुत्री जिसके निमित्त, जिसके विरह में तुम यह जीवन बिता रही हो वह दशरथ कुमार जिसका रूप कोटि कन्दपों को मात दे, यही रामचन्द्र तुम्हारे स्वयंवर के बारे में सुनकर आये हैं। उनको देखकर से

पृष्ठ 2१0

[सम्पादन]

गीत

(राग घनश्री-एक ताल)

घु. : स्वामीक चरित्र शुनिये कुमारी । भेलि पुलक तनु चेतन आकुल, कमल नयन झुरे वारि॥

पद: राम चरण चित्त थिर चिन्तिये, नयना मुदि रहु माइ॥ प्रेम परश रस राजनन्दिनी यैच मानस अमिया झुराइ॥ याहे विरह दहे रहेना जीवन सो पिउ पावल कोल॥ आनन्द सिन्धु मगन मन कानिनी, कृष्ण किंकर ओहि बोल॥

सूत्रधार: सीता की सहायता करते हुए कनकावती और मदनमन्थरा ने कुमारी के अंग पोंछ लिए और बोले ।

कनकावती: हे प्राण सखि ! जिस रामचन्द्र से मिलने के लिए तुम ने इतनी प्रतीक्षा की है विधि ने तुम्हें उनसे मिलने का सौभाग्य प्रदान किया है।

मदनमन्थरा: हे सखि! आनन्द के इन क्षणों में तुम क्यों आकुल हो? संभालो अपने आप को.....

सूत्रधार: आनी सखियों के शुभ वचन सुनकर सीता श्रीराम के चरणों का ध्यान करती हुई एक तरफ को हो गईं।

श्लोक

ततो नृपान् समान्य मणिमन्तो नृपाज्ञा । कारयामास महतों सभामुत्सवशोभिताम्॥

सूत्रधार: तब फिर राजा जनक की आज्ञा से आये हुए सभी राजाओं की मणिमन्त ने सभा बुलाई। देखिये और सुनिए तथा निरंतर बोलिए हरि बोल ।

गीत

(राग कनाडा-परिताल)

घु.: आवे नृप सब धरि शर चाप ।

काम्पे धरणी परम प्रताप॥

पद: कहु काण्डे खाण्डा उड़ि हाता। दशन कामुरि झंकारे माथा॥ दरपे करन्त धर मार रोल । आवल राजसभा फेरि कोल ॥

श्लोक

सखीभिः सकमभेद्यां जानकी जनकोऽनयत् ।

महेश धनुः स्कन्धे निधाय शोभितां सभाम्॥

सूत्रधार: इसके पश्चात् राजा जनक, महेश का अजगव कंधे पर उठाए सभा में प्रवेश कर गए। सीता तथा उनकी सखियाँ भी राजा के साथ प्रवेश कर गईं। सभी अलंकारों और सुन्दर वस्त्रों से सुशोभित सीता के हाथों में स्वर्ण-कमलों की माला थी। सभा में उत्सव की प्रतीक्षा में सभी थे।

गीत

(राग सुहाइ-चुटिकला ताल)

ध्रु. : जानकी कामिनी कौतुके चलिली लाय। सखी सब संगे संगे करतु केलि, मेलि आंचोला दुलाय॥

पद: नव पिउ परश रसिक करू बाला माला करतले लोले ।

चरण रंजि मणि मंजिर झनकित कनक किंकणी रोले॥

मत्तगज गामिनी कामिनी माइ जाय निज पिउ पासा ।

हेरिये नृपसब मदने दहतु मन कहतु कृष्णाक दासा॥

सूत्रधार: राजकुमारी का नव यौवन तथा रूप देखकर स्वयंवर आये राजा कामदेव के बाण से मूर्छित होने लगे । अचेत होने लगे । पुनः चेतनता प्राप्त करके वे सीता से बोलने लगे।

एक राजा: हे प्राणेश्वरि! हम काम के सागर में डूबे हैं हमारा उद्धार करें।

दूसरा राजा: (मुँह में अँगुली रखे हुए राजा ने कहा) हे राजकुमारी! कामदेव ने हमारी बुद्धि हर ली है। अपने हाथ से स्पर्ष कर के हमारा कल्याण करो।

तीसरा राजा: (घास की तीली चवाते हुए, नम्रता के साथ कहा) हे सुन्दरी! मदन के बाण से बेधित हैं हम, अपने वचनों के अमृत से हमें फिर से जीवित करें।

चौथा राजा: (अत्यधिक प्रेम से लालायित ) हमारे पास जितनी भी रानियाँ हैं, उन सभी को हम आपकी दासियाँ बनाएँगे। हम आप के चरणों के दास हैं। अपनी एक दृष्टि डालकर हमें प्राणदान दें।

सूत्रधार: इस प्रकार काम के मद में भ्रष्ट राजाओं की भावना को देखकर सीता की सखियों कनकावती, मदनमन्थरा, चन्द्रावती, सूर्यप्रभा ने उन से दुर्व्यवहार किया। कुछ को लात मारी, कुछ को धकेल दिया, कुछ को बांध दिया तथा दो-तीन को पीट दिया। परन्तु फिर भी वे राजे अनुनयकरते रहे।

ऐ दर्शको, कामातुर पुरुषों की हरि की भक्ति बिना दशा देख रहे हो! इन्हें पता नहीं है कि जनक की पुत्री इस जगत की माता हैं। यह जान कर, निरंतर हरि बोल बोलते रहिए।

पृष्ठ 2१2

[सम्पादन]

पृष्ठ 214

[सम्पादन]

धरिकहु रमणी राम हासि तोले। स्वामिनी कमिनीआंचोले ढोले ॥ सूत्रधार : हे सामाजिक सीता ने राम को स्वामी स्वीकार करते हुए आनन्द के साथ कर्पूर और ताम्बूल भेंट किया। यह देखकर वहाँ उपस्थित राजा लोग व्यग्र हुए, अपने-अपने धनुष बाण लिए अभिमान के साथ श्रीराम पर गरजे ।

राजा लोग ः ओह ! कहाँ से आया है यह! देखो, हमारी दुल्हन ले गया। हम सब पर धिक्कार है। रोको इसे, मारो इसे ।

""""""""""श्लोक""""""'""

श्रुत्वा सीताभवद्भीता भूपाल वीरभाषितं । रुरोद वेपुथमती शोचन्ती चर पतिं प्रति ॥

सूत्रधार राजाओं के विक्षुब्ध शब्द सुनकर राजकुमारी की आकुलता बढ़ी। जानकी ने विलाप करते हुए क्या कुछ कहा, देखिए, सुनिए और हरि के बोल बोलते रहिए।

सीता : हाय! विधि ने मेरे भाग्य में क्या लिखा है। हरि ! हरि ! मेरे स्वामी राम युवा हैं अनुभवहीन हैं और उनके साथ केवल उनके सहोदर हैं, वे कैसे इन निर्दयी और अनुभवी राजाओं के साथ युद्ध जीतेंगे? हे दैव मैंने कौन सा अपराध किया है!

सूत्रधार ऐसा बोल कर जानकी अपने स्वामी के लिए विलाप करने लगी।

"""""""""गीत

""""""''(राग गोरी- विषमताल )""""""

धु. : नाइ नाइ चेतन तनु नयने क्षुरे

वारि ।

विलपति भाइ पिउक लाइ तापे परि कुमारि ॥

पद : पुरब जनम पुइन परम पावल पहु ओहि । बँकिम विधि हातक निधिहरे अभागीय, मोहि ॥ दुर्लभवल्लभागिया आबुल करतु हृदि समारि हरि हरि स्मरे श्वास फोकारे पहुक मुख निहारि ॥

""""'"""""""""श्लोक"""""""""""

भीतां सीतां ततो रामः: निरीक्ष्य कृपया प्रभुः । प्राह प्रियां समाश्वास्य मा भैः स्थिते मयि ॥

सूत्रधार : अपनी प्रिया को सन्ताप में देखकर रामचन्द्र ने वाहें फैलाकर पकड़ लिया और कहा।

रामचन्द्र

-हे प्राणप्रिये! तुम्हें किस बात का भय है? ये राजे हमारे सामने क्या हैं, जैसे सिंह के सामने हिरणों के शावक हो! हमारे बाणों के प्रहार से थे क्षण में भाग जाएंगे। कोतुक के साथ देखते रहो!


रामचन्द्र जी ने इस प्रकार जानकी को आश्वस्त किया और धनुष की टंकार पर बोले ।


ऐ सभी पापी राजाओ इस धनुष को तोड़कर मैंने जानकी को पाया है, तुम लोग ऐसा आचरण क्यों कर रहे हो? यदि शक्ति है तो मेरे साथ युद्ध करो!


श्रीराम की वाणी सुनकर सभी राजाओं ने धनुषों की टंकार के साथ बाणों की वर्षा की। श्री रामचन्द्र ने सभी बाण खाँडेत किए तथा प्रत्येक राजा पर अपने बाणों से प्रहार किया किन्हीं का हृदय भेदन हुआ, 1 किसी-किसी की जायों में श्रीराम का बाण लगा, किसी के कूल्हे में बाप लगा, किसी की भुजाएँ और कान कट गए और जो बाकी बचे थे के भव के कारण भाग गए।

श्लोक

निरीक्ष्य साक्षाद्रामस्य विजयं जनको मुदा ।

विवाहे विधिवत् वीरो राघवाय सुतामदात् ॥

सूत्रधार:-

उसके पश्चात् रामचन्द्र का परम विक्रम देखकर राजा जनक का मन अति प्रसन्न हुआ। उसी समय राजा दशरथ के पास दूत भेज दिया। राजा दशरथ ने अपने पुत्र के पराक्रम और सीता की प्राप्ति की बात सुनी तो राजा जनक का अलिंगन किया, फिर आनन्द से नाचने लगे। राजा जनक ने विवाह का आरम्भ करवाया। विश्वामित्र ने होम का उपक्रम किया।

"""""""""श्लोक""""""""

ऋषिः निरीक्ष्य सीतायाः रूप लावण्यमद्भुतम् ।

सूत्रधार:-

पुलकांगः पपातोर्व्या कामात मूर्तितो यथा ॥

सीता का चंद्रमा जैसा मुख देखकर, जो सारे जगत को सम्मोहित करता है, ऋषि मंत्रमुग्ध हुए तथा आहुति की करछुल उनके हाथ से गिर गई। उनका शरीर काम्पने लगा और वे मूर्छित हुए। यह देखकर उनके शिष्य गालव ने कहा।


हे गुरु यह कैसा व्यवहार? शांतचित रहि


पृष्ठ 216

[सम्पादन]

""""""श्लोक""""""""

ततश्वेतन मालभ्य मुनिर्मन्त्रमुदीरयेत्। तदोद्वाह विधी तस्मिन् उत्सवः सुमहान भूत।।

सूत्रधार उसके पश्चात, शांतचित होकर, बार-बार विष्णु का नाम लेते हुए मुनि ने आहुति का करछुल हाथ में लेकर होम कराना प्रारम्भ किया। विवाह कराते समय मुनि ने वर और कन्या के केश एक साथ कर के पानी डालना शुरू किया। ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र आदि देवता आनन्द मनाने लगे। देखिए, सुनिए और निरंतर हरि बोल बोलते रहिए।

""""गीत""""""

"""""(राग सुहाय यतिमान )"""""

घु : रघुनाथ कौतुके करतु विवाह । सुरपुर मिलल उत्साह ॥

पद : शम्भु स्वयम्भू गुण गावे। इन्द्र मृदंग रंगे चावै ॥ वरिषे कुसुम सुर रामा। पूरल सब मन कामा॥

सूत्रधार:- इस प्रकार सीता का विवाह आनन्द के साथ करके राजा जनक ने जो भी उपहार प्राप्त किए थे वे सभी श्रीराम जी को दे दिए। राजा दशरथ को बहुत सम्मान दिया तथा वर और कन्या को अयोध्या के लिए प्रस्थान कराया।

"""""श्लोक""""""

ततोऽति-कौतुको रामः प्रियया सह सीतया ।

ससोदरो भ्राजदयोध्याम्प्रययौ पुरिम ॥

सूत्रधार इसके पश्चात, श्री रामचन्द्र अपनी पत्नी प्रिय सीता तथा सहोदर के

साथ प्रसन्नता के साथ अयोध्या को चलने लगे। हे लोक ! देखिए,

सुनिए और निरन्तर हरि का नाम लेते रहें

मत मातंग संगे यैचन तरुणी करिणी आवे । जय जय रव चौदिशि उत्सव कृष्ण किंकरे गावे ॥

""""''''श्लोक""""""""

ततः आगत्य तरसा भार्गवो भ्रुकुटि मुखः स्कन्धे निधाय कठिन कुठारं राममब्रवीत्॥

सूत्रधार ऐसे महोत्सव में रामचन्द्र और सीता चलने लगे। तभी, अपने गुरु महेश के धनुष के भंग होने की बात जानकर, बहुत ही क्रोध में, परशुराम कंधे पर कुल्हाड़ी लेकर सामने आये और श्रीराम को आगे जाने से रोका।

सूत्रधार:-परशुराम अरे नीच! कैसे तुमने मेरे गुरु का धनुष भंग किया? परशुराम को जानते नहीं क्या? इस भूमि का इक्कीस बार भ्रमण किया है तथा कुठार से सब क्षत्रियों के गले काटे हैं। इसी कारण इस कुठार में धब्बे पड़े हैं आह ! आज तुम्हारे काँधे के रक्त से यह फिर से रक्तमय हो जायेगी।

सूत्रधार ऐसा कहते हुए, बाँहे उछालते हुए परशुराम कहते रहे।

""""""श्लोक""""""""""

तन्निशम्याभवद्भीतः भवाद्दशरथो नृपः। स्कन्धे च वसनं कमवा भार्गवराज पपतत्॥


परशुराम का क्रोध देखकर राजा दशरथ चिंतित हो गए। बोले सर्वनाश की बेला आई है। अपना वस्त्र गले में बांधते हुए वे भार्गव के पैरों में पड़े और विनती करने लगे।

दशस्थ:-

हे प्रभु परशुराम ! हमारा पुत्र रामचन्द्र एक बालक ही तो है, कृपया इसके दोष क्षमा करें। मैं आपके चरणों का दास हूँ, माथे पर यह घास का तिनका रखकर आपसे अपने पुत्र का दान माँगता हूँ। अगर इसे क्षमा नहीं करते तो इसे छोड़ मेरा सिर काट लीजिए।


इस प्रकार राजा दशरथ ने बहुत विनती की। परन्तु फिर भी भार्गव क्रोध में बोलते रहे। यह देखकर राजा दशरथ ने अपने हृदय पर हाथ रखा और रामचन्द्र को गले से लगाकर कहा ।

दशरथ : हाय पुत्र ! अंत आ गया है। तुम्हारा दर्शन आज के बाद अब दुर्लभ होगा ।

सूत्रधार यह बोलकर राजा दशरथ विलाप करने लगे।


.


. """""(राग भाट. ियाली- यतिमान)""""""

घु-: करतु कौतुके चलतु रमया रमणी संगहि जाइ।


नील घने यैच विजुरि उजुरि कुंजर गमनी माइ



पृष्ठ 2१8

[सम्पादन]

श्लोक

विलोक्य भार्गवं भीता सीता वोपतमानसा । रुरोद पतिमालिंगय हा हतास्मीतिवादिनी॥

सूत्रधार : तब फिर, परशुराम का ऐसा रूप देखकर सीता विलाप करने लगीं, उनका शरीर कांपने लगा।

सीता : हाय! मेरे प्रिय स्वामी आप सब प्रकार से गुणी हैं और यह कैसी विडम्बना है कि आप आज किन के हाथों में जा रहे हैं।

सूत्रधार ऐसा बोल कर सीता ने अपने पति का आलिंगन किया और विलाप करती रही। देखिए, सुनिए !

गीत (राग गौरी- यतिमान )

घु. : हरि हरि रमणी करये पड़ि माइ । पेखि परम पिठ जीव यैचे याइ ॥

पद : पावल कत पुण्ये पहु हामि । हाते हरये विहि नवनिधि स्वामी ॥ नीर झुरये फुकारये घने श्वासा। वंग विधाता कयल सब नाशा ॥

श्लोक

सन्तापं प्रेक्ष्य सीतायाः भक्तायाः भक्तवत्सलः । प्रियां प्रोवाच परमां पाणिना माज्जर्यन्मुखम ॥

सूत्रधार भक्त सीता का ऐसा सन्ताप देखकर श्री रामचन्द्र ने अपनी प्रिय पत्नी के मुख से आँसू पोंछ लिए और सप्रेम वाणी में विश्वास देते हुए बोले- रामचन्द्र : हे प्रिय? इस वनवासी ऋषि की ढीठता देखकर तुम क्यों भयातुर हो, वह मेरे सामने एक तुच्छ कीट जैसा है। देखते रहना में इस दुष्ट द्विज का घमंड क्षण में मिटा दूंगा। हे प्राणप्रिये, आज तुम देखना कि कैसे

इस ऋषि का मैं सिर काटता हूँ। सूत्रधार : उसके पश्चात, एक बार फिर राजा दशरथ ने तृण दाँतों में रखकर परशुराम के पैरों पर पड़े।

दशरथ : हे ऋषिराज ! मेरे पुत्र का दान दीजिए। मैं आपके पाँव पड़ता हूँ। सूत्रधार ऐसा होते हुए भी परशुराम ने क्रोध में दाँत पीसते हुए कहा। परशुराम : ऐ कुठार! तुमने माँ रेणुका का गला काटा है, आज क्यों तुम दशरथ

सूत्रधार :

के पुत्र के प्रति शांत हो। आज तुम्हें और मुझे धिक्कार है! ऐसा बोलकर, अपनी कुल्हाड़ी उठाते हुए श्रीराम को देखा। कुल्हाड़ी को ऊपर उछाला, फिर दोबारा पकड़कर कुल्हाड़ी को देखा। भुजाएँ थमथपाईं और शरीर क्रोध से कांपने लगा।

श्लोक

विश्वामित्रस्तदागत्य भार्गवं प्राह कोपतः । अरे द्विज कुलाङ्गार मत् शिष्यं हन्तुमिच्छसि ॥

विश्वामित्रः

अरे दुष्ट द्विज ! रामचन्द्र मेरे प्रिय शिष्य हैं और तुम उनका वध करने पर तुले हो। यदि शक्ति है तो मेरे साथ युद्ध करो, मैं तुम्हारा घमंड़ मिट्टी में मिला दूंगा।

सूत्रधार :

परशुराम ने क्रोध में आकर लाठी उठाई। विश्वामित्र ने भी लाठी उठाई। दोनों के प्रहार से दोनों लाठियां टूट गई। उसके बाद, दोनों पेड़ की छाल से एक दूसरे पर प्रहार करने लगे परन्तु वह भी नष्ट हो गईं। उसके बाद दोनों ने बाहुयुद्ध किया। दोनों धरती पर गिर गए। दोनों के चर्म-परिधान भी खिसक गए। विष्णु के अंश परशुराम के प्रहारों को सहन न करते हुए विश्वामित्र अपने प्राणों की रक्षा करते हुए भाग गए। परशुराम ने फिर से कुठार (कुल्हाड़ी) उठाया और श्रीराम की ओर गर्जने लगे।

श्लोक

लक्ष्मणः प्रेक्ष्य तत्-दर्प राममाह सकोपतः ।

आज्ञापय बधे चास्य दुर्जनस्याततायिनः॥

ऋषि का इतना अभिमान देखकर, लक्ष्मण ने अपने वस्त्र बांध लिए और

सूत्रधार श्रीराम को प्रणाम करके बोले।

लक्ष्मण

: हे रघुनाथ! इस दुष्ट द्विज का वध करने में क्या दोष है? मुझे आज्ञा

दीजिए मैं इसका अंत कर दूँगा।

सूत्रधार : ऐसा कहकर, धनुष की टंकार कर के ऋषि के सामने जाकर लक्ष्मण दशरथ से बोले ।

लक्ष्मण : हे पिता ! इस पापी क्षत्रीयघातक से क्यों आप विनती करते हैं। आप एक तरफ हो जाइये मैं अभी इस का सिर काट डालता हूँ।

सूत्रधार : यह देखकर श्रीराम ने लक्ष्मण को पीछे खींच लिया और कहा.... रामचन्द्र : अरे भाई, तुम अभी बालक हो! प्रतीक्षा करो, इस दुष्ट द्विज को मैं दंड दूँगा। तुम यह युद्ध आनन्द के साथ देखो।

रामविजय (नाटक)

पृष्ठ 220

[सम्पादन]

श्लोक

धनुष्टंकारमकरोत् भार्गवं भीषयन् प्रभुः। तिष्ठ तिष्ठेति तम्प्राह नवाम्पय यमालयम् ॥

सूत्रधार शारंग की टंकार कर के श्री रामचन्द्र परशुराम के सम्मुख आए और बोले.....

रामचन्द्र

ऐ दुष्ट द्विज सब क्षत्रियों को मारने पर गर्व करते हो? अपनी माता रेणुका को मार कर कितना बड़ा पाप किया है। वही कथा कह कर मुझे क्यों डराते हो? रुको, अभी तुम यमपुरी देखोगे आज अपनी पूरी शक्ति के साथ मेरा सामना करो।

सूत्रधार हे सामाजिक श्रीराम के धनुष की टंकार सुनकर परशुराम का हृदय भींच गया और पूरा शरीर कांपने लगा। कुल्हाड़ी हाथ से नीचे गिर गई। अपने प्राणों की रक्षा करने के लिए वह भागने लगा। आगे क्या हुआ, देखिए !

गीत (राग कानाड़ा परिताल ) -

घु धावे परि शारंग रघुनाथ। तरासे ऋषिक कम्पय पाव हात ॥

पद : परशु खलल दूर भेल राग पड़ल दण्डवते रामक आग ॥ राखहु तोहार अंश हामु राम दशने खेर घरो करो परणाम ॥

सूत्रधार परशुराम, व्याकुल होकर श्रीराम के आगे नतमस्तक हो गया और बोला।

परशुराम हे राम ! मेरी रक्षा कीजिए। आप तो परम ईश्वर हैं। मैं तो आपका ही अंश हूँ। अज्ञान में, मैंने गर्व किया था। हे प्रभु मेरे दोषों के लिए मुझे क्षमा करें।

सूत्रधार भार्गव ऋषि को अधीर देखकर लक्ष्मण और सीता ने हँसा तथा श्रीराम ने मुस्कुराते हुए कहा-

श्रीराम हे भृगुपति हमारा अचूक बाण आपके वध के लिए खींचा गया है इसको निरुद्ध कैसे करें ।

सूत्रधार ऐसा कहकर श्रीराम ने वाण को कान तक खींचा परशुराम कांपने लगे। उन्होंने तृण दाँतों में दबाया और डरते-डरते कहा-

परशुराम हे प्रभु! मैं आपका धर्म पुत्र हूँ। मुझे मेरे प्राणों का दान दीजिए।

पृष्ठ 221

[सम्पादन]

श्रीराम

(मुसकुरा कर बोले) ऐ भार्गव ! निर्भय रहो आपके जीवन की रक्षा कर ली है मैंने परन्तु यह बाण व्यर्थ नहीं जा सकता है। इस कारण मैं इस बाण को स्वर्ग पथ में प्रवेश कराऊँगा ।

सूत्रधार : ऐसा बोल कर श्रीराम ने बाण को गगन की ओर चलाया। परशुराम ने श्रीराम का आलिंगन किया।

परशुराम हे पिता ! आप की कृपा के कारण आज मेरे प्राणों की रक्षा हो गई। मेरा पुनर्जन्म हुआ है आज !

सूत्रधार ऐसा कहकर, परशुराम तपोवन की ओर चले गये।

श्लोक

निर्जित्यं भार्गवं रामं प्रियया सह रायवाः । पुरी अयोध्यामाविश्यत् मातृभिः शम्प्रवेशितः॥

सूत्रधार : हे सामाजिक ! भार्गव से विजय प्राप्त कर श्रीरामचन्द्र प्रिय सीता के साथ अयोध्या में प्रवेश कर गए राम की विजय की बात सुनकर कौशल्या माता सभी स्त्रियों के साथ मंगल गीत गाने लगीं। आनन्द की इस वेला में वर और कन्या के हाथ मिलाकर, इस उत्सव में गृहप्रवेश की रीत निभाई गई। दोनों को माता कौशल्या ने एक आसन पर बिठाया, उनके माथे पर दूर्वा और अक्षत लगाकर आर्शीवाद दिया। इस परम उत्सव में कौशल्या नृत्य करने लगीं। इस प्रकार रामचन्द्र का विवाह महोत्सव पूर्ण हुआ।

श्लोक

भृशं तुष्टमना रामः समप्राप्य परमां प्रियां ।

तया कुर्व्वन कामकेलि रेमे मणिमये गृहे ॥

सूत्रधार त्रिभुवनमोहिनी पदमिनी सीता को प्राप्त कर श्री रामचन्द्र आनन्द मे

मग्न हो गए। मणिमय प्रासाद में प्रवेश करके सीता के साथ आनन्दमय हो गए। देखिए और सुनिए तथा निरंतर हरि का बोल बोलते रहिए।

गीत

(राग कल्याण- खरमान )

धु. ए करु रमया, करु रमया रस केलि ।

कांचुरी छूरि फुरे कुच कुच रति कौतुके करा अलि ॥"

पद : नय घर धरिये अधर मधु धंचल सोचन मुदि रह माह करत सुरत मत्त मातंग गामिनी । कामिनी यामिनी या ॥

पृष्ठ 222

[सम्पादन]

पृष्ठ 224

[सम्पादन]

पृष्ठ 226

[सम्पादन]

पृष्ठ 228

[सम्पादन]

पृष्ठ 230

[सम्पादन]

पृष्ठ 232

[सम्पादन]

पृष्ठ 234

[सम्पादन]