भारत-पाकिस्तान के सम्बन्धों में संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रभाव

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यह सर्वमान्य तथ्य है कि प्रत्येक राष्ट्र अपनी विदेश नीति को निर्धारित करते समय अपने हितों एवं स्वार्थो को देखता है। संयुक्त राज्य अमेरिका भी इसका अपवाद नहीं है। अमेरिकी विदेश नीति के कुछ लक्ष्य है, जिसे वह प्राप्त करने की निरन्तर कोशिश करता है। अमेरिका की विदेश नीति का मुख्य लक्ष्य इस प्रकार की व्यवस्था करना है कि उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा पर कोई आँच न आने पाये। इसी कारण अमेरिका यूरोप, अफ्रीका तथा एशिया में शक्ति-सन्तुलन बनाये रखना चाहता है। अमेरिका जनतंत्र का प्रबल समर्थक है। प्रथम विश्व युद्ध उसने जनतंत्र की रक्षा के लिए लड़ा था। द्वितीय विश्व युद्ध के समय रूजवेल्ट ने अमेरिका का उद्देश्य हिटलर की तानाशाही को नष्ट करना तथा संसार में प्रत्येक स्थान पर चार स्वतंत्रताओं, भाषण, धर्म अभाव और भय से स्वतन्त्रता की स्थापना करना बनाया था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने साम्यवाद के बढ़ते हुए प्रसार को रोकने का दृढ़ संकल्प ले रखा था। चेस्टर बोल्स के शब्दों में -‘‘युद्ध के बाद मुख्यतः अमेरिकी कूटनीति, साम्यवाद को उसके विस्तारशील, सोवियत और चीनी रूपों में विशाल रूस और चीन सीमा के चारों ओर शक्ति की स्थितियां उत्पन्न करके रोक सकने की रही है’’। इसके लिए अमेरिका ने सोवियत संघ के प्रत्येक विस्तारवादी कार्य के मार्ग में विघ्न डालने का निर्णय किया।1 द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका ने अपने आप को एकदम नयी स्थिति में पाया। इस महायुद्ध ने जर्मनी, जापान और इटली की शक्ति को नष्ट कर दिया तथा ब्रिटेन और फ्रांस को इतना कमजोर कर दिया कि वे द्वितीय श्रेणी की शक्तियाँ मात्र रह गयी। अमेरिका ने पाया कि युद्ध के बाद वह न केवल विश्व की महानतम शक्ति है, अपितु साम्यवाद और सोवियत संघ विरोधी पश्चिमी दुनिया का प्रधान संरक्षक और नेता भी है।2 अमेरिकी विदेशी नीति का प्रधान लक्ष्य साम्यवादी खतरे का सामना करने और सोवियत संघ तथा साम्यवादी चीन के प्रभाव क्षेत्र की वृद्धि को रोकने की दृढं व्यवस्था करना रहा है। इसके लिए उसने अलगाववाद का परित्याग कर न केवल यूरोप के मामलों में रूचि ली बल्कि सुदूरपूर्व, मध्यपूर्व, दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका के मामलों में भी सक्रिय दिलचस्पी ली। शमा में शब्दों में, ‘‘प्रथम महायुद्ध के बाद अमेरिका आसानी से अलगाववादी नीति का अनुसरण कर सकता था, क्योकि धुरी राष्ट्रों की पराजय के बाद यूरोप और एशिया में नया शक्ति 1

जे0एस0के0 निकोलसन, ‘‘अमेरिकन स्ट्रेटजी इन वर्ल्ड पोलिटिक्स’’, 1962, पृ0 139.2 सतीश के0 अरोड़ा, ‘‘अमेरिकन फारेन पालिसी टुआडर्स इंडिया, 1954, पृ0 129.


सन्तुलन स्थापित हो गया था परन्तु द्वितीय विश्व महायुद्ध के बाद अमेरिका के लिए पार्यक्य नीति का अनुसरण करना संभव नहीं था, क्योकि त्रिगुट राष्ट्रों की हार के बाद यूरोप और एशिया के देशों पर साम्यवादी राष्ट्रों का प्रभाव बढ़ता जा रहा था।3 विश्वयुद्ध के बाद साम्यवाद को रोकने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपतियों द्वारा जो नीति अपनायी गयी वह आज भी मार्ग दर्शक बनी हुई है जैसे -ट्रूमैन सिद्धान्त, मार्शल योजना तथा आइजनहावर सिद्धान्त मुख्य है।

विषय सूची

भारत-पाकिस्तान एवं अमेरिका[सम्पादन]

1948 के अंत तक भारत एवं पाकिस्तान के प्रति अमेरिकी रूख अधिक उत्साहवर्धक नहीं था, जबकि ईरान, ईराक और सऊदी अरब जैसे देशों के प्रति उसकी विशेष सहानुभूति थी। यद्यपि अमेरिकी नेता, नेहरू और उनके प्रतिनिधियों के विचारों पर पर्याप्त ध्यान देते थे। फिर भी भारत एवं पाकिस्तान दोनों के ही बारे में उनका दृष्टिकोण लगभग समान था। उसकी प्राथमिक चिंताओं में भारत और पाकिस्तान को सम्मिलित नहीं किया गया था। सोवियत संघ पूर्वी यूरोप, चीन तथा पूर्वी एशियाई देशों के प्रति अधिक चिंतित था।4 स्टालिन की सरकार तो भारतीय एवं पाकिस्तानी नेतृत्व के प्रति तिरस्कारपूर्ण विचार रखती थी। उन दिनो ं किसी राष्ट्र अथवा क्षेत्र का महत्व केवल उसी स्थिति में बढ़ता था जब कम से कम एक महाशक्ति उसे महत्वपूर्ण समझने लगती थी।

दक्षिण एशिया में भारत के प्रभाव को कमजोर करने के उद्देश्य से सर्वप्रथम पाकिस्तान ने ही इस क्षेत्र में अमेरिकी उपस्थिति की योजना बनाई। उपमहाद्वीप के विभाजन के पूर्व ही मुहम्मद अली जिन्ना ने दक्षिण एशिया में अमेरिकी हितों की रक्षा हेतु उसे पाकिस्तान की उपयोगिता का विश्वास दिलाना आरम्भ कर दिया था। इस सन्दर्भ में उन्होंने उन समस्याओं का जिक्र किया जिनमें पाकिस्तान अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता था। पहली स मस्या सोवियत आक्रमण का खतरा था और दूसरी हिन्दू साम्राज्यवाद का विस्तार अपने विचारों की पुष्टि हेतु उन्होंने यह तर्क दिया कि पाकिस्तान अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण दोनों ही खतरों को रोक पाने की आदर्श स्थिति में है। अतः अमेरिका को उसकी सहायता करनी चाहिए। यह सर्वविदित है कि नवोदित राष्ट्र पाकिस्तान के शसन की बागडोर संभालने के पूर्व ही जिन्ना ने भारत में अमेरिकी राजदूत एवं भारत यात्रा पर आये अमेरिकी विदेश विभाग के अन्य 3

फ्रेडरिक एल0 शमा, ‘‘अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध, पृ0 139.4

विलियम जे0 बांडर्स, ‘‘साउथ एशिया’’

कुर्ट लादेन (संपा0) में दि सोवियत यूनियन इन वर्ल्ड पॉलिटिक्स, क्रूम हेल्म, लंदन, 1980, पृ0 197.


अधिकारियों से परामर्श कर यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया था कि सम्प्रभु राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान अमेरिकी हितों के लिए सर्वाधिक उपयोगी सिद्ध होगा।5 उन्हें आशा भी थी कि पाकिस्तान की विभिन्न समस्याओं के समाधान हेतु अमेरिकी सहायता उपयोगी रहेगी। किन्तु इस समय उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया था कि वे किस प्रकार की सहायता चाहेगें। स्टालिन के शसन काल में नेहरू ने राष्ट्रपति ट्रूमैन के निमंत्रण पर अमेरिका की यात्रा की। इसकी प्रतिक्रिया में सोवियत संघ ने पाकिस्तान से घनिष्ठ सम्बंध बनाने की पहल की। इन्ही दिनों सोवियत संघ परमाणु बम बनाने की धमकी दे चुका था, और अमेरिका को साम्यवाद का विस्तार रोकने की आवश्यकता महसूस हो रही थी। इस स्थिति में, भारत को उपमहाद्वीप की महत्वपूर्ण शक्ति समझ कर अमेरिकी राष्ट्रपति ने पं0 जवाहर लाल नेहरू को अमेरिकी यात्रा का निमंत्रण भेजा था।6 भारत को अपनी ओर मिलाने के इस अमेरिकी प्रयास पर पाकिस्तान में हुई रोषपूर्ण प्रतिक्रिया सोवियत संघ में बड़ी सावधानी से विश्लेषित की गई। जून 1949 में सोवियत संघ ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री लियाकत अली खाँ को उनकी तेहरान यात्रा के समय सोवियत संघ आने का निमंत्रण दिया। इसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। इस अवधि तक पाकिस्तान और सोवियत संघ के बीच पूर्ण राजनयिक सम्बंध नहीं स्थापित हुए थे। उस समय पाकिस्तान में एक शक्तिशाली गुट सोवियत-पाक सम्बंध का घोर विरोधी था। इस गुट में विदेश सचिव इकरामुल्ला खाँ, वित्तमंत्री गुलाम अहमद, और कई अन्य वरिष्ठ अधिकारी सम्मिलित थे। यह वही गुट था जो अमेरिकी नीति-निर्धारकों का समर्थन प्राप्त करने की चेष्ठा कर रहा था। इन लोगों ने सोवियत संघ से आर्थिक एवं सैन्य सहायता की प्रत्येक संभावना को निर्मूल सिद्ध कर दिया। उन्होंने सोवियत प्रस्तावों को फारस की खाड़ी के उसके पर म्परागत हितों के परिपेक्ष्य में विश्लेषित करके अपने पक्ष को प्रभावशाली बनाने की कोशिश भी की।7 इस गुट ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री के माध्यम से भी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री पर दबाव डालने का प्रयास किया। इन गतिविधियों के मध्य लियाकत अली को भी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमैन का निमंत्रण मिला और अंततः उनकी सोवियत संघ की यात्रा रद्द हो गयी। सोवियत नेताओं को स्पष्ट आभास हो गया कि पाकिस्तान का कोई अत्यन्त शक्तिशाली गुट सोवियत संघ एवं पाकिस्तान के बीच 5

एम0 एस0 वेंकटरनमी, ‘दि अमेरिकन रोल इन पाकिस्तान’’ रैडिएन्ट, नई दिल्ली, 1982, पृ0 1.6

भवानी सेन गुप्ता, ‘‘फलक्रम ऑफ एशिया’’ कोणार्क, दिल्ली, 1990, पृ0 63-63.7

जे0सी0 हयूरविट्ज, ‘‘डिप्लोमेंसी इन दि नियर एण्ड मिडिल ईस्ट’’, वाल्यूम. प्प् एन0जे0ः पी0 नोस्ट्रंड क0 इन्श्योरेंंस, प्रिंसटन,1956, पृ0 229-30.


घनिष्ठ सम्बंधों के विकास के विरूद्ध है। फलस्वरूप, दोनों देशों के मध्य उस समय तक विकसित सम्बंध भी खराब हो गये, बाद में जब अप्रैल 1965 में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल अयूब खाँ अपनी पहली राजकीय यात्रा पर मास्को पहुचें तो सोवियत प्रधानमंत्री कोसीगिन ने उनका स्वागत करते हुए प्रसन्नतापूर्वक यह कहा कि ‘‘अंततः पाकिस्तान सरकार का अध्यक्ष मास्को आ गया है।8 इस समय तक अमेरिका ने पाकिस्तान के सुरक्षा मामलों में दिलचस्पी लेना प्रारम्भ कर दिया था। मास्कों द्वारा लियाकत अली को दिये गये निमंत ्रण के ठीक एक दिन बाद ही अमेरिकी विदेश विभाग ने पाकिस्तान को 75 एम0एम0 शस्त्र के 20 हजार राउण्ड देने की स्वीकृति दे दी।9 अतः इससे 1949-50 में परिस्थतियाँ इस तरह हो गई कि अमेरिका पाकिस्तान को सोवियत संघ से विमुख बनाने हेतु प्रयासरत था। इस दौरान भारत एवं सोवियत संघ ने पारस्परिक सम्बंधों को विकसित करने हेतु कोई विशेष प्रगति नहीं हुई थी। पाकिस्तान का पश्चिमी भाग, पश्चिम एशिया से तथा पूर्वी भाग दक्षिण-पूर्व एशिया से मिला है, इस कारण, उपरोक्त स्थिति में वह अमेरिकी नीतियों के गणित में महत्वपूर्ण बन गया। इसका कारण था कि तत्कालीन अमेरिकी प्रतिक्रिया इन्हीं दोनों सर्वाधिक अस्थिर क्षेत्रों की गतिविधियाँ पर आधारित थी।10 ब्रिटिश प्रभाव के कारण अमेरिका को यह विश्वास हो गया कि पश्चिम एशिया तथा मुस्लिम देशों में अमेरिकी उद्देश्यों की पूर्ति हेतु पाकिस्तान की भूमिका उपयोगी हो सकती है। अमेरिका की फिलिस्तीन सम्बंधी नीतियों के कारण ये सभी देश उससे वैमनस्य रखने लगे थे और वह अपने क्षेत्रीय हितों के कारण उनसे सम्बंध सुधारने की आवश्यकता अनुभव कर रहे थे। भारत पहले ही पूर्व एवं दक्षिण पूर्व एशिया में सोवियत संघ एवं चीन की ओर अपना झुकाव प्रदर्शित कर चुका था। भारत की चीन-सम्बंधी नीति पेकिंग स्थिति उसके राजदूत सरदार के0एम0 पणिक्कर के विचारों से प्रभावित थी। पणिक्कर महोदय का माओं और कुछ अन्य चीनी नेताओं से घनिष्ठ सम्बंध था।11 इस काल की समाप्ति के आस-पास स्टालिन ने भी भारत की गुटनिरपेक्षता एवं ‘तीसरे गुट’ की धारणा से सोवियत संघ को होने वाले संभावित लाभ पर ध्यान देना आरम्भ कर दिया था। किन्तु क्रेमलिन द्वारा एशियाई 89

पी0डब्ल्यू0चौधरी, ‘‘इंडिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश एंण्ड दि मेजर पावर्स’’ दि फ्री प्रेस न्यूयार्क, 1975, पृ0 14.

एम0 एस0 वेंकटरनमी, ‘दि अमेरिकन रोल इन पाकिस्तान’’ रैडिएन्ट, नई दिल्ली, 1982, पृ0 77-78.10

एन0 ए0 हुसैन, ‘‘पाकिस्तान सिक्यूरिटी रिलेंशस’’ स्ट्रेटजिक स्टडीज, स्प्रिंग, 1985.11

के0एम0 पणिक्कर, ‘‘इन टू चाइनाज’’, जार्ज अलेन एण्ड अनिवन लि0, लंदन, 1935, पृ0 171-75.


देशों में भारत की छवि तथा अंतर्राष्ट्रीय मामलों में उसकी मैत्रीपूर्ण भूमिका के बारे में नये आकलन का संकेत स्टालिन की मृत्यु के उपरान्त ही मिल पाया।12 जापानी शंति संधि पर सैनफ्रांसिस्को शंति-सम्मेलन में भाग लेते समय पाकिस्तानी प्रतिनि धि ने अंतर्राष्ट्रीय सम्बंधों में अपनी प्राथमिकताओं की चर्चा की। विश्व की प्रमुख समस्याओं के बारे में पाकिस्तान और अमेरिका के बीच बहुत कम मतभेद थे जबकि इन मामलों पर अमेरिका एवं भारत के बीच अपेक्षाकृत अधिक मतभेद थे। 1950 में अपने अन्तर्राष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अमेरिकी विदेश विभाग ने पाकिस्तान में सैनिक अड्डे स्थापित करने में उत्सुकता दिखाई और पाकिस्तान को दी जाने वाली अमेरिकी सैनिक सहायता के चलते इन अड्डों की उपलब्धता सुगम बनाने के बारे में पाकिस्तानी अधिकारियों से चर्चा भी की।13 पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ दीर्घकालीन रक्षा योजनाओं में शमिल होने हेतु अपनी स्वीकृति का संकेत पहले ही दे दिया था। अमेरिका की दिलचस्पी मुख्यतः एशिया में सुरक्षा सम्बंधी सामंजस्य स्थापित करने में थी जिससे वह सोवियत प्रभाव को आगे बढ़ने से रोक सके। कश्मीर अथवा पख्तून मसले पर पाकिस्तान की सहायता करने में उसकी दिलचस्पी नहीं थी। यद्यपि भारत और अमेरिका, दोनों ही लोकतंत्र, मानवाधिकार एवं अन्तर्राष्ट्रीय शंति के प्रति प्रतिबद्ध है; फिर भी, इनकी प्राप्ति के लिए दोनों ने भिन्न-भिन्न साधन चुने। भारत ने मैत्री एवं सहयोग का रास्ता चुना जबकि अमेरिका ने संधियों एवं टकराव का। अन्तर्राष्ट्रीय सम्बंधों की अमेरिकी योजनाओं में पाकिस्तान उपयुक्त था। क्योंकि अफगानिस्तान एवं भारत से खतरा महसूस करने के कारण वह सैन्य संधियों के सिद्धान्त का समर्थक भी था।

द्वितीय महायुद्ध के बाद अमेरिका की यह मंशा थी कि दक्षिण एशिया के नवोदित राष्ट्र साम्यवादी प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिकी गठबन्धन में शमिल हो जाय किन्तु भारत श्रीलंका और अफगानिस्तान जैसे दक्षिण के गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों के लिए यह असंभव था। भारत से सहयोग न मिलने के कारण अमेरिका ने पाकिस्तान की ओर मुंह किया और उसने अपनी बाहों में भरने को प्रेरित किया। उसने पाकिस्तान को 1954-55 में क्रमशः ‘सीटो‘ और ‘सेंटो‘ का सदस्य बनाया जिससे अमेरिका ने चीनी प्रभाव को रोकने का सबसे अच्छा साधा माना। हलाकि अमेरिका से शस्त्रों की सहायता पाकर पाकिस्तान ने कश्मीर मुद्दे पर भारत से उलझने की 12 सोवियत यूनियन कमयूनिस्ट पार्टी की 1956 में हुई 20वीं कांग्रेस में सोवियत अनुमान में आये इस परिवर्तन का जिक्र किय गया था।13 कोशिश तेज कर दी। अपार मात्रा में पाकिस्तान को मिले शस्त्रों के कारण भारत को अमेरिका से विमुख होना पड़ा।

यू0 एस0 डिपार्टमेंट ऑफ स्टेट, ‘‘पॉलिसी स्टेटमेंट’’,3 अप्रैल, 1950, पृ0 177-75.


गुटनिरपेक्षता, कश्मीर मुद्दा एवं सीटो पर अमेरिका का प्रभाव[सम्पादन]

गुट-निरपेक्षता एवं अमेरिका[सम्पादन]

युद्धोत्तर अन्तर्राट्रीय राजनीति का सबसे प्रमुख और दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य संसार का दो विरोधी गुटों में बंट जाना था। एक गुट का नेता संयुक्त राज्य अमेरिका और दूसरे का सोवियत संघ था। अभी द्वितीय विश्व युद्ध खत्म भी नहीं हुआ था कि संसार इन विरोधी खेमों में विभाजित हो गया और युद्ध खत्म होते-होते दोनों देशों में अनेक कारणों को लेकर भीषण शतयुद्ध प्रारम्भ हो गया।14 जिस समय संसार इस भयंकर परिस्थतियों से गुजर रहा था, उसी समय एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में भारत का उदय हुआ। भारत के समक्ष यह बहुत विकट समस्या थी कि वह किस गुट में शमिल हो या गुटबन्दियों से पृथक होकर दोनों विरोधी गुट में मेल मिलाप का प्रयत्न करें। बहुत विचार विमर्श के बाद हमोर नीति निर्धारकों ने राष्ट्रीय हित में दूसरी ही नीति का अवलम्बन किया और घोषणा की कि अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के सभी प्रश्नों पर वे गुट-निरपेक्ष नीति का अवलम्बन करेंगे और अपनी वास्तविकता पर ध्यान देते हुए स्वतन्त्र रूप से सभी प्रश्नों पर अपना निर्णय करेंगे।15 भारत ने यह निर्णय तो कर लिया लेकिन इस नीति के अवलम्बन में अनेक कठिनाइयां थी। जैसे-जैसे दोनों गुटों का मतभेद गहरा होता गया वैसे -वैसे उनके द्वारा यह प्रयास होने लगा कि, किसी भी तरह संसार के उन देशों को जो अपने को गुट-निरपेक्ष कहते है, अपने गुट में शमिल कर लिया जाय और इसी उद्देश्य को प्राप्त करने हेतु सभी तरह के उपायों का अवलम्बन किया जाने लगा। विशेषकर अमेरिकी गुट द्वारा राजनयिक धमकियाँ देना, आर्थि क सहायता देने से इंकार करना और अन्य तरीकों से दबाव डालने का काम शरू हुआ। जब अमेरिका द्वारा इस प्रकार का दबाव असहाय हो गया तो 4 दिसम्बर, 1947 में संविधान सभा में बोलते हुए पं0 नेहरू ने कहा कि ‘‘हम लोगों ने दोनों में से किसी गुट में शमिल न होकर गुटबंदियों से अलग रहने का प्रयास किया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि, दोनों गुट हम 14

ए0एन0 चक्रवर्ती, ‘‘नेहरू हिज डेमोक्रेसी एण्ड इंण्डिया, 1963, पृ0 381.15 श्री राम शर्मा,

‘‘इंण्डियाज फारेन पॉलिसी‘‘, ब्रिटिश इन्टर प्रिटेशन्स, 1973, पृ0 1.


लोगो के प्रति सहानुभूति नहीं रखते है।16 लेकिन पंडित नेहरू ने बिल्कुल स्पष्ट कर दिया कि चाहे परिणाम जो भी हो हम अपनी गुट-निरपेक्षता और स्वतन्त्र नीति का परित्याग नहीं कर सकते हैं क्योंकि भारत का कल्याण इसी नीति का अवलम्बन करने में है। गुटबंदियों से अलग रहने की भारतीय नीति एक अत्यन्त विवादस्पद विषय बन गयी। इस नीति को विविध नामों से पुकारा जाता रहा जैसे तटस्थ विदेश नीति, स्वतंत्र विदेश नीति , गुटबंदियों से अलग रहने की नीति, शंति की नीति, असंलग्नता की नीति आदि। इस प्रकार के विविध नामकरणों से इसके सम्बन्ध में भ्रांतियाँ और बढ़ी लेकिन वास्तव में इस नीति में गलतफहमियों की कोई गुंजाइश नहीं थी। असंलग्नता की नीति को जैसा कि पं0 नेहरू ने कहा था कि ‘‘इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वैश्विक राजनीति से अपने आप को पृथक रखें और न इसका अर्थ कोई शंतिवाद से है। क्योंकि प्रत्येक देश को युद्ध की संभावना को देखकर काम करना पड़ता है। भारत की नीति सकारात्मक और गतिशील थी। भारत दोनों गुटों से अलग रहना चाहता था, वह दोनों की मित्रता चाहता था और दोनों से सहायता प्राप्त करके अपनी उन्नति करना चाहता था। वहां दोनों पक्षों में किसी के साथ सैनिक संधिया करके महाशक्तियों की राजनीति में अपने आप को उलझाना नहीं चाहता था परन्तु आवश्यकता पड़ने पर भारत की नीति चुपचाप बैठकर तमाशा देखनें वाली नहीं थी । भारत किसी भी पक्ष का समर्थन करने को तैयार था, यदि वह शंति और सुरक्षा के लिए आवश्यक होता । लेकिन भारत उन शक्तियों से अपने को दूर रखता था, जिसकी नीति से शंति और सुरक्षा के खतरे में पड़ने की संभावना थी।17 संयुक्त राज्य अमेरिका की सीनेट में बोलते हुए पं0 नेहरू ने इसको स्पष्ट कर दिया था, कि जहां स्वतन्त्रता के लिए खतरा उत्पन्न हो, न्याय की धमकी दी जाती हो, जहां आक्रमण होता है वहां न तो हम तटस्थ रह सकते हैं और न तटस्थ रहेंगें।18 किन्तु अमेरिका ने शरू से ही भारतीय गुट-निरपेक्षता को महत्व नहीं दिया, अमेरिका का यह मत था कि दो गुटों की इस राजनीति में न तो कोई तटस्थ है और न कोई तटस्थ रह सकता है। कुछ अमेरिकी नेताओं ने अमेरिका और सोवियत संघ के शत युद्ध में एक बड़ा ही गलत दृष्टिकोण अपना लिया था, उनका कहना था कि जो देश स्पष्ट रूप से अमेरिका के 16

नेहरू स्पीसेज, मई, 1955, पृ0 30.17

नेहरू ‘‘इंण्डियाज फारेन पालिसी’’, पृ0 41.18

लियोन पीटर, न्यूट्रीज्म’, 1967, पृ0 173-129.


साथ नहीं है,वे उसके विरोधी है, अमेरिकियों ने भारत की असंलग्नता की नीति को व्यर्थ का ढकोसला बताया, कुछ प्रमुख नेताओं ने इस आशय से वक्तव्य दिये कि जवाहर लाल नेहरू एक अर्द्ध साम्यवादी है, जिनका उद्देश्य असंलग्नता की आड़ में धीरे-धीरे खिसका कर भारत को सोवियत गुट की ओर ले जाना है।19 जनवरी, 1947 में जान फॅास्टर डलेस ने कहा था कि ‘‘भारत में सोवियत साम्यवाद अन्तकालीन हिन्दू सरकार के माध्यम से अपने प्रभाव का विस्तार कर रही है।

भारत और अमेरिका के प्रारम्भिक सम्बन्ध में जो मतभेद उत्पन्न हुए उसके मौलिक कारणों में असंलग्नता की नीति प्रमुख थी। जिस समय भारत ब्रिटिश पराधीनता से मुक्त हुआ, उस समय सोवियत संघ और अमेरिका का सम्बन्ध बहुत खराब हो चला था और सोवियत संघ का विरोध करने के लिए अमेरिका, विश्व व्यापी पैमाने पर तैयारी कर रहा था। इस कार्य में अधिक से अधिक देशों को वह अपने गुट में रखना चाहता था। एशिया के नवोदित राष्ट्रों की ओर उसका विशेष झुकाव था और उसका विचार था कि ये राष्ट्र शत युद्ध में अमेरिका का साथ देगें तथा सोवियत संघ का विरोध करेंगे जो देश अमेरिका के इस नीति से सहमत नहीं थे, उन्हें शत्रु की कोटि में रखा जाता था। अमेरिका को यह आशा थी कि भारत आँख मूं द कर उसका साथ देगा, लेकिन भारत ने गुट निरपेक्षता की नीति को अपना लिया। तटस्थता या असंलग्नता की नीति अमेरिका को पसंद नहीं थी इसलिए वह भारत को शंका की दृष्टि से देखने लगा।

संयुक्त राज्य अमेरिका पश्चिमी शिविर का नेतृत्व करता था। उसका भारत के प्रति दृष्टिकोण शतयुद्ध की समस्याओं के द्वारा निर्मित हुआ।20 विश्व के एक अलग भाग में स्थिति होने के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के हित कभी भी टकराये नहीं थे।21 सोवियत संघ से भूमण्डलीय संघर्ष में संयुक्त राज्य का प्रमुख साथी ब्रिटेन रहा, जो दो सौ वर्षो तक भारत का शसक रहने और भारतीय उपमहाद्वीप की समस्याओं से भलीभाँति परिचित होने के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका की इस उपमहाद्वीप के प्रति नीति निर्मित करने में प्रमुख यंत्र रहा। सन् 1949 के अंत तक संयुक्त राज्य की दक्षिण एशिया के सम्बन्ध में कोई नीति नहीं थी।19 22

जे0 हयुकाज, ‘‘द हिस्ट्री ऑफ कोल्डवार’’, 1961, पृ0 101.20

रोजिनगर एण्ड एशोसिएट, ‘‘द स्टेट ऑफ एशिया’’, 1953, पृ0 485.21

द यू0 एस0 ए0 इन वर्ल्ड एफेयर्स, 1951, पृ0 256. .


मगर चीन की मुख्यें भूमि में साम्यवाद की विजय ने तत्काल दृश्य को पूणर्तया परिवर्तित कर दिया और शत युद्ध के महत्वपूर्ण क्षेत्र में भारत की भी गणना होने लगी। परन्तु भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को त्याग करने के लिए तत्पर नहीं था। डलेस के विदेशमंत्री होते ही भारत के प्रति संयुक्त राज्य की नीति में उद्देश्य की कठोरता और कल्प ना के अभाव के दर्शन हुए, जिसके कारण भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के मध्य मतभेद तीव्र हो गये। ये मत विभिन्नताओं यर्थाथ मे कम थीं और बाहय रूप से देखने में अधिक। सन् 1959 तक संयुक्त राज्य की नीति में इसी कठोरता के दर्शन हुए। जब राष्ट्रपति आइजनहावर सद्भावना यात्रा पर भारत आये तब भारत के प्रति संयुक्त राज्य अमेरिका के दृष्टिकोण में हल्का सा परिवर्तन आया। प्रजातंत्र में भारत द्वारा किये गये प्रयोगों की सराहना हुई। और यह आश्वासन दिया गया कि आर्थिक सहायता के द्वारा इसे दृढ़ बनाया जायेगा, लेकिन गुट निरपेक्षता अभी भी संदेहात्मक धारणा थी। कैनेडी के संक्षिप्त राष्ट्रपतित्व काल में गुट निपरेक्षता की कुछ सराहना की गयी और सम्बन्ध कुछ सद्भावपूर्ण हो गये। स्वर्गीय कैनेडी ने भारतीय गुट-निरपेक्षता को मान्यता प्रदान की उन्होंने कहा कि ‘‘कुछ लोग रूप और रीतियां चुन सकते हैं हम अपने लिए कुछ नहींं चुन सकते लेकिन यह हमारे लिए नहीं है कि वे कुछ चुन रहे है।23 गुट-निरपेक्षता के सम्बन्ध में अमेरिकन दृष्टिकोण को राष्ट्रपति अयूब खाँ ने अपनी आत्म कथा ‘‘फ्रेन्ड नाट मास्टर’’ में वर्णित किया उन्होंने कहा ‘‘जब हम पहले संयुक्त राज्य के साथ सन्धि में सम्मिलित हुए, तटस्थता गुट निरपेक्षता जो भी भारत इसे पुकारना चाहे अमेरिकन दृष्टि में संदेहात्मक था, इसको वास्तव में अनैतिक समझा गया था। यह गली के दोनों ओर खेलने की नीति के लिए एक दूसरा नाम था। वर्षो के व्यतीत होने के कारण गुट निरपेक्षता अमेरिकन दृष्टि में आदर सूचक बन गयी। मगर सत्र 1962 तक अमेरिका की नीति एक गुट निरपेक्ष भारत और अपने संन्धि मित्र पाकिस्तान में अन्तर करने की थी। यह अन्तर भारत और चीन के संघर्ष के बाद समाप्त हो गया।24 22 विन्सैन्ट सीन, ‘‘द केस फार इण्डिया फारेन अफेयर्स’’ अक्टूबर 1955.23 वाई0 एन0 एलिन्गर और ओ0 मेलिकयान ‘‘पालिसी ऑफ नान एलाइनमेन्ट‘‘, 1963, पृ0 86..24 हिन्दुस्तान टाइम्स, अगस्त 15, 1967.


सीटो[सम्पादन]

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद च्यांग-काई शेक की सरकार का प्रभाव और कम्यूनिस्टों के उद्भव ने, अमेरिकी सरकार की प्रतिष्ठा को जबरदस्त धक्का पहुँचाया। चीनी कम्यूनिस्ट सत्ता पर अधिकार करने के बाद पड़ोस के देश के कम्युनिस्ट पार्टियों को मदद देने लगे। इसमें कोई सन्देंह नहीं है कि उसका उद्देश्य साम्यवाद का प्रसार था। कम्यूनिस्ट चीन ने मलाया और हिन्द चीन में कम्यूनिस्टों को भी मदद देना शरू किया। इस कारण पश्चिमी गुट की चिन्ता बढ़ी। 1951 में चर्चिल ने कम्यूनिस्ट चीन के साम्यवादी प्रसार के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के सामने यह प्रस्ताव रखा कि दक्षिण पूर्व एशिया के लिए नाटो जैसे एक संगठन का निर्माण किया जाय। आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड भी प्रशान्त महासागर में साम्यवाद के प्रसार को शंति के लिए घातक समझ रहे थे। शरू में संयुक्त राज्य इस क्षेत्र के लिए सैन्य संगठन का उतना बड़ा समर्थक नहीं था, लेकिन हिन्द चीन की लड़ाई बहुत गंभीर हो गयी। डा0 हो ची मिन्ह के नेतृत्व में वियतनाम के राष्ट्रवादियों ने अमेरिकी सहायता के बावजूद फ्रेंच साम्राज्य पर करारे प्रहार किये। जब स्थिति बहुत गंभीर हो गयी तो हिन्द चीन की समस्या पर विचार के लिए जेनेवा में जुलाई 1954 में एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ।25 वहाँ एक समझौता हुआ जिसके फलस्वरूप उत्तरी वियतनाम कम्युनिस्टों के हाथ में चला गया, पर संयुक्त राज्य ने इस निर्णय को नहीं माना।

इसके बाद अमेरिकी विदेश सचिव जान फॉस्टर डलेस ने नाटो की तरह दक्षिण-पूर्व एशिया में एक सैन्य संगठन कायम करने के लिए जमीन आसमान एक कर दिया। अमेरिका हिन्द चीन में साम्यवाद के विजय से सतर्क हो चुका था और एशियाई चावल को साम्यवादी हाथों में जाने से बचाने के लिए एक तत्काल प्रतिकार चाहता था। फलस्वरूप 8 सितम्बर, 1954 को मनीला में आस्ट्रेलिया, फ्रांस, ब्रिटेन, न्यूजीलैण्ड, पाकिस्तान, फिलीपाइन्स, थाईलैण्ड और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच पारस्परिक सहायता और सामूहिक सुरक्षा की एक सन्धि हुई। इस सन्धि के आधार पर दक्षिण-पूर्व-एशिया सन्धि संगठन की स्थापना हुई।

‘सीटो’ की पहली धारा में अन्तर्राष्ट्रीय विवादों के शन्तिपूर्ण निपटारों की तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के किसी भी रूप में शक्ति प्रयोग और धमकी का मार्ग न अपनाने की प्रतिज्ञा की गयी 25

डाकुमेन्टस ऑफ अमेरिकन फारेन रिलेन्स, वियतनाम, पृ0 283-302.


है। इसकी तीसरी धारा में आर्थिक उन्नति और सामाजिक कल्याण के लिए सहयोग करने का वचन दिया गया है। लेकिन सन्धि की सर्वाधिक महत्वपूर्ण चौथी धारा है जिसमें कहा गया है कि सन्धि के अन्तर्गत किसी भी देश के विरूद्ध सशस्त्र आक्रमण होने या शंति भंग का भय होने पर सबके लिए समान खतरे की स्थिति होगी। पॉचवी धारा में इस सन्धि से सम्बन्धित सभी मामलों पर विचार करने के लिए या किसी योजना पर सलाह लेने के लिए प्रत्येक सदस्य राष्ट्र के एक प्रतिनिधि से निर्मित होने वाली एक परिषद का वर्णन है। सींटो का प्रधान कार्यालय थाईलैण्ड की राजधानी बैंकाक में है। सन्धि के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका का एक व्याख्या पत्र भी जुड़ा है इसमें यह कहा गया है कि धारा 4 में वर्णित आक्रमण का अभिप्राय साम्यवादी आक्रमण से है। इसका अर्थ यह है कि अमेरिका कम्युनिस्टों द्वारा आक्रमण होने पर इन राज्यों को सहायता देगा।26 एशिया के स्वतंत्रता प्रेमी देशों ने इस संधि को घोर विरोध किया। इण्डोनेशिया और वर्मा ने मनीला समझौते या ‘सीटो’ की स्थापना का तीव्र विरोध किया और सीलोन (श्रीलंका) को सन्धि में सम्मिलित होने से रोका। चीन की इस सन्धि की भर्त्सना करते हुए कहा कि - इन सबका उद्देश्य विश्व में अमेरिकी प्रभुत्व की स्थापना करना है। चीन के प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई ने इसे सामूहिक सुरक्षा के आवरण से ढका आक्रमण का साधन बताया था।27 वस्तुतः सीटो पुराने उपनिवेशवाद का आधुनिक संरक्षण था।

भारतीय प्रतिक्रिया[सम्पादन]

भारत किसी भी प्रकार के ‘शक्ति राजनीति’ से संबंधित सन्धि के विरूद्ध रहा है वह शंति सन्धियाँ चाहता है, न कि सैन्य सन्धियाँ। 9 सितम्बर, 1954 को पं0 जवाहर लाल नेहरू ने ‘सीटो’ और ऐसी ही सैन्य तैयारियों को द्विमुखी विचार और द्विमुखी वार्ता कह कर नकार दिया। उन्होंने सीटो को अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में अजीबो -गरीब उलझन बताया। ‘सींटो’ की आलोचना करते हुए कहा कि ‘मुझे लग रहा है कि इस विशेष मनीला संन्धि का शक्तिशाली राज्यों के प्रभाव की दिशा में खतरनाक ढंग से झुकाव है। इस क्षेत्र में किसी भी भीतरी घटना के बहाने26

क्रुर्त्स्किश्व अर्न्द्रेइ ‘‘हिन्द महासागर क्षेत्र में अमेरिका की नीति’’, पृ0182.27

दीनानाथ वर्मा, ‘‘अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध’’, 2003, पृ0 115.


ये देश हस्तक्षेप कर सकते हैं जिससे इस क्षेत्र के देशों की अखण्ड़ता, स्वाधीनता और संप्रभुता की कल्पना पर कुप्रभाव पड़ता?28 श्री मेनन ने समझौते के विरूद्ध निम्नलिखित आपत्तियां उठायीः-

1. भारत इस तर्क को स्वीकार नहीं कर सकता कि ‘सीटो’ संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्य पत्र द्वारा परिभाषित क्षेत्रीय संस्था थी, क्योंकि हस्ताक्षर कर्ताओं में कुछ देश भौगोलिक दृष्टि से उस क्षेत्र में स्थित नहीं थे।

2. जिनेवा के समझौते द्वारा निर्मित ‘‘शांति के वातावरण को मनीला समझौते ने अघात पहुॅचाया।

3. भारत समझौते के रणनीतिक भाग से असंन्तुष्ट था, क्योंकि इसने हस्ताक्षर करने वाली शक्तियों के क्षेत्र को परिभाषित किया। (वियतनाम, लाओस और कम्बोडिया) सन्धि ने एक भ्रमणकारी आयोग की रचना की थी, जो उन लोगो को सुरक्षा प्रदान करना चाहता था, जो सुरक्षा नहीं चाहते थे जिससे क्षेत्र के राष्ट्रों की प्रभुसत्ता प्रभावित होती थी।

4. मनीला समझौता उन समस्याओं को शक्तिशाली बना देगा जिन्हें वह सुलझाना चाहता था।

इस प्रकार ‘सीटो’ एक अमेरिकी प्रपंच था जो ‘नाटो’ द्वारा भेड़ो की तरह फैलाया गया था। जिन एशियाई शक्तियों के बल पर यह सन्धि स्थापित होनी थी वे शक्तियाँ तो इसके विरोध में थी। पूरे एशिया के तीन देश इसके पक्ष में थे और उनकी कुल जनसंख्या 11 करोड़ 60 लाख थी जो सर्वथा नगण्य थी। इस प्रकार लगभग सवा अरब जनता और उसके नेता समवेत रूप में सीटों के विपक्ष में थे।29 अमेरिका के अतिरिक्त जो अन्य देश इसमें शमिल हुए उनका अपना-अपना स्वार्थ था। एक तो वे साम्यवाद के विरोधी थे। दूसरे फ्रांस और ब्रिटेन किसी तरह से अपने पुराने उपनिवेशों पर अपना नियंत्रण कायम करना चाहते थे। आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड और फिलीपाइन्स ने जापान के उत्कर्ष को रोकने के लिए इस सन्धि की साथ दिया। इस सन्धि को सबसे रोचक विशेषता यह थी कि इसमें पाकिस्तान भी सम्मिलित था, जो दक्षिण पूर्व एशिया का भाग नहीं 28

जे0एल0 नेहरू, ‘‘इण्डियाज फारेन पॉलिसी’’, सेलेक्टेड स्पीच 1 सितम्बर, 1946 से अप्रैल 1961, पृ0 89.29

आर0 जैन, ‘‘एशिया की राजनीति’’ 1956, पृ0 37.


था उसका मुख्य उद्देश्य कश्मीर समस्या का हल पश्चिमी शक्तियों के दबाव से अपने पक्ष में करवाना था।

पाकिस्तान के ‘सीटो’ सन्धि में शमिल होने से निश्चित रूप से इस सन्धि का दायरा दक्षिण पूर्व एशिया से बढ़कर दक्षिण एशिया तक फैल गया और इस सन्धि ने भारतीय उपमहाद्वीप को अपने प्रभाव क्षेत्र में ले लिया। भारतीय उपमहाद्वीप में विशेषकर भारत-पाक सम्बन्धों में और कटुता आयी तथा दोनों देशों के बीच मतभेदों का दायरा बढ़ता गया।

कश्मीर मुद्दा एवं अमेरिका[सम्पादन]

कश्मीर भारत की स्वतन्त्रता के पूर्व से ही अपनी भौगोलिक व सामरिक स्थिति के कारण महत्वपूर्ण रहा है। भारत की स्वतन्त्रता के बाद वैसे तो यह भारत व पाकिस्तान की ही प्रमुख समस्या रही परन्तु इसने भारत-अमेरिका संबंधों पर भी गहरा प्रभाव डाला है तथा यह हाल के वर्षो में और भी ज्वलन्त रूप से सामने आयी है। डेनिस कक्स (ज्ञनग) के अनुसार शत युद्ध, डालर कूटनीति व उपनिवेशवाद उन्मूलन, स्वतंत्रत भारत व संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच पहले व प्रमुख द्वितीय मतभेद का कारण नहीं थे। पहला प्रमुख मतभेद जम्मू कश्मीर रियासत के विवाद के ऊपर हुआ यह विभाजन की अपूर्णता के कारण था।30

कक्स ने कश्मीर के प्रश्न को भारत व अमेरिका के बीच प्रथम मुख्य राजनीतिक मुद्दा कहा, जो एक हद तक सही है परन्तु कश्मीर विवाद को भारत-पाक विभाजन की अपूर्णता बताना, भारत-अमेरिका के बीच राजनीतिक समस्या का कारण रहा है। कश्मीर को लेकर भारत-पाक में पूरे विवाद तथा 1948 में हुए युद्ध के उपरान्त भारत द्वारा इस मसले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ले जाने का निर्णय लिया गया। इस मुद्दे पर अमेरिका का भारत विरोधी रवैये को अपनाया जाना भारत के लिए वाकई दुख भरा था।31 1953 में कई मुद्दें इस तरह से उभरे जो भारत-पाकिस्तान के मध्य कश्मीर को लेकर तनाव उत्पन्न करते रहे हैं और इस दौरान अमेरिकी नीति भारत के संदर्भ में काफी विवादस्पद बनी रही। इस समय अमेरिका ने दोहरी नीति को अपनाते हुए गुप्त तौर पर शेख अब्दुल्ला से वार्ता हेतु अदलाई स्टीपेश (।कसंपैजमअमदपेवद) को भेजा। जिसके उपरान्त अब्दुल्ला ने कश्मीर 30 डेनिस कक्स, ‘‘इंण्डिया एण्ड द यूनाईटेड स्टेट एस्ट्रेन्ज्ड डेमोक्रेसी, 1944-1991‘‘, वांशिगटन, डी0सी0 नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी प्रेस, 1992 .31

नारमन डी0 पामर, ‘‘दि यूनाइटेड स्टे्टस एण्ड इण्डिया : दि डाइमेशन ऑफ इन्फ्लुएन्स’’, न्यूयार्क, 1948.


मामले में अपने पुराने रूख में अचानक परिवर्तन कर लिया। 1954 में अमेरिका एवं पाकिस्तान के मध्य पारस्परिक रक्षा सहयोग पर हुई सहमति ने तो और भी स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका पाकिस्तान को दक्षिण एशियाई महाद्वीप के सभी मुद्दों पर समर्थन करता रहेगा।32 नेहरू ने इसे स्वीकारते हुए कहा था - अमेरिका पाक सहमति ने भारत-पाकिस्तान के विवाद को पूर्णतः परिवर्तित कर दिया है। फलतः कश्मीर से सेना की वापसी और जनमत संग्रह इन परिवर्तित परिस्थतियों में पूर्णतः निरर्थक और असम्भव बन गया है।33 संयुक्त राष्ट्र में 1960 के दशक के मध्य तक पाकिस्तान के तर्क को समर्थन और पाकिस्तान की जबरदस्त सैन्य सहायता करने की अमेरिकी नीति का भारत ने बड़ा विरोध किया था। विरोध का वैध आधार यह था कि अमेरिका पहले कश्मीर के भारत में विलय की वैधता का अनुमोदन और कश्मीर में भारत की संप्रभुता को मंजूर कर चुका था। उसके बावजूद अमेरिका ने पाकिस्तान को हमलावर बताने से इन्कार कर दिया और समस्या अन्तर्राष्ट्रीय करार दे दिया। यह नीति सरासर अन्यायपूर्ण थी क्योंकि ग्रीस यानी यूनान और तुर्की के बीच साम्यवादियों की ओर से ऐसी ही स्थिति पैदा होने पर अमेरिकी प्रतिक्रिया भिन्न रही थी। अमेरिका द्वारा कश्मीर में जनमत संग्रह कराने पर भी जोर दिया जाता रहा जबकि उसने कश्मीर का भविष्य तय करने के लिए पाकिस्तान पर मुक्त एवं निष्पक्ष संग्रह संबंधी अपना दायित्व निभाने के लिए कोई दबाव नहीं डाला। कश्मीर के मुद्दे पर अमेरिका ने पाकिस्तान को सरे आम समर्थन करके न्याय और निष्पक्षता के बुनियादी सिद्धान्तों का आंशिक उल्लंघन किया था। भारत में इससे यह सही राय बनी कि पाकिस्तान के अन्यायपूर्ण दावे के समर्थन की अमेरिकी नीति अपने सहयोग को पुरस्कृत करने और भारत को गुट निरपेक्षता की नीति के पालन के विरूद्ध सबक सिखाने के लिए है। यह भी एक तथ्य रहा है कि अमेरिका की पाकिस्तान समर्थक नीति के पीछे दरअसल कश्मीर की सामरिकी महत्ता भी कारण थी।

इन तमाम कारणों ने इन दोनों देशों के बीच अविश्वास और बढ़ा दिया। पाकिस्तान को अमेरिका द्वारा हथियार दिये जाने के पीछे अनेक राजनीतिक कारक थे प्रथम-भारत के गुटनिपरेक्ष होने के कारण अमेरिका ने पाकिस्तान को अपना सहयोगी बनाने के लिए पटाना शरू कर दिया,, यूरोप का बटवारा मंजूर करने के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान इरान, इराक 32 डेनिस कक्स, ‘एस्ट्रेन्ज्ड डेमोक्रेसीज’, नई दिल्ली, 1993, पृ0 157.33

वी0 डी0 चोपड़ा, ‘‘पेन्टागन्स ॉौडो ओवर इण्डिया‘‘, नई दिल्ली, 1985, पृ0 70.


और तुर्की के साथ गठजोड़ करके सोवियत संघ की घेराबंदी और बढ़ाने का फैसला किया। सोवियत संघ के असर को घटाने की इच्छा अमेरिका के एजंडे में इतनी प्रबल थी , कि उसने ईरान में मुहम्मद मुसादिक के नेतृत्व में वैध लोकतांत्रिक सरकार का तख्ता पलटवा दिया। इसकी वजह अमेरिका को यह आशंका थी कि मुसादिक की राष्ट्रवादी सरकार कहीं भारत की तरह गुट निपेक्षता की नीति का अनुसरण न करने लगे, तीसरा-पाकिस्तान की सामरिक- भौगोलिक स्थिति भी महत्वपूर्ण कारक थी क्योंकि वहां पर सैन्य अड्डें बनाए जा सकते थे। चौथा-पाकिस्तान को हथियार बंद किया ताकि गुट निरपेक्ष भारत पर दबाव डाला जा सके।34 पाकिस्तान को हथियार देने के आइजनहावर सरकार के 1954 के निर्णय का भारत ने डटकर विरोध किया क्योंकि यह पता था कि अमेरिकी समझौते में भले यह शर्त हो कि सैन्य सहायता का प्रयोग सिर्फ कम्युनिस्ट देश द्वारा हमले के विरूद्ध किया जाएगा लेकिन पाकिस्तान के नेतृत्व ने अमेरिका के साथ संधि कहीं चीन अथवा सोवियत संघ के हमले की आशंका के विरूद्ध नहीं की थी बल्कि उसका निशाना भारत था, क्योंकि पाकिस्तान उसे अपना अव्वल दुश्मन मानता था। इस संधि के बाद सीमा पर झड़पों की संख्या तो बढ़ी ही, उसके साथ ही साथ 1965 में भारत के साथ युद्ध में पाकिस्तान ने अमेरिका से मिले हथियारों और गोला बारूद का ही दुरूपयोग किया। भारत द्वारा इसकी आलोचना की प्रतिक्रिया में अमेरिका ने उसे भी वही मदद देने की पेशकश की, जिसे भारत ने ठुकरा दिया। अमेरिका की नीति साम्यवादी खतरे के विरूद्ध सामूहिक सुरक्षा की थी और यह भारत की नीति के उलटी थी। इसका परिणाम यह हुआ कि 1960 के दशक की संधियों के अनुमोदन के बाद उसे अमेरिका से मिलने वाली सैन्य सहायता में जबरदस्त बढ़ोत्तरी कर दी गई। अमेरिका के इस निर्णय का भारत ने विरोध किया और इन सैन्य संधियों को रद्द करने की मांग की।

शतयुद्ध के बाद कश्मीर का मुद्दा भारत-अमेरिका सम्बंधों के निर्धारण में एक महत्वपूर्ण कारक रहा है। कश्मीर की विशेष भू-रणनीतिक अवस्थिति और बदली हुई विश्व व्यवस्था में अमेरिका के प्रभुत्वकारी वैश्विक दृष्टिकोण ने कश्मीर पर अमेरिकी नीति निर्माताओ के लिए विशेष रूचि पैदा की है। क्योंकि मध्य एशिया एवं दक्षिण पूर्व एशिया को जोड़ने वाला यह क्षेत्र एक ओर जहाँ रूस व ची न जैसी दो महाशक्तियों के केन्द्र में अवस्थित है, वहींं दूसरी 34

प्रो0 सुब्रत मुखर्जी, ‘‘यूपीए की विदेश नीति पहल : भारत-अमेरिका संबंधों के प्रति द्विपक्षीय नीति ‘‘, वर्ल्ड फोकस, अगस्त 2013, पृ0 13.


ओर अफगानिस्तान, ईरान, जैसे कट्टरपंथी राज्यों पर अंकुश लगाने के लिए भी इस क्षेत्र का विशेष रणनीतिक महत्व है।35 बुश प्रशासन ने अपने कार्यकाल के अन्तिम वर्षों में कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के प्रति दबाव बनाये रखा उनके द्वारा आतंकवादियों गतिविधियों के संचालन में लायी गयी तेजी की भर्त्स ना की। मई 1990 में जार्ज बुश ने अपने उपराष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रार्व र गैट्स और सहायक विदेश सचिव जान किली को भारतीय उपमहाद्वीप में भेजा। जिन्होंने कश्मीर को सम्भावित परमाणु युद्ध खतरा उत्पन्न करने वाला कारक माना था।36 इसके बावजूद बुश प्रशासन के लिए कश्मीर नीति में कोई खास परिवर्तन नहीं था। लेकिन परमाणु अप्रसार और मानवाधिकारों को लेकर क्लिंटन प्रशासन के लिए कश्मीर एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया। यद्यपि संयुक्त राष्ट्र संघ के जनमत संग्रह वाले प्रस्ताव को इसने अस्वीकारते हुए ‘शिमला समझौते’ के प्रति अपना समर्थन जताया। फिर भी सम्पूर्ण क्षेत्र को विवादग्रस्त मानते हुए उसके विलय की वैधानिकता पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया। और इस मामले को अन्तर्राष्ट्रीयकरण का प्रयास किया। सोवियत संघ की समाप्ति, अफगानिस्तान में निरन्तर गृह युद्ध, इस्लामिक कट्टरतावाद, साम्यवादी चीन की बढ़ती शक्ति तथा भारत-पाक में शस्त्रों की लगी होड़ एवं तनाव के माहौल को अमेरिका की ‘कश्मीरी नीति’ में परिवर्तन के लिए कारक माना गया। क्योंकि यह वैश्विक व क्षेत्रीय हितों की दृष्टि से काफी लाभदायक सिद्ध हो सकता है।37 जार्ज डब्ल्यू बुश के शसन काल में पाकिस्तान सदैव की तरह कश्मीर मुद्दे को अमेरिका के एजेंडें में लाना चाहता था। पाकिस्तान की इच्छा थी कि इस मुद्दे को अमेरिका गंभीरता से लेते हुए मध्यस्थता करे। लेकिन यह पहली बार हुआ कि अमेरिका और पाकिस्तान की ओर से जारी संयुक्त बयान में कहा गया कि भारत को बातचीत का समर्थन द्विपक्षीय विवादों को सुलझाने के लिए तो किया गया है लेकिन इसमें कश्मीर का कोई जिक्र नहीं है।38 दिसम्बर 1959 को अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहावर ने भारत की यात्रा की। वह भारत यात्रा करने वाले प्रथम अमेरिकी राष्ट्रपति थे। 13 दिसम्बर, 1959 को आइजनहावर एवं नेहरू की एक संयुक्त विज्ञप्ति प्रकाशित हुई, जिसमें यह कहा गया कि दोनों देश समान आदर्श एवं 35 36 अजय उपाध्याय, ‘‘भारत अमेरिका सम्बन्ध’’ राधा पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली, 2001 पृ0 73

चिंतामणी महापात्रा, ‘‘इंडो-यू0एस0 रिलेशन्स इ टू दी 26 सेन्चुरी’’, न्यू दिल्ली, 1948, पृ0 44.37

वी0के0 मल्होत्रा, ‘‘क्लिंटन एडमिनिस्ट्रेशन एण्ड साउथ एशिया 1993-1997’’, नई दिल्ली, 1997, पृ0 130 .38

दि हिन्दू नई दिल्ली, 4 मार्च, 2006.


विश्व शन्ति हेतु प्रयास करेगे तथा अपनी मित्रता को और अधिक दृढ़ बनायेगें। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच अनेकानेक भ्रान्तियों को दूर करने का कार्य किया गया।39 परन्तु गोवा के प्रश्न पर भारत अमेरिका सम्बन्धों में पुनः कड़वाहट देखने को मिली।

पाकिस्तान का समर्थन, भारत की अवहेलना[सम्पादन]

कश्मीर के प्रश्न पर शरू से ही संयुक्त राज्य अमेरिका ने पाकिस्तान का समर्थन किया है। अमेरिकी नीति के कारण ही कश्मीर के प्रश्न का संतोष जनक समाधान अब तक नहीं हो सका है।

सर्वप्रथम कश्मीर विवाद ने अमेरिका द्वारा अपनाया गया एकपक्षीय दृष्टिकोण भारतीय हितों पर कुठाराघात का ज्वलन्त उदाहरण है। कोरिया, ग्रीक तथा हंगरी के प्रश्नों को लेकर अमेरिका ने जो उत्तेजना और रोष दर्शाया वह कश्मीर के संदर्भ में पूर्णतया नदारद था। बल्कि इसके विपरीत कश्मीर में पाक सेनाओं द्वारा की गयी लूटपाट, बलात्कार और हत्याओं को नजरअांज कर पाकिस्तान के पक्ष में जो समर्थन दिया, उसे भारतीय जनता भी कभी भूल नहीं पायी । इतना ही नहीं कश्मीर में अमेरिकी नागरिकों और कतिपय सैनिक तत्वों ने पाकिस्तान की ओर से सक्रिय रूप से भाग भी लिया था। कश्मीर नरेश स्वर्गीय हरि सिंह द्वारा कश्मीर के विलीनीकरण प्रलेखन पर हस्ताक्षर करने के बाद यह क्षेत्र अक्टूबर 1947 में भारत का अंग बन गया था।

विलय की इस प्रक्रिया के दौरान ही पाकिस्तानी शसकों ने एक सुनियोजित ढंग से इस प्रदेश पर धावा बोलने का षंडयंत्र रच दिया था। अक्टूबर में जब यह योजना कार्यान्वित हुई तो भारत ने आक्रमण को विफल करने के लिए सैनिक कार्यवाही के साथ-साथ भूतपूर्व वायसराय माउण्टबेटन के आग्रह पर संयुक्त राष्ट्र संघ के समक्ष प्रस्तुत किया। अमेरिका ने आक्रमण की वस्तुस्थिति को नजरअंदाज कर ‘जनमत’ पर अधिक जोर दिया। संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिका के प्रतिनिधि वारन आस्टिन ने कश्मीर पर भारत की सार्वभौमिकता स्वीकार करते हुए भी पाकिस्तान को आक्रमणकारी करार देने से इंकार किया। अमेरिका ने कश्मीर समस्या की तुलना, जूनागढ़ से करके इसे हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष कहकर और भी उलझन में डाल दिया।40 39 डॉ0 कृष्णा कुदेसिना, ‘‘विश्व राजनीति में भारत’’, 1972, पृ0 235.


थोडे़ समय के बाद अमेरिकी प्रशासकों ने कश्मीर विभाजन को स्थाई बनाकर उसे स्वतंत्र स्थान बनाने की वकालत की।

अमेरिका के लिए साम्यवादी, जगत को नियंत्रित करने की योजना में यही व्यवस्था अधिक हितकर थी, किन्तु भारत की एकता और सुरक्षा की दृष्टि से उससे अधिक खतरनाक प्रस्ताव और क्या हो सकता था। कश्मीर पर अमेरिका के एकपक्षीय और स्वार्थपरक रवैये ने भारत-अमेरिकी सम्बन्धों को सामान्य बनाये जाने में बड़ा अहित किया है। कश्मीर के पूर्व हैदराबाद राज्य के प्रसंग को लेकर भी अमेरिका ने काफी कानूनी फसाद किया । उसका कहना था कि हैदराबाद एक राजनीतिक मामला है और शक्ति का प्रयोग उसकी कानूनी हैसियत को समाप्त कर सकता है।41 भारत का प्रत्युत्तर बहुत ही सटीक था, उसका कहना था कि चूकि हैदराबाद सार्वभौमिक राज्य नहीं है, अतः उसे यहाँ शिकायत करने का अधिकार नहीं है।

पाकिस्तानी आक्रमण की वस्तुस्थिति को देखते हुए भारत ने 3 जनवरी 1948 को संयुक्त राष्ट्र का दरवाजा खटखटाया । गांधी जी इस कार्यवाही से अप्रसन्न थे उनका कहना था कि संयुक्त राष्ट्र संघ में ‘‘बन्दरों को न्याय’’ मिलेगा।42 गांधी जी यह बात समय के साथ सही होती गयी। कश्मीर का प्रश्न संयुक्त राष्ट्र संघ में अनेक शक्तियों, विशेषकर अमेरिका की स्वार्थ सिद्धी का माध्यम बन गया। भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर की धारा 34 और 35 के अन्तर्गत सुरक्षा परिषद से शिकायत की कि आक्रमण बन्द करने के लिए कदम उठायें। दूसरी तरफ पाकिस्तान भारत पर आरोप लगाते हुए कहा कि भारत में कश्मीर का विलय अवैध है। इस प्रकार सुरक्षा परिषद में एक ऐसा मामला आया जिसका इतिहास पश्चिमी राष्ट्रों विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका की बेईमानी और अन्याय की कहानी थी।43 भारत की शिकायत पर सुरक्षा परिषद को कोई निश्चित निर्णय लेना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बात यह थी की सुरक्षा परिषद में आंग्ल-अमेरिकी गुट का बहुमत था और भारत शत युद्ध के इस दौर में असंलग्नता की नीति का आवलम्बन कर रहा था जो अमेरिका को फूटी आँख नहीं सुहाता था। इसके विपरीत पाकिस्तान इस गुट का एक पिछलग्गू था। 40

टी0पी0 कुन्ही कृष्णन ‘‘द अन्फेण्डली फैडस : इंण्डिया एण्ड अमेरिका‘‘, 1974, पृ0 119.41

वेदान सुधीर, ‘‘भारत की विदेश नीति-बदलते सन्दर्भ‘‘, 1978, पृ0 146.42

वही, पृ0 195.43

डी0एफ0 फ्लेमिंग, ‘‘अमेरिकाज रोल इन एशिया’’, 1961, पृ0 123.


इसलिए अमेरिकी गुट ने टाल-मटोल की नीति अपनाकर वास्तविक प्रश्न को ओझल करने का प्रयास किया। 20 जनवरी को सुरक्षा परिषद ने तीन सदस्यों के एक आयोग की स्थापना का फैसला किया। जिसका एक सदस्य भारत की सिफारिश पर दूसरा पाकिस्तान की सिफारिश पर तथा तीसरा इन दोनों की सिफारिश पर नियुक्त होता। आयोग को जांच पड़ताल और मध्यस्थता का काम सौपा गया। भारत ने इस कार्य कि लिए चेकोस्लवाकिया और पाकिस्तान ने अर्जेन्टाइना को चुना, पर ये दो राज्य तीसरे नाम के लिए सहमत नहीं हो सके। इस कारण सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष ने संयुक्त राज्य अमेरिका को तीसरा सदस्य मनोनीत कर दिया। 30 अप्रैल को सुरक्षा परिषद ने आयोग में दो और सदस्य बढ़ा दिये । ये सदस्य कोलम्बिया और बेल्जियम थे। इन पांच राज्यों का आयोग बना और इसका नाम ‘‘भारत और पाकिस्तान के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ का आयोग’’ पड़ा। इसी बीच सुरक्षा परिषद ने एक और प्रस्ताव पास किया और सिफारिश की कि कश्मीर से विदेशी कबायली, पाकिस्तानी नागरिक और भारतीय सेना हटा ली जाय और भाषण लेखन की स्वतंत्रता प्रदान करके जनमत संग्रह के लिए उचित वातावरण तैयार किया जाय। संयुक्त राष्ट्र आयोग के कार्य बन्द करने को कहा और समझौता करने के लिए प्रस्ताव रखा जिसके मुख्य सिद्धान्त निम्नलिखित थे-

1) पाकिस्तान कश्मीर से सेना हटा ले और कश्मीर में सामान्य रूप से न रहने वाले पाकिस्तानी नागरिकों और कबायलियों को वहाँ से हटाने का प्रयास करे।

2) इस प्रकार के क्षेत्र को जिसको पाकिस्तानी सेना ने खाली कर दिया उसका शसन प्रबन्ध आयोग के निरीक्षण में स्थानीय नागरिक करे।

3) जब पाकिस्तान इन दोनों शर्तो को पूरा कर ले और इसकी सूचना भारत को दे दे, तो भारत भी अपनी सेना का अधिकतर भाग कश्मीर से हटा ले।

4) अंतिम समझौता होने तक भारत युद्ध विराम की सीमाओं के भीतर उतनी ही सेनायें रखे जितनी इस प्रदेश की कानून व्यवस्था के लिए आवश्यक हो।

शरू में पाकिस्तान ने इन शर्तों को मानने में टाल मटोल की, किन्तु कुछ शर्तो के साथ इन प्रस्ताव को मान लिया। इसके बाद लम्बी वार्ता के बाद 1 जनवरी, 1949 को दोनों पक्ष युद्ध बन्द करने पर सहमत हो गये। युद्ध विराम रेखा निश्चित की गयी और इसकी देखभाल के लिए आयोग के विभिन्न राष्ट्रों में निरीक्षक नियुक्त किये गये। कश्मीर का अंतिम फैसला जनमत संग्रह द्वारा होना था, अतएव जनमत संग्रह के लिए अमेरिकी नागरिक श्री चेस्टरनिमिट्स को

नियुक्त किया गया। प्रशासक बनकर वह कश्मीर पहुँचा और भारत संघ व पाकिस्तान की सरकारों से जनमत संग्रह के सिद्धान्तों पर बात करने लगा, पर दोनों देश इस प्रश्न पर राजी न हो सके। इसके बाद चेस्टरनिमिट्स ने पद त्याग दिया।

इसके बाद पाकिस्तान के आक्रामक इरादों के कारण कश्मीर की समस्या पुनः गम्भीर होने लगी। इस हालत में 29 दिसम्बर, 1949 को मेकनाटन योजना प्रस्ताव रखा गया इसमें कश्मीर का विसैन्यीकरण करके जनमत संग्रह का प्रस्ताव पास किया था लेकिन अनेक कारणों से यह प्रस्ताव मान्य नहीं था, इस कारण योजना को अस्वीकृत कर दिया। मैकनाटन योजना के विफल होने पर 24 फरवरी, 1956 को सुरक्षा परिषद ने आस्ट्रेलिया के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सर आवेन डिक्शन को सौपा। डिक्सन की योजना समूचे कश्मीर में जनमत संग्रह के स्थान पर इसका विभाजन करने की थी। लेकिन यह योजना दोनों पक्षों में किसी भी मान्य नहीं हुई। जबकि डिक्शन ने यह स्वीकार किया कि ‘‘कश्मीर में विरोधी कबायलियों तथा मई 1948 में नियमित सेनाओं का प्रवेश अन्तर्राष्ट्रीय विधि का उल्लंघन था फिर भी उसने भारत और पाकिस्तान दोनों को एक ही स्तर पर रखा।44 डिक्शन की विफलता के बाद लन्दन में राष्ट्रमंण्डल सम्मेलन में कश्मीर समस्या के समाधान का एक और प्रयत्न किया गया। 20 अप्रैल को अमेरिकी नागरिक डा0 फैक ग्राहम को डिक्शन के उत्तराधिकारी को नियुक्त करने का फैसला लिया जो कश्मीर से दोनों सेनाओं को हटाकर जनमत संग्रह का रास्ता तैयार कर सके। इनके समय में अनेक प्रस्ताव रखे जो दोनों देशों को मान्य नहीं था। ग्राहम ने 27 मार्च 1953 में डिक्शन की भाति यह सुझाव दिया कि इस समस्या को सुलझाने के लिए दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने लन्दन, कराची और नई दिल्ली में कश्मीर के सम्बन्ध में वार्तालाप किया। परन्तु जनमत संग्रह के प्रशासक के नाम पर दोनों के बीच समझौता नहीं हो सका फिर भी दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच पत्र व्यवहार होता रहा। पाकिस्तान का सींटो में शामिल होना कश्मीर के लिए एक बड़ी समस्या उत्पन्न कर दी क्योंकि 1947-48 में कश्मीर पर आक्रमण के बाद आज तक संयुक्त राज्य अमेरिका ने उसकी निन्दा नहीं की और हमे यह कहा जाता रहा है कि, हम शंति बनाये रखने के लिए इस पर आग्रह नहीं करे। इससे संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा दी जाने वाली सहायता से आक्रमण को 44

पी0डब्ल्यू0चौधरी, ‘‘पाकिस्तान रिलेशन्स विथ इण्डिया (1947-66)‘‘, 1968, पृ0 28.


प्रोत्साहित करने वाली परिस्थतियों के उत्पन्न होने की सम्भावना थी। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने कहा कि यह सहायता कश्मीर की समस्या को सुलझाने में सहायक होगी, यह इस बात का सूचक है कि उनका मन किस प्रकार सोचता है और वह सैनिक सहायता का किस उद्देश्य हेतु प्रयोग करना चाहते है।45 संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा समर्थित सैन्य संगठनों में पाकिस्तान के शमिल हो जाने से कश्मीर समस्या ‘शीतयुद्ध’ के क्षेत्र में आ गयी। कश्मीर स्थिति गिलगिट में अमेरिका सैन्य अड्डा बनाना चाहता था। गिलगिट सोवियत संघ के बहुत ही निकट पड़ता है, इस हालत में वह इसको कैसे बर्दाश्त कर सकता था। यू तो पहले से सहानुभूति भारत के प्रति रही है पर अब तो सोवियत संघ कश्मीर के मामले पर भारत का खुलेआम समर्थन करने लगा। 26 जनवरी, 1957 को कश्मीर संविधान परिषद के निर्णयनुसार भारत के साथ कश्मीर का अंतिम विलय होने वाला था। अतः इसके विरोध में पाकिस्तान ने सुरक्षा परिषद में पुनः अपील की। इस तरह कश्मीर का प्रश्न एक बार फिर 16 जनवरी, 1957 को सुरक्षा परिषद के सामने आया। यह ऐसा समय था जब स्वेज नहर के प्रश्न पर भारतीय दृष्टिकोण से पश्चिमी जगत के नेता अप्रसन्न थे परिस्थितियां पाकिस्तान के पक्ष में थी, क्योंकि यह पश्चिमी समर्थित गुट का सदस्य बन गया था।

सुरक्षा परिषद में अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया और क्यूबा ने एक सम्मिलित प्रस्ताव रख्ा कि सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष गुन्नार जारिंग भारत और पाकिस्तान जाकर इस समस्या के समाधान का प्रयत्न करे तथा 15 अप्रैल तब अपनी रिपोर्ट दे और पाकिस्तान के साथ इस सुझाव पर विचार करे कि, राज्य से दोनों पक्षों की सेना हटाने और जनमत संग्रह करने तक संयुक्त राष्ट्र संघ की संकटकालीन सेना को कश्मीर भेजा जाय। भारतीय प्रतिनिधि वी0 के0 कृष्णमेनन ने संकटकालीन सेना भेजने का घोर विरोध किया।

श्री मेनन का कहना था कि सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों को ठुकराने के लिए भारत की अपेक्षा पाकिस्तान दोषी है क्योंकि पाकिस्तान ने शस्त्र आक्रमण पर शंतिमय वातावरण को भंग किया है और संयुक्त राष्ट्र चार्टर की अवहेलना की है।46 मेनन के इस तर्क में सोवियत प्रतिनिधि सोवोलोव का पूरा समर्थन मिला। सोवोलोव ने कहा कि - कश्मीर का निर्णय वहाँ की 45

जे0 एल0 नेहरू, ‘‘इंण्डियाज फारेन पालिसी’’ सेलेक्टेड स्पीसेज, सितम्बर (1946 से अप्रैल 1961), पृ0 89.46

शिशिर गुप्ता, ‘‘कश्मीर ए स्टडी इन इंण्डिया, पाकिस्तान रिलेशन्स’’, पृ0 313-14.


जनता कर चुकी है और वह भारत का अभिन्न अंग है। मूल प्रस्ताव में उसने संकटकालीन सेना भेजने पर एक संशोधन पेश किया, परन्तु संशोधन साम्राज्यवादी गुट द्वारा जिसका नेतृत्व अमेरिका कर रहा था मान्य नहीं हुआ। इसके बाद मूल प्रस्ताव पर सुरक्षा परिषद में मतदान हुआ और सोवियत ने ‘वीटो’ का प्रयोग करके पूरे प्रस्ताव को रदद् कर दिया। जब यह प्रस्ताव रद्द हो गया तो 21 फरवरी को सुरक्षा परिषद में एक दूसरा प्रस्ताव पेश हुआ। इससे जारिंग को भारत व पाकिस्तान जाने एवं रिपोर्ट देने की बात थी सेना भेजने का कोई उल्लेख नहीं था। जारिगं ने दोनों देशों से वार्ता करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि कुछ वर्षो में कश्मीर की स्थिति में मौलिक परिवर्तन हो गया है। अपनी रिपोर्ट में समस्या सुलझाने में असमर्थता व्यक्त की। इसी तरह दिसम्बर, 1954 को पुनः ग्राहम मिशन प्रस्ताव आया और यह भी असफल हुआ इसके बाद अमेरिका द्वारा जून 1962 को आयरलैण्ड का प्रस्ताव आया जिसमें कहा गया कि भारत और पाकिस्तान कश्मीर की समस्या के समाधान के लिए प्रत्यक्ष वार्ता करे और ऐसी कार्यवाही न करे जिसमें उस क्षेत्र की शंति भंग हो जाने का खतरा उत्पन्न हो जाय। सोवियत संघ ने पुनः वीटो के द्वारा इस प्रस्ताव को रद्द कर दिया इसके बाद सुरक्षा परिषद ने कश्मीर के प्रश्न पर कोई कदम नहीं उठाया।

1965, 1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध एवं अमेरिका का प्रभाव[सम्पादन]

1965 भारत-पाकिस्तान युद्ध एवं अमेरिका[सम्पादन]

पाकिस्तान में कश्मीर पर अधिकार की माँग जोर पकड़ने लगी थी और पाकिस्तान के हर कोने से युद्ध की आवाजे आने लगी थी। पाकिस्तान ने सर्वप्रथम अपनी शक्ति का प्रदर्शन ‘कच्छ के रन’ में किया, क्योंकि यह क्षेत्र रेडक्लिफ कमीशन द्वारा कभी सीमांकित नहीं किया था। भारत का यह दावा था कि पश्चिमी सीमा पर स्थिति कंजर कोर्ट क्षेत्र और बीनावरे क्षेत्र भारत में है। जबकि पाकिस्तान का यह कहना था कि चूकिं यह क्षेत्र ब्रिटिश राज्य में सिन्ध राज्य के अधीन था इसलिए इस पर पाकिस्तान का अधिकार है। अतः इस क्षेत्र को अधिकार में लेने के लिए जनवरी 1965 में पाकिस्तान ने सैनिक कार्यवाही की। 9 अप्रैल 1965 को पाकिस्तान ने भारतीय सीमा में घुसकर एक अघोषित युद्ध की शरूआत की और भारत ने पाकिस्तान आक्रमण को विफल कर दिया।


पाकिस्तान ने इस युद्ध में अमेरिकी शस्त्रों का जिसमें पेंटेन टैंक भी सम्मिलित थे, खुल्लमखुला प्रयोग किया। संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा भारत को दिया गया यह आश्वासन कि अमेरिकी शस्त्र भारत के विरूद्ध प्रयोग नहीं किये जायेगें, कच्छ केस में झूठा साबित हुआ। वास्तव में यह अमेरिकी शस्त्र शक्ति ही थी जो पाकिस्तान को भारत से युद्ध करने में लिए उत्तेजित करती रही।47 सन् 1965 का युद्ध लगभग 23 दिन तक चला। इस युद्ध के दौरान दोनों देशों ने अपनी-अपनी जीत के समाचार प्रसारित किये। 5 अगस्त कश्मीर में पाकिस्तानी घुसपैठ की खबर जब अमेरिका पहुंची तो अमेरिकी अखबारों ने पाकिस्तानी राग अलापते हुए कहा कि भारत के विरूद्ध कश्मीर वालों ने विद्रोह किया है, लेकिन यह उम्मीद की जाती है कि अमेरिका सरकार को घटना का वास्तविक ब्यौरा मिला होगा और जिस ढंग से अमेरिका के प्रबल दुश्मन चीन के साथ पाकिस्तान अपना सम्बंध बढ़ा रहा था। उसे देखते हुये यह विश्व शंति के लिए खतरा था।48 इस युद्ध में अमेरिकी आश्वासन झूठा साबित हुआ जब राष्ट्रपति आइजनहावर ने कहा था कि पाकिस्तान को मिले अमेरिकी हथियारों का प्रयोग केवल कम्युनिस्ट राज्यों के विरूद्ध करने दिया जायेगा और यदि पाकिस्तान ने उन हथियारों का प्रयोग भारत के विरूद्ध किया तो संयुक्त राज्य अमेरिका उसका विरोध करेगा और भारत की सहायता करेगा।49 इस आश्वासन के आधार पर भारत सरकार ने अमेरिका का ध्यान इस ओर आकृष्ट कराया कि पाकिस्तान ‘‘सेन्टों’ और ‘सीएटों’ सन्धियों के अन्तर्गत मिले शस्त्रास्त्रों का प्रयोग भारत के विरूद्ध कर रहा है और यह अनुरोध किया कि अमेरिका अपने मित्र राज्यों को ऐसा करने से रोके, लेकिन अमेरिकी प्रशासन ने इस तथ्य की ओर ध्यान नहीं दिया और पाकिस्तान को अमेरिकी शस्त्रास्त्रों के दुरूपयोग को रोकने में अपनी असमर्थता प्रकट की।50 अमेरिका ने काफी व्याकुलता प्रकट की जब सितम्बर 1965 में भारत पाकिस्तान युद्ध प्रारम्भ हो गया। अमेरिकी विदेश सचिव डीन रस्क ने भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिवों 47

सुधीर वेदान, ‘‘भारत की विदेश नीति बदलते सन्दर्भ‘‘, 1978, पृ0 105.48

डिपार्टमेंन्ट ऑफ यू0 एस0 वुलेटिन, अक्टूबर 11, 1965, पृ0 603.49

रामरघुनाथ, ‘‘सुपर पार्वस एण्ड इंण्डिया-पाकिस्तानी सबकान्टीनेन्स‘‘,‘ 1983, पृ0 218.50

नार्मन डी0 पार्मर, ‘‘इण्डिया एण्ड पाकिस्तान दी मेजर रेसिपेन्स’’ करेन्टहिस्ट्री, नवम्बर 1965, पृ0 267 .


से अपने देश की चिन्ताओं एवं व्याकुलताओं से अवगत कराया। उन्होंने दोनों देशों से यह आग्रह किया कि वे संयुक्त राष्ट्र महासचिव यू थाट के इस अपील पर सावधानी से विचार करें। इस युद्ध में शरू से लेकर अन्त तक संयुक्त राज्य अमेरिका ने सख्त तटस्थता का पालन किया। अमेरिका ने युद्ध के लिए भारत और पाकिस्तान किसी एक पर दोषारोपण नहीं किया शयद वह पाकिस्तान और भारत के साथ अपना व्यापक हित देख रहा था।51 पाकिस्तान के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका ने भारत के ऊपर भी प्रतिबन्ध लगा दिया। इस प्रकार अमेरिका ने आक्रान्त दोनों को एक ही कोटि में रखने का प्रयास किया। इसके अतिरिक्त उसने यह भी धमकी दी कि वह दोनों देशों को आर्थिक सहायता देना भी बन्द कर देगा यदि युद्ध बन्द नहीं किया गया। इस धमकी से पाकिस्तान की तुलना में भारत को ज्यादा नुकसान होने वाला था क्योंकि इस समय भारत में खाद्यान्नों का संकट उत्पन्न हो गया था और इस समय भारत को अमेरिकी सहायता की ज्यादा आवश्यकता थी।

अमेरिका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली सैनिक सहायता कुछ समय के लिए बन्द कर दी। अमेरिकी सरकार ने यह महसूस किया कि युद्ध केवल भारतीय उप महाद्वीप की शंति के लिए खतरा नहीं है, वरन यह विश्व शंति के लिए भी खतरा है और इस युद्ध से अन्य देश भी प्रभावित होगें। इस युद्ध में अमेरिका ने युद्ध के लिए भारत और पाकिस्तान किसी एक पर दोषारोपण नहीं किया शयद वह पाकिस्तान और भारत के साथ अपनी व्यापक हित देख रहा था।52 सन् 1965 के पतझड़ में सुरक्षा परिषद ने कई प्रस्ताव लाये। इन प्रस्तावों का प्रमुख उद्देश्य दोनों पक्षों को युद्ध विराम तक लाना था, तथा दोनों पक्षों की सेनाओं को 5 अगस्त, 1965 की स्थिति तक लाना था तथा कश्मीर समस्या का राजनीतिक समाधान ढूढंना था । संयुक्त राज्य अमेरिका ने इन प्रस्तावों का समर्थन तथा संयुक्त राष्ट्र महासचिव के शंति प्रयासों के समर्थन की पुष्टि की। अमेरिका ने उन सारे उपायों को भी समर्थन दिया जिसके द्वारा दोनों पक्षों भारत और पाकिस्तान को वार्ता के मेंज तक लाया जाय, तथा उनको युद्ध से दूर किया जाय।53 51

रामरघुनाथ, ‘‘सुपर पार्वस एण्ड इंण्डिया - पाकिस्तानी सबकान्टीनेन्स‘‘, 1983, पृ0 219.52

रामरघुनाथ, ‘‘सुपर पार्वस एण्ड इंण्डिया - पाकिस्तानी सबकान्टीनेन्स‘‘, 1983, पृ0 219.53

न्यूयार्क टाइम्स’ 15 सितम्बर, 1965.


1965 के पाकिस्तानी आक्रमण का मुख्य उद्देश्य 1947 के इतिहास को दोहराना था। 9 अगस्त को शेख अब्दुल्ला के कैद के वर्षगांठ के अवसर पर कश्मीरी जनमत संग्रह दल ने एक विशाल प्रदर्शन का आयोजन किया था। उसी दिन घुसपैठियों को अपनी कार्यवाही शरू करनी थी, ताकि पाकिस्तान को यह कहने का मौका मिल जाय कि कश्मीर की जनता ने भारत के खिलाफ विद्रोह कर दिया है। भारत सरकार ने घटना की सूचना विराम रेखा पर स्थित संयुक्त राष्ट्र के पर्यवेक्षकों को दे दी। इन पर्यवेक्षकों ने स्थिति की जांच पड़ताल की और संयुक्त राष्ट्र के मुख्य पर्यवेक्षक जनरल निम्मों ने महासचिव को इस बात की सूचना दी कि असैनिक पोशाक में बहुत से लोग सीमा के उस पार से भारतीय क्षेत्र में घुसे है। 10 अगस्त को महासचिव यू थॉट ने भारतीय और पाकिस्तानी प्रतिनिधियों से बातचीत करते हुए कहा कि वे अपनी सरकारों को संयम से काम लेने की सलाह दें।

इसी बीच भारतीय सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि, वह घुसपैठियों का सामना करने के लिए दृढ है और महासचिव को पाकिस्तान से अनुरोध करना चाहिए कि वे इन व्यक्तियों को वापस बुला ले। 18 अगस्त को यह सुनने में आया कि महासचिव ने कश्मीर की स्थिति पर एक वक्तव्य तैयार किया है जिसमें वर्तमान स्थिति के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया गया है।54 लेकिन पाकिस्तान तथा अमेरिकी गुट के दबाव में आकार महासचिव ने उस वक्तव्य को प्रकाशित नहीं कराया।55 इसके उपरान्त महासचिव ने जनरल निम्मों को न्यूयार्क बुलाया। 16 अगस्त को जनरल न्यूयार्क पहुंचे और महासचिव को उन्होंने कश्मीर की स्थिति के सम्बन्ध में अपनी रिपोर्ट प्रस् तुत की। कश्मीर के प्रश्न पर अपनी मंत्रणा का दौरा पूरा करने के बाद महासचिव समस्या के समाधान के लिए नये सिरे से कदम उठाने पर विचार करने लगे। उन्होंने यह बताया कि, कश्मीर में लड़ाई के बारे में जनरल निम्मों ने जो रिपोर्ट दी है उसको अभी वे प्रकाशित नहीं करेगें। ऐसा उन्होंने अमेरिका के दबाव में आकर किया।56 अमेरिका ने पुनः वही रवैया अपनाया जो कश्मीर के प्रश्न पर अब तक उसका रहा है यह जानकर कि जनरल निम्मों की रिपोर्ट पाकिस्तान के विरूद्ध है; अमेरिकी सूत्रों ने महासचिव 54 56 एम0 वी0कामथ, ‘‘इण्डिया एण्ड यूनाईटेड नेशन‘‘, पृ0 81.55

वही।

जे0एस0के0 निकोलसन, ‘‘अमेरिकन स्ट्रेटजी इन वर्ल्ड पोलिटिक्स’’, 1962, पृ0 67.


यू-थाँट पर यह दबाव डाला कि वे इस रिपोर्ट को प्रकाशित न करें। भारत के प्रति संयुक्त राज्य अमेरिका का यह अन्यायपूर्ण रूख था।

सुरक्षा परिषद में अमेरिका का प्रभाव[सम्पादन]

4 सितम्बर को सुरक्षा परिषद की बैठक हुई। कश्मीर समस्या पर विचार करने के लिए परिषद की यह 125वीं बैठक थी। भारत ने परिषद से यह मांग की कि वह कश्मीर में पाकिस्तान को आक्रमणकारी घोषित करे, और पाकिस्तान से यह मांग करे कि वह कश्मीर के सभी भागों में अपनी सेना ह टा लें। भारतीय प्रतिनिधि पार्थसारथी ने कहा कि पाकिस्तानी ने आक्रमण के द्वारा करांची में 1949 में हुए युद्ध विराम समझौते को टुकड़े-टुकड़े कर दिया है और युद्ध विराम रेखा को कसाई खाने में परिवर्तित कर दिया है। बहस को प्रारम्भ करते हुए पार्थसारथी ने कहा कि, पिछले 18 वर्षो से सुरक्षा परिषद कश्मीर समस्या को सुलझानें में असफल रही है। क्योंकि वह इस समस्या के साथ तथ्य को पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण किया है, मानने से हमेशा इंकार कर रही है। उन् होंने कहा कि, ‘‘कश्मीर में आजकल जो हो रहा है वह पुनः भारी आक्रमण है न्यायविहीन पाकिस्तानी दावे से सुरक्षा परिषद पथभ्रष्ट, भ्रम और बहकावे में पड़ गयी है।57 6 सितम्बर सुरक्षा परिषद की दूसरी बैठक हुई यू थाट ने सुरक्षा परिषद को सूचित किया कि भारत और पाकिस्तान दोनो ने युद्ध बन्द करने से इंकार कर दिया है उस रात सुरक्षा परिषद ने सर्वसम्मिति से एक संकटकालीन प्रस्ताव पास किया जिसमें भारत और पाकिस्तान को तत्काल युद्ध बन्द करने के लिए कहा गया। साथ ही यह घोषणा की कि युद्ध बन्द कराने के लिए वह (थाट) भारत और पाकिस्तान जायेगे।

यू थाट का शंति अभियान[सम्पादन]

सुरक्षा परिषद के इस प्रस्ताव के आधार पर 9 सितम्बर को यू थाट करांची पहुंचे। तीन दिनों तक पाकिस्तानी नेताओं से बातचीत की पाकिस्तान ने युद्ध विराम की शर्त को मानने के लिए तीन शर्ते रखी।

1. युद्ध विराम के बाद सम्पूर्ण कश्मीर से भारत और पाकिस्तान अपनी सेनाओं को पूर्ण रूप से हटा लें।57

एम0 वी0 कामथ, ‘‘इण्डिया एण्ड यूनाईटेड नेशन‘‘, पृ0 76.


2. जनमत संग्रह होने तक शंति व्यवस्था बनाये रखने के लिए कश्मीर में अफ्रीकी एशियायी देशों की सेना रखी जाय।

3. तीन महीनें के भीतर कश्मीर में सुरक्षा परिषद के 5 जनवरी 1949 के प्रस्ताव के अनुसार जनमत संग्रह के लिए मतदान किया जाय।

इन शर्तो ने यह स्पष्ट कर दिया कि पाकिस्तान युद्ध पर बात करने के लिए तैयार नहीं है, क्योंकि ये तीन शर्ते ऐसी थी। जिनकों भारत किसी भी हालत में नहीं मान सकता है। 12 सितम्बर को महासचिव दिल्ली पहुंचे दिल्ली में भारतीय प्रधानमंत्री से उन्होंनें तुरन्त युद्ध बन्द करने का प्रस्ताव रखा। भारत इस प्रस्ताव को मानने के लिए तैयार था, लेकिन साथ ही उसने यह स्पष्ट कर दिया कि वह अपनी प्रादेशिक अखण्डता बनाये रखने के लिए स्वतंत्र है। वही 15 सितम्बर को राष्ट्रपति अयूब खां ने युद्ध विराम के प्रस्ताव को अन्तिम रूप से अस्वीकार कर दिया, यू थान्ट अपने शंति अभियान में असफल होकर लौटे।58 युद्ध के अन्तिम दौर में पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खां ने अमेरिकी राष्ट्रपति वी जॉनसन से अपील की कि वे पाकिस्तान की ओर से कश्मीर समस्या को सुलझाने की पहल करे तथा उन्होंने यह भी कहा कि वे जो निर्णय करेंगे वो पाकिस्तान को मंजूर होगा। इस प्रकार पाकिस्तान का प्रयास यह था कि वह कश्मीर समस्या पर संयुक्त राज्य अमेरिका की सहानुभूति प्राप्त करें। संयुक्त राष्ट्र महासचिव के शंति प्रयासों के परिदृश्य में राष्ट्रपति जानसन ने भारत पर यह दबाव डालने का प्रयास किया कि वह कश्मीर समस्या पर या तो मध्यस्थता या पंच निर्णय के सुझावों को मान ले। अमेरिकी सरकार ने पाकिस्तान से यह कहा कि वह इस प्रायद्वीप में शंति स्थापना की हिमायती है।59 संयुक्त राष्ट्र के लिए 22 सितम्बर, 1962 को भारत और बाद में पाकिस्तान की ओर से यह खबर आयी कि उन्होंने सुरक्षा परिषद के युद्ध विराम सम्बंधी तीसरे प्रस्ताव को मान लिया है।60 अमेरिका राजदूत आर्थर जी गोल्डबर्ग ने इस कार्य के लिए भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शस्त्री एवं पाकिस्तान राष्ट्रपति अयूब खां को सुरक्षा परिषद की ओर से धन्यवाद ज्ञापित किया।61 58 वही, पृ0 47.59

रामरघुनाथ, ‘‘सुपर पार्वस एण्ड इंण्डिया-पाकिस्तानी सबकान्टीनेन्टस‘‘, 1983, पृ0 220.60

दी यूनाईटेड स्टेट इन वर्ल्ड अफेयर्स, 1965, पृ0 222.61

डाक्यूमेन्ट आन अमेरिकन फारेन रिलेशन्स, 1965, पृ0 116.


भारत और पाकिस्तान युद्ध के दौरान अपने नये साथी पाकिस्तान पर भारतीय सैनिक दबाव कम करने के उद्देश्य से 17 सितम्बर को चीन ने भारत को धमकी भरा एक अल्टिमेटम भेजा जिसमें भारत से यह मांग की गयी थी कि वह तीन दिनों के अन्दर गैर कानूनी ढंग से चीनी क्षेत्र में बनाये गये सैनिक अड्डों को तोड़ दे तथा इसके उपरान्त उसने शघ्र ही सीमान्त पर भारत के विरूद्ध सैनिक गतिविधि प्रारम्भ कर दी। चीन की इस कार्यवाही से परिस्थति बहुत जटिल हो गई । परिस्थिति को देखते हुए भारत ने अमेरिका विदेश सचिव से यह अपील की कि अमेरिका इस चीनी आक्रमण की स्थिति में हस्तक्षेप करें। अमेरिकी सचिव रस्क ने यह बयान दिया कि चीन, भारत और पाकिस्तान के इस संघर्ष्ा में व्यक्तिगत रूप से दखलअन्दाजी कर रहा है।

अमेरिकी सरकार ने चीन को यह आगाह किया कि यदि चीन ने भारत पर आक्रमण किया तो इस आक्रमण के जवाब में अमेरिकी की तरफ से व्यापक हवाई हमले किये जायेगे।62 चीनी रक्षा मंत्रालय से यह आवाज आयी कि साम्राज्यवादी अमेरिकी भारत द्वारा पाकिस्तान और चीन के खिलाफ की जा रही प्रतिक्रिया का समर्थन कर रहा है। इसके एक सप्ताह बाद चीनी विदेशमंत्री का एक वक्तव्य आया जो उन्होंने बीजिंग में सम्पन्न हुए एक संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि अमेरिका और उसके सहयोगी चीन में भूमि पर हमला करेगें लेकिन वे ऐसा करने में कभी सफल नहीं होगें। हम उनका स्वागत करते है।63 संयुक्त राज्य अमेरिका के समाचार पत्रों ने भारत-पाकिस्तान युद्ध के बारे में काफी सन्तुलित टिप्पणी की। वांशिगटन पोस्ट ने लिखा है कि यद्यपि साम्यवाद दोनों के शत्रु है। किन्तु पाकिस्तानी मानसिकता यह थी कि भारत वास्तविक शत्रु है। जो शस्त्र पाकिस्तान को साम्यवादी रूस से मुकाबला करने के लिए अमेरिका द्वारा प्रदत्त किये गये थे उनका प्रयोग अब भारत के विरूद्ध हो रहा है जिसका भारत ने सदा से विरोध किया है, ‘सेन्टो’ ने अपना वास्तविक उद्देश्य पूर्ण रूप से खो दिया है यह ध्यान देने योग्य है कि, पाकिस्तान ने अमेरिका के इस निवेदन को ठुकरा दिया है कि वह वियतनाम में साम्यवादियों के खिलाफ उसका सहयोग करे जबकि ‘सीटों’ सदस्य देशों के लिए ऐसी सहायता करना बन्धनकारी है। यदि संक्षेप में कहे तो पाकिस्तान इसके द्वारा केवल अपना राष्ट्रीय हित साध रहा है और उसका 62

साइनों-सोवियत रिलेशन्स, (1964-65), पृ0 117.63

‘न्यूयार्क टाइम्स, सितम्बर 22, 1965.


केन्द्रीय लक्ष्य स्वकेन्द्र भारत से सक्रिय लड़ाई लड़ना है न कि साम्यवाद के विरूद्ध लड़ाई लड़नी है।64 दि पोस्ट इन्टेलिजेन्सर ने लिखा है कि-पाकिस्तान को अत्यधिक मात्रा में दी जाने वाली शस्त्र सहायता ही भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाले युद्ध का प्रमुख कारण है प्रायः सत्य है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार लैटिन अमेरिका देशों में शस्त्रो से भरे जहाज दिये गये जिसका उद्देश्य वहां प्रति क्रान्तियों को आधार देना था। सच्चाई यह है पाकिस्तान के प्रति जो अमेरिका की नीति है तथा जो सोच है, वह ठीक ढंग से कार्य नहींं कर रही है और अमेरिका का नाम दोनों देशों में गर्त में जा रहा है।

1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध एवं अमेरिका[सम्पादन]

बॉग्लादेश की जनक्रान्ति और उसका सार्वभौमिक राष्ट्र के रूप में अभ्युदय अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में इस शताब्दी की एक ऐसी घटना है जिसका उदाहरण क्रान्ति के इतिहास में मिलना दुर्लभ है। समय की दृष्टि से भी इसकी महत्ता है। इत ने थोडे़ समय में इस देश के बाशिन्दों ने अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए जितना बड़ा बलिदान किया, उतना शयद किसी देश ने किया होगा। नौ महीने की अवधि में (25 मार्च से 16 दिसम्बर 1971) पाकिस्तानी सेना ने लगभग 30 लाख नर-नारियों को मौत के घाट उतार दिया। छात्र-छात्राअें, प्रोफेसर वकी ल, डाक्टर अदि अधिकांश बु़द्धजीवी तबके को उनके पूर्व नियोजित नृशंस हत्याकाण्ड का शिकार बनना पड़ा। लगभग 2 करोड़ लोगो को अपनी प्राण्रक्षा हेतु वतन छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी।

मुक्ति संग्राम में भारत की भूमिका[सम्पादन]

बांग्लादेश के उद्भव के समय इस क्षेत्र में विकसित अमेरिकी-चीन ‘देतांत’ ने भारत के समक्ष विकट स्थिति उत्पन्न कर दी एक ओर पाकिस्तान, चीन और अमेरिका की सांठ गांठ से दक्षिण एशिया में स्थित शक्ति सन्तुलन अस्त-व्यस्त हो रहा था, तो दूसरी ओर पाकिस्तान के दो संभागों के बीच झगड़ों का सीधा प्रभाव उसी पर पड़ रहा था। बांग्ला क्षेत्र में पाकिस्तान की सैनिक कार्यवाही के परिणाम स्वरूप लाखों को अपना वतन छोड़कर भारत आना पड़ा। वैसे देखा जाया तो भारत में आये शरणार्थियों की संख्या विश्व के कई देशों की कुल जनसंख्या से 64

वंशिगटन पोस्ट, सितम्बर 9, 1965.‘


भी अधिक था। इसकी देखभाल तथा खान-पान भारत पर ही था सबसे महत्वपूर्ण बात भारत की सुरक्षा, अखण्डता और सार्वभौमिकता को अक्षुण्ण बनाये रखने की थी। पाकिस्तान अपनी समस्या का समाधान भारत की कीमत पर करना चाहता था, और भारत किसी भी कीमत पर यह न होने देने के लिए कृत संकल्प था। भारतीय हितों को देखते हुए वे उसे स्वतंत्र राज्य के रूप में स्वीकृति प्रदान करने और खुले जमीन के पक्ष में था।

भारत के कतिपय बुद्धिजीवी सरकार से शघ्रतिशीघ्र कार्यवाही करने की वकालत कर रहे थे। भूतपूर्व विदेशमंत्री श्री एम0 सी0 छांगला का कहना था कि राजनैतिक, वैधानिक और नैतिकता की दृष्टि से बांग्लादेश की स्वीकृति देना न्यायोचित है। भारतीय हितों के परिप्रेक्ष्य में विवेचना करते हुए उन्होंने कहा कि ‘बांग्लादेश का उद्भव हमारे अच्छे पड़ोसी की दृष्टि से स्वागत योग्य है। इसके साथ हमारे सांस्कृतिक, राजनीतिक और व्यापारिक सम्बन्ध होगें। यह पड़ोसी पाकिस्तान से भिन्न होगा। क्या हम अपने पूर्वी भाग में पड़ोसी मित्र नहीं चाहते।65 श्री अजित भट्टाचार्य का कहना था कि भूगोल, इतिहास, संस्कृति और आर्थिक दृष्टि से इस संघर्ष की परिणिती भारत के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। शरणार्थियों के आगमन से स्थिति और भी गंभीर हो गयी है, इन सब बातों को देखते हुए भारत के लिए यह आवश्यक है कि इस लड़ाई का अन्त बांग्लादेश के पक्ष में हो। सन् 1962 और 1965 में जितनी जोखिम थी उतनी ही इसमे विद्यमान है। इससे हमें निश्चित लाभ होगा।66 तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 22 मई 1971 को कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में इस समस्या पर अपना मत व्यक्त करते हुए कहा कि-पूर्वी बंगाल की समस्या का कोई सैनिक समाधान संभव नहीं जो लोग शक्ति में है उन्हें इसका राजनीतिक हल ढूढ़ना हागा। विश्व जनमत अपने आप में एक शक्ति है। वह अतिशक्तिशाली को भी प्रभावित कर सकती है। महाशक्तियों की इसमें विशेष जिम्मेदारी है। अगर वे अपना समुचित प्रभाव काम में ले, तो इस क्षेत्र में शंति बनी रह सकती है, अन्यथा यह क्षेत्र अशांति का केन्द्र बना रहेगा।67 भारत द्वारा इस समस्या के समुचित निराकरण के लिए की गयी पेशकश असफल सिद्ध हुई। पाकिस्तान ने अपनी स्थिति और भी मजबूत कर ली अमेरिका और चीन ने भी अपनी 65 67

के0 सुब्रम्ह्णयम्, ‘‘बांग्लादेश एण्ड इण्डियाज सेक्यूरिटी’, 1972, पृ0 55.66

वही।

धीरेन मलिक, ‘‘इन्दिरा स्पीक्स आन जीना साइट एण्ड वार विद बंग्लादेश’’, 1976, पृ0 22.


मूलभूत नीति में कोई परिवर्तन नहीं किया न अन्य यूरोपीय देशों ने दक्षिण एशिया में बढ़ते संघर्ष पर यथोचित ध्यान ही दिया।

संघर्ष के आरम्भिक दिनों में अमेरिकी शसन ने मौन रहने का आभास अवश्य दिया था। किन्तु बाद की घटनाओं से पता चलता है कि यह भंगिमा भी एक छलावा थी। वास्तव में वह शिथिल कभी भी नहीं रही। इतने बड़े नरसंहार के समय संसार की चुप्पी और अमेरिकी शसन की एक पक्षीय भूमिका से वहाँ के जन मानस और पत्रकार जगत में बड़ा जबरदस्त रोष प्रकट किया गया। अमेरिकी नीति पर करारा प्रहार करते हुए ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने लिखा ‘‘पूर्वी पाकिस्तान में हो रही घटना पर संयुक्त राज्य अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र संघ और पूरा विश्व क्योंं चुप है? क्या अमेरिका इसलिए शिथिल है कि वहां एक मुसलमान दूसरे मुसलमान का कत्ल कर रहा है और गोरा आदमी सुरक्षित है? अथवा इसलिए कि इससे साम्यवादी विचारधारा का कोई सम्बन्ध नहीं है? क्या अमेरिका इसलिए चुप है कि पूर्वी पाकिस्तान कही दूसरा वियतनाम न बन जाय? अफसोस इस बात का है कि नरसंहार के समय सारा संसार चुप्पी साधे बैठा है। इन परिस्थतियों मे हमें अमेरिका की खतरनाक एवं मूर्खतापूर्ण नीति का विरोध करने के लिए बाध्य होना पड़ता है, एक ओर तो हम भारत को सात करोड़ का अनुदान देने का आश्वासन देते है, दूसरी ओर हम पाकिस्तानी सैनिक कमांडरों को बचाने हेतु उन्हें शस्त्र दे रहे है, जिससे कि वे रक्तपात और जनता को भयभीत कर सके।

इन आलोचनाओं के उपरान्त भी अमेरिका बांग्लादेश के मुक्ति संघर्ष में पश्चिमी पाकिस्तान के सैनिक जत्थे का ही समर्थन करता रहा। उनसे न केवल उसका उत्साह ही बढ़ाया अपितु धनवस्त्रों की सहायता देकर टूटते पाकिस्तान को संबल भी दिया। एशिया में पाकिस्तान का दूसरा प्रबल समर्थक जनवादी चीन था। जिसने वाणी और कर्म दोनों से ही पाकिस्तान का समर्थन किया। जनवादी चीन को आशंका थी कि भारत पाकिस्तान पर आक्रमण करेगा। इसी आशय में चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई ने 12 अप्रैल, 1971 को याह्यि खाँ को एक संदेश में आश्वस्त किया, ‘‘प्रसारवादी भारत अगर पाकिस्तान पर आक्रमण करता है तो ऐसी स्थिति में जनवादी चीन की जनता और संसार, पाकिस्तान की सार्वभौमिकता और स्वतन्त्रता की रक्षा में आपके साथ सुदृढ़ता से खड़ी रहेगी।68 68

न्यूजवीक अगस्त 2, 1977.


पाकिस्तान के सम्बन्ध में अमेरिका और चीन की समझ या महत्ता कोई नयी बात नहीं है। पाकिस्तान दोनों ही देशों के लिए भू-राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल रहा है और इसलिए वह समान रूप से दोनों का कृपा पात्र रहा है। श्री तपनदास ने अपनी पुस्तक ‘‘साइनों-पाक काजुन एण्ड यू0 एस0 फारेन पालिसी’ में इस क्षेत्र में अमेरिका और चीन की समान रूप से बढ़ती दिलचस्पी में निहित कारणों का उल्लेख करते हुए लिखा है कि ‘‘दोनों ही देश अपने औपनिवेशक प्रभुत्व के लिए पाकिस्तान को निरन्तर प्रोत्साहित करते है। इसके पीछे मूल लक्ष्य अपने समान दुश्मन, सोवियत रूस और भारत को सबक सिखाना है। बांग्लादेश का उद्भव उनकी राजनीतिक प्रभुता के लिए प्रतिकूल है। चूकि दोनों देशों के बीच सम्बन्ध सुधारने में पाकिस्तान ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। इसलिए उन्होंने आदि माध्यम से एहसास का बदला चुकाया है। लेखक का कहना है कि ‘‘अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा, संघर्ष और तनाव के उपरान्त भी अपने दूरगामी हितों की दृष्टि से एक अलिखित समझ विद्यमान थी जिसका बांग्लादेश में कार्यान्वयन किया गया।69 इस बीच भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव बढ गया और मुक्ति वाहिनी की गतिविधि में तेजी आने के समय ही भारत और पाकिस्तान की सेनाओं में मामूली झड़पे भी होने लगी। पाकिस्तान के कुछ विमान और टैंक नष्ट कर दिये गये। इस पर अमेरिका ने यह आरोप लगाया कि भारत ने पाकिस्तान के विरूद्ध आक्रमणात्मक कार्यवाईयां शरू कर दी है। भारतीय विदेश सचिव अमेरिकी राजदूत क्रिटिंग को स्पष्ट शब्दों में बतला दिया कि अमेरिकी सरकार का यह आरोप सरासर झूठ है कि भारत ने पाकिस्तान पर हमला कर दिया है।

3 दिसम्बर को युद्ध शरू हो गया, 4 दिसम्बर को अमेरिकी विदेश सचिव ने इस विषय पर एक लम्बा वक्तव्य जारी किया, जिसमें युद्ध छिड़ने के लिए भारत को दोषी बताया गया। यह भी घोषणा की गयी कि भारत को हथियारों की खरीद के बचे हुए सभी लाइसेन्स रद्द कर दिये गये हैं। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि अमेरिका ने भारत को सैनिक साज-समान आपूर्ति रोकने का निर्णय लिया है। यह भी धमकी दी गयी कि भारत ने युद्ध बन्द नहीं किया तो अमेरिका आर्थिक मदद भी बन्द कर सकता है। उसी दिन अमेरिका ने सुरक्षा परिषद में भारत-पाक प्रश्न रखने की पहल की और परिषद में जो प्रस्ताव रखा गया वह स्पष्टतया भारत विरोधी था।70 69 तपन दास, ‘‘साइनों - पाक काजुलन एण्ड यू0 एस0 फारेन पालिसी’’, पृ0 7.


परिषद में भारत विरोधी रवैये के लिए भारत सरकार ने अमेरिका की कठोर शब्दों मे निन्दा की। भारत के विदेश सचिव ने कीरिंग को बुलाकर अमेरिका द्वारा भारत विरोधी रूख अपनाने का कड़ा विरोध प्रकट किया और स्पष्ट शब्दों में बता दिया कि अमेरिका के इस रवैये से भारत-अमेरिका सम्बन्ध बिगड़ जायेगें। कीरिंग को चेतवानी दी गयी कि अमेरिका भारत को आक्रमणकारी कहना बन्द करे। अमेरिका चाहे जितना कहे भारत तब तक युद्ध बन्द नहीं करेगा, जब तक बांग्लादेश का सारा इलाका खाली नहीं कर दिया जाता, साथ ही वांशिगटन स्थित भारतीय राजदूत को आदेश दिया गया कि वे भारतीय शसकों का गुस्सा अमेरिकी शसकों तक पहुॅचा दे। अमेरिका द्वारा सुरक्षा परिषद में भारत का विरोध और पाकिस्तान का समर्थन करने तथा भारत को धमकी देने के विरोध में भारतीय जनता में तीव्र प्रतिक्रिया हुई।

सुरक्षा परिषद में पाकिस्तानी शसकों की रक्षा करने में असफल हो जाने के बाद अमेरिका जानबूझकर भारत पर आरोप लगाने लगा, एक आरोप यह था कि इस्लामाबाद में खड़े अमेरिकी विमान पर भारत ने बम वर्षा की तथा बंगाल खाड़ी में दो अमेरिकी जलपोतों पर हमला किया गया।71 भारत सरकार के एक प्रवक्ता ने इस वक्तव्य को सरासर झूठ बताया। 6 दिसम्बर को अमेरिकी प्रशासन ने यह घोषणा की कि 876 करोड़ डालर की आर्थिक सहायता के सम्बन्ध में भारत के साथ जो करार हुआ था वह रदद् किया जाता है। दो दिन बाद अमेरिकी राजदूत कीटिंग ने औपचारिक रूप से भारत सरकार को सूचित कर दिया अमेरिका भारत को सैनिक सामान देना बन्द कर रहा है। सैनिक सामान के आयात के लिए भारत को अब कोई नये अमेरिकी लाइसेंन्स नहीं दिये जायेगे तथा वर्तमान लाइसेंन्स जो बीस लाख डालर के मूल्य के थे वे भी रद्द किये जाते है।72 जहां तक भारत को अमेरिकी आर्थिक सहायता का प्रश्न या भारत को विदेशों से जो सहायता प्राप्त होती थी उसमे 48 प्रतिशत योगदान अमेरिका का होता था। भारत को आर्थिक सहायता देने में अमेरिका अग्रणी रहा। इससे उसे और भी यह बहस हुआ कि उसकी सहायता के बिना भारत का अस्तित्व लड़खड़ा जायेगा, लेकिन युद्ध से पहले ही भारत सरकार ने यह नीति विषयक निर्णय ले लिया था कि विदेशों से खासकर अमेरिका से आर्थिक सहायता लेना जल्द ही बंद कर दी जाय। उधर युद्ध के हर मोर्चे पर पाकिस्तान की अच्छी पिटाई हो रही थी। अमेरिका ने युद्ध में सुरक्षा परिषद द्वारा हस्तक्षेप 70

डी0 एन0 वर्मा, ‘‘अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध‘‘, 2003, पृ0 286.71

टी0वी0के0 कृष्णन, ‘‘दि अन्फ्रेन्डली फ्रेन्डस इण्डिया एण्ड अमेरिका’’, 1974, पृ0 286.72

वही।


कराने का एक और प्रयास किया तथा 6 दिसम्बर को सुरक्षा परिषद की बैठक अमेरिकी प्रतिनिधि के आग्रह पर पुनः बुलाई गयी। अमेरिका ने बार-बार भारत विरोधी प्रस्ताव पेश किया और भारत पर आरोप लगाया कि पाकिस्तान पर उसका हमला जारी है। परन्तु सोवियत संघ वीटो के कारण यह अमेरिका साजिश भी व्यर्थ हो गयी।

अमेरिका का युद्धपोत राजनय[सम्पादन]

बॉग्लादेश के प्रश्न पर पाकिस्तान के प्रतिनिधि जुल्फिकार अली भुट्टों द्वारा सुरक्षा परिषद के अन्दर भारत विरोधी हवा बनाने का प्रयास किया गया। इसमें अमेरिका के प्रतिनिधि जार्ज बुश ने सुरक्षा परिषद के अन्दर और निक्सन प्रशासन के प्रवक्ताओं ने व्हाइट हाउस के मंच से इस प्रकार का सहयोग प्रदान किया जो अमेरिकी राजनयिक इतिहास में भूतपूर्व अमेरिकी विदेश सचिव जाॅन फास्टर डलेस के कुख्यात राजनय की याद दिलाने लगा। सुरक्षा परिषद में जब अमेरिका को कोई सफलता नहीं मिली तो उसने सैनिक हस्तक्षेप की धौंस देकर भारत को धमकाना डराना शरू किया। बांग्लादेश में जब पाकिस्तानी फौजों का पतन अवश्यम्भावी हो गया तब संयुक्त राज्य अमेरिका ने वियतनाम के पास टोंकिग की खाड़ी में स्थिति शक्तिशाली अमेरिकी सांतवे बेडे को बंगाल की खाड़ी की ओर कूच करने का आदेश दे दिया। इस सिलसिले में 15 अमेरिकियों को जिन्होंने संभवतः स्वेच्छा से ढाका में रहने का फैसला किया था, निकालने के लिए अमेरिका के एकमात्र परमाणु शक्ति चालित विमानवती ‘इन्टरप्राइज’ का बंगाल खाड़ी में पहुंचना भारत और संभवतः सोवियत संघ को भी चेतावनी देने का स्पष्ट और असभ्य कदम था।

सातवें बेडे़ को टोंकिग की खाड़ी से प्रस्थान की सूचना के साथ यह अनुमान लगाया गया कि राष्ट्रपति निक्सन का यह कदम भारत को अपनी शक्ति से धमका कर एक ऐसी मनोवैज्ञानिक दहशत पैदा करना था जिससे वह बिना शर्त युद्ध विराम की शर्त को स्वीकार कर लें। निक्सन का उद्देश्य अगर पाकिस्तानियों को हटाना ही था तो इसके लिए अमेरिका को भारत से अनुमति लेनी पड़ती और भारत ने स्पष्ट कर दिया था कि ऐसा कुछ तब तक नहीं होगा जब तक युद्ध जारी रहेगा। अमेरिका के युद्धपोत राजनय के क्या कारण हो सकते थे। सम्भवतः युद्ध विराम से पहले बांग्लादेश में किसी रूप में अपना दखल कायम करना चाहता था जिससे युद्ध विराम के बाद पाकिस्तानी सैनिको तथा पाकिस्तान से आकर बांग्लादेश में शषण करने वालों को भारतीय सेना तथा मुक्ति वाहिनी के पंजे से छुड़ाया जा सके। युद्ध में भारतीय


नौ सेना को लगातार कामयाबी मिल रही थी। बंगाल की खाड़ी में इंटरप्राइज को खड़ा कर देने से भारतीय नौ सेना की गतिविधि सीमित हो सकती थी। अमेरिकी पत्रकार जैफ एण्डरसन बाद में गुप्त दस्तावेजों का प्रकाशन किया कि, जहाज को इसलिए भेजा गया ताकि भारत और सोवियत संघ को यह पता चल जाय कि वक्त आने पर अमेरिका अपने बल का प्रयोग कर सकता है। सोवियत संघ पर प्रभाव पैदा करने के लिए यह कदम उठाया गया था ताकि सुरक्षा परिषद में उसके रवैये में नरमी आयें। और भारतीय जहाजों की नाकेबन्दी तथा भारतीय ठिकानों की सक्रियता पर रोक लगायी जा सके।

इसके उपरान्त भारतीय राजदूत लक्ष्मीकांत झां ने यह संकेत दिया कि भारतीय जनता अमेरिका के इस हस्तक्षेप को किसी भी प्रकार सहन नहीं कर सकती है। उन्होंने यह ‘भी कहा कि दोनों पक्षों में युद्ध के समय अन्तर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार तीसरे पक्ष को युद्धबंदी को छीनने का कोई अधिकार नहीं है। विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय नियमों के अनुसार युद्ध विराम से पहले जो भी लड़ाई में हस्तक्षेप करेगा, उसे युद्ध में शमिल माना जायेगा और उसके खिलाफ सैनिक कार्यवाही की जा सकेगी। भारत का यह दृढ़ विरोध कारगार रहा और ‘इण्टरप्राइज’ ने बांग्लादेश के मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं किया73 इस घटना का एक ही नतीजा हुआ कि अमेरिका बुरी तरह बदनाम और अपमानित हुआ। भारत-पाक युद्ध को संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में ले जाने की पहल संयुक्त राज्य अमेरिका ने की। युद्ध शरू होते ही अमेरिकी प्रशासन ने भारत को आक्रमणकारी घोषित कर दिया। भारत ने इसका विरोध किया लेकिन 5 सितम्बर को सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाई गयी। सुरक्षा परिषद में जो प्रस्ताव पारित हुआ वह भारत विरोधी था। जिसका भारत ने लगातार विरोध किया, सोवियत प्रतिनिधि जैकब मलिक ने अमेरिकी प्रस्ताव को एक पक्षीय और अस्वीकार्य मसौदा बताया और कहा कि इस प्रस्ताव का उद्देश्य, जिम्मेदारी को सही पक्ष से गलत पक्ष की ओर डालना है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान और उसका महान रक्षक अमेरिका तथा पाकिस्तान के कतिपय मित्र देश जो उसके सैनिक गुट में है। भारत और पाकिस्तान को एक ही स्तर पर रख सकते है। ऐसी नौबत नहीं आती, यदि पाकिस्तान संसदीय चुनावों में चुने गये पाक जनता के कानूनी प्रतिनिधियों से बातचीत करने से इंकार न करता। मलिक ने कहा 73

डी0 एन0 वर्मा, ‘‘अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध‘‘, 2003, पृ0 288


कि भारत को दण्डित किया जा रहा है और उसे अपने प्रदेश में एक करोड़ शरणार्थियों का बोझ सहना पड़ रहा है।

सुरक्षा परिषद में अमेरिकी प्रस्ताव पर बोलते हुए सोवियत प्रतिनिधि ने कहा कि यह प्रस्ताव बिल्कुल स्वीकार नहीं किया जा सकता है उसने अमेरिका के प्रस्ताव पर ‘वीटो’ कर दिया। सुरक्षा परिषद में तीन बार वीटों से संयुक्त राष्ट्र संघ में गतिरोध पैदा हो गया। इसके बाद इटली और जापान ने भारत पाक युद्ध विराम के लिए एक नया फार्मूला तैयार किया। यह नौ सूत्रीय प्रस्ताव था जिसमें सुरक्षा परिषद के तीन सदस्यों की एक समिति बनायी जाने वाली थी, जिसका काम भारत और पाकिस्तान के महज मध्यस्थता कराकर समझौता कराना था। इस प्रस्ताव पर विचार करने के लिए परिषद की बैठक बुलानी ही थी कि भारत ने एक तरफा युद्ध विराम की घोषणा कर दी।

भारत के हाथों 1971 में पाकिस्तानी सेना को मिली हार जबरदस्त पराजय का अमेरिका को काफी मलाल था। और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड इस कदर आहत थे कि वह भारत को बदनाम करने के लिए प्रचार अभियान चलाने को बेताब हो उठे थे।74 राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को आर्थिक सहायता के रूप में पाकिस्तान के लिए मदद पैंकेज भी तैयार करने में कहा अमेरिकी कांग्रेस पाकिस्तान को हथियारों की बिक्री के खिलाफ थी। उन्होंने कहा मैं पश्चिमी पाकिस्तान की मदद के लिए अभी के अभी एक कार्यक्रम चाहता हूॅ। उनके इस हाल को देखते हुए कोई कार्यक्रम तैयार करो। हम उसे इस हाल में उनके भरोसे पर लटकता नहीं छोड़ सकतें।75 इस प्रकार अमेरिका ने अपने पुराने सहयोगी पाकिस्तान का युद्ध के हर मोड़ पर साथ देने का प्रयास किया।

भारत-पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम एवं अमेरिका का प्रभाव[सम्पादन]

भारत की परमाणु नीति[सम्पादन]

भारत ने शंतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए अपना पहला परमाणु विस्फोट 14 मई 1974 को प्रातः 8 बजकर 5 मिनट पर राजस्थान के जोहापुर एवं जैसलमेर जिले के मध्य पोखर न रेंज में किया और इस प्रकार भारत ने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में पांच बड़े राष्ट्रों का एकाधिकार समाप्त कर दिया।76 74

दैनिक जागरण, 1 जुलाइ्र्र , 2005.75

वही।


इस परीक्षण के दो लक्ष्य थे। एक यह देखने के लिए कि कितना गहरा क्रेटर बन सकता है और दूसरा कि किस हद तक पत्थरों को तोड़ा जा सकता है। इन दोनों ही लक्ष्यों की प्राप्ति में यह विस्फोट सफल रहा।

भारतीय परमाणु ऊर्जा आयोग की घोषणा के अनुसार इस परमाणु विस्फोट का उद्देश्य परमाणु बम बनाने का नहीं है।77 तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने 26 अक्टूबर, 1970 के लोक सभा में कहा था कि ‘‘परमाणु शक्ति शंतिपूर्ण उपयोग की नीति में यह शमिल है कि भूमि के अन्दर परमाणु विस्फोट किया जाय।78 चूंकि यह विस्फोट महाशक्तियों के परमाणु एकाधिकार पर खुला प्रहार था। अतः उनमें बौखलाहट होनी स्वाभाविक थी। यद्यपि भारत ने यह शंतिपूर्ण परमाणु विस्फोट करके अपने द्वारा की गयी किसी भी संन्धि का उल्लंघन नहीं किया था। फिर भी अमेरिका ने अप्रत्यक्ष रूप से और कनाड़ा ने प्रत्यक्ष रूप से भारत के परमाणु कार्यक्रमों में असहयोग करना शरू कर दिया। एक सरकारी वक्तव्य में वांशिगटन ने कहा कि ‘‘संयुक्त राज्य अमेरिका ने हमेशा परमाणु शस्त्रों के एकत्रीकरण का विरोध किया है, क्योकि इसका विश्व के स्थायित्व पर विकृत प्रभाव पड़ेगा। अतः हमारी यह स्थिति बनी रहेगी। टोकियों में मंत्रीमण्डल के मुख्य सचिव ने यह टिप्पणी की कि सरकार केवल दुख प्रकट कर सकती है क्योंकि हम पहले भी और अब भी किसी राष्ट्र द्वारा किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किसी परमाणु विस्फोट के विरूद्ध है।79 21 मई को जिनेवा में 25 राष्ट्रों के निःशस्त्रीकरण सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि ब्रजेश मिश्रा ने कहा कि ‘‘उनके देश का इरादा एक अणुशक्ति बनने का नहीं है लेकिन अब भी हम शंतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए अणु ऊर्जा के उपयोग के लिए वचन बद्ध है। और इसी सन्दर्भ में यह भूगर्भित विस्फोट की प्राविधिकी भी सम्मिलित हैं । इस विस्फोट के बाद भारत की काफी विदेशो आलोचना भी की गयी। जबकि भारत हमेशा कहता आया कि इसका उपयोग केवल शंतिपूर्ण कार्यो के लिए किया जायेगा।

19 मई 1974 को एक समाचार सम्मेलन में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री भुट्टों ने कहा कि वे भारत द्वारा आणविक ब्लैकमेल से अपनी सुरक्षा के लिए एक आणविक छतरी की 76 78

जी0जी0मीर चन्दानी, ‘‘इण्डियाज न्यूक्लीयर डिलेका’’, पृ0 47.77

डी0सी0पाण्डेय, ‘‘द्विध्रुवता में गुटनिरपेक्षता’’, 1977, पृ0 197

पी0आर0गुप्ता, ‘‘परमाणु निरस्त्रीकरण’’, 1983, पृ0 76.79

फारेन अफेयर्स रिकार्डस, खण्ड 20, जून 1979, पृ0 194.


मांग करेंगे। उन्होंने कहा कि-‘‘एक आणविक विस्फोट का आशय है कि एक राष्ट्र ने उद्जन शस्त्रों की सामर्थ्य को प्राप्त कर लिया, लेकिन एक आणविक शस्त्र परम्परागत शस्त्रों के समान नहीं है। यह मूलतः आणविक शस्त्र विहिन राष्ट्रों पर दबाव डालने या उनके दमन करने का एक यंत्र है। हमारा दृढ़ निश्चय है कि हम ऐसे भय से विचलित नहीं होगे। हम अपने देशवासियों को यह वचन देते हैं कि हम पाकिस्तान को आणविक ब्लैकमेल द्वारा पीड़ित नहीं होने देगें, न ही हम उपमहाद्वीप पर भारतीय सर्वोच्चता या नेतृत्व को स्वीकार करेगें।80 श्री भुट्टों ने सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी सदस्यों से सामूहिक या व्यक्तिगत रूप से आक्रांत देशों की ओर से उत्तरदायित्व वहन करने का आग्रह किया। वे भारत के विरूद्ध विश्व भर में प्रचार करने में संलग्न हो गये।

21 मई को भारत के विदेशमंत्री श्री स्वर्णिंसंह ने विस्फोट की शंतिपूर्ण प्रकृति पर बल देते हुए शिमला समझौते के प्रति भारत की वचनबद्धता को पुनः दोहराया कि पाकिस्तान के साथ सभी मतभेदों का समाधान द्विपक्षीय वार्ता के आधार पर होगा। और यह आशा व्यक्त करी कि जो भी भ्रम ‘विस्फोट’ के कारण उत्पन्न हुआ है, यथार्थ और उद्देश्यपूर्ण विश्लेषण तथा धैर्य से विचार करने पर दूर हो जायेगें।

यद्यपि श्री भुट्टों का अमेरिकी शस्त्रो के लिए लगाव और अब उनकी यह धमकी थी कि यदि उनके देश को शस्त्रो की पूर्ति पर प्रतिबन्ध नहीं हटाया गया तो उनका देश आणविक शक्ति बन जायेगा जो उपमहाद्वीप के सामान्यीकरण की इच्छा को विकृत करती है लेकिन भारतीय विस्फोट से इतना तय हो गया कि अमेरिका की प्रतिक्रिया को बल मिल गया।

पाकिस्तान की परमाणु नीति[सम्पादन]

स्व0 श्री जुल्फिकार अली भुट्टों को पाकिस्तान परमाणु कार्यक्रम का जनक माना जा सकता है। परमाणु ऊर्जा आयोग का कार्यभार उन्हें सौपा गया जब वे एक कनिष्ठ मंत्री थे। इस दिशा में वे काफी सक्रिय रहे। 1950 में ही कुछ पाकिस्तानी वैज्ञानिको और इंजीनियरों को परमाणु शक्ति के शंतिपूर्ण उपयोग से सम्बन्धित प्रशिक्षण के लिए अमेरिका भेजा गया। 1950 में पाकिस्तान ने कनाडा के विशेषज्ञों की सहायता से अपना पहला परमाणु संयत्र एवं फ्रांसीसी विशेषज्ञों की सहायता से दूसरा चश्मा में स्थापित किया।80

दिलीप मुखर्जी, ‘‘इण्डियाज न्यूक्लियर टेस्ट एण्ड पाकिस्तान’’, 1975, पृ0 179.


1965 में ही जनरल भुट्टों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि ‘‘यदि भारत परमाणु बम का निर्माण करता है तो हमे घास खानी पड़े या पत्तियॉ हम अपना बम अवश्य प्राप्त करेगें। इसके अतिरिक्त हमारे पास कोई विकल्प नहीं है।81 पाकिस्तान की यह झल्लाहट उस समय और भी बढ़ गयी जब उसे 1971 के भारत-पाक युद्ध में बुरी तरह पराजित होना पड़ा। इस युद्ध के बाद पाकिस्तान के शसक श्री जुल्फिकार अली भुट्टों बने। सत्ता में आने के लगभग तीन सप्ताह बाद ही जनवरी 1972 में उन्होंने पाकिस्तानी वैज्ञानिको की एक बैठक मुल्तान में की। इस बैठक में उन्होंने परमाणु बम तैयार करने के अपने कार्यक्रम को स्पष्ट करते हुए कहा कि ‘‘पाकिस्तान के पास ऐसा परमाणु बम हो कि भारत का उस पर हमला करने की जुर्रत ही न हो। यहूदी, ईसाई और हिन्दू परमाणु बमों से लैस है तो इस्लाम पीछे क्यों। इसी बैठक में भुट्टों ने पाकिस्तान को परमाणु बम से युक्त करने का निर्णय लिया। इसकी घोषणा खालिद हसन जो भुट्टों के प्रेस सचिव थे ने की। लेकिन यह कार्य केवल पाकिस्तान के बस का तो था नहीं, अतः इस काम के लिए उन्होंनें लीबिया, ईरान, अरब आदि देशों की सहायता ली। इस्लाम के नाम पर बनी इस योजना को गुप्त नाम दिया गया प्रोजेक्ट 706 । पाकिस्तान के परमाणु बम योजना में शमिल सभी देशों के अपने स्वार्थ थे।

अक्टूबर 1975 में भुट्टों प्लूटोनियम रिप्रोसिसंग प्लांट का सौदा करने पेरिस पहुॅचे। अमेरिका के विरेध के बावजूद भी फ्रांस ने 20 वर्षो के लिए अन्तर्राष्ट्रीय आण्विक ऊर्जा प्राधिकरण की निगरानी में रखने की शर्त पर प्लान्ट देने की स्वीकृति दे दी। सन् 1971 में अमेरिका की ओर से एलान किया गया कि परमाणु शक्ति संयत्र बनाने का उद्देश्य अपनी परमाणु शक्ति संहारक क्षमता बढ़ाना है। फिर अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु संस्था ने अपने प्रबन्धक मण्डल को सूचना दी कि जब तक कोई देश यह आश्वासन नहीं देते कि उसका उद्देश्य परमाणु हथियार बनाना नहीं है तब तक उसे परमाणु संयत्र चलाने के लिए परिकृष्ट यूरेनियम जैसी सामग्री नहीं दी जा सकती। लेकिन पाकिस्तान ने इस तरह का आश्वासन देने से साफ इंकार कर दिया। इसके बावजूद रीगन प्रशासन ने पाकिस्तान को संहारक हथियार और विमान दियें।81

दिलीप मुखर्जी, ‘‘इण्डियाज न्यूक्लियर टेस्ट एण्ड पाकिस्तान’’, 1975, पृ0 179.


पाकिस्तान ने इस्लामाबाद से कोई 25 किमी0 दूर काहूटा में जो परमाणु संयंत्र लगाया है। पता चलता है कि पाकिस्तान के भौतिक शस्त्री ने हालैण्ड के परमाणु शक्ति केन्द्र से जो कागजात प्राप्त किये थे उनसे ही इस संयत्र का संचालन किया जा रहा है। यूरेनियम को परिष्कृत करने का एक गैस संयंत्र पश्चिमी जर्मनी ने पाकिस्तान को यहां उपलबध कराया है। अब यह बात साफ हो गयी कि पाकिस्तान परमाणु बम के निर्माण में चीन भी बड़े पैमाने पर सहयोग का रहा। परमाणु बम के सिलसिले में चीन और पाकिस्तान की इस मिली मदद को अमेरिकी सिनेटर एलन क्रेन्सटन अमेरिकी सीनेट में एक दस्तावेज प्रस्तुत करके बेनकाब किया। उन्होंने आशंका व्यक्त की कि पाकिस्तान 1986 में अमेरिका से मिलने वाली शेष 3.2 अरब डालर की आर्थिक सहायता शस्त्रास्त्र सहायता प्राप्त करने तक प्रतीक्षा कर रहा है, इसके बाद वह परमाणु विस्फोट कर देगा और परमाणु बम बना लेगा। क्रेन्स्टन ने मांग की कि पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक सहायता और शस्त्रास्त्र सहायता तब तक के लिए रोक दी जाय, जब तक कि वह अपने परमाणु सयंत्र अन्तर्राष्ट्रीय निगरानी के लिए खोल नहीं देता ‘‘उन्होंने रीगन से कहा कि वह इस सहायता को देने से पूर्व यह प्रमाण पत्र दें कि अमेरिका की पूर्ण विश्वसनीय जानकारी के अनुसार पाकिस्तान ने परमाणु हथियार न तो बनाने की क्षमता हासिल की है और न ही इसे प्राप्त करने का प्रयास किया है।82 सिनेटर क्रेन्सर की उक्त रिपोर्ट की शब्दतः पुष्टि रीगन प्रशासन के डिफेन्स निविलयर एजेन्सी के तत्वाधान में जार्ज टाउन यूनिवर्सिटी के सेन्टर फार स्ट्रेटजिक एण्ड इण्टरनेशनल स्टडीज द्वारा तैयार रिपोर्ट में भी हुई है। जिसमें 90 विशेषज्ञों ने भाग लिया। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पाक ने 6 सी0-130 विमान भी परमाणु बम डिलेवरी के लिए ही अमेरिका से खरीदा है। यद्यपि पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल जिया ने अनेक अवसरों पर यह कहा कि पाकिस्तानी परमाणु कार्यक्रम शंतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और उसकी यूरेनियम संवर्धन क्षमता प्रयोगशाला स्तर की है, लेकिन उपरोक्त स्थितियां उसके इस दावें को खोखला साबित कर रही हैं फिर भी पाकिस्तान लगातार मना करता रहा कि ऐसे किसी काम में प्रयोग नहीं कर रहा है। अमेरिका को यह पता था कि रीगन और बुश दोनों राष्ट्रपतियों ने इसके सबूतों को भी 82

पी0आर0 गुप्ता, ‘‘परमाणु निरस्त्रीकरण’’, 1983, पृ0 81.


अनदेखी करना न केवल ठीक समझा बल्कि अमेरिकी संसद को इसके विपरीत प्रभाव पत्र भेजा ताकि पाकिस्तान को सैन्य साजों समान सहित वित्तीय मदद जारी रहे। एक भूतपूर्व वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी रिचर्ड वर्लो ने वांशिगटन को पाकिस्तान द्वारा चलाये जा रहे नाभिकीय हथियार कार्यक्रम की पूरी जानकारी दे दी थी। लेकिन इस रिपोर्ट को दबा दिया गया। ताकि राष्ट्रपति द्वारा प्रमाण पत्र जारी कर संसद से पाकिस्तान को मदद दिलायी जा सके। पूर्व पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष असल वेग ने भी पुष्टि की कि अमेरिका को अच्छी तरह मालूम था कि पाकिस्तान अपनी हद पार कर चुका था लेकिन उसने अफगानिस्तान तथा उसके बाद खाड़ी युद्ध के कारण सारे सबूतों की अनदेखी की।83 1990 के अन्त तक ये सबूत लगातार इतने पुष्ट होते जा रहे थे कि बुश प्रशासन यह बहाना नहीं बना सकता था कि उसे इसकी पर्याप्त जानकारी नहीं थी इसलिए प्रेसलर संसोधन का प्रतिरोध नहीं कर सका। 1991 तक पाकिस्तान की नाभकीय महत्वाकांक्षा को देखते हुए अमेरिका ने सभी सैनिक तथा आर्थिक सहायता रोक दी। इसके बाद भी पाकिस्तान लगातार मना करता रहा कि यह कार्यक्रम शंतिपूर्ण उद्देश्यों के अलावा कुछ और नहीं है।84 वाशिंगटन भी इसे वर्गीकृत सूचना कह कर ऐसे लीपापोती करता रहा जैसे उसे कुछ भी मालूम नहीं है। रीगन और बुश प्रशासन दोनों जानते थे कि पाकिस्तान परमाणु क्षमता की डयोढ़ी पार कर रहा है तब भी उसे आवश्यक प्रमाण पत्र देते रहे जिससे पाकिस्तान को अमेरिकी मदद जारी रह सके क्योंकि उन्हें अफगानिस्तान सोवियत सेना को बाहर निकलवानें में पाकिस्तान के साथ मित्रता बनाये रखने की जरूरत थी।85 अमेरिका पाकिस्तान को पहले जैसी पूरी तरह दी जाने वाली मदद से अमेरिकी कानून के स्पष्ट तौर पर उल्लंघन के बावजूद हट गया था। सोवियत संघ की सेनाओं की अफगानिस्तान से वापसी तथा उसके बाद सोवियत साम्यवाद के धरासायी होने और उसी तरह पाकिस्तान की सीमावर्ती देश के रूप में स्थिति बदलने से अमेरिका की रणनीतिक स्थिति बदल गयी थी । बुश प्रशासन ने पाकिस्तान को अस्त्र सम्बन्धी क्षमता और कश्मीर की स्थिति में इसकी दखलन्दाजी की ओर अनदेखी न करने का फैसला किया। 29 जनवरी, 1991 में अमेरिकी गृह विभाग के प्रवक्ता मार्गटेर टुरबाइलर ने घोषणा की कि पाकिस्तान की अब कोई 83

टाइम्स ऑफ इण्डिया’, अप्रैल 4, 1994.84

हिन्दुस्तान टाइम्स, जनवरी 16, 1992.85

वी0पी0दत्त, ‘‘बदलती दुनिया में भारत की विदेश नीति’’, 2003, पृ0 23.


मदद नहीं दी जायेगी क्योंकि प्रेसलर संसोधन के अनुसार कुछ भी मदद पाने का तब तक हकदार नहीं है जब तक कि अमेरिकी राष्ट्रपति यह प्रमाण पत्र कांग्रेस को जारी न कर दे कि पाकिस्तान के पास परमाणु विस्फोट साधन नहीं है।86 बुश प्रशासन ने मान लिया कि यह अब इस स्थिति में नहीं है ऐसा प्रमाण पत्र जारी करे कि पाकिस्तान वास्तव में परमाणु क्षमता सम्पन्न पहले ही हो चुका था।

परमाणु अप्रसार सन्धि और अमेरिका[सम्पादन]

अणु प्रसार सन्धि या आणविक अप्रसार सन्धि (छण्च्ण्ज्ण्द्ध का मसौदा अमेरिका और रूस के सम्मिलित प्रयासों द्वारा तैयार किया गया था। जिस पर 1 जुलाई, 1968 को लन्दन, मास्कों तथा वाशिंगटन ने एक साथ हस्ताक्षर किये किन्तु इसका क्रियान्वयन मार्च 1970 में किया गया। कई परमाणु शस्त्र विहीन राष्ट्रों ने इस सन्धि में दी गयी प्रक्रिया के अनुसार हस्ताक्षर कर दिये किन्तु भारत ने इस संन्धि पर हस्ताक्षर नहीं किया है। भारत का तर्क यह रहा है कि चीन की बढ़ती परमाणु ताकत से भारत की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित हो सकती है।

संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए अमेरिका दबाव बना रहा था। भारत आण्विक शक्ति के शन्तिपूर्ण उपयोग के लिये कटिबद्ध है। भारत ने 1974 में पोखरण में पहला भूमिगत विस्फोट करके रचनात्मक कार्यो में इसके योगदान की आवश्यकता पर बल दिया है। अमेरिका ने इस विस्फोट की तीव्र प्रतिक्रिया की और भारत को एन0पी0टी0 पर हस्ताक्षर करवाने के उद्देश्य से तत्कालीन राष्ट्रपति कार्टर ने अपनी असमर्थता व्यक्त की क्योंकि भारत किसी देश से मित्रता अपना स्वाभिमान सुरक्षित रखकर करना चाहता है क्योंकि अमेरिका भारत से अप्रसन्न था। भारत ने अमेरिका से साफ-साफ बता दिया कि यदि अमेरिका सन्धि के वचनों की अवहेलना करके यूरेनियम देना बन्द कर दे तो भारत कोई वैकल्पिक व्यवस्था कर लेगा।

12 जनवरी, 1978 को प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने एक पत्रकार सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहा कि जब तक परमाणु शक्तिया परमाणु निषेध के परीक्षणों पर रोक नहीं लगाती। भारत कोई ऐसी भेदभाव पूर्ण नीति को मानने को तैयार 87 नहीं है जिससे हमारे शंतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए चलायी जा रही है परमाणु योजना के रास्ते में रोड़े खड़े करे।88 1991 के 86 87 दि आवजर्बर, जनवरी 30, 1991

हिन्दुस्तान टाइम्स, सितम्बर 23, 1992.88

इंण्डिया इन चैन्जिंग वर्ल्ड, एशियन रिकार्डर, जनवरी 1992, पृ0 220.


शरूवात में अमेरिका ने भारत और पाकिस्तान पर परमाणु अप्रसार सन्धि पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव डाला। जब दोनों देश इस पर राजी नहीं हुए तो यह प्रस्ताव रखा गया कि दिल्ली और इस्लामाबाद अपने को परमाणु मुक्त क्षेत्र घोषित करे।

अमेरिकी प्रशासन की निरन्तर चिन्ता दूसरे देशों के पमाणु कार्यक्रम एवं प्रक्षेपास्त्र कार्यक्रमों पर नजर रखने की रही। दक्षिण एशिया के खास पर परमाणु अस्त्र की क्षमता के विकास के बारे में चिन्ता तभी जगी जब पाकिस्तान ने वह क्षमता हासिल की इसके बाद में यह पीछे नहीं जा सकता। अमेरिका को यह निरन्तर पता था कि वहां क्या हो रहा है, परन्तु वह जानबूझकर आँखें बन्द रखनें का नाटक करता रहा। अब अमेरिका भारत और पाकिस्तान को एक साथ इकट्ठा करना चाहता था और उन्हें परमाणु प्रसार निषेध की दृष्टि से एक मानने लगा था। यह भारत पर दबाव बढ़ाने का तरीका था जिससे भारत या तो परमाणु अप्रसार सन्धि पर हस्ताक्षर करे या विकल्प के रूप में एक महाशक्ति (अमेरिका) द्वारा निर्धारित दक्षिण एशिया परमाणु प्रसार विशेष समझौते पर सहमत हो।89 अमेरिका के उकसाने पर पाकिस्तान ने दक्षिण एशिया में पमाणु अप्रसार के बारे में आश्वसत होने के लिए पांच शक्तियों (भारत, पाकिस्तान, अमेरिका, रूस और चीन) के सम्मेलन की सलाह दी। ये दोनों प्रस्ताव दो कारणों से भारत को स्वीकार नहीं थे। पहला इस योजना के तहत भारत और पाकिस्तान इस क्षेत्र में पूरी रणनीतिक स्थिति में अलग कर दिये थे दोनों को एक बराबर समझा गया था और भारत की सुरक्षा तथा सीमा सुरक्षा समस्याओं की चिन्ता की अनदेखी कर दी गयी थी। दूसरे इस प्रस्ताव में परमाणु अप्रसार प्रणाली की भेदभाव पूर्ण प्रकृति को एक अलग रूप से बनाया गया था। इसमें नैतिक बन्धन के सन्तुलन का अभाव था वह किसी भी तरह व्यापक परमाणु निःशस्त्रीकरण की प्रक्रिया का बढावा देने वाला नहीं था। अमेरिका भारत के अन्तरिक्ष कार्यक्रम की प्रगति से चिन्तित था और इस पर रोक लगाने पर तुला हुआ था। इसका स्पष्ट रूप से खुलासा तब हुआ जब उसने रूस को यह चेतावनी दी कि वह अमेरिका के स्वीकृति के बिना भारत को अपने निम्न तापी क्रायोजनिक इंजनों और उसकी प्रौघोगिक विधि न दे।90 89

वी0पी0दत्त, ‘‘बदलती दुनिया में भारत की विदेश नीति’’, 2003, पृ0 50.90

वही।


पोखरण-2 एवं संयुक्त राज्य अमेरिका[सम्पादन]

भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार ने अपनी परमाणु नीति में परिवर्तन करते हुए पुनः 11 मई 1998 को 3.45 बजे अपराहन भारत ने तीन भूमिगत पोखरण नाभकीय विस्फोट किये। इसके साथ भारत एक नाभकीय सम्पन्न देश बन गया।91 उसी दिन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने एक रैली को सम्बोधित करते हुए वादा किया कि नाभिकीय हथियारों का हम पहले इस्तेमाल किसी देश के खिलाफ नहीं करेगे। उन्होंने कहा कि भारत अपनी नाभिकीय क्षमता का उपयोग यदि बहुत ही अनिवार्य हुआ तो आत्म रक्षा के लिए करेगा। जैसा कि पहले से ही उम्मीद की जा रही थी कि अन्तर्राष्ट्रीय विरादरी, उसमें भी मुख्यतः विकसित देश विशेषकर अमेरिका ने इन परीक्षणों के विरोध में प ्रतिक्रिया व्यक्त की। अमेरिका ने प्रतिबन्ध लागू करने की घोषणा की और उसके पीछे चलकर जापान ने भारत को दी जाने वाली सहायता बन्द कर दी। अमेरिका जी-8 देशों के द्वारा 17 मई, 1998 को वर्मिघंम की बैठक में भारत के विरूद्ध सामूहिक कार्यवाही के लिए प्रस्ताव लाया। रूसियों ने यह साफ कर दिया कि प्रतिबन्ध निश्चित रूप से उत्पादन प्रतिरोधक है इसलिए उन्होंने इसे सिद्धान्त का मामला बताकर भारत के खिलाफ प्रतिबन्ध लगाने का विरोध किया। यूरोपीय आयोग के अध्यक्ष श्री जैक्स सेंटर ने रहस्य उदघाटित किया कि विभिन्न देशों ने विभिन्न प्रकार के मत व्यक्त किये हैं इसलिए यह हर देश की निजी स्तर पर प्रतिबन्धों के मामले में फैसला लेने के लिए सोचना चाहिए क्योंकि सभी देशों से भारत के साथ विभिन्न स्तरों पर अलग-अलग प्रकार के सम्बन्ध है।92 फिर भी भारत के पास आत्म सन्तुष्टि के लिए कोई वजह नहीं थी जैसा छिपा हुआ खतरा यूरोपीय संघ के द्वारा 25 मई को जारी कठोर बयान से जाहिर हो रहा था जो क वास्तव में भारत को सी0टी0वी0टी0 पर हस्ताक्षर करने तथा आगे नाभकीय हथियारों के उत्पादन की ओर न बढ़ने की अंतिम चेतावनी दे रहा था। जी-8 देशों के द्वारा 12 जून, 1998 के प्रस्ताव में साथ-साथ काम करने की सहमति से विश्व बैंक तथा अन्य अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से (मानवीयता के आधार को छोड़कर) सभी प्रकार की ऋण सहायता उन देशों के लिए स्थगित करने पर विचार किया गया था जो भारत-पाकिस्तान या अन्य देश नाभकीय 91

‘‘टाइम्स आफ इण्डिया, मई 18, 1998.92

‘‘टाइम्स आफ इण्डिया, मई 20, 1998


परीक्षण करेंगे। यह हमारे लिए चेतावनी का संकेत ही था।93 अमेरिका द्वारा प्रतिबन्धों की घोषणा और उसको लागू करने पर होने वाले असर के बारें में भारत में कुछ तबकों में बाद में जब चर्चा हुई तो इससे स्पष्ट था कि भारत अब भविष्य में लम्बी अवधि के लिए और कठिनाईयों का सामना करता रहेगा।

वांशिगटन ने पोखरण-2 में नाभिकीय परीक्षणों को पूरी हैरानगी से देखा। उनका दूर-दूर तक फैला हुआ खुफिया जाल जो गुप्तचरों और इलेक्ट्रानिक दोनों रूपों में अजेय एवं अभेद कहलाता था वह इसे सूघनें में असफल रहा। इससे अमेरिका के गुस्से और छटपटाहट में वृद्धि हुई। भारत बार-बार सी0टी0वी0टी0 पर हस्ताक्षर करने की बात नकार कर अमेरिका को पहले ही नाराज कर चुका था। लेकिन इस तरह से अमेरिका के नाभिकीय दर्शन के तत्व की अवहेलना तो उसे किसी भी प्रकार से स्वीकार नहीं थी। हर हाल में अमेरिकी कानून ऐसे बनाये गये थे कि पांच नाभिकीय शक्ति वाले देशों के एकाधिकार के तोड़ने वाले देश पर सभी प्रकार के प्रतिबन्ध स्वयं लागू हो जाते थे। 13 मई को राष्ट्रपति बिलक्लिंटन ने बर्लिन में घोषणा की कि उन्होंने भारत के खिलाफ प्रतिबन्धों को लागू करने का आदेश दे दिया है।

पाकिस्तान का परमाणु विस्फोट और अमेरिका[सम्पादन]

28 मई, 1998 को (भारत के द्वितीय पोखरण परीक्षण-11 व 13 मई के बाद) पाकिस्तान ने बलूचिस्तान की चिंगाई पहाड़ियों में लगभग पांच परमाणु परीक्षण किये। इस प्रकार पाकिस्तान दक्षिण एशिया में दूसरा एवं विश्व में सातवां परमाणु शक्ति सम्पन्न देश बन गया। वैसे ही पाकिस्तान बहुत पहले से ही परमाणु परीक्षणों की तैयारी कर चुका था और उचित अवसर की तलाश में था। उसे यह अवसर भारत द्वारा किये गये परमाणु परीक्षणों के बाद मिला तथा उसने यह कहते हुए परमाणु परीक्षण किये कि भारत द्वारा बनाये गये बमों से उसे खतरा है। इस कार्य में उसे चीन एवं अन्य देशों से सहयोग प्राप्त होता रहा है अमेरिका पहले से ही पाकिस्तान को परमाणु परीक्षण न करने का दबाव बना रहा था। उसके बदले वे सैन्य तथा आर्थिक मदद एक मुश्त देने को तैयार थे जिसमें एफ-16 भी शमिल था जिसे प्रेशलर संशोधन के जरिये रोक दिया गया था। 13 मई को अमेरिकी उपमंत्री स्ट्रोब रूजबे ल्ट के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमण्डल पाकिस्तान सरकार को नाभिकीय परीक्षण करने से रोकने के लिए 93

इंटरनेशनल हेराल्ड ट्रिव्यूम, जून 13, 1998.


जोर डालने के वास्ते इस्लामाबाद भेजा गया था। लेकिन वह नवाज शरीफ से कोई भी स्पष्ट आश्वासन पाने में असफल रहा।

इसके बारे में अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय खासकर पश्चिम में काफी चिन्ता व्यक्त की जा रही थी क्या पाकिस्तानी बम इस्लामी बम के रूप में उभरेगा। आर्थिक संकट की स्थिति में फसने पर पाकिस्तान इससे कुछ नकदी हासिल करने के लिए ऐसे बम की जानकारी अन्य मुस्लिम देशों को बेच सकता है। नवाज शरीफ ने सऊदी अरब की यात्रा के दौरान इस बात से दृढ़तापूर्वक इन्कार किया कि पाकिस्तान की नाभिकीय अस्त्र क्षमता एक इस्लामिक बम निर्माण की है। फिर भी ईरान के विदेश मंत्री कमाल खर्रानी ने दावा किया कि पाकिस्तान की नाभिकीय क्षमता इजराइल के सम्भावित परमाणु हथियार भंडारों का प्रतिरोध करेगी और मुसलमानों में आत्म विश्वास जगाएगी।94

भारत और पाकिस्तान पर प्रतिबन्ध[सम्पादन]

वाशिंगटन द्वारा अनेक अधिकारिक बयान आक्रामक और विरोधी तेवर से जारी हुए। अनेक महीनों तक तरह-तरह के प्रतिबन्धों का स्वरूप और दायरा शयद स्पष्ट न हो पाया। सीधे सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता जो बहुत थोड़ी थी, लेकिन ये प्रतिबन्ध अन्य विभिन्न अमेरिकी वित्तीय संस्थाओं से भारत और पाकिस्तान को मिलने वाले साख और ऋण को प्रभावित करते थे। इस तरह अमेरिका भारत को 21 अरब डालर का दण्ड देने के रूप में इसे पेश कर रहे थे।95 अमेरिकी साख के रूप में बेचे जाने वाली वस्तुओं की खेप को भारत तथा पाकिस्तान के लिए रोक दिया। भारत ऐसी मदद लगभग 30 अरब डालर की पा रहा था। अमेरिकी बैंको को भारत तथा पाकिस्तान की सरकारो को ऋण देने से रोक दिया गया। लेकिन भारत और पाकिस्तान में अमेरिकी बैंकों के निजी प्रतिष्ठानों के कारोबार को बन्द नहीं किया। अमेरिका ने ज्यादा कठोर प्रतिबन्ध इसलिए लागू नहीं किया क्योंकि पाकिस्तान की हालत खस्ता होने लगती। अमेरिका शरू से ही पाकिस्तान का शभ चिन्तक रहा है। वर्ल्ड ट्रेड सेंन्टर पर हुए हमले के बाद अफगानिस्तान में तालिबान शसन के अन्त में सहयोग के बदले बुश प्रशासन ने भारत और पाकिस्तान पर लगे सारे प्रतिबन्ध को समाप्त कर दिया किन्तु परमाणु प्रसार के मुद्दें पर अब भी अमेरिका राग अलाप रहा है।94 95

‘‘एशियन एज’’ जून 17, 1998.

‘‘इकोनामिक्स टाइम्स’’ मई 17, 1998.


21वीं सदी में भारत-पाकिस्तान और अमेरिका का प्रभाव[सम्पादन]

दक्षिण एशियाई क्षेत्र में लम्बे समय से अमेरिका पाकिस्तान के एक प्रति सन्तुलनकारी शक्ति के रूप में सहायता देता रहा, लेकिन विगत कुछ समय से परमाणु प्रसार, उग्रवाद तथा आतंकवाद के बढते हुए खतरों तथा व्यापक बाजार की सम्भावना के कारण अमेरिका के नीति निर्माताओं की दृष्टि में भारत का महत्व बढ़ा है। 11 सितम्बर, 2001 को अमेरिका पर हुए आतंकवादी हमले के बाद से ही अमेरिकी विदेश नीति में दक्षिण एशिया को लेकर व्यापक परिवर्तन हुआ। राष्ट्रपति जार्ज बुश द्वारा छे ड़े गये आतंकवाद के विरूद्ध संघर्ष में पाकिस्तान को एक मजबूत साझेदार की भूमिका के रूप में लेना अमेरिकी आवश्यकता बनी क्योंकि अफगानिस्तान में तालिबान एवं अलकायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन को सबक सिखाने हेतु रणनीतिक एवं सामरिक दृष्टिकोण से पाकिस्तान के साथ यह गठजोड स्वाभाविक था। फलतः तत्कालीन अमेरिकी प्रशासन ने पुनः पाकिस्तान को प्रमुखता देते हुए अफगानिरूतान युद्ध में सहयोगी बनाया।96 इतना ही नहीं 23 सितम्बर, 2001 को अमेरिकी राष्ट्रपति बुश द्वारा भारत-पाकिस्तान पर लगाये गये प्रतिबन्धों की समाप्ति की घोषणा की गई। यह घोषणा करते हुए उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि प्रतिबन्धों को बनाये रखना अमेरिका के अधिकांश प्रतिबन्धों को क्लिंटन प्रशासन द्वारा पहले ही हटा लिया गया था। भारत पर अब केवल वही प्रतिबन्ध शेष थे जिनका सम्बन्ध प्रौद्योगिकी के दोहरे इस्तेमाल से था। इस दृष्टिकोण से प्रतिबन्धों को हटाने की इस घोषणा से मुख्यतः पाकिस्तान को ही लाभ प्राप्त हुआ।

राष्ट्रपति बुश के दूसरे कार्यकाल में अमेरिकी दिलचस्पी दक्षिण एशिया के विशेषकर भारत को लेकर काफी बढ़ी इस बढ़ती दिलचस्पी के कई कारण रहे जैसे - उभरता हुआ विशाल बाजार, उपभोक्ता बाजार, परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग के संकेत, साफ्टवेयर उद्योग का वैश्विक प्रभाव, अर्थव्यवस्था की लगातार मजबूती आदि। इसका स्पष्ट संकेत अमेरिका यात्रा पर गये भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एवं अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश के बीच 18 जुलाई, 2005 को हुई सहमति में दिखाई दी। इस सहमति के माध्यम से दोनों शसनध्यक्षों ने समय की मांग को वास्तविकता के धरातल पर उतारने की भरपूर कोशिश की और वैश्विक स्तर पर आने 96

डा0 आर0 पी0 जोशी एवं अमिता अग्रवाल, ‘‘अन्तर्राष्ट्रीय संबंध‘‘ 2003-04, पृ0 188.


वाली बाधाओं को दूर कर विश्वास का नया माहौल तैयार करना चाहा। इस दौरान हुए असैन्य परमाणु समझौते का दूरगामी प्रभाव दिखा। जिसकी पाकिस्तान द्वारा विपरीत प्रतिक्रिया हुई।

भारत-अमेरिका नाभिकीय समझौता और पाकिस्तान[सम्पादन]

18 जुलाई 2005 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एवं राष्ट्रपति जार्ज बुश के बीच असैन्य परमाणु समझौते पर सहमत हुये। जिनके अन्तर्गत यह तय हुआ कि भारत अपने परमाणु रिक्टरों को सैन्य एवं असैन्य क्षेत्रों में बाटतें हुए असैन्य परमाणु रिएक्टरों को अन्तर्राष्ट्रीय निगरानी हेतु खोलेगा तथा अमेरिका नाभिकीय ऊर्जा से सम्बन्धित तकनीकी एवं ईधन भारत को मुहैया करायेगा। इसी क्रम में 1 मार्च से 3 मार्च, 2006 तक अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश भारत की यात्रा पर आये और 2 मार्च 2006 को राष्ट्रपति बुश एवं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ‘‘भारत-अमेरिका परमाणु सन्धि’’ को मूर्त रूप दिया। जहां एक तरफ भारतीय प्रधानमंत्री ने अपने नाभिकीय संयत्रों को सैन्य एवं असैन्य उपयोग वाले संयंत्रों को अलग-अलग श्रेणियों में रखकर अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु एजेंसी (आई0ए0ए0) के निगरानी के अधीन चलाने को सहमति व्यक्त की, वही अमेरिका राष्ट्रपति जार्ज बुश ने भारत को असैन्य उपयोग वाले नाभिकीय सयंत्रों हेतु ईधन उपलब्ध कराने तथा समझौते को अमेरिकी कांग्रेस में अनुमोदन प्राप्त कराने एवं नाभिकीय आपूर्ति कर्ता समूह (एन0एस0जी0) हेतु प्रयास की दृढ़ बद्धता जताई । 13 मार्च को राष्ट्रपति बुश हैदराबाद के एक कार्यक्रम में सम्मिलित हुए। इस प्रकार अपनी तीन द्विवसीय भारत यात्रा को समाप्त करते हुए 3 मार्च, 2006 की शम पाकिस्तान के लिए रवाना हो गये। 4 मार्च, 2006 को राष्ट्रपति जार्ज बुश एवं पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज मुर्शरफ ने संयुक्त संवाददाता सम्मेलन को सम्बोधित किया। इस अवसर पर पाकिस्तानी राष्ट्रपति मुर्शरफ ने भारत के साथ सम्पन्न नाभिकीय समझौते की तर्ज पर इसी प्रकार का समझौता पाकिस्तान के साथ किये जान की मांग की जिस पर टिप्पणी करते हुए राष्ट्रपति बुश ने कहा, मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूॅ कि भारत एवं पाकिस्तान अलग-अलग आवश्यकताओं तथा अलग-अलग इतिहास वाले दो अलग-अलग देश है। इसलिए जब हम आगे बढ़ते है, तो हमारी रणनीति इन विभिन्ताओं से प्रभावित एवं संचालित होती है।’’ राष्ट्रपति बुश ने पाकिस्तानी राष्ट्रपति को दो टूक शब्दों में स्पष्ट कर दिया कि सवर्द्धित यूरेनियम सेन्ट्रीफ्यूजेन तथा चीनी नाभिकीय हथियार अविकल्पों को लीबिया, उत्तरी कोरिया और ईरान को आपूर्ति करने वाले देश पाकिस्तान एवं नाभिकीय अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर न करने के बावजूद नाभिकीय


प्रौद्योगिकी तथा हथियार आदि से सम्बन्धित जानकारी विश्व के किसी भी देश को हस्तान्तरित करने से परहेज रखने वाले देश भारत को एक ही पलड़े में नहीं रखा जा सकता। अमेरिका पाकिस्तान के विपरीत भारत को एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति मानता है, जबकि पाकिस्तान का रिकार्ड इस मामले में अच्छा नहीं है।97 पाकिस्तान, भारत और अमेरिका के बीच हुए करार से खुश नहीं था इसके कारण स्पष्ट थे पाकिस्तानी मीडिया में आशंका जताई गई कि भारत-अमेरिका के बीच इस परमाणु समझौते का प्रभाव ईरान-पाकिस्तान-भारत (आई0पी0आई0) गैस पाइप लाइन के भविष्य पर पड़ सकता है। पाकिस्तान के प्रमुख अखबारों में अमेरिका द्वारा भारत की तरह पाकिस्तान से भी ऐसी ही सहमति से रूचि न दिखाने का अफसोस जाहिर किया। द डान ने आशंका जताई कि इस समझौते के बाद भारत इस क्षेत्र के दूसरे देशों पर प्रभुत्व जमाने की कोशिश कर सकता है। डेली टाइम्स ने अमेरिका और पाकिस्तान के बीच ऐसी ही व्यवस्था न हो पाने के कारण बताए है। पहला कारण यह है कि जिन कारणो पर भारत-अमेरिका सम्बन्ध फल-फूल रहे है ं वह पाकिस्तान-अमेरिका के मध्य नदारद है। दूसरा पाकिस्तान खुद जो दुनिया के सम्मुख परमाणु प्रसार की चिंता करने वाले देश के रूप में नहीं पेश कर पाया। एम0 क्यू खान ने टवर्क और असुरक्षित परमाणु तकनीकी ने इसकी समय-समय पर पुष्टि की है।

भारत-अमेरिका परमाणु करार को लेकर इस्लामाबाद की शिकायतों को नकारते हुए अमेरिका ने कहा कि बातचीत की प्रगति से हर बार पाकिस्तान को पूरी तरह से अवगत कराया गया और इस समझौते से दक्षिण एशिया में हथियारों की होड शरू नहीं होगी। भारत के साथ हुए परमाणु समझौते को अमेरिका के राष्ट्रीय हित में अनुकूल बताया। अमेरिका के तत्कालीन उप विदेशमंत्री निकोलस बर्न्स ने कहा कि भारत के साथ असैन्य परमाणु समझौता के बारे में हुई बाचचीत और उसकी प्रगति की हमने पाकिस्तान सरकार को जानकारी दी थी। बर्न्स ने कहा कि पाकिस्तान सरकार को राष्ट्रपति जार्ज बुश को दक्षिण एशियाई यात्रा और परमाणु समझौते के बारे में बताया गया था। उसने दलील दी थी कि वाशिंगटन को दक्षिण एशिया में स्थिरता सुनिश्चित करने के एक पैकेज समझौता तैयार करना चाहिए। दूसरी ओर बर्न्स ने कहा कि अमेरिका ने पाकिस्तानी अधिकारियों के साथ विस्तृत विचार विमर्श किया था।98 97

हिन्दुस्तान टाइम्स, मार्च 06, 2006.98

अजय उपाध्याय, ‘‘नाभिकीय भारत (भारत करार का यर्थाथ), 2009, पृ0 99-100.


इस प्रकार अमेरिका ने पाकिस्तान को स्पष्ट रूप से बता दिया कि उसके साथ कुछ ऐसा कोई परमाणु करार नहीं किया जा सकता, जैसा भारत के साथ किया गया है। और न ही उसे कोई परमाणु संयंत्र दिया जायेगा। अमेरिकी प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि पाकिस्तान की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए अमेरिका उसके साथ मिलकर काम कर रहा है। परमाणु करार हमारे बीच अभी बातचीत का हिस्सा नहीं है क् योंकि परमाणु प्रसार और प्रौद्योगिकी के रिकार्डो को देखते हुए प्रमुख अमेरिकी संसद और अमेरिका सरकार में शमिल लोगों को पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की सुरक्षा के बारे में गंभीर चिंता है। अतः इन परिस्थतियों में पाकिस्तान के लिए परमाणु ऊर्जा के विकल्प पर विचार करना काफी कठिन है।99 अतः भारत-अमेरिका के बीच हुए परमाणु करार की बराबरी करने के लिए पाकिस्तान ने चीन के साथ ऐसा समझौता किया है तथा चीन की मदद से एक यूरेनियम संवर्धन प्लांट लगा रहा है।

इस प्रकार अमेरिकी प्रशासन ने पुरानी ‘समान दूरी बनाये रखने की नीति’ को छोड़ने का संकेत देते हुए ‘प्राथमिकता एवं अनिवार्यता’ के आधार पर दोनों देशों को मित्र का दर्जा प्रदान करने की कोशिश की। इसकी प्रामाणिकता अमेरिकी राष्ट्रपति की मार्च 2006 में दक्षिण एशिया की यात्रा सिद्ध हुई। इस दौरान कई रणनीतिक, सुरक्षात्मक, राजनीतिक एवं व्यापारिक समझौते किये गये। जबकि पाकिस्तान में अल्पकालिक प्रयास के दौरान आतंकवाद और प्रजातंत्र को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति ने उसे नसीहत दी। इतना ही नहीं ओबामा प्रशासन की विदेश नीति के केन्द्र में भी दक्षिण एशिया है। चीन इस क्षेत्र में एक ऐसी उभरती हुई शक्ति है, जो अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में अमेरिका की प्रधानता को चुनौती देने की ताकत रखता है। दूसरी तरफ अमेरिका-अफगानिस्तान में लड़ाई हारने के कगार में पहुंच गया है। इसी के तहत विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने अपने पहले दौरे के लिए दक्षिण एशिया को चुना ताकि पुराने मित्रों को आश्वस्त किया जा सके और नये मित्रों से कंधा मिलाया जा सके।100 अमेरिका ने अफगान समस्या को ध्यान में रखकर इस समस्या से निपटने के लिए 2009 में नयी अफगान-पाक नीति की घोषणा की। अमेरिका अफगानिस्तान समस्या के समाधान के लिए जहां सैनिकों की संख्या में बढ़ोत्तरी कर रहा है। वही इस नीति के तहत अन्य देशों तथा 99

अमर उजाला, 28 फरवरी, 2010.100

हिन्दुस्तान, 2 मार्च, 2009.


रूस, चीन आदि की भूमिका को बढ़ाना चाहता है। लेकिन पाकिस्तानी दबाव के चलते अमेरिका भारत को अफगानिस्तान में कोई व्यापक भूमिका प्रदान करने का पक्षधर नहीं है।

अफगानिस्तान-पाकिस्तान नीति का एक पहलू यह भी है कि इसमें सैनिक तत्वों के साथ-साथ राजनीतिक तत्वों का भी समावेश किया गया है। राजनीतिक दृष्टि से अमेरिका तालिबान के अच्छे व उदारवादी तत्वों के साथ समस्या के समाधान हेतु बातचीत व समझौते का पक्षधर है वही कट्टरवादी तत्वों के साथ सैनिक कार्यवाही का समर्थन किया जा रहा है।

अफगानिस्तान-पाकिस्तान नीति का मूल उद्देश्य अफगानिस्तान की प्रशासनिक व सैनिक क्षमता का इतना विस्तार करना है कि अमेरिकी सेनाओं के वापसी के बाद यह सुनिश्चित हो सके कि अफगानिस्तान पुनः आतंकवाद का गढ़ न बन सके। साथ ही अमेरिका को चाहिए कि वह पाकिस्तान की सरकार व सेना पर इस बात के लिए पर्याप्त दबाव बनाये कि वह तालिबान की मदद बन्द करे। अमेरिका व नाटो की सेना को अपनी कार्यशैली इस तरह बदलनी होगी जिससे अफगानिस्तान में निर्दोष लोग न मारे जाए। अफगानिस्तान के लिए आर्थिक सहायता को कई गुना बढ़ाना पडे़गा जिससे सरकार जरूरी विकास कार्यो को तेज कर सके आम लोगों को रोजी रोटी सुनिश्चित हो और उन्हें लड़ाकू कट्टरवादियों या अफीम की खेती पर निर्भर न होना पड़े।101

भारत, अमेरिका और पाकिस्तान-डि-हायफनेशन की रणनीति[सम्पादन]

दक्षिण एशिया में आतंकवाद, सीमा विवाद, आंतरिक संघर्ष और विद्रोह, परमाणु हथियारों की दौड़ जैसे कई मुद्दे अमेरिकी हितों के लिए खतरा है। भारत और पाकिस्तान से अमेरिका के सुरक्षा संबंधी आर्थिक और मानवीय हित जुड़े हुए है। अमेरिका दोनों देशों से समान स्तर पर संबंध बनाए रखने की कठिन कोशिश कर रहा है। कश्मीर को लेकर दोनों देशों का झगड़ा इस क्षेत्र की सुरक्षा और स्थायित्व के लिए खतरा है। यह तो पूरे इलाके को बड़े युद्ध में झोक सकता है। चीन की खामोशी से इस मामले में शमिल होना बड़ा राजनीतिक-आर्थिक और सुरक्षा संकट पैदा करेगा और आशंकित परमाणु संघर्ष भी देखने को मिल सकता है।

भारत और पाकिस्तान दोनो आंतंरिक सुरक्षा से भी जूझ रहे है। भारत में आतंकवादी गतिविधिया जारी है तो पश्चिमी पाकिस्तान के सिंध और पख्तून में अलगाववादी आंदोलन चल 101

राष्ट्रीय सहारा, 2 मार्च, 2009.


रहा है। इन अांतरिक संघर्षो का क्षेत्र के दूसरे देशों में भी फैलने का खतरा है। इस तरह से यहां जारी आंतरिक संघर्ष केवल संबंधित देश की सुरक्षा और स्थायित्व को ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया को भी प्रभावित कर सकते है।

पाकिस्तान आतंकवाद से लड़ाई के नाम पर अमेरिका से भी सहायता लेता रहा है। जिसके कुछ हिस्से का कश्मीर में जारी कथित आजादी की लड़ाई के लिए भी इस्तेमाल करने की आशंका है। इसके बाद इस मामले में होने वाले अन्तर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप का पाकिस्तान हमेशा से स्वागत करता आया है जिससे वह भारत पर दबाव बना सके। भारत उम्मीद जताता आया है कि अमेरिका और पाकिस्तान के सम्बन्ध उसकी सुरक्षा को खतरे में नहीं डालेगें। अमेरिका भी पाकिस्तान में अलकायदा की मौजूदगी के बड़े खतरे से जूझ रहा है जो दुनिया के सभी देशों की सुरक्षा और स्थायित्व के लिए खतरा बनकर उभरा है। भारत के मुबंई शहर पर हुए 26/11 हमले में पाकिस्तान के आतंकवादियों से मिलीभगत का सबसे क्रूर और घिनौना चेहरा सामने आया है। इस पर अमेरिकी प्रशासन ने भी बड़ी प्रतिक्रिया दी जब अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडोलिजा राइस ने पाकिस्तान को चेतावनी दी कि इस हमले में पाकिस्तानी तत्वों के शमिल होने के अकाट्य सबूत मौजूद है। पाकिस्तान के पास आंतकी हमले के षडयंत्रकारियों के खिलाफ तुरन्त और प्रभावी तौर पर कार्यवाही करने के अलावा कोई चारा नहीं है। अगर वह ऐसा नहीं करता है तो अमेरिका करेगा।102 अंततः 2 मई, 2011 को अमेरिकी सेना और सी0 आई0 ए0 ने पाकिस्तान के एबटाबाद में घुसकर एक ऑपरेशन में आतंकी ओसामा बिन लादेन को मार डाला। इस घटना ने ओसामा को शरण देने में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिये।103 भारत और पाकिस्तान के बारे में कोई रणनीति बनाने या नीति निर्धारित कर ने से पहले अमेरिका को इस क्षेत्र में मौजूद संभावित खतरों और मौको का अध्ययन करना होगा। भारत और पाकिस्तान दोनों अमेरिका की सुरक्षा और आर्थिक हितों को बेमिसाल मौके मुहैया कराते है। सुरक्षा के मामले में स्थाई और दोस्ताना भारत-पाकिस्तान इस क्षेत्र में चीन, रूस और ईरान की ताकत को संतुलित करेंगे। दक्षिण एशिया के इन दोनों देशों में स्थायित्व और शंति 102 103

फेइंस्टीन लाँ, ‘‘ए न्यू इक्वेशन : यू0एस0 पालिसी टूर्वड इंण्डिया एण्ड पाकिस्तान अफगान, सितम्बर, 11 कार्नेकीए इन्डोमेंन्ट फार इन्टरनेशनल पाल, वांश्ांगटन डी0सी0, मई, 2003.

सुमित गांगुली, ‘‘द स्टार्ट ऑफ ब्यूटीफुल फ्रेन्डशिप? द यूनाईटेड स्टेट एण्ड इंण्डिया वर्ल्ड पाँलिसी, वाल्यूम. ग्ग्ए नं0 1, स्प्रिंग 2003, न्यूयार्क, 2003.


की स्थापना से आने वाले समय में इनके पड़ोसी देशों, अफगानिस्तान, बंग्लादेश ,भूटान, नेपाल और श्रीलंका में भी शंति और स्थायित्व की नीवं पडे़गी।

आर्थिक क्षेत्र में भारत इस समय लगभग 8 फीसदी विकास दर के साथ दुनिया की 12वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इसके मुकाबले 2003 में अमेरिका में विकास दर 3 .6 फीसदी थी। एक बढ़ती आर्थिक ताकत के तौर पर भारत इस क्षेत्र में अमेरिका को निवेश और बाजार की संभावनाएं मुहैया कराता है। इस तरह से दक्षिण एशिया में दोनों देशों से संभावित खतरों और मौको को देखते हुए ही दोनों देशों के प्रति अमेरिकी नीति निर्धारित होती है। दक्षिण एशिया में कदम रखने के साथ ही अमेरिका के सामने इन सबसे ज्यादा संवेदनशील और रणनीतिक तौर पर अहम दोनों देशों के प्रति संतुलित रवैया अपनाते हुए अपने हितों को प्राथमिकता देने की चुनौती है। समान लोकतांत्रिक मूल्य होते हुए भी अमेरिका ने पिछली आधी सदी से भारत को ठुकराया हुआ या और पाकिस्तान के साथ करीबी गाठी हुई थी। 18 जुलाई को अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के संयुक्त बयान में अमेरिका के भारत और पाकिस्तान के साथ डि-हायफनेशन की रणनीति अपनाने को हाईलाइट किया गया था और भारत को आधुनिक परमाणु तकनीक वाला जिम्मेदार देश बताया था।104

आतंकवाद एवं अमेरिका[सम्पादन]

भारतीय संस्कृति का तकाजा तो शलीनता और वसुधैव कुटुम्बकम् ही रहा है। भारत ने पड़ोसियों के साथ शिष्टता व सद्भावना पूर्ण व्यवहार को ही पिछले 68 वर्षो में प्रदर्शित किया है व कर रहा है।105 लेकिन पड़ोसी देश जन्म से आतंकवादी विचारधारा को भारत के खिलाफ पनाह देता रहा है। भारत ने सदैव पाकिस्तान के साथ सद्भावना बढ़ाने का प्रयास किया लेकिन उसने सदैव भारत के प्रति दोस्ती व सद्भावना का हाथ नहीं बढ़ाया। उसने अपनी आतंकवादी गतिविधियों से हमेशा भारत को नुकसान पहुचाया है।

21वीं शताब्दी में पूरे विश्व के साथ-साथ अमेरिका के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। भारत तो अपने स्वतन्त्रता के बाद से ही आतंकवाद से ग्रसित हो गया था। भारत के आतंकवाद 104

ग्लार्डो थामस, ब्लूनेसिंग यू0एस0 इन्ट्रेस्ट एमिडिस्ट द इंण्डिया एण्ड पाकिस्तान कानफ्लिक्ट स्ट्रेटजिक स्टडीज इन्स्टीट्यूट वार, यू0 एस0 आर्मी वार कालेज, मार्च 18, 2005.105

शल के0 आशिया, ‘‘पाकिस्तानी आतंकवाद‘‘, राजस्थान पत्रिक, 8 जुलाई, 1999.


में पड़ोसी देशों की भागेदारी व इसको रोकने में अपेक्षित अमेरिकी सहयोग न मिलना भारत-अमेरिका के बीच मतभेद भी उभरता रहा।

9/11 के बाद अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में नाटकीय बदलाव देखने को मिला। क्योंकि अमेरिका के पर्लहार्वर के आक्रमण के बाद, पहली बार अमेरिकी भूमि पर हमला था। जिसमें अमेरिका जैसे महाशक्ति को झकझोर कर रख दिया। इसके बाद अमेरिका ने अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए विश्वव्यापी अभियान छेड़ दिया। इससे अमेरिका ने ‘अलकायदा’ प्रमुख ओसामा बिन लादेन को जिम्मेदार ठहराया और उसे अमेरिका को सौपने के लिए तालिबान पर दबाव डाला।106 जब तालिबान ओसामा बिन लादेन को नहीं सौपा तो सितम्बर 2002 को अफगानिस्तान पर आक्रमण कर दिया। तालिबान इस लड़ाई में पराजित हुआ। और लादेन 10 वर्ष बाद पाकिस्तान में मारा गया।

पाकिस्तान ने भारत के साथ अपने परोक्ष युद्ध को जारी रखते हुए 1989 में कश्मीर में आतंकवाद की शरूआत कर दी। कश्मीर के आम लोगों का नरसंहार, मुम्बई बम कांड, कांधार विमान अपहरण, विभिन्न मंदिरों पर हुए हमले, ससंद पर हमला एवं 26/11 की घट ना आदि भारत में बढ़ रहे आतंकवाद के कुछ उदाहरण है।

शरू में अमेरिका ने कश्मीर की घटनाओं को आतंकवाद की श्रेणी में नहीं रखा तथा इस घरेलू व आंतरिक समस्या कहा। इस सोच के पीछे अमेरिका के पूर्व के कश्मीर नीति एवं आतंकवाद के सन्दर्भ में उसकी नीति रही। अपनी आतंकवाद विरोधी नीति के अन्तर्गत अमेरिका ने अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद व घरेलू आतंकवाद नामक विभाजन कर रखा था और उसने कश्मीर को दूसरी श्रेणी में रखा था तथा अपने हितों पर चोट पहुॅचाने वाली घटनाओं को अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद की श्रेणी में रखा। अमेरिका ने इस आतंकवाद की समाप्ति के लिए सभी प्रकार के हथियारों, जिसमें उसमें पोषक राज्य पर आक्रमण भी शमिल था तो अपने पास सुरक्षित रखा। 1970 के दशक के अंत से 1990 के दशक के मध्य तक अमेरिका की आतंकवाद विरोधी प्राथमिक नीति या थी कि उस शसन को लक्ष्य बनाया जाय जो आतंकवाद को प्रोत्साहन देते है। इसके लिए अमेरिका ने आर्थिक प्रतिबन्ध, सैन्यबल के प्रयोग को 1996 के मध्य में अमेरिका ने और उसने किसी शसन को लक्ष्य करने के बजाए आतंकवादी संगठन और 106

एशियन डिफेन्स जनरल, अप्रैल 2002, पृ0 73.


व्यक्तिगत आतंकवादियों को लक्ष्य बनाया तथा विदेशी आतंकवादी समूह के पहचान की शरूआत की यह नीति ‘अलकायदा’ नामक आतंकवादी संगठन के विरूद्ध उसकी कार्यवाही में देखी जा सकती है।107 अमेरिकी प्रशासन ने अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद के विरूद्ध कांग्रेस द्वारा 22 सितम्बर 1983 के विदेशी संबंध से संबद्ध अमेरिकी कोड के टाइटिल 22 के सेक्शन 2656 एफ तथा 1979 के एक्सपर्ट एडमिनिस्ट्रिशन एक्ट के सेक्शन 6 और टाइटिल 50 के अपेंडिक्स के सेक्शन 2405 व जो अमेरिकी कोड के युद्ध व राष्ट्रीय सुरक्षा से संबद्ध है के अंतर्गत कार्यवाही करता है।108 इस प्रकार अमेरिकी कानूनों का उद्देश्य अमेरिकी नागरिकों व हितों की सुरक्षा करना है। 1979 व 1987 के कानून, राज्यों के विरूद्ध व 1996 का कानून आतंकवादी संगठनों के विरूद्ध कार्यवाही करते है। भारत ने अपने यहां आतंकवाद में पाकिस्तानी भागीदारी के सबूत दिये और उसे आतंकवादी राष्ट्र घोषित करने की मांग की, परन्तु अमेरिका ने ऐसा नहीं किया। 1990 के प्रेसलर संशोधन व 1998 के ग्लेन संशोधन द्वारा पाकिस्तान पर अनेक प्रतिबंध लगाये थे। इनका असर केवल द्वितीय आर्थिक व्यापारिक सहायता पर पड़ा, सामान्य व्यापारिक संबंध अमेरिका पाकिस्तान के बीच बने रहे। यदि पाकिस्तान को आतंकवादी राष्ट्र घोषित कर दिया जाता तो पाकिस्तान पर और दबाव पड़ता जो भारत के हित में होता परन्तु ऐसा नहीं हुआ। भारत में जम्मू कश्मीर विधान सभा व भारतीय संसद पर हमले के बाद भारत पुनः दबाव बनाया परन्तु अमेरिका पर 11 सितम्बर 2001 को हुए हमले व उसके उपरांत अफगानिस्तान में अमेरिकी प्रत्युत्तर के लिए पाकिस्तानी सहयोग के कारण अमेरिका उस पर से सारे प्रतिबन्ध हटा लिया तथा कहा कि पाकिस्तान को आतंकवादी सूची में नहीं रखा जायेगा। क्योंकि वह आतंकवाद विरोधी मुहिम में उसका सहायोगी है। इस नीति को भारत ने आतंकवाद के विरूद्ध दोमुखी नीति मानता है।109 पहली बार 1999 में अमेरिका ने कश्मीरी संगठनों द्वारा आम लोगों की हत्या को आतंकवादी घटना माना। वही 2001 में भारत में सीमा पार आतंकवाद स्वीकार करते हुए पाकिस्तान पर दबाव डाला। जैश-ए-मोहम्मद व लश्कर-ए-तेय्यबा को पहली बार काली सूची 107

साउथ एशिया ओवरवियु दि वांशिगटन फाइल, 22 मई, 2002.108

साउथ एशिया एनालसिस ग्रुप.109

दि टाइम्स ऑफ इण्डिया, 14 जुलाई, 2002


में डाला गया अर्थात उन्हें विदेशी आतंकवादी संगठन के रूप में प्रतिबंधित किया गया।110 इस प्रकार पाकिस्तान और भारत में सक्रिय आतंकवादी संगठन अमेरिकी कानून व नीतियों की कमियों का पूर्ण लाभ उठाते हुए भारत में सक्रिय है और अमेरिका उन पर कड़ी कार्यवाही नहीं कर रहा है वह भारत में अमेरिकी नागरिकों व हितों पर हमला करने से बचकर अमेरिकी प्रकोप से बच रहे है। यद्यपि 2000 की रिपोर्ट में पाकिस्तान का तालिबान से गठजोड़ प्रकाश में आया है और अमेरिका पर हमले में शमिल अलकायदा के पाकिस्तान में क्रियाशील होने के सबूत है। वर्तमान समय में आतंकवाद का केन्द्र मध्य एशिया से स्थानान्तरित होकर दक्षिण एशिया हो गया है। पाकिस्तान की राजनीति व आर्थिक स्थिति कट्टरवाद के उभार व भारत के विरूद्ध उसके शत्रुभाव ने उसे आतंकवाद की उर्वरा भूमि बना दिया है। इस समय आतंकवादियों द्वारा सामूहिक नरसंहार के साधनों जैसा-रासायनिक, जैविक रेड़ियों लाजिकल व नाभिकीय अस्त्रों की प्राप्ति का प्रयास चिन्ता का कारण है। यह संगठन अब राज्यों द्वारा सहायता पर बहुत निर्भर नहीं रह गये हैं। उन्होंने अपने अन्तर्राष्ट्रीय नेटवर्क व वित्तीय स्रोत विकसित कर लिए है। यह वित्तीय स्रोत अवैध व्यापार, नशीले पदार्थ की तस्करी, निजी सहायता आदि है। अब आतंकवाद का चेहरा और भयावह होता जा रहा है। अब आतंकवाद को घरेलू आतंकवाद और अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद में परिभाषित नहीं किया जा सकता है। इसके लिए एक समान नीति की आवश्यकता है।111 ऐसा नहीं है कि अमेरिकी हितों पर पहली बार 2001 में हमला हुआ। इस घटना ने सारा परिदृश्य बदल दिया है, अब अमेरिका आतंकवाद के विरूद्ध ज्यादा गंभीर व संवेदनशील है तथा उसको वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखना उसकी मजबूरी बन गयी है। अब अमेरिका ने कई अवसरो पर कहा है अफगानिस्तान में जारी आतंकवादी विरोधी कार्यवाही का स्वरूप वैश्विक है और कश्मीर का आतंकवाद भी इस अमेरिकी आतंकवाद विरोधी अभियान में शमिल है परन्तु दबाव के बावजूद पाकिस्तान की हरकतों में कमी न आना भारत के लिए चिन्ता का विषय बना है।112 110

साउथ एशिया एनालसिस ग्रुप.111

दि हिन्दू, 15 अप्रैल, 2001.112

यू0 एस0 पाक रिलेसन्श स्ट्रेटजिक, रूमस्फील्ड डाट कॉम. न्यू, फरवरी 14, 2002, डब्ल्यू.डब्ल्यू.डब्ल्यू.काम/न्यू/2002/फरवरी/14 यू0एस0 पाक-एच0 टी0एम0एल0.


अमेरिका पर हुये आतंकवादी हमले व अफगानिस्तान में जारी संघर्ष के कारण एक बार पुनः अमेरिकी नीति में बदलाव दिख रहा है। पाकिस्तान में अमेरिका को आतंकवाद से लड़ने की मुहिम में हमेशा महत्व देता रहा है। अफगानिस्तान के संदर्भ में पाकिस्तान की भूमिका है जबकि यह सर्वविदित है कि पाकिस्तान आतंकवाद के प्रश्रयदाताओं में एक है। भारत की चिन्ता इस कारण से है कि एक तरफ तो पाकिस्तान अमेरिका को आतंकवाद के खिलाफ सहयोग की बात कर रहा है तो दूसरी ओर वह भारत में सीमा पार से आतंकवाद को प्रोत्साहन दे रहा है।113 भारत द्वारा अमेरिका से बार-बार उस पर दबाव डालने व उसे आतंकवादी देशों की सूची में डालने की मांग को अमेरिका अपने हित में नजरअंदाज नहीं कर सकता क्योंकि सामरिक व आर्थिक महत्व काफी ज्यादा बढ़ गया है।

अमेरिका अब इस नीति का अनुपालन कर सकता है कि वह भारत के साथ वह अपने संबंधों को प्रगाढ़ करे तथा पाकिस्तान को भी साथ रखे क्योंकि मध्य एशिया में अमेरिकी उपस्थिति की स्थिति में अफगानिस्तान व पाकिस्तान महत्वपूर्ण है और वह इन पर अपना प्रभाव बनाये रखना चाहता है। दूसरी ओर अमेरिका के लिए भविष्य में प्रमुख चुनौतीकारी के रूप में उभर रहे चीन द्वारा पाकिस्तान में अपना प्रभाव बढ़ाने से रोकने के लिए अमेरिका पाकिस्तान को लुभाने का प्रयास करेगा। अभी भी मुस्लिम देशों व खाड़ी क्षेत्रों के परिप्रेक्ष्य में पाकिस्तान का महत्व है। आतंकवाद के विरूद्ध अमेरिकी मुहिम में ज्यादातर ऐसे देश निशाने पर है जो मुस्लिम वाहुल्य देश है। अमेरिका ने इराक के विरूद्ध कार्यवाही किया। ऐसे में वह एक प्रमुख मुस्लिम देश, पाकिस्तान का साथ नहीं छोड़ना चाहेगा क्योंकि उसे अपनी कार्यवाही व नीतियों को मुस्लिम विरोधी सिद्ध होने से बचाना है तथा साथ ही साथ पाकिस्तान पर अपने प्रभाव से क्षेत्रों में अपने हितों का संवर्द्धन करना है। उपरोक्त तथ्यों के कारण अमेरिका खुलकर भारत के साथ नहीं आ रहा है। वह दोनों देशों के साथ अपने सम्बन्ध को बनाये रखना चाहता है। पाकिस्तान ने अमेरिका की इस मजबूरी को अच्छी तरह समझ रहा है और उसे इसका फायदा भी मिल रहा है।114 यद्यपि अमेरिका भी पाकिस्तान द्वारा भारत में सीमापार आतंकवाद फैलाने को स्वीकार कर चुका है।113

पी0 स्टीफन कोहेन एण्ड सुनील दासगुप्त, ‘‘यू0एस0 साउथ एशिया : रिलेसन अन्डर बुश, ‘‘फारेन पॉलसी स्टडीज, द बुकिंग इन्स्टीट्यूट, 2001.114

डेनिस कुक्स, ‘‘पाकिस्तानः लफ्वेद नाट फील्ड स्टेट’’ समर, 2001, फारेन पॉलिसी एसोसिएशन मेडलिन सीरिज, न0ं 322-76.


आज दक्षिण एशिया आतंकवादियों के आश्रय का स्थान बन चुका हैं इस संदर्भ में भारत-अमेरिका सहयोग नितांत उपयोगी हो जाता है क्योंकि भारत दक्षिण एशिया क्षेत्र का सबसे बड़ा राष्ट्र है तथा शक्ति संतुलन भारत के पक्ष में हैं। अमेरिका को अपने वैश्विक हित संरक्षण के लिए आतंकवाद से लड़ना आवश्यक है। इस परिस्थति में आतंकवाद के विरूद्ध जारी संघर्ष में दोनों देश स्वाभाविक रूप से जुड़े हुए है।115

आतंकवाद : ओबामा की नई रणनीति[सम्पादन]

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने जिम्मेदारी के नए युग के उदय के साथ बुश प्रशासन की नीतियों पर भी पर्दा डालने का काम किया है। जिसमें कुछ इस तरह के भडकाऊ नारे दिये गये थे। अगर आप हमारे साथ नहीं है तो आप हमारे खिलाफ है, उन्हें लाया जाए। बुराई की धुरी, जिंदा या मुर्दा और आतंकवाद के खिलाफ वैश्यिक युद्ध।116 ओबामा जिस तरह से अमेरिका को एक एक्टिविस्ट विदेश नीति के लिए तैयार कर रहे है इनसे उम्मीद है कि वह महत्वपूर्ण मुद्दों जैसे वैश्वियक आतंकवाद, एशिया की सुरक्षा, चीन को मद्देनजर रखते हुए दक्षिण एशिया में भारत पाकिस्तान सम्बन्ध, रूस का उदय, वैश्यिक परमाणु शक्तियों का प्रबंधन, नए वैश्यिक वित्तीय ढांचे का गठन और जलवायु परिवर्तन के खतरों को कम करने आदि पर नए तरीके से सोचने के काम में तेजी लायेगें। राष्ट्रपति ओबामा की आतंकवाद की नई नीतियों का मकसद पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अलकायदा और तालिबान को बाधा पहुचाना, तोड़ना और हटाना है।117 इस नई रणनीति में पाकिस्तान को वित्तीय मदद देना, भारत और पाकिस्तान के लिए रचनात्मक कूटनीति अपनाना और वार्ता के लिए नए गुटों को तलाशना है । 20 जनवरी 2009 को राष्ट्रपति ओबामा ने अपने पहले भाषण में वैश्यिक आतंकवाद को संबोधित करते हुए कहा था कि उसे आखिरकार खत्म होना ही पड़ेगा। 27 मार्च 2009 को आतंकवाद को हराने की रणनीति के तहत ही ओबामा ने अमेरिकी कांग्रेस से उस बिल को पास करने की अपील की थी जिसके तहत पाकिस्तान को वित्तीय मदद बढाकर अगले पांच सालों तक हर साल 1.5 अरब 115

ऋतेश ठाकुर भारत और संयुक्त राज्य संबंध : नवीन समीकरण और परिवर्तनशील, 2002, पृ0 238.116

भी0 आर0 राघवन, ‘‘एशियाज मेजर पार्वस एण्ड यू0 एस0 स्ट्रेटजी पर्सपेक्टिव फ्राम इंण्डिया‘‘, सेन्टर फार सिक्योरिटी एनालिसिस, चेन्नई, इंण्डिया, 04-05 मई, 2007, डब्लू.डब्लू.डब्लू. काम. ओ0 आर0जी0/पी0डी0ए0/0603 इंण्डिया. एच0 टी0 एम0 एल0.117

शफर टेरेसिट कांड एक्ट मुंडुई ‘‘राइजिंग इंडिया एण्ड यू0एस0 पॉलिसी आप्शन इन एशिया ‘‘साउथ एशिया मॉनीटर सेंटर फॉर स्ट्रेटजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज, वांशिगटन डी0सी0, दिसंबर 2001 अवीलेवल एट एच0टी0टी0पी0://डब्ल्यू0डब्ल्यू0डब्ल्यू0डॉटसी0एस0आई0एस0डॉटओ0आर0जी0/मीडिया/सी0एस0आई0एस0/पी0डी0एफ.


डालर होनी थी। इस बिल को जान केरी और रिचर्ड लूगर ने पेश किया। इस मदद को अमेरिकी प्रशासन ने पाकिस्तान को लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए वहां स्कूल, सड़के और अस्पताल बनाने के लिए जरूरी बताया था। ओबामा ने कांग्रेस एक और बिल (मारिया कैंटवेल क्रिस वैन हांलन और पीटर हीकस्ट्रा का पेश किया) पास करने की अपील की थी जिसमें आतंकवाद से प्रभावित सीमावर्ती क्षेत्रों में आर्थिक विकास के लिए मौके पैदा करने की बात थी। अमेरिका ने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों को दुर्गम कबीलाई इलाकों में जारी आतंकवाद से निपटने के लिए ट्रेनिंग के जरिए सैन्य मदद का प्रस्ताव भी रखा था । अमेरिका को पता है कि पाकिस्तान के पास आतंकवाद से निपटने के लिए जरूरी संसाधनों का अभाव है। इसे वैश्विक खतरा बताते हुए ओबामा ने कहा था कि पाकिस्तान को वित्तीय मदद उनके अपने देश के भविष्य की सुरक्षा के लिए दी जाने वाली किस्त है क्योंकि अमेरिका और पाकिस्तान की सुरक्षा एक दूसरे से जुड़ी है।118 टोक्यों की कांफ्रेंस में तो अमेरिकी प्रशासन ने एक कदम आगे बढ़कर नाटो गठबंधन और अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों जैसे वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ से पाकिस्तान की मदद की अपील की थी। अमेरिकी राष्ट्रपति ने संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर पाकिस्तान और अफगानिस्तान में मौजूदा स्थिति से निपटने के लिए न्यू कांटेक्ट ग्रुप बनाने का प्रस्ताव किया था। यह नाटों देशों रूस, चीन, भारत और मध्य एशियाई, खाड़ी देशों और ईरान से मिलकर बनता। पाकिस्तान की मदद बताने के इतनें मजबूत तर्को के बावजूद अमेरिकी प्रशासन को भारत-पाकिस्तान के बीच संबंधों की मजबूत डोर बाधनी है जिससे भारत-अमेरिका के संबंध सही दिशा में आगे बढ सकें।

राष्ट्रपति ओबामा की पहली बार शपथ लेने के समय से ही पता था कि अमेरिका से मिलने वाली मदद का पाकिस्तान क्या इस्तेमाल कर रहा है। फॉक्स न्यूज के बिल ओ रीली को दिये इंटरव्यू में ओबामा ने साफ शब्दों में कहा था कि अमेरिका लगभग बिना शर्त पाकिस्तान को सैन्य सहायता दे रहा है। इसलिए वे सैन्य सहायता का इस्तेमाल भारत के 118

‘‘श्री धारगन कृपा, ‘‘इंडिया यू0एस0रिलेशन : एन इमर्जिगपार्टनरशिप एंड इट्स इम्पलीकेशन फा र एशियन सिक्योरिटी : मार्च 2007,अवीलेबल एट एच0टी0टी0पी0://डब्ल्यू0डब्ल्यू0डब्ल्यू0आल ऐकेडमिक डॉट कॉम/मेटा/पी0 एम0 एल0ओ0एल0ओ0 ए0वी0ए0-रिसर्चेशन-इटसन/1/80/9/पेज 80843.


खिलाफ युद्ध की तैयारी करने के लिए कर रहे हैं।119 इस्लामाबाद की अमेरिका ने कड़ी आलोचना की और उस पर भारी दबाव भी बना जब ओबामा ने पाकिस्तान में आतंकवादी गतिविधियों से निपटने के लिए अमेरिकी सैनिक उतारने की धमकी दी।

अमेरिकी राष्ट्रपति के तौर पर शपथ लेने के बाद ओबामा ने इस मामले को गंभीरता से लिया और पाकिस्तान पर दबाव बनाया कि वह आतंकी गतिविधियों को रोकने के लिए सकारात्मक भरोसा दे और उनके ठिकानों पर कार्रवाई करे जैसा कि अमेरिका खुफिया एजेंसियां चाहती है। अमेरिका के कड़े रूख का पता तब भी चला जब राष्ट्रपति ओबामा ने कहा कि अमेरिका से मिलने वाली मदद को पाकिस्तान सिर्फ एक ब्लैंक चेक न समझें। अमेरिका को पाकिस्तान में लोकतांन्त्रिक मूल्यों और इसके नागरिकों के नाम पर दी जाने वाली मदद बढाने से पहले हर सावधानी बरतनी होगी। राष्ट्रपति ओबामा ने ठीक इशारा किया था कि भारत अमेरिका की वैश्यिवक साझेदारी बढाने को भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ उन्हों ने रचनात्मक कूटनीति अपनायी होगी।119 टालवोल्ट स्ट्रोब, ‘‘फ्राम स्ट्राबग्मेंट टू इंगजमेंट, यू0 एस0 इंडिया रिलेशन सिंस मई 1998, टेक्सट ऑफ लेक्चर स्पां र्सड बाई सेंटर फार द एडवांस्ड स्टडी ऑफ इंण्डों यूर्निवसिटी ऑफ पेंसिलवेनिया, अक्टूबर 13, 2004, अवीलेबल एच0टी0टी0पी0// सी0 ओ0एस0आई0.एस0एस0सी0 यू0पी0ई0एन0एम0डॉट इंडू/रिसर्च/पेपर/टालवोट .

स्रोत[सम्पादन]