भारत का भूगोल/अपवाह तंत्र

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भारत में अपवाह तंत्र

  • निश्चित वाहिकाओं के माध्यम से हो रहे जलप्रवाह को 'अपवाह'तथा इन वाहिकाओं के जाल को 'अपवाह तंत्र'कहा जाता है।वहां के भूवैज्ञानिक समयावधि,चट्टानों की प्रकृति एवं संरचना,स्थलाकृति,ढाल, बहते जल की मात्रा और बहाव की अवधि का परिणाम है।
  • मुख्य अपवाह प्रतिरूप
  1. वृक्षाकार (Dendritic) प्रतिरूप पेड़ की शाखाओं के अनुरूप-उत्तरी मैदान की नदियाँ।
  2. अरीय (Radial)प्रतिरूप-जब नदियाँ किसी पर्वत से निकलकर सभी दिशाओं में बहती हैं- अमरकंटक पर्वत श्रृंखला से निकलने वाली नदियां।
  3. जालीनुमा (Trellis)अपवाह प्रतिरूप-जब मुख्य नदियां एक दूसरे के समानांतर बहती हों तथा सहायक नदियाँ उनसे समकोण पर मिलती हों।
  4. अभिकेंद्री प्रतिरूप-जब सभी दिशाओं से नदियां बहकर किसी झील या गर्त में विसर्जित होती हैं।
  • एक नदी विशिष्ट क्षेत्र से अपना जल बहाकर लाती है जिसे 'जलग्रहण(catchment) क्षेत्र कहा जाता है।
  • एक नदी एवं उसकी सहायक नदियों द्वारा प्रवाहित क्षेत्र को अपवाह द्रोणी कहते हैं। एक अपवाह द्रोणी को दूसरे से अलग करने वाली सीमा को जल विभाजक या जल-संभर वाटरशेड कहते हैं।
  • बड़ी नदियों के जल ग्रहण क्षेत्र को नदी द्रोणी जबकि छोटी नदियों व नालों द्वारा अपवाह क्षेत्र को जल संभर कहा जाता है।
  • नदी द्रोणी एवं जल संभर एकता के परिचायक हैं।इनके एक भाग में परिवर्तन का प्रभाव अन्य भागों व पूर्ण क्षेत्र में देखा जा सकता है। इसलिए इन्हें सूक्ष्म,मध्यम व बृहत नियोजन इकाइयों व क्षेत्रों के रूप में लिया जा सकता है।
  • कुल अपवाह क्षेत्र का लगभग 77% भाग बंगाल की खाड़ी में तथा 23% अरब सागर में जल विसर्जित करती है।
  • जल संभर क्षेत्र के आकार के आधार पर भारतीय अपवाह द्रोणी का वर्गीकरण।
  1. 20000 वर्ग किलोमीटर से अधिक अपवाह क्षेत्र वाले:-14 नदी द्रोणियाँ शामिल जैसे गंगा,ब्रह्मपुत्र,कृष्णा, तापी नर्मदा माही पेन्नार साबरमती बाराक।
  2. मध्यम नदी द्रोणी:- 2000 से 20000 वर्ग किलोमीटर अपवाह क्षेत्र है।44 नदी द्रोणियाँ हैं,जैसे-कालिंदी,पेरियार,मेघना आदि।
  3. लघु नदी द्रोणी:-2000वर्ग किलोमीटर से कम अपवाह क्षेत् वाले:-इसमें न्यून वर्षा के क्षेत्रों में बहने वाली नदियां शामिल हैं।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • अपवाह क्षेत्र के आधार पर भारत में नदियों का सही क्रम है-गंगा > सिंधु > ब्रह्मपुत्र > कावेरी
  • प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र हिमालयी अपवाह तंत्र से पुराना है।इस तथ्य की प्रमाणिकता नदियों की प्रौढ़ावस्था और नदी घाटियों के चौड़ा व उथला होने से होता है।
  • नर्मदा,ताप्ती एवं महानदी रिफ्ट घाटी से होकर बहने वाली प्रायद्वीपीय नदी।
  • अपवाह क्षेत्र के घटते क्रम के अनुसार प्रायद्वीपीय नदियों का क्रम:-गोदावरी>कृष्णा>महानदी>कावेरी
  • जनवरी से जूनकी अवधि के दौरान गंगा नदी में न्यूनतम जल प्रवाह होता है,क्योंकि यह अपना जल बर्फ पिघलने तथा वर्षा होने से प्राप्त करती हैं।
  • गंगा नदी में अधिकतम जल प्रवाह अगस्त या सितंबर में प्राप्त होता है।
  • छोटानागपुर पठार के पूर्वी किनारे पर दामोदर नदी बहती है और भ्रंश घाटी से होती हुई हुगली नदी में गिरती है। बराकर इसकी एक मुख्य सहायक नदी है। कभी बंगाल का शोक कही जाने वाली इस नदी को दामोदर घाटी कार्पोरेशन नामक एक बहुद्देश्यीय परियोजना ने वश में कर लिया है।

भीमताल, उत्तराखंड में स्थित मीठे पानी की झील है।

  • पुलिकट झील, तमिलनाडु एवं आंध्र प्रदेश राज्यों की सीमा पर कोरोमंडल तट पर स्थित खारे पानी की लैगून झील है।

हिमालय अपवाह तंत्र[सम्पादन]

  • बर्फ पिघलने व वर्षण के कारण बारहमासी।गहरे महाखड्डों से गुजरने के साथ-साथ यह पर्वतीय मार्ग में V-आकार की घाटियाँ,क्षप्रिकाएँ व जलप्रपात तथा मैदानों में निक्षेपणात्मक(depositional)स्थलाकृतियाँ जैसे-समतल घाटियां,गोखुर झील,बाढकृत मैदान,गुंफित वाहिकाएँ और नदी के मुहाने पर डेल्टा का निर्माण करती हैं।
  • हिमालय क्षेत्र में इन नदियों का रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा है,परंतु मैदानी क्षेत्र में रास्ता बदलते हुए सर्पाकार मार्ग में बहने की प्रवृत्ति पाई जाती है।
  • बिहार का शोक कोसी नदी अपना मार्ग बदलने के लिए कुख्यात रही है,यह पर्वतों के ऊपरी क्षेत्रों से भारी मात्रा में अवसाद लाकर मैदानी भाग में जमा करती है इससे नदी मार्ग अवरुद्ध होकर अपना मार्ग बदल लेती है।

सिंधु नदी तंत्र[सम्पादन]

  • तिब्बत क्षेत्र में,कैलाश पर्वत श्रेणी में बोखर चू (Bokhar Chu) के निकट एक हिमनद से नकलने वाली सिंधु नदी को तिब्बत में इसे सिंगी खंबान (Singi Khamban) अथवा शेर मुख भी कहते हैं। लद्दाख व जास्कर श्रेणियों के बीच से यह नदी उत्तर-पश्चिमी दिशा में बहती हुई लद्दाख और बाल्टिस्तान से गुज़रती है। लद्दाख श्रेणी को काटते हुए यह नदी जम्मू और कश्मीर में गिलगित के समीप एक दर्शनीय महाखड्ड (Gorge) का निर्माण करती है।
  • सिंधु नदी भारत में केवल जम्मू-कश्मीर राज्य के लेह ज़िले में बहती है। आगे सिंधु नदी बाल्टिस्तान तथा गिलगित से बहते हुए अटक में पर्वतीय क्षेत्र से बाहर निकलती है।झेलम,चिनाब,रावी,व्यास, तथा सतलज,आपस में मिलकर पाकिस्तान में पठानकोट के पास सिंधु नदी में मिल जाती हैं। इसके बाद यह नदी दक्षिण की तरफ बहती है तथा अंत में कराची से पूर्व की ओर अरब सागर में मिल जाती है। सिंधु नदी मैदान का ढाल बहुत धीमा है। चिनाब सिंधु की सबसे बड़ी सहायक नदी है।
  1. सुलेमान श्रेणियों से निकलकर इसके दाहिने तट पर मिलने वाली सहायक नदियाँ हैं-खुर्रम,तोची,गोमल,विबोआ और संगर।काबुल भी सिंधु के दाहिने तट की एक महत्त्वपूर्ण सहायक नदी है।
  2. सिंधु की बहुत-सी सहायक नदियाँ हिमालय पर्वत से निकलती हैं,जैसे-श्योक,गिलगित,जास्कर,हुंजा,नुबरा, शिगार, गास्टिन व द्रास हैं।
  • झेलम-कश्मीर घाटी के दक्षिण-पूर्व भाग में पीरपंजाल गिरिपद में स्थित वेरीनाग झरने से निकलती है। इसपर वूलर झील अवस्थित है तथा यह नदी कश्मीर की राजधानी श्रीनगर से बहते हुए एक तंग व गहरे महाखड्ड से गुज़रते हुए पाकिस्तान में झंग के निकट चिनाब नदी में मिलती है।
  • चेनाब नदी-चंद्रा और भागा दो सरिताओं के मिलने से बनती है, जिसे आगे चंद्रभागा के नाम से जाना जाता है।चेनाब नदी सिंधु की सबसे बड़ी सहायक नदी है।
  • रावी-हिमाचल प्रदेश की कुल्लू पहाड़ियों में रोहतांग दर्रे के पश्चिम से निकलती है और राज्य की चंबा घाटी से बहती है। पाकिस्तान में प्रवेश करने व सराय सिंध के निकट चिनाब नदी में मिलने से पहले यह नदी पीरपंजाल के दक्षिण-पूर्वी भाग व धौलाधर के बीच से प्रवाहित होती है।
  • व्यास नदी रोहतांग दर्रे के निकट व्यास कुंड से निकलती है।यह नदी कुल्लू घाटी से गुज़रती है और धौलाधर श्रेणी में काती और लारगी में महाखड्ड का निर्माण करती है। यह पंजाब के मैदान में हरिके के पास सतलज नदी में जा मिलती है।
  • सतलज नदी तिब्बत में स्थित मानसरोवर के निकट राक्षसताल से निकलती है, जहाँ इसे लॉगचेन संबाब के नाम से जाना जाता है।

गंगा नदी तंत्र[सम्पादन]

  • उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के गोमुख के निकट गंगोत्री हिमनद से 3900 मीटर की ऊँचाई से निकलती है।जहां इसे भागीरथी नाम से जाना जाता है देवप्रयाग में अलकनंदा नदी के मिलने के पश्चात इसे गंगा नाम से जाना जाता है। इसके बाद यह प्रथम बार हरिद्वार में मैदान में प्रवेश करती है।
  • गंगा नदी मध्य व लघु हिमालय श्रेणियों को काटकर तंग महाखड्डों से होकर गुज़रती है।
  • गंगा नदी उत्तराखंड राज्य के उत्तरकाशी ज़िले में अपनी द्रोणी और सांस्कृतिक महत्त्व दोनों के दृष्टिकोणों से भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण नदी है।
  • गंगा नदी सागर द्वीप के निकट अंततः बंगाल की खाड़ी में जा गिरती है। पिरम द्वीप खम्भात की खाड़ी के पास अरब सागर में स्थित है।
  • यमुना गंगा की सबसे पश्चिमी और सबसे लंबी सहायक नदी है। इसका स्रोत यमुनोत्री हिमनद है जो हिमालय में बंदरपूँछ श्रेणी की पश्चिमी ढाल पर स्थित है। प्रयाग (इलाहाबाद) में इसका संगम होता है।
  • सोन नदी दक्षिणी तट पर गंगा की एक बड़ी सहायक नदी है जो अमरकंटक पठार से निकलती है। यह नदी पटना से पश्चिम में आरा के पास गंगा नदी में विलीन हो जाती है।
  • महानंदा,दार्जिलिंग पहाड़ियों से निकलती है।यह नदी पश्चिम बंगाल में गंगा के बाएँ तट पर मिलने वाली अंतिम सहायक नदी है।
नदियों के नाम स्रोत स्थल सहायक नदियाँ
सिंधु नदी बोखर चू हिमनद खुर्रम,तोची,गोमल,विबोआ,संगर और काबुल।
गंगा नदी गंगोत्री हिमनद गोमती, शारदा या सरयू, घाघरा, गंडक, कोसी, रामगंगा, महानंदा, यमुना, तथा सोन।
ब्रह्मपुत्र नदी चेमायुंगडुँग हिमनद सुबनसिरी, तीस्ता, मानस,दिहाँग,दिबांग,रागोंसांग्पो,लोहित,सुबनसिरी,कामेंग
उदाहरण उदाहरण उदाहरण
उदाहरण उदाहरण उदाहरण
दामोदर नदी उदाहरण वेनगंगा
  • यमुना नदी गंगा की सबसे पश्चिमी और सबसे लम्बी सहायक नदी है।
  • प्रायद्वीपीय पठार से निकलने वाली चंबल, सिंध, बेतवा व केन इसके दाहिने तट पर मिलती हैं, जबकि हिंडन, रिंद, सेंगर, वरुण आदि नदियाँ इसके बाएँ तट पर मिलती हैं।
  • यमुना की अधिकतर सहायक नदियों का उद्गम विंध्याचल और कैमूर पर्वत श्रेणियों से होता है, जैसे- चंबल, सिंध, बेतवा, केन आदि।
  • चंबल नदी मध्य प्रदेश के महू (जानापाव पहाड़ी) के पास से निकलकर उत्तरमुखी होकर एक महाखड्ड से बहती हुई राजस्थान में कोटा पहुँचती है, जहाँ इस पर गांधी सागर बांध बनाया गया है।चंबल नदी अपनी उत्खात भूमि वाली भू-आकृति के लिये प्रसिद्ध है,जिसे चंबल खड्ड (बीहड़) कहा जाता है।
  • चंबल की एकमात्र मुख्य सहायक नदी बनास,अरावली पर्वत से निकलती है।

ब्रह्मपुत्र नदी[सम्पादन]

ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत की मानसरोवर झील के पूर्व में स्थित चेमायुंगडुँग हिमनद से निकलती है।यह हिमालय के समानांतर पूर्व की ओर बहती है।मध्य हिमालय में नामचा बरवा शिखर के निकट अंग्रेज़ी के यू (U) अक्षर जैसा मोड़ बनाकर भारत के अरुणाचल प्रदेश में गॉर्ज के माध्यम से प्रवेश करती है। यहाँ इसे दिहाँग के नाम से जाना जाता है।यह बाढ़,मार्ग परिवर्तन एवं तटीय अपरदन के लिये भी जानी जाती है। ऐसा इसलिये है,क्योंकि इसकी सहायक नदियाँ बड़ी हैं और इनके जलग्रहण क्षेत्रों में भारी वर्षा के कारण इनमें अत्यधिक अवसाद बहकर आ जाता हैं।

  • तिब्बत की रागोंसांग्पो ब्रह्मपुत्र नदी के दाहिने तट की सहायक नदी है।हिमालय के गिरिपद में यह सिशंग के नाम से निकलती है।दक्षिण-पश्चिम दिशा में बहते हुए इसके बाएँ तट पर इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ दिबांग या सिकांग और लोहित मिलती हैं।
  • असम घाटी में अपनी 750 किलोमीटर की यात्रा में,इसके बाएँ तट की प्रमुख सहायक नदियाँ बूढ़ी दिहिंग तथा धनसरी हैं, जबकि दाएँ तट पर मिलने वाली महत्त्वपूर्ण सहायक नदियों में सुबनसिरी,कामेंग,मानस व संकोश हैं।

सुबनसिरी नदी (स्वर्ण नदी) तिब्बत के पठार से निकलती है तथा अरुणाचल प्रदेश में मिरी पहाड़ियों से होते हुए भारत में प्रवेश करती है।यह एक पूर्ववर्ती नदी है।सुबनसिरी नदी को स्थानीय रूप से स्वर्ण नदी के नाम से जाना जाता है। इसमें पाई जाने वाली गोल्ड डस्ट (Gold Dust) के कारण यह प्रसिद्ध है। कामेंग, सुबनसिरी, मानस, संकोष और तीस्ता ब्रह्मपुत्र नदी के दाएँ तट की सहायक नदियाँ हैं, जबकि लोहित, दिबांग, बूढ़ी दिहांग, देसांग, धनिशिरी इसमें बाईं ओर से मिलने वाली नदियाँ हैं। यह ब्रह्मपुत्र नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है। ब्रह्मपुत्र का उद्गम कैलाश पर्वत श्रेणी में मानसरोवर झील के निकट चेमायुँगडुंग हिमनद से होता है। यह नामचा बरवा (अरुणाचल प्रदेश) से भारत में प्रवेश करती है।

प्रायद्वीपीय नदी तंत्र[सम्पादन]

एक सुनिश्चित मार्ग पर चलनेवाली ये नदियाँ न तो विसर्पो का निर्माण करती हैं और न ही बारहमासी हैं, यद्यपि भ्रंश घाटियों में बहने वाली नर्मदा और ताप्ती इसके अपवाद हैं।

  • ये नदियाँ अपने मुहाने पर डेल्टा का निर्माण करती हैं तथा प्रायद्वीपीय नदियों की अपवाह द्रोणियाँ अपेक्षाकृत छोटी हैं।
  • नर्मदा नदी:-अमरकंटक पहाड़ी के पश्चिमी पार्श्व से निकलकर दक्षिण में सतपुड़ा और उत्तर में विंध्याचल श्रेणियों के मध्य यह भ्रंश घाटी से बहती हुई जबलपुर के निकट भेड़ाघाट में संगमरमर के शैलों में यह नदी गहरे गॉर्ज से बहती है तथा जहाँ यह नदी तीव्र ढाल से गिरती है वहाँ ‘धुआँधार प्रपात’ का निर्माण करती है। लगभग 1,312 किलोमीटर दूरी तक बहने के बाद यह भड़ौच के दक्षिण में अरब सागर में मिलती है और 27 किलोमीटर लंबा ज्वारनदमुख बनाती है।

प्रायद्वीपीय भारत की नदियों की लम्बाई 1. गोदावरी नदी - 1465 किलोमीटर 2. कृष्णा नदी - 1400 किलोमीटर 3. नर्मदा नदी - 1312 किलोमीटर 4. कावेरी नदी - 760 किलोमीटर

गोदावरी नदी[सम्पादन]

यह प्रायद्वीपीय भारत की सबसे बड़ी नदी है। यह पश्चिमी घाट से लेकर पूर्वी घाट तक प्रवाहित होती है। इसे दक्षिण भारत की गंगा भी कहा जाता है। यह पश्चिमी घाट स्थित नासिक के पास त्रयंबक पहाड़ियों से निकलती है। मुख्य रूप से इस नदी का बहाव दक्षिण-पूर्व की ओर है। समुद्र में मिलने से 60 मील (लगभग 96 किमी.) पहले ही नदी बहुत ही सँकरी उच्च दीवारों के बीच से बहती है। बंगाल की खाड़ी में दौलेश्वरम् के पास डेल्टा बनाती हुई यह नदी सात धाराओं के रूप में समुद्र में गिरती है। गोदावरी की सहायक नदियाँ:

  1. पूर्णा
  2. कदम
  3. प्राणहिता
  4. सबरी
  5. इंद्रावती
  6. मजीरा
  7. सिंधुकाना
  8. मनेर
  9. प्रवरा

कृष्णा-गोदावरी डेल्टा:-भारत की प्रायद्वीपीय नदियाँ- गोदावरी और कृष्णा, दोनों मिलकर 'कृष्णा-गोदावरी डेल्टा' का निर्माण करती हैं, जो सुंदरबन के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा डेल्टा है। इस डेल्टा को सामान्यतः 'केजी डेल्टा' भी कहा जाता है। उद्गम स्थल: यह महाराष्ट्र में नासिक के पास त्रयंबकेश्वर से निकलती है। अपवाह बेसिन: इस नदी बेसिन का विस्तार महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडिशा राज्यों के अलावा मध्य प्रदेश, कर्नाटक और पुद्दुचेरी के कुछ क्षेत्रों में है। इसकी कुल लंबाई लगभग 1465 किमी. है। सहायक नदियाँ: प्रवरा, पूर्णा, मंजरा, वर्धा, प्राणहिता (वैनगंगा, पेनगंगा, वर्धा का संयुक्त प्रवाह), इंद्रावती,मनेर और सबरी।

कृष्णा नदी[सम्पादन]

उद्गम स्थल: इसका उद्गम स्थल महाराष्ट्र में महाबलेश्वर (सतारा) के पास होता है। अपवाह बेसिन: यह नदी चार राज्यों महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से प्रवाहित होकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। नागार्जुनसागर बाँध इसी नदी पर स्थित है। सहायक नदियाँ: तुंगभद्रा, मालप्रभा, कोयना, भीमा, घाटप्रभा, यरला, वर्ना, बिंदी, मूसी और दूधगंगा। पेन्नार नदी उद्गम स्थल: कर्नाटक के चिकबल्लापुर ज़िले में नंदी पहाड़ से। अपवाह बेसिन: यह कर्नाटक और आंध्र प्रदेश राज्यों में प्रवाहित होकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। सहायक नदियाँ: जयमंगली, कुंदरू, सागरलेरू, चित्रावती, पापाघनी और चीयरू।

कावेरी नदी[सम्पादन]

कर्नाटक के पश्चिमी घाट के ब्रह्मगिरी श्रृंखला से निकलने वाली यह नदी प्रायद्वीप की अन्य नदियों की अपेक्षा कम उतार-चढ़ाव के साथ लगभग सालोभर बहती है,क्योंकि *इस नदी के अपवाह क्षेत्र के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में दक्षिण-पश्चिम मानसून(गर्मी) से और निम्न क्षेत्रों में उत्तर-पूर्वी मानसून (सर्दी) से वर्षा होती है। इस नदी की द्रोणी का लगभग 3 प्रतिशत भाग केरल में,41 प्रतिशत भाग कर्नाटक में और 56 प्रतिशत भाग तमिलनाडु में पड़ता है।

  • अपवाह बेसिन:-यह कर्नाटक और तमिलनाडु राज्यों से बहकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है।यह नदी एक विशाल डेल्टा का निर्माण करती है,जिसे ‘दक्षिण भारत का बगीचा’ कहा जाता है।
  • अमरावती, भवानी, हेमावती, लोकायावनी, लक्ष्मणतीर्थ, काबीनी, सुवर्णवती भवानी, हारंगीआदि नदियाँ कावेरी की सहायक नदियाँ है।
  • कावेरी नदी के अपवाह क्षेत्र को ‘राइस बाउल ऑफ साउथ इंडिया’ कहा जाता है।
  • यह नदी श्रीरंगपट्टनम व शिवसमुद्रम द्वीप से होकर बहती है।

पश्चिम की ओर बहने वाली प्रमुख नदियाँ

  1. नर्मदा एवं ताप्ती जो ज्वारनदमुख का भी निर्माण करती हैं।
  2. साबरमती और माही-गुजरात।अहमदाबाद, साबरमती नदी के किनारे स्थित है।
  3. मांडवी और जुआरी-गोवा में।
  4. शरावती-कर्नाटक के शिमोगा ज़िले से निकलने वाली।
  5. भरतपूझा,अन्नामलाई पहाड़ियों से निकलनेवाली केरल की सबसे बड़ी नदी तथा पेरियार केरल की दूसरी सबसे बड़ी नदी।
  6. पांबा नदी केरल में 177 किलोमीटर लंबा मार्ग तय करती हुई बेंबनाद झील में जा गिरती है।

वैगेई तमिलनाडु में पूर्व की ओर बहने वाली एक महत्त्वपूर्ण नदी है जो हिंद महासागर में जाकर गिरती है। नदी के चैनल में वर्षपर्यंत जल प्रवाह के प्रारूप को नदी बहाव प्रवृत्ति (River Regime) कहा जाता है।

पूर्व की ओर बहने वाली प्रमुख नदियाँ

  • वैगई नदी पूर्व दिशा में प्रवाहित होकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। वैगई नदी बेसिन, कावेरी और कन्याकुमारी के मध्य अवस्थित 12 महत्त्वपूर्ण बेसिनों में से एक है। इसका नदी बेसिन पूर्व में पाक जल-डमरू-मध्य और पश्चिम में कार्डमम तथा पालनी पहाड़ियों से घिरा हुआ है।

पेन्नार नदी उद्गम स्थल: कर्नाटक के चिकबल्लापुर ज़िले में नंदी पहाड़ से। अपवाह बेसिन: यह कर्नाटक और आंध्र प्रदेश राज्यों में प्रवाहित होकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। सहायक नदियाँ: जयमंगली, कुंदरू, सागरलेरू, चित्रावती, पापाघनी और चीयरू।


संदर्भ[सम्पादन]

Bharat ka bhugol