भाषा साहित्य और संस्कृति/काहे रे बन खोजन जाई

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यह पद गुरुनानक द्वारा लिखा गया है जो कि सिख संप्रदाय के आदि (प्रथम) गुरु माने जाते हैं। इस पद में मुश्किल शब्दों के शाब्दिक अर्थ को सुपरस्क्रिप्ट में लिखा गया है। इससे पाठक वर्ग पद के अर्थ को आसानी से समझ सकता है।

पद[सम्पादन]

काहे रे! बनजंगल खोजन जाई![१]
सरब निवासी सदा अलेपानिर्लिप्त, तोही संग सगाई॥१॥

पुष्प मध्य ज्यों बाससुगंध बसत है, मुकुरदर्पण माहि जस छाईपरछाईं
तैसे ही हरि बसै निरंतर, घटशरीर ही खोजौ भाई ॥२॥

बाहर भीतर एकै जानों, यह गुरु ग्यान बताई।
जन नानक बिन आपाअभिमान चीन्हे, मिटै न भ्रमकी काई॥३॥

संदर्भ[सम्पादन]

  1. भाषा, साहित्य और संस्कृति-(सं.)विमलेश कान्ति वर्मा, ओरियंट ब्लैकस्वान, दिल्ली, २०१५, पृ.१८२