भाषा साहित्य और संस्कृति/बहुत कठिन है डगर पनघट की

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अमीर अबुलहसन खुसरो

बहुत कठिन है डगर पनघट की
कैसे मैं भर लाऊँ मधवा से मटकी॥
पनिया भरन को मैं जो गई थी।
दौड़ झपट मोरी मटकी पटकी॥
बहुत कठिन है डगर पनघट की।
खुसरो निज़ाम के बल-बल जाइए॥
लाज राखे मेरे घूँघट पट की।
बहुत कठिन है डगर पनघट की॥[१]

शब्दार्थ[सम्पादन]

  1. पनघट-कुँआ, वह जगह जहाँ से पानी भरा जाता है।
  2. मधवा-जगह का नाम

संदर्भ[सम्पादन]

  1. सं॰विमलेश कान्ति वर्मा-भाषा, साहित्य और संस्कृति,ओरियंट ब्लैकस्वॉन, दिल्ली, २०१५, पृ॰१७४