भाषा साहित्य और संस्कृति/विधवा

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सर्दी का मौसम । इस गांव में जाने क्यों ठंड ज्यादा है। मंगम्मा मेरी शाल ओढ़ कर सो रही होगी खसम से गरम गरम लिपट कर। यहां मुझे ठंड लग रही है। नींद आती नहीं, ओढ़ने के लिए कुछ नहीं। इस गर्म अंगीठी के पास बैठती हूँ तो कंपकंपी कुछ कम लगती है। लेकिन फर्श अभी सूखा नहीं है- सुना है कि इससे ज्यादा ठंडे देश भी है जाने वहाँ कैसे रहता होगा? बचपन में पिता जी सिंड्रेला की कहानी सुनाते थे मेरी हालत अब वैसी ही है। लेकिन सिंड्रेला छोटी बच्ची थी।... पिताजी जब थे कितना अच्छा रहता था! तकलीफ क्या है ,जानती तक ना थी। कोई उदास दिखाई पड़ता तो अचम्भा होता था। पिता जी अब मुझे इस आधी रात में इस अंगीठी के पास अकेले बैठे दिखे तो? जाने कितना रोयेंगे? उन्होंने कभी सोचा होगा कि मैं इस तरह अनाथ हो जाऊँगी? गोद में मुझे बिठाकर सिर पर हाथ फेरते हुए गाल सहलाते सहलाते कहते थे, ' मेरी बिटिया जितनी सुन्दर है कोई? इसके लिए ऐसा लड़का लाऊंगा जो इसको ज़मीन पर पैर न रखने दे। ' तब यह वेंकटरावजी वैराग्य मुझे गोद में बिठा लेते थे और मिठाई की पुड़िया दे कर मेरे मुझे मुंह से छोटा सा गाना फुटने पर 'वाह! वाह! 'की झड़ी लगा देते थे। दस साल भी तो नहीं बीते। अभी परसों बड़े भैया से बात कर दे उसे वेंकटराव ने मुझे देख कर मुँह फेर लिया था।


यह देखो बच्चा उठकर रो रहा है।