भाषा साहित्य और संस्कृति/हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी

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मिर्ज़ा ग़ालिब

असदुल्ला खाँ मिर्ज़ा ग़ालिब

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी, कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले
डरे क्यूँ मेरा क़ातिल, क्या रहेगा उस की गर्दन पर
वो ख़ूं जो चश्म-ए-तर से उम्र-भर यूं दम-ब-दम निकले
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए थे लेकिन
बहुत बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले
भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेचोख़म का पेच-ओ-ख़म निकले
मगर लिखवाए कोई उसको ख़त तो हम से लिखवाए
हुई सुबह और घर से कान पर रख कर क़लम निकले
हुई इस दौर में मंसूब मुझ से बादा-आशामी
फिर आया वो ज़माना, जो जहां में जामे-जम निकले
हुई जिनसे तवक़्को ख़स्तगी की दाद पाने की
वो हमसे भी ज़ियादा ख़स्ता-ए-तेग़-ए-सितम निकले
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले
खुदा के वास्ते पर्दा न काबे का उठा ज़ालिम
कहीं ऐसा न हो यां भी वही काफ़िर सनम निकले
कहां मैखाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहां वाईज़
पर इतना जानते हैं, कल वो जाता था कि हम निकले[१]

संदर्भ[सम्पादन]

  1. विमलेश कान्ति वर्मा और मालती (सं.)-भाषा साहित्य और संस्कृति, ओरियंट ब्लैकस्वॉन, नई दिल्ली, २०१५, पृ.१९७-१९८