भोजपुरी भाषा/इतिहास

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भोजपुरी भाषा का इतिहास 7वीं सदी से शुरू होता है। मध्य काल में भोजपुर नामक एक स्थान में मध्य प्रदेश के उज्जैन से आए भोजवंशी राजाओं ने एक गाँव बसाया था। इसे उन्होंने राजधानी बनाया और इसके राजा भोज के कारण इस स्थान का नाम भोजपुर पड़ गया। इसी नाम के कारण यहाँ बोले जाने वाली भाषा का नाम भी भोजपुरी पड़ गया।

इसे पहले ब्राह्मी लिपि से उत्पन्न कैथी नामक एक ऐतिहासिक लिपि में लिखा जाता था। इसे "कयथी" या "कायस्थी", के नाम से भी जाना जाता है। यह देवनागरी लिपि से मिलती जुलती लिपि है। सोलहवीं सदी में इसका बहुत अधिक उपयोग किया जाता था। मुग़लों के शासन काल के दौरान भी इसका काफी उपयोग किया जाता था। अंग्रेजों ने इस लिपि का आधिकारिक रूप से बिहार के न्यायालयों में उपयोग किया। अंग्रेजों के समय से इसका उपयोग धीरे धीरे कम होने लगा था। बाद में इस लिपि के स्थान में देवनागरी लिपि का उपयोग होने लगा।

कैथी लिपि को वर्ष 2009 में मानक 5.2 में शामिल किया गया। कैथी का यूनिकोड में स्थान U+11080 से U+110CF है। इस सीमा में कुछ खाली स्थान भी है जिनके कोड बिन्दु निर्धारित नहीं किए गए हैं। वर्तमान में कई लोग इस लिपि को पढ़ नहीं पाते हैं। लेकिन सबसे बड़ी समस्या तब होती है जब किसी पुराने अभिलेख को पढ़ना पड़ता है, क्योंकि अभी भी कई सारे पुराने भू-अभिलेख कैथी लिपि में लिखे गए हैं और किसी भी प्रकार के कानूनी कार्यों में इसे पढ़ने की आवश्यकता पड़ जाती है। लेकिन इस लिपि को अधिक लोग नहीं जानते इसलिए इन कार्यों में बाधा उत्पन्न हो जाती है। भाषा के जानकारों के अनुसार यही स्थिति सभी जगह है। ऐसे में इस लिपि के संरक्षण की बहुत जरूरत है।