भौगोलिक चिंतन/रोमन भूगोलवेत्ता

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रोमन भूगोलवेत्ताओं से तात्पर्य यह नहीं है कि वे सभी रोम के निवासी थे। यूनानियों के बाद राजनीतिक शक्ति और सत्ता इटली के प्राचीन रोम में स्थानांतरित हो गयी और रोमन साम्राज्य का उदय हुआ। रोमन साम्राज्य के इस दौर को रोमन काल कहते हैं और इस दौरान जिन भूगोलवेत्ताओं और विद्वानों ने भूगोल के क्षेत्र में कार्य किया उन्हें रोमन भूगोलवेत्ता कहा जाता है; उदाहरण के लिए प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता स्ट्रेबो यूनान में जन्मा और लगभग सारा जीवन यूनान में रहा फिर भी उसे इस कालखंड के कारण रोमन भूगोलवेत्ताओं में गिना जाता है। इसी प्रकार मिस्रवासी और यूनान में रहने वाले टॉलेमी को भी रोमन काल के भूगोलवेत्ताओं में गिना जाता है।

रोमन साम्राज्य की अनुशासित सेनाओं ने विजय अभियानों द्वारा उस समय के विश्व के बारे में रोमवासियों के ज्ञान में अभूतपूर्व विस्तार किया। एक ओर पोम्पेइ ने पूर्व की ओर अल्बानिया और एशिया माइनर पर विजय प्राप्त की तो दूसरी तरफ सीज़र पश्चिम में गॉल (फ़्रांस) और इंग्लैंड तक अपने साम्राज्य का विस्तार करने में सफल रहा। ऑगस्टस का समय इस प्रकार के ज्ञान विज्ञान का चरम युग था। रोमन काल के भूगोलवेत्ताओं के योगदान भौतिक एवं प्रादेशिक भूगोल के क्षेत्र में रहे ; एक ओर जहाँ पोलिबियस और पोसीडोनियस ने भौतिक भूगोल के क्षेत्र में योगदान किया वहीं स्ट्रेबो ने ऐतहासिक एवं प्रादेशिक भूगोल के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान किये।

रोमन काल के प्रमुख भूगोलवेत्ता[सम्पादन]

स्ट्रेबो[सम्पादन]

स्ट्रेबो[१] यूनानी विद्वान् थे जिनका जन्म एशिया माइनर (वर्तमान तुर्की) के शहर अमासिया में हुआ था। अमासिया में काफी आबादी यूनानी लोगों की भी थी।

स्ट्रेबो ने 29 ई.पू. में रोम की यात्रा की और कुछ समय के लिये वहाँ निवास किया, इसके बाद सिकंदरिया (अलेक्जेंड्रिया) आये। 24 ई.पू. में उन्होंने नील नदी के सहारे दक्क्षिण की ओर सीन (अस्वान) तक की यात्रा की। स्ट्रेबो द्वारा टाइरेनियन सागर और युग्जाइन सागर (काला सागर) की यात्रा भी की गयी थी।

पुस्तकें
  • स्ट्रेबो ने 43 खंडों में इतिहास पर पुस्तक लिखी जिसे ऐतिहासिक स्मृतिवृत्त (हिस्टोरिकल मेमोइयर्स) के नाम से जाना जाता है।
  • हालाँकि, उनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक ज्याग्रफिका है जो 17 खंडों में लिखी गयी।
  • यह पुस्तक भूगोलवेत्ताओं के लिये नहीं बल्कि राजनीतिज्ञों और प्रशासकों के लिये लिखी गयी थी।
  • इस पुस्तक को अधिक महत्व तब मिला जब पुनर्जागरण काल के बाद दुबारा इस पुस्तक को खोजा गया।
  • इसका महत्व केवल इसलिए नहीं है कि इसमें भौगोलिक विवरण हैं बल्कि इसलिये भी है कि इसमें स्ट्रेबो ने अपने पूर्ववर्ती भूगोलवेत्ताओं और उनके कार्यों के बारे में भी लिखा है। अतः जिन भूगोलवेत्ताओं के कार्य मूल रूप से नष्ट हो गये थे उनके बारे में भी हम स्ट्रेबो की इस पुस्तक द्वारा जान पाते हैं।

माना जाता है कि स्ट्रेबो ऐसे पहले भूगोलवेत्ता थे जिन्होंने भूगोल की सभी चारों शाखाओं (गणितीय, भौतिक, राजनीतिक एवं ऐतिहासिक) में योगदान किया। इन्हें भूगोल को क्षेत्रवर्णी (कोरोलॉजिकल) विज्ञान के रूप में स्वीकार करने वाला पहला भूगोलवेत्ता माना जाता है (हालाँकि, उन्होंने इस शब्द का प्रयोग नहीं किया था) और प्रादेशिक भूगोल के क्षेत्र में प्रथम योगदानकर्ता भी माना जाता है। स्ट्रेबो ने विभिन्न स्थानों के इतिहास का उनके भूगोल पर प्रभाव पड़ने का विवरण भी दिया अतः उसे पहला नियतिवादी (डिटरमिनिस्ट) चिंतक भी माना जाता है।

अपनी पुस्तक ज्याग्रफिका के 15वें भाग में भारत और ईरान के क्षेत्रों का वर्णन किया है। भारत के बारे में उसकी जानकारी सिकंदर के साथ यात्रा करने वाले नियर्कास और एरिस्टोडलस के विवरणों पर आधारित है; भारत की अधिकतम लंबाई उसने उत्तर-दक्षिण माना और इस कारण प्रोमोंटरी ऑफ़ कोनियाक (कन्याकुमारी) को दक्षिण-पूर्व की ओर बढ़ा हुआ माना। गंगा नदी के बारे में उसका विवरण है कि यह इमोडी (हिमालय) पर्वतों से निकल कर पोलिब्रोथा (पटना) के पूर्व की ओर जाकर समुद्र में मिल जाती है (उपरोक्त विवरण एरिस्टोडलस के विवरणों पर आधारित है)।

स्ट्रेबो ने पृथ्वी को गोलाभीय (स्फेरिकल) ही नहीं बल्कि दीर्घवृताभ (ऑब्लौंग) माना (अर्थात एक ऐसा गोला जो कुछ चपटापन लिये हुये हो)।

प्लिनी (द ईल्डर)[सम्पादन]

प्लिनी का पूरा नाम गायस प्लिनियस सेकंडस था और इन्हें प्लिनी द ईल्डर (वरिष्ठ प्लिनी) के नाम से जाना जाता है। प्लिनी ने नैचुरालिस हिस्टोरिया (नैचुरल हिस्ट्री) नामक ग्रंथ लिखा जिसे पहला विश्वज्ञानकोश (एन्साइक्लोपीडिया) माना जाता है।

प्लिनी के इस विश्वकोश में भूगोल संबंधी विवरण भी मिलते हैं। प्लिनी की यह पुस्तक ऐसी सबसे बड़ी रचना है जो रोमन काल में रची गयी और आधुनिक समय में उपलब्ध है।

प्लिनी (द यंगर)[सम्पादन]

प्लिनी द ईल्डर के भतीजे गायस प्लिनियस कैसीलियस सेकंडस को "प्लिनी द यंगर" (छोटे प्लिनी) के नाम से जाना जाता है। इन्होने सैकड़ों पत्र लिखे जिनमें से कुछ आज भी प्राप्य हैं और इन्हें एपिस्टुलाए (Epistulae) के नाम से जाना जाता है। ये पत्र उस समय के बारे में काफी जानकारी देते हैं। भूगोल के लिये सबसे महत्वपूर्ण इन्ही पत्रों में से दो पत्र हैं जिनमें प्लिनी द यंगर ने माउंट विसुवियस के विस्फोट का आँखों देखा वर्णन (25 वर्षों बाद) किया है। यह घटना अक्टूबर 79 ई. में हुई थी। इसी वर्णन के आधार पर इस प्रकार के ज्वालामुखी विस्फोटों को "प्लिनियन प्रकार" का ज्वालामुखी विस्फोट कहा ही जाता है।

टालेमी[सम्पादन]

क्लॉडियस टालेमी एक मिस्रवासी थे और यूनानी वंश के थे। दूसरी सदी ईसवी में ये मिस्र के प्रसिद्ध शहर सिकंदरिया में निवास करते थे। टालेमी के योगदान खगोलिकी, गणितीय भूगोल, कार्टोग्राफी एवं सामान्य भूगोल के क्षेत्र में हैं। अनुमान लगाया जाता है कि उन्होंने अपने खगोलीय प्रेक्षण 139 ई. में किये थे। खुद के प्रेक्षणों के अलावा उन्होंने मेरिनस ऑफ़ टायर और हिपार्कस के योगदानों का अपनी रचनाओं में इस्तेमाल किया है जिसके कारण इन्हें कुछ विद्वानों द्वारा साहित्यिक चोर (प्लेजीयरिस्ट) कहा जाता है; हालाँकि,यह आरोप उचित नहीं क्योंकि टालेमी ने अपने पूर्ववर्ती लोगों के कार्य का न केवल अपनी रचनाओं में प्रयोग किया, उन्हें अधिक सुव्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत किया।

टालेमी के योगदान निम्नवत बिंदुवार प्रस्तुत किये जा सकते हैं:

  • पुस्तकें:
  • अल्माजेस्ट अथवा ज्याग्राफिक सिन्टैक्सिस, इसमें गणितीय भूगोल और खगोलिकी का ज्ञान महत्व का योगदान है
  • द आउटलाइन ऑफ़ ज्याग्रफी
  • एनेलिमा
  • ज्याग्रफिया
  • टालेमी ने सर्वप्रथम अक्षांश-देशान्तरों के जाल पर विश्व का मानचित्र निर्मित किया। यह एक शंकुआकार प्रक्षेप की तरह था। इसे इमागो मुंडी (शब्दार्थ: विश्व का चित्र) के नाम से जाना जाता है जो उनके बाद आगामी कई सौ वर्षों तक मान्य रहा। टालेमी ने इस मानचित्र पर दिन की लंबाई और अक्षांशों के बीच के संबंध पर क्लाइमेटा के वर्गीकरण को भी प्रस्तुत किया है।
  • ध्रुवीय क्षेत्रों के लिए टालेमी ने स्टीरियोग्राफिक प्रक्षेप का प्रयोग किया था।
  • टालेमी हिपार्कस के इस मत के दृढ़ समर्थक थे कि अक्षांश-देशान्तरों के द्वारा ही जगहों को सटीकता से विश्व मानचित्र पर दिखाया जा सकता है।
  • टालेमी ने पृथ्वी का आकार (परिधि) अनुमानित करने का प्रयास किया औरइस वृत्त को 360 डिग्री में बाँटा तथा प्रत्येक को 500 स्टेडिया का माना। परिणामस्वरूप पृथ्वी का आकार पहले की तुलना में अधिक विकृत हो गया।
  • इन्होने कैस्पियन सागर को एक स्थलरुद्ध सागर माना और पहली बार "रा" (Rha) अर्थात वोल्गा नदी को अपने मानचित्र पर दिखाया
  • बंगाल की खाड़ी को मानचित्र पर प्रदर्शित करनेवाले वे पहले रोमन भूगोलवेत्ता थे। इसके अलावा इन्होने और पूर्व में एक द्वीप का अनुमान लगाया जिसे सुनहरा द्वीप चोएसे कहा (इसे हम आज मलय प्रायद्वीप के रूप में जानते हैं)। इसके भी पूर्व में उन्होंने मेगानस अर्थात श्याम की खाड़ी का विवरण दिया।
  • सुदूर पूर्व चीन को इन्होने पूर दिशा का अंतिम छोर माना
  • हिंद महासागर कोटालेमी ने अपने मानचित्र पर स्थलरुद्ध सागर के रूप में दिखाया था और इसके दक्षिण में टेरा इन्कॉग्निटा (अज्ञात भूमि) नामक महाद्वीप की संकल्पना दी।
  • ताप्रोबाने अर्थात श्रीलंका द्वीप को अरब सागर में भारत की पश्चिमी तटीय सीमा के सहारे दिखाया था

अन्य महत्त्वपूर्ण योगदान[सम्पादन]

  • पोम्पोनियस मेला (Pomponius Mela) ने अपनी पुस्तक दो खंडों में प्रकाशित की:
  • पहला खंड कास्मोग्राफी है जो खगोलिकी, ब्रह्मांड एवं गणितीय भूगोल के बारे में है
  • दूसरा खंड डी कोरोग्राफिया (De chorographia) प्रादेशिक भूगोल के बारे में है

संदर्भ[सम्पादन]

  1. Tozer, Henry Fanshawe (1897). A History of Ancient Geography (अंग्रेज़ी में). University Press. पृप. 238-. आइएसबीएन 978-0-7905-6843-0.श्रेणी_वार्ता:सीएस1 अंग्रेज़ी-भाषा स्रोत (en)