महाकवि माघ एवं शिशुपालवधम् का वैशिष्ट्य

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महाकवि माघ का सामान्य परिचय[सम्पादन]

संस्कृत साहित्य के काव्यकारों में माघ का उत्कृष्ट स्थान रहा है। यही कारण है कि उनके द्वारा विरचित ‘शिशुपालवधम्’ महाकाव्य को संस्कृत की वृहत्त्रयी में विशिष्ट स्थान मिला है। महाकवि ‘माघ’ ने काव्य के 20वें सर्ग के अन्त में प्रशस्ति के रूप में लिए हुए पाँच श्लोकों में अपना स्वल्पपरिचय अंकित कर दिया है जिसके सहारे तथा काव्य में यत्र-तत्र निबद्ध संकेतों से तथा अन्य प्रमाणों के आधार पर कविवर माघ के जीवन की रूप रेखा अर्थात् उनका जन्म समय, जन्म स्थान तथा उनके राजाश्रय को जाना जा सकता है।

प्रसिद्ध टीकाकार मल्लिनाथ ने प्रशस्तिरूप में लिखे इन पाँच श्लोकों की व्याख्या नहीं की है। केवल वल्लभदेव कृत व्याख्या ही हमें देखने को मिलती है। इसी प्रकार 15वें सर्ग में प्रथम 39वें श्लोक के पश्चात् द्वयर्थक 34 श्लोक रखे गये हैं। इसके पश्चात् 40वाँ श्लोक है। यहीं से मल्लिनाथ ने उनकी व्याख्या नहीं की है उसी प्रकार प्रशस्ति के पाँच श्लोकों को भी प्रक्षिप्त मानकर मल्लिनाथ ने व्याख्या नहीं की है। किन्तु मल्लिनाथ के पूर्ववर्ती टीकाकार वल्लभदेव ने उन 34 श्लोकों तथा कविवंश वर्णन के पाँच श्लोकों की टीका लिखी है। अतः वल्लभदेव से पूर्ववर्ती होने के कारण यह विश्वास किया जाता है कि कविवंश वर्णन के आदि में जो ‘‘अधुना कविमाघों निजवंशवर्णन चिकीर्षुराहु’’ लिखा है, वह सत्य है अर्थात् अन्य द्वारा लिखा हुआ यह कविवंश वर्णन नहीं है।

‘‘कविवंशवर्णन के पाँच श्लोक प्रक्षिप्त है’- वह कहना केवल कपोल कल्पना है।

कवि द्वारा लिखे हुए वंश-वर्णन के पाँचवें श्लोक में स्पष्ट लिखा हुआ है कि दत्तक के पुत्र माघ ने सुकवि-कीर्ति को प्राप्त करने की अभिलाषा से ‘शिशुपालवधम्’ नामक काव्य की रचना की है[1] जिसमें श्रीकृष्ण चरित वर्णित है और प्रतिसर्ग की समाप्ति पर ‘श्री’ अथवा उसका पर्यायवाची अन्य कोई शब्द अवश्य दिया गया है। यहाँ ध्यातव्य यह है कि जिस कवि ने 19वें सर्ग के अन्तिम श्लोक (क्र0120) ‘चक्रबन्ध’ में किसी रूप में बड़ी ही निपुणता से ‘माकाव्यमिदम्’ शिशुपालवधम्’’ तक अंकित कर दिया है। कविवर माघ का जन्म राजस्थान की इतिहास प्रसिद्ध नगरी ‘भीनमाल’ में राजा वर्मलात के मन्त्री सुप्रसिद्ध शाक द्वितीय ब्राह्मण सुप्रभदेव के पुत्र कुमुदपण्डित (दत्तक) की धर्म पत्नी ब्राह्मी के गर्भ से माघ की पूर्णिमा को हुआ था। कहा जाता है कि इनके जन्म समय की कुण्डली को देखकर ज्योतिषी ने कहा था कि यह बालक उद्भट विद्वान अत्यन्त विनीत, दयालु, दानी और वैभव सम्पन्न होगा। किन्तु जीवन की अन्तिम अवस्था में यह निर्धन हो जायेगा। यह बालक पूर्ण आयु प्राप्त करके पैरों पर सूजन आते ही दिवंगत हो जायेगा। ज्योतिषी की भविष्यवाणी पर विश्वास करके उनके पिता कुमुद पण्डित-दत्तक ने जो एक ओष्ठी (श्रेष्ठ धनादिकम् अस्ति यस्य, श्रेष्ठ + इनि) (धनी) थे, प्रभूतधनरत्नादि की सम्पत्ति को भूमि को घड़ों में भर कर गाड़ दिया जाता था और शेष बचा हुआ धन माघ को दे दिया था। कहा जाता है कि ‘शिशुपालवधम्’ काव्य के कुछ भाग की रचना इन्होंने परदेश में रहते हुए की थी और शेष भाग की रचना वृद्धावस्था में घर पर रहकर ही की। अन्तिम अवस्था में ये अत्यधिक दरिद्रावस्था में थे। ‘भोज-प्रबन्ध’ में उनकी पत्नी प्रलाप करती हुई कहती हैं कि जिसके द्वार पर एक दिन राजा आश्रय के लिए ठहरा करते थे आज वही व्यक्ति दाने-दाने के तरस रहा है। क्षेमेन्द्रकृत ‘औचित्य विचार-चर्चा’ में पं0 महाकवि माघ का अधोलिखित पद्य माघ की उक्त दशा का निदर्शक है-

बुभुक्षितैत्यकिरणं न भुज्यते न पीयते काव्यरसः पिपासितेः।
न विद्यया केनचिदुदूधृतं कुलं हिरण्यमेवार्जयन्हिफलः कियाः।।

उक्त वाक्य से ऐसा प्रतीत होता है कि दरिद्रता से धैर्यहीन हो जाने के कारण अत्यन्त कातर हुए माघ की यह उक्ति है। कविवर माघ 120 वर्ष की पूर्ण आयु प्राप्त करके सन् 880 ई0 के आसपास दिवंगत हुए साथ ही उनकी पत्नी सती हो गई। इनकी अन्तिम क्रिया तक करने वाला कोई व्यक्ति इनके परिवार में नहीं था। ‘भोजप्रबन्ध’ ‘‘प्रबन्धचिन्तामणि’’ तथा ‘‘प्रभावकचरित’’ के अनुसार भोज की जीवितावस्था में दिवंगत हुए, क्योंकि भोज ने ही माघ का दाह संस्कार पुत्रवत् किया था।

माघ का स्थिति काल[सम्पादन]

माघ के समय निर्धारण में स्थित काल प्रमाण भी मिलते हैं, जिनकी सहायता से हम उनका समय जान सकते हैं। नवीं शती के आनन्दवर्धन (840 ई0) ने अपने ध्वन्यालोक (2 उद्योत्) में माघ के दो पद्यों को उद्धृत किया है। प्रथम पद्य है- ‘रम्याइतिप्राप्तवतीः पताकाः’ (3153) तथा द्वितीय है- ‘त्रासाकुल’ परिपतन् परितो निकेतान्।’ (5126) इस प्रकार माघ निःसन्देह आनन्दवर्धन (850 ई0) के पूर्ववर्ती है।

आनन्दवर्धन द्वारा माघ के श्लोक उद्धृत किए जाने के कारण माघ आनन्दवर्धन के पूर्ववर्ती भी हो सकते है या समकालीन भी हो सकते हैं क्योंकि यशोलिप्सा के कारण माघ स्थिर रूप में किसी एक स्थान पर न रहे पाये हों उन्होंने निश्चित रूप से उत्तर भारत में कश्मीर तक भ्रमण किया था जिसका प्रमाण काव्य के प्रथम सर्ग का नारद मुनि की जटाओं का वर्णन है। यहीं पर सम्भव है ध्वन्यालोक में उद्धृत श्लोकों को किसी काव्योष्ठी में श्री आनन्दवर्धन ने माघ के मुख से सुने हो और वे उत्तम होने के कारण आनन्दवर्धन ने ध्वन्यालोक में उन्हें उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है।

एक शिखालेख से भी माघ के समय-निर्धारण में सहायता मिलती है। राजा वर्मलात का शिखालेख वसन्त गढ़ (सिरोही राज्य में) से प्राप्त हुआ। यह शिखालेख शक संवत् 682 का है शक संवत् 682 में 78 वर्ष जब जोड़ दिए जाते हैं तब ई0 वी0 सन् का ज्ञान होता है इस प्रकार य शिलालेख सन् 760 ई0 का लिखा हुआ होना चाहिए माघ में 20वें सर्ग के अन्त में ‘कविवंशवर्णनम्’ में लिखा है कि उसके पितामाह सुप्रभदेव के आश्रयदाता राजा वर्मल (वर्मलात) थे अतः सुप्रभदेव का समय 760 ई0 के आसपास होना चाहिए। उनके पौत्र कवि माघ का शैशवकाल सन् 780 के आसपास। इतना तो निश्चित है कि माघ आनन्दवर्धन के पश्चात्वर्ती जिस अतीत के इतिहास को अपने काव्य का कथानक बनाता है, उसी अतीत की अन्य स्थितियाँ भी निम्नांकित करने का भरसक प्रयत्न करता है। किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाये तो वहाँ भी उसका वर्तमान समाज झाँकता परिलक्षित होता है, क्योंकि उसका अतीत या भविष्य से सम्बद्ध सम्पूर्ण कल्पनाओं का आधार वर्तमान ही रहता है। कवि की कल्पना वर्तमान की नींव पर अतीत तथा भविष्य के प्रसादों का निर्माण किया करती है। इसलिए माघ में अंकित रीतिबद्धता की बढ़ी हुई प्रवृत्ति तथा समाज का शृङ्गारिक वातावरण भी हमें माघ की उक्त तिथि निश्चित करने में सहायक है। संक्षेप में माघ एक ऐसे युग की देन हैं जिसके प्रमुख लक्षण शृङ्गारिकता, साजबाज के कार्यों में अत्यधिक रूचि और चमत्कार एवं विद्वता प्रदर्शन की प्रवृत्ति आदि है। मदिरा एवं प्रमदा का जो साहचर्य माघ काव्य में देखने को मिलता है वह आठवी से दसवीं शताब्दी के उत्तर भारतीय राजपूत जीवन का इतिहास है।

इस तरह माघ का काल प्रायः 8वीं और 9वीं शताब्दियों के बीच स्थिर होता है। इसमें सन्देह नहीं किया जा सकता। भोज प्रबन्ध के अनुसार माघ भोज के समकालीन थे, क्योंकि भोज प्रबन्ध में माघ के सम्बन्ध में यह किंवदन्ती प्रचलित है कि एक बार माघ ने अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति दानकर दी थी। निर्धन स्थिति में उन्होंने एक श्लोक की रचना की। जिसे उन्होंने राजा भोज के सभा में भेजा था। वह श्लोक इस प्रकार है-

कुमुदवनमपत्रि श्री मदम्भोजखण्डे,
मुदति मुद मूलूकः प्रीतिमारचक्रवाकः।
उदयमहिमरश्मिर्याति शीतांशुरस्तं
हतविधिलीसतानां ही विचित्रो विपाकः।।’’[2]

जब राज सभा में उक्त श्लोक को पढ़कर सुनाया गया तो भोज अत्यन्त प्रसन्न हुए उन्होंने माघ की पत्नी को बहुत सा धन देकर विदा किया माघ की पत्नी जब वापस लौट रही थी, तो रास्ते में बालक माघ की दानशीलता की प्रशंसा करते हुए उससे भी कुछ माँगने लगे। माघ की पत्नी ने सारा धन याचकों में बाँट दिया। जब पत्नी रिक्तहस्त घर पहुँची तो माघ को चिन्ता हुई कि अब कोई याचक आया तो उसे क्या देंगे ? माघ की यह चिन्ताजनक स्थिति को देखकर किसी याचक ने यह कहा था-

आश्वास्य पर्वतकुलं तपनोष्णतप्त
मुद्दामदामविघुराणि च काननानि।
नानानदीनदशतानि च पुरयित्वा।
रित्कोडसि य०जलद सैव तवोन्तमा श्रीः।।’’[3]

डॉ0 कीलहार्न को राजपूताने के वसन्तगढ़ नामक स्थान से वर्मलात नामक किसी राजा का 682 विक्रमी अर्थात् 625 ई0 का शिलालेख प्राप्त हुआ था। इसके प्राप्तिकर्ता के अनुसार ये वर्मलात और श्री वर्मल एक ही थे और ये ही माघ के पितामाह सुप्रभदेव के आश्रयदाता थे। इस दृष्टि से सुप्रभदेव का समय 628 ई0 के आस-पास और उनके पौत्र माघ का अनुमानित समय 650-757 वि0सं0 से 757 वि0 सं0 (700) के बीच हो सकता है।’’[4] अन्य विद्वानों ने भी इस विषय पर प्रभूत अन्वेषण एवं विचार किया है तदानुसार इनका स्थिति-काल शातवीं शती ईसवी के उत्तरार्द्ध में माना जाना चाहिए। इसके मत के प्रत्यायक कुछ वाह्य प्रमाणों का सारांश इस प्रकार है-

  • 1. आनन्दवर्धन (850 ई0) ने अपने ग्रन्थ ध्वन्यालोक में शिशुपालवधम् के दो श्लोक उद्धृत किए हैं।[5]
  • 2. शिशुपालवध (1992) का एक पद्य,[6] जिसमें माघ ने श्लेष द्वारा राजनीति की तुलना व्याकरणशास्त्र से की है स्पष्टरूप से व्याख्या के दो प्रथित ग्रन्थों, वृत्ति (काशिकावृत्ति) 650 ई0 और ‘न्यास’ (सम्भवतः जिनेन्द्रबुद्धिविरचित ‘न्यास’ या ‘विवरण-पि०जका’ समय 700 ई0) का संकेत करता है। इस मत की पुष्टि में एम0 एस0 भण्डार ने कुछ अन्य प्रमाण भी उपस्थित किए हैं। उनका मत है माघ अपने काव्य के अनेक श्लोकों में न्यासकार (जिनेन्द्रबुद्धि) के ही विचारों को प्रकट करते प्रतीत होते हैं। नीचे उद्धृत किए जा रहे न्यासकार के इन वाक्यों की छाया शिशुपालवधम् के एक श्लोक में मिलता है। दोनों तुलनीय प्रसंग इस प्रकार हैं-
परितो व्यापृता परिभाषा। न्यास (2/9/9)
परिभाषात्वेकदेशस्थाऽपि सर्वत्तशास्त्रे व्याप्रियते। शिशुपालवध (9/6/80)
परितः प्रमिताक्षराऽपि सर्व विषयं प्राप्तवर्ती गता प्रतिष्ठान। न खलु प्रतिहन्यते कुतश्चित परिभोषव गरीयसी यदाज्ञा[7]

किन्तु इस धारणा का समर्थन सभी विद्वान् नहीं करते। उनका कथन है कि ‘अनुत्सूत्रपदन्यासा’ आदि पद्य में जो ‘न्यास’ संकेतित हुआ है वह जिनेन्द्रबुद्धिकृत ‘न्यास’ नहीं अपितु उससे भी पहले का कोई एतत्वामक व्याकरण ग्रन्थ होना चाहिए क्योंकि स्वयं जिनेन्द्रबुद्धि ने भी अपने से पूर्व अनेक न्यास ग्रन्थों के नाम दिए हैं और जिनेन्द्रबुद्धि से पूर्ववर्ती बाणभट्ट ने अपने हर्षचरित में भी ‘न्यास’ संज्ञक’ व्याकरण ग्रन्थ का संकेत किया है।[8] अतएव माघ का समय सप्तम शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही स्वीकारना युक्तिसंगत है।’[9]

माघ का पाण्डित्य[सम्पादन]

संस्कृत साहित्यकोश में महाकवि माघ एक जाज्वल्यमान नक्षत्र के समान हैं जिन्होंने अपनी काव्यप्रतिभा से संस्कृत जगत् को चमत्कृत किया है। ये एक ओर कालिदास के समान रसवादी कवि हैं तो दूसरी ओर भारवि सदृश विचित्रमार्ग के पोषक भी। कवियों के मध्य महाकवि कालिदास सुप्रसिद्ध हैं तो काव्यों में माघ अपना एक विशिष्ट स्थान रखते हैं-

काव्येषु माघः कवि कालिदासः।

माघ अलंकृत शैली के पण्डित कवि माने जाते हैं। जहाँ काव्य के आन्तरिक तत्त्व की अपेक्षा वाह्य तत्त्व शब्द और अर्थ के चमत्कार देखे जा सकते हैं। इनकी एकमात्र कृति ‘शिशुपालवधम्’ जिसे महाकाव्य भी कहा जाता है, वृहत्त्रयी में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। इस महाकवि के आलोडन के पश्चात् किसी विद्वान् ने इसकी महत्त्वा के विषय में कहा है- ‘मेघ माघे गतं वयः। माघ विद्वानों के बीच पण्डित कवि के रूप में भी सुप्रसिद्ध हैं। समीक्षकों का कहना है कि माघ ने भारवि की प्रतिद्वन्दिता में ही महाकाव्य की रचना की क्योंकि माघ पर भारवि का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। भले ही माघ ने भारवि के अनुकरण पर अपने महाकाव्य की रचना की हो लेकिन माघ उनसे कहीं अधिक आगे बढ़ गए हैं इसीलिए कहा जाता है,

तावद भा भारवेभीति यावन्माघस्यनोदयः।

माघ जिस शैली के प्रवर्तक थे उनमें प्रायः रस, भाव, अलंकार काव्य वैचित्य बहुलता आदि सभी बातें विद्यमान थी। माघकवि की कविता मेंं हृदय और मस्तिष्क दोनों का अपूर्व मिश्रण था। माघकाव्य में प्राकृतिक वर्णन प्रचुर मात्रा में हुआ है। इनके काव्य में भावगाम्भीर्य भी है। ‘शिशुपालवधम्’ में कतिपय स्थलों पर भावागाम्भीर्य देखकर पाठक अक्सर चकित रह जाते हैं। कठिन पदोन्योस तथा शब्दबन्ध की सुश्लिष्टता जैसी महाकाव्य में देखने को मिलती है वैसी अन्यत्र बहुत कम काव्यों में मिलती है। इनके काव्य को पढ़ते समय मस्तिष्क का पूरा व्यायाम हो जाता है।

कलापक्ष की दृष्टि से भी माघ परिपक्व कवि सिद्ध होते हैं। कवि के भाषापक्ष को ही साहित्यकारों ने कलापक्ष नाम दिया है। महाकवि माघ की भाषा के स्वरूप और सौष्ठव को समझने के लिए उनके शब्दकोष, पदयोजना, व्याकरण शब्दशक्ति, प्रयोगकौशल तथा अलंकार आदि सभी को सूक्ष्म रूप से देखना होगा। कालिदास की सरल सुगम कविता की तुलना में माघ की पाण्डित्यपूर्ण कविता में प्रवेश पाने के लिये अध्येता को काव्यशास्त्रीयज्ञान होना आवश्यक है। वाणी के पीछे अर्थ का स्वतः अनुगमन करने (वाचामर्थोऽनुधावति) की जो दृष्टि भवभूति की रही है तदनुरूपमाघ का भी कहना है कि रस भाव के ज्ञाता कवि को ओज, प्रसाद आदि काव्यगुणों का अनुगमन करने की आवश्यकता नहीं है। वे तो कवि की वाणी का स्वतः अनुगमन करते हैं-

नैकमोजः प्रसादो वा रसभावाविदः कवेः।[10]

माघ के प्रकृति चित्रण में भी उनका वैशिष्ट्य देखने को मिलता है। यद्यपि माघ ने सरोवर, वन, उपवन, पर्वत, नदी, वृक्ष, सन्ध्या, प्रातः रात्रि, अन्धकार आदि प्रकृति के विभिन्न रूपों का चित्रण उद्दीपन के रूप में किया है फिर भी वह इतना सजीव और हृदयस्पर्शी है कि कोई भी पाठक उसमें डूब जाता है। शिशुपालवधम् का नौंवी और ग्यारहवीं सर्ग इस दृष्टि से अवलोकनीय’’ है। नवम् सर्ग में संध्याकाल का वर्णन करते हुए वे कहते हैं कि-

सन्ध्याकाल में पश्चिम दिशा नये कदम के समान लाल बादलों से आच्छादित हो गयी है और समस्त दिग्मण्डल भी सूर्य रश्मियों में परिव्याप्त हो गया हे।[11]

इसी प्रकार ग्यारहवें सर्ग में कवि प्रातः काल का वर्णन करते हुए लिखता है-

अरुणजलजराजीमुग्धहस्ताग्रपादा बहुल मधुपमालाकज्जलेन्दी वरोक्षी।
अनुपतित विरावैः पत्रिणां व्याहरन्ती रजनिमचिरजाता पूर्वसन्धा सुतेव।।’’[12]

अर्थात् रात्रि की विदाई पर ऊषा उसका अनुगमन करती हुई ऐसी शोभायमान हो रही है जैसे वह रजनी की सद्यः प्रसूता कन्या हो। यहाँ रक्तकमलों की पंक्तियों की तुलना ऊषारूपी नायिका की हथेली से और पंखुड़ियों की तुलना उसकी अंगुली से की गयी है। इस प्रकार माघ के प्रकृतिचित्रण में वर्ण्यवस्तु के अनुरूप वातावरण और उसके समस्त अंगों का स्वाभाविक वर्णन देखने को मिलता है। अन्य कृतियों की अपेक्षा माघ के प्रकृतिचित्रण में यह वैशिष्ट्य देखने को मिलता है कि उन्होंने काव्यशास्त्रीय दृष्टि का पूर्ण निर्वाह करते हुए उसे जन सुलभ बनाने का प्रशंसनीय प्रयास किया है।

माघ का शृंगार वर्णन भी उच्चकोटि का है। उन्होंने शृंगार के संयोगपक्ष का ही विस्तृत वर्णन किया है। वियोगपक्ष का नहीं। संयोग शृंगार का वर्णन भी उन्होंने आलम्बन के रूप में ही किया है। शिशुपालवधम् के सातवें सर्ग में इस प्रकार के अनेक सन्दर्भ दिखायी पड़ते हैं। उदाहरणार्थ-

अतिषयपरिणाहवान् वितेने बहुतरमपितरत्नकिप्रिणीकः।
अलधुनि जहनस्थलेऽपरस्या ध्वनिमधिकं कलमेखलाकलापः।।[13]

उर्युक्त प्रसंग में नायिका का अत्यन्त ही शृंगारिक वर्णन किया गया है। माघ रसवाधि कवि होने के साथ ही विचित्य तथा चमत्कार से अपनी कविता को कलात्मक के उच्च शिखर पर पहुँचा दिया है। एक ही वर्ण में सम्पूर्ण श्लोक की रचना करना उनके पाण्डित्य का परिचायक है-

दाददो दुद्ददुहुद्दादी दादादो दूददीददोः।
दुद्दार्द दददे दुद्दे ददाऽददददोऽददः।।[14]

इस प्रसंग में महाकवि माघ ने ‘द’ वर्ण का प्रयोग कर अपनी विद्धता का परिचय दिया है। इसी प्रकार उन्होंने केवल दो वर्णों से भी अनेक श्लोकों की रचना की है जिसका एक उदाहरण प्रस्तुत है।

वरदोऽविवरो वैरिविवारी वारिराऽऽखः।
विववार वरो वैरं वीरो रविरिवौर्वरः।।[15]

यहाँ केवल ‘व’ और ‘र’ वर्णों का प्रयोग कर कवि ने अपने वर्णनचातुर्य को प्रदर्शित किया है। इसके अतिरिक्त अनेक अनुलोम-प्रतिलोम प्रयोग विशेष प्रसिद्ध हैं। इनके एकक्षरपादः[16] सर्वतोभद्र[17] गामुत्रिका[18] बन्धःमुरजबन्ध[19] और ×यर्थवाची[20] तथा चतुरर्थवाची[21] आदि जटिलतम चित्रबन्धों की रचना तत्कालीन कवि समाज की परम्परा की द्योतक है। शिशुपालवधम् के उन्नासवें सर्ग में यही शब्दार्थ कौशल दिखायी पड़ता है।

इस प्रकार माघ ने चित्रालंकार के द्वारा अपने शब्दकौशल का परिचय दिया है। यद्यपि यह शब्द कौशल कुछ बोझिल हो गया है तथा मम्मट के अनुसार चित्रकाव्य अधम कोटि के अन्तर्गत आते हैं। किन्तु फिर भी माघ की शब्दकुशलता मानी जा सकती हैं। काव्य के कथानक के वर्णनचातुर्य को देखकर भी माघ एक कल्पनाशील एवं वर्णनप्रधान कवि प्रतीत होते हैं। शिशुपालवधम् की एक छोटी सी घटना को महाभारत के सभापर्व से ग्रहण कर विशालकाय बीस सर्गों के महाकाव्य की रचना माघ के अपूर्व वर्णन कौशल पर परिचायक है। शिशुपालवधम् के तीसरे से तेरहवें सर्ग तक आठ सर्गों में माघ ने अपनी मौलिक कल्पना द्वारा वर्णनचातुर्य को प्रदर्शित किया है जहाँ मुख्य विषय गौण हो गया है। उन्होंने चतुर्थ और पञ्चम सर्ग में केवल रैवतक पर्वत का वर्णन अत्यन्त ही रोचकतापूर्ण किया है। रैवतक पर्वत को गज के समान तथा दो घण्टे की तुलना चन्द्र और सूर्य से कर माघ ने बहुत सुन्दर निर्दशना प्रस्तुत की है, जिस पर समीक्षकों द्वारा माघ को ‘घण्टामाघ’ की उपाधि प्रदान की गयी है।[22] रैवतक एक ऐसा पर्वत है जिसका वर्णन माघ के अतिरिक्त किसी दूसरे कवि ने अपने काव्य में नहीं किया है।

वर्णनकुशलता, अलंकारप्रियता, प्रकृति समुपासना के साथ ही माघ एक सफल काव्यशास्त्र भी रहे हैं। उनके महाकाव्य के अनुशीलन से माघ के विविधशास्त्रविशेषज्ञ होने का ज्ञान होता है। उन्होंने अपने महाकाव्य के माध्यम से हृदय पाठकों एवं कवियों को प्रायः सभी शास्त्रों का सूक्ष्म ज्ञान करा दिया है। काव्यशास्त्रीय सभी विषयों में उनकी गति दिखायी पड़ती है। विविध विषयों जैसे- श्रुतिविषय (वेद) व्याकरणशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, दर्शनशास्त्र, योग, वेदान्त, मीमांसा, बौद्ध, सामरिकज्ञान, नाट्यशास्त्र, आयुर्वेदशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र, पशुविद्या संगीतशास्त्र, कामशास्त्र पाकंशास्त्र, साहित्यशास्त्र, व्यावहारिकज्ञान और पौराणिकज्ञान इत्यादि का सूक्ष्म परिचय इस काव्य के अनुशीलन से प्राप्त होता है। उपर्युक्त सभी विषयों के ज्ञान का प्रमाण इस प्रकार है- महाकवि माघ का श्रुतिविषयकज्ञान अत्यन्त प्रशंसनीय है। शिशुपालवधम् के ग्यारहवें सर्ग में प्रातःकाल के समय इन्होंने अग्निहोत्र यज्ञ का सुन्दर वर्णन किया है-

प्रतिषरणमषीर्षज्योतिरग्न्याहितानां
विविधहितविरिब्धैः सामिधेनीरधीत्य।
कृतगुरुदुरितौघध्वंसमध्वर्युवयै
र्हुतमयभुपलीढे साधु सात्राध्यमग्निः।।[23]

अग्नि का आवाह्न करने लगे अग्निहोत्रियों के प्रत्येक घर में प्रचण्ड ज्वाला अग्नि जलने लगी है जिसमें ब्राह्मण पुरोहित वैदिक स्वरों के साथ मन्त्रों का उच्चारण करके हवन करने लगे हैं। इस प्रकार महाकवि माघ का वैदिक ज्ञान शिशुपालवधम् में दिखायी पड़ता है। माघ व्याकरण के प्रकाण्ड पण्डित थे। शिशुपालवधम् में दिखायी पड़ता है।

माघ व्याकरण के प्रकाण्ड पण्डित थे। शिशुपालवधम् का प्रत्येक पद्य उनके व्याकरण के पण्डित का साक्षी है। काव्यशास्त्र का भट्टिरचित ‘भट्टिकाव्य’ वैयाकरणिक महाकाव्य माना जाता है। तत्पश्चात् काव्यशास्त्र जगत् में माघकाव्य ही पाठकों को व्याकरण की शिक्षा देने वाला ग्रन्थ माना गया है ‘शिशुपालवधम्’ के द्वितीय सर्ग में वर्णित है कि वह राजनीतिज्ञ काम की जिसमें सब कुछ रहते हुए भी परपश (वर्णन करने वाला मर्मज्ञ गुप्तचर) नहीं है। इसमें शब्दविद्या और राजनीति दोनों का उपमानोंपमेय भाव दिखाते हुए कवि ने अपने वैयाकरणिकज्ञान का परिचय दिया है। यहाँ अपस्पशा के शब्दश्लेष, सद्वृत्ति, सत्रिबन्धना के अर्थश्लेष अनुत्सूत्रपद न्याय के उभयश्लेष और शब्दविहीन के पूर्णिपमा की छटा द्रष्टव्य है-

अनुत्सूत्रपदन्यासा सद्वृत्तिः सन्निबन्धना।
शब्दविघैव नो भाति राजनीतिरपस्पषा।।[24]

यहाँ परेपश का अर्थ व्याकरण रहस्य है अर्थात् महर्षि पतंजलि द्वारा लिखित महाभाज्य का प्रथम आहिक जिसे पस्पशहिक भी कहा जाता है न्यास और काशिका भी व्याकरण के व्याख्यान ग्रन्थ है इस प्रकार यहाँ कवि ने सम्पूर्ण व्याकरण के सार को राजनीतिज्ञान से सम्बद्ध कर अपने वैयाकरणिक सूक्ष्म ज्ञान का परिचय दिया है। इन्होंने व्याकरण का कहीं सरल रूप में तथा कहीं पाण्डित्यपूर्ण ढंग से प्रयोग किया है। भूतकाल के स्थान पर लोट्लकार सुन्दर प्रयोग ‘क्रियासमाभिहारेलोट्’ सूत्र के द्वारा माघ ने किया है।[25] इसी प्रकार व्याकरण से सम्बन्ध एक अन्य उदाहरण भी अवलोकनीय है-

निपातितसुहत्स्वामिपितृव्यभ्रातृमातुलम्
पाणिनीयमिवाऽऽलोकि धीरैस्तत्समराऽजिरम्।।[26]

वीरगति को प्राप्त होने वाले मित्र स्वामी चाचा भाई और मामा से युक्त उस युद्धाङ्गण को विद्वान लोगों ने पाणिन विरचित ‘अष्टाध्यायी’ के समान देखा। इस तरह हम देखते हैं कि माघ ने व्याकरण के सूक्ष्म विषय को भी गम्भीरता से दिखाने का प्रयास किया है। नये-नये प्रचलित एवं अप्रचलित शब्दों का निर्माण भी इनके वैयाकरण होने का प्रमाण है। ‘नवसंर्गगते माघे नवशब्दों न विद्यते’ सूक्ति भी इनके शब्द निर्माण कौशल को प्रकट करती है।

माघ में शिशुपालवधम् के सम्पूर्ण द्वितीय सर्ग में अपने राजनीतिविषयक ज्ञान का परिचय दिया है। श्रीकृष्ण, बलराम और उद्धव के मध्य राजनीतिविषयक गृहमन्त्रणा के माध्यम से उन्होंने अपने राजनीतिज्ञान को प्रकट किया है-

  • 1. गुरुकाव्यानुगां विभ्रमान्द्रीमभिनभः श्रियमः।
  • 2. ‘‘सार्धमुद्धवसीरिभ्याऽथासावासदत्सदः।।[27]

जिस प्रकार आकाश में वृहस्पति और शुक्र के साथ चन्द्रमा सुशोभित होता है उसी प्रकार श्रीकृष्ण भी बलराम और उद्धव के साथ सुशोभित हुए संभावन में पहुँचे।

माघ ने राजनीतिविषयक परिभाषिक शब्दों का भी स्थान-स्थान पर उल्लेख किया है जिनसे उनका कुशल राजनीतिज्ञ होना प्रकट होता है। सन्धि, विग्रह, यान, आसन, षड्गुण तीन शक्तियाँ-प्रभु, मन्त्र, उत्साह इत्यादि राजनीतिविषयक पदों के प्रयोग महाकाव्य में मिलते हैं। इसका एक उदाहरण यहाँ पर दर्शनीय है-

षड्गुणाः शक्तवस्तिस्रः सिद्धयप्रोदयस्त्रयः।[28]

अपि च

आत्मोदयः परज्यानिर्द्धयं नतिरितीयती।
तदूरीकृत्य कृतिभिर्वचस्पत्यं प्रतायते।।’’[29]

बलराम जी कहते हैं कि अपनी उन्न्ति और शत्रु की अवनति होने पर युद्ध करना चाहिए, यही राजनीति है जिसे स्वीकार कर पुरुष अधिकाधिक बोलने वाले बन जाते हैं।

इसी प्रकार राजनीति के अनेक उदाहरण शिशुपालवधम् में प्राप्त होते हैं।

माघ के दर्शन विषयक उद्धरणों से प्रतीत होता है कि वे एक बहुत बड़े दार्शनिक भी थे। भारतीय दर्शन के प्रायः सभी अंगों का उन्हें विस्तृत ज्ञान था। आस्तिक तथा नास्तिक दोनों ही दर्शनों का समन्वय उनमें था। शिशुपालवधम् के प्रथम सर्ग में नारद भगवान् श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए कहते हैं-

उदासितारं निगृहीतमानर्गृहीतमध्यात्मदृशकथञ्चन्।
बहिर्विकारं प्रकृतेः पृथग्विदुः पुरातनं त्वां पुरुषं पुराविदः।।[30]

तत्व को जानने वाले कपिल आदि मुनियों द्वारा अभ्यास और वैराग्य से मन को वश में करके अन्तदृष्टि से आपको देखा गया। योगीजन आपको उदासीन विकारों से अतीत मूल प्रकृति से भिन्न आदि और परम पुरुष मानते हैं।

उपर्युक्त पद्य द्वारा माघ के साड्ख्यदर्शन के ज्ञान का पता चलता है। साङ्ख्य मत का अन्य उदाहरण भी बलराम की उक्ति[31] में स्पष्ट परिलक्षित होता है। इसी प्रकार ‘शिशुपालवधम्’ के अन्तर्गत साङ्ख्यदर्शन से सम्बन्ध अनेक पद्य दिखायी पड़ते हैं।

माघ को योगशास्त्र का भी गूढ़ ज्ञान है। इसका स्पष्ट प्रमाण शिशुपालवधम् महाकाव्य में प्राप्त होता है। चौदहवें सर्ग में भीष्म भगवान् श्रीकृष्ण की स्तुति करते हैं।

सर्ववेदिनमनादिमास्थितं देहिनामनुजिधृक्षया वपुः।
क्लेषकर्मफलभोगवर्जितं पुविषेषममुमीष्वरं विदुः।।[32]

भगवान श्रीकृष्ण को विद्वान जन्म और मृत्यु से रहित प्राणियों पर कृपा करने की इच्छा से मानव अवतार लेने वाले पाँच क्लेशों और पाप तथा पुण्यक फलों से रहित ईश्वर, परमपुरुष आदि पुरुष इत्यादि कहते हैं।

यहाँ योगशास्त्र में वर्णित अविद्या अस्मिता, रागद्वेष और अभिनिवेश इत्यादि पचंक्लेशों का उल्लेख माघ की योगशास्त्र में प्रवीणता को प्रदर्शित करता है इसी प्रकार चतुर्थ सर्ग में रैवतक पर्वत के वर्णन में[33] भी माघ के योगशास्त्र प्रवीण होने का पता चलता है। महाकवि माघ को वेदान्तदर्शन का अपूर्वज्ञान था। उन्होंने अद्धैतवेदान्त के तत्त्वों का प्रतिपादन शिशुपालवधम् में अनेक स्थानों पर किया है। चौदहवें सर्ग में भीष्म भगवान् श्रीकृष्ण का गुणगान करते हुए कहते हैं-

ग्राम्यभावमहाहातुमिच्छवो योग मार्गपतितेन चेतसा।
दुर्गमेकमपुनर्निवृत्तये यं विषति वषिनं मुमुक्षवः।।’’[34]

मुमुक्ष लोक इस संसार से मुक्ति पाने के लिए योगमार्ग में अपने चित्त को लगातार इन्हीं भगवान् श्रीकृष्ण का ध्यान करते हैं। यहाँ माघ ने भीष्म के द्वारा श्रीकृष्ण के प्रति वेदान्तदर्शन का स्पष्ट स्वरूप स्थापित किया है। मोक्ष प्राप्ति के लिए वेदान्त ही एकमात्र मार्ग है। श्रीकृष्ण के ध्यानमात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। इसी प्रकार अन्यत्र भी वेदान्त के उदाहरण शिशुपालवधम् में दिखायी पड़ते हैं। महाकवि माघ ने नारद के मुख से श्रीकृष्ण के लिए निर्गुण बाह्य के स्वरूप का प्रतिपादन करवाया है। नारद कहते हैं कि मोक्ष की इच्छा करने वालों को आपकी ही शरण में जाना पड़ता है। आप जैसे परमपुरुष को प्राप्त कर मृत्यु से छुटकारा मिलता है, इसके सिवाय दूसरा कोई मार्ग नहीं है। वही पहुँचकर पुनः इस संसार में वापस आना नहीं पड़ता है।[35]

माघ मीमांसाशास्त्र के भी पारङ्गत पण्डित प्रतीत होते हैं। ‘शिशुपालवधम्’ के चौदहवें सर्ग के यज्ञ विषयक प्रतिपादन में माघ के मीमांसा सम्बन्धी ज्ञान का परिचय मिलता है।

षब्दितामनपषब्दमुच्चकैवक्यिलक्षणविदोऽनुवाक्यया।
याज्यया यजनकर्मिणोऽत्यजन् दब्यजातमपदिष्यदेवताम्।[36]

मीमांसाशास्त्र के ज्ञाता पुरोहित जिनका उच्चारण अत्यन्त शुद्ध था, उच्च एवं स्पष्ट स्वरों द्वारा श्रुति का उच्चारण करते हुए देवताओं के निमित्त अग्नि में आहुतियां देने लगे। यहाँ मीमांसा की गयी है कि यज्ञ के मन्त्रों के उच्चारण में विशेष निपुणता होनी चाहिए अन्यथा अशुद्धि से अनर्थ की आशंका बनी रहती है इसी प्रकार अन्यत्र भी मीमांसा ज्ञान के उद्धरण प्राप्त होते हैं।

भारतीय दर्शन के नास्तिक दर्शनों में बौद्धदर्शन् का भी माघ को ज्ञान था। ‘शिशुपालवधम्’ के दूसरे सर्ग में बौद्धदर्शन का स्पष्ट संकेत दिखायी देता है।

सर्वकार्यषरीरेषु मुत्वाङ्गस्कन्धपञ्चकम्।
सौगातानामिवात्मान्यो नास्ति मन्त्रोद्रलमहीभृताम्।।[37]

राजाओं के लिए पांच अंगो वाले मन्त्र के अतिरिक्त दूसरा कोई मन्त्र नहीं है। जिस प्रकार बौद्ध दर्शन में पाँच स्कन्ध के अतिरिक्त और कोई आत्मा नहीं है, क्योंकि बौद्ध लोग आत्मा नाम की कोई वस्तु स्वीकार नहीं करते हैं। यहाँ बलराम की उक्ति के माध्यम से माघ ने बौद्ध दर्शन के स्वरूप को दर्शाया है। जिस प्रकार बौद्धदर्शन में आत्मा को स्वीकार नहीं किया गया है और शरीर को पाँच स्कन्धों रूपस्कन्ध, वेदनास्कन्ध, विज्ञानस्कन्ध, संज्ञास्कन्ध और संस्कार स्कन्ध से युक्त माना गया है। ठीक उसी प्रकार राजाओं के लिए पंचाग मन्त्र कार्य के आरम्भ करने का उपाय कार्य को सिद्ध करने में उपयोग दृव्य का संग्रह देश और काल का निरूपण विपत्तियों को दूर करने के उपाय और कार्य की सिद्धि बताये गये हैं। बलराम के इस कथन का तात्पर्य यह है कि इन सब बातों पर विचार करने के पश्चात् यही उचित है कि इस समय शिशुपाल पर अभियान करने के लिए उपयुक्त अवसर है। तेरहवें सर्ग में भी बौद्धदर्शन का उल्लेख प्राप्त होता है।[38]

महाकवि माघ का सामरिक ज्ञान भी उच्चकोटि का था द्वितीय सर्ग में समुद्रमन्थन के पौराणिक आख्यान की चर्चा इनके सामरिक ज्ञान को प्रकट करती है-

अमृतं नाम यत्सन्तों मन्त्रजिह्वोषु जुह्वति।
शौभैव मन्दरक्षुब्ध भिताम्त्मोधिवर्णना [39]

विद्वान लोग अग्नि में जो हवन करते हैं वहीं अमृत होता है। मन्दरा चल रूपी मथनी द्वारा मथे गए समुद्र से निकले हुए अमृत की चर्चा केवल शोभामात्र के लिए की गयी है।

यहाँ ज्ञात होता है कि माघ का सामरिक ज्ञान अत्यन्त प्रौढ़ था। इसके अतिरिक्त औपम्य विधान द्वारा निषाद ब्राह्मण[40] इत्यादि उपाख्यानों द्वारा और युद्ध सम्बन्धी वर्णनों में उनका सामरिक ज्ञान का पता चलता है।

माघ नाट्यशास्त्र के भी ज्ञाता थे इसका ज्ञान ‘शिशुपालवधम्’ के परिशीलन से सहृदय सामाजिक को स्वयं हो जाता है। बीसवें सर्ग में मुख आदि नाट्य सन्धियों की उपमा मोपुच्छ और सर्प से करते हैं माघ कहते हैं-

दधतस्तनिमानमानपूर्त्या बभुरक्षिश्रवसो मुखे विषालाः।
भरतज्ञकविप्रणीतकाव्यग्रथिताप्रा इव नाटकप्रपञ्चाः।।[41]

मुख भाग (मुख सन्धि) में विस्तृत और क्रमशः पतले होते हुए वे सर्ग नाट्यशास्त्र के नियमों को जानने वाले कवियों द्वारा रचित काव्य के गुणों से गुथे नाटक रचना के समान शोभित हो रहे थे।

यहाँ पर नाट्यसन्धियों (मुख प्रतिमुख गर्भ, विमर्श और निर्वहण) के प्रयोग की जिस प्रकार माघ द्वारा बताया गया है इससे यह सिद्ध हो जाता है कि नाट्यशास्त्र के किसी भी क्षेत्र से वे अछूते नहीं थे। इसका एक अत्यन्त सुन्दर उदाहरण चौदहवें सर्ग में दिखायी पड़ता है जहाँ पर नवरत्नों की व्यंजना की गयी है।[42]

आयुर्वेदशास्त्र का भी माघ को सूक्ष्म ज्ञान था जिसका प्रमाण शिशुपालवधम् में देखा जा सकता है। द्वितीय सर्ग में बलराम द्वारा कही गयी उक्ति में ज्वरसिद्धान्त का उदाहरण दर्शनीय है-

चतुर्थोपायसाध्ये तु शत्रौ सान्त्वमपक्रिया।
स्वेधमामज्वरं प्राज्ञः कोऽम्भसा परिषिञ्चति।।[43]

दण्ड के द्वारा वश में आने वाले शत्रु के साथ शान्तिपूर्ण व्यवहार करना हानियुक्त होता है क्योंकि पसीना लाने वाला ज्वर को कौन सा चिकित्सक पानी छिड़ककर शान्त करता है ? अर्थात् कोई नहीं।

यहाँ पर माघ अप्रस्तुत विधान के रूप में नीति संसार में शत्रु ज्वर के समान होता है जो एक भयंकर रोग के समान होता है उसके लिए धर्मोचर ही करना चाहिए। आयुर्वेद से सम्बन्ध अनेक श्लोक ‘शिशुपालवधम्’ में मिलते हैं।44

महाकवि माघ ज्योतिषशास्त्र में भी प्रवीण थे। तृतीय सर्ग में श्रीकृष्ण के रथारूढ़ होने का वर्णन करते हुए वे कहते हैं-

रराज सम्पादकमिष्टसिद्धेः सर्वासुदिक्ष्वप्रतिधिदृमार्गम्।
महारथः पुख्यरथं रथाङ्गी क्षिप्रं क्षपानाथ इवाधिरूढः।[45]

सुदर्शन चक्र को धारण करने वाले भगवान श्रीकृष्ण इच्छापूर्ति करने वाले सभी दिशाओं में बिना बाधा के चलने वाले और पूर्ण वेग से चलने वाले पुष्य नामक रथ पर ऐसे सुशोभित हो रहे थे जैसे- इच्छापूर्ति करने वाले सब दिशाओं में यात्रा हेतु प्रशस्त और क्षिप्रनामक पुष्प नक्षत्र में स्थित चन्द्रमा शोभित हो रहा है।

यहाँ पर पुष्पनामक रथ की उपमा पुण्य नक्षत्र से दी गई है जो ज्योतिषशास्त्र में इष्टसिद्धि का सम्पादक है। प्रस्तुत पद्य में माघ ने ज्योतिष विषयक पुष्प नक्षत्र की चर्चा कर अपने ज्योतिष सम्बन्धी ज्ञान का परिचय दिया है। इसी प्रकार प्रथम सर्ग के अन्तिम पद्य में भी नारद द्वारा शिशुपाल के वध के लिए दिए गये सन्देश के प्रत्युतर में भी माघ के ज्योतिषशास्त्र का ज्ञान परिलक्षित होता है।

महाकाव्य के परिशीलन से यह भी पता चलता है कि माघ पशु विद्या में भी महारथी थे। इन्होंने यथास्थान हाथियों, घोड़ों, ऊँटों, साड़ों इत्यादि का वर्णन कर पशु विद्या से भी अपना सम्बन्ध दर्शाया है। अट्ठारहवें सर्ग में गजशास्त्र का वर्णन करते हुए वे कहते हैं-

सान्द्रत्वक्का स्तल्पलाष्लिष्टकक्षा आङ्गी शोभामासुवन्तष्चचतुर्थीम।
कल्पस्यान्ते मारुतेनोपनुत्राष्चेलुष्चण्ड मण्डषैलाइवेमाः।।[46]

मजबूत कवच वाले पीठ से सटाकर बांध गये रस्से वाली, चालीस वर्ष की अवस्था से युक्त हाथी प्रलयकाल में वायु द्वारा गति देने से पर्वतों की बड़ी-बड़ी चैनों के समान चल पड़े।

गजशास्त्र के अनुसार हाथियों की पूर्ण आयु 120 वर्ष होती है जिसमें 12 दशायें होती हैं अतः चतुर्थी दशा वाले हाथी की आयु 40 वर्ष होती है। इस प्रकार यहाँ हाथियों के आयु सम्बन्धी सूक्ष्मज्ञान को माघ ने बताया है। इसी प्रकार शिशुपालवधम् में अन्य पशु पक्षियों से सम्बन्ध ज्ञान का भी परिचय प्राप्त होता है। संगीत के बिना जीवन नीरस माना जाता है।[47] अतः माघ ने अन्य शास्त्रों के साथ-साथ संगीतशास्त्र को भी आवश्यक माना जाता है। प्रथम सर्ग में नारद की वाणी का वर्णन करते हुए माघ कहते हैं-

रणादिभराघट्टनया नभस्वतः पृथभिन्नश्रुतिमण्डलैः स्वरैः।
स्फुटीभवद्भमविषेषमूर्च्छनामवेक्षमाणं महती मुहुर्मुहुः।[48]

वायु के प्रहार से शब्दायमान अनेक श्रुतिसमूह से युक्त स्वरों द्वारा प्रस्फुटित विभिन्न ग्राम मूर्च्छनाओं वाली महती नामक वीणा को बार-बार देखते हुए उस व्यक्ति को श्रीकृष्ण ने नारद समझा।

प्रस्तुत पद्य में माघ ने संगीत से सम्बन्ध सात स्वर (सा-रे-ग-म-प-ध-नी) तीन ग्राम तथा इक्कीस मूर्च्छना की चर्चा कर अपनी संगीतशास्त्र के ज्ञान को उपस्थित किया है। इसी प्रकार अन्यत्र भी संगीतशास्त्र से सम्बन्ध उदाहरण महाकाव्य में मिलते हैं।[49]

माघ कामशास्त्र के भी ज्ञाता थे। संभवतः इन्होंने वात्सयायन विरचित कामसूत्र का भी अध्ययन किया था क्योंकि शिशुपालवधम् में इसका उल्लेख प्राप्त होता है। दसवें सर्ग में इसका उदाहरण देते हुए वे कहते हैं-

सीत्कृतानि मणितं करूणोक्तिःस्निग्धमुक्तमलमर्थवचांसि।
हासभूषणरवाष्च रमण्याः कामसूत्रपदतामुपजुग्मः।।[50]

रमणी के सीत्कार द्वारा किया गया अव्यक्त शब्द विशेष, करूण वचन, प्रेमयुक्त कथन निषेधार्थक वचन हंसने और आभूषणों की ध्वनि ये सभी मानो वात्स्यायन विरचित कामसूत्र के पद हो गए।

प्रस्तुत पद्य के अनुशीलन से यही स्पष्ट होता है कि माघ ने कामशास्त्र का सूक्ष्म अध्ययन किया था। उससे उनके प्रत्येक विषय में गहन अध्ययन का संकेत मिलता है।

शिशुपालवधम् के द्वितीय सर्ग में माघ के पाकशास्त्र निपुण होने का उल्लेख है-

सामवादाः सकोपस्य तस्य प्रत्युत दीपकाः।
प्रतप्तस्येव सहसा सर्पिषस्तोयबिन्दयः।।[51]

क्रोधी शिशुपालवध के साथ सन्धि इत्यादि की शान्तिपूर्ण वार्ता इस समय उसी प्रकार उत्तेजिनपूर्ण रहेगी जिस प्रकार खौलते हुए घी के ऊपर शीतल जल की छीटें।

यहाँ पर ‘घी’ इत्यादि शब्दों के प्रयोग से उनके पाकशास्त्र के ज्ञान का पता चलता है। माघ का ‘शिशुपालवधम्’ सम्पूर्ण लक्षणों से युक्त महाकाव्य है परन्तु इस ग्रन्थ के अध्ययन से यह प्रतीत होता है कि यह महाकाव्य साहित्यशास्त्र का ही ग्रन्थ हो क्योंकि इस महाकाव्य में अनेक ऐसे उद्धरण आए हैं जो साहित्यशास्त्र की अच्छी व्याख्या करते हैं साथ ही छन्द, अलंकार, रस एवं गुणों के सम्यक् प्रयोग विस्तार से हुए हैं। इनका महाकाव्य उस समय की अलंकृत शैली का प्रतिबिम्ब करता है।

महाकाव्य में अलंकार का बहुत अधिक प्रयोग देखने को मिलता है इनका अलंकार प्रयोग बहुत ही अनुपम है। यमक अलंकार के उदाहरण के रूप में सर्वत्र उद्धृत माघ का प्रस्तुत पद्य प्रसिद्ध है।

नवपलाषपलाषवनं पुरः स्फुटपरागपरागतपप्रजम्।
मृदुलतान्तलताऽन्तमलोकयत्स सुरभिं सुरभिं सुमनोभरैः।।[52]

श्रीकृष्ण ने नये पत्तों से युक्त पलाश वन वाले खिले हुए तथा पराग से पूर्ण कमलों वाले, गर्मी से मलिन पुष्पों वाले तथा पुष्प, समूहों से सुरक्षित वसन्त ऋतु को देखा। यहाँ पर ‘पलाश-पलाश’’ पराग-पराग’’ लतान्त-लतान्त’ तथा सुरभि-सुरभि पदों में यमक अलंकार का प्रयोग दर्शनीय है। इसी प्रकार माघ ने यथावसर अर्थान्तरयास अतिशोक्ति, उपमा, श्लेष, निदर्शना इत्यादि अलंकारों का सुन्दरतम प्रयोग कर शिशुपाल को एक अलंकृत महाकाव्य के रूप में प्रतिष्ठित किया है।

इसी तरह काव्य के अन्तःतत्त्व छन्द[53] रस[54] और गुण[55] का भी समुचित प्रयोग इन्होंने अपने महाकाव्य में किया है।

महाकवि माघ शास्त्व के प्रकाण्ड पण्डित होने के साथ ही व्यवहारिकता की ओर भी पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है वे कहते हैं कि मनुष्य को न तो भाग्य के भरोसे रहना चाहिए और न ही पुरुषार्थ पर अहंकार करना चाहिए। जिस प्रकार सुकवियों के लिए शब्द और अर्थ दोनों आवश्यक होते हैं उसी प्रकार जीवन में भाग्य और पुरुषार्थ दोनों का अवलम्बन करना चाहिए-

नालम्बते दैष्टिकतां न निर्षादति पौरुषे।
शर्ब्दाथौ सत्कविरिव द्वयं विद्वानपेक्षते।।[56]

उपर्युक्त उद्धरण में उनके व्यावहारिक ज्ञान के दर्शन होते हैं।

महाकवि माघ का पौराणिक ज्ञान भी असीम था। महाकाव्य के अध्ययन से यह प्रतीत होता है कि कवि को समझते पुराणों, महाभारत, भागवत् और गीता इत्यादि का पूर्णज्ञान था। माघ के प्रायः प्रत्येक श्लोक से कोई न कोई पौराणिक कथा सम्बन्घ है जगत् के समस्त प्राणी भगवान् के अंगों से उत्पन्न हुए हैं इत्यादि संकेत प्रस्तुत प्रद्य से ज्ञात होता है।

प्रजा इवांङ्गादरविन्दनाभे शम्भोजर्टाजूटतटादिवापः।
मुखादिवाऽथ श्रुतयो विधातुः पुरान्निरीयुर्मुरे घुजिऽवणिन्यः।।[57]

जिस प्रकार विष्णु के शरीर से सभी प्रजाओं , भगवान शंकर की जटाओं से गंगा और ब्रह्मा के मुख से वेद की उत्पत्ति हुई है उसी प्रकार श्रीकृष्ण की सेनाएं द्वारकानगरी से बाहर निकली।

उपर्युक्त पद्य में कमलनाभि भगवान् पौराणिक कथा गंगा की उत्पत्ति और विधवा के मुख से वेदोत्पत्य इत्यादि कथाओं का संकेत मिलता है। इस तरह हम देखते है कि महाकवि ने पुराणों की कथा को आधार बनाकर न केवल अपने पौराणिक ज्ञान का परिचय दिया है अधिक कथाओं से पद्य के अर्थ को अभिव्यक्त करने में तथा उसमें चमत्कार लाने में भी सफलता प्राप्त है।[58]

इस प्रकार माघ के पाण्डित्य का विवेचन करने से यहीं निष्कर्ष निकलता है कि माघ बाहुबली प्रतिभा के धनी थे शास्त्रों के प्रकाण्ड पण्डित थे, प्रत्येक विषय का सूक्ष्म ज्ञान उन्हें था, उन्होंने काव्य के आवश्यक पहलुओं पर ध्यान दिया एवं उन्हें जीवन से जोड़ने का भी प्रयास किया। वे कवि एवं सहृदय पाठक दोनों के लिए आदर्श रहे हैं। इनकी रचना में चमत्कार गेयता, वैचित्र्य, अलंकार रस तथा व्यावहारिक जीवन के अनुभव प्राप्त होते हैं।

माघ का कर्तृत्व[सम्पादन]

‘एकष्चन्द्रस्तमोहन्ति’ उक्ति के अनुसार महाकवि माघ की कीर्ति उनके एकमात्र उपलब्ध महाकाव्य ‘शिशुपालवधम्’ पर आधारित है, जिसका बृहत्रयी और पंचमहाकाव्य में विशिष्ट स्थान है। ‘शिशुपालवधम्’ महाकाव्य के अतिरिक्त माघ की अन्य रचनाएं प्राप्त नहीं होती। यद्यपि सुभाषित ग्रन्थों में माघ के नाम से कुछ फुटकर पद्य भी मिलते हैं जिनसे प्रतीत होता है कि माघ की और भी रचनाएं रही होंगी जो कालान्तर में नष्ट हो गयी। माघ के नाम से जिन ग्रन्थों में उनके पद्य मिलते हैं उनका सन्दर्भ अधोलिखिल हैं-

बुभुक्षितैव्यकिरण न भुज्यते पिपासितैः काव्यरसो न पीयते।
‘‘विधया केनचिदुद्धतं, कुलं हिरण्यमेववार्जय निष्फलाः क्रियाः।।

प्रस्तुत श्लोक महाकवि क्षेमेन्द्र की ‘औचित्यविचार चर्चा’ में माघ के नाम से उल्लिखित है जो ‘शिशुपालवधम्’ महाकाव्य में नहीं मिलता। ‘सुभाषिरत्न भण्डागार’ में यह पद्य नाम से प्राप्त होते हैं-

अर्थाः न सन्ति न च मुञ्चर्त मां दुराषा त्यागात्त सकुंचित दुर्लवितं मनो मे।
याञ्चा च लाघवकारी स्ववधे च पापं प्राणः स्वयं व्रजत् किं नु विलम्बितेन।।

इसके अतिरिक्त इनमें ग्रीष्मवर्णनम्[59] सामान्य नीति[60] दरिद्रनिन्द्रा[61] तेजसवीप्रशंसा[62] पानगोष्ठिवर्णनम्[63] चन्द्रोदयवर्णनम्[64] सरतकेलिकथनम्[65] कथनम्[66] कुटानि तथा रत्ती स्वभाव निन्दा[67] इत्यादि में भी माघ के पद्य प्राप्त होते हैं। जीवनवार्ता में भी माघ के नाम से एक पद्य प्रयुक्त हुआ है-

उपचरिलत्याः सन्तो यद्यपि कथयन्ति नैकमुपदेशम् यास्तेषां स्वैरकथास्ता एव भवन्ति शास्त्राणि।।

उपर्युक्त सभी पद्यों के अतिरिक्त महाकवि माघ से सम्बन्ध अन्य पद्य भी है जो भोजप्रबन्ध और ‘प्रबन्धचिन्तामणि’ में माघ के मुख द्वारा मुखरित हुए हैं। यह पद्य माघ विरचित किसी प्रकाशित या अप्रकाशित ग्रन्थ से सम्बन्ध हो अथवा न हो क्योंकि माघ को अमरता प्रदान करने के लिये उनका ‘शिशुपालवधम्’ ही पर्याप्त है।

‘पुरातन-प्रबन्ध-संग्रह’ में माघ द्वारा एकमात्र महाकाव्य की रचना किये जाने का कारण बताया गया है। माघ काव्य रचना करने के पश्चात् जब अपने पिता को दिखाते तत्व वे उनकी प्रशंसा करने के स्थान पर उनके काव्य की निंदा किया करते थे। इसलिये माघ ने काव्य रचना करने के पश्चात् उसे रसोई घर में रख दिया कुछ समय पश्चात् जब वह पुस्तक एक प्राचीन पाण्डुलिपि के समान प्रतीत होने लगी तब माघ उसे अपने पिता के पास ले गये जिसको देखकर उनके पिता ने प्रसन्न होकर कहा कि यह वास्तविक कविता है किन्तु जब माघ ने उन्हें सम्पूर्ण वस्तुस्थिति से अवगत करवाया तो उन्होंने क्रोधित होकर माघ को शाप दिया कि तुमने मुझसे छल किया है, अतः अब तुम कुछ नहीं लिख पाओगे। तत्पश्चात् उनके पिता का स्वर्गवास हो गया और अत्यन्त धनी होने के कारण माघ का जीवन विलासिता पूर्ण हो गया किन्तु उनके महाकाव्य ‘शिशुपालवधम्’ ने उनको प्रसिद्ध महाकवि की उपाधि से विभूषित कर दिया।

‘शिशुपालवधम्’ महाकाव्य 20 सर्गों में विभक्त है जिसमें 1650 पद्य हैं। माघ ने महाभारत को आधार बनाकर अपनी मौलिक कल्पनाओं द्वारा इस महाकाव्य की रचना की है। इसके अन्तर्गत रस, गुण, अलंकारिक काव्य तत्त्वों का एक विशाल संदेह दिखायी पड़ता है। महाकवि माघ यश प्राप्ति के लिये श्रीकृष्ण का गुणकीर्तन कविवंशवर्णनम् के प्रसंग में करते हुए-

श्रीषब्दरम्यकृतसर्गसमाप्तिलक्ष्य लक्ष्मीपतेश्ररितकीर्तनमात्रचारू।
तस्यात्मजः सुकविकीर्तिदुराषयाऽदः काव्य व्यधत्वषिषुपालवधम्।।[68]

संस्कृत समीक्षकों में माघ के प्रति यह भी धारणा प्रचलित है कि महाकवि माघ ने अपने महाकाव्य के निर्माण से पूर्व भारवि कृत ‘‘किरातार्जनीयम्’’ का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया होगा और उन्हें (भारवि) परास्त करने के लिये ही ‘शिशुपालवधम्’ महाकाव्य की रचना की होगी। ‘‘तावद् भा भारवेभीति यावन्याघस्य नोदयः उक्ति का भी ही तात्पर्य है क्योंकि ‘‘किसतार्जुनीयम्’’ और ‘‘षिषुपालवधम्’ के अध्ययन से महाकवि माघ पर भारवि का स्पष्ट प्रभाव दिखायी पड़ता है। अतएव शिशुपालवधम् महाकाव्य लिखने का प्रेरणाश्रोत भारवि का किरातार्जुनीयम् भी माना जा सकता है।

इस प्रकार महाकवि माघ का एकमात्र उपलब्ध ग्रन्थ ‘शिशुपालवधम्’ प्राप्त होता है लेकिन महाकवि माघ की कृति सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य जगत एवं समीक्षकों के समक्ष अमरकृति बन गयी। एकमात्र रचना से ही महाकवि माघ जीवन के विभिन्न अनुभवों का संदेश पाठकों एवं कवियों के लिए दे गये।

शिशुपालवधम् का महाकाव्यत्व[सम्पादन]

‘काव्य’ शब्द संस्कृत भाषा में बहुत प्राचीन है जिसे ‘कवि’ के कर्म के रूप में देखा जाता है। ‘कवेः कर्म काव्यम’ (कवि + व्यत्) यह ‘कवि’ शब्द च्कु अथवा च्कव् धातु (भ्वादि आत्मनेपद-कवेट) से बना है जिसके तीन अर्थ हैं-

  • 1. ध्वनि करना,
  • 2. विवरण देना, और
  • 3. चित्रण करना।

इस प्रकार शब्दों के द्वारा किसी विषय का आकर्षक विवरण देना या चित्रण करना ही काव्य कहलाता है।

लौकिक संस्कृत भाषा में काव्य-रचना का आरम्भ महर्षि वाल्मीकि से हुआ। इन्होंने राम को नायक बनाकर आदिकाव्य ‘रामायण’ की रचना की। महर्षि वाल्मीकि ने जिस काव्यपद्धति का आरम्भ किया था उसे कुछ कालतक सर्गबन्ध रचना कहा जाता रहा। बाद में इसे ही महाकाव्य कहा गया। अधिकांश विद्वानों की मान्यता है कि संस्कृत में ‘महाकाव्य’ विद्या की कल्पना का मूल ‘आदिकाव्य’ ‘वाल्मीकि रामायण’ है जिसके उत्तरकाण्ड में निम्नलिखित श्लोक मिलता है।

किम्प्रमाणमिदं काव्यं का प्रतिष्ठा महात्मनः।
कर्ता काव्यस्त महतः क्व चासौ कविपुग।।[69]

‘महाभारत’ में भी ‘महत्’ शब्द के प्रयोग के औचित्य को बताया गया है।

महत्त्वाद भारत्वाद च महाभारतमुच्यते

महाकाव्य को विधा के रूप में प्रतिष्ठापित करने वाले आचार्यों की लम्बी परम्परा रही है। जिसमें आचार्य भामह, दण्डी, रूद्रट मम्मट, विश्वनाथ और जगन्नाथ इत्यादि प्रमुख हैं। लक्ष्यग्रन्थ पहले बना तत्पश्चात् लक्षणग्रन्थ का निर्माण हुआ। आदिकाव्य ‘रामायण’ तथा कालिदास के काव्यों का अध्ययन करने के पश्चात् समालों-चकों ने महाकाव्य के शास्त्रीय स्वरूप को तथा आलंकारिको ने उसके लक्षण को अपने अलंकार ग्रन्थों में प्रस्तुत किया।

आलंकारिक मे आचार्य दण्डी का महाकाव्य लक्षण[70] प्राचीनतम् माना जाता है।

आचार्य रूद्रट ने काव्यांलंकार[71] में आचार्य दण्डी द्वारा निर्दिष्ट काव्यलक्षणों कुछ विस्तार से दुहराया है। रूद्रट ने उतने ही विषय के समावेश तथा अलंकार को चित माना है जिससे कथावस्तु का विच्छेद न हो सके। इन्होंने रस पर विशेष बल दिया है जो उनकी विशेषता है। वे त्रच्छु, नगर, उद्यानादि वर्णनों को अनिवार्य मानते हैं।

प्रामाणिक रूप में आचार्य विश्वनाथ के लक्षण को स्वीकार किया जाता है। इनके समय 1350 ई0 तक उनके महाकाव्य लिखे जा चुके थे। ‘साहित्यदर्पण’ में महाकाव्य का लक्षण इन्होंने इस प्रकार किया है।’[72]

सर्गबन्धो महाकाव्य तत्रैको नायकः सुरः।।
सदूषं क्षत्रियों वापि धीरोदत्तगुणान्वितः।।
एकवंषभवा भूपाः कुलजा बहवोऽपि वा।।
शृंङ्गांरवीरषान्तानामेकोंऽपि रस इत्यते।
अगांनि सवैऽपि रसाः सर्वे नाटकसन्धयः।।
इतिहासोद्भवं वृत्तमन्यद्धासज्जनाश्रयम्।
चत्वारतस्य वर्गाः स्युस्तेष्वेकं च फलं भवेत्।।
आदौ नमस्क्रियाषीर्बा वस्तुनिर्देष एव वा।
कवचिन्निन्दा खलादीनाम् सतां च गुणकीर्तनम्।।
एकवृत्तमयैः पद्यैरवसानेऽन्यवृत्तकैः।
नातिस्वल्पा नातिदीर्घाः सर्गा अष्टाधिका इह।।
नानावृत्तमयः क्वापि सर्गः कष्चन दृष्यत।
सर्गान्ते भाविसर्गस्य कथायाः सूचनं भवेत्।।[73]

1. महाकाव्य का सर्गबद्ध होना आवश्यक है जो प्रबन्ध तत्त्व के गुणार्थ सन्धियों से युक्त हो।

2. उसका नायक पाठकों को संदेश देने वाला धीरोदत्त, क्षत्रिय अथवा देवता होना चाहिए।

3. यह आठ सर्गों से बड़ा और उनके वृत्त्वों (छन्दो) से युक्त होना चाहिए।

4. महाकाव्य की कथा इतिहास प्रसिद्ध हो जिसमें जीवन जगत तथा प्रफुटित विभिन्न अंगों का चित्रण सुन्दर रूप में किया जाय।

5. शृंगार वीर और शान्त रसों में से कोई एक रस अंगी रूप में होता है।

6. प्रकृति वर्णन के रूप में नगर, समुद्र पर्वत, सन्ध्या, प्रातःकाल, संग्राम यात्रा तथा ऋतुओं इत्यादि का वर्णन भी अपेक्षित है।

7. शैली में काव्य-सौष्ठव तथा काव्य के समस्त गुण होने चाहिए।

शिशुपालवधम्’ में श्रीकृष्ण के द्वारा युधिष्ठिर के राज सूय यज्ञ में चेदि नरेश शिशुपाल के वध का वर्णन है। इसमें वर्णनों की प्रचुरता को देखकर यदि इसे वर्णन प्रधान महाकाव्य कहे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। विषय प्रधान काव्य के अन्तर्गत भी यदि इसको लिया जाय तो भी असंगत नहीं होगा। वास्तव में यह काव्य विषय प्रधान ही प्रतीत होता है।

इसके नायक श्रीकृष्ण का चरित एक योद्धा के रूप में है। अन्य पात्रों में भी शौर्य प्रधान गुण अधिक मात्रा में मिलते हैं। इस काव्य के आद्योपरान्त पारायण से ज्ञात होता है कि उसमें श्रीकृष्ण के चरित के साथ ही क्षत्रिय जाति के क्रियाकलाप का भी सुन्दर वर्णन है। कथानक की दृष्टि से यह उच्चकोटि का महाकाव्य प्रतीत होता है। काव्यशास्त्रीय लक्षणकारों के अनुसार महाकाव्य में महाकाव्य के सम्पूर्ण लक्षण प्राप्त होते हैं। काव्य का मुख्य रस वीर है।74 अन्य रसों का भी यथोचित वर्णन हुआ है। इसका कथानक ‘महाभारत’ से लिया गया है। यह कथानक श्रीकृष्ण के जीवन की एक मुख्य घटना है। 120 सर्गों में निबद्ध इस काव्य के प्रत्येक सर्ग में न तो 50 से न्यून और नहीं 150 से अधिक श्लोक हैं। काव्य का प्रारम्भ वस्तुनिर्देशात्मक मंगलाचरण से हुआ है-

श्रियः पतिः श्रीमति शासिंतु जगज्जगान्निवासों वसुदेवसद्यनि।
वसत्त्ददर्षावतरन्तमम्बराद्धिख्यगर्भाङ्गभुर्व मुनि हरिः।।[75]

‘‘शिशुपालवधम्’ के प्रत्येक सर्ग में एक ही छन्द है तथा एक ही छन्द का प्रयोग मिलता है। सर्ग के अन्त में लक्षणानुसार छन्द परिवर्तन किया गया है। केवल चतुर्थ सर्ग ही इसका अपवाद है जिसमें अनेक छन्दों का प्रयोग हुआ है। ‘शिशुपालवधम्’ में सूर्योदय, सूर्यास्त इत्यादि का वर्णन भी मिलता है जिसे लक्षणकारों में अपेक्षित माना है। तृतीय सर्ग में द्वारिका नगरी अथवा समुद का वर्णन प्राप्त होता है। सम्पूर्ण चतुर्थ सर्ग में रैवतक पर्वत का मनोहारी वर्णन किया गया है। पंचम सर्ग में मुख्य रूप से श्रीकृष्ण के शिविर का वर्णन है। षष्ठ, सप्तम और अष्ठम सर्ग सहऋतुओं के वर्णन से चमत्कृत है जहाँ पुष्प-चयन और जल-क्रीड़ा का भी प्रसंग आया है। नवम् सर्ग में नायिका नायक एवं चन्द्रोदय को वर्णित किया गया है। दशम सर्ग में रतिक्रीड़ा का वर्णन है। एकादश सर्ग प्राभाविक सौन्दर्य को दर्शाता है। द्वादश सर्ग में श्रीकृष्ण की सेना का रैवतक पर्वत से इन्द्रप्रस्थ की ओर प्रस्थान करने एवं यमुना नदी का वर्णन है। अन्तिम तीन सर्गों में युद्ध का वर्णन है।

‘शिशुपालवधम्’ में प्रसंगानुसार कहीं-कहीं दुर्जनों की निन्दा और सज्जनों की प्रशंसा की गई है। सात्यकि ने भगवान् श्रीकृष्ण और शिशुपाल के व्याजु से क्रमशः प्रशंसा और निन्दा की है।[76] सज्जन और दुर्जन के गुण दोषों को सोलहवें सर्ग में बताया गया है।77 महाकाव्य में यज्ञ का भी विवरण मिलता है।

विषय के आधार पर शिशुपालवधम् महाकाव्य का नामकरण किया गया है, क्योंकि शिवपाल का वध करना ही इस महाकाव्य का अभीष्ट है। माघ के पाण्डित्य ने ‘शिशुपालवधम्’ महाकाव्य का नामकरण किया गया है क्योंकि शिशुपाल का वध करना है। इस महाकाव्य का अभीष्ट है। माघ के पाण्डित्य ने ‘शिशुपालवधम्’ महाकाव्य को आदर्श महाकाव्य का रूप प्रदान कर उसे उच्चकोटि के महाकाव्यों में स्थान दिलाया है। मल्लिनाथ ने ‘शिशुपालवधम्’ महाकाव्य की विशिष्टता को इस प्रकार बताया है-

तेताऽस्मिन्यदुनन्दनः स भगवा वीरप्रधानोरसः
श्रंगांरादिभिरवांन् विजयते पूर्णा पुनर्वर्णना।
इन्इ्रप्रथ गमाद्युपायविषयष्चैद्यासादः फल धन्यो
महाकविवयं तु कृतिनस्तत्सूक्तिसंसेवनात्।।[78]

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह सिद्ध होता है कि शिशुपालवधम् सम्पूर्ण लक्षणों से युक्त एक महाकाव्य है। ऐसा प्रतीत होता है कि लक्षणकारों ने महाकाव्य को आधार बनाकर ही महाकाव्य के लक्षण निर्धारित किये हैं।