महाकवि सुबन्धु का व्यक्तित्त्व एवं कर्तृत्व

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वासवदत्ता कथा के कवि सुबन्धु ने अपने सम्बन्ध में सुजनैकबन्धुः 1 के अलावा कुछ नही कहा है। अतः उनके व्यक्तिगत जीवन और व्यक्तित्त्व के सम्बन्ध में भी देश और काल की तरह अनुमान ही आधार है। उनके ग्रन्थ से इतना अवश्य ही प्रकट होता है कि वे वैदिक धर्मावलम्बी थे। वासवदत्ता के प्रारम्भिक दो श्लोकों में उन्होंने विष्णु और विष्णु के अवतार भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति की है। 2 ग्रन्थ में अन्यत्र भी अन्य देवों की अपेक्षा भगवान् विष्णु या उनके अवतारों का स्मरण कुछ अधिक ही बार हुआ हैं। 3 इस आधार पर कहा जा सकता है कि वे वैष्णव थे। परम भागवत गरुड़ध्वज गुप्त सम्राटों के सम्पर्क में रहने वाले सुबन्धु का विष्णु पदावलम्बी होना स्वाभाविक भी लगता है। लेकिन अन्य वैदिक देवों के प्रति भी उनका सहिष्णु भाव था। यह भी गुप्तों के प्रभाव का द्योतक है। कवि ने भगवान शिव के प्रति भी भक्ति भाव प्रकट किया है। 4 नास्तिक बौद्धमतावलम्बियों के प्रति उनका अनादर भाव भी स्पष्ट है। 5 बहुत सम्भव है कि यह उस युग का प्रभाव हो जब उद्योतकर आदि वैदिक विद्वान् बौद्धमत का सतर्क प्रचण्ड खण्डन करते हुए वैदिक धर्म की पताका फहरा रहे थे। भारतीय ज्ञान-विज्ञान की प्रायः सभी शाखाओं से कवि ने अपना परिचय प्रकट किया है। 6 इससे उनके बहुमुखी पाण्डित्य का आभास प्राप्त होता है। वासवदत्ता के दशवें तथा तेरहवें श्लोक से यह भी ध्वनित होता है कि किसी व्यक्ति की प्रेरणा से ये उसके प्रसाद के लिए नहीं अपितु सरस्वती की कृपा से स्वान्तः सुखाय की गयी थी।

महाकवि सुबन्धु गद्य के प्राचीन कवि हैं। इन्होंने एकमात्र रचना की जो, संस्कृत साहित्य में ‘वासवदत्ता’ के नाम से विख्यात है। कवि कि यह रचना कल्पना प्रसूत है। यदि हम सुबन्धु के विषय में दृष्टिपात करें तो इस सम्बन्ध में अनेक विरोधाभास है। क्या वासवदत्ता के प्रणेता सुबन्धु ही हैं? इस विषय में भी मतभेद है। कतिपय विद्वानों का मानना है कि सुबन्धु और बसुबन्धु एक ही हैं। आचार्य दण्डी सुबन्धु को ‘विन्दुसार’ मानते हैं और ऐसा भी मानते है कि काव्य-प्रतिभा का प्रदर्शन करने के पश्चात् ये राजा को प्रसन्न करके बन्धन से मुक्त हुए थे। इस तथ्य का वर्णन महाकवि दण्डी की अवन्तिसुन्दरी कथा में प्राप्त होता है।7

मैक्डोनल के अनुसार सर्वानुक्रमणी में सुबन्धु ऋग्वेद के रचनाकार माने गये हैं।8

ए0 रंग स्वामी दण्डी के मत का समर्थन करते हुए कहते है कि सुबन्धु ‘वासवदत्ता’ के रचनाकार हैं।9 परन्तु इसके साथ ही साथ यह भी प्रश्न उठता है कि किस कारण से ये राजा के बन्दी बने। किसी राजद्रोह के कारण अथवा किसी विपरीत आचरण के कारण। अभिनव गुप्त अपनी रचना ‘अभिनव भारती’ में यह मानते हैं कि जिन्होंने वासवदत्ता की रचना की वे ही सुबन्धु हैं।10

नामचन्द्र एवं गुणचन्द्र नामक विद्वान् जो कि 12वीं शताब्दी में हुए वे ‘नाट्यदर्पण’ के सुबन्धु को प्रमुख मानते हैं।11

इस सम्बन्ध में यह भी कहा जा सकता है कि आचार्य दण्डी ने सुबन्धु को ही नाट्यप्रणेता माना है। ऐतिहासिक तथ्यों पर यदि हम दृष्टि डालतें तो ज्ञात होगा कि तक्षशिला में जो विद्रोह हुआ वह विन्दुसार के ही राज्यकाल में हुआ।12

कुछ प्रमाणों द्वारा यह तथ्य समाने उपस्थित होता है कि दण्डी ने जिस घटना का वर्णन किया है, वह महाराज चन्द्रगुप्त और उसके मंत्री राक्षस की ओर ध्यान आकर्षित करती है; ऐसा इसलिए सम्भव है कि सर्वप्रथम राक्षस को बन्दी बनाकर और पश्चात् मंत्री के पद को ग्रहण करके मुक्ति प्रदान की गई हो। महाराज बिन्दुसार के यहाँ सुबन्धु नामक एकमंत्री का संकेत प्राप्त होता है।13

संस्कृत के सुप्रसिद्ध विद्वान् पी0वी0 काणे इसे सत्य नही मानते है कि नाट्यकार सुबन्धु तथा कथाकार सुबन्धु दोनों एक हैं।14

कथाकार सुबन्धु ने अपनी कृति में अपने वंश का कहीं भी उल्लेख नही किया है। ऐतिहासिक तथ्य भी प्राप्त नहीं होते अतः इनका वंश वर्णन कर पाना अत्यन्त ही दुष्कर है। ये किस देश में उत्पन्न हुए इस विषय में भी विद्वान् एकमत नही है। जिन मतों को विद्वानों ने प्रस्तुत किया वे सभी अपने अपने मत को श्रेष्ठ घोषित करते है। कुछ विद्वान् इन्हें उत्तरी कतिपय बंगाली तथा अन्य दक्षिणी मानते हैं।

महाकवि सुबन्धु उत्तरी हैं। इनके पक्ष में बाणभट्ट के ‘हर्षचरित’ में एक श्लोक उद्धृत है जिनमें लेखकों की प्रवृत्त्यिं को वर्णित किया गया है-

श्लेष प्रापमुदीच्येषु प्रतीचेढवर्थमातृक्रम।
उत्प्रेक्षा दक्षिणात्येषुगोडेढवक्षरडम्बरः॥ (प्रस्तावना श्लोक, 7, हर्षचरित)

अर्थात् श्लेष की रचना उत्तरी भारत में, अर्थ पश्चिम में, उत्प्रेक्षा दक्षिण में तथा अक्षर पूर्वी क्षेत्रों में हुआ है। इस आधार पर सुबन्धु उत्तर भारत के हुए।

उपर्युक्त रचनाकार सुबन्धु श्लेष से युक्त रचना में सिद्धहस्त हैं, उन्होंने अपनी सम्पूर्ण प्रतिभा का समावेश अपने श्लेषों में प्रयुक्त किया है। महाकवि बिल्हण काश्मीर को ‘शारदादेश’ कहते है और यहीं पर योग्य और कुशल रचनाएँ हुई तथा योग्य काव्य-प्रणेताओं ने यहीं जन्म लिया ऐसा मानते है। सुबन्धु श्लेष के कारण इसलिए प्रसिद्धि को प्राप्त हुए क्योंकि अपनी कृति में इन्होंने ‘सरस्वती प्रसाद’ को स्वीकार किया है। बाण के एक श्लोक के आधार पर कविवर सुबन्धु ने उन विशेषताओं का वर्णन किया है जिनमें श्लेष की प्रधानता थी पर यह मत पूर्णतः सिद्ध नहीं है। कवि का भौगोलिक तथा आभ्यान्तरिक अनुशीलन यह सिद्ध करता है कि ये दक्षिण भारत के थे।

नरसिंह वैश्य का मानना है कि वे विक्रमादित्य के सभापण्डित थे और इनकी मृत्यु हो जाने के बाद इन्होंने एक कथा ‘वासवदत्ता’ की रचना की। सुबन्धु कुसुमपुर का भी संकेत करते हैं। यदि हम वायु पुराण और भाष्य का अध्ययन करें तो हमें यह उल्लेख प्राप्त हो जायेगा। क्योंकि सुबन्धु विक्रमादित्य से सम्बन्ध रखते थे और उनकी राजधानी पाटलिपुत्र (पटना) थी, अतः ये कहीं न कहीं पटना से सम्बन्धित है।

डॉ0 मनमोहन घोष का मत है कि सुबन्धु बंगाली थे। 16 इस मत के लिए उन्होंने कई अलग-अलग प्रयाण प्रस्तुत किये। वासवदत्ता पर यदि दृष्टिपात करें तो उसमें एक अंश ‘पथिक जन हृदयं मत्स्यं ग्रहीतुं मकरकेतोः पलाव इव पाटलिपुष्पमदृश्यत’। 17 जिसका अर्थ है कि जैसे पाटलिपुत्र का पुष्प विरहीजनों के हृदयरूपी मत्स्य को पकड़ने के लिए कामदेव की वल्छी (मछली पकड़ने की कंटिया) के समान दिखाई पड़ रहा था। इस अंश के अन्तर्गत पाटलिपुत्र की तुलना कामदेव के ‘पलाव’ से की गई है। इस प्रकार घोष ने इन्हीं तथ्यों के आधार पर इन्हें बंगाली घोषित किया।

वासवदत्ता की प्रस्तावना के एक श्लोक में ‘दामोदर’ शब्द का प्रयोग किया गया है जो कृष्ण का पर्याय है और इस पर ध्यान देने पर यह प्रतीत होता है कि यह वैष्णव शक्ति का परिचायक है। कुछ विद्वान् यह मानते है कि यह सुबन्धु के गुरु का नाम है। पद्य संख्या 2528 में ये कपिल दामोदर से सम्बन्धित लगते हैं। इस स्थिति की पुष्टि नहीं हो पाने के कारण इस सम्बन्ध में अनेक मतभेद है क्योंकि ये दण्डी के भी पूर्वज माने जाते है और दक्षिण के राजपुताना तक इनकी ख्याति पहुँच जाने के कारण ये सुबन्धु के ही गुरु सिद्ध होते है।18

निष्कर्षतः उक्त प्रमाणों द्वारा यह सिद्ध होता है कि सुबन्धु का सम्बन्ध निश्चित रूप से बंगाली परिवार से था ओर इन्होंने शास्त्रों के अध्ययन किसी गुरु के माध्यम से प्राप्त किये होगें। रामायण, महाभारत तथा मीमांसा दर्शन से इनको विशेष लगाव था।19

कर्तृत्व[सम्पादन]

महाकवि सुबन्धु की एकमात्र कृति वासवदत्ता ही प्राप्त होती है। यद्यपि कवि पुरातन रचनाओं से प्रभावित है तथापि उसकी उच्चकोटि की कल्पनाएँ श्लाघनीय एवं रोचक है। कवि नायिका के लिए पुरातन साहित्य का ऋणी है। शेष कथानक उसकी मौलिक देन है। यद्यपि रुढ़ियों का प्रयोग प्राचीन साहित्य से समादृत है परन्तु उनकी कल्पनाएँ अपनी हैं। कहीं-कहीं कवि ने श्लेष के अतिमोह के कारण उपमानों का पिष्टपेषण कर दिया है, जिससे कथानक के प्रवाह को बाधा पहुँचती है। इसीलिए इस कृति में कथा स्वल्प है और वर्णन अधिक हो गया है। अतः यही कहना समीचीन है कि सुबन्धु ने केवल एक ही ग्रन्थ ‘वासवदत्ता’ कथा की रचना की थी जो उसकी कीर्ति को अद्यापि अक्षुण्ण बनाए हुए है।

सुबन्धु का स्थिति काल[सम्पादन]

बोधिचिन्तोत्पादन शास्त्र, जो आचार्य बसुबन्धु के ही ग्रन्थ बताये जाते है, का अनुवाद कुमार जीव ने 404-405ई0 के अन्दर किया था।20

कुमार जीव ने बसुबन्धु का जीवन चरित भी लिखा था जिसका अनुवाद चीनी भाषा में 401-409ई0 में हुआ था।21 अतः यही प्रमाणित होता है कि आचार्य बसुबन्धु पांचवी शताब्दी ई0 के प्रथम दशक के पूर्व ही कम से कम 30-40 वर्ष पूर्व हो चुके थे। बसुबन्धु का चौथी शताब्दी में होना कई विद्वानों ने माना है। 22 वासुदेव उपाध्याय का यह मत अत्यन्त समीचीन लगता है कि बसुबन्धु गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त के समसामयिक तथा आश्रित थे तथा इनका काल 280 से 366ई0 तक माना जाना चाहिए। यदि बसुबन्धु (280-360ई0) के शिष्य दिंगनाग को अपने गुरु से 30 वर्ष भी छोटा माना जाय तो दिंगनाग का स्थिति काल 310ई0 से 375ई0 तक मानना उचित होगा। अब दिंगनाग तथा सुबन्धु का भी प्रत्याख्यान करने वाले उद्योतकर को यदि दिंगनाग से पच्चीस वर्ष भी छोटा माने और उन्हें भी दिंगनाग की तरह लगभग 65 वर्ष की आयु वाला ही माने तो उद्योतकर का स्थितिकाल 335 से 400 ई0 तक आसानी से माना जा सकता है। उद्योतकर का स्मरण करने वाला वासवदत्ता कथाकार सुबन्धु नैयायिक उद्योतकर से कुछ काल बाद उत्पन्न हुए थे। कम से कम इतना पश्चातकालिक अवश्य था कि उनके प्रौढ़ होने तक उद्योतकर न्यायशास्त्र की कुतार्किक बसुबन्धु आदि की आलोचनाओं को ध्वस्त कर, प्रतिष्ठा करने वाले आचार्य के रूप में लोक में विख्यात हो चुके थे। अब यदि सुबन्धु को उद्योतकर से आयु में 40 वर्ष भी छोटा माने और उनकी आयु 60-65 वर्ष भी रही हो तो उनका स्थितिकाल 375 से 435-40ई0 तक मानने में कोई असंगति नहीं हैं।

सुबन्धु और धर्मकीर्ति[सम्पादन]

कतिपय टीकाकारों के साक्ष्य के बावजूद सुबन्धु द्वारा धर्मकीर्ति के किसी अलंकार ग्रन्थ का स्मरण मानना सम्भव नहीं है। हाल 24 तथा पीटर्सन 25 ने यद्यपि आनन्दवर्धन द्वारा तथा सुभाषित संग्रहों में उद्धृत धर्मकीर्ति को बौद्ध नैयायिक धर्मकीर्ति से अभिन्न मानते हुए उन्हें किसी अलंकार ग्रन्थ का रचयिता माना हैं तथापि ऐसी मान्यता प्रमाणित नहीं हो पाती है क्योंकि धर्मकीर्ति द्वारा रचे गये ग्रन्थों की सूची में किसी अलंकार ग्रन्थ का उल्लेख नहीं मिलता है। अपि च वासवदत्ता के जिस स्थल के आधार पर ऐसा कहा जाता है वह सभी पाण्डुलिपियों में प्राप्त नहीं होता है।26 अतः इसकी प्रमाणिकता भी संदिग्ध है। जो हो इस प्रसंग में विद्वान् लेवी का मत27 ही स्वीकार्य लगता है कि सुबन्धु द्वारा धर्मकीर्ति के किसी ग्रन्थ का स्मरण असमीचीन है।

यहीं सुबन्धु ने स्थितिकाल से सम्बन्धित कुछ अन्य बातों पर भी विचार कर लेना आवश्यक है। परम्परा सुबन्धु को वररूचि का भागिनेय बताती है28 कुछ विद्वानों ने भी इस मान्यता पर आस्था प्रकट की है।29

सुबन्धु और वररूचि[सम्पादन]

इतिहास से हमें अनेक वररूचियों का अस्तित्व ज्ञात होता है। एक वारूचि का उल्लेख भविष्य पुराण तथा कथासरित्सागर में महाराज नन्द के समय मिलता है। 30 किसी वररूचि काव्य का उल्लेख महाभाष्यकार पतञ्जलि ने भी किया है। 31 एक वररूचि को राजशेखर ने कण्ठाभरण का रचयिता बताया है। 32 एक वररूचि को विक्रमादित्य के नवरत्नों में भी बताया गया है। 33 एक वररूचि ‘पत्रकौमुदी’ तथा ‘विद्यासुन्दर’ नामक रचनाओं का कवि हो चुका है जो स्वयं अपने को उज्जयिनी के किसी विक्रमादित्य का सभ्य बताया है।34

वासवदत्ता के दसवें श्लोक में एक विक्रमादित्य का सुबन्धु ने भी स्मरण किया है तो क्या विक्रम के नवरत्नों में स्मृति वररूचि और विद्यासुन्दर का कवि वररूचि एक ही व्यक्ति है? क्या किसी विक्रमादित्य का स्मरण करने वाला सुबन्धु इसी का भागिनेय है? नवरत्नों में उल्लिखित वररूचि तथा विद्यासुन्दर के कवि वररूचि की अभिन्नता कुछ लोगों ने मानी है। 35 कुछ लोगों ने वासवदत्ता के दशवें श्लोक में ‘नवका’ पदों में नवरत्नों का संकेत स्वीकार किया हैं किन्तु नवरत्नों वाली अनुश्रुति की महत्त्वहीनता सिद्ध हो चुकी है। 36 अतः इसके आधार पर कोई निष्कर्ष निकालना असंगत है। विद्यासुन्दर के कवि द्वारा उल्ल्खित विक्रमादित्य बहुत सम्भव है कि पुलकेशीन द्वितीय या उसका पुत्र है। शतपथ ब्राह्मण के भाष्यकार हरिस्वामी (सातवीं शताब्दी का पूर्वाद्ध) ने अपने को अवन्तिनाथ विक्रम का धर्माध्यक्ष लिखा है। 37 इसी समय के लौहणेर ताम्रशासन पत्र में पुलकेशीन द्वितीय ने अपने को साहसैकरति विक्रमनाथ वाला घोषित किया है। 38 ऐहोल के शिलालेख से ज्ञात होता है कि लाटमालव ओर गुर्जर प्रान्त इसकी अधीनता में थे। 39 इस प्रकार यह अवन्तिनाथ भी था। ‘पत्रकौमुदी’, ‘विद्यासुन्दर’ तथा ‘लिंगविशेष विधि’ का रचनाकार वररूचि इसी का सभ्य था। अस्तु यदि कभी यह निःसन्देह रूप से प्रमाणित हो सके तो निश्चय ही वासवदत्ता कथाकार सुबन्धु को सातवीं शताब्दी ई0 के पूर्वाद्ध में वर्तमान पुलकेशनी द्वितीय या उसके पुत्र के शासनकाल में मानना पड़ेगा ओर तब इसे वररूचि का भागिनेय भी माना जा सकता है। साथ ही तब इसे बाण का समकालीन भी मानना पड़ेगा। वासवदत्ता के सम्बन्धमें हर्षचरित में बाण के गतयाकर्णगोचरम् कथन से भी स्पष्ट है कि बाण ने वासवदत्ता की ख्याति सुनी थी किन्तु उसे देखा नही था किन्तु सम्प्रति यह एक सम्भावना भर है।

सुबन्धु को वररूचि का भागिनेय मानने वाली परम्परा का समर्थन नन्द मौर्य युगीन इतिहास से किया जा सकता है। कदाचित् कथासरित्सागर आदि में उल्लिखित नन्दकालीन वररूचि ही वासवदत्ता नाट्याधार के कवि सुबन्धु का मातुल है। इसको न जानने के कारण बाद के लोगों ने वासवदत्ता कथाकार सुबन्धु को ही वररूचि का भागिनेय बता दिया जो भी हो यह एक संभावना मात्र है। वासवदत्ता के बहुचर्चित दशवें श्लोक का कंकः भी विद्वानों में चर्चा का विषय रहा है। श्री आर0सी0 मजूमदार ने इसका भागवत40 में उल्लिखित अत्याचारी कंक. राजाओं से सम्बन्ध जोड़ना चाहा है।41

श्री आर0सी0 मजूमदार के अनुसार वासवदत्ता में कंक[सम्पादन]

चूँकि सुबन्धु की तिथि छठी शताब्दी ई0 का उत्तरार्द्ध है अतः यदि सुबन्धु की तिथि सत्य है तो थानेश्वर के वर्णनों के पूर्व ही कंकों को होना चाहिए किन्तु एतत् सम्बन्धी कोई साक्ष्य अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है न ही मजूमदार साहब कोई साक्ष्य उपस्थित कर सके है। अवधेय है कि भागवत पुराण में कंकों को गर्दभिल्लों के पश्चात् बताया गया है। संवत् प्रवर्तक अवन्तिनाथ विक्रमादित्य जैसा कि डॉ0 राजबली पाण्डेय ने प्रमाणित किया है, गर्दभिल्ल वंश का था। यदि भागवत के उल्लेख में विश्वास किया जाय, अपि च सुबन्धु के कंकः से भागवत के कंकों का ही संकेत माना जाय तो कहना चाहिए कि सुबन्धु ई0 सन् की पहली या दूसरी शताब्दी में हुए थे लेकिन ऐसा कहना कदाचित् सम्भव नहीं है। कम से कम जब तक सुबन्धु द्वारा उल्लिखित गुणाढ़्य तथा उद्योतकर को ई0पू0 उत्पन्न सिद्ध नहीं कर दिया जाता है ऐसा मानना सम्भव नहीं है।

अब तक के विवेचन से यह कहा जा सकता है कि सुबन्धु पांचवी शताब्दी के पूर्वार्द्ध में विद्यमान थे।

कतिपय विद्वान ऐसा स्वीकार करते है कि सुबन्धु बाण से परवर्ती थे। इस विषय में उन्होंने अपने मत दिये और ऐसा स्वीकार किया कि सुबन्धु ने बाण से सामग्री प्राप्त की। वासवदत्ता में जो इन्द्रायुध पद आदि को प्रयुक्त किया गया है वह चन्द्रापीड के इन्द्रायुध घोड़े से किसी न किसी रूप में प्रभावित लगता है। वाण ने हर्षचरित में तथा पतंजलि ने पतंजलि योगसूत्र में वासवदत्ता का संकेत किया है। इन तथ्यों से एक ही निष्कर्ष निकलता है कि सुबन्धु बाण के पाश्चात् हुए परन्तु यह सत्य है इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता है। टीकाकार भानुचन्द्र (1600ई0) ने अपनी कथा ‘कादम्बरी’ को अद्वितीय रचना बताया है और वासवदत्ता तथा वृहत्कथा की ओर संकेत किया हैं काणे महोदय ने सप्रमाण वर्णित किया है कि सुबन्धु वाण के पश्चात् हुए और उन्होंने अपने हर्षचरित में वासवदत्ता का वर्णन किया है-

कविनामगलद्दर्पो नूनं वासवदत्तया।
शक्त्येवपाण्डुपुत्राणां गतयाकर्णगोचरम्॥

वामन (800ई0) ने अपनी कृति ‘काव्यालंकार सूत्रवृत्ति’ में वासवदत्ता ओर कादम्बरी से कतिपय उद्धरण दिये हैं इसलिए इन दोनों का काल निर्धारण 750ई0 से पूर्व होना स्वीकार किया है। कविराज (1209ई0) ने राघवपाण्डवीय में सुबन्धु, वाणभट्ट और स्वयं का भी उल्लेख किया है। यदि हम सुबन्धु के प्रयोगों पर दृष्टि डालें तो उनकी रूढ़ियों द्वारा यह स्वीकार कर लेना अनुचित होगा कि बाण परवर्ती है। इसके विपरीत होने पर बाण पश्चात् के हो जायेंगे यही तथ्य हमें वृहत्कथा में भी प्राप्त होता है क्योंकि इसके द्वारा ही सुबन्धु ने प्रेरणा प्राप्त की।

‘दशकुमारचरित’ के रचनाकार आचार्य दण्डी ने अपनी इस रचना में ‘वासवदत्ता’ का उल्लेख किया है परन्तु उन्होंने ऐसा क्यों किया इसके पीछे कोई विशेष कारण दृष्टव्य नहीं होता। आलंकारिक दण्डी और काव्यकार दण्डी में भी पर्याप्त मतभेद है।42 इसके प्रमुख समर्थनकर्ता ‘वाचस्पति गैरोला’ है। भोलाशंकर व्यास, सुबन्धु, दण्डी और बाण को समान क्रम में स्वीकार करते हैं।43 इसके अतिरिक्त ‘अमरूशतक’ में सुबन्धु दृष्टिगोचर होते हैं। इनका समय वैसे तो निर्धारित नहीं है फिर भी वामन ने इसकी प्रशंसा की है अतः सुबन्धु का स्थितिकाल अष्टम शतक का माना जाता है।

वैदुष्य[सम्पादन]

कविकर्म में परिश्रम को कवि ही जानता है।44 सागर की गहराई को आपाताल निमग्न मन्थाचल ही जानता है।45 ऐसा कोई ज्ञान या शिल्प नही हैं, ऐसी कोई विद्या या कला नहीं है, जो काव्य के अंग न हो।46 लोक का स्थावरजंगमात्मक लोक व्यवहार का, शास्त्रों-छन्दः व्याकरण अभिधान कोष कलाचतुर्वर्गगजतुरगखगादि लक्ष्य ग्रन्थों का, महाकवियों के काव्यों का तथा इतिहास पुराण का विमर्श सफल कवित्व के लिए आवश्यक है। वासवदत्ता के कवि सुबन्धु ज्ञान, विज्ञान की अनेक शाखाओं का यथापेच्छित सम्यक् ज्ञान रखते थे। उनके एतद् सम्बन्धी वर्णनों में अनुभूति की गहराई या सहानुभूति की ईमानदारी प्रकट है। वह लोक वृत्त-स्थावर ओर जंगम बहुरूप प्रकृति का साक्षात् अनुभव रखता था। शास्त्रों में भी लगभग सबमें उनकी गति थी। भट्टि, माघ और हर्ष आदि की तरह उन्होंने काव्येत्तर विधाओं का विस्तार से वर्णन तो नही किया है किन्तु वासवदत्ता में उनका जितना भी उल्लेख मिलता है उससे उनकी बहुज्ञता प्रमाणित हो जाती है।

लोक जीवन से कवि का निकट परिचय मनुष्यों, पशुओं और पक्षियों के स्वाभाविक वर्णनों में अनेकत्र हुआ है। भोर ही रात के वर्णन में प्रबुद्धाध्ययन कर्मठ मठों का वर्णन,47 गलियों में विमासरागमुखरकार्पटिकों का वर्णन48 तत्कालीन लोक जीवन एक सही दृश्य उपस्थित करता है।

सर्पस्नेहइव कर युगललालितोपि शिरसाधृतोपि न कटुत्वम् जहाति 49 और तालफलरसइवापातनधुरः परिणाम विरसस्तिक्तश्च50 सरसों के तैल और ताल फल रस के प्रति कवि के ज्ञान को प्रकट करते है। विन्ध्याटवी के वर्णन में दूर से गिरने के कारण फूटे हुए ताल फल के रसों से गिले अपने हाथों को चाटते हुए वानरों का वर्णन51 निर्झरों के उपान्त में बैठे हुए जीवन जीवक मिथुनों द्वारा लैलिह्यमान विविध फल रसों का वर्णन कवि के वन्य जीवों के वृत्तों के साथ परिचय को प्रकट करता है।

इसी प्रकार रेवा के वर्णन में उपकूलसंजातनलनिकुंजपुंजित कुलाय कुक्कुट घटा द्यूतकारमैरवतीरया तथा नलिनीनिकुंजपुंजव कोट ककुटुम्बिनी निरीक्ष्यमाण वृद्धशफरया52 में कवि के सूक्ष्म निरीक्षण का प्रमाण मिलता है। इसी प्रकरण में खंजरीट मिथुन निधुवनदर्शनोपजातिनिग्रहण कौतुक किरात शत रवन्यमान स्थ पुटिततीरमा53 का वर्णन किरातों की खंजरीट मिथुन के निधुवन के दर्शन से उस स्थान पर धन मिलने की मान्यता से कवि के परिचय का प्रमाण है। प्रवाह को रोककर ऊपर लायी हुई निम्न देश में बहने वाली नदी का वर्णन कवि के साक्षात् अनुभव की वस्तु लगती है। इसी प्रकार कुरुदेश ढक्कमेवधन सारसार्थवाहिन्य कुरुदेव से कवि के निकट परिचय को प्रकट करता है। कोकिल की परपुष्टता और जली कसीं की रक्ताकृष्टि वर्णन से इन जीवों के स्वभाव से कवि का परिचय भी प्रकट होता है। लाटी, अपरांत, केरली, मालव्य और आन्ध्र पुरन्ध्रियों के वर्णन से तत्तद् देश की सुन्दरियों से कवि के विशेष परिचय को प्रमाणित करता है। मालिनी, तुंगभद्रा, नर्मदा, गोदावरी और गंगा के वर्णन प्रसिद्ध नदियों से कवि के परिचय को प्रकट करते है।

सन्ध्याकाल के समय कथा श्रवणोत्सुक जनों द्वार शिशुओं के कलरव निवारण में क्रोध, लोरियाँ गाकर बच्चों को थपकियाँ लगाकर सुलाती हुई महिलाओं का वर्णन, धूल में लोटकर उठी हुयी बसेरा के लिए कलह विकल कलविंकों का कलरव वर्णन, गाँव के वृक्षों पर बसेरा लेते हुए कौओं का वर्णन, कवि के लोक जीवन से निकट परिचय का प्रमाण प्रस्तुत करता है। समुद्र का वर्णन भी समुद्र से कवि की अभिज्ञता को प्रकट करता है। इस प्रकार लोक जीवन से कवि के निकट परिचय को प्रकट करने वाले अनेक स्थल वासवदत्ता में आसानी से देखने को मिल सकते हैं।

शास्त्रज्ञान[सम्पादन]

सुबन्धु को विविध शास्त्रों का भी ज्ञान था। किसी शास्त्र के ज्ञान का काव्य में उन्होंने कहीं विस्तृत उपयोग नहीं किया है जिससे उस शास्त्र के सम्बन्ध में उनके ज्ञान की सीमा को जाना जा सके किन्तु जितना उल्लेख मिलता है उससे कवि की बहुज्ञता का प्रमाण मिल जाता है। ‘वैदस्येवमूरिशाखालंकृतस्य’ वासवदत्ता के इस वाक्य से अनेक शाखाओं वाले वेद से कवि का परिचय प्रकट होता है। ‘उपनिषदमिवानन्दमेकम्उद्यौतमन्तीम्’ इस वाक्य से आनन्दवादी उपनिषदों से कवि का परिचय स्पष्ट होता है। न्यायविद्या और न्यायविद्या के आचार्य उद्योतकर से भी उसने अपना परिचय अनेकत्र प्रकट किया है।

बौद्ध दर्शन का भी उन्होंने अनेकत्र उल्लेख किया है, जिससे उनके बौद्ध दर्शन ज्ञान की पुष्टि होती है। मीमांसा दर्शन से भी कवि ने अपना परिचय प्रकट किया है। छन्द, शास्त्र का तो वे पण्डित ही है। कुसुम विचित्रा, वंशपत्रपतिता, पुष्पिताग्रा, प्रहर्षिणी और शिखरिणी आदि नाना छन्दों का भी उन्होंने वासवदत्ता में उल्लेख किया है। चार्वाक के नास्तिक दर्शन से भी उन्होंने अपनी अभिज्ञता प्रकट की है। ज्योतिषशास्त्र का भी उन्हें अच्छा ज्ञान था। वासवदत्ता में ज्योतिष सम्बन्धी अनेक उल्लेख मिलते है।

संगीतशास्त्र में भी कवि ने अपना पाण्डित्य प्रदर्शन किया है। शब्दानुसान-व्याकरणशास्त्र से भी कवि ने अपना परिचय अनेकत्र प्रकट किया है। पत्थरों की जातियाँ भी उन्हें ज्ञात थी। उन्होंने चुम्बक, द्रावक, आकर्षक और भ्रामक पत्थरों का उल्लेख किया है। धर्मशास्त्र में भी उन्हें अच्छा ज्ञान था। धर्मशास्त्र के अन्तर्गत व्यवहार शास्त्र से भी उन्होंने अपनी अभिज्ञता प्रकट की है। काव्यों और काव्यशास्त्र से उनका प्रगाढ़ प्रेम था। इस प्रकार की बहुज्ञता निःसंदिग्ध है। लोक और शास्त्र दोनों का सम्यक् ज्ञान उन्हें था जिसका उन्होंने यथेच्छ उपयोग अपने काव्य में किया है।

संस्कृत साहित्य में सुबन्धु का स्थान[सम्पादन]

सुबन्धु के वस्तुविन्यास, गुणों, रसों और अलंकारों की योजना तथा उसके दोषों की भी समीक्षा कर लेने के बाद संस्कृत साहित्य में सुबन्धु या उनकी कृति वासवदत्ता के स्थान का निर्धारण करना कुछ आसान है। रस और वस्तु की योजना की दृष्टि से जिनका किसी काव्य में अनिवार्य महत्त्व होता है सुबन्धु की वासवदत्ता का स्थान नगण्य है किन्तु अलंकारों की विच्छिति कम से कम अनुप्रास और उत्प्रेक्ष की चारुत्तर योजना वासवदत्ता, विन्ध्यगिरि, रेवा, भागीरथी, वसन्तकाल, सूर्यास्त, चन्द्रोदय, श्मशान, सागर और सागर तट आदि के वर्णन के लिए सुबन्धु संस्कृत साहित्य में सदा गौरव के साथ उल्लिखित होते रहेंगे।

सुबन्धु के मूल्यांकन में मोटे तैर पर पाश्चात्य और पौरस्त्य दो दृष्टियाँ है। पाश्चात्य आलोचना की दृष्टि से- जिसका मैनें स्वसंपादित वासवदत्ता की भूमिका में उल्लेख किया है, वासवदत्ता एक निष्प्राण कलावाजी से अधिक कुछ नही है किन्तु पाश्चात्य रूचि और समीक्षा की मान्यताओं से वासवदत्ता को आँकना अनुचित है। फिर भी इतना तो निश्चित है कि सुबन्धु कालिदास आदि की कक्षा के कवि नही है जो आलोचना के किन्हीं भी देश कालातीत मानदण्डों पर खरे उतरेंगे। संस्कृत आलोचना शास्त्र के अनुसार समीक्षा करके कुछ संस्कृत पण्डितों ने भी, जिनमें वासवदत्ता के लब्ध प्रतिष्ठ टीकाकार अभिनव बाणभट्ट श्री कृष्णमाचार्य का नाम प्रमुख है, वासवदत्ता की तीव्र आलोचना की है। उनकी आलोचना में सार है किन्तु बाण के प्रति कुछ अधिक ही मोह के कारण उन्होंने सुबन्धु के साथ पूरा न्याय नहीं किया है। सुबन्धु की वासवदत्ता के मूल्यांकन में हमें कभी भी यह नही भूलना चाहिए कि स्वयं कवि ने वासवदत्ता की रचना केवल श्लेषमय प्रबन्ध रचना में अपनी शक्ति दिखाने के लिए की थी। किसी रस निर्भर सुघटित वस्तुक प्रबन्ध की रचना उनका लक्ष्य नही था इसलिए रस और वस्तु की दृष्टि से उसके काव्य वासवदत्ता की परीक्षा नहीं की जानी चाहिए। किन्तु इसका यह अर्थ नही है कि वासवदत्ता एक रसहीन रचना है। वासवदत्ता में भी रस की स्थिति है, गुणों का विन्यास है और इनका विस्तृत विवेचन तत्तद् अध्यायों में इसी ग्रन्थ में किया जा चुका है। अवधेय है कि रस यहाँ अन्तर्गूढ़ है। सुबन्धु का वचन भी भारवि की तरह नारिकेलफलसम्मित है।

सुबन्धु का सही मूल्यांकन उन तत्तद् वर्णनों के आधार पर करना चाहिए जहाँ श्लेष का क्लेष नहीं है। प्रभात, सन्ध्या, बसन्त, सूर्योदय आदि के रत्नायमान वर्णन पूर्ण बिम्बग्राही है और कवि की शक्ति के साथ उसकी कृति की उत्कृष्टता के प्रमाण है। वासवदत्ता के गौरव को बाण ने भली-भाँति अध्ययन किया था। ‘कवीनामगलद्दर्पो नूनं वासवदत्तया’ बाण के इस कथन में सुबन्धु ओर उनकी वासवदत्ता का महत्त्व निहित है।

जिस अज्ञातनाम कवि ने सुबन्धु को गद्य सुधाधुनी का प्रभवाचल कहा था और सुबन्धु के सभंगश्लेषों से कवियों के भंग की बात की थी उसने भी सुबन्धु के महत्त्व को समझा था। कविराज ने भी सुबन्धु के महत्त्व को उचित रूप में देखा था। एक कवि का महत्त्व कवि ही समझ सकता है। सुबन्धु ने जितना अपने उत्तरकालीन कवियों को प्रदान किया है या उत्तरकालीन कवियों ने, जिनमें बाणभट्ट, भवभूति, भर्तृहरि और नलचम्पूकार त्रिविक्रमभट्ट जैसे महाकवि भी सम्मिलित है, जितना कुछ सुबन्धु से ग्रहण किया है वह सुबन्धु और उसकी वासवदत्ता के महत्त्व को स्थापित करने में स्वयं प्रमाण है। निश्चय ही सुबन्धु महाकवि थे उनकी कवित्त्व शक्ति श्लेष प्रदर्शन के कारण अपनी पूरी क्षमता के साथ प्रकट नहीं हो पायी अन्यथा उसके पद्य और उनके बसन्तादि के विविध वर्णन अपनी विम्बग्रहिता और प्रेषणीयता के कारण उत्कृष्ट काव्य के उदाहरण है। प्रबन्धकार के रूप में असफल होकर भी सुबन्धु निश्चय ही महान् कवि है।

महाकवि सुबन्धु संस्कृत गद्य साहित्य के सुप्रतिष्ठित कविरत्न है। गद्य साहित्य के अनुशीलन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि यद्यपि इनके पूर्ववर्ती कई गद्यकारों का उल्लेख प्राप्त होता है परन्तु उनकी गद्य कृतियाँ सम्प्रति उपलब्ध नहीं है। उपलब्ध गद्य कृतियों में इनकी ही कृति प्रमाणिक मानी जाती है। इनकी गद्य कृति के अनुशीलन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि इतने प्रौढ़ गद्य ग्रन्थ की रचना सहसा नहीं हो सकती। इसके पूर्व कतिपय गद्यकारों की सतत् साधना अवश्य रही होगी जिसके फलस्वरूप इतने उच्चकोटि के गद्य के विकसित रूप के हमें दर्शन हो रहे है।

संस्कृत गद्यकारों में सुबन्धु, दण्डी और बाणभट्ट का प्रमुख स्थान है। तीनों ही महाकवि अपने-अपने क्षेत्र में अद्वितीय है। महाकवि दण्डी के गद्य में सरसता, प्रवाह एवं माधुर्य है। कवि को सरस गद्य के संयोजन में विषयानुरूप प्रस्तुतीकरण में पूर्ण सफलता प्राप्त हुई है। कविता कामिनी के पञ्चबाण महाकवि बाणभट्ट को गद्य का सम्राट कहा गया है। महाकवि बाणभट्ट अद्वितीय गद्य के शिल्पी है। कवि को सभी प्रकार के वर्णनों में पूर्ण सफलता प्राप्त हुई है। महाकवि की भाषा शेली, विषयानुरूप प्रौढ़़, सरस एवं सरल है।

महाकवि सुबन्धु का गद्यशिल्प विलक्षण है। उन्होंने स्वल्प से कथानक को अपनी विलक्षण प्रतिभा के द्वारा मनोरम रूप प्रदान किया है। यद्यपि उनकी कृति को प्रत्यक्षर श्लेषमय कहकर अधिक मान्यता दी गई है तथापि उन्होंने यथा अवसर कोमलकान्त पदावली का भी प्रयोग किया है। उदाहरण के लिए स्वप्न में नायक कन्दर्पकेतु को देखकर काम परवशा के लिए विह्वल नायिका वासवदत्ता की दशा का अवलोकन करें-

मुग्धे मदनमञ्जरि! सिञ्चाआनि चन्दनवारिणा। सरले वसन्तसेने संवृणु केशपाशम्। वरतो तरावति! विकिरोषु कैतकधूलिम्। वामे मदनमालिनि! कलय वलयं शैवालकलापेन। चपले चित्रलेखे। चित्रपटे विलिख चित्तचोरंजनम्।54

इस प्रकार हम देखत है कि महाकवि सुबन्धु का संस्कृत गद्य साहित्य में अतिविशिष्ट स्थान है। बाणभट्ट जैसा महान् गद्यकार उनकी प्रशंसा करता है। उनकी प्रतिभा, योग्यता एवं विद्वता सर्वथा विलक्षण है जो कि विद्वानों को सहज रूप में अपनी ओर आकृष्ट कर रही है। उनकी कृति वासवदत्ता संस्कृत गद्य साहित्य के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से अंकित है।

सन्दर्भ सूची[सम्पादन]

1. सरस्वतीदत्तवरप्रसादश्चक्रे सुबन्धुः सुजनैकबन्धुः। प्रत्यक्षरश्लेषमयप्रबन्धबिन्यासवैदग्ध्यनिधिर्निबन्धम्॥

2. खिन्नोऽसि मुञ्च शैलं बिभृमो वयमिति वदत्सु शिथिलभुजः। भरभुग्नविततबाहुषु गोपेषु हसन् हरिर्जयति॥ कठिनतरदामवेष्टनलेखासन्देहदायिनो यस्य। राजन्ति बलिविभाः स पातु दामोदरो भवतः॥

3. अतिमलिने कर्तव्ये भवति खलानामतीव निपुणा धीः। तिमिरे हि कौशिकानां रूपं प्रतिपद्यते चक्षुः॥ विध्वस्तपरगुणानां भवति खलानामतीव मलिनत्वम्। अन्तरितशशिरूचामपि सलिलमुचां मलिनिमाऽभ्यधिकः॥

4. स जयति हिमकरलेखा चकास्ति यस्योमयोत्सुकान्निहिता। नयनप्रदीपकज्जलजिघृक्षया रजतशुक्तिरिवः॥

5. वासवदत्ता, श्रीराम संस्करण, भूमिका भाग, पृ0 23

6. वासवदत्ता, श्रीराम संस्करण, पृ0सं0 107, 135, 334, 305, 121, 137, 229 इत्यादि पर नाना शास्त्रों के उल्लेख।

7. सुबन्धुः किल निष्क्रान्तो बिन्दुसारस्य बन्धनात्। तस्य वै हृदयं भित्वा वत्सराजो...॥

8. दृष्टव्य वासवदत्ता, भूमिका, पृ0 2, एच0एल0 ग्रे0 1962, वाराणसी।

9. वसुबन्धु या सुबन्धु लेख, पृ0 8 से 12 (इण्डियन एण्टीक्वेरी, खण्ड-53, 1924)

10. अभिनव भारती, खण्ड-3, पृ0 172 से उद्धृत तजास्य बहुतरं व्यापिनो बहुगर्भ स्वप्नायित तुल्यस्य नाट्यायितस्यो- दाहरणं महाकवि सुबन्धु निबद्धो वासवदत्ता नाट्यधाराण्यः समस्य एवं प्रयोगः। तत्रहि विन्दुसारः प्रयोज्य उदयन वीरतै सामाजिकी कृतोऽप उदयनो वासवदत्ता चेष्टिते॥ इण्डियन एण्टीक्वेरी, खण्ड-53; 1924, पृ0 177 पर एवं हिस्ट्री ऑफ संस्कृत प्वेटिक्स, पृ0 59 पर पी0वी0 काणे, निर्णय सागर 1957, मुम्बई।

11. सुबन्धु नाटकास्यापि लक्षणं प्राह प्रचद्या। पूर्ण चैव प्रशान्तंत्र च भास्वरं ललितं तथा॥ भाव प्रकाश, पृ0 238, गायकवाड़ सीरीज, 45, बड़ौदा-1968 12. दृष्टव्य इण्डियन एण्टीक्वेरी, खण्ड-53, पृ0 177 से 180, 1924 एवं इण्डियन हिस्टोरिक क्वार्टरली, पृ0 69; 1943।

13. वही।

14. हिस्ट्री ऑफ संस्कृत जेटिक्स, पृ0 59

15. उदायी भविता यस्मात् त्रयस्त्रिंशत् समाः नृपाः। सर्वै पुरवरं राजा पृथव्यं। कुसुमाहवयं गंगायाः दक्षिणे कूले चतुर्थवृदे करिष्यति। अध्याय-61/178, वायुपुराण अनुशीणं पाटलिपुत्र, 2/1/25 महाभाष्य, पतञ्जलि।

16. इण्डियन हिस्टोरिक क्वार्टरली, सितम्बर, 1929, पृ0 472 से 474 पर ‘‘दि होम ऑफ सुबन्धु’’ लेख- मनमोहन घोष।

17. वासवदत्ता, चौ0सं0, पृ0 146

18. ‘अवन्ति सुन्दरी कथा’ पद्य संख्या-22 एवं भूमिका, पृ0सं0 24, सम्पादित शूरनाऊकुन्ज पिल्स-1954।

19. दृष्टव्य-बुलेटिन ऑफ दि डेल्कन कॉलेज रिसर्च इन्स्टीट्यूट, खण्ड-1, मार्च 1940, पृ0 421, सुबन्धु एण्ड दामोदर लैब, आर0जी0 हर्ष।

20. दृष्टव्य- वासुदेव उपाध्याय कृत ‘गुप्त साम्राज्य का इतिहास’, द्वितीय भाग, पृ0 141

21. नैमिज्यो-सूची परिशिष्ट 1-64

22. (क) हिस्ट्री ऑफ संस्कृत लिटरेचर मैक्डोनल, पृ0 325

(ख) जो0ए0सो0बं0 1905, पृ0 227, डॉ0 एस0सी0 विद्याभूषण का लेख

(ग) अर्ली हिस्ट्री ऑफ इण्डिया, स्मिथ, पृ0 328-329, तृतीय संस्करण

(घ) डॉ0 विनयतोष भट्टाचार्य-तत्त्वसंग्रह की भूमिका, पृ0 63-69

23. दृष्टव्य हाल द्वारा सम्पादित वासवदत्ता की भूमिका।

24. वही, पृ0 236

25. पीटर्सन द्वारा सम्पादित सुभाषितावली की भूमिका, पृ0 47

26. हाल द्वारा सम्पादित वासवदत्ता की भूमिका, पृ0 236 तथा वासवदत्ता श्रीराम संस्करण भूमिका।

27. ला डेट डे चन्द्रगोमिन इन बुलेटिन डेस इकोड डी एक्स्ट्रीम ओरियण्ट, पृ0 130

28. दृष्टव्य विद्वत वृत्त का प्रथम खण्ड तथा हाल सम्पादित वासवदत्ता की भूमिका तथा प्रो0 विलसन का संस्कृत शब्द कोश।

29. पं0 भगवददत्त का भारत वर्ष का वृहद् इतिहास, द्वितीय भाग, पृ0 293

30. भविष्य पुराण।

31. महाभाष्य।

32. व्यथार्थत्ता कथन्नाम मामूदवररूचेहि। व्यधत्तकण्ठाभरणं यः सदारोहणप्रियः॥ राजशेखर

33. विक्रमादित्य भूपस्य कीर्ति सिद्धेर्निदेशतः। श्रीमान् वररूचिर्धीमांस्तनोतिपत्र कौमुदीम॥ तथा साहसांकस्य भूपस्य समरयां काव्य कोविदः वररूचि नाम स कविः श्रुत्वा वाक्यं। नृपेन्द्रस्य, विद्यासुन्दर काव्यं श्लोक समूहैस्तदारेमे। द्वितीय अखिल भारतीय प्रा0सभा का विवरण, पृ0 216-218

34. दृष्टव्य पं0 भगवतदत्त का भारत वर्ष का वृहद् इतिहास, पृ0 324-325

35. दृष्टव्य कीथ कृत हिस्ट्री ऑफ संस्कृत लिटरेचर, पृ0 76

36. पं0 भगवतदत्त का भारत वर्ष का वृहद् इतिहास, भाग-प्रथम, पृ0 298-304

37. द्विपंचाशदधिके शकाब्दपंचके विजयी साहसैकरतिः। स्व भुजवल लब्ध-विक्रमारव्यः पूर्व पराम्बुनाथः॥ सोर्सेज ऑफ मेडि0 हिस्ट्री ऑफ डेल्कन वाई खरे, वाफर्स्ट, 1-8

38. प्रतापोपनता यस्य लाटमालवगूर्जरा। इण्डियन ऐण्टी0 भाग-52, पृ0 70, 1826

39. भागवत्पुराण स्कन्ध 12, 1/27

40. ऐज द पोयेट सुबन्धु मेन्शन्स द नेम ऑफ द गुड किंग विक्रम, इट इज मोस्ट अनलाइकली दैट ही हैज ओमिटेड टू नेम द - टीरेन्ट ऑफ हिज टाइम इन द स्टेन्जा सो आर्टिस्टिकली कम्पोज्ड ए कम्पोजिशन एवाउण्डिंग इन द अलंकार ऑफ श्लेष काइण्ड वुड वी डिफेक्टिव इफ इन कन्ट्रास्ट टू द नेम ऑफ विक्रमादित्य ऐन अदर नेम वेअर नाट गिवेन, वी नो दैट देयर वेयर रियली कंक किंग्स ऐज द भागवत टेल्स अस.... सो मे प्ले अपान द वर्ड कम् एण्ड कः ईफ थाट आउट गिब्स क्वाइट ए फिटिंग डिसक्रिप्सन्स।

41. सुबन्धुज टाइम हैज बीन फिक्स्ड ऐज द लास्ट हॉफ ऑफ द सिक्स्थ सेंचुरी ईफ दिस डेट इज करेक्ट द कंक्स मस्ट हैव रूल्ड प्रिवियस टू द बर्धन्स ऑफ स्थाणीश्वर एण्ड सो आल्सो किंग्स कन्टेम्पोरेरी विथ हर्षवर्धन एण्ड हिज एल्डर ब्रदर बट इट इज क्यूरियस दैट नो इनेस्क्रिप्सन ऑफ हर्षबर्धन मेक्स एनी रिफरेन्स टू द कंक्स। डॉ0 आर0सी0 मजूमदार का लेख, हू वेयर द कंकाज इन जो0रा0ए0सो0

42. हिस्ट्री ऑफ संस्कृत लिटरेचर, पृ0 207-209, एस0के0डे0 एवं एस0एन0 दास गुप्त, 1947, कोलकाता।

43. संस्कृत कवि दर्शन, पृ0 442, 1961, वाराणसी।

44. ‘कवेरिव हि जानाति कवेः काव्य परिश्रमम्।’ नलचम्पू

45. अव्धिर्लङ्धितएव वानरमतैः किन्त्वस्य गम्भीरताम्। आपाताल निमग्न पीवर तनुः जानाति मन्धाचलः॥

46. न तज्झानं न तत्छिल्पं न सा विद्या न सा कला। विद्यते यन्न काव्यार्गम् अहो आणे महान् कवेः॥

47. वासवदत्ता, चौ0सं0, पृ0 33

48. वही, पृ0 33

49. वही, पृ0 53-54

50. वही

51. वही, पृ0 64

52. वही, पृ0 76

53. वही, पृ0 77

54. वासवदत्ता।