रक्षा

विकिपुस्तक से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ

21वीं शताब्दी के प्रथम दशक में इस बात के साक्ष्य उत्तरोत्तर बढ़ते रहे हैं कि सीमाएं इन सुरक्षा खतरों को रोक सकने में अक्षम रही हैं। भारत का हर पड़ोसी एक संक्रमण से गुज़र रहा है जिससे विभिन्न राजनीतिक अनुभवों एवं प्रयोगों की उत्पत्ति हो रही है। आतंकवाद और हथियार, ड्रग्स एवं आणविक तकनीक का विस्तार $खतरे उत्पन्न कर रहा है जिस पर ध्यान दिए जाने कीज़रूरत है। वर्ष 2008 के विकासों ने, विशेषकर वैश्विक आर्थिक प्रणाली की चुनौतियों ने वैश्विक पर्यावरण की सुरक्षा में अपूर्व तनावों को उत्पन्न किया है।

उग्रवादी और आतंकी संगठनों के साथ पाकिस्तान के सम्मिलन ने महानतम जटिलताओं और खतरों को उत्पन्न किया है जिससे हमें दो चार होना पड़ रहा है। इसलिए आंतरिक और सीमाओं दोनों स्तरों पर हमारे सुरक्षा उपकरणों की मजबूती सर्वोच्च राष्ट्रीय प्राथमिकता है।

चीन के सुदूर जल में अभियानों के संचालन के लिए समुद्री बेड़े और सामरिक मिसाइल तथा आकाशीय प्रक्षेपास्त्रों का विस्तार, साथ ही साथ सीमावर्ती क्षेत्रों में क्रमिक ढांचागत विकास, गहन सर्वेक्षण और निगरानी। चौकसी, त्वरित प्रतिक्रिया और अभियानात्मक क्षमताओं की बढ़ोत्तरी के अपने श्वेतपत्र में घोषित उद्देश्यों के, भारत की रक्षा-सुरक्षा पर निकट भविष्य में पड़ने वाले प्रभावों के मद्देनजर, सजग जांच- पड़ताल कीज़रूरत है। वैसे ही पाकिस्तान के साथ इसका सहयोग और इसकी सैन्य सहायता, जिसमें जम्मू- कश्मीर राज्य के अवैध पाकिस्तानी कब्जे वाले भू-भाग के जरिये पाकिस्तान से संपर्क बढ़ाए जाने की संभावना भी शामिल है, का भारत पर सीधा सैन्य-प्रभाव पड़ेगा।

भारत की विश्वसनीय न्यूनतम भयकारी/ हतोत्साहन की नीति का क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों में महत्वपूर्ण योगदान है। न्यूनतम हतोत्साहन की स्थिति रखते हुए भारत ने “प्रथम-प्रयोग-नहीं” की नीति एवं गैर-परमाणु हथियार वाले देशों के लिए “प्रयोग-नहीं” की नीति की घोषणा की है। साथ ही, भारत स्वैक्षिक रूप से आणविक परीक्षण के एकपक्षीय विलंबन/स्थगन की स्थिति भी बनाए रखता है। आवर्धित समुद्री सुरक्षा को लंबी तटरेखा की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए जो पश्चिम में अरब सागर, पूर्व में बंगाल की खाड़ी एवं दक्षिण में विशाल हिंद महासागर से लगी हुई है। हाल के कुछ वर्षों में, जहाजरानी मुद्दे जैसे-समुद्री-पथों की सुरक्षा, गहरे समुद्र में लूट-पाट, उर्जा- सुरक्षा, डब्ल्युएमडी, आतंकवाद आदि भारत की सुरक्षा में महत्वपूर्ण तत्व बन गए हैं। भारतीय नौ-सेना ने हिंद महासागर के कुछ हिस्सों में समुद्री लूट-पाट के नियंत्रण में अहम भूमिका निभाई है। मुंबई के आतंकी हमलों ने एक बार फिर भारत की सुरक्षा में जहाजरानी-आयाम की महत्ता को विशिष्टता प्रदान की है।

संगठन[सम्पादन]

रक्षा मंत्रालय का प्रमुख काम है रक्षा और सुरक्षा संबंधी सभी मामलों पर सरकार से निर्देश प्राप्त करना और सशस्त्र बलों के मुख्यालयों, अंतर-सेना संगठनों, रक्षा उत्पादन प्रतिष्ठानों और अनुसंधान एवं विकास संगठनों तक कार्यान्वयन के लिए उन्हें पहुंचाना। सरकार के नीति-निर्देशों को प्रभावी ढंग से तथा आवंटित संसाधनों का ध्यान रखकर उन्हें कार्यान्वित करना भी उसका काम है। विभाग के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं-

(i) रक्षा विभाग एकीकृत रक्षा स्टाफ और तीनों सेनाओं तथा विभिन्न अंतर-सेवा संगठनों की जिम्मेदारियों का वहन करता है। रक्षा बजट, स्थापना कार्य, रक्षा नीति, संसद से जुड़े मुद्दे, बाहरी देशों के साथ रक्षा सहयोग तथा समस्त क्रियाकलापों का समन्वय इसी विभाग के दायित्व हैं।

(ii) रक्षा उत्पादन विभाग का प्रमुख सचिव इसका प्रमुख होता है और यह रक्षा उत्पादन, आयातित भंडार के स्वदेशीकरण, उपकरणों और अतिरिक्त कलपुर्जों तथा हथियार कारखाना बोर्ड और सार्वजनिक क्षेत्र के रक्षा उद्यमों की विभागीय उत्पादन इकाइयों के नियंत्रण संबंधी कार्यों को निपटाता है।

(iii) रक्षा, शोध तथा विकास विभाग का प्रमुख सचिव होता है जो रक्षा मंत्री का सलाहकार भी होता है। इसका काम सैनिक साजो-सामान के वैज्ञानिक पक्ष, संचालन तथा सेना द्वारा इस्तेमाल में लाए जाने वाले उपकरणों से संबंधित शोध, डिजाइन और विकास योजनाएं बनाना है।

(iii) भूतपूर्व सैनिक/रक्षाकर्मी कल्याण विभाग का प्रमुख एक अतिरिक्त सचिव होता है इसके जिम्मे पेंशनयाफ्ता भूतपूर्व सैनिकों, भूतपूर्व कर्मचारी स्वास्थ्य योजना, पुन—नियोजन और केंद्रीय सैनिक बोर्ड महानिदेशालय तथा तीनों रक्षा सेवाओं के पेंशन नियमों से जुड़े मुद्दों का निष्पादन है।

करगिल समिति की रिपोर्ट के आधार पर मंत्रियों के समूह द्वारा लिए गए निर्णय के अनुसार 1 अक्टूबर, 2001 को इंटिग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (आईडीएस) की स्थापना की गई। आईडीएस के लिए स्टाफ तीन सेनाओं, एमईए, डीआरडीओ, सशक्त सेना मुख्यालय, सिविल सेवाओं तथा रक्षा विभाग से मुहैया कराया गया है। वर्तमान में इंटिग्रेटेड डिफेंस स्टाफ सीओएससी के सलाहकार के रूप में कार्यरत है। वर्तमान में आईएसडी अध्यक्ष सीओएससी के सलाहाकार स्टाफ के रूप में कार्य कर रहा है।

तीनों सेनाओं के मुख्यालय-यानी थल सेना मुख्यालय, नौसेना मुख्यालय और वायु सेना मुख्यालय थल सेना प्रमुख (सीओएएस) नौसेना प्रमुख (सीएनएस) और वायुसेना प्रमुख (सीएएस) के अधीन काम करते हैं। इनकी सहायता के लिए प्रधान स्टाफ अधिकार (पीएसओ) होते हैं। चिकित्सा सहायता, जन संपर्क और रक्षा मुख्यालय में सिविलियन स्टाफ के कार्मिक प्रबंधन जैसे तीनों सेनाओं से संबद्ध कार्यों के लिए रक्षा मंत्रालय के अधीन एक अंतर-सेवा संगठन है। रक्षामंत्री को रक्षा संबंधी गतिविधियों में मदद देने के लिए अनेक समितियां होती हैं। स्टाफ समिति का प्रमुख एक ऐसा मंच होता है जो तीनों सेनाओं की गतिविधियों से संबद्ध मामलों पर विचार का स्थान होता है और यह मंत्रालय को सलाह देता है। स्टाफ समिति प्रमुख का पद सबसे लंबी सेवा वाले सेना प्रमुख को दिया जाता है और यह तीनों सेना प्रमुखों के बीच बारी-बारी से आता है। रक्षा मंत्रालय का वित्त विभाग वित्तीय मामलों से जुड़े सभी मुद्दों पर विचार करता है। रक्षा सेवाओं का रक्षा सलाहकार इसका प्रमुख होता है तथा यह रक्षा मंत्रालय से पूर्णत— संबद्ध होता है और सलाहकार की भूमिका निभाता है।

थल सेना[सम्पादन]

भारतीय थल सेना सीमा पर चौकस रहती है-चौकन्नी, किसी भी बलिदान के लिए तैयार - ताकि देश के लोग शांति व सम्मान के साथ जी सकें।

उच्च तकनीक आधारित सटीक हथियारों को शामिल किए जाने से आगामी युद्धों की मारक क्षमता कई गुणा बढ़ गई है। $खतरों का वर्णक्रम पारंपरिक से आणविक तथा विषम तक फैला है, साथ ही आतंकवाद एक हाइड्रा के सिर वाले राक्षस के रूप में उभर रहा हैं। जलवायु की कठिनता जैसे- हिम खंडों की ऊंचाई एवं अत्यधिक ठंड, सघन पहाड़ी जंगल तथा मरूभूमि की गर्मी एवं उमस आदि का भी सामना करना पड़ता है।

लंबी अवधि के परिप्रेक्ष्य में थलसेना का आकार, आकृति एवं भूमिका का व्यावहारिक दृष्टिकोण थलसेना की आधुनिकीकरण प्रक्रिया को गतिशील/ओसस्वी बनाता है तथा प्रौद्योगिकी प्रक्रिया इसे एक भय- सह-क्षमता आधारित ताकत बनने की तरफ अग्रसर करती है। भारतीय थल सेना को विभिन्न वर्णक्रम उन्मुख परिवर्त्तनों के लिए एवं भविष्य की चुनौतियों के लिए एक “तैयार व प्रासंगिक थलसेना” के रूप में तैयार किया जाना है।

भारतीय सेना बहुबल के अर्थ में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी थल सेना है। थल सेना का प्रमुख उत्तरदायित्व बाहरी खतरों से देश की रक्षा करना है। इसके अतरिक्त थल सेना आंतरिक सुरक्षा गड़बडि़यों के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सिविल प्रशासन की मदद भी करती है। थल सेना बाढ़, भूकंप, तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय राहत कार्य भी करती है तथा आवश्यक सेवाओं की बहाली में मदद करती है।

भारतीय थल सेना विश्व की उत्कृष्ट थल सेनाओं में से एक है। वर्तमान तथा भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए थल सेना का निरंतर आधुनिकीकरण तथा उन्नयन किया जाता है। यह पंचवर्षीय योजना पर आधारित है। आधुनिकीकरण के प्रमुख क्षेत्र इस प्रकार हैं-

(i) गोलीबारी क्षमता में सुधार तथा गश्त में वृद्धि

(ii) सभी मौसमों में युद्ध क्षेत्र निगरानी क्षमता

(iii) रात्रि युद्ध की क्षमता

(iv) विशिष्ट बलों की क्षमता में बढ़ोत्तरी

(v) नेटवर्क आधारित युद्ध की क्षमता

(vi) एनबीसी संरक्षण

आर्टिलरी का मुख्य जोर बेहतर गोलीबारी क्षमता रेंज में सुधार के लिए भारी कैलबिर बंदूकों की खरीद करना है। रात्रि निगरानी उपकरणों तथा अतिरिक्त मानवरहित विमानों की खरीद से आर्टिलरी की निगरानी तथा लक्ष्यबेधन क्षमता में वृद्धि होगी।

निगरानी क्षमता, गोलीबारी क्षमता, संरक्षण, संचार तथा गश्त में कई गुना वृद्धि कर राष्ट्रीय राइफल तथा पैदल सेना की युद्ध क्षमता में व्यापक बदलाव लाया जा रहा है। आधुनिकीकरण के तहत पैदल सेना की टुकडि़यों को अधिक मारक क्षमता तथा रेंज वाले हथियार, T-90 टैंक, ब्र±मोस शस्त्र प्रणाली, मिसाइल और राकेट प्रणाली, थर्मल इमेजिंग उपकरण, बुलेट तथा माइन प्रूफ गाडि़यां तथा सुरक्षित रेडियो संचार उपलब्ध कराया गया है।

नौसेना[सम्पादन]

अपनी क्षमता, रणनीतिक स्थिति तथा भारतीय महासागरों में अपनी मुखर उपस्थिति के कारण नौसेना भारतीय महासगरीय क्षेत्र में शांति, स्थिरता तथा प्रशांति की उत्प्रेरक है। इसने अन्य समुद्रीवर्ती देशों से मित्रता तथा सहयोग कायम किया है। हमारे पड़ोस के छोटे मुल्क तथा वे देश जो अपने व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए भारत के महासागरों पर निर्भर हैं, उनके लिए नौसेना भारत के समुद्री क्षेत्र में प्रशांति तथा स्थिरता के उपाय सुनिश्चित करती है। इस काम को पूरा करने के लिए भारतीय नौसेना अपनी क्षमता तथा क्षेत्रीय और क्षेत्र के बाहर की नौसेनाओं के साथ सहयोग और अंतः क्षमता बढ़ा रही है। जहाज, पनडुब्बियां, देश में और बाहर निर्मित की जा रही हैं। कोचि में देसी एयरक्राफ्ट केरियर भी निर्माणाधीन है। बीवीआर डर्बो मिसाइल का सफल परीक्षण किया गया है। 6 यूएच 3 एच हेलीकाप्टर शामिल किए गए हैं। इसके लिए आईएफटीयू स्थापित की गई है। यह यूनिट 23 मार्च, 2009 को भारतीय नौसेना वायु स्क्वाड्रन (आईएनएएस) के रूप में शुरू की गई।

लैंडिंग शिप टैंक आईएनएस शार्दूल 4 जनवरी, 2007 को नेवल बेस, कारवार में नियुक्त किया गया। अमरीकी नौसेना से खरीदे गए आईएनएस जलाशव को 22 जून, 2007 को नोरफोक (अमरीका) में तैनात किया गया। इसने भारतीय नौसेना में एक नया आयाम जोड़ा है। यह जहाज भारतीय नौसेना में पहला लैंडिग प्लेटफार्म डॉक (एलपीडी) है।

भारतीय नौसेना के जहाजों की विदेशों में तैनाती देश की विदेश नीति में सहायक है। इस प्रकार के मिशन विदेशी मित्र देशों के साथ संबंधों की बेहतरी तथा विदेशी सहयोग को बढ़ाने में महत्वपूर्ण हैं। वर्ष 2007 में हुई महत्वपूर्ण विदेशी तैनातियों में पर्सियन खाड़ी, उत्तरी अरब सागर, भू-मध्य सागर, लाल सागर, चीन सागर तथा उत्तरी-पश्चिमी प्रशांत महासागर में की गई जहाजों की तैनाती शामिल है।

तटरक्षक[सम्पादन]

समुद्री क्षेत्र में भारत के राष्ट्रीय हित की संरक्षा के लिए तटरक्षक कानून 1978 लागू होने के साथ ही 18 अगस्त, 1978 को भारतीय तटरक्षक (आईसीजी) की स्थापना हुई थी। तटरक्षक का दायित्व भारत की सीमाओं में जलीय क्षेत्र तथा विशिष्ट आर्थिक जोन की नियमित निगरानी करना है, ताकि चोरी और तस्करी जैसी अवैध गतिविधियों को रोका जा सके। इसके अतिरिक्त तटरक्षक बल के कार्यों में खोज और बचाव कार्य तथा समुद्री वातावरण को प्रदूषण से बचाना भी शामिल है।

तटरक्षक की कमान और नियंत्रण तटरक्षक महानिदेशक में निहित है। इसका मुख्यालय नई दिल्ली है। इसके तीन क्षेत्रीय मुख्यालय मुंबई, चेन्नई और पोर्ट ब्लेयर में हैं। अपने 11 तटरक्षक जिलों और 6 तटरक्षक स्टेशनों के जरिए ये क्षेत्रीय मुख्यालय संगठन की कमान संभालते हैं। तटरक्षक बल अधिनियम के अनुसार इसके बुनियादी कार्य इस प्रकार हैं-(क) कृत्रिम द्वीपो ंऔर समुद्री प्रतिष्ठानों की रक्षा, (ख) मछुआरों को सुरक्षा प्रदान करना, (ग) समुद्री प्रदूषण सहित समुद्री पर्यावरण का संरक्षण करना और लुप्तप्राय नस्लों की रक्षा करना, (घ) तटकर और अन्य अधिकारियों की तस्करी विरोधी अभियानों में सहायता करना, (æ) भारत के समुद्री कानूनों को लागू कराना, (च) समुद्र में जान-माल की सुरक्षा करना और भारत सरकार द्वारा निर्दिष्ट अन्य कर्त्तव्य (छ) युद्ध के समय नौसेना की सहायता करना।

वायु सेना[सम्पादन]

भारतीय सेना बदलाव के दौर में है। यह बदलाव बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण और नए उपकरण शामिल करने तक सीमित नहीं बल्कि प्रभावी रोजगार में सैद्धांतिक बदलाव का भी है। वायु सेना आज एक पीढ़ी आगे है और इसने आधुनिक युद्ध क्षमताएं हासिल कर ली हैं। इस बीच देश और देश से बाहर बहुत से अंतर्राष्ट्रीय अभ्यासों और मिशन दोनों में सर्वोच्य प्रदर्शनों से अपनी पेशेवर धाक बढ़ाना जारी रखा है।

भारतीय वायु सेना ने अति आधुनिक एसयू-30 एमकेआई एयरक्राफ्ट शामिल किया है। 20 हॉक एजेटी एयरक्राफ्ट भी शामिल किए गए हैं। विशेष अभियानों के लिए सी-130 जे-30 एयरक्राफ्ट प्राप्त करने के लिए यूएस सरकार के साथ निविदा पर हस्ताक्षर किए गए हैं। आक्रमण और रक्षा दोनों में प्रभावी बढ़ोत्तरी के लिए हवाई चेतावनी और नियंत्रण प्रणाली (अवाक्स) प्राप्त की जा रही है। इसके शामिल होन से सामने आने वाली परिस्थितियों में बल प्रलंबता क्षमताओं में भी बढ़ोत्तरी होगी।

मिग-29 को बीच में अपग्रेड करने और संपूर्ण तकनीकी जीवन के विस्तार के लिए रूस के आरएसी मिग के साथ करार पर हस्ताक्षर हुए हैं। अपनी क्षमताओं को और बढ़ाने के लिए वायु सेना मिराज 2000, जगुआर एयरक्राफ्ट तथा एमआई-17 हेलिकॉप्टरों को अपग्रेड करने की प्रक्रिया भी शुरू कर रहा है। डीओ- 228 एयरक्राफ्ट को आधुनिक तकनीक से लैस रखने के लिए सभी मौजूदा एयरक्राफ्टों को इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से सुसिîात किया जा रहा है। मरम्मत के लिए पुर्जों का देश में ही निर्माण एक सतत प्रक्रिया है। वायु सेना की विभिन्न टुकडि़यों के लिए 80,000 से अधिक पुर्जे बेस रिपेयर डिपो (बीआरडी) द्वारा इस्तेमाल किए गए हैं। सभी आयातित बेरियरों की जगह देसी बेरियर लगाने की एक दीर्घकालीन योजना बनाई गई है।

इलेक्ट्रॉनिक निगरानी क्षमता बढ़ाने के लिए बढ़ी संख्या में ग्राउंड आधारित रडार शामिल किए जा रहे हैं। इन रडारों से एयरस्पेस प्रबंधन में खासा सुधार होगा।

वायु सेना सभी क्षेत्रों के लिए आधुनिकतम संचार उपकरण हासिल कर रही है। इनमें शामिल सेटकॉम, एचएफ तथा वी/यूएचएफ सेट शामिल हैं। इसके अथावा सभी कमांड, नियंत्रण और युद्ध तत्वों के लिए सुरक्षित और भरोसेमंद एनक्रिप्शन उपकरणों को भी हासिल किया जा रहा है।

कमीशंड रैंक[सम्पादन]

तीनों सेनाओं में कमीशंड रैंक का विवरण और उनके समान पद नीचे चार्ट में दिए गए हैं —

थलसेना नौसेना वायुसेना
जनरल एडमिरल एयर चीफ मार्शल
लेफ्टिनेंट जनरल वाइस एडमिरल एयर मार्शल
मेजर जनरल रियर एडमिरल एयर वाइस मार्शल
ब्रिगेडियर कमोडोर एयर कमोडोर
कर्नल कैप्टन ग्रुप कैप्टन
लेफ्टिनेंट कर्नल कमांडर विंग कमांडर
मेजर लेफ्टिनेंट कमांडर स्क्वॉड्रन लीडर
कैप्टन लेफ्टिनेंट फ्लाइट लेफ्टिनेंट
लेफ्टिनेंट सब लेफ्टिनेंट फ्लाइंग ऑफिसर

भारतीय वायु सेना में भर्ती[सम्पादन]

गैर-संघ लोक सेवा आयोग के माध्यम से अधिकारियों की भर्ती — भारतीय वायु सेना में कमीशन अधिकारियों की भर्ती मुख्यत— संघ लोक सेवा आयोग के माध्यम से होती है। तकनीकी शाखाओं, महिला विशेष भर्ती स्कीम, एनसीसी विशेष भर्ती स्कीम, सेवा भर्तियों के लिए चयन भारतीय वायु सेना मुख्यालय के माध्यम से किया जाता है।

सेवा चयन बोर्डो के माध्यम से भर्ती[सम्पादन]

इसके जरिए फलाइंग (पायलट), एयरो नॉटिकल इंजीनियरिंग (इलेक्टॉनिक्स, यांत्रिकी), शिक्षा, प्रशासन, लॉजिस्टिक्स, अकाउंट तथा अंतरिक्ष विज्ञान शाखाओं के लिए भर्ती की जाती है।

विश्वविद्यालय प्रवेश स्कीम[सम्पादन]

इसके तहत तकनीकी शाखाओं में स्थाई कमीशन अधिकारियों के रूप में शामिल होने के लिए इंजीनियरिंग के अंतिम/प्री- अंतिम वर्ष के छात्र योग्य होते हैं।

महिला अधिकारियों की भर्ती[सम्पादन]

फ्लाइंग, एयरो नॉटिकल इंजीनियरिंग (इलेक्ट्रॉनिक्स, मेकेनिकल) शिक्षा, प्रशासन, लॉजिस्टिक, अकाउंट तथा अंतरिक्ष विज्ञान शाखाओं में लघु सेवा कमीशन अधिकारियों के रूप में योग्य महिलाओं की भर्ती की जाती है

एनसीसी के जरिये भर्ती[सम्पादन]

एनसीसी “सी” (बी ग्रेड) प्रमाणपत्र तथा 50 प्रतिशत अंक वाले स्नातक सेवा चयन बोर्डों के माध्यम से नियमित कमीशन अधिकारियों के रूप शामिल किए जाते हैं। अधिकारी रेंक से नीचे के कार्मिकों की भर्ती — नई दिल्ली में स्थित केंद्रीय वायुसैनिक चयन बोर्ड द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर एक केंद्रीकृत चयन प्रणाली के जरिए वायुसैनिकों का चयन किया जाता है। इसमें देशभर में फैले 14 चयन केंद्रों की सहायता ली जाती है।

थल सेना में भर्ती[सम्पादन]

संघ लोकसेवा आयोग के अतिरिक्त सेना में निम्नलिखित तरीकों से भी कमीशंड अधिकारियों की भर्ती की जाती है।

विश्वविद्यालय भर्ती योजना (यूईएस)[सम्पादन]

अधिसूचित इंजीनियरिंग शाखाओं के फाइनल और प्री- फाइनल के विद्यार्थी इस योजना के तहत सेना की तकनीकी शाखा में कमीशंड अधिकारी के रूप में स्थायी कमीशन के लिए आवेदन करने के पात्र हैं। सेना मुख्यालय द्वारा नियुक्त एक स्क्रीनिंग दल कैंपस साक्षात्कार के माध्यम से योग्य उम्मीदवारों का चयन करता है। इन उम्मीदवारों को एसएसबी तथा मेडिकल बोर्ड के समक्ष उपस्थित होना पड़ता है।

तकनीकी स्नातक पाठ्यक्रम (टीजीसी)[सम्पादन]

अधिसूचित इंजीनियरिंग शाखाओं के स्नातक/स्नाकोत्तर विद्यार्थी इसके माध्यम से स्थाई कमीशन के लिए आवेदन के पात्र हैं। एसएसबी और मेडिकल बोर्ड के बाद अंतिम रूप से चुने गए उम्मीदवारों को भारतीय सेना अकादमी, देहरादून में एक वर्ष का प्री-कमीशन प्रशिक्षण पूरा करना होता है।

शॉर्ट सर्विस कमीशन (तकनीकी)[सम्पादन]

अधिसूचित इंजीनियरिंग शाखाओं के इंजीनियरिंग स्नातक/ स्नातकोत्तर विद्यार्थी शार्ट सर्विस कमीशन (तकनीकी) प्रवेश के जरिए तकनीकी शाखा में शार्ट सर्विस कमीशन के लिए आवेदन के पात्र हैं। चुने गए उम्मीदवारों को एसएसबी और मेडिकल बोर्ड के बाद 11 महीने के प्री-कमीशन प्रशिक्षण के लिए ओटीए, चेन्नई जाना पड़ता है।

10+2 तकनीकी योजना (टीईएस)[सम्पादन]

10+2 सीबीएसई/आईसीएसई/राज्य बोर्ड के ऐसे विद्यार्थी जिन्होंने भौतिकी, रसायन तथा गणित विषयों में कुल मिलाकर 70 प्रतिशत अंक प्राप्त किए हों, इस योजना में आवेदन के पात्र हैं।

महिला अधिकारियों के लिए विशेष प्रवेश योजना (डब्ल्युएसईएस-ओ)[सम्पादन]

इस योजना के जरिए सेना में शॉर्ट सर्विस कमीशंड अधिकारियों के लिए योग्य महिला उम्मीदवारों का चयन किया जाता है। इन्हें इलक्ट्रानिक तथा मेकेनिकल इंजीनियरी, सिग्नल, सेना शिक्षा, सेना आर्डिनेंस, आपूर्ति, सेना गुप्तचर दलों, जज एडवोकेट जनरल ब्रांच तथा सेना वायु रक्षा में कमीशंड किया जाता है।

एनसीसी (विशेष) प्रवेश योजना[सम्पादन]

कम से कम “बी” ग्रेड के साथ एनसीसी का “सी” सर्टिफिकेट रखने वाले और स्नातक परीक्षा में 50 प्रतिशत अंक पाने वाले विद्यार्थी इस योजना के माध्यम से शॉर्ट सर्विस कमीशन के लिए आवेदन करने के पात्र हैं। इन्हे संघ लोकसेवा आयोग द्वारा आयोजित लिखित परीक्षा से छूट मिलती है तथा इनका चुनाव सीधे एसएसबी बोर्ड के साक्षात्कार तथा मेडिकल बोर्ड द्वारा किया जाता है।

न्यायाधीश वकील सामान्य प्रवेश[सम्पादन]

न्यायाधीश वकील सामान्य शाखा के लिए 21 से 27 वर्ष आयु के लोग आवेदन कर सकते हैं। जिन्होंने एलएलबी में न्यूनतम 55 प्रतिशत अंक प्राप्त किए हों। योग्य उम्मीदवारों को सीधे साक्षात्कार के लिए बुलाया जाता है। उसके बाद चिकित्सा परीक्षण। यह लघु सेवा कमीशन प्रवेश है जिसमें उम्मीदवार स्थाई कमीशन का विकल्प दे सकता है।

अधिकारी स्तर से नीचे कार्मिकों की भर्ती (पीबीओआर)[सम्पादन]

सेना में पीबीओआर की भर्ती खुली रैलियों द्वारा होती है। रैली स्थल पर उम्मीदवारों की प्राथमिक स्क्रीनिंग के बाद उनके दस्तावेजों की जांच तथा शरीरिक क्षमता की परीक्षा होती है। वहीं पर चिकित्सा अधिकारी द्वारा मेडिकल जांच भी की जाती है। इसके बाद शारीरिक रूप से सक्षम अभ्यार्थियों को एक लिखित परीक्षा भी देनी पड़ती है। सफल उम्मीदवारों को प्रशिक्षण के लिए संबद्ध प्रशिक्षण केंद्रों में भेज दिया जाता है।

47 रेजीमेंटल केंद्रों के अलावा ग्यारह जोनल भर्ती कार्यालय, दो गोरखा भर्ती डिपो तथा एक स्वतंत्र भर्ती कार्यालय अपने संबंधित क्षेत्रों में आयोजित रैलियों के जरिए भर्ती करते हैं।

भारतीय नौसेना में भर्ती[सम्पादन]

अधिकारियों की भर्ती — नौसेना की निम्नलिखित शाखाओं/कॉडरों में संघ लोकसेवा आयोग के अलावा अन्य तरीकों से भर्ती की जाती है।

(i) कार्यकारी — वायु परिवहन नियंत्रण/विधि/लॉजिस्टिक/नेवल अर्मामेंट इंस्पेक्टरेट (एनएआई)/ हाइड्रो कॉडर के लिए शार्ट सर्विस कमीशन तथा विधि/एनएआई कॉडरों के लिए स्थाई कमीशन।

(ii) इंजीनियरिंग (नेवल वास्तुकार सहित) — विश्वविद्यालय प्रवेश योजना (यूईएस), विशेष नेवल वास्तुकार प्रवेश योजना तथा एसएससी (ई) योजना के जरिए शार्ट सर्विस कमीशन। 10+2 (तकनीकी) योजना के जरिए स्थाई कमीशन।

(iii) इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग — यूईएस तथा एसएससी (एल) योजना के जरिए शार्ट सर्विस कमीशन में भर्ती। 10+2 (तकनीकी) योजना के जरिए स्थाई कमीशन।

(iv) शिक्षा शाखा — इस शाखा के लिए स्थाई तथा शार्ट सर्विस कमीशन योजनाएं विद्यमान हैं।

(v) 10+2 (तकनीकी) योजना — यह योजना भारतीय नौसेना की इंजीनियरिंग तथा इलेक्ट्रिकल शाखाओं में स्थाई कमीशन के लिए है। इस योजना के तहत एसएसबी द्वारा 10+2 पास चयनित अभ्यार्थियों को नेवल संचालन पाठ्यक्रमों के लिए नौसेना अकादमी में भेजा जाता है। इसके पश्चात उन्हें आईएनएस शिवाजी/वालसुरा पर चार वर्षीय इंजीनियरिंग कोर्स करना पड़ता है।

(vi) विश्वविद्यालय प्रवेश योजना (यूईएस) — इस योजना को शार्ट सर्विस कमीशन योजना के रूप में अगस्त, 2005 में पुन— शुरू किया गया है। नौसेना की तकनीकी शाखाओं/ कॉडरों में इंजीनियरिंग के फाइनल तथा प्री-फाइनल विद्यार्थी आवेदन के पात्र हैं।

(vii) महिला अधिकारी — महिलाएं नौसेना की शिक्षा शाखा तथा कार्यकारी (एटीसी, विधि तथा लॉजिस्टिक कैडरों) में शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारियों के रूप में शामिल हो रही हैं।

(viii) एसएससी अधिकारियों के लिए स्थाई कमीशन (महिला एवं पुरूष) — जनवरी, 2009 से इसमें शामिल होने वाले बैचों के लिए शिक्षा, एक्स/विधि तथा ई/नौसेना प्रशिक्षक कैडर के लिए स्थाई कमीशन दिया जाएगा।

(ix) एनसीसी के जरिए भर्ती — स्नातक परीक्षा में “बी” ग्रेड तथा 50 प्रतिशत अंक पाने वाले एनसीसी “सी” प्रमाणपत्रधारी स्नातक विद्यार्थी नौसेना में नियमित कमीशंड अधिकारी के लिए आवेदन के पात्र हैं। इन स्नातकों को सम्मिलित रक्षा सेवा परीक्षा में शामिल होने से छूट मिलती है तथा इनका चयन सीधे एसएसबी साक्षात्कार द्वारा होता है।

(x) विशेष नेवल वास्तुकार प्रवेश योजना — आईआईटी खड़गपुर, आईआईटी चेन्नई, कोचीन विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय तथा आंध्र विश्वविद्यालय में बी.टेक. (नेवल वास्तुकार) कोर्स कराए जाते हैं। नौसेना का एक दल यहां कैंपस साक्षात्कारों के जरिए अभ्यार्थियों का चयन करता है। समीप के सेना अस्पताल में इन अभ्यार्थियों की मेडिकल जांच की जाती है तथा अंतिम रूप से चयनित अभ्यार्थियों को प्रशिक्षण के लिए भेज दिया जाता है।

नाविकों की भर्ती — नौसेना में नाविकों की भर्ती लिखित परीक्षा, शारीरिक क्षमता परीक्षा तथा मेडिकल परीक्षा की प्रक्रिया के जरिए की जाती है। नाविकों की भर्ती के लिए विभिन्न प्रवेश योजनाएं इस प्रकार हैं-

(i) आर्टिफिशर अप्रेंटिस (एएएस)-10+2 (पीसीएम)

(ii) सीधा प्रवेश (डिप्लोमा धारक) [डीई(डीएच)]-मैकेनिकल/इलेक्ट्रिकल / इलेक्ट्रॉनिक्स / उत्पादन/एयरोनॉटिकल/मैटलर्जी/पोत निर्माण में डिप्लोमा।

(iii) मैट्रिक प्रवेश भर्ती-मैट्रीकुलेशन

(iv) नान-मैट्रिक प्रवेश भर्ती-मैट्रिक से नीचे

(v) सीधी भर्ती पैटी अधिकारी-उत्कृष्ट खिलाड़ी

भारतीय वायुसेना में भर्ती[सम्पादन]

भारतीय वायुसेना में अधिकारियों का चयन — भारतीय वायुसेना में संघ लोकसेवा आयोग द्वारा प्रवेश केवल फ्लाइंग शाखा के लिए होता है। तकनीकी तथा गैर तकनीकी शाखाओं में भर्ती वायुसेना मुख्यालय द्वारा की जाती है।

विभिन्न वायुसेना स्टेशनों पर महिला तथा पुरूष इंजीनियरिंग स्नातकों के लिए इंजीनियरिंग नॉलेज टेस्ट का आयोजन किया जाता है। इसके पश्चात वायुसेना चयन बोर्ड द्वारा चयन परीक्षा ली जाती है। 74 हफ्तों के सफल प्रशिक्षण के बाद इन्हें इलेक्ट्रॉनिक्स तथा मैकेनिकल शाखा में भेजा जाता है। विश्वविद्यालय प्रवेश योजना (यूईएस) के माध्यम से अधिसूचित इंजीनियरिंग शाखाओं के फाइनल तथा प्री-फाइनल विद्यार्थी आवेदन के पात्र होते हैं।

गैर-तकनीकी शाखाओं में भर्ती के लिए स्नातक तथा स्नातकोत्तर महिला और पुरूष उम्मीदवारों के लिए विभिन्न वायुसेना स्टेशनों पर वर्ष में दो बार संयुक्त प्रवेश परीक्षा का आयोजन किया जाता है, इसके बाद वायुसेना चयन बोर्ड द्वारा आयोजित चयन परीक्षा देनी पड़ती है।

वायुकर्मियों की भर्ती — नई दिल्ली स्थित केंद्रीय वायुकर्मी चयन बोर्ड पूरे देश में फैले अपने 14 चयन केंद्रों की सहायता से एक केंद्रीकृत चयन प्रणाली के जरिए अखिल भारतीय स्तर पर वायुकर्मी के तौर पर भर्ती के लिए योग्य उम्मीदवारों का चयन करता है।

राष्ट्रीय कैडेट कोर[सम्पादन]

राष्ट्रीय कैडेट कोर (एनसीसी) की स्थापना एनसीसी अधिनियम, 1948 के तहत की गई। इसने स्थापना के 59 वर्ष पूरे कर लिए हैं। एनसीसी देश के युवा वर्ग को उनके सम्पूर्ण विकास के अवसर उपलब्ध कराता है। उनमें प्रतिबद्धता, समर्पण, आत्मानुशासन और नैतिक मूल्यों के विकास के लिए काम करता है ताकि वे अच्छे नेता और उपयोगी नागरिक बन सकें तथा राष्ट्र की सेवा में उचित भूमिका निबाह सकें। एनसीसी कैडिटों की कुल अनुमोदित संख्या 13 लाख है। देश के लगभग 606 जिलों के 8454 स्कूलों तथा 5377 कॉलेजों में एनसीसी की उपस्थिति महसूस की जा सकती है।

नई दिल्ली स्थित एनसीसी महानिदेशालय देशभर में फैले सोलह एनसीसी निदेशालयों के जरिए विभिन्न गतिविधियों का संचालन और नियंत्रण करता है। समस्त नीति-निर्देशों के लिए एक केंद्रीय सलाहकार समिति है। एनसीसी में सेवाकर्मी, पूर्णकालिक महिला अधिकारी, शिक्षक, प्रोफेसर और नागरिक हैं। प्रत्येक शैक्षणिक संस्थान में एक लेक्चरर/शिक्षक की नियुक्ति एसोशिएट एनसीसी अधिकारी के रूप में होती है।

प्रादेशिक सेना[सम्पादन]

प्रादेशिक सेना एक स्वैच्छिक और अंशकालिक नागरिक सेना है। प्रादेशिक सेना के पीछे यह अवधारणा काम करती है कि युद्ध के समय तैनाती के लिए इनका उपयोग हो सकेगा और शांति काल में कम- से-कम खर्च में इनका रख-रखाव होगा। नियमित सेना के संसाधनों के पूरक के रूप में जीवन के हर क्षेत्र से इच्छुक, अनुशासित और समर्पित नागरिकों को लेकर कम लागत वाली इस सेना की तैयारी होती है। प्रादेशिक सेना में शामिल होने वाले नागरिकों को थोड़े समय के लिए कड़ा प्रशिक्षण पूरा करना होता है, जो उन्हें एक सक्षम सैनिक के रूप में तैयार करता है। इसके बाद इस प्रशिक्षण को बरकरार रखने के लिए वे प्रत्येक वर्ष दो महीनों के लिए अपनी-अपनी इकाइयों में जाते हैं।

इस सेना के गठन से ही विभिन्न व्यावहारिक अभियानों के लिए इनके साथ पैदल बटालियन को जोड़ा गया है। प्रादेशिक सेना की इकाइयों की सभी युद्धों में नियमित सेना के साथ भागीदारी रही है। हाल के समय में अधिकतम बाईस इकाइयों को ऑपरेशन रक्षक, ऑपरेशन विजय और ऑपरेशन पराक्रम में शामिल किया गया था। पूर्वोत्तर तथा जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की रोकथाम के लिए भी पैदल बटालियन को तैनात किया गया है। इसके अलावा रेलवे, तेल आपूर्ति, आपातकाल के दौरान चिकित्सा, चिकित्सा सुविधा जैसी आवश्यक सेवाएं बनाए रखने में भी इनका उपयोग किया गया है। कुछ इकाइयों को पर्यावरण तथा वनीकरण जैसे राष्ट्रीय विकास कार्यों में भी लगाया गया है।

प्रशिक्षण संस्थान[सम्पादन]

रक्षा क्षेत्र में अनेक प्रशिक्षण संस्थान एक-दूसरे के सहयोग से कार्य कर रहे हैं। इनका विस्तृत ब्योरा आगे के पैरा में दिया गया है।

सैनिक स्कूल[सम्पादन]

सैनिक स्कूल केंद्रीय और राज्य सरकारों के संयुक्त उद्यम हैं। ये सैनिक स्कूल सोसाइटी के अधीन कार्य करते हैं। वर्तमान में 24 सैनिक विद्यालय सैनिक स्कूल सोसाइटी के द्वारा चलाए जा रहे हैं। रेवाड़ी में सैनिक स्कूल अप्रैल, 2009 से शुरू हुआ।

सैनिक स्कूलों के उद्देश्यों में आम आदमी तक ऊंची पब्लिक स्कूल शिक्षा की पहुंच बनाना, बच्चे के व्यक्तित्व का समग्र विकास करना एवं सशस्त्र सेनाओं के अधिकारी संवर्ग में क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करना शामिल है। यह स्कूल लड़कों को राष्ट्रीय रक्षा अकादमी की मार्पत सशस्त्र सेनाओं में शामिल होने के लिए शैक्षिक, शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार करते हैं।

मिलिट्री स्कूल[सम्पादन]

देश में पांच मिलिट्री स्कूल अजमेर, बंगलुरू, बेलगांव, चायल और धौलपुर में हैं, जो सीबीएससी से मान्यता प्राप्त हैं। यह मिलिट्री स्कूल अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा के आधार पर लड़कों को कक्षा 6 में प्रवेश देते हैं। इनमें से 67 प्रतिशत सीटें जे सी ओ/ओ आर के बच्चों के लिए आरक्षित होती है, उन्हें “अधिकृत श्रेणी” कहते हैं। शेष 33 प्रतिशत सीटों में से 20 प्रतिशत सीटें सर्विस अधिकारियों के बच्चों के लिए आरक्षित हैं।

राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज[सम्पादन]

भारतीय सशस्त्र बल में अधिकारी बनने के इच्छुक तथा भारत में जन्मे या रहने वाले लड़कों को आवश्यक प्राथमिक प्रशिक्षण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज (आरआईएमसी), देहरादून की स्थापना 13 मार्च, 1922 को की गई। आरआईएमसी इस समय देश के प्रमुख शिक्षा संस्थानों में से एक है। इस कॉलेज के लिए चयन एक परीक्षा तथा वायवा द्वारा होता है। यह संस्थान आज राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, खडगवासला, पुणे के एक सहयोगी संस्थान के रूप में काम कर रहा है।

राष्ट्रीय रक्षा अकादमी[सम्पादन]

राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए), खडगवासला एक प्रमुख अंतर-सेवा प्रशिक्षण सस्ंथान है, जहां सशस्त्र बलों के भावी ऑफिसर्स को प्रशिक्षण दिया जाता है। यह प्रशिक्षण तीन वर्षों का होता है। इसके बाद कैडिट्स अपनी संबंधित सेवा अकादमियों में जाते हैं, जैसे-इंडियन मिलिट्री अकादमी, नेवल अकादमी या वायुसेना अकादमी।

इंडियन मिलिट्री अकादमी[सम्पादन]

इंडियन मिलिट्री अकादमी (आईएमए), देहरादून युवाओं को साहसी, ऊर्जावान और प्रतिभा संपन्न अधिकारी बनाता है, जो युद्ध की विभीषिकाओं का मुकाबला कर सकें और देश की सीमाओं की सुरक्षा करते हुए हर कठिनाई का सामना कर सकें। 1932 में स्थापित आईएमए सेना में कमीशन के लिए कैडेट्स को आवश्यक प्रशिक्षण प्रदान करता है।

ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी[सम्पादन]

21 सितंबर, 1992 से थलसेना में महिलाओं की भर्ती शुरू होने से अब तक प्रत्येक वर्ष लगभग सौ महिला अधिकारियों को कमीशन किया गया है। अकादमी में शॉर्ट सर्विस कमीशन के लिए केडेट को प्रशिक्षण दिया जाता है। इन अधिकारियों को एजुकेशन कार्पआर्मी सर्विस कार्प, जज एडवोकट जनरल विभाग, इंजिनियर्स, सिग्नल आदि में नियुक्ति दी जाती है।

डिफेंस सर्विसेज स्टॉफ कॉलेज[सम्पादन]

डिफेंस सर्विसेज स्टॉफ कॉलेज (डीएसएससी), वेलिंगटन एक प्रमुख सेवा प्रशिक्षण संस्थान है, जिसकी स्थापना का उद्देश्य भारतीय सशस्त्र सेनाओं की तीनों शाखाओं, बाहरी मित्र देशों तथा भारतीय सिविल सर्विसेज के मध्यक्रम के अधिकारी (मेजर तथा समकक्ष) को आवश्यक प्रशिक्षण देना है।

रक्षा प्रबंधन कॉलेज[सम्पादन]

रक्षा प्रबंधन कॉलेज तीन दशक से त्रि-सेवा ेAब वर्ग प्रशिक्षण संस्थान है। सशस्त्र बलों के वरिष्ठ नेतृत्व में सामायिक प्रबंधन विचारों, सिद्धांतों और व्यवहार को उत्तरदायित्व के साथ समाहित करने का कार्य कर रहा है। सीडीएम के कोर पाठ्यक्रमों जैसे प्रबंधन अध्ययन में मास्टर डिग्री के लिए उस्मानिया विश्वविद्यालय ने मान्यता दी है।

कॉलेज ऑफ मिलिट्री इंजीनियरिंग[सम्पादन]

मिलिट्री अभियांत्रिकी महाविद्यालय (सीएमई), पुणे एक प्रमुख तकनीकी संस्थान है। यहां इंजीनियरिंग कोर, अन्य सशस्त्र सेवाओं, नौसेना, वायुसेना, अर्द्धसैनिक बल, पुलिस तथा सिविलियन को प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके अलावा मित्र राष्ट्रों के कर्मियों को भी यहां प्रशिक्षण दिया जाता है। सीएमई जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से बीटेक और एमटेक डिग्री प्रदान करने के लिए मान्यता प्राप्त है।

नेशनल डिफेंस कॉलेज[सम्पादन]

राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय (एनडीसी) देश का एकमात्र संस्थान है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा तथा रणनीति के प्रत्येक पहलू के बारे में ज्ञान प्रदान करता है। एनडीसी वरिष्ठ रक्षा तथा सिविल सेवा के अधिकारी राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीति पर सैंतालीस सप्ताह का एक व्यापक कार्यक्रम चलाता है।

उत्पादन[सम्पादन]

रक्षा उत्पादन विभाग निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र दोनों में रक्षा उपकरणों के स्वदेशीकरण, विकास तथा उत्पादन हेतु कार्य करता है। इसमें 39 आयुध कारखाने तथा आठ रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम शामिल हैं। इन आयुध कारखानों में विमानों और हेलीकाप्टरों के लिए मूल सुविधाएं और युद्धपोतों, पनडुब्बियों, भारी वाहनों, मिसाइलों आदि के लिए तरह-तरह के इलेक्ट्रानिक उपकरण और कल पुर्जे और विशेष काम आने वाला इस्पात और धातु मिश्रण तैयार किए जाते हैं। आत्मनिर्भरता के उद्देश्य के साथ आजादी के बाद रक्षा उत्पादन क्षेत्र सतत विकसित हुआ है।

आयुध-कारखाने[सम्पादन]

आयुध निर्माणी संगठन देश का विभागीय रूप से संचालित सबसे बड़ा संगठन है और यह सशस्त्र सेनाओं के लिए रक्षा सामग्री तैयार करता है। आयुध कारखानों की स्थापना रक्षा उपकरणों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उद्देश्य से हुई थी।

आयुध कारखाने पुरानी तथा आधुनिक तकनीकों से सिîात कारखानों का बेहतरीन संगम हैं। 1801 में कोलकाता के निकट काशीपोर में पहला आयुध कारखाना लगाया गया था। पूरे देश में 24 स्थानों पर 39 आयुध कारखाने हैं। नालंदा तथा कोरबा के आयुध कारखाने परियोजना के स्तर पर हैं।

आजादी पूर्व के कारखानों की, सिविल क्षेत्र में औद्योगिक ढांचे के अपर्याप्त होने के कारण बुनियादी तथा इंटरमीडिएट सामग्री उत्पादन क्षमता थी। आजादी बाद सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के क्रमिक विकास के चलते अपनी जरूरतों को आरूटसोर्स करना शुरू कर दिया है। रक्षा बलों की बढ़ती आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कारखाने निर्माण प्रौद्योगिकियों को अपग्रेड करते रहे हैं। गैर-रक्षा ग्राहकों तथा निर्यात और रक्षा बलों के उपयोग के लिए अधिकतम क्षमता हासिल करने की नीति पर जोर दिया जा रहा है।

रक्षा उपक्रम[सम्पादन]

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल)[सम्पादन]

यह रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र का एक “नवरत्न” उपक्रम है। एयरोस्पेस क्षेत्र में रणनीतिक आत्मनिर्भरता प्राप्त करने तथा रक्षा सेवाओं को पूरा सहयोग प्रदान करने के लिए कंपनी प्रतिबंद्ध है। इसके कोर व्यवसाय में शामिल हैं- डिजाइन, फिक्स विंग एयरक्राफ्ट तथा हेलीकाप्टर (लड़ाकू, प्रशिक्षक तथा परिवहन) का विकास और उत्पादन, उनकी सहायक सामग्रियां, लाइफसाइकल ग्राहक सेवा, एयरोस्पेस उत्पादों की मरम्मत तथा ढांचे का निर्माण तथा स्पेस लांच व्हीकल और सेटेलाइट के लिए एकीकृत प्रणाली का उत्पादन। कंपनी ने 11 एयरक्राफ्ट इन हाउस तथा 14 प्रकार के लाइसेंस के तहत उत्पादित किए हैं। देश के अंतरिक्ष कार्यक्रमों में भी कंपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड (बीईएल)[सम्पादन]

बेल रडार तथा सोनार, संचार उपकरण, ऑप्टो-इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, टेंक इलेक्ट्रॉनिक्स तथा रणनीतिक भागों के क्षेत्र में मजबूत उपस्थिति के साथ बहु-प्रौद्योगिक, बहु-उत्पाद कंपनी है। यह कंपनी सुरक्षा बलों सहित आल इंडिया रेडियो, दूरदर्शन, बीएसएनएल, एमटीएनएल वीएसएनएल. एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया जैसे सरकारी संस्थानों को इलेक्ट्रॉनिक उपकरण की आपूर्ति करती है।

भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड (बीईएमएललि)[सम्पादन]

यह कंपनी खनन और निर्माण उपकरणों, रक्षा उत्पादों, रेलवे तथा मेट्रो उत्पादों की डिजाइन, निर्माण, विपणन तथा विक्री बाद सहयोग के क्षेत्र में सक्रिय है। कंपनी अपने व्यापार विभाग के जरिए तथा अंतर्राष्ट्रीय बाजारों के लिए अपनी प्रौद्योगिकी तथा गैर-कंपनी उत्पादों, हिस्सों, एकत्रीकरण तथा कमोडिटियों के माध्यम से ई-इंजीनियरिंग समाधान मुहैया कराती है। बीईएमएल टाट्रा आधारित उच्च सचल ट्रकों, आर्मर्ड रिकवरी वाहनों, टेंक परिवहन ट्रेलरों, मिल रेल वैगन तथा कोचों, क्रेश फायर टेंडरों, एयरक्राफ्ट टोइंग ट्रेक्टरों, एयरक्राफ्ट वीपन लोडिंग ट्रॉली, बीएमपी कंबेट वाहनों के लिए ट्रांसमीशन प्रणालियों सहित युद्ध टेंकों के लिए सस्पेंशन प्रणाली के निर्माण और ग्राउंड सपोर्ट उपकरण तैयार करती है। कंपनी डीजीबीआर तथा सेना, सीमा सड़क निर्माण/देखरेख के लिए बुलडोजरों और मोटर-ग्रेडरों की आपूर्ति भी करती है।

मजगांव डॉक लिमिटेड (एमडीएल)[सम्पादन]

एमडीएल देश का प्रमुख शिप निर्माता है। जिसकी 6800 टन तक स्थांतरण क्षमता के युद्धपोत तथा 27000 डीडब्ल्युटी मर्चेंट पोत निर्माण की क्षमता है। यह तटों के फेब्रिकेशन, तेल निकालने तथा भारी इंजीनियरिंग कार्यों को यार्ड में पूरा करती है। कंपनी ने भारतीय नौ सेना को लिएंडर श्रेणी के 6 फ्रिगेट, गोदावरी श्रेणी के 3 फ्रिगेट, एक कैडेट प्रशिक्षण जहाज, 3 मिसाइल कर्वेट्स, 4 मिसाइल नाव 3 डेस्ट्रोयर्स तथा 2 पनडुब्बियां बनाकर सौंपी हैं।

गोवा शिपयार्ड (जीएसएल)[सम्पादन]

गोवा शिपयार्ड लि. भारतीय नौसेना, भारतीय तटरक्षक दल तथा अन्य के लिए मध्यम आकार की उच्च विकसित नौका निर्माण का अग्रणी शिपयार्ड है। 29 सितंबर, 1967 से निदेशकों के अपने बोर्ड के साथ इसने अपना कार्य प्रारंभ किया। मार्च, 2007 में भारत सरकार ने इसे I- श्रेणी के मिनी रत्न का दर्जा दिया। यह आईएसओ-9001 प्रमाणित कंपनी है।

गृह मंत्रालय के आदेशों के अनुपालन में कंपनी ने बिल्डिंग ग्लास री-इनफोर्सड प्लास्टिक (जीआरसी) में प्रमुख कार्य शुरू किया है। उड्डयन विशेषज्ञता के लिए जीएसएल तट आधारित परीक्षण सुविधा (एसबीटीएफ) के निर्माण में भी कदम रख रहा है।

गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड (जीआरएसई)[सम्पादन]

जीआरएसई का भारत के समुद्रीय हितों के विस्तार के साथ कदम बढ़ाना जारी है और अब पूर्वी भारत में एक अग्रणी शिप निर्माण यार्ड तथा उच्च मूल्य, उच्च प्रौद्योगिकी, जटिल इंजीनीयरिंग आइटमों के निर्माता के रूप में पहचाना जाता है। कंपनी को श्रेणी- 1 के मिनी रत्न का दर्जा प्रदान किया गया है। कंपनी की मुख्य व्यावसायिक गतिविधि भारतीय नौसेना तथा तट रक्षक के लिए शिप निर्माण तथा शिप मरम्मत करना है।

भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (बीडीएल)[सम्पादन]

निर्धारित लक्ष्यभेदी मिसाइलों के निमार्ण के लिए इसकी स्थापना 1970 में हुई। यह सार्वजनिक क्षेत्र के गिने-चुने युद्ध संबंधी उद्योगों में एक है और अति उन्नत गाइडेड मिसाइल प्रणाली के निर्माण की क्षमता रखता है। पी-II मिसाइल प्रणाली के स्वदेशी विकास के अतिरिक्त बीडीएल रूस के सहयोग से कांकर्स- एम तथा इनवार (3 यूबीके-20) मिसाइलों के निर्माण से भी जुड़ा है। बीडीएल तकनीकी अधिकृत/ समावेश के लिए डीआरडीओ से भी निकट से संबद्ध है। यह आकाश, नाग, आर्टिकल के-15, अग्नि के प्रतिरूप (ए 1, ए 2 तथा ए 3) जैसी मिसाइलों के परिक्षण के लिए डीआरडीओ को मिसाइल उप- प्रणाली इंटिग्रेटेड मिसाइल उपलब्ध कराता है।

मिश्र धातु निगम लिमिटेड (मिधानि)[सम्पादन]

रक्षा मंत्रालय के रक्षा उत्पादन विभाग की देखरेख में 1973 में इसका निगमीकरण किया गया। इसका उद्देश्य सुपरअलाय, टिटेनियम अलॉय और वैमानिकी, अंतरिक्ष, अस्त्र-शस्त्र, परमाणु ऊर्जा और नौसेना जैसे रणनीतिक महत्व के कामों में इस्तेमाल के लिए विशेष प्रकार के इस्पात के उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना था। मिधानि के उत्पादों में विशेष उत्पाद जैसे मालिबिडनम कॉयर तथा प्लेट, टाइटेनिटम तथा स्टेनलेस

स्टील टयूब्स, इलेक्ट्रिक तथा इलेक्ट्रानिक के लिए अलॉय, साफ्ट मेगनेटिक अलॉय, कंट्रोल्ड एक्सपेंशन अलॉय और रजिस्टेंस अलॉय शामिल हैं।

रक्षा अनुसंधान तथा विकास संगठन[सम्पादन]

रक्षा अनुसंधान तथा विकास संगठन रक्षा मंत्रालय की आर एंड डी विंग है जिसका विजन रक्षा प्रौद्योगिकियों में भारत का सशक्तिकरण करना है। इसका मिशन स्वदेशीकरण तथा नवाचार द्वारा समालोचनात्मक (ष्टह्म्itiष्ड्डद्य) रक्षा प्रौद्योगिकियों तथा प्रणालियों में स्वावलंबन प्राप्त करना है। साथ ही सशस्त्र सेनाओं को अति आधुनिक शस्त्र प्रणालियों तथा उपकरणों से सिîात करना है। डीआरडीओ का गठन 1958 में किया गया। इसे सेना के तकनीकी विकास स्थापना तथा रक्षा विज्ञान संगठन सहित तकनीकी विकास और उत्पादन निदेशालय का विलय कर स्थापित किया गया। डीआरडीओ का प्रमुख रक्षा मंत्री का वैज्ञानिक सलाहकार होता है जो रक्षा अनुसंधान और विकास विभाग का सचिव तथा अनुसंधान एवं विकास महानिदेशक भी होता है। इस संगठन के पहले प्रमुख मशहूर वैज्ञानिक तथा शिक्षा विद डा.डी.एस. कोठारी थे। रक्षामंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार की सहायता के लिए आठ मुख्य नियंत्रक होते हैं। डीआरडीओ का कॉरपोरेट मुख्यालय नई दिल्ली के राजाजी मार्ग स्थित डीआरडीओ बिल्डिंग में है।

संगठन का ढांचा द्विस्तरीय है, अर्थात नई दिल्ली में कॉरपोरेट मुख्यालय; तथा देशभर में प्रयोगशालाएं/स्थापनाएं, क्षेत्रीय केंद्र, फील्ड स्टेशन इत्यादि स्थित हैं। रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के अंतर्गत डीआरडीओ मुख्यालय के अधीन दो निदेशालय है अर्थात कॉरपोरेट निदेशालय तथा तकनीकी निदेशालय। अपनी कोर क्षमता के आधार पर प्रयोगशालाएं आठ छोटे समूहों में वर्गीकृत हैं। सरकार से नई परियोजनाओं के अनुमोदन, ढांचागत सुधार, नई सुविधाएं जुटाने, जारी परियोजनाओं की निगरानी और समीक्षा में सहायता करने तथा अन्य प्रयोगशालाओं को संबंधित तकनीकी निदेशालयों जैसे- एयरोनॉटिक्स, अर्मामेंट्स, कंबेट व्हीकल्स एवं इंजीनियंरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कंप्यूटर साइंसेज, सामग्रियां, मिसाइल, नौसेना अनुसंधान एवं विकास तथा जीवन विज्ञान का सहयोग प्राप्त होता है। ये निदेशालय प्रयोगशालाओं के लिए आर एंड डी मुख्यालय तथा भारत सरकार से “सिंगल विंडो” के रूप में कार्य करते हैं। व्यवसाय, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, प्रौद्योगिकी अर्जन, सार्वजनिक कार्य तथा संपदा सेवाओं सहित प्रौद्योगिकी विस्तार केंद्र तथा परस्पर संवाद निदेशालय और तकनीकी परीक्षण सैल सभी प्रमुख, वायुसेना प्रमुख नौसेना प्रमुख तथा एकीकृत रक्षा उप प्रमुख के वैज्ञानिक सलाहकार अपने-अपने प्रमुखों को तकनीकी निदेशकों के रूप में भी सेवाएं प्रदान करते हैं।

कॉरपोरेट निदेशालय जैसे बजट वित्त एवं लेखा निदेशालय, एक्स्ट्राम्युरल अनुसंधान एवं बौद्धिक संपदा अधिकार, मानव संसाधन विकास, प्रबंधन सेवाएं, सामग्री प्रबंधन, कार्मिक, योजना और समन्वय, पब्लिक इंटरफेस, राजभाषा और ओएम, निगरानी और सुरक्षा निदेशालय संसाधनों की योजना और उनका प्रबंधन करते हैं और अन्य सरकारी मंत्रालयों तथा विभाग के बीच कड़ी का कार्य करते हैं। वे मानव शक्ति, प्रशिक्षण तथा कैरियर विकास सहित वित्तीय प्रबंधन, चालू परियोजनाओं की योजना और समन्वय, संसदीय प्रश्नों, बड़े पैमाने पर जनता के साथ-साथ मीडिया, शिक्षाविदों तथा छात्रों को डीआरडीओ के कार्यक्रमों/नीतियों/निष्पादनों से संबंधित सूचना प्रदान करने जैसी इमेज निर्माण गतिविधियों में केंद्र (आरएसी) विभिन्न स्तरों पर वैज्ञानिकों की नई भर्तियां करता है तथा आवधिक आधार पर वैज्ञानिकों के प्रमोशन के लिए आकलन करता है। कार्मिक प्रतिभा प्रबंधन (सीईपीटीएएम) संगठन के

लिए “तकनीकी तथा अन्य स्टाफ” की भर्ती तथा प्रशिक्षण के लिए उत्तरदायी है। डीआरडीओ की निम्नलिखित जिम्मेदारियां हैं —

  1. उत्पादन के लिए डिजाइन, विकास और मार्गदर्शन, अतिआधुनिक सेंसर, शस्त्र प्रणालियां, प्लेटफार्म

और सहयोगी उपकरण (स्ट्रेटेजिक उपकरण, टेक्टिकल प्रणालियां, ड्यूअल यूज टेक्नोलॉजी)

  1. जीवन विज्ञान में अनुसंधान, सैनिकों की युद्ध प्रभावकारिता को श्रेष्ठता बनाना और उनका जीवन

स्तर संवारना विशेषकर कठिन वातावरण में।

  1. मजबूत रक्षा प्रौद्योगिकी बेस के लिए बुनियादी और उच्च प्रशिक्षित मानव शक्ति का विकास

डीआरडीओ राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित क्षेत्रों में वैज्ञानिक अनुसंधान डिजाइन और विकास के कार्यक्रमों को बनाता और क्रियान्वित करता है। यह राष्ट्रीय वैज्ञानिक संस्थानों, पीएसयू तथा निजी एजेंसियों के साथ मिलकर प्रमुख रक्षा संबंधी कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए नोडल एजेंसी के रूप में भी कार्य करता है। तीनों सेवाओं द्वारा निर्धारित आवश्यकताओं के अनुरूप इसने विश्वस्तरीय शस्त्र प्रणालियां और उपकरणों के उत्पादन में मार्गदर्शन किया है। इसके अतिरिक्त, डीआरडीओ स्टाफ जरूरतें, हासिल किए जाने वाली प्रणालियों का मूल्यांकन, अग्नि तथा विस्फोटक सुरक्षा, संचालन समस्याओं इत्यादि के गणितीय/सांख्यिकीय विश्लेषणों जैसे मामलों पर तकनीकी सलाह देकर सेना सेवाओं की सहायता करता है।

निम्नलिखित तथ्य डीआरडीओ के ढांचे तथा आयाम की झलक देते हैं—

  1. लैब/ईएसटीटीएस की कुल संख्या - 52
  2. प्रशिक्षण संस्थान - सीईपीटीएएम (दिल्ली), डीआईएटी (पुणे), आईटीएम (मसूरी)
  3. इंटीग्रेटड टैस्ट रेंज - 2
  4. कुल क्षमता - 28292
  5. वैज्ञानिक - 7454
  6. तकनीकी कार्मिक - 10433
  7. अन्य - 10405
  8. रक्षा आर एंड डी परिव्यय 2008-09 - 7694.41 (करोड़ रूपये में)
  9. रक्षा आर एंड डी बजट 2009-10 - 8481.54 (करोड़ रूपये में)

ठोस रूप में डीआरडीओ ने रणनीतिक तथा व्यावहारिक शस्त्र प्रणालियों की विशाल शृंखला तथा ऐसी प्रणालियों से जुड़ी जटिल प्रौद्योगिकियों को विकसित किया है। डीआरडीओ द्वारा विकसित प्रणालियों के लिए अब तक 35,000 करोड़ रूपये तक के ऑर्डर हैं। यद्धपि, डीआरडीओ उत्पादों का उत्पादन मूल्य राष्ट्र की रक्षा क्षमताओं पर इन विकास के प्रभाव का पैमाना नहीं है। इनमें से कई प्रणालियां, गतिरोधों और प्रौद्योगिकी देने से मना करने के युग में किसी अन्य देश के साथ न तो मांगी जा सकती हैं। और ना ही संयुक्त रूप में विकसित की जा सकती हैं। आधुनिक सेना प्रौद्योगिकियों से लैस विकसित देश उन प्रणालियों के लाइसेंसयुक्त उत्पादों का प्रस्ताव देते हैं जो उनके लिए पुरानी हो चुकी हैं और जिनमें मुशिकल से ही प्रौद्योगिकी हस्तांतरण होता है। अग्नि तथा पृथ्वी शृंखला की मिसाइलों, पनडुब्बी सहित बैलेस्टिक मिसाइल इत्यादि जैसी रणनीतिक प्रणालियों और प्लेटफार्मों के सफलतापूर्वक देसी विकास तथा उत्पादन ने भारत की सैनिक शक्ति को लंबी छलांग लगाने में सहायता की है। इससे प्रभावी रोधक पैदा करने और निर्णायक क्षमता प्रदान करने तथा ऐसी प्रौद्योगिकी रखने वाले इलीट क्लब में भारत का प्रवेश संभव हुआ है। विकसित उत्पाद और प्रणालियां/स्वीकृत/समाहित, विकसित प्रौद्योगिकियों और स्थापित ढांचागत सुविधाओं के रूप में डीआरडीओ के प्रत्येक समूह के प्रमुख योगदान —

समूह उत्पाद और प्रणालियां विकसित/स्वीकृत/समाहित प्रौद्योगिकियां विकसित तथा ढांचागत सुविधाएं स्थापित

एयरो एलसीए-तेजस भारत का पहला देसी डिजाइन विकसित उच्च जटिल प्रौद्योगिकी की विशाल शृंखला प्रणालियां तथा निर्मित मल्टी रोल लाइट कंबेट एयरक्राफ्ट (सात) तैयार की जा चुकी है और एलसीए-तेजस, ने 1150 उड़ाने भरी हैं। 2010-11 में 20 एलसीए के इसकी उप-प्रणालियों तथा गैस टर्बाइन इंजन- पहले दस्ते का शामिल होना। 2010 तक ही नौसेना के कावेरी के विकास की प्रक्रिया में विशाल लिए एलसीए का निर्माण। अन्य सफलता की कहानियां ढांचा खड़ा किया गया है। हैं- पायलट रहित लक्ष्य एयरक्राफ्ट, निशांत अनाम अस्थिर एयरोडायनामिक्स, अस्थिर, रूप रेखा एरियल व्हीकल, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर स्युट, उच्च सटीक एयरक्राफ्ट, फ्लाइ-बाइ-वायर डिजिटल दिशा सूचक चेतावनी रिसीवर (एचएडीएफ) आर फ्लाइट नियंत्रण प्रणाली, ओपन आर्किटेक्चर डब्ल्यूआर, कई लड़ाकू जहाजों के लिए मिशन कंप्यूटर मिशन एवियोनिक्स, विकसित मिश्रित ढांचा, तथा उड्डयन अपग्रेडेशन, मिसाइल अप्रोच चेतावनी अनुकरण के लिए हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर प्रणाली तथा लेजर चेतावनी प्रणाली विकसित की गई है और विभिन्न सैनिक जहाजों और हेलीकॉप्टरों पर लगाई जा रही हैं। बड़े लाभ सहित पनडुब्बी को चलाने के लिए कावेरी इंजन के कई प्रकार विकसित किए जा रहे हैं।

सशस्त्र डीआरडीओ द्वारा डिजाइन और विकसित अर्मामेंट की हाइड्रो-न्यूमेटिक सस्पेंसन, राकेट मोटर थर्मल डी सैन्य बड़ी संख्या शस्त्र बलों में शामिल की गई हैं। जब तक प्रोटेक्शन कंपोजिट प्रोपलेंट प्री-फ्रेगमेंट, प्रणालियां असॉल्ट राइफलों और एलएमजी के फिक्स और फोल्ड इंसेडियरी एंड बमलेट वार हेड इलेक्ट्रिक होने वाले बट वर्जन में 5.56 एमएमआईएनएसएएस और इलेक्ट्रो-हाइड्रॉलिक लांचर (भारतीय लघु शस्त्र प्रणाली) राष्ट्रफल उपलब्ध नहीं हुई तब तक डीआरडीओ द्वारा दस लाख से अधिक 7.62 एमएम ईशापोर सेल्फ लोडिंग राइफल (एसएलआर) बनाई गईं। सभी में एक तरह का गोला-बारूद इस्तेमाल होता है और लगभग 70 प्रतिशत पुर्जे भी समान ही हैं।

युद्ध प्रथम आर्मोरेड रेजीमेंट (45 टैंक) के लिए 45 सहित इंजन परीक्षण सुविधा, पारेषण परीक्षण सुविधा, वाहन 50 से अधिक मुख्य युद्ध टैंक-अर्जुन तथा एक्सप्लोसिव फुल इंजेक्शन पंप परीक्षण रिंग, वेरिएब्ल और रिएक्टिव आर्मर (ईआरए) सिîात 645 कंबेट इम्प्रूव्ड स्पीड ड्राइव परीक्षण सुविधा, रोड व्हील रक्षा 235

इंजीनि- अजय टैंक, ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम (जीपीएस), परीक्षण रिंग, एयर क्लीनर परीक्षण रिग, यरिंग इंटीग्रेटड फायर डिटेक्शन एंड सुप्रेशन प्रणाली (आई- सस्पेंशन परीक्षण सुविधा, हाइड्रोलिक परीक्षण एफडीएसएस) तथा रीकनफीगर्ड स्मोक ग्रेनेड डिस्चार्जर बैंच, सार्वभौमिक गीयर परीक्षण, अल्ट्रासॉनिक (एसजीडी) बनाए गए हैं। अन्य प्रमुख उपलब्धियां हैं — फ्लॉडिटेक्टर एयरक्राफ्ट गीयर बॉक्स परीक्षण भीम-76 स्वचालित 155 एमएनगन, अतिआधुनिक एमबी सुविधाएं, निम्न ताप चैंबर सहित पर्यावरणीय टी अर्जुन शस्त्र प्रणाली, ब्रिज लेयर अर्जुन टैंक (कुछ ही परीक्षण सुविधाएं, ड्राइविंग रेन चैंबर, जल घंटो में अर्जुन टैंक से बीएलटी में परिवर्तित होने की इमर्शन चैंबर, डस्ट चैंबर, साल्ट स्प्रे चैंबर, क्षमता), ब्रिज लेयर टैंक टी-72, सर्वत्र मोबाइल ब्रिज शॉक परीक्षण मशीन, तथा बंप परीक्षण मशीन, लेइंग प्रणाली, साकव 46 एम सिंगल स्पेन ब्रिज प्रणाली, परीक्षण ट्रेक सुविधा, इलेक्ट्रॉनिक तथा एमएलसी 70 तथा एमएलसी 40 मोड्युलर ब्रिज, केरियर इलेक्ट्रिकल उपकरणों के प्रदर्शन और कमांड पोस्ट ट्रेक्ड, बीएमपी-II एनबीसी प्रोटेक्टड संरचनात्मक इंटीग्रिटी के मूल्यांकन के लिए इंटीग्रेटड फील्ड शेल्टर, रिमोट चालित वाहन (दक्ष), ड्राइहीट चैंबर तथा डेंप हीट। रेपिड प्रोटोटाइपिंग आईईडी क्षमता वाला रोबोटिक वाहन, दंगा नियंत्रण तथा प्रोटोटाइप निर्माण सुविधाएं। वीआरडीई वाहन, मानवरहित ग्राउंड वाहन (यूजीवी), सशस्त्र में रक्षा और नागरिक वाहनों की आधुनिक अंबुलेंस बीएमपी-II, बीएमपी-II पर, केरियर मोर्टार ईएमसी परीक्षण सुविधा के साथ अति ट्रेक्ड, कंटेनराइज्ड आपरेशन बिएटर कांप्लेक्स ऑन आधुनिक उपकरणों से लैस एक राष्ट्रीय व्हील्स, विभिन्न देसी स्ट्रेटेजिक एंड टेक्टिकल मिसाइलों ऑटोमोटिव परीक्षण केंद्र तैयार किया है जो के लिए जीएसवी, निशांत लांचर,टी-72 टैंक पर काउंटर विश्व स्तरीय है। माइनफ्लेल (सीएमएफ), स्नो गैलरी, स्नो प्रेशर के प्रभावी स्थानांतरण के लिए माइक्रो पाइल फाउंडेशन।

इलेक्ट्रॉ- आर्टिलरी कंबेट कमांड कंट्रोल सिस्टम (एसीसीसी) उच्च परिशुद्धता दिशा खोजी प्रौद्योगिकी, उच्च निक और भारतीय डॉप्लर रडार इंद्र-I और II, मल्टीफंक्शन फेज्ड शक्ति जैमिंग, वॉयस रिकग्नीशन और वॉयस कंप्यूटर अरे रडार-राजेंद्र, सुपरविजन मेरिटाइम पेट्रोल रडार प्रिंट एनालिसिस डेटा/इमेज फ्यूजन, जैम- प्रणालियां (एसवी-2000 एमपीएआर), अवेलेंची विक्टिम डिटेक्टर रेजिस्टेंट डेंटा लिंक सी 1 प्रणालियां, (एवीडी), बेटलफील्ड और पेरीमीटर सर्वेलांस-बी एफ मल्टीफंक्शन इलेक्ट्रॉनिक स्केनिंग रडार, पैरेलल एसआर, का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया गया है। प्रोसेसिंग, 1-4 सीएमओएस फेब्रिकेशन इलैक्ट्रॉनिक वारफेयर प्रणालियां समुक्ता और संग्रह सेना प्रौद्योगिकी जीएएस क्रिस्टल ग्रोथ सुविधा, तथा नौसेना के लिए, 3डी-सीएआर मध्यम दूरी का पूर्व मॉल्युकुलर बीम एपिटेक्सी सिस्टम, इयोनच ेतावनी सेंसर-रेवती नौसेना के लिए, शस्त्र दिशा सूचक इंप्लांटेशन प्रणाली, इलेक्ट्रॉन बीम माइक्रो रडार इथोन-51 इलेक्ट्रो-ऑप्टिक फायर कंट्रोल प्रणाली, लिथोग्राफी प्रणाली, एम ओसीवीडी प्रणाली, ब्रीफकेस सेटकॉम टर्मिनल, सेक्टेल (सुरक्षित टेलीफोन), मास्क फेब्रिकेशन सुविधा, एमएमआईसी के कंपेक्ट कम्युनिकेशन इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर स्यूट-सुजव, फेब्रिकेशन के लिए फेब लाइन, यूएचवी. इंटीग्रेटड वीपन सिस्टम सिम्युलेशन, आई सेफ लेजर्स, प्रोसेसिंग स्टेशन, प्रोसिजन मशीनी सुविधा, लेजर डेजिग्नेटर, लेजर चेतावनी सेंसर, पामटॉप ग्रीन सिंगल पॉइंट डाइमंड टर्निंग (एसपीडीटी) माइक्रो चिप लेजर मॉड्यूल, ईओसीएम-क्लास लेजर माइक्रो-मशीनी सुविधा। लेजर प्रणाली तथा एस-बैंड 130 केडब्ल्यु (पल्सड) कपल्ड-केविटी टीडब्ल्यु टी।

जीवन थल सेना, नौसेना और वायु सेना कर्मियों के लिए जीवन जीवन रक्षक प्रौद्योगिकियां, एनबीसी रक्षा विज्ञान रक्षक प्रणालियां, 30,000 फीटएनबीसी केनिस्टर से फ्री प्रौद्योगिकियां मिलिट्री न्यूट्रीशन (ताजा और प्रणालियां फाल की कठिन परिस्थितियों में कार्य करने वाली फ्री परिवर्धित खाद्य प्रौद्योगिकी), मिलिट्री मनो- 236 भारत-2010

फाल प्रणाली, जल विष खोजी किट, पोर्टेबल विज्ञान और कार्मिक चयन, मेन-मशीन डिकंटेमिनेशन उपकरण, एनबीसी फिल्टर/वेंटिलेशन इंटरफेस, पानी से फ्लोराइड अलग करने की प्रणालियां, सीडब्ल्यू टाइप ए/बी डिकंटेमिनेशन किट/ प्रौद्योगिकी, पानी से आर्सोनिक आयरन अलग सॉल्युशन, हर्बल एंटीऑक्सीडेंट सप्लीमेंट, हाईएल्टीट्यूड करने की प्रौद्योगिकी शीतकाल में आलू स्टोर अडेप्टड एंड फास्ट ग्रोइंग बॉइलर शीप, बायोडीजल करने की प्रौद्योगिकी। उत्पादन, ठंड बर्दाशत करने वाली सब्जियां, हाइपर बेरिक ऑक्सीजन थैरेपी चैंबर (समुद्रसुता), कड़ाके की ठंड के लिए गर्म दस्ताने और मौजे, 65° ष्ट पर लंबी अवधि तक तैयार डिब्बाबंद भोजन को रखने और गर्म करने की प्रणाली, कड़ाके की सर्दी के लिए मानव अपव्यय के परिशोधन के लिए बायो-डाइजेस्टर जिसे रेलवे लाइन पर गंदगी रोकने के लिए रेलवे कोच में भी लागू किया जा रहा है। मल्टी-इंसेक्ट रिपेलेंट डीईपीए कंप्यूटरीकृत पायलट चुनाव प्रणाली (सीपीएसएस), एनबीसी और हाई एल्टीट्यूड चिकित्सा उत्पाद। सामग्रियां नौसेना अनुप्रयोग के लिए एबी श्रेणी का इस्पात, कंपोजिट आर्मर संबंधी प्रौद्योगिकी, नौसेना टाइटेनियम स्पंज, एनबीसी संरक्षित वस्त्र/भेद्य सूट, के लिए विशेष इस्पात, गैस टर्बाइन के लिए कड़ाके की ठंड में पहने जाने वाले वस्त्र, विस्फोटक कास्ट एयरफॉइल, टाइटेनियम अलॉय, रेयरअर्थ संरक्षित सूट, सिंथेटिक लाइफ जैकेट, दंगारोधी पॉली धातु आधारित उच्च ऊर्जा वाली चुंबकें, लड़ाकू कार्बोनेट शील्ड, दंगारोधी हेल्मेट, विमान के लिए वाहनों के लिए आर्मर, एनबीसी रक्षा, डिजर्ट ब्रेकपैड, भारीधातु पेनिट्रेटर रॉड, जैकाल आर्मर, कंचन प्रणालियां और रेडिएशन इंस्ट्रमेंटेशन। आर्मर, पनडुब्बी अनुप्रयोगों के लिए हाइड्रॉलिक पाइप- लाइन, टर्बाइन कंपोनेंट की इनवेस्टमेंट कास्टिंग आदि। मिसाइल जमीन से जमीन वाली मिसाइल प्रणालियां-अग्नि I (700 देश में विकसित की जाने वाली प्रौद्योगिकियां, प्रणालियां किमी), अग्नि-II (2000 किमी) तथा अग्नि III फाइबर ऑप्टिक गाइरो का परीक्षण तथा (3000 किमी) तथा पृथ्वी शृंखला। सेना और नौसेना उत्पादन, रिंग लेजर गाइरो, एक्सीलटो-मीटर, के लिए सुपरसॉनिक क्रूज मिसाइल-ब्र±मोस धनुष-शिप इनार्शियल/ऑटोनॉमस नेविगेशन प्रणालियां, लांच्ड एसएस मिसाइल, मल्टी-डाइरेक्शनल, आकाश मेम्स तथा मेम्स आधारित सेंसर, डाइरेक्ट मल्टी टार्गेट सेम एरिया डिफेंस वीपन सिस्टम-आकाश, एक्शन ट्रेजेक्टरी तथा एल्टीट्यूड नियंत्रण थर्ड जेनरेशन एंटी टैंक मिसाइल। 2000 किमी तक की प्रणाली, लंबी दूरी के ठोस राकेट मोटर, प्री- बैलेस्टिक मिसाइल का मुकाबला करने वाली एयर फ्रेग्मेंटड और सबम्युनीशन वार हेड, कमांड डिफेंस प्रणाली लंबी दूरी की मिसाइल और एयरक्राफ्टों गाइडेंस के लिए प्रौद्योगिकियां, रैम राकेट के लिए रिन्स-टिंग लेजर गाइरो आधारित आईएनएस- प्रोपल्शन, मल्टी टार्गेट एंगेजमेंट मूविंग शिप जीपीएस-ग्लोनेस, मिलीमीटर वेव सीकर, मिंग्स-मेम्स के लिए लांच प्लेटफार्म का ट्विन-इंजन आधारित हाइब्रिड नेविगेशन सिस्टम, सेना तथा वायु लिक्विड प्रोपल्शन स्टेबिलाइजेशन मल्टी सेना के लिए कंप्यूटरीकृत बार गेम। ब्रांड रडार सीकर परीक्षण सुविधा, इलेक्ट्रो- मैग्नेटिक पल्स सुविधा, इलेक्ट्रो-हाइड्रॉलिक सर्वो वाल्स लि. उत्पादन सुविधा, ठोस प्रोपलेंट प्रोसेसिंग सुविधा।

नौसेना शिप-बोर्न सोनार हमसा, एयर बोर्न डंकिंग सोनार मिहिर, तैरती प्रयोगशाला-आईएनएस-सागर ध्वनि, प्रणालियां सब मेरीन-सोनार 3 शूस, टॉरपीडो एडवांस्ड लाइट अंडरवाटर अकॉस्टिक्स अनुसंधान सुविधा, (टीएएल), टॉरपीडो फायर नियंत्रण प्रणाली, अंडरवाटर हाइड्रोडायमिक परीक्षण सुविधाएं, शॉक नॉइज

टेलीफोन (यूडब्ल्यूटी), टेडपोल, स्व-नियंत्रित कार्बन और वाइब्रेशन परीक्षण सुविधाएं, टॉरपीडो डाइआक्साइड प्रणाली, पॉली-लिस्ट डॉकब्लॉक। इंजीनियंरिंग केंद्र, मेट्स सुविधाएं, दर्पण को सिस्टम लेवल सिम्युलेशन प्रदान करने के लिए कल्स्टर कंप्यूटिंग सुविधा। प्रोटोटाइप निर्माण सुविधा।

डीआरडी का सबसे अधिक महत्वपूर्ण योगदान शैक्षणिक/अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के साथ भागीदारी बढ़ाकर अतिआधुनिक विकास के लिए प्रेरक एक प्रणाली का सृजन है। इसके अलावा बुनियादी ढांचा-संगठन के भीतर और सहयोगी संस्थानों दोनों में खड़ा करना; उत्कृष्टता संस्थान और उच्च गुणवत्ता के मानव संसाधन का सृजन भी शामिल है। आज डीआरडीओ के पास कोर क्षमताओं का विशाल फलक है जिसमें शामिल हैं- सिस्टम डिजाइन और जटिल सेंसरों का एकीकरण शस्त्र प्रणालियां और प्लेटफार्म, कांप्लेक्स हाई-एंड सॉफ्टवेयर पैकेज, कार्यकारी सामग्रियां, परीक्षण और मूल्यांकन, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा अवशोषण इत्यादि। इसके अतिरिक्त, संबंधित क्षेत्रों में बुनियादी/अनुप्रयुक्त अनुसंधान के लिए विशेषज्ञता और बुनियादी ढांचा खड़ा किया गया है। डीआरडीओ द्वारा तैयार ढांचागत सुविधाएं राष्ट्रीय परिसंपत्ति हैं और इसमें एकीकृत यांत्रिक फ्लाइट परीक्षण रेंज, एयरक्राफ्टों के लिए संरचनात्मक डायनामिक्स और कंपन परीक्षण सुविधा, ईडब्ल्यु परीक्षण रेंज, प्रपल्सन और बैलेस्टिक परीक्षण सुविधाएं, ईएमआई/ ईएमसी परीक्षण रिंग, ईएमपी/प्रकाश करना, एंटेनी परीक्षण रेंज, यांत्रिक शिप, अकॉस्टि अनुसंधान शिप, पानी के नीचे शस्त्र परीक्षण रेंज, लैंड प्रणाली के लिए परीक्षण ट्रेक इत्यादि। अन्य अमूर्त लाभ हैं- सैन्य कौशलता और अग्रणी प्रौद्योगिकियों की विशाल शृंखला में सक्षमता, कंपोनेंट की सतत आपूर्ति की सुनिश्चितता, बदलते अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में स्पेयर्स तथा आत्मनिर्भरता वाले रक्षा और आर एंड डी बेस को विकसित करना।

हमारे राष्ट्र निर्माण उद्यमों के प्रमुख भागीदारी की प्रयोक्ता सेवाओं की तीन शाखाएं हैं - रक्षा, सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयां, निजी उद्योग, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग तथा अकादमिक/अनुसंधान कर्ता। रक्षा सहयोग पर लगभग 35 देशों के साथ अंतर-सरकारी समझौते/एमओयू लागू हैं। उच्च प्रौद्योगिकी रक्षा संस्थान (मानद विश्वविद्यालय) पुणे में विकासशील देशों के वैज्ञानिकों/इंजीनियरिंग कार्मिकों को विशेष रक्षा प्रौद्योगिकी संबंधी क्षेत्रों में प्रशिक्षण दिया जाता है। डीआरडीओ रक्षा उत्पादन में भारतीय उद्योगों की भागीदारी को सक्रियता से बढ़ावा दे रहा है। परिणामस्वरूप, पीएसयू और निजी क्षेत्रों दोनों उद्योगों में पर्याप्त बढ़ोतरी हुई है। डीआरडीओ एकीकृत रक्षा स्टाफ और सेवा मुख्यालय के माध्यम से प्रयुक्त सेवाओं के बीच सक्रिय है। देश के भीतर स्थापित किए जाने वाले उत्पादों तथा सूक्ष्म प्रौद्योगिकी की पहचान के लिए एस एंड टी रोड मेप्स और तीनों सेवाएं अध्ययन कराती हैं। प्रौद्योगिकियों को “खरीदो”, “बनाओ” तथा “खरीदो और बनाओ” श्रेणियों में बांटा गया है। रणनीति इन्हें देश में निम्नलिखित में से किसी एक मार्ग द्वारा स्थापित करने की है- डीआरडीओ में ही विकास, राष्ट्रीय एस एंड टी लेबों और अकादमिया के जरिए संयुक्त विकास, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के जरिए विकास, ऑफसेट बाध्यताओं के माध्यम से समृद्ध प्रौद्योगिकियों का अधिग्रहण। 33 देशों के साथ इस क्षेत्र में समझौते हैं। प्रमुख विदेशी भागीदार हैं-रूस, सूएसए, फ्रांस, इजराइल, जर्मनी, यूके, सिंगापुर कजाकिस्तान। डीआरडीओ के अपने प्रमुख विदेशी भागीदारों के साथ सहयोग के लिए संयुक्त कार्य समूह भी हैं। ऐसे तीन समूह हैं-भारतयूएस संयुक्त प्रौद्योगिकी समूह, भारत-रूस आर एंड डी उप समूह तथा भारत-इजराइल प्रबंध समिति। वित्त वर्ष 2008-09 के दौरान 7,694 करोड़ रूपये का रक्षा अनुसंधान व्यय देश के कुल 1,14,600.28

करोड़ रूपयों के रक्षा सेवा व्यय का मात्र 6.67 प्रतिशत है। इसमें 77 प्रतिशत से अधिक अनुसंधान गतिविधियों तथा इनके लिए ढांचागत सुविधाएं तैयार करने पर था। चालू वित्त वर्ष (2009-10) के लिए रक्षा अनुसंधान और विकास बजट 8481 करोड़ रूपये है। रक्षा सेवा बजट 1,41,703 करोड़ रूपये का 5.98 प्रतिशत होने के नाते बजट का 44 प्रतिशत केपिटल हेड के तहत है। रक्षा अनुसंधान बजट का पर्याप्त हिस्सा लेते हुए रणनीतिक प्रणालियां प्राथमिकता पर हैं।

ज्ञान आधारित संगठन होने के नाते, डीआरडीओ अपनी संस्कृति के रूप में बौद्धिक संपदा अधिकारों को पैदा और उनकी रक्षा कर रहा है। डीआरडीओ ने अब तक 416 से अधिक भारतीय तथा 45 विदेशी पेटेंट/डिजाइन/कॉपीराइट लिए हैं जबकि 459 भारतीय और 110 विदेशी पेटेंट प्राप्त करने की प्रक्रियाधीन हैं। हमारे वैज्ञानिकों द्वारा काफी संख्या में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पेपर प्रकाशित किए जा रहे हैं। डीआरडीओ में अकेले डीआरडीएस श्रेणी में 640 से अधिक पीएचडी हैं। राष्ट्र और विशाल बौद्धिक संपदा के मालिक के लिए यह सही मायने में एक “नॉलेज बैंक” है। डीआरडीओ अपने कामचारियों को संचालन, स्वायत्तता, वित्तीय तथा प्रबंधकीय जिम्मेदारियां, उच्च प्रशिक्षण और कैरियर के मामलों में पर्याप्त व्यावसायिक मौके प्रदान करता है। वैज्ञानिकों की स्व-विकास आवश्यकताओं पर भी ध्यान दिया जाता है। संगठन के कर्मचारी अपूर्व प्रकृति की दैनिक ड्यूटी निभाते हैं। कई परियोजनाएं मिशन मोड की और फील्ड आधारित हैं। रेतीले और ऊंचे ठंडे क्षेत्रों जैसी कठिन परिस्थितियों के अंदर महीनों तक फील्ड ट्रायलों को अंजाम देने के अलावा, डीआरडीओ के वैज्ञानिक अक्सर लेह, तेजपुर आदि कठिन केंद्रों पर भी तैनात किए जाते हैं। वैज्ञानिकों से अपनी परियोजना जिम्मेदारियों के रूप में सघन वायु और समुद्री सेवाओं संबंधी ट्रायल करने की अपेक्षा की जाती है।

डीआरडीओ कैरियर विकल्प के रूप में रक्षा एस एंड टी को लेने के लिए युवा छात्रों को आकर्षित करता है। डीआरडीओ में विभिन्न स्कीमों के माध्यम से सक्षम मानव शक्ति शामिल की जाती है। ये स्कीमें हैं- अखिल भारतीय डीआरडीओ वैज्ञानिक प्रवेश परीक्षा (सेट), वार्षिक कैंपस प्रति का खोज, रोसा स्कीम के तहत हाल ही में पीएचडी पूरी करने वाले उम्मीदवारों का बतौर वैज्ञानिक चयन, एनआरआई के लिए ऑन लाइन चयन तथा पाशिर्वक प्रवेश स्कीम के अंतर्गत वैज्ञानिकों का चयन। “बलस्य मूलम विज्ञानम” अर्थात “बल का स्रोत विज्ञान है।” डीआरडीओ की टेगलाइन है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के संदर्भ में खासकर सैन्य प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में राष्ट्र को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने के लिए डीआरडीओ कृत संकल्प है।

पूर्व सैनिकों का पुनर्वास[सम्पादन]

भूतपूर्व सैनिकों के पुनर्वास की योजनाएं पूर्व सैनिक कल्याण विभाग बनाता है। इस विभाग में दो प्रभाग हैं-पुनर्वास प्रभाग और पेंशन प्रभाग। इनकी सहायता के लिए दो अंतर्सेना संगठन हैं-अर्थात पुनर्वास महानिदेशालय और केंद्रीय सैनिक बोर्ड (केएसबी)। रक्षा मंत्री केंद्रीय सैनिक बोर्ड के प्रमुख और इस बोर्ड के पदेन अध्यक्ष होते हैं। वह भूतपूर्व सैनिकों और उनके परिवार के लोगों के पुनर्वास की नीति निर्धारित करते हैं और कल्याण कोष के प्रशासन की दिशा भी तय करते हैं। पुनर्वास महानिदेशालय सरकार की विभिन्न नीतियों/योजनाओं/कार्यक्रमों को कार्यान्वित करता है।

केंद्रीय सैनिक बोर्ड/पुनर्वास महानिदेशालय की विभिन्न राज्यों के सैनिक बोर्ड/जिला सैनिक बोर्ड सहायता करते हैं। ये राज्य सरकारों के प्रशासनिक नियंत्रण में होते हैं। राज्य सैनिक बोर्डों पर होने वाले

खर्च का 50 प्रतिशत भार केंद्र वहन करता है। शेष 50 प्रतिशत संबद्ध राज्य द्वारा वहन किया जाता है क्योंकि भूतपूर्व सैनिकों का पुनर्वास राज्य और केंद्र का संयुक्त दायित्व है।

पुनर्वास महानिदेशालय, केंद्रीय सैनिक बोर्ड और राज्य सैनिक बोर्डों और जिला सैनिक बोर्डों के मिले-जुले प्रयासों का मुख्य जोर इस बात पर होता है कि पूर्व सैनिकों को सम्मानपूर्वक फिर से रोजगार दिया जा सके और उन्हें रोजगार के विभिन्न अवसर उपलब्ध कराए जाएं। प्रत्येक वर्ष लगभग साठ हजार कार्मिक सेना से सेवानिवृत होते हैं या सक्रिय सेवा से हटाए जाते है; उनमें से अधिकतर की आयु 3545 वर्ष होती है। इन्हें राष्ट्रीय निर्माण के कार्य में लगाने की जरूरत है। पूर्व सैनिकों को फिर से काम धंधे से लगाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार निम्नलिखित प्रकार के उपाय करती है—(क) ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम जिनके जरिए सेवानिवृत्त रक्षा कार्मिकों को काम धंधे में लगाया जा सके। (ख) सरकारी/सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों में रोजगार के अवसर देने के उद्देश्य से पदों का आरक्षण तथा कारपोरेट सेक्टर में काम पाने में उनकी मदद करना। (ग) स्वरोजगार की योजनाएं और (घ) उद्यमिता और लघु उद्योग शुरू करने में सहायता।

अधिकारी प्रशिक्षण[सम्पादन]

पुनर्वास महानिदेशालय अधिकारियों के लिए भी रोजगार उन्मुख प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करता है। एक से तीन महीने के व्यावसायिक पाठ्यक्रम से लेकर छह माह तक के कार्यक्रम शामिल हैं। जूनियर कमीशंड अधिकारियों (जेसीओ) अन्य रैंक (ओआर) समकक्ष जूनियर कमीशंड अधिकारी। अन्य रैंक तथा इनके समकक्ष अन्य सेवाओं के लिए पूरे देश में फैले सरकारी, अर्ध-सरकारी तथा निजी संस्थानों में छह माह के पुनर्वास प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

पूर्व सैनिक (ईएसएम) प्रशिक्षण[सम्पादन]

इस योजना के तहत राज्य सैनिक बोर्डों को संबद्ध राज्यों में ईएसएम के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने के वास्ते धनराशि मुहैया कराई जाती है। प्रारंभ में यह योजना उन ईएसएम के लिए बनाई गई थी जो सेवाकाल के दौरान पुनर्वास प्रशिक्षण सुविधा का लाभ नहीं उठा पाते।

भूतपूर्व कर्मियों को पुन— रोजगार[सम्पादन]

केंद्र और राज्य सरकार भूतपूर्व कर्मियों को केंद्रीय और राज्य सरकार के अधीन पदों पर पुन— रोजगार के लिए कई रियायतें देती है। इनमें पदों में आरक्षण, उम्र सीमा, शैक्षणिक योग्यता में छूट तथा आवेदन और परीक्षा शुल्क में छूट शामिल है। विकलांग भूतपूर्व सैनिकों और मारे गए सैनिकों के आश्रितों को अनुग्रह के आधार पर रोजगार में प्राथमिकता दी जाती है।

सरकारी नौकरियों में भूतपूर्व सैनिकों के लिए आरक्षण[सम्पादन]

केंद्र सरकार ने ग्रुप-सी के दस प्रतिशत और ग्रुप-डी के बीस प्रतिशत पद भूतपूर्व कर्मियों के लिए आरक्षित किए हैं, जबकि केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान और राष्ट्रीयकृत बैंकों में उन्हें ग्रुप-सी के पदों में 14.5 प्रतिशत और ग्रुप-डी के पदों में 24.5 प्रतिशत आरक्षण मिलता है। अर्द्धसैनिक बलों में असिस्टेंट कमांडेंट के दस प्रतिशत पद भी भूतपूर्व कर्मियों के लिए आरक्षित हैं। सुरक्षा कोर में शतप्रतिशत पद भूतपूर्व सैनिकों के लिए आरक्षित हैं।

पुनर्वास महानिदेशालय द्वारा रोजगार[सम्पादन]

सुरक्षा एजेंसियां[सम्पादन]

पुनर्वास महानिदेशालय विभिन्न सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिDान तथा निजी क्षेत्र के उद्योगों में सुरक्षा गार्ड उपलब्ध कराने के लिए सुरक्षा एजेंसियों को निबंधित करती है। इस योजना के तहत अवकाश प्राप्त अधिकारियों तथा ऑफिसर रैंक से नीचे के पूर्व स्टॉफ को उन क्षेत्रों में स्व-रोजगार के अच्छे अवसर प्राप्त होते हैं, जिनकी पर्याप्त विशेषज्ञता उन्हें हासिल है। बैंकों की सुरक्षा भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों को निर्देश दिया है कि वे बैंकों की सुरक्षा के लिए महानिदेशालय द्वारा पंजीकृत सुरक्षा एजेंसियों/कंपनियों/कारपॉरेशन की सेवाएं लें।

स्व-रोजगार योजनाएं[सम्पादन]

सरकार ने भूतपूर्व सैनिकों तथा उनके परिवारों के पुनर्वास के लिए अनेक स्वरोजगार योजनाएं तैयार की हैं। इनका विस्तृत ब्योरा इस प्रकार है- सेना के फालतू वाहनों का आबंटन- भूतपूर्व सैनिक तथा सेवा के दौरान मारे गए सैनिकों की विधवाएं सेना के V-B क्षेणी के फालतू वाहनों के लिए आवेदन कर सकती हैं। कोयला परिवहन योजना - यह योजना पिछले 27 वर्षों से चल रही है। वर्ष 2007 में कोल इंडिया लिमिटेड के लिए सात ई एस एम कोल कंपनियां स्पांसर की गई।

उद्यमी योजनाएं[सम्पादन]

इस समय ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि, उद्योग तथा सेवा क्षेत्र में सेमफेक्स-II तथा सेमफेक्स-III योजनाएं चल रही हैं। प्रमुख संस्थान राष्ट्रीकृत बैंक, कोपरेटिव बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक आदि हैं। इन योजनाओं के लिए 25-30 प्रतिशत तक की सब्सिडी उपलब्ध है। भूतपूर्व सैनिक ऋण के लिए संबद्ध जिला सैनिक बोर्ड के जरिए बैंक को सीधे आवेदन कर सकते हैं।

सेमफेक्स-II योजना[सम्पादन]

ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि, उद्योग तथा सेवा क्षेत्र में उद्यम शुरू करने के लिए नाबार्ड के सहयोग से 1988 में यह योजना शुरू की गई। इसमें परियोजना लागत की 25 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है। योजना शुरू होने से अब तक 7580 भूतपूर्व सैनिकों को 5706 लाख रूपये का ऋण इस योजना के तहत उपलब्ध कराया जा चुका है।

सेमफेक्स-III योजना[सम्पादन]

ग्रामीण क्षेत्रों में टेक्सटाइल, ग्रामीण, कुटीर, लघु तथा छोटे उद्योगों की स्थापना के लिए खादी तथा ग्रामीण उद्योग आयोग की सहायता से 1992 में यह योजना शुरू की गई थी। इस योजना के तहत 25 लाख रूपये तक का ऋण तथा 30 प्रतिशत तक सब्सिडी उपलब्ध कराई जाती है। प्रधानमंत्री छात्रवृत्ति योजना

इस योजना का उद्देश्य भूतपूर्व सैनिकों तथा सैनिकों की विधवाओं के बच्चों को उच्च शिक्षा तथा व्यावसायिक शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्रोत्साहन देना है। इसके तहत पूरे पाठ्यक्रम के दौरान छात्र को 1250 रूपये तथा छात्रा को 15 हजार रूपये प्रतिमाह की छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है।

तेल उत्पादन एजेंसी का आबंटन[सम्पादन]

पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने एलपीजी वितरण, पेट्रोल पंप श्रेष्ठ केरोसिन तेल वितरण इत्यादि तेल उत्पादों की एजेंसी के लिए वारटाइम/पीस टाइम विधवाओं तथा शारीकिक रूप से अक्षम सैनिकों को रक्षा श्रेणी के आवेदनों में आठ प्रतिशत आरक्षण देता हैं।

मदर डेयरी दुग्ध बूथ तथा फल-सब्जी (सफल) दुकानें[सम्पादन]

ईएसएमपी बीओआर के लिए यह एक जांचा-परखा अच्छी आमदनी वाला स्वरोजगार है। मदर डेयरी से विचार-विमर्श के बाद यह स्कीम अब न केवल एनसीआर अर्थात गुड़गांव, नोएडा तथा ग्रेटर नोएडा बल्कि अन्य राज्यों में भी बढ़ाई जा रही है। जयपुर को मार्च, 2009 में इसमें शामिल किया गया है।