वार्ता:भारतीय साहित्य

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गुजराती साहित्य

शौरसेनी अपभ्रंश प्रसूत गुजराती 710,072 वर्गमील के गुजरात प्रदेश के उत्तर में कच्छ और मारवाड़ से लेकर दक्षिण में बंबई के थाना जिले तथा पश्चिम में अब सागर एवं पूर्व में मालवा और खानदेश के बीच 33,063,267 (5.36%) व्यक्तियों द्वारा बोली जाती है। भारतवर्ष में जनसंख्या की दृष्टि से गुजराती का स्थान सातवाँ है। यह गुजरात की राजभाषा है। इसकी लिपि शिरोरेखामुक्त देवनागरी लिपि ही है।

'गुजरात' शब्द का संबंध 'गुर्जर' जाति के लोगों से हैं। ये लोग मूलतः शक थे और पाचवीं सदी के लगभग भारत में आए थे। पहले इनका क्षेत्र पंजाब एवं राजस्थान था, बाद में मुसलमानों के आक्रमण के कारण गुजरात की ओर चले गए। 'गुजरात' शब्द 'गुर्जर+त्र' से बना माना गया है: गुर्जर+त्र = गुजरात्ता = गुजरात। इस प्रदेश में इन गुर्जरों को 'त्रण' मिला, और यह गुजरात कहलाया। इस प्रकार का विकास मानने का कारण यह है कि आठवीं, नवीं तथा दसवीं सदी के कुछ अभिलेखों में 'गुर्जर - भूमि' तथा 'गुज्जरत्ता' आदि शब्द मिले हैं। गुजरात या 'गुर्जर देश।' मूलतः केवल माउंट आबू के उत्तर का प्रदेश था, किंतु बाद में धीरे-धीरे उसके दक्षिण का भाग भी गुजरात के अंतर्गत आ गया। अब कच्छ आदि भी इसमें सम्मिलित हैं ।

'गुजरात' शब्द का प्रयोग यों तो 1000 के लगभग से प्रारंभ हो गया था, किंतु भाषा के अर्थ में 'गुजराती' शब्द का प्रयोग अभी तक 17वीं सदी से पूर्व नहीं मिला है। इसका प्रथम प्रयोग प्रेमानंद (1649-1714 ई.) के 'दशम स्कंध' में हुआ है। किंतु इसका यह आशय नहीं कि गुजराती भाषा उस समय तक विकसित नहीं हुई थी । अन्य देशी भाषाओं से अलग, इसे लोग आठवीं सदी में ही पहचानने लगे थे। उद्योतन सूरि के 'कुवलयमाला' में आता है-अह पेच्छे गुज्जरे अवरे। 14वीं सदी तक आते-आते भाषा कुछ और विकसित हो गई, यद्यदि मारवाड़ी आदि राजस्थानी भाषाओं से इतनी भिन्न नहीं हुई थी कि उसे स्वतंत्र भाषा माना जा सके। धनपाल (900), हेमचंद्र, सोमप्रभ (1185) गुजरात के आदिकालीन कवियों में अपना स्थान रखते हैं। गुजराती का प्रथम उदाहरण भरतेश्वर बाहुबली रास कहा गया है जिसकी रचना शांतिभद्र सूरी ने 1241ई. में की। यह सुखद संयोग ही है कि हिंदी एवं गुजराती (राजस्थानी के भी) साहित्य इतिहास लेखक इस कृति को अपनी-अपनी भाषा की प्रथम रचना स्वीकारते हैं। हरीकृष्ण दवे के अनुसार यथा प्रकृत संदर्भ में पुरानी गुजराती का प्रथम प्राप्त ग्रंथ है भरतेश्वर बाहुबलि रास ।

गुजराती साहित्य का प्रारंभ कुछ लोग 12वीं सदी से ही मानते हैं। हेमचंद्र के व्याकरण में कुछ छंद ऐसे भी हैं जिनको प्राचीन गुजराती का कहा जा सकता है। 18वीं सदी से इसके प्राचीन रूप का समारंभ हो जाता है। तबसे अब तक इसमें साहित्य रचना हो रही है।

प्राचीन गुजराती के प्रमुख साहित्यकार विजयचंद्र सूरि (13वीं सदी), राजशेखर (14वीं सदी), नरसी मेहता ( 15वीं सदी), आदि है। 14वीं सदी तक की गुजराती भाषा अपभ्रंश से बहुत अधिक आक्रांत है। गुजराती का मध्यकाल 'प्रेमानंद युग' भी कहलाता है। इस युग में प्रेमानंद तथा अखा प्रसिद्ध हैं।

गुजराती कविता में कृष्ण भक्तिपरक वैष्णव काव्य का प्रभाव अधिक है। आरंभिक गुजराती काव्य को रास युग कहते हैं। जैन कवियों ने भी रास और 'फागु' लिखे, जैसे “भरतेश्वर बाहुबलि रास' और जिनचंद्र सूरी फागु, ये क्रमशः 1185 तथा 1285 ईसवी की रचनाएँ है, यह 'फागु' परंपरा पंद्रहवीं शती तक चलती रही। विरहिनियों के ‘बारामासी' काव्य भी तेरहवीं शती में मिलते हैं। जैन धर्म का वैष्णव धर्म पर प्रभाव पड़ा। जैसे नरसी मेहता (1408-80) के पदों में 'वैष्णव जन तो तेणे कहिए जे पीर पराई जाणे रे' आदि पंक्तियों में स्पष्ट है। पौराणिक विषयों पर बहुत-सी रचना की गई। भालण ( 16वी शती का आरंभ) ने व्रजभाषा में पांच पद लिखे । (मीराबाई (1499-1574) राजस्थानी में पद रचती थीं पर गुजराती साहित्यकार उन्हें अपनी भाषा की कवयित्री मानते हैं। गोपाल ने 1649 में 'ज्ञानगीता' लिखी। सबसे महत्त्वपूर्ण संतकवि है 'आखो' (1615-75 ) उनकी 'आवेगीता' (1650)। आखाभगत की वाणी षटपदी या छप्पय में हैं और गुजराती भाषा में यह कबीर की तरह लोकप्रिय हुए। वे लोकभाषा का प्रयोग करते हैं। आखो भक्ति को ऐसी पक्षिणी मानते हैं जिसका एक पंख ज्ञान है, दूसरा वैराग्य ज्ञानमार्गी कवियों में आखों के बाद पीरो, भोजो, निरांत, बापूसाहेब गायकवाड, निष्कुलानंद, ब्रह्मानंद आदि हुए।

ये और उनके साथ मिलकर कुछ काम भी कर चुके थे। सन् 1885 से 1940 तक गुजराती में नवजागरणकाल के अग्रदूत 'नर्मद' थे। ये भारतेंदु के समकालीन का काल राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना का काल कहा जा सकता है। मोहनदास गाँधी, नानालाल, प्रो. ठाकोर, काका कालेलकर, उमाशंकर, सुन्दरम् और सर्वाधिक कन्हैयालालइस धारा के प्रतिनिधि साहित्यकार हैं। गाँधीजी की रचनाएँ राष्ट्रीयता, सत्यता, ईमानदारी और प्रेम से ओत-प्रोत हैं। काका कालेलकर के निबंध और आलोचनाएँ विद्वत्ता, प्रकृति-प्रेम, हाजिरजवाबी और देशभक्ति से भरपूर हैं। कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी के उपन्यास, नाटक, जीवनचरित्र देशभक्ति और नैतिकता के प्रतीक हैं। भगवद्गीता और आधुनिक जीवन, पृथ्वीवल्लभ, जय सोमनाथ, श्री कृष्णावतार आटि इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। गुजराती में रोमानी काव्य रचना पूजालाल के प्रगीतों के माध्यम से प्रविष्ट हुई। इनकी रस-चेतना में सूक्ष्म परिष्कार है तथा अभिव्यक्ति में नवीन भंगिमा। 1940 ई. के लगभग गुजराती में भी प्रगतिवादी काव्य की रचना हुई। मणियार इस काव्य धारा के प्रमुख कवि हैं। इसके पश्चात राजेन्द्रशाह, सुरेश जोशी और सुरेश दलाल आदि कवियों ने नवीन बौद्धिक कविता के क्षेत्र में प्रवेश किया। है। सितांशु यशचन्द्र अपनी कविताओं को अति यथार्थवादी कहते हैं। आदिल मंसूरी, रमेश पारिख, रघुवीर चौधरी आदि इस धारा के सशक्त हस्ताक्षर हैं।

एक भाषा के रूप में इसका आविर्भाव तो 1150 के बाद होने लगता है किन्तु गुजराती का साहित्य 15वीं शताब्दी के आस-पास ही उभर कर सामने आया। गुजराती भाषा के भी अनेक लघु रूप प्रचलित है। गुजराती भाषा ने भी अपना शब्द भंडार संस्कृत, अरबी, फारसी, पुर्तगाली, अंग्रेजी आदि भाषाओं से सजाया है। साहित्यिक दृष्टि से भी गुजराती भाषा में कई महत्वपूर्ण ग्रंथ लागा है

मराठी साहित्य

महाराष्ट्री अपभ्रंश प्रसूत मराठी महाराष्ट्र की बोलचाल की प्रमुख भाषा है तथा भारतीय संविधान के अनुसार यह महाराष्ट्र राज्य की राजभाषा भी स्वीकृत की गई है। इसके बोलने वालों की संख्या 49,452,922 (8.0296) है जो कि समस्त भारतीय भाषाओं में जनसंख्या की दृष्टि से चौथे स्थान पर आती है। इसकी लगभग 65 बोलियाँ हैं। इसकी प्रमुख बोलियाँ हलबी, कोंकणी, कमारी, कटिया कटकरी, कोष्टी, मराठी, क्षत्रिय मराठी, परखारी तथा वर्ती है मराठी भाषा की लिपि देवनागरी है। साहित्यिक दृष्टि से मराठी अतिसम्पन्न है।

में यह लगभग एक लाख वर्गमील में उत्तर में सतपुड़ा पहाड़ियों से लेकर, दक्षिण कृष्णा नदी तक तथा पूर्व में नागपुर से लेकर पश्चिम में गोवा तक बोली जाती है। डॉ. गुणे, जूल, ब्लाक आदि अनेक विद्वान् मराठी का सम्बन्ध महाराष्ट्री प्राकृत और महाराष्ट्री अपभ्रंश से मानते हैं। डॉ. घोष आदि ने उसे शौरसेनी के बाद की माना है। 979 ई. से 1270 ई. तक के छह उत्कीर्ण लेख मैसूर स्वदेश और बंबई में मिले हैं। ध्वनि के स्तर पर भी मराठी ने अपनी अलग पहचान बनाते हुए अपनी भाषाग तवैशिष्ट्य को निर्मित किया है। मराठी साहित्य ने भारतीय भाषाओं को उच्च कोटि के कई साहित्यिक रचनाएं दी है। मराठी साहित्य के इतिहास में साहित्यिक काल विभाजन छह खंडों में विभक्त

है-

1. यादव काल (1189 ई. से 1320 ई. तक)

2. बहमनी काल (1320 से 1600) 3. मराठा काल (1600 से 1700)

4. पेशवा काल (1700 से 1850)

5. ब्रिटिश काल (1850 से 1947)

6. आधुनिक काल (1947 से आज तक)

भक्ति आंदोलन की मुख्य धारा में भी मराठी साहित्य और मराठा भक्त कवियों का भारी योगदान रहा है तो आधुनिक काल में भी स्वतंत्रता आंदोलन और समाज सुधार के दौर में इन कवियों ने सामाजिक और राष्ट्रीय जागृति के स्वर को मुखरित करने का स्तुत्य कार्य किया। साहित्यिक सरोकार को राष्ट्रीय-सामाजिक-सांस्कृतिक- मानवीय सरोकार में रूपान्तरित करने का बीड़ा आधुनिक मराठी साहित्य ने उठाया। मराठी साहित्य के अग्रणी रचनाकारों में एकनाथ, तुकाराम, मुक्तेश्वर, विष्णु सखाराम खांडेकर, केलकर, विभावरी शिरूरकर, शिवाजी सावंत और विजय तेंदुलकर आदि का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। विजय तेंदुलकर ने तो आधुनिक नाटक और रंगमंच को लेकर मराठी भाषा में कई अभिनव प्रयोग किए हैं। मराठी नाटक और रंगमंच पर उनकी गहरी छाप है। हिन्दी भाषा और साहित्य के विपरीत मराठी साहित्य में गद्य मध्यकाल से ही मिलने लगते हैं। चूंकि गद्य विचार और चिंतन की भाषा होती है इसीलिए हम यह कह सकते हैं कि मराठी साहित्य ने अपने आरिम्भक दौर से ही विचार और चिंतन के दामन को पकड़ कर आगे बढ़ी है।

मराठी के आदि कवि मुकुन्दराय (1128-1198) हैं जिनका प्रधान ग्रन्य 'विवेकसिंधु' है। भक्ति की प्रवृत्ति के आधार पर मराठी साहित्य को प्रमुखतः महानुभव काल, ज्ञानेश्वर नामदेव काल, एकनाथ काल तुकराम-रामदाल काल, मोरोपंत काल, प्रभाकरराम जोशी काल तथा आधुनिक काल, प्रमुखतः इन कालों में बाँटा गया है।

महानुभाव पंथ के प्रथम कवि चक्रधर (1274 ईसवी) अहिंसा में परम विश्वात करने वाले थे, और वैदिक यज्ञबलि के विरुद्ध थे। संस्कृत काव्य-परंपराएं तोड़कर इस पंथ के कवियों ने 1881 और 1333 में 'ऋद्धिपुर वर्णन', 'सह्याद्रि वर्णन जैसे काव्य रचे। यह पंथ गुप्तलिपि में खो गया

संन्यासी पुत्र ज्ञानेश्वर (1275-99 ) वारकरी संप्रदाय के आदिपुरुष थे। उनका ग्रन्थ 'ज्ञानेश्वरी' (जो गीता की छन्दोबद्ध टीका है) और 'अमृतानुभव' दर्शन के अपार सरोवर हैं, और श्रेष्ठ काव्य भी । ज्ञानेश्वर का अंतिम 'पसायदान' विश्वात्मक मानवतावाद का श्रेष्ठ उदघोष है। नामदेव ( 1270-1850) शिंपी जाति के थे, पर उनकी वाणी हिंदी में और पंजाबी 'ग्रंथसाहब' में भी मिलती है। उन्होंने अभंग और पद, विविध रागों में लिखे 'संत ज्ञानेश्वर' की 'ज्ञानेश्वरी' मराठी के प्राचीन साहित्य का सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ है।

उनकी 'अनुभवामृत' कृति भी जन भाषा की कमनीयता, वैचारिकता की सघनता एवं कल्पना की उदात्तता के कारण मराठी काव्य की अब भी अप्रतिम रचना है। नामदेव ज्ञानेश्वर के कनिष्ठ समसामयिक संत थे जो एक प्रकार से वारकरी संप्रदाय के प्रतिष्ठापक भी थे जिसमें रूढ़ि विद्रोह एवं संत बोध की वह धारा गतिशील हुई जिसकी प्रतिष्ठा हिंदी में कबीर के द्वारा हुई। एकनाथ समाज सुधारक कवि थे जिनका काल था 1582- 99। उन्होंने रामायण और भागवत की भाषा टीकाएँ लिखी। एकनाथ ने ही कबीर की उलटवासियों की तरह संध्या भाषा का प्रयोग किया और नाट्यात्मक एकालापों द्वारा रहस्यवाद को जनसुलभ बनाया 1551 के 'दासोपंत' के एक लाख ओवियों की परमार्थपरक कविता लिखी।

ज्ञानदेव, नामदेव, ज्ञानेश्वर, एकनाथ, मुक्तेश्वर, तुकाराम, रामदास मराठी के प्रसिद्ध संत कवि हैं।

पश्चिम में मराठी साहित्य में नवजागरण का उदय अन्य क्षेत्र से पहले हुआ। बम्बई प्रेसीडेंसी कॉलेज के अधिकारी एलफिंसटन और मालकम की उदार शिक्षा नीति, ईसाई धर्म प्रचार, बालशास्त्री जमेकर तथा कृष्ण शास्त्री, चिपलूणकर द्वारा पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन, केशरी के प्रकाशन तथा तिलक, रानाडे और गोखले जैसे प्रबुद्ध विचारकों के चिन्तन के परिणामस्वरूप उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध में ही आधुनिक मराठी साहित्य का सूत्रपात हो गया था। उन्नीसवीं शताब्दी का मध्य अनुवाद और प्रेरणाकाल है। इस काल में कालिदास, भवभूति, शुद्रक आदि का मराठी में अनुवाद किया गया। ड्राइडन, मिल्टन, स्कॉट, पोप, ग्रे, वर्डस्वर्थ आदि ने भी भाव-भंगिमा के स्तर पर मराठी साहित्य को प्रभावित किया। महाजनि कीर्तिकर, कुते आदि कवियों ने राष्ट्रवादी चेतना का काव्य लिखा। इनके काव्य में विचार गांभीर्य, वैयक्तिक तत्त्व और उपन्यास श्चीमन अभिव्यक्ति की सरलता मिलती है। अन्य कवियों में केशवसुत (तुतारी), गोविंदाग्रज हिमायत की है और क्रान्तिकारी वीर सावरकर (के पवाड़े) राष्ट्रीय जनजागरण के माध्यम बने। रोमानी कविताओं का प्रारम्भ तो ‘केशवसुत' की कविताओं से माना जाता है, परन्तु बालकवि आदि ने इस। स्वर को अधिक स्पष्ट किया। बालकवि के प्राकृतिक चित्रण में देखने लगा था। अद्वितीय मृदुता है। उनमें पुष्पकलिकाओं, नर्तन करती हुई सरिताओं, गुंजन करती ने मलयालम भ्रमरियों आदि का चित्रण पाठक को मोह लेता है। शरद, मुक्तिबोध और करंदीकर साम्यवादी भावधारा के कवि हैं जिन्होंने निष्ठा के साथ इस विचारधारा को स्वीकार और अभिव्यक्त किया है। नव काव्य, प्रयोगवाद और अति यथार्थवाद के प्रमुख स्वर बनकर उभरे बा. सी. मर्ढेकर। इनकी कविताएँ मानवी व्यक्तित्व के विघटन को व्यक्त करती हैं। इस धारा के अन्य साहित्यकारों में पेंडसे, पाधे, रेगे आदि के नाम उल्लेखनी

पंजाबी साहित्य

पंजाबी साहित्य का आरंभ कब से होता है, इस विषय में विद्वानों का मतैक्य नहीं है। फरीद को पंजाबी का आदि कवि कहा जाता है ; किंतु यदि इस बात को स्वीकार किया जाय कि जिन फरीद की बाणी "आदि ग्रंथ" में संगृहीत है वे फरीद सानी ही थे तो कहना पड़ेगा कि 16वीं शती से पहले का पंजाबी साहित्य उपलब्ध नहीं है। इस दृष्टि से गुरु नानक को ही पंजाबी का आदि कवि मानना होगा। "आदि ग्रंथ" पंजाबी का आदि ग्रंथ है। इसमें सात गुरुओं और 16 भक्तों की वाणियाँ संगृहीत हैं। पदों की कुल संख्या 3384 है। गुरु नानक की रचनाओं में सर्वप्रसिद्ध "जपुजी" है; इसके अतिरिक्त "आसा दी वार," "सोहिला" और "रहिरास" तथा लगभग 500 फुटकर पद और है। भाव और अभिव्यक्ति एवं कला और संगीत की दृष्टि से यह बाणी अत्यंत सुंदर और प्रभावपूर्ण है। भक्ति में "सिमरन" और जीवन में "सेवा" नानक की वाणी के दो प्रमुख स्वर हैं। परवर्ती सिक्ख गुरुओं ने गुरु नानक के भावों की प्राय: अनुकृति और व्याख्या की है। गुरु रामदास (1534-1581 ई.) की कविता में काव्यगुण अधिक है। गुरु अर्जुनदेव (1561-1606 ई.) की वाणी में ज्ञान और विचार की प्रधानता है। "आदि" ग्रंथ में सबसे अधिक पद (1000 से कुछ ऊपर) इन्हीं के हैं। यह बात विशेषत: उल्लेखनीय है कि पूरे ग्रंथ में कुल मिलाकर 350-400 पद पंजाबी के होंगे। गुरु गोविंदसिंह के "दशम ग्रंथ" में भी "चंडी दी वार" एकमात्र पंजाबी की कृति है, जो सिरखंडी छंद में रचना है। इसमें दुर्गा देवी और दैत्यों के युद्ध का वर्णन है। सिक्ख गुरुओं के अतिरिक्त भाई गुरुदास (1558-1637 ई.) की वाणी को गुरुमत साहित्य के अंतर्गत मान्यता दी जाती है। उनके कवित्त और सवैए ब्रजभाषा में हैं, वारें और गीत शुद्ध साहित्यिक पंजाबी में हैं।

सूफी कवियों में फरीद के बाद लुत्फ अली का नाम आता है। इनकी रचना "सैफलमलूक" संवेदना, वैराग्य भावना और सरसता के लिए बहुत प्रसिद्ध है। परवर्ती सूफियों पर इसका बहुत अधिक प्रभाव रहा है। प्रेम, विरह और वैराग्य से भरे शाह हुसेन लाहौरी (1538-1599 ई.) के गीत बड़े प्रभावोत्पादक और कवित्वपूर्ण हैं। इनकी काफियों में निरपेक्ष प्रेम का स्वर है। इस्लाम की शरअ से विद्रोह करनेवाला दूसरा कवि सुल्तान बाहू (1629-1690 ई.) हुआ है। इसने अपनी "सीहर्फियों" में अहंकार के त्याग, गुरु की कृपा और सहायता, अंतर्निरीक्षण और आत्मचिंतन पर बल दिया है और उस दुनिया में रहने की आकांक्षा प्रकट की है जहाँ "मैं" और "मेरे" का बखेड़ा नहीं है। शाह शरफ की काफियों में रूपकों द्वारा इश्क हकीकी के रहस्य समझाए गए हैं। पंजाबी सूफी साहित्य के प्रसिद्धतम कवि बुल्लेशाह कसूरी प्रेम, साधना और मिलन के साधक हैं। उनकी कविता की सबे बड़ी विशेषता है भाषा का ओज और प्रभाव। अली हैदर (1690-1785 ई.) की सीहफिंयाँ और काफियाँ कुछ दुरूह और दार्शनिक होने के कारण सर्वप्रिय नहीं हैं। परवर्ती सूफियों में वजीद, फरीद (1720-90 ई.), गुलाम जीलानी (1749-1819), हाशिम (1753-1823), बहादुर (1750-1850 ई.) आदि प्रसिद्ध हैं। पंजाबी सूफी साहत्य प्राय: गेय मुक्तक काव्य है।

इस युग का लौकिक साहित्य विशेषतया वारों और शृंगाररसप्रधान किस्सों के रूप में उपलब्ध है। हीर राँझा का किस्सा सबसे अधिक पुरातन और प्रसिद्ध है। सबसे श्रेष्ठ रचना बारिस शाह (1738-1798 ई.) की "हीर" है। वारिस शाह बड़े अनुभवी, प्रतिभाशाली और बहुज्ञ कवि थे। भाषा पर उनका पूर्ण अधिकार था। "मिरजा साहिबाँ" की प्रेमकथा को भी कई कवियों ने काव्यबद्ध किया, पर सबसे पुरातन और उत्तम किस्सा जहाँगीर और शाहजहाँ के राज्यकाल में पीलू ने लिखा। पीलू के बाद हाफिज बरखुरदार ने भी मिरजासाहिबाँ का किस्सा लिखा। उसने "यूसूफ-जुलेखा" और "सस्सी पुन्नू" की प्रेमकथाएँ भी लिखीं। सस्सी और पुन्नू बिलोचिस्तन के एवं जुलेखा और यूसुफ मिस्र के थे। हाशिम (1753-1823 ई.) की "सस्सी" इस नाम के किस्सों में सबसे अधिक लोकप्रिय है। इसके अतिरिक्त उनकी "सोहनी महीवाल," "शीरीं फरहाद" और "लैला मजनूँ" प्रबंध कृतियाँ हैं। पिछले दो किस्से फारसी से लिए गए हैं और "सोहनी महीवाल" गुजरात (पंजाब) की लोकवार्ता से। भावों की सूक्ष्म अभिव्यक्ति के लिए हाशिम अद्वितीय है। अहमदयार (1768-1845) ने 40 किस्से लिखे, जिनमें "हीर राँझा," "सस्सी पुन्नू," "कामरूप", "राजबीबी," "चंदरबदन" उच्च कोटि के हैं। इनके काव्य की विशेषता है वैचित्र्यपूर्ण घटनाओं का तारतम्य, संयत वर्णन एवं आलंकारिक भाषा शैली: किंतु विषय की मैलिकता कम है। अमामबख्श की कृतियों में "बहराम गोर" उत्तम काव्य के अंतर्गत गिना जाता है। इसी समय का एक और कवि कादरयार हुआ है। उसकी प्रसिद्धि "पूरनभगत" और "राजा रसालू" के किस्सों के कारण है। पूरन और रसालू दोनों स्यालकोट के राजा शालिवाहन के पुत्र थे।

पंजाबी का वीर साहित्य बहुत समृद्ध है। इसके अंतर्गत गुरु गोविंदसिंह की "चंडी दी वार" शिरोमणि रचना है। नजाबत की "नादरशाह दी हीर" और शाह मुहम्मद (1782-1862 ई.) की अपने आश्रयदाता महाराजा रणजीतसिंह की कथा भी उल्लेखनीय है। मुकबल (1696 ई.) का "जगनामा", जिसमें हसन हुसैन और यजीद के युद्धों का मार्मिक वर्णन है, शिया मुसलमानों में बड़े चाव से पढ़ा जाता है।

प्रारंभिक काल का पंजाबी गद्य साहित्य महापुरुषों की जन्मसाखियों, गोष्ठों और टीकाओं के रूप में प्राप्त होता है। भाई बालाकृत गुरु नानक की जन्मसाखी (1535 ई.) सबसे प्राचीन है। बाद में सेवासिंह (1588 ई.) और मनीसिंह (1737 ई.) ने भी गुरुनानक का जीवनचरित लिखा। भाई मनीसिंह की "ग्यान रतनावली" पंजाबी गद्य की उत्तम कृति है। उन्हीं की एक दूसरी गद्यरचना "भगत रतनावली" है जिसमें पहले पाँच गुरुओं के समकालीन कुछ प्रेमी भक्तों की कथाएँ है। इनके अतिरिक्त "पारसभाग," "भरथरी", "मैनावत," हजरत मुहम्मद साहब, कबीर और रविदास की जीवनियाँ, "सतयुग कथा," "पकी रोटी," "गीतासार", "लवकुश संवाद," "जपु परमार्थ" "सिंहासनबत्तीसी" और "विवेक" आदि छोटी बड़ी गद्यकृतियाँ उल्लेखनीय हैं।


अमृता प्रीतम आधुनिक पंजाबी साहित्य मुख्यत: सिक्खों की देन हैं और उसमें सिक्खपन का अधिक स्थान मिला है। किंतु जीवन की एकांगिता रहते हुए भी साहित्य प्राय: लौकिक है। इस युग के आदि कवि भाई वीरसिंह (1872-1957 ई.) माने जाते हैं। उनका "राण सूरतसिंह" (1915) 35 सर्गों का अतुकांत प्रबंध काव्य है। इसका उद्देश्य सिक्ख सिद्धांतों की प्रतिष्ठा है। उनकी "लहराँ दे हार" रहस्यवादी रचना है। "मटक हुलारे" में प्रकृतिचित्रण और "बिजलियाँ दे हार" में देशप्रेम मिलता है। प्रो॰ पूर्ण सिंह (1882-1932 ई.) की कविता में वेदांती बौद्ध और पाश्चात्य विचारों का गूढ़ प्रभाव है। इनके विचारों और अलंकारों में अपनी मौलिकता भी स्पष्टत: लक्षित होती है। धनीराम चात्रिक (जन्म 1876 ई.) यथार्थवादी किंतु निराशावादी कवि हैं। उनके "भरथरी हरि" और "नल दमयंती" में शैली और विचारधारा पुरानी है, बाद की कविताओं में शहरी जीवन का चित्रण मौलिक ढंग से हुआ है। पंजाबी काव्य को नए मोड़ देनेवाले कवियों में प्रो॰ मोहनसिंह (जन्म 1905 ई.) सर्वविदित हैं। ईश्वर, जीवन, प्रेम, समाज और प्रकृति के प्रति उनकी नवीन और मौलिक दृष्टि है। "सावे पत्तर" "कसुंभड़े" में वे शरीरवादी और मानववादी हैं तो "अधवाटे" में समाजवादी और छायावादी बनकर आए हैं। मोहनसिंह गीतकार भी है और शैलीकार भी। काव्य में उन्होंने कई नए प्रयोग चलाए हैं। अमृता प्रीतम (जन्म 1909) के अनेक कवितासंग्रह प्रकाशित हैं। ये बड़ी सफल गीतकार हैं। इनकी कविता की प्रेरक शक्ति प्रेम है जो अब मानव प्रेम में परिवर्तित होता जा रहा है। गोपालसिंह दर्दी का "हनेरे सवेरे" काव्य संग्रह उल्लेखनीय है। वे समाज के पापों का चित्रण करने में दक्ष हैं।

भारतीय साहित्य[सम्पादन]

गुजरती पंजाबी मराठी साहित्य इतिहास @ आयुष सिंह यादव (वार्ता) ०८:२९, ८ अक्टूबर २०२३ (UTC)[उत्तर दें]

भारतीय साहित्य नया[सम्पादन]

गुजरती पंजाबी मराठी का साहित्य इतिहास आयुष सिंह यादव (वार्ता) १८:२०, ८ अक्टूबर २०२३ (UTC)[उत्तर दें]