वृत्तिक आचार एवं अधिवक्ता की जवाबदेही : एक दार्शनिक अध्ययन

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मुकेश कुमार मालवीय, सहायक प्राध्यापक, विधि संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी

विधि व्यवसाय ऐसी वृत्ति है जिसमें सम्बद्ध अधिवक्ताओं को समाज के विभिन्न मानव सम्बन्धों से संव्यवहार करना होता है। उन्हें इन सम्बन्धों से संव्यवहार करने में अपनी योग्यता एवं संयम की परीक्षा देनी होती है। इसके लिये उन्हें न केवल अपने गुणों तथा उत्साह का प्रदर्शन करना होता है। अपितु अपनी सौम्यता का परिचय भी देना होता है। जब अधिवक्ता अपने पास विधिक राय के लिए आये मुवक्किल की समस्या सुनता है तब उसे मामले के तथ्य को छांटने तथा उनका विश्लेषण करने में अपनी योग्यता का प्रयोग करना होता है। उसकी शैक्षिक योग्यता एवं विधि का प्रशिक्षण ऐसी परिस्थितियों में उसके सम्बल होते हैं क्योंकि इन्हीं गुणों से वह अपने मुवक्किलों की न्यायालय में सहायता करता है और न्याय-प्रशासन की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य सम्पादित करता है ज्ञातव्य है, अधिवक्ता ही वह यंत्र है जो न्यायालय में विधि के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करता है, जिनके अनुसार न्यायाधीश मामलों का निराकरण करते है।

विधि-व्यवसायी (अधिवक्ता) की भूमिका केवल वादों के निस्तारण तक सीमित नहीं होती है। अधिवक्ता वर्ग समाज में शान्ति-व्यवस्था बनाये रखने में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। विधि-व्यवसाय में उनका दृष्टिकोण विवादों की संख्या को बढ़ाना नहीं होता अपितु आसन्न विवादों का समाधान ढूँढना होता है। इस प्रकार अधिवक्ता समाज में भाई-चारे की भावना बढ़ाकर समाज की विधिक व्यवस्था कायम रखने का गुरूतर कार्य सम्पन्न करते हैं। विधि व्यवसायी न्याय को प्रश्रय देते हैं क्योंकि वे नागरिकों के अधिकारों तथा स्वतंत्रताओं के पोषक होते हैं और न्यायालय के माध्यम से उनके अधिकारों तथा स्वतंत्रताओं की रक्षा करते हैं। इससे समाज में विधि का शासन साकार होता है।

अधिवक्ता अपने वृत्तिक अनुभव द्वारा विधि के दोषों और न्यूनताओं की जानकारी रखते हैं और समयानुसार उन दोषों को दूर करने के लिए विधि-आयोग को अपने सुझाव प्रस्तुत करते हैं। इसीलिये विधि आयोग के गठन में वरिष्ठ अधिवक्ता अधिक संख्या में सदस्य के रूप में नामित होते हैं जिससे विधि में आवश्यक सुधार सम्भव हो सके। विधि-व्यवसाय कोई व्यापार नहीं होता। इस व्यवसाय का मुख्य उद्देश्य धन-अर्जन करना नहीं है, अपितु न्याय-प्रशासन में अपनी अग्रणी भूमिका का निर्वहन करना है जिससे समाज में शान्ति, व्यवस्था तथा न्याय कायम रखा जा सके। निःसन्देह समाज की जटिल समस्याओं का समाधान ढूंढने, जनता के अधिकारों तथा स्वतंत्रताओं की सुरक्षा करने और विधि का शासन कायम रखने में प्रमुख भूमिका का निर्वहन करने में विधि-व्यवसाय को जो महत्वपूर्ण स्थान है, वह समाज के किसी वर्ग से छिपा नहीं है। अपनी विलक्षण प्रतिभा तथा सामाजिक दायित्व की भावना से अधिवक्ता वर्ग आसन्न कठिन परिस्थितियों को अनुकूल बनाकर उनका समाधान प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं जिसके लिए उन्हें समाज से सम्मान तथा ख्याति प्राप्त होती है। विधि-व्यवसाय का समाज में बहुत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है क्योंकि इसका कोई विकल्प नहीं है। विधि-व्यवसायी (अधिवक्ता) का प्राथमिक कर्तव्य संविधान के अनुसार-विधि का शासन समाज में बनाए रखने में अपना योगदान प्रदान करना होता है। उसे न्याय के क्रमिक विकास को प्रोन्नत करना है और संविधान में प्रदत्त नागरिकों के मूलाधिकारों के प्रवर्तन में न्यायालय की सहायता करनी होती है। साथ ही अपने विधिक ज्ञान, योग्यता और नैतिकता द्वारा उसे नागरिकों का विश्वास तथा सद्भाव प्राप्त करना होता है, जो उसकी अमूल्य पूंजी होती है।

सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम, 1882, की धारा 136 के अन्तर्गत प्रावधान किया गया है कि ‘‘कोई भी विधिक व्यवसायी (अधिवक्ता) किसी अनुयोज्य दावे में किसी अंश या हित का न तो क्रय करेगा, न दुर्व्यापार करेगा, न तो उसके लिए अनुबन्ध करेगा और न उसे प्राप्त करने के लिए करार करेगा और न तो कोई न्यायालय उसकी प्रेरणा पर या उससे व्युत्पन्न अधिकार के अधीन या दावा करने वाले किसी व्यक्ति की प्रेरणा पर, ऐसा कोई भी अनुयोज्य दावा प्रवृत्त करेगा जिसके बारे में उसने उपर्युक्त व्यवहार किया है।’’ इस के हित को ध्यान में रखकर बनाए गये हैं। यदि अधिवक्ताओं को ऐसे दावे (सम्पत्ति) खरीदने के लिए अनुमति दे दी जावे तो इसका तात्पर्य वादों के संधारण को प्रोत्साहन देना हो जाएगा, तो इससे वादों के निस्तारण में अनुचित विलम्ब होने लगेगा। न्यायालय का अधिकारी होने से अधिवक्ता का यह दायित्व होता है कि वह वादों का निस्तारण शीघ्र तथा न्यायोचित रीति से होने के लिए न्यायालय की सहायता करे जिससे न्याय का मार्ग सुगम हो और वादार्थियों के हित का मार्ग प्रशस्त हो सके। अधिवक्ता को धन का लोभी नहीं होना चाहिए क्योंकि उसका कार्य कोई व्यापार नहीं होता। उसका विधि-व्यवसाय एक विद्वत-व्यवसाय है, जिसका उद्देश्य वादों में हितों की सत्यता तथा असत्यता को सिद्ध करना होता है। वादों के निस्तारण में उसे अपने विधिक ज्ञान, सूझबूझ तथा नैतिकता का प्रयोग करना होता है जो उसका सर्वोच्च सामाजिक कर्तव्य है। उसे अपनी अन्तरात्मा के संदेशों के अनुसार कार्य करना होता है भले ही उसके मुवक्किल को वाद के संधारण से यथोचित लाभ न मिल सके। अधिवक्ता को अन्तःपरायण होना आवश्यक है उसे ऐसे मामलों में अभिकथन करने से इनकार कर देना चाहिए जहां उसकी आत्मा अपने मुवक्किल को न्याय दिलाने की अनुमति नहीं होती। न्यायालय के अधिकारों तथा सलाहकार के रूप में अधिवक्ता का दायित्व है कि वह न्यायाधीश को वाद से सम्बन्धित विधि के सिद्धान्तों की सही सूचना प्रस्तुत करे, जिससे व्यवस्थित समाज में उचित न्याय-प्रशासन सुनिश्चित किया जा सके।

विधि व्यवसायी का कर्तव्य सामान्य परिस्थितियों तक सीमित नही होता। उसे, समाज के गरीब तथा शोषित वर्ग के अधिकारों के प्रवर्तन के लिए, न्यायालय में उनका पहुंच बढ़ाने के लिए, निःशुल्क विधिक सहायता प्रदान करने का दायित्व होता है। यह कार्य अधिवक्ता को इसलिए नहीं करना होता क्योंकि इससे उसे न्यायालय से शाबाशी प्राप्त होगी अपितु इसलिए करना होता है कि इससे उसे आत्म-सन्तुष्टि प्राप्त होती है क्योंकि यह उसका सामाजिक दायित्व है। ऐसा कार्य करके वह सभी को समान अवसर प्रदान कराने में अपने ख्याति की वृद्धि करता है। और इससे उसका व्यावसायिक महत्व सामान्य जनता की दृष्टि में अत्यधिक सम्मानित हो जाता हैं ज्ञातव्य है कि वर्तमान समय में अधिवक्ता-वर्ग इस दिशा में अत्यधिक अग्रसर है।

समाज में उचित न्याय प्रशासन का होना, वादार्थियों को वादों में सफलता अथवा असफलता की प्राप्ति की तुलना में अधिक श्रेयस्कर है। विधि-व्यवसायी को यह विचार करना आवश्यक होता है कि उसकी निष्ठा विधि के शासन के प्रति, अपने तथा अपने मुवक्किलों के हितों की तुलना से, अधिक महत्वपूर्ण है। इस प्रकार समाज को न्याय सुनिश्चित कराने वाले तन्त्र के प्रमुख अंग के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करके विधि व्यवसायी (अधिवक्ता) न्याय प्रशासन में अपना महत्वपूर्ण स्थान सुनिश्चित करते है।

हमारे देश की प्राचीन काल से यह मुख्य दार्शनिक विचारधारा रही है कि हमें प्रत्येक नागरिक के अधिकार को सृजित करने व दिलाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति के कर्तव्य निर्धारित करने चाहिये। उक्त दर्शन अधिवक्ता गण एवं आम समुदाय पर भी लागू होता है। अधिकारों की मांग हमेशा की जाने पर स्वार्थ की भावना सामने आती है एवं जब कर्तव्य की बात भी की जाती है तो निस्वार्थ भावना प्रस्फुटित होती है। इस बात को महसूस किया जाता है कि मानव अधिकार को सुरक्षित रखने में मानव कर्तव्य आत्मीयता से किया जाना चाहिये मनुष्य अपने आप को आत्मीयता से मानव कर्तव्य की ओर प्रेरित करे तो मानव अधिकार अपने आप में स्थापित हो जायेगा। ऐसा आदर्श समाज हमारे भारत वर्ष में पहले था जब प्रत्येक व्यक्ति धर्म के अनुसार अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए दूसरों के अधिकारों की रक्षा करता था और दूसरों को खुशहाली दिलाता था यहां उदाहरण के तौर पर बताया जा रहा है कि माता पिता का यह दायित्व है कि वह उनके बच्चे बच्चियों को शिक्षित करें, परिवार के प्रमुख मुखिया का यह दायित्व है कि वह परिवार के सदस्यों का भरण पोषण करें, लालन पालन करें वह परिवार के उन सदस्यों का जो कि उनके ऊपर निर्भर है और धन नहीं कमाते हैं उनके प्रति कर्तव्यों का ध्यान रखें एवं उनका पालन पोषण करें। बच्चे बच्चियों का यह दायित्व है कि वृद्धावस्था में अपने माता पिता की देखभाल करे उनकी आज्ञा का पालन करें। अध्यापकों का यह दायित्व है कि विद्यार्थियों को अच्छी तरह शिक्षित करें और विद्यार्थियों का यह दायित्व है कि वे शिक्षकों का सम्मान करें एवं शिक्षक द्वारा प्राप्त की गई शिक्षा से ही संतुष्ट न रहे बल्कि उसे आगे और बढ़ाते हुए प्रतिभाशाली व्यक्तित्व बन कर देश को गौरवान्वित करें। प्रत्येक व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह अन्य व्यक्तियों के अधिकारों का ध्यान रखे और मानव समाज का ध्यान रखते हुए उसकी रक्षा करें। प्रत्येक व्यवसायिक व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह समाज हित को सर्वोच्च प्राथमिकता दे और अपने व्यक्तिगत हित से समाज हित को ऊंचा मानें प्रत्येक नागरिक का यह दायित्व है कि वह राज्य के नियमों का पालन करे और राज्य का यह दायित्व है कि वह नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा करें व नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व संवैधानिक एवं सांस्कृतिक अधिकार दिलायें एवं समान रूप से न्याय करें। जब हम किसी व्यक्ति के कर्तव्य का सृजन करते हैं तो आवश्यक रूप से अन्य व्यक्ति के अधिकार के संरक्षण का सृजन हो जाता है। अब आगे मैं समाज के प्रति अधिवक्ता का क्या कर्तव्य होना चाहिये यह बता रहा हूँ।

सामाजिक कर्त्तव्य[सम्पादन]

यहां पर हमारे भारत के प्राचीन दर्शन का उल्लेख करना उचित समझता हूँ जिसके द्वारा हमारे देश में कर्तव्य किये जाने के आधार पर समाज का निर्णय किया था। जहां पर किसी व्यक्ति के अधिकार दिये गये थे, वहां व्यक्ति के कर्तव्यों का भी उल्लेख किया गया था। हमारे मूलभूत जीवन के सिद्धांत को विष्णु पुराण में भी निम्न प्रकार से बताया गया है-

अत्रापि भारतं श्रेष्ठं जंबूद्वीपे महामुने,
यतो हि कर्मशूरेषा अतोन्या भोग भूमयः।

भारत एक महान देश है। यह एक कर्म भूमि का देश है जो कि आनन्द एवं अधिकार के पश्चात्य संस्कृति के सिद्धान्तों के विरूद्ध खड़ा हुआ। महात्मा गांधी ने मानवीय मूल्यों को सृजित करते हुय एक आदर्शवाद हमारे देश में स्थापित किया और कहा कि हमारा देश आवश्यक रूप से कर्म भूमि है, जो कि भोज भूमि के विरोध में खड़ा हुआ है।

यहां यह महत्वपूर्ण रूप से बताया जा रहा है कि प्रसिद्ध पश्चिमी न्यायविद् ड्यूगिट ने सन् 1859 से सन 1928 की अवधि में उन्होंने जो कि संवैधानिक विधि के प्रोफेसर के रूप में कूराडेक्स विश्वविद्यालय में थे और यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि मानव अधिकार, शान्ति एवं खुशहाली तभी समाज में स्थापित हो सकती है जबकि कर्तव्य आधारित समाज का निर्माण हो इस संदर्भ में यह कहा गया है एवं कानून के अंदर कर्तव्यों को इस प्रकार से बताया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पूर्ण रूप से पालन करते हुए समाज को मजबूत करने की ओर अग्रसर हो। मानव को केवल एक ही अधिकार प्राप्त करना चाहिये व रखना चाहिये कि वह हमेशा अपने कर्तव्य का निर्वाह करता रहे। उक्त विचार 18वीं से 20वीं शताब्दी में भी प्रासंगिक थे और आज 21वीं शताब्दी में भी प्रासंगिक है।

कर्तव्य पालन का हमेशा मूलभूत सिद्धान्त हमारे देश में भी वैदिक काल से लेकर आज तक चले आ रहे हैं और हमारे देश के धार्मिक व अध्यात्मिक क्षेत्र में भी यह एक महत्वपूर्ण रूप से परिलक्षित होता है और हमारे देश के प्रसिद्ध धार्मिक ग्रंथ गीता में भी इसे निम्न प्रकार से बताया गया है -

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफल हेतुभूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि।। गीता 2/47

‘‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’’ इसका अर्थ यह है कि तुम्हारा अधिकार यह है कि तुम अपने कर्तव्य का पालन करो इस प्रक्रिया से मानव अधिकार का सृजन हुआ है और मानव अधिकार संरक्षित रहे हैं शायद यह केवल एक ही सर्वोत्तम तरीका सार भूत रूप से हमारे समाज के प्रत्येक लोगों के लिए गीता में कहा गया है कि वे अपने कर्तव्य का पालन करते हुए समाज में अपने दायित्वों का निर्वाह करें और उक्त कर्तव्य का पालन धर्मानुसार हो तभी जाकर के समाज में शान्ति व खुशहाली बनी रही सकती है। यदि हम अधिवक्ता के व्यवसाय की ओर देखें और ऊपर वर्णित गीता के सिद्धांन्त कर्मण्येवाधिकारस्ते जो कि हमारे भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का और हमारे खुशहाल शांति व आनन्दमय समाज का दर्शन है और इस दर्शन को विधि व्यवसाय में सम्मिलित करें तो यह जान पड़ता है कि अधिवक्ता वर्ग का यह कर्तव्य बन पड़ता है कि वह प्रत्येक व्यक्ति के विधिक अधिकारों की रक्षा करे। चाहे वह व्यक्ति हमारे देश का हो अथवा विदेशी नागरिक हो। उसे ‘‘वसुधैव कुटुम्ब’’ की भावना से आत्म प्रेरित होकर अपने कर्तव्य का निर्वहन हमारे भारत के संविधान में दिये गये सिद्धान्त की विधि के समक्ष क्षमता और विधि का समान संरक्षण को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक व्यक्ति के विधिक अधिकार दिलाने के प्रति समर्पण भाव से कार्य करे। इस संबंध में हमारे भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का कल्याणकारी श्लोक आज प्रासंगिक है -

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु माँ कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ।।

अधिवक्ता के व्यवसाय का यह भी अर्थ है कि दूसरे व्यक्तियों को सेवायें प्रदान करना। इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि अधिवक्ता प्रत्येक व्यक्ति को विधिक सेवा प्रदान करते हुए विधिक सेवा प्रदान करने के बदले में पारिश्रमिक लेता है लेकिन फिर भी यह व्यवसाय एक सेवाभावी प्रवृत्ति से प्रेरित होकर किया जाने वाला व्यवसाय होने के कारण इसे हम व्यापार अथवा वाणिज्य की श्रेणी में नहीं रख सकते हैं और न ही यह रखा जा सकता है, क्योंकि मानव के अधिकार की रक्षा करने में एक मूलभूत मानवता की भावना छिपी होती है। उस मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए किये गये कार्य की कीमत रूपयों में नहीं आंकी जा सकती, इसीलिए अधिवक्ता गण द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को दिलाये जाने वाला विधिक अधिकार या प्रत्येक व्यक्ति के किये जाने वाले विधिक अधिकार की रक्षा के बदले में लिया गया पारिश्रमिक व्यवसाय की श्रेणी में लिये गये पारिश्रमिक के समतुल्य नहीं है। हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जो कि स्वयं एक अधिवक्ता थे जिन्होंने आज से लगभग 80 वर्ष पूर्व अधिवक्ता वर्ग में इस मानवीय मूल्यों से प्रेरित होकर किये जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति के विधिक अधिकारों की रक्षा के व्यवसायीकरण का मजबूती से विरोध किया था। तब उन्होंने कहा था कि ‘‘प्रथम महत्वपूर्ण बात अपने मस्तिष्क में रखने की है कि यदि आप विधिक व्यवसाय को ईश्वरीय व्यवसाय या ईश्वर द्वारा प्रदत्त कृत्य की श्रेणी में रखकर करते हैं तब यह आपका व्यवसाय व किया जाने वाला कार्य कभी भी आपको स्वार्थ की भावना से प्रेरित नहीं करेगा व स्वार्थी नहीं बनायेगा बल्कि आपके द्वारा किया जाने वाला उक्त कार्य राष्ट्र की सेवा के प्रति किये जाने वाले कार्य की श्रेणी में माना जायेगा। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का यह विचार हमेशा हमेशा के लिए संपूर्ण पृथ्वी के अभिभाषक वर्ग के लिए प्रेरणा दायक रहेगा। अब यहां यह बताना चाहेंगे कि विधि व्यवसाय का अधिकार वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करना है।

अधिवक्ता वर्ग का विधि व्यवसाय का अधिकार है कि वह अन्य व्यक्तियों की रक्षा करें एवं अन्य व्यक्तियों के अधिकार की रक्षा करें एवं अन्य व्यक्तियों को अधिकार दिलायें। इस संबंध में यहां निम्नलिखित श्लोक के द्वारा स्पष्ट है कि -

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः,
परोपकाराय दुहन्ति गावः,
परोपकारार्थ वयं अधिवक्तारः।

इस सिद्धान्त को कर्नाटक उच्च न्यायालय की डबल बेंच ने प्रभावशाली तरीके से न्याय दृष्टांत ‘‘टी.वैकटैया बनाम मैसूर राज्य ए.आई.आर. 1963 मैसूर 127’’में लागू करते हुए बताया कि उक्त न्याय दृष्टांत में याचिकाकर्ता ने माननीय उच्च न्यायालय के उक्त निर्णय को चुनौती दी कि उसे जिला न्यायाधीश के पद पर चयन हेतु साक्षात्कार के लिए नहीं बुलाया गया था जबकि उसने उक्त पद पर के लिए आवेदन पत्र प्रस्तुत किया था। उक्त मामले में उस व्यक्ति ने न्यायालय के समक्ष अधिवक्ता की वर्दी में अपने आपको प्रस्तुत किया था। न्यायालय ने यह कहा कि अपने स्वयं के मुकदमें की पैरवी कर रहे हैं और व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित हुए हैं आपको यह अधिकार नहीं है कि आप एक अधिवक्ता का ड्रेस पहनकर न्यायालय को संबोधित करें। माननीय न्यायालय ने याचिकाकर्ता द्वारा स्वयं के मुकदमें में यद्यपि वह अधिवक्ता था लेकिन व्यक्तिगत मुकदमें में अधिवक्ता की ड्रेस पहनकर उसे न्यायालय को संबोधित करने का अधिकार नहीं है। न्यायालय ने धारा 30 अधिवक्ता अधिनियम की व्याख्या करते हुए कहा कि अधिवक्ता को न्यायालय में ड्रेस पहनकर संबोधन का अधिकार तभी मिलता है जब कि किसी मुवक्किल की पैरवी कर रहा हो स्वयं की पैरवी करते वक्त उसे ड्रेस पहन कर न्यायालय को संबोधन का अधिकार नही रहता है। यह एक महत्वपूर्ण निर्णय अधिवक्ता वर्ग के लिए प्रदान किया गया है जो कि जो कि अधिवक्ता वर्ग के सामाजिक कर्तव्य के प्रति दी गई सेवाओं को बताते हुए यह समझाया गया है कि अधिवक्ता वर्ग को ड्रेस पहनकर न्यायालय में उपस्थित होने का अर्थ यह है कि वह मुवक्किल का हित न्यायालय के समक्ष सेवाभावी रूप से प्रकट कर रहा है। अधिवक्ता वर्ग को अपने व्यवसाय में पर्याप्त योग्यता हासिल करना चाहिये इस संबंध में भी नीचे बताया जा रहा है।

जैसा कि अधिवक्ता अपनी सेवायें मुवक्किल के विधिक अधिकारों के संबंध में प्रदान करता है तो अधिवक्ता का प्रथम दायित्व यह है कि जिस प्रकार से एक चिकित्सक यदि पर्याप्त रूप से दक्ष न हो तो वह अपने मरीज को मौत की नींद सुला सकता है। चिकित्सक मरीज को तभी बचा सकता है जब कि वह अपने व्यवसाय में पूर्ण रूप से दक्ष हो। इसी प्रकार से प्रत्येक अधिवक्ता का यह दायित्व है कि वह अपने व्यवसायिक ज्ञान को इतना पर्याप्त रूप से हासिल करे कि वह मुवक्किल के अधिकारों की रक्षा पर्याप्त रूप से कर सके। ऐसा न हो कि अधिवक्ता मुवक्किल के अधिकार की रक्षा करने के बजाय उसे अन्य मुसीबतों में उलझा दे। इसलिए यह सही जान पड़ता है कि अधिवक्ता को कानून के विभिन्न क्षेत्रों की पर्याप्त रूप से दक्षता पूर्ण ज्ञान होना आवश्यक है और यह ज्ञान अर्जित करना उसका परम कर्तव्य और सामाजिक कर्तव्य भी है। इस संबंध में निम्नलिखित श्लोक अवलोकनीय है -

ज्योतिषं व्यवहारंच प्रायश्चित्तं चिकित्सितं।
अजानन् यो नरो ब्रूयात् अपराधं किं अतः परं।।

यह श्लोक बृहद पराशर स्मृति में हमारे भारतीय प्राचीन पुस्तक में लिखा हुआ है और यह बताया गया है कि यह एक बहुत बड़ा अपराध होगा कि वगैर किसी दक्षता हासिल किये, आवश्यक ज्ञान प्राप्त किये कोई व्यक्ति ज्योतिष विज्ञान का अथवा अधिवक्ता का अथवा चिकित्सक का दायित्व निभाये। आजकल काम चलाऊ प्रवृत्ति व सतही प्रवृत्ति से अपने जीवन में कार्य करने की प्रवृत्ति व लोगों में दिन प्रतिदिन विकसित होकर बढ़ती जा रही है और आम आदमी आलस्य वश आलस्य के दल-दल में अपने आपको डालकर कम समय में अधिक धन अर्जित करना और वगैर किसी मेहनत व पर्याप्त व्यवसायिक दक्षता हासिल किये अपना काम चलाना चाहता है। यह दुष्प्रवृत्ति हमारे आने वाली पीढ़ी के लिए घातक सिद्ध होगी व मानव समाज के लिए अभिशाप होगी। इससे हमें बचना चाहिये और काम चलाऊ व सतही प्रवृत्ति की आदत को त्यागकर कर्मठ भाव, आत्मीयता, एवं समर्पण भाव से हमारे प्राचीन भारतीय दर्शन की ख्याति को ध्यान में रखते हुए अपने ज्ञान को इतना विकसित करें कि दक्षता के मामले में आपके ऊपर कोई उंगली न उठा सके। अर्थ के पीछे भागना अर्थ का दास बनना है, जो व्यक्ति अर्थ का दास बनता है वह अज्ञानता में जीता है। अज्ञानता को वही मिटा सकता है जो अर्थ व मोह से दूर हो और अपने आपको कर्तव्य के प्रति समर्पित करते हुए फल की इच्छा न रखते हुए गीता ग्रंथ की भावना व आदर्श को ध्यान में रखते हुए अपना कार्य निष्काम कर्म से करे और इस तरह का कार्य करते हुए अधिवक्ता अपने आप में दक्षता हासिल कर सकता है तथा समाज व लोकतंत्र को मजबूत कर सकता है। अधिवक्ता वर्ग ने स्वतंत्रता के आंदोलन में हमारे देश में बहुत बड़ी कुर्बानी देकर देश को आजाद करवाया, गुलामी से मुक्त करवाया और उसी अधिवक्ता वर्ग के क्षेत्र में न्यायपालिका में आज करोड़ों लोग न्याय की आस लगाये वर्षों से न्यायालय के चक्कर लगा रहे हैं एवं करोड़ों मुकदमें न्यायालय में लंबित हैं एवं जिनका न्याय कब होगा, कैसे होगा यह अभिभाषक वर्ग को स्वयं मालूम नहीं है ऐसी परिस्थिति में अधिवक्ता वर्ग को अपने व्यावसायिक मूल्यों को पहचानने की जरूरत है और उसे आत्मीयता से लागू कर इस देश में न्याय को स्थापित करते हुए लोकतंत्र को मजबूत करने की आशा केवल मात्र अधिवक्ता वर्ग से की जा सकती है और यदि आशा की किरण का प्रस्फुटन हुआ, तो इसी बुद्धिजीवी वर्ग से होगा इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है। अब मै यहां बताना चाहूंगा कि व्यवसायिक आचार संहिता अधिवक्ता वर्ग की क्या है।

अधिवक्ता के लिए व्यवसायिक आचार संहिता आज समान रूप से व्यवसाय में महत्वपूर्ण है। आज हमारे लिये यह दुर्भाग्य की बात है कि बहुत सारे अधिवक्ता व्यवसायिक दक्षता व व्यवसायिक आचार संहिता से परिपूर्ण नहीं है यह एक धब्बा हमारे विधिक व्यवसाय पर है। यदि अधिवक्ता वर्ग में सारभूत रूप से व्यवसायिक आचार संहिता व व्यवसायिक दक्षता होगी तो निश्चित रूप से हमारे देश की जनता में अधिवक्ता वर्ग के प्रति विश्वास पैदा होगा। देश की जनता में अधिवक्ता वर्ग के प्रति विश्वास पैदा हो व विश्वास बना रहे इसके लिए व्यवसायिक दक्षता व अचार संहिता का होना अति आवश्यक है। मै यहां यह बताना चाहूंगा कि अधिवक्ता संघ के सदस्य कई बार भ्रष्टाचार एव पक्षपात का आरोप न्यायिक अधिकारियों पर लगाते हैं। अधिकतर शिकायत न्यायिक अधिकारी के विरूद्ध इस बात कि की जाती है कि वह पक्षपात कर रहा है कि बार के सदस्यों के प्रति समान व्यवहार न रखते हुए कुछ सदस्यों का पक्ष समपार्श्विक कारण से तिरछे उद्देश्यों के लिए लेता है इसलिए यहां प्रत्येक अधिवक्ता का यह दायित्व है कि वह स्वयं अपनी आत्मा में इस बात का संकल्प ले कि वह न्यायिक अधिकारी के द्वारा समपार्श्विक कार्य को लेकर तिरछे उद्देश्यों की पूर्ति से किये जाने वाले पक्षपात में अपन आपको शामिल न होने दे व अपने आपको इससे दूर रखें। प्रत्येक बार का सदस्य किसी भी न्यायिक अधिकारी द्वारा यदि पक्षपात किया जाता है। चाहे उसका कारण कोई भी हो तो वह उसे अपने आप से दूर रखें यदि प्रत्येक अधिवक्ता अपने आपको न्यायिक अधिकारी के इस कृत्य से दूर रखेगा तो न्यायिक अधिकारी कभी भी पक्षपात नहीं कर पायेगा और उच्च न्यायिक मूल्यों की स्थापना हमारी न्यायपालिका में होगी। प्रत्येक अधिवक्ता यदि ऐसी प्रवृत्तियों में लिप्त होता या न्यायिक अधिकारी से पक्षपात करवाता हो इसके लिए अधिवक्ता संघ व बार काउंसिल को सतर्क रहना चाहिये व बार के सदस्य के विरूद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही कर उसे दंडित करना चाहिये, यही एक तरीका है जो भ्रष्टाचार एवं पक्षपात को न्याय प्रशासन से उखाड़ फेक सकता है। इस संबंध में यहां पर संत कबीर के श्लोक का वर्णन किया जाना प्रासंगिक रहेगा कि -

बुरा जो देखन में चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपनो, मुझसे बुरा न कोय।।

तात्पर्य यह है कि अधिवक्ता संघ अपने अधिवक्ता वर्ग के प्रत्येक सदस्यों में किसी के प्रति लगाव या किसी के प्रति अलगाव किये जाने की प्रवृत्ति यदि पाता है या अधिवक्ता वर्ग का कोई सदस्य ऐसी प्रवृत्ति में लिप्त होता है तो स्वयं अधिवक्ता वर्ग की संस्था को इस संबंध में कार्य करना चाहिये। अधिवक्ता वर्ग की संस्था यह नहीं कह सकती कि गलती दूसरे संस्था के लोगों की है। जैसा कि संत कबीर ने कहा कि मनुष्य को अपनी बुराई स्वयं को देखना चाहिये और अपने में जितने अवगुण हैं उनको अग्नि में फेंककर पवित्र निर्मल दया करूणा से भरा हुआ मन मस्तिष्क व आत्मा को शुद्ध बुद्ध रखते हुए अपने जीवन को सफेद चदरिया की भांति रखना चाहिये। जिस प्रकार से मनुष्य जब पैदा होता है तब वह छल, कपट, प्रपंच, मोह, ईर्ष्या, द्वेष, राग आदि से मुक्त होकर शुद्ध बुद्ध निर्मल आत्मा सफेद चदरिया की भांति होती है। ऐसा ही जीवन मनुष्य को जीना चाहिये और अधिवक्ता वर्ग भी सोचे कि संत कबीर के उक्त श्लोक का सिद्धांत प्रत्येक अधिवक्ता के जीवन का आचरण हो तभी जाकर नीर-क्षीर न्याय प्रत्येक व्यक्ति को कर्मण्येवाधिकारस्ते के सिद्धांत पर अग्रसर होकर ‘‘वसुधैव कुटुम्ब’’ की भावना से प्रेरित होकर दिलाया जा सकता है।

अधिवक्ता वर्ग के कर्तव्य के संबंध में यहां यह बताना उचित है कि उनके पांच प्रकार के कर्तव्य हैं। पहला कर्तव्य स्वयं की संस्था के प्रति है कि वह संस्था का सम्मान व गरिमा बनाये रखें, दूसरा कर्तव्य न्यायालय के प्रति, है कि वह न्यायालाय का सम्मान व गरिमा बनाये रखें, तीसरा कर्तव्य स्वयं के पक्षकार के प्रति है कि उसे न्याय दिलायें चौथा कर्तव्य विपक्षी पक्षकार के प्रति है उसके प्रति भी अन्याय न करें और यदि विपक्षी के हित में न्याय हो रहा है या कानूनी प्रावधान है तो, उसे निर्भीक रूप से न्यायालय के समक्ष नीर क्षीर विवेक से न्याय किये जाने हेतु रखें और पांचवा कर्तव्य अपने साथियों के प्रति है कि वे साथियों के साथ सम्मानजनक अच्छे व्यवहार रखें। ये सभी कर्तव्य अधिवक्ता वर्ग की पवित्र गंगोत्री संस्था से निकली निर्मल भागीरथी के समान है। इनका उल्लेख यद्यपि किन्हीं कानून व नियमों में नहीं है फिर भी ये विचार हमारे भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के दार्शनिक विचार धाराओं से प्रस्फुटित होकर आज भी प्रत्येक अधिवक्ता के हृदय में विद्यमान है। शर्त यह है कि उनके हृदय में विद्यमान इन सिद्धान्तों को हम उन्हें याद दिलायें। इसके साथ ही मैं यह कहना चाहूंगा कि अधिवक्ता वर्ग के सदस्यों के लिए बार काउंसिल आफ इंडिया के भाग-7 में आचरण संहिता को लागू करवाने के संबंध में की गई अनुशासनहीनता की कार्यवाही के नियम आदि बता रखे हैं लेकिन उक्त नियमों की कभी भी अधिवक्ता को उसक जीवन में जरूरत नहीं पड़ेगी यदि वह ऊपर वर्णित हमारे भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की आदर्श विचारधारा को अपने हृदय में संजोकर जीवन में कर्तव्य के पथ पर लागू करेंगे तो निश्चित रूप से अधिवक्ता वर्ग अपने सम्मान जिस प्रकार से आजादी की लड़ाई में उसने भारतीय समाज में गरिमामय रूप से पाया था वह आज भी प्राप्त करेंगे व भविष्य में भी प्राप्त करते रहेंगे।

प्रत्येक अधिवक्ता का यह कर्तव्य है कि वह अपने मुवक्किल को न्यायालय से न्याय दिलाये। यदि उसके मुवक्किल के प्रति न्याय का पलड़ा भारी है तो इस संबंध में विधिक प्रावधानों को न्यायालय के समक्ष पूर्णतया रखें। लेकिन आजकल यह हो रहा है कि अधिवक्ता वर्ग येन-केन-प्रकारेण मुकदमे को लंबे समय तक चलाने के लिए कुछ तरीके निकाल लेता है और आधारहीन आवेदन पत्र न्यायालय में प्रस्तुत करता है अथवा अनावश्यक स्थगन न्यायालय से प्राप्त करते हुए न्यायालय में विलंब पैदा करता है अधिवक्ता वर्ग को चाहिये कि वह अपने आपकों ऐसा विकसित करें ऐसी भावना अंतरमन से पैदा करें कि उसे जहां तक संभव हो सके शीघ्र न्याय दिलाने के लिए पक्षकार व न्यायालय की सहायता करें। यह निर्विवाद सत्य है कि अधिवक्ता वर्ग का यह दयित्व है कि वह अपने मुवक्किल की मुकदमें की अच्छी पैरवी तुरंत व दक्षता पूर्ण करे लेकिन इसके साथ ही वह निर्भीक व निष्पक्ष रहे और यदि उसे ऐसा लगता है कि उसके विरोधी पक्षकार के पक्ष में कोई कानून है नियम है या निर्णय होना है और उक्त कानून नियम उसकी जानकारी में है जो न्याय निर्णय के लिए आवश्यक हो तो वह भी न्यायालय को बतायें ताकि अपने विधिक दक्षता से पक्षकारों के बीच वास्तविक न्याय हो ओर न्यायालय को दूध का दूध व पानी का पानी करने में अपना आत्मीय सहयोग दें। चाहे वह किसी भी पक्ष की पैरवी कर रहा हो और एक ऐसा आदर्श व्यक्तित्व न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर समाज में आदर्श व्यक्तित्व न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर समाज में सम्मान प्राप्त करें। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय के उपर अधिवक्ता वर्ग से जुड़े हुए आचार संहिता से संबंधित महत्वपूर्ण न्याय निर्णय दिये है जिन्हें मैं यहां बताना उचित समझता हूँ जो कि निम्न है -

  • 1. अधिवक्ता को यह चाहिये कि वह झूठी व तथ्यहीन याचिकायें न्यायालय में प्रस्तुत न करें ताकि न्यायालय का मूल्यवान व कीमती समय नष्ट हो।
  • 2. अधिवक्ता वर्ग को यह चाहिये कि वह इस बात से संतुष्ट हो जाये कि वह अपने पक्ष की पैरवी कर रहा है और अपने पक्ष के हित में कार्य कर रहा है। उसे दूसरे पक्ष की ब्रीफ स्वीकार नहीं करना चाहिये और इसके साथ ही यदि वह लोक अभियोजक नियुक्त किया गया है तो उसे अभियुक्त की ओर से आपराधिक मामले में पैरवी स्वीकार नहीं करनी चाहिये इस संबंध में न्याय दृष्टांत 1986(6) एस.सी.सी. सप्लीमेंट 719 अवलोकनीय है।
  • 3. अधिवक्ता को यह चाहिये कि वह प्रकरण का पूरा अध्ययन करे ओर तत्पश्चात वह वकालतनामा प्रस्तुत कर उस जज के समक्ष पैरवी न करे जो कि उसका पिता हो अथवा उसका रिश्तेदार हो। इस संबंध में न्याय दृष्टांत सुनील कुमार बनाम पोहता शेख ए.आई.आर.1984 सु.को. 1591 अवलोकनीय है।
  • 4. अधिवक्ता वर्ग का कभी अपनी पैरवी का पाला बदलना नही चाहिये, यदि वह वादी का वकील है अथवा रहा है तो उसे प्रतिवादी को उसकी बात सुनकर उसे सलाह नहीं देनी चाहिये और प्रतिवादी की ओर से उसे पैरवी नहीं करनी चाहिये और यदि वह प्रतिवादी का वकील है अथवा रहा है अथवा उसे सलाह दे दी है तो उसे कभी वादी का वकील नहीं बनना चाहिये। इस संबंध में न्याय दृष्टांत ‘‘सत्यनारायण सिंह बनाम रामनाथ सिंह ए.आई.आर. 1984 सु.को. 755’’ अवलोकनीय है।
  • 5. अधिवक्ता को यह चाहिये कि वह कभी भी गलत शपथ पत्र को तस्दीक न करे इस संबंध में न्याय दृष्टांत ‘‘चन्द्रशेखर सोने विरूद्ध बार काउंसिल राजस्थान ए.आई.आर. 1983 सु.को. 1012’’ अवलोकनीय है।
  • 6.अधिवक्ता को कभी भी गलत राय देने में अपने आपको आलिप्त नहीं करना चाहिये और न ही उसे गलत राय देनी चाहिये। इस संबंध में यहां यह स्पष्ट किया जा रहा है कि अधिवक्ता जितना अपने स्तर के अनुसार अपनी आयु के अनुसार अपने क्षेत्र में जितना अधिवक्ता लोग ज्ञान रखते हैं उसके अनुसार यदि वह बुद्धिमत्ता पूर्ण अपनी कोई राय रखता है तो वह कोई अनुचित नहीं होगा यद्यपि उसकी राय किसी अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा प्रकरण को देखने पर गलत पाई जाये। या कानून के अध्ययन के उपरांत भी गलत पाई जाये फिर भी वह व्यवसायिक दुराचरण का दोषी नहीं है। क्योंकि उसने अपने ज्ञान विवेक से निर्मल मन से राय दी है। इस संबंध में न्याय दृष्टांत ‘‘ए.आई.आर. 1985 सु.को.2’’ अवलोकनीय है। अभिभावक वर्ग को चाहिये कि वह अपने मुवक्किलों से यह कहते हुए धन एकत्रित न करें कि उसे न्यायाधीश को धन रिश्वत के रूप में देना है इस संबंध में न्याय दृष्टांत ‘‘पांडू रंगा दतरैया खांडेकर विरूद्ध बार काउंसिल आफ महाराष्ट्र ए.आई.आर.1983 सु.को.110’’ अवलोकनीय है।
  • 7. अधिवक्ता वर्ग को यह चाहिये कि वह ऐसे मुकदमों में जिनमें प्रतिकर की राशि उनके पक्षकारों को दी जाती है, वह राशि पक्षकारों को उचित रूप से मिले, अधिकतर यह देखने में आता है कि निर्णय होने के पश्चात निर्णय अनुसार राशि पक्षकारों को नहीं मिलती है और अधिवक्ता द्वारा दुरूपयोग कर लिया जाता है। ऐसा मोटर दावा दुर्घटना अधिनियम के अंतर्गत पारित अवार्ड की राशि के संबंध में अथवा भूमि अवाप्ति अधिनियम के अंतर्गत पारित अवार्ड की राशि के क्रम में दुरूपयोग किया जाता हैं, ऐसा नहीं होना चाहिये। इस संबंध में न्याय दृष्टांत ए. आई.आर 1983 सु.को. 1012अवलोकनीय है। यहां यह भी बताना उचित है कि इस प्रकार की शिकायतें मिलने के उपरांत माननीय कर्नाटक उच्च न्यायालय ने सिविल रूल्स में इस बात का संशोधन किया कि प्रकरण के निर्णय के पश्चात प्रतिकर की राशि का चेक केवल पक्षकार को ही दिया जाये, अधिवक्ता को न दिया जाये। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति निर्मित हुई है जो कि विधि व्यवसाय में जुड़े लोगों की गरिमा के विपरीत है, ऐसा नहीं होना चाहिये। अधिवक्ता वर्ग के विरूद्ध शिकायतें आने के कारण प्रकरण में निर्णय के पश्चात मुआवजे की राशि को पक्षकारों को दी जानी चाहिये इस संबंध की राशि को पक्षकारों को दी जानी चाहिये। इस संबंध में न्याय दृष्टांत ‘‘वी.सी. रंगमुरारी रंगादूरी बनाम बी.गोपालन ए.आई.आर 1987 सु.को. 281’’अवलोकनीय है। अधिवक्ता का न्याय प्रशासन में क्या भूमिका होनी चाहिये, इस संबंध में माननीय सर्वोंच्च न्यायालय के न्यायाधीष महोदय श्री कृष्णा अय्यर ने कहा है कि अधिवक्ता को चाहिये कि वह अपने व्यवसाय व जीवन स्तर में उच्च आदर्शों को कायम रखें और वह इस बात को ध्यान रखे कि शीघ्र न्याय लोगों को मिले और विधि का व्यवसाय सार्वजनिक उपयोगिता के लिए काम में आना चाहिये न कि अपनी मोनोपॉली को बढ़ाने के लिए। यह राष्ट्र हित में नहीं है। अधिवक्ता वर्ग को समाज में विश्वास प्राप्त करना चाहिये और उसे यह ध्यान में रखना चाहिये कि वह सामाजिक न्याय का वाहन है। इस संबंध में न्याय दृष्टांत ‘‘बार कांउसिल बनाम एम.वी. डबलोकर ए.आई.आर. 1976 सु.को. 242’’ अवलोकनीय है। यहां पर यह भी बताना उचित है कि किसी भी अधिवक्ता को नैतिक दुराचरण के मामले में नहीं पड़ना चाहिये। नैतिक दुराचरण की परिभाषा को संकुचित दायरे में नहीं लिया जा सकता। नैतिक दुराचरण के संबंध में यहां यह बताना उचित है कि ऐसा कोई अधिवक्ता का दुराचरण जो कि अनैतिक हो वह नैतिक दुराचरण में आयेगा। अधिवक्ता का दुराचरण जो कि अनैतिक हो वह नैतिक दुराचरण में आयेगा। अधिवक्ता को पक्षकारों को पत्र देकर बुलाकर मुकदमा की ब्रीफ स्वीकार नहीं करनी चाहिये यह व्यावसायिक आचरण के विरूद्ध है। होना यह चाहिये कि पक्षकार स्वयं उसकी इच्छानुसार अधिवक्ता के समक्ष प्रस्तुत होकर अपना मुकदमा लड़ने के लिए निवेदन करें। इस संबंध में न्याय दृष्टांत ‘‘ए.आई.आर. 1962 सु.को. 1337’’अवलोकनीय है।

बैंच के साथ संबंध[सम्पादन]

न्यायाधीशगण को और अधिवक्तागण को न्याय प्रशासन को पृथक नहीं किया जा सकता है और इन दोनों में से किसी भी एक की कमी से न्याय प्रदान नहीं किया जा सकता है। जज का भी यह दायित्व है कि शांति पूर्वक सुने एवं अधिवक्ता का यह दायित्व है कि वह शांति पूर्वक सुने एवं अधिवक्ता का यह दायित्व है कि वह पर्याप्त सहयोग न्यायाधीश को करे। न्यायाधीश हमेशा सत्य अन्वेषण करता है भूसे में से दाने को निकालता है उसके समक्ष दोनों पक्षों की जो साक्ष्य आती है उसको देखते हुए सत्यता क्या है, असत्यता क्या है, इसको ढूंढ निकालता है और इसको निकालने में अधिवक्ता गण को मदद करना चाहिये और अधिवक्ता गण को चाहिये कि यथा स्थिति न्यायाधीश के समक्ष रखें। बगैर अधिवक्ता की सहायता के न्याय पूरा नहीं किया जा सकता है। दोनों पक्षों के अधिवक्ता का यह दायित्व है कि न्यायालय को सही नतीजे पर पहुंचने में मदद करे। अधिवक्ता का यह कर्तव्य नही है कि वह उसके पक्षकार के लिए ‘‘बाई हुक एवं कुक’’ यानी ऐन केन प्रकार से प्रकरण को जीतने का प्रयास करे और काल्पनिक रूप से साक्ष्य तैयार करके न्यायालय को गुमराह करे। इसलिए प्रत्येक अधिवक्ता का यह दायित्व है कि वह न्यायालय को संतोषप्रद ढंग से मुकदमें का निराकरण करने में सहयोग प्रदान करे। अधिवक्ता को यह चाहिये कि वह न्यायालय के समक्ष जब अपना मामला रखता है तब विनम्रता की भाषा का प्रयोग करें। इसका अर्थ यह नहीं है कि वह अपनी बात को वह अपने आधारों को दृढ़ता पूर्वक न कहे और न्यायालय को दृढ़ता पूर्वक संतुष्ट न करे। उसे दृढ़ता पूर्वक बात रखने का व साहस के साथ कहने का अधिकार है और अधिवक्ता को चाहिये कि जब कभी भी न्यायाधीश उसके बात के विपरीत कोई तथ्य प्रस्तुत करता है अथवा कोई जानकारी अधिवक्ता से चाहता है अथवा कोई प्रश्न पूछता है तो ऐसे समय में अधिवक्ता को उत्तेजित नहीं होना चाहिये, नाराज नहीं होना चाहिये, बल्कि सम्मान पूर्वक तरीके से विनम्रता से प्रश्नों का उत्तर देकर न्यायालय से टकराहट करने की बजाय समुचित तरीके से अपना मामला रखना चाहिये। अधिवक्ता का साहस पूर्वक मामला रखने का अर्थ यह नहीं है कि वह अपनी भाषा को निंदा पूर्ण रूप से रखें और अनैतिक रूप से रखें। अधिवक्ता को कभी यह नहीं कहना चाहिये कि इस मुकदमें को किसी विशेष न्यायाधीश के समक्ष सुनवाई के लिए रख दिया जाये यदि वह ऐसा निवेदन करता है तो दूसरे पक्षकार के मस्तिष्क में संदेह पैदा होता है और दूसरा पक्षकार न्यायाधीश पर संदेह करने लग जाता है तो ऐसी स्थिति से अधिवक्ता को बचना चाहिये। इस संबंध में न्याय दृष्टांत ‘‘चन्द्रप्पा विरूद्ध एच.एम.पी. 1983 (1) कर्नाटका लॉ क्रानिकल 1’’ अवलोकनीय है एवं ‘‘ए.आई.आर 1962 सु.को. 1337’’अवलोकनीय है।

पक्षकार के प्रति दायित्व[सम्पादन]

अधिवक्ता को जब वह पारिश्रमिक पक्षकार से लेता है तब उसे चाहिये कि वह उचित पारिश्रमिक ले। कभी कभी यह अनुभव किया जाता है कि कुछ मामलों में अधिवक्ता बहुत बड़ी पारिश्रमिक राशि लेते हैं जब कि उक्त मामलों में मैटर में कोई जटिल प्र्रश्न हल करना नहीं होता है और न ही कोई ज्यादा समय व शक्ति की जरूरत पड़ती है और जब कि कुछ मामलों में जो कि गरीब लोगों से संबंधित है और गरीब लोग अपने जटिल मुकदमें में या उलझे हुए केस में जिसमें ज्यादा समय लगने व शक्ति आवश्यक है और वह अधिवक्ता को गरीबी के कारण उनका उचित मेहनताना नहीं दे पाते हैं ऐसे मामले में अधिवक्ता को चाहिये कि वे पर्याप्त रूप से समय प्रदान कर अध्ययन कर मुकदमें में बहस कर गरीब व्यक्ति को न्याय दिलायें। जैसा कि महान क्रान्तिकारी विचारक तुलसीदास जी ने कहा है कि

परहित सरिस धर्म नहीं भाई,
पर पीड़ा नहि सम अधमाई।

इसलिए परोपकार किये जाने को अपने मस्तिष्क में धारण करना चाहिये। यदि अधिवक्ता इस बात को सोचेगा कि उसने जितनी मेहनत की है या जितनी मेहनत की आवश्यकता पड़ती है, उतना ही पारिश्रमिक लेने पर वह कार्यवाही करेगा निश्चित रूप से वह हमारे देश की न्याय प्रशासन में समान रूप से सभी न्याय दिलाने में एक बाधा के रूप में उपस्थित होगा व संविधान के उच्च आदर्शों की प्राप्ति में बाधक बनेगा। इस संबंध में यहां उदाहरण देकर बताया जा रहा है कि यदि किसी पक्षकार ने किसी अधिवक्ता को एक प्रकरण पैरवी के लिए दिया और कहा कि वकील साहब उक्त प्रकरण में आप बहस करेंगे और बहस करने का पारिश्रमिक दिया जा रहा है तो वकील साहब उस पक्षकार को यह नहीं कह सकते हैं कि यह तो केवल बहस करने का पारिश्रमिक हुआ लेकिन अब प्रकरण को पढ़ने व अध्ययन करने का पारिश्रमिक और दो। प्रकरण का अध्ययन करने का पढ़ने का पारिश्रमिक अलग से नहीं मांगना चाहिये क्योंकि यह सभी जानते हैं कि वकील साहब प्रकरण का अध्ययन करके ही पढ़कर तथा न्यायालय में बहस करेंगे। अधिवक्ता को यह चाहिये कि वह अपने पक्षकार की हैसियत के अनुसार और प्रकरण की परिस्थितियों के अनुसार उसमें लगने वाले श्रम के अनुसार अपना पारिश्रमिक ले रहे हैं और सेवा भावी तरीके से कार्य कर न्याय प्रशासन को मदद करे और अधिवक्ता को यह चाहिये कि वह अधिक धन कमाकर बहुत खर्चीली जिंदगी आलीशन जिंदगी न जिये बल्कि एक साधारण जीवन जियें। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा कि जब कभी भी कोई व्यक्ति अधिक धन कमाने के लालसा में लिप्त होकर अधिक धन कमा लेता है और बड़े शान शौकत की जिंदगी जीता है तो निश्चित रूप से वह व्यक्ति अपनी योग्यता व क्षमता के अनुसार समाज को सेवायें देने में उसका योगदान कम हो जाता है अथवा कम कर लेता है अथवा गिरा लेता है और वह समाज के लिए पर्याप्त रूप से राष्ट्र के लिए व न्याय प्रशासन के लिए पर्याप्त रूप से अपने योग्यता व क्षमता से सहयोग प्रदान करने से वंचित हो जाता है।

अधिवक्ता वर्ग हमारे देश में एक संगठन है जो कि समाज में सम्मान जनक स्थिति गरिमा मय स्थिति प्राप्त किये हुए है और उनकी क्रियाकलाप हमेशा ऐसी होनी चाहिये कि वह समाज को कुछ दे सके। आजकल यह देखने को मिलता है कि अधिकतर अधिवक्ता गण न्यायालयों के बहिष्कार करने में लग जाते हैं आये दिन हड़ताल करते हैं यह सब कुछ अच्छी बात नहीं है बल्कि एक आपराधिक लापरवाही है। जो कि वे न्यायालय के प्रति व पक्षकार के प्रति कर रहे हैं अधिवक्ता को यह सोचना चाहिये कि वे एक कर्मकार नहीं है जो कि अपने मालिक के सामने मांग के संबंध में हड़ताल का सहारा ले। अधिवक्ता गण इस बात को महसूस करें कि जब वे हड़ताल पर जाते हैं तब कोई अपने पक्षकारों के एवं न्याय प्रशासन के प्रति कार्य कर रहे होते है और वे असंवैधानिक प्रावधान की ओर अग्रसर होते हैं।

=लोकतंत्र एवं अधिवक्ता[सम्पादन]

डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने 25 नवम्बर 1949 को संवैधानिक सभा में यह कहा था कि ‘‘यदि हम देश में लोकतंत्र को वास्तविक रूप से कायम रखना चाहते हैं तब हमें क्या करना चाहिये इस संबंध में उन्होंने कहा कि सबसे पहले हमें हमारे संवैधानिक प्रावधानों को इस तरह से लागू करना चाहिये कि हम सामाजिक एवं आर्थिक उद्देश्यों को पूर्णतः प्राप्त कर लें’’।

इस प्रकार से डॉ. भीमराव अम्बेडकर का यह कथन आज सारभूत रूप से सही प्रतीत होता है। लोकतंत्र तभी कायम रह सकता है जब कि इस देश में सामाजिक व आर्थिक न्याय प्रत्येक व्यक्ति को मिले और उक्त न्याय मिलने के उपरांत हड़ताल, धरना, प्रदर्शन आदि की आवश्यकता नहीं रहेगी, तो उक्त संवैधानिक प्रावधान में सामाजिक न्याय व आर्थिक न्याय दिलाने में अधिवक्ता गण को अपना जीवन समर्पित कर देना चाहिये तभी वह देश की जनता को शांति, खुशहाली व समानता व न्याय प्रदान कर सकेंगे।

अधिवक्ता एवं मानवता[सम्पादन]

अंत में मैं यह कहना चाहूँगा कि प्रत्येक अधिवक्ता को ऊपर वर्णित बातों को अपने मन मस्तिष्क में विचार करने के उपरांत यह चिंतन करना चाहिये एवं यह सोचना चाहिये कि वह एक मानव है और एक मानव को सबसे पहले मानव होने के नाते मानवता रखनी चाहिये और यदि वह मानवता रखेगा तो प्रत्येक मानव दूसरे मानव के विरूद्ध दूसरे मानव के लिए मानवता की ओर तत्पर होगा और वसुधैव कुटुम्ब की भावना का मार्ग प्रशस्त होगा। इस संबंध में भी निम्नलिखित श्लोक अवलोकनीय है-

येके सत्पुरूषाः परार्थघटकाः स्वार्थं परित्यज्य ये।
सामान्यास्तु परार्थमुद्यंमभृतः स्वार्थाविरोधेन ये।
तेऽमी मानुषराक्षसाः परहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति ये।
ये निघ्नंति निरर्थकं परहितं ते के न जानीमहे।।

जो व्यक्ति निस्वार्थ भावना से दूसरों की सेवा करते हैं, वे तो इस पृथ्वी पर महान होकर असाधारण व्यक्तित्व वाले होते हैं और जो व्यक्ति दूसरों की सेवा अपने स्वार्थ हित को निश्चय किये बगैर करते हैं, वे साधारण व्यक्तित्व वाले होते हैं और जो व्यक्ति स्वार्थवश दूसरों का शोषण करते हैं या उन्हें क्षति पहुंचाते हैं, वह मानव शरीर में राक्षस का रूप होते हैं। यहां यह बताना उचित है कि कितने व्यक्ति ऐसे हैं जो कि महान व असाधारण व्यक्तित्व वाले है, कितने व्यक्ति ऐसे हैं जो कि मानव में राक्षस व्यक्तित्व वाले हैं कितने व्यक्ति ऐसे हैं जो कि मानव में राक्षस प्रवत्ति वाले हैं। सोचना आपका काम है और मूल्यांकन करना आपका स्वयं का काम है। मैं तो यहां यह कहना चाहूँगा कि प्रत्येक अधिवक्ता यह प्रयास करें कि वह प्रथम अथवा द्वितीय श्रेणी में अर्थात् महान एवं असाधारण व्यक्तित्व की श्रेणी में अपना स्थान पाये अथवा साधारण व्यक्तित्व की श्रेणी में अपना स्थान पाये। लेकिन कोई भी अधिवक्ता तृतीय श्रेणी में अर्थात् मानव के शरीर रूपी स्थान न पायें।

संदर्भ ग्रंथ[सम्पादन]

  • 1. गुप्ता, एस0पी0, वृत्तिक आचार एवं अधिवक्ताओं के उत्तरदायित्व,सेन्ट्रल लॉ पब्लिकेशन, द्वितीय संस्करण, 2004
  • 2. दशोरा, मनोज कुमार, न्याय प्रशासन में अभिभाषकगण की भूमिका, एम0पी0 बार कौंसिल टाइम्स, जनवरी-मार्च, 2010
  • 3. राय, डॉ0 कैलाश, विधिक आचार, अधिवक्ता की जवाबदेही एवं बेन्च-बार संबंध,सेन्ट्रल लॉ एजेंसी, द्वितीय संस्करण, 200