शस्त्रास्त्रों की अवधारणा, प्रकार एवं इतिहास

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श्रेष्ठ हथियारों के अभाव में अच्छे नियम की कल्पना भी नहीं की जा सकती, परन्तु जहां हथियार उत्तम होते हैं, वहां नियम स्वयं ही उत्तम होते हैं।
--मैक्यावेली

समस्त युद्ध इतिहास का अध्ययन करने पर एक सबसे प्रमुख तथ्य जो उजागर होता है, वह यह है कि युद्ध और शांति का कथानक जिस रूप में सामने लायें उसमें "शस्त्र" एक चमचमाते हुए सितारे की भांति हरकाल में जगमगाता रहा है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि शांति और युद्ध दोनों ही कालों में शस्त्रों की धूम, उपयोगिता और प्रभाव यथावत बना रहा है। आज शांति की रक्षा तभी प्रभावी ढंग में कर सकते हैं जब आप शांति तोड़ने वालों की तुलना में शक्तिशाली हो। भारत के राष्ट्रकवि का भी यही मानना था कि "ऋषियों को भी सिद्धि तभी तप में मिलती है जब पहरे पर स्वयं धनुर्धर राम खड़े होते हैं।"[१]

शास्त्रों के बिना शांति की कल्पना आप शांति काल में भी नहीं कर सकते। रामायण एवं महाभारत कालीन युद्धों से लेकर आज तक के सभी युद्धों में प्रयुक्त किये गये तरह-तरह के हथियारों ने मानव जाति का ध्यान न केवल अपनी ओर आकर्षित किया है बल्कि विश्व इतिहास पर गहरा प्रभाव भी डाला है। छोटे से छोटा देश भी आज अपनी आवश्यकता से अधिक नवीनतम एवं विध्वंसक हथियारों की प्राप्ति में लगा हुआ है।

वास्तव में शस्त्र किसे कहा जाए, सर्व प्रथम हमें इस प्रश्न का उत्तर जानना जरूरी है। विभिन्न विद्वानों ने विभिन्न प्रकार के शस्त्रों की उपयोगिता व कार्य क्षमता आदि गुणों को ध्यान में रखकर विभिन्न प्रकार के शस्त्रों की परिभाषा की है :-

जे.एफ.सी.फुलर की प्रसिद्ध पुस्तक "आर्मानेन्ट एण्ड हिस्ट्री" के अनुसार शस्त्र एक ऐसा उपकरण है जिसमें चोट पहुँचाने की क्षमता होती है। जनरल ब्रेडली ए.फ्रिस्के ने अपनी पुस्तक "द आर्ट ऑफ फाइरिंग" में शस्त्रों के संदर्भ में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा है - ऐसा उपकरण जो रक्षा अथवा आक्रमण के कार्यों में प्रयुक्त किया जाता है उसे शस्त्र की संज्ञा दी जाती है। वेबीस्टिर डिक्सनरी के अनुसार शस्त्र आक्रमण अथवा सुरक्षा का साधन है। आक्सफोर्ड डिक्सनरी के अनुसार शस्त्र वह उपकरण है जिसमें घायल करने अथवा चोट करने की क्षमता हो। श्यामलाल व मुखर्जी ने शस्त्र की अवधारणा दर्शाते हुए कहा है - शस्त्र वह साधन है जिससे शत्रु को चोट पहुँचाई जा सकती है। उपरोक्त परिभाषाओं को ध्यान में रखते हुए हम शस्त्र की परिभाषा इस प्रकार दे सकते हैं :-

"शस्त्र एक ऐसा उपकरण है, जो मानव अथवा जीवित प्राणियों को घायल करने से लेकर मृत्यु की गोद में सुलाने तक की क्षमता रखता है।

सरल शब्दों में अगर हम शस्त्र की व्याख्या करें तो, कोई भी उपकरण जिसका प्रयोग अपने शत्रु को चोंट पहुँचाने, वशमें करने या हत्या करने के लिये किया जाता है, शस्त्र (हथियर) कहलाता है। शस्त्र का प्रयोग आक्रमण करने, बचाव करने अथवा डराने-धमकाने के लिये किया जा सकताहै। शस्त्र एक तरफ लाठी जितना सरल हो सकता है तो दूसरी तरफ बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्र जटिल भी।

शस्त्रों की विशेषताएँ एवं गुण[सम्पादन]

किसी भी शस्त्र की विशेषताएँ उस शस्त्र की सामरिक शक्ति तथा परिधि का बोध कराती है। कहने का तात्पर्य यह है कि किसी शस्त्र की सामरिक शक्ति तथा परिधि उसकी विशेषता प्रकट करती है। शास्त्रों की विशिष्टतायें ही वह मापदण्ड होती है जो उसके कार्य पर प्रकाश डालते हुए यह स्पष्ट करती है कि उसे किस कार्य (आक्रमण या सुरक्षा) के लिए किस प्रकार प्रयोग में लाया जा सकता है।

कुछ सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार किसी शस्त्र की प्रभावशीलता व उपयोगिता का परीक्षण निम्न तीन शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है :-

(1) सुरक्षा

(2) गतिशीलता

(3) भार

यहाँ यह रखने योग्य है कि मार की दूरी भी शस्त्र का एक प्रमुख एवं अभिन्न लक्षण है, जिसे अनदेखा नही किया जा सकता। जनरल फुलर ने तो इसे शस्त्र का प्राभावी लक्षण माना है। जनरल फुलर [२] के अुनसार किसी शस्त्र की उपयोगिता का आकलन उसके निम्नलिखित मुख्य लक्षणों पर निर्भर करता है।

(1) प्रहारक शक्ति - शस्त्र में चोट पहुँचाने की क्षमता का होना नितान्त आवश्यक है। यह शस्त्र की प्रक्षरक शक्ति अथवा हथियार में निकलने वाले गोल अथवा गोली के अवेग पर निर्भर करती है। प्रक्षेप्य की गति उसका भार तथा उसकी भेदक अथवा विनाशक शक्ति के सम्मिलित योग से ही किसी शस्त्र की वास्तविकता प्रक्षरक शक्ति का निर्माण होता है। शस्त्र का महत्वपूर्ण गुण उसकी प्रहारक शक्ति है क्योकि इसी के द्वारा शत्रु का विनाश अथवा बचाव संभव है।

(2) परास या मार की दूरी - श्रेष्ठ मार की दूरी के शस्त्र को मिले जूले समरतन्त्र का सन्तुलन बिन्दू समझना चाहिए यह वह शस्त्र है जिसके चारो और समरतन्त्र को चूमना चाहिए। शस्त्रों की छत्रछाया में कम मार की क्षमता रखने वाले शस्त्र अपना समरतन्त्र निर्धारित करते है।

ध्यान रखना चाहिए कि यह परास या मार प्रक्षेप्य के वेग और स्थिरीकरण पर आधारित होती है। प्रक्षेप्य जितना आकार में छोटा तथा सुप्रभावी होगा, उतना ही घर्षण का प्रभाव कम होगा तथा परास में वृद्धि होगी। स्थिरीकरण का तात्पर्य यह है कि प्रक्षेप्य इस प्रकार अपने प्रक्षेप पथ का अनुसरण कर सके कि उसका अग्र भाग सर्वदा आगे ही रहे। ऐसा होना इसलिए आवश्यक है कि यदि अग्र भाग किसी कोण में मुडकर अपना पथ बदल ले तो शस्त्र की लक्ष्य को भेदने की शक्ति कम हो जायेगी। जनरल फूलर ने ठीक की कहा है कि परास अथवा मार की दूरी शस्त्र का एक प्रमुख लक्षण है।

(3) अचूकता - शस्त्र के अनेक गुणों के साथ अचूकता का गुण ही उसकी प्रहारक शक्ति को कारगर बनाने में निर्णायक भूमिका का निर्वाह करता है। क्योकि जब तक शस्त्र से अचूक निशाना नही लेगगा तब तक प्रहारक शक्ति की उपयोगिता का कोई अर्थ नही होगा। शस्त्रों के प्रादूर्भाव के समय से ही अचूक निशाना लगाने के लिये हर सम्भव प्रयास किये जा रहे है। आज इस दिशा में काफी प्रगति हो चुकी है और अब शस्त्रों में नये-नये यन्त्रों द्वारा जिनमें Range Finders, Telescopic Sights, Ingra - red. Telescope, Laser Range finders, Radar Controlled Airing Devices के नाम उल्लेखनीय हैए की सहायता ये गतिमान लक्ष्यों को भी सुगमता से अचूक निशाना लगाकर ध्वस्त किया जा सकता है।

(4) फायर की मात्रा - प्रत्येक शस्त्र में अपनी अलग-अलग फायर की मात्रा होती है। किसी शस्त्र के प्रभाव का आकलन इस तथ्य पर निर्भर करता है कि वह कितने अधिक गोले अथवा गोली प्रति मिनट फायर करने की क्षमता रखता है। शस्त्र का यह गुण मुख्यतः तीन बातों पर निर्भर करता है (1) फायर का समय, (2) मैगनीज अथवा पेटी में गोला। गोली भरने की विधि (3) ठण्डा करने का साधन। फायर चक्र के समय से यह अभिप्राय है कि फायर चक्र के लिये जितना कम समय प्रयुक्त है। शस्त्र का फायर उतना सफल होगा। मैगनीज अथवा पैटी में गोला। गोली भरने की विधि से यह अभिप्राय है कि शस्त्र में कितने राउड आते है तथा गोला बारूद की पूर्ति का प्रबंध किस ढंग का है। शस्त्र को ठण्डा करने का साधन कैसा है क्योंकि पानी से ठन्डी की गई नाल तैजी से फायर डाल सकती है। अपेक्षाकृत हबा से ठंडी की गई नाल से।

(5) वहनीयता - किसी शस्त्र की वहनीयता उसके भार तथा आकार पर निर्भर करती है क्योंकि इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि शस्त्र जितनी सरलता से प्रयोग किया जा सकेगा उतना ही प्रभावी सिद्ध होगा। दूसरे शब्दो में हम यह कर सकते है कि शस्त्रो की वहनीयता जितनी कम होगी उतना ही उसका प्रयोग कम होगा साथ ही इसके विपरीत वहनीयता जितनी अधिक होगी उतनी ही सरलता एवं अधिकता से इसका प्रयोग होगा।

(6) दृढता एवं अनुकुलता - शस्त्र में इस प्रकार की मजबूती होने चाहिए की वह लम्बें समय तक बिना की रूकावट के कार्य करता रहे। रण क्षेत्र में कीचड़ छूल नमी ताप इत्यादि का प्रभाव किसी ना किसी रूप में हर क्षण बना रहता है। अतः यह आवश्यक है कि शस्त्र में अवरोधों का मुकरवला करने की क्षमता विधमान हो। दृढता के ही कारण शस्त्र जहां अधिक कार्य करने पर भी खराब नही होते वही प्रत्येक मोसम एवं स्थिति के अनुरूप समाजस्य बनाये रखने की क्षमता अनुकूलता के गुण के कारण ही प्राप्त होती है।

निर्णायक अथवा प्रबल शस्त्र[सम्पादन]

अपनी विशिष्टता एवं गुणो के कारण प्रत्येक काल मे कोई न कोई शस्त्र अपना एैसा स्थान बनाये रखने में सफल हुआ है जिसके आधार पर यह विश्वास किया जाने लाग है युद्ध में विजय अथवा पराजय का निर्णय इस शस्त्र के ही द्वारा संपन्न होगा। चाहे वह धनुष बाड से लडा जाने वाला आर्य सभ्यता का युद्ध रहा हो अथवा आणविक बंम का प्रयोग कर जपान को तवाह कर देने वाला द्वितीय विश्व युद्ध दोनो की अपनी-अपनी महत्ता एवं निर्णय भूमिका को सभी विधानों द्वारा स्वीकार किया गया है। एक काल विशेष में एक शस्त्र तक छाया रहता है। जब तक उसकी काट करने का कोई नया शस्त्र विकसित नही कर लिया जाता। "आवश्यकता अविष्कार की जननी है" इस कथन के आधार पर यह मानना तर्क-संगत की जैसे-जैसे युद्ध का क्षेत्र विस्तृत होता जाता है वैसे - वैस युद्ध कौशल के नये-नये रूप देखने को मिलते है आने वाला युद्ध अपने प्रत्येक पिछले युद्ध की तुलना में कुछ न कुछ नवीनता आवश्यक प्रस्तुत करता चाहे यह नवीनता नवीन शस्त्रों के निर्माण से संबंधित हो अथवा युद्ध कला से। इसी प्रकार जब तक किसी शक्तिशाली शस्त्र की काट अथवा मुकबला करने का कोई कारगर तरीका अथवा शस्त्र ढूड नही निकाला जाता जब तक वह शस्त्र अपनी निर्णायक क्षमता के बल पर प्रदान अथवा प्रबल शस्त्र के रूप में जाना जाता है।

उदाहरण के लिए हम यह कह सकते है कि शस्त्रों के विकास के विभिन्न चरण में अपनी मारक क्षमता अथवा मार की दूरी आधार पर प्रत्येक शस्त्र की प्रधानता निर्धारित की जाती रही है। वैज्ञानिक युग में प्रवेश के साथ ही टैंको की प्रधानता, वायु यानो की निर्णायक भूमिका और अब अन्तरिक्ष में दादा गिरी करने तथा एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप में शोले वर्षा कर तवाह करने वाले मिशाइलो के करतब को देखते हुये यह स्पष्ट है कि सर्वदा अलग-अलग ढंग से शस्त्रों ने अपनी मारक क्षमता के आधार पर अपना निर्णायक एवं विशिष्ट स्थान बनाये रखा है। जब तक की उसे चुनौती देने वाले किसी नवीन शस्त्र का विकास नही हुआ है। जनरल फुलर की धारणा है कि किसी शस्त्र का प्रबलतम हथियार होना उसकी अचूकता वहनीयता अथवा फायर की गति पर निर्भर न होकर उसकी पसार पर ही निर्भर होता है। क्योकि इस प्रकार का हथियार अन्य हथियार से पहले काम मे लाया जा सकता है और इसके फायर के आड़ में अन्य हथियारों को शत्रु के निकट लें जाकर अपनी-अपनी विशेषताओं के अनुसार उन्हें प्रयोग किया जाता है। यद्यपि विद्यमानों में इस प्रश्न पर मतभेद है की शस्त्रों का कोन सा लक्षण निर्णायक अथवा सर्वश्रेष्ठ है। फिर भी यह मानना उचित प्रतित होता है कि सुरक्षा, मार अथवा गतिशीलता के लक्षणों की भी शस्त्रों को निर्णायक रूप देने में कम महत्वपूर्ण भूमिका नही होती।

अनवरत या अटल समरतान्त्रिक तत्व[सम्पादन]

प्रत्येक परिस्थिति का सामाना करना तथा उसका समाधान ढूनना मानव स्वाभाव का अभिभाज्य अगं रहा है। यह तथ्य अन्य क्षेत्रों के भांति शस्त्र के क्षेत्र में भी लागू होता है।

हम देखते है कि कभी भी कोई एक शस्त्र अनवरत रूप से अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने में सफल नही हुआ है। इसका कारण क्या है यह साफ-साफ स्पष्ट है जैसे जब तलवार ने अपनी श्रेष्ठता स्थिपित की तो मानव ने इसके बार को असफल बनाने के लिये डाल का निर्माण किया और उसे तलवार के बार को विफल बनाने में पूर्णताः सफलता प्राप्त हुई। इसी प्रकार बाड़ के विरूद्ध कबज का प्रयोग किया गया। आगे चल कर कबज को विफल करने के लिए मस्केट तथा राइफल के फायर ने अपनी करिश्मा दिखाया। टैंको तथा विमानो के आक्रमण को विफल बानने के लिए टैंक विरोधी शस्त्र (Anti Tank Lileapons) तथा वायुयान विरोधी तोपों (।Anti Aircraft Guns) का प्रयोग किया गया। आज जब सभ्यता अन्तरिक्ष युग में प्रवेश कर चुकी है तो अन्तर्महाद्वीपीय प्रक्षेपास्त्र (ICBM) ने अपनी श्रेष्ठता हासिल करने का प्रयास किया है किन्तु मानव के मस्तिष्क ने इसके जबाव के लिए भी ए.बी.एम. (Anti Ballistic Missile) का निर्माण करके आई.सी.बी.एक. का मस्तक नीचे झुका दिया है। यही कारण है कि समरतन्त्र कभी भी आक्रमण शक्ति अथवा रक्षा शक्ति का पूर्णतया पक्षधर नहीं बना बल्कि उनमें एक विशिष्ट प्रकार का संतुलन सर्वदा स्थापित रहा। संतुलन की इसी समरतान्त्रिक स्थिति को अनवरत या अटल समरततान्त्रिक तत्व की संज्ञा दी जाती है।

शस्त्रों का वर्गीकरण[सम्पादन]

शस्त्रास्त्रों के समुचित अध्ययन के लिये यह आवश्यक है कि उनका वर्गीकरण कर लिया जाये। वैसे शस्त्रास्त्रों का उचित वर्गीकरण आसानी से नही किया जा सकता क्योंकि नित्य ही नवीन शस्त्रों का अविष्कार होता रहता है। इस कारण वर्गीकरण में प्रत्येक नवीन शस्त्र का उचित स्थान निर्धारित करना कठिन हो जाता है। पी. ई. क्लीएटर [३] के द्वारा शस्त्रास्त्रों को मुख्य रूप से दो भागो में विभाजित किया गया है।

(1) आक्रमक शस्त्र

(2) रक्षात्मक शस्त्र

आक्रमक शस्त्र[सम्पादन]

वे शस्त्र जो आक्रमण की अवस्था में शत्रु को घायल करने अथवा चोट पहुँचाने के उद्देश्य से प्रयोग में लाये जाते है, वे आक्रमक शस्त्र है। आक्रमक शस्त्र के टैंक, तोपे, बमकर्षक विमान तथा मिसाइल आदि है।

रक्षात्मक शस्त्र[सम्पादन]

वे शस्त्र जिनमें शत्रु के आक्रमणकारी प्रभवों को विफल कर दिया जाये, वे शस्त्र रक्षात्मक शस्त्र कहलाते है। रक्षात्मक शस्त्रों में वायुयान, विरोधी मशीगन, टैंक विरोधी गन तथा प्राक्षेणिक मिसाइले विरोधी शस्त्र आदि इसके प्रमुख उदाहरण है।

वैज्ञानिक विश्लेषण गहन अध्ययन एवं शस्त्रों की विनाशक क्षमता को ध्यान में रखकर शस्त्रों के दो भाग किये गये है- परम्परागत शस्त्र, अपरम्परागत शस्त्र।

(1) परम्परागम शस्त्र -

परम्परागत शस्त्रों की श्रेणी में वे शस्त्र आते है जिनका प्रयोग युद्धों में होता रहा है और वह जेनेवा नियम द्वारा वर्जित नही है। इस श्रेणी के शस्त्रों की प्रहारक क्षमता की एक निर्धारित सीमा है और उसी सीमा के भीतर के शक्ति सम्पन्न शस्त्र इसमें रखे गये है। परम्परागत शस्त्र वे शस्त्र है जिनका निर्माण आधुनिक वैज्ञानिक शताब्दी में हुआ है और इसकी विनाशक क्षमता का अनुमान नही लगाया जा सकता। इसे दूसरे शब्दों में हम इस प्रकार कह सकते है कि इस श्रेणी के शस्त्रों में असीमित विनाश की क्षमता होती है। इस श्रेणी के शस्त्र जिन्हें Weapons of Mass Destructions कहते है का प्रयोग मानव जाति के सदा-सदा के लिये धरती से समाप्त कर सकता है। अतः इस ध्यान में रखते हुये अर्न्तराष्ट्रीय कानून के निर्माताओं और विशेषज्ञों ने अर्न्तराष्ट्रीय विधि के द्वारा इसका प्रयोग निषिद्ध कर दिया है।

(2) अपरम्परागत शस्त्र - अपरम्परागत शस्त्र अपनी विशेषताओं के आधार पर तीन भोगो में बांटे जा सकते है -
परमाणु शस्त्र
जीवाणु शस्त्र
रासानिक शस्त्र

परमाणु शस्त्र में हम परमाणु बम का उदाहरण ले सकते है, जिनके विस्फोट से उत्पन्न वायु दवाब, ताप, पृथ्वी का धक्का तथा रेडियों धर्मी प्रभाव से धरती पर बसी मानव जाति एवं जीव-जन्तुओं का अनेको बार सफाया हो सकता हैं।

जीवाणु शस्त्र में ऐसे कीटाणुओं का प्रयोग किया जाता है जो मनुष्यों, पालतू जानवरो, खड़ी फसलो और अन्य आर्थिक साधनों को गम्भीर हानि पहूँचा सकें। उदाहरण के लियें बैक्टीरिया के एक विशेष समूह "सालमोनेला" को लिजिये। इसकी कल्चर के लगभग आधे किग्रा. को पचास लाख लीटर पानी में मिला दिया जाये तो इस विषाक्त जल के केवल 200 ग्राम पीने से किसी व्यक्ति को गम्भीर रूप से बीमार होने की सम्भावना है। इन बैक्टीरिया समूह से आत्रशोथ, टाइफाइड़ और पेराटाइफाइड़ ज्वर आदि रोग पैदा होते है। पशुओं में यदि कीटाणुओं के द्वारा महामारी फैला दी जाये तो राष्ट्र की आर्थिक व्यवस्था प्रभावित हुए बिना नही रह सकती। इसी प्रकार फसलो का क्षति पहुँचाने वाले कीटाणुओं के द्वारा भी करोडा़े रूपयें मूल्य की फसलों को बरबाद किया जा सकता है।

रासायनिक शस्त्रों का प्रयोग कृत्रिम वर्षा, बाढ, सूखा और समुद्ध तटीय प्रदेशों में भंयकर तूफान लाने के लिये किया जाता है। रासायनिक शस्त्र आक्रमणकारी सेना को अनेक सुविधायें प्रदान कर सकते है। अतः आक्रमण से पूर्ण सेना इसका उपयोग कर सकती है। स्वयं अपनी सेना की कार्यवाहियों के लिये उचित पर्यावरण तैयार करने के साथ समुद्र के निक ट तूफान पैदा करके शत्रु के जहाजी बेडे़ की गति को अवरूद्ध किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त नदीय क्षेत्र में सुरक्षात्मक व्यवस्था को अस्तव्यस्त किया जा सकता है।

अपनी विशेषताओं और कार्य क्षेत्र के आधार पर परम्परागत हथियार पुनः दो श्रेणियों में बारे जा सकते है - स्त्रातजिक शस्त्र और सामरिक शस्त्र।

स्त्रातजिक शस्त्र -

वे शस्त्र स्त्रातजिक शस्त्र कहलाते है, जो अपनी प्रहारक शक्ति तथा विध्वंस की प्रकृति के कारण न केवल किसी संग्राम को बलिक समस्त युद्ध को अपनी चपेट में लेकर प्रभावित करते है। ऐसे शस्त्रों की विशेषता यह है कि इनकी मार की दूरी एवं बिनाषक क्षेत्र तुलनात्मक अधिक होता है। ऐसे शस्त्रों के उदाहरण है लम्बी दूरी तक मार करने वाले बमवर्षक विभाग तथा अन्तर्महाद्वीपीय प्रक्षेपास्त्र (I.C.B.M) इत्यादि।

सामरिक शस्त्र -

सामरिक शस्त्र वे शस्त्र है जिनका दो प्रतिद्वन्द्वी सेनाय एक - दूसरे क विरूद्ध समर भूमि में प्रयोग करती है। ये मुख्यतः युद्ध क्षेत्र में प्रयोग किये जाते है और इनकी मारक दूरी तथा कार्यक्षेत्र सीमित होता है। ऐसे शस्त्रों के उदाहरण है छोटे आग्नेद शस्त्र (राइफल, स्टेनगन, मशीनगन) तोपे तथा कम शक्ति के प्रक्षेपास्त्र, छोटे राकेट इत्यादि। ध्यान रखना चाहियें कि ऐसे राकेट जिनकी मारक क्षमता हजारों मील है वे स्त्रातजिक हथियारों के वर्ग में रखे जायेगे किन्तु जिन राकेटो की मारक क्षमता अपेक्षाकृत कम होगी और उनके कार्य क्षेत्र की दायरा सीमित होगा, वे सामरिक हथियारों के वर्ग में रखे जायेगे। वैसे वास्तविकता तो यह है कि स्त्रातजी और सामरिको की भाँति स्त्रातजिक ओर सामरिक हथियारों के मध्य विभाजन की बहुत सी स्पष्ट रेखा खींच पाना जटिल कार्य है।

समरतान्त्रिक शस्त्रों को तीन वर्गो में विभाजित किया जा सकता है -

(1) आरक्षित

(2) आघात शस्त्र

(3) प्रक्षेपीद शस्त्र

पहले वर्ग के प्रमुख उदाहरण है सुरंग इत्यादि। दूसरे वर्ग के उदाहरण है तलवार, संगीन इत्यादि, जो गुत्थम गुत्था की लडाइयों में प्रयोग में लाये जाते है। प्रक्षेपीय शस्त्र का जहाँ तक प्रश्न है इन्हें भी पुनः दो भागो में बाँटा जा सकता है-

(1) वे जो किसी प्रकार की यांत्रिक शक्ति द्वारा छोडे जाते है जैसे प्राचीन काल मे प्रयोग किये जाने वाले युद्ध यंत्र तथा तीर कमान इत्यादि।

(2) वें जो रासायनिक शक्ति द्वारा छोड़े जाते है।

रासायनिक शक्ति उत्पन्न करने के भी दो साधन है :-

(1) किसी पदार्थ में विस्फोट को उत्पन्न करने से।

(2) किसी पदार्थ के दहन से।

ध्यान रखना चाहिए कि दहन के माध्यम से उत्पन्न शक्ति प्रयोग करने वाले शस्त्र स्वतन्त्र राकेट या नियन्त्रित प्रक्षेपास्त्र हो सकता है। इसका पुनःविभाजन इसके कार्य, मारक क्षमता, लक्ष्य की स्थिति तथा कार्य क्षेंत्र को ध्यान में रखकर किया जाता है। इसी प्रकार विस्फोटक शक्ति प्रयोग करने वा ले शस्त्रों को अग्नेय शस्त्र की संज्ञा दी जाती है। ऐसे आग्नेय शस्त्र जिनकी नली का व्यास (Caligre) 15 मि.मी. (0.6) से कम होता है [४] तथा जिन्हे सैनिक उठाकर चल सकता है, तथा इनका भार भी कम होता है, साधारण तथा छोटे शस्त्र कहे जाते है। इनका वर्गीकरण निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है।

छोटे शस्त्र

शस्त्र हस्त
कन्धास्त्र
मशीनगन
शस्त्र हस्त -

इनमे अन्यन्त हल्के शस्त्र होते है, जिन्हें एक हाथ के पंजे मे जकड़ कर बिना किसी अन्द सहारे के फायर किया जाता है जैसे पिस्तौल, रिवाल्वर इल्यादि। इनकी मारक क्षमता कम होती है। अतः यह कम दूरी तक मार करने में सहायक होते है।

कन्धास्त्र -

इनके पीछे की और लकड़ी का एक बद अथवा कुन्दा लगा होता है जिसे कन्धे से लगाकर फायर किया जाता है। कन्धास्त्र के उदाहरण है - एक नली या दोनाली कारतूसी बंदूक, राइफल, मस्केट, मशीन कारबाइन इत्यादि।

मशीनगन -

इन्हें स्वचालित शस्त्र भी कहते है इन शस्त्रों में एक बार ट्रेगर दबाने के बाद फायरिंग की समस्त क्रिया उस समय तक अपने आप होती है जब तक कि सम्पर्ण गोलियां समाप्त नही हो जाती। इसे हम ऐसे कह सकते है स्वचालित शस्त्र वे है जिन्हें किसी टेक पर माउनद करके फायर डाला जाता है। इनकी गोलियाँ मैगजीन अथवा वेल्ट में भरी जाती है। मशीनगने तीन प्रकार की होती है-

भारी मशीनगन -

यह छोटा स्वचालित हथियार है जो राइफल की अपेक्षा अधिक शक्ति शाली होता है। इसकी नली का व्यास भी अधिक होता है जैसे अमेरिकी 50 रूसी 12.7 अथवा 14.7 mm की भारी मशीनगनें। इनकी नली पानी में ठन्डी की जाती है जिसके कारण लगातार और तेर फायर डालना सम्भव होता है।

मध्यम मशीनगन -

इसमें राइफल की गोली ही प्रयोग की जाती है। मध्यम भार मशीनगन को तिपाई अथवा पहिएदार प्लेटफार्म पर टिका कर फायर किया जाता है तथा इसकी नली भी सामान्यतयः हवा से ठण्डी होती है।

हल्की मशीनगन -

इसे दुपाई पर टिकाते हुए लेटकर फायर डाला जाता है। इसका भार तथा मार की दूरी दोनो ही कम होती है।

उपरोक्त छोटे शस्त्रों के अतिरिक्त बडे़ शस्त्र तोपखाने की श्रेणी में रखे जाते है, तोपखाने के अंतर्गत निम्न शस्त्र आते है :-

गन

हाउटजर

मार्टर

धक्का रहित तोपे

राकेटशस्त्र

गन -

अत्यन्त तीव्र नथा नीचे प्रक्षेप पथ से फायर करने वाली को गन कहते है। इसकी नली लम्बी होती है और मुख्यतः पीछे से भरी जाने वाली (BREECH LOADING) होती है। गन के भार के आधार पर इनका वर्गीकरण किया जता है। जैसे हल्की, मध्यम, तथा भारी। कार्य के आधार पर यह क्षेत्रीय गन, पहाडी गन, विमान भेद, टैंक नोडक व दुर्गनाशक श्रेणियों में विभक्त की जाती है। ध्यान रखना चाहिए कि ये दोड़ होता है यानी अन्य गाड़ी द्वारा जोडकर या खीं चकर इन्हें कार्य क्षेत्र तक पहुँचाया जाता है। साथ ही इनमें स्वचालित तोपे भी होती है जो टैंक के फ्रेम पर लगी होती है और इन्हें खीचनें के लिए अलग से किसी साधन की आवश्यकता नही होती।

हाउटजर -

यह एक आग्नेसास्त्र है जो गन की अपेक्षाकृत कम वेग वाले परन्तु गन की तुलना में ऊँचे प्रक्षेप पथ बनाते है। हाउटजर की नली की लम्बाई भी तुलनात्मक रूप से कम होती हाउटजर पहाडी क्षेत्र में काफी उपयोगी सिद्ध होता है, क्योंकि ऊँचे मार्ग से जाने वाला गोला राह में आने वाली ऊँचाइयों को सरलता से पार करता हुआ अपने लक्ष्य तक पहूँचता है।

मार्टर -

मार्टर ऐसी तोप होती है जो हाउटजर से छोटी तथा हल्की होती है। इनमें बम नाल के मुख की ओर से भरा जाता है, और इनकी नाल कटान रहित होती है। इनके गोले का नाल मुख वेग भी कम होता है। चूंकि यह हल्का और छोटा हथियार होता है, अतः पैदल सेना को काफी निकट से सहायक फायर दे सकता है।

धक्का रहित तोपे -

चपटे प्रक्षेप के शस्त्र है जिनमें गोले को फायर करते समय उत्पन्न धक्के का अवरोध उत्पन्न करने की क्षमता होती है। ढैक विनाशक कार्य करने में इनकी उपयोगिता काफी महत्वपूर्ण है।

राकेट शस्त्र -

राकेट की सबसे प्रमुख विशेषता यह होती है कि ये स्वचालित होते है। इस श्रेणी के शस्त्रों को प्रक्षेप (LAUNCHER) द्वारा फायर किया जाता है। इनमें बारूद द्वारा बनी गैस पीछे को जेट द्वारा विसर्जित होती है, जिसके परिणाम स्वरूप राकेट आगे की ओर बढ़ता है। यह संवेग अविनाशिता के सिद्धांत पर कार्य करता है। छोटे किस्म के शस्त्रों का प्रक्षेप पूर्णतः प्रतिक्षेपपविहीन होता है अतः इसे पैदल सेना में स्थान दे दिया गया है। इसका उदाहरण है 3.5" राकेट लांचर जो पैदल सेना का एक छोटे किस्म का टैंक नाशक शस्त्र है। हवा की गति से भागकर पलक झपकाते ही एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक मार करने वाले अन्तर महाद्वीपीय प्रक्षेपास्त्रों (I.C.B.M.) को भी राकेट पद्वति पर ही बनाया गया है जिनके बल पर महाशक्तियाँ तथा कुछ अन्य विकासशील देश विश्व को अपनी चपेट में करने का दावा कर रहें है। राकेट शस्त्रों को मुख्यतः तीन भागो में बाँटा जा सकता है -

(क) स्वतन्त्र राकेट

(ख) निर्देशित राकेट

(ग) प्राक्षेपिक मिसाइल

(क) स्वतन्त्र राकेट -

वे शस्त्र जो राकेट सिद्धांत द्वारा फायर किये जाते है तथा प्रक्षेपक में अलग होने के बाद जिन्हें अपने मार्ग परी चलने में किसी प्रकार का बाहरी निर्देश प्राप्त नही होता, स्वतन्त्र राकेट कहलाते है।

(ख) निर्देशित राकेट -

इस प्रकार के शस्त्रों की प्रमुख विशेषता यह होती है कि इनका मार्ग लगभग सम्पूर्ण उडान अवधि के दौरान बाहरी व्यवस्था द्वारा निर्देशित किया जाता है।

(ग) प्रक्षेपिक मिसाइल -

इस प्रकार के शस्त्रों का मार्ग निर्देशन प्रारंभ में ही किया जाता है। उसके पश्चात वे वायु गतिकी के नियमों का पालन करते हुये आगे बढते जाते है। इनका प्रक्षेप पथ काफी ऊँचा होता है। मुख्यतः ये अपने मार्ग की अन्तिम अवस्था में ही गति पकडते है और उसी समय इनके मार्ग को निर्देशन भी प्राप्त होता है।

शस्त्र और सामरिकी का परस्पर सम्बन्ध[सम्पादन]

युद्ध मे सदैव मानव ने एक से बढकर एक शस्त्रों का प्रयोग किया है। ऐसी तकनीक को विकसित किया है जिससे शत्रु को अति शीघ्र ही पराजित होने को विवश होना पडे। शस्त्रों के विकास के साथ ही सामरिकी मे भी परिवर्तन करना आवश्यक बन जाता है। शस्त्रों का विकास और सामरिकी का इनता गरहा संबंध है कि इनमें से एक-दूसरे को अलग करके युद्ध में विजय की कल्पना को आकार किया ही नही जा सकता। सच तो यह है कि यदि यही हथियार बना लिये जाये और यही विधि से इनका प्रयोग करने की कला ज्ञात हो तो 99 प्रतिशत विजय निश्चित हो जाती है। मैक्लाहरी ने अपनी पुस्तक "द हाइरेक्शन आफ बार" में लिखा है कि इतिहास से हमें एक स्पष्ट शिक्षा मिलती है और वह यह कि नयें हथियारों व साधनों से नई सामरिकी अवश्य आती है। भारतीय एवं विदेशी सभी विद्वान एवं टीका कार इस सत्य से पूर्णतः सहमत है कि नये वैज्ञानिक एवं तकनीकी ज्ञान के आधार पर विकसित किये गये शस्त्रास्त्रों के गर्भ से नवीन समरतन्त्र का उदय होता है।

हथियारों का विकास काल और परिस्थितियों के अनुसार होता रहा है। चूंकि मानव स्वभाव से ही अधिनायकवादी है। अतः उसमे युद्ध की प्रवृति सदा से ही विद्यमान रही है। जब हथियार नही थे तब भी मानव झपट कर फुर्ती से हमला करता था, धीरे-धीरे हथियारों के विकास से समरतन्त्र भी करवटें बदलने लगा। जिस प्रकार होते है उसी के अनुरूप समरतन्त्र में बदलाव आता है। हथियारों की कहानी कभी खत्म न होने वाली कहानी है। हर क्षण इसमें एक नया नाम जुड जाता है और उसके नये काम जुड जाते है। युद्ध बड़ा हो या छोटा, सीमित हो या असीमित, आक्रमण स्वरूप का हो या प्रतिरक्षात्मक सभी का सीधा रिश्ता समरतन्त्र से है। युद्ध जीतने वाला और युद्ध हारने वाला दोनो ही पक्ष युद्ध इतिहास में हथियार और समरतन्त्र के रिश्ते की कहानी दर्ज करना है। इतिहास पर नजर डालने पर हम पाते है कि 316 ई.पू. के आस-पास मूनानियों ने सरिसा और आधात शस्त्रों का विकास किया जिसके फलस्वरूप उन्हें इस तरह की सामरिकी का प्रयोग करना पड़ा जिससे इस हथियार के आधात प्रभाव का भरपूर फायदा उठाया जा सके। रोम के सैनिक प्रक्षेपास्त्रों तथा आघात शस्त्रों से लैंस होने के कारण ऐसी सामरिकी का प्रयोग करने थे कि वे अपने दोने प्रकार के शस्त्रों के प्रयोग को लाभ की स्थिति में रख सकें। टैंको और वायुयानों के आविष्कार ने आक्रमण के इतिहास मे एक तूफानी सामरिकी को जन्म दिया जिसने प्लिट्जक्रिम सामरिकी तथा प्रतिरक्षा के क्षेत्र में एक नया समरतन्त्र विकसित किया जिसे AREA OF WEB DEFENCE कहते है। आणविक शस्त्रों के विकास ने तो सामरिकी के रूप में और प्रकृति दोनो में क्रान्तिकारी परिवर्तन ला दिया है।

शस्त्रास्त्रों का इतिहास[सम्पादन]

मानव जाति के इतिहास का अध्ययन काने से प्रतीत होता है कि युद्ध और मानव जाति का आदि काल से संबंध चला आ रहा है। युद्ध आदि काल से होते रहे है, केवल समय-समय पर युद्ध के समरतन्त्र व कौशल में परिवर्तन होता रहा है। परन्तु युद्ध की प्रवृति में कोई परिवर्तन नही हुआ है। अगर हम सुक्ष्म विवेचन करे तो ज्ञात होता है कि वस्तुतः जिस समय देश युद्धरत नही होते अर्थात् शान्तिकाल होता है, तब भविष्य के युद्ध का तत्व विद्यमान रहता है। इस प्रकार देश में हर समय युद्ध का तत्व विद्यमान रहता है और युद्ध तत्व की अनवरतता या निरन्तरता के कारण विस्तृत अध्ययन की महत्ता को बढाता है। युद्ध का प्रधान प्रत्यक्ष साधन शस्त्र है। युद्ध में शस्त्रों के प्रयोग का निश्चित समय बता पाना अत्यन्त दुष्कर कार्य है, क्योंकि यह तत्व शान्तिपूर्ण है। आदि काल से युद्ध मानव की प्रकृति रही है। लड़ने की भावना मनुष्य मे उस समय से ही पायी जाती रही है। जब से उसने पृथ्वी पर जन्म लिया है। हथियारों का प्रयोग धातुओं के आविष्कार से प्रारम्भ होता है जो कि 2000 ई . पू.है, क्योकि पूर्व व नवपाषणकालीन युग के प्राप्त अवशेषो में शास्त्र प्राप्त नही हुए है लेकिन युद्ध में जब भी शस्त्र प्रयोग हुआ तो क्रान्तिकारी तथ्य यह रहा है कि जिस पक्ष के पास शस्त्र था उसी की विजय हुई। इस स्थिति को देखते हुये फुलर का यह मत है कि यदि सही औजार व हथियार बना लिये जाये तो 99 प्रतिशत जीत निश्चित हो जाती है वास्तव में सत्य प्रतीत होता है।

यह निश्चयपूर्वक नही कहा जा सकता कि प्रारम्भ में जिस हथियार का निर्माण किया गया था वह वास्तव में युद्ध के ही उदे्श्य से निर्मित हुआ था या फल इत्यादि तोडने के लिये, जैसे एक चाकू से फल भी काता जा सकता है और जान भी ली जा सकती है। जैसा भी ययर्फोड ने कहा है - " आदि काल में हथियारो व औजारो को एक दूसरे की जगह प्रयोग किया जाता रहा है। एक हथौडी के ऊपरी सिरे को फेककर मारने के हथियार का भी काम किया जा सकता है। कुल्हाडी जिस प्रकार पेड़ काट सकती है उसी प्रकार से यह शत्रु पर मार कर सकती है।"

बिर्नी के अनुसार लडाई में प्रयुक्त होने वाला सबसे पहले हथि्ायार कांसे का छुरा था। वही लम्बा होकर तलवार बन गया और लाठी लगा दिये जाने पर भाला। शीघ्र ही इनका सामना करने के लिये ढाल, वक्षस्त्ताण, शिरस्त्राण आविष्कार हुए। इनसे युद्ध ने छिट-पुट के स्थान पर व्यवस्थित रूप धारण कर लिया। [५] सिपाहीगिरी एक व्यवसाय हो गयाए सेना पतित्व एक कला और युद्ध राजनीति का एक साधन।

हथियारों का विकास समय, सभ्यता व भौगोलिक परिस्थितियों को अनुसार होता रहा है। पाषण काल में हथियारों का विकास नही हुआ था, क्योंकि समाज अविकसित था। आज जितनी तेजी से समाज विकसित हो रहा है उतनी ही तेजी से हथियार भी बनाये जा रहे है। हथियार के विकास के संबंध में फूलर का कहना है कि "हथियारों के विकास ने किसी नियम का पालन नही किया बल्कि इनका जन्म अचानक ही हो गया है। शस्त्रों को आविष्कृत करने में सैन्य प्रतिभा से अधिक नागरिक प्रतिभा का श्रेय प्राप्त है, परन्तु फिर भी एक नियम लागू होता है कि जैसे उस समय की आर्थिक, भौगोलिक, सामाजिक, प्रावैधिक परिस्थिति रही होगी उसी के अनुसार विकास हुआ होगा, जैसे कि प्रथम औद्योगिक क्रांति के बाद सभी सेनाये यन्त्रीकृत होती जा रही है।

आधुनिक काल की ही भांति प्राचीन काल मे भी शस्त्रास्त्र तत्कालीन सैन्य संगठन, युद्ध कला और युद्ध-निर्णय पर अपना अमिर प्रभाव डालते थे।

शस्त्रास्त्रो का वर्गीकरण[सम्पादन]

अध्ययन की सुविधा हेतु इन प्राचीन शस्त्रास्त्रों को दो प्रमुख भागो में विभाजित किया जा सकता है -

1. अक्रमणात्मक शस्त्रास्त्र

2. सुरक्षात्मक शस्त्रास्त्र

अक्रमणात्मक शस्त्रास्त्र[सम्पादन]

ऐसा प्रतीत होता है कि जनरल फूलर द्वारा आधूनिक शस्त्रास्त्रों के वर्गीकरण हेतु प्रस्तावित दो भेद-प्रक्षेपास्त्र और संक्षोभ शस्त्र, आचार्य शुक्र द्वारा भारत के प्राचीन शस्त्रास्त्रों के वर्गीकरण का ही परिमार्जित रूप है। शुक्रनीति मे हथियारों को ‘अस्त्र’ तथा ‘शस्त्र’ नामक दो वर्गो में विभाजित किया गया है जिनमे ‘अस्त्र’ को शत्रु पर फेककर मारे जाने वाले हथियार के नाम से संबोधित किया गया है और शस्त्र को हाथ मे पकडे-पकडे शत्रु पर प्रहार करने वाला बताया गया है अन्य शब्दो में ‘अस्त्र’ को आधुनिक प्रक्षेपास्त्रों की श्रेंणी में तथा ‘शस्त्र’ को संक्षोभ शस्त्रों की श्रेणी में रखा जा सकता है।[६]

प्राचीन आयविर्त के आर्यपुरूष अस्त्र-शस्त्र विद्या में निपुण थे। उन्होने अध्यात्म-ज्ञान के साथ-साथ आततियों और दुष्टों के दमन के लिये सभी अस्त्र-शस्त्रों की भी सृस्टि की थी। आर्यो की यह शक्ति धर्म-स्थापना में सहायक होती थी। प्राचीन काल में जिन अस्त्र-शस्त्रों का उपयोग होता था, वे आयुध जो मन्त्रों से चलाये जाते है- ये दैवी है। प्रत्येक शस्त्र पर भिन्न-भिन्न देव या देवी का अधिकार होता है और यन्त्र-तन्त्र के द्वारा उसका संचालन होता है। वस्तु इन्हें दिव्य तथा मान्त्रिक-अस्त्र कहते है। इन बाणों के कुछ रूप इस प्रकार है।[७]

आग्नेय - यह विस्फोटक बाण है। यह जल के समान अग्नि बरसाकर सब कुछ भस्सीभूत कर देता है। इसका प्रतिकार पर्जन्य है।

पर्जन्य -यह विस्फोटक बाण है यह जल के समान अग्नि बरसाकर सब कुछ भस्सीभूत कर देता है। इसका प्रतिकार पर्जन्य है।

वायत्य -इस बाण से भयंकर तुफान आता है और अन्धकार छा जाता है।

पन्नग -इससे सर्प पैदा होते है। इसके प्रतिकार स्वरूप गरूड बाण छोड़ा जाता है।

गरूड़ -इस बाण के चलते ही गरूड उत्पन्न होते है, जो सर्पो को रखा जाते है।

ब्रहमास्त्र -यह अचूक विकराल अस्त्र है। शत्रु का नाश करके छोडता है। इसका प्रतिकार दूसरे ब्रहमास्त्र से ही हो सकता है, अन्यथा नही।

पाशुपत -इससे विश्व नाश हो जाता है यह बाण महाभारतकाल में केवल अर्जुन के पास था।

वैष्णव नारायणास्त्र - यह भी पाशुपत के समान विकाराल अस्त्र है। इस नारायण - अस्त्र का कोई प्रतिकार ही नही है। यह बाण चलाने पर अखिल विश्व में कोई शक्ति इसका मुकाबला नही कर सकती। इसका केवल एक ही प्रतिकार है और वह यह है कि शत्रु अस्त्र छोड़कर नम्रतापूर्वक अपने को अर्पित कर दे। कहीं भी हो, यह बाण वहाँ जाकर ही भेद करता है। इस बाण के सामने झुक जाने पर यह अपना प्रभाव नही करता।

इन देवी बाणों के अतिरिक्त ब्रहमशिरा और एकाग्नि आदि बाण है। आज यह सब बाण-विद्या इस देश के लिये अतीत की घटना बन गयी महाराज पृथ्वीराज के बाद बाण-विद्या का सर्वथा लोप हो गया।

यह विद्या के प्राचीनतम गन्थ ‘धनुर्वेद’ में समस्त शस्त्रास्त्रों को मुख्यतः 4 वर्गो (मुक्त, अमुक्त, मुक्तामुक्त और मन्त्रयुक्त) में विभाजित किया गया है। वैशम्पायन की ‘नीति प्रकाशिका’ में भी शस्त्रों के इन्ही 4 भेदों का वर्णन किया है। इन दोनो के समन्वित वर्गीकरण को हम निम्न प्रकार स्पष्ट कर सकते है-[८]

(अ) मुक्त हथियार -

इस वर्ग को अंतर्गत फेककर चलाये जाने वाले हथियार थें जिनमें शक्ति, भिंडीनाल, दुधन, चक्र तथा तोमर आदि प्रमुख थे। नीति- प्रकाशिका में इन शस्त्रों के 12 प्रकार का उल्लेख है जिनमें निम्नलिखित प्रमुख है।

(1) भिंडीपाल -एक तहर का भारी गदा लगभग डेढ़ फीट लम्बा पीछे का भाग चौडा और मुड़ा हुआ।

(2) शक्ति -यह लम्बाई में गजभर होती है, उसका हैंडल बडा होता है, उसका मूंह सिंह के सामान होता है और उसमें बड़ी तेज जीभ और पंजे होते है। उसका रंग नीला होता है और उसमें छोटी-छोटी धंटिया लगी होती है। यह बडी मारी होती है और दोनो हाथो से फेंकी जाती है।

(3) द्रुधन -लगभग 4 फीट लम्बा ‘मुग्दर’ के आकार का शस्त्र।

(4) तोमर -यह लोहे का बना होता है। यह बाण की शकल में होता है और इसमें लोहे का मुँह बना होता है सॉप की तरह इसका रूप होता है इसका धड़ लकडी का होता है। नीचे की तरफ पंख लगाये जाते है, जिससे वह आसानी से उड़ सके। यह प्रायः डेढ़ गज लंबा होता है। इसका रंग लाल होता है।

(5) नालीक -आधुनिक गन से मिलत-जुलता छोटा एवं बड़ा दो प्रकार का अस्त्र।

(6) लगुड - भारी दण्ड ।

(7) पाश - ये दो प्रकार के होते है, वरूणपाश और साधारण पाशः इस्पात के महीन तारों को बटकर ये बनाये जाते है। एक सिर त्रिकोणवत होता है नीचे जस्ते की गोजियाँ लगी होती है। कहीं-कहीं इसका दूसरा वर्णन भी है। वहाँ लिया है कि वह पांच गज का होता है और सन, रूई, घास या चमडे के तार से बनता है। इन तारों को बटकर इस बनाते है।

(8) चक्र - धातु निर्मित मण्डलाकार तश्तरी की भॉति का आरों से युक्त अस्त्र जिसका मध्य भाग खोखला होता था।

(9) दन्तकान्ता - धातु का दाँत की भाँति बना हुआ शस्त्र।

(ब) अमुक्त हथियार -

इस वर्ग में हाथ में पकडे़ रहकर शत्रु पर प्रहार किये जाने वाले हथियार आते थे, जैसे - बज्र, परशु, गदा तथा तलबार आदि। वैशस्पायन की ‘नीति प्रकाशिका’ में इस कोटि के हथियार के 20 प्रकार का वर्णन है, जिसमें निम्नलिखित प्रमुख है [९]

(1) वज्र -बिजली के समान भयानक आबाज उत्पन्न करने वाला छःधारो वाल शस्त्र।

(2) इसू -तलवार ।

(3) परशु या फरसा - लकड़ी के हस्थे के साथ अर्द्ध-मण्डलाकार लोहे के फल वाला शस्त्र।

(4) ग्रोसियार -गाय के सींग से मिलता जुलजा 2 फीट का भाला।

(5) असिधुन -तीन धारों वाली छोटी धुरी।

(6) कुन्त -9 से 15 लम्बा एक प्रकार का बल्लम अथवा कांटेदार बर्घ्ण।

(7) स्थूण - आदमी की ऊचाई का स्तम्भवत् हथियार।

(8) प्राश - दो धार वाला (दुधारा) शस्त्र।

(9) पिनाक -त्रिशूल लोहे अथवा पीतल द्वारा निर्मित तीन कांटो वाला लगभग 6 फीट लम्बा शस्त्र।

(10) गदा -इसका हाथ पतला और नीचे का हिस्ता वजनदार होता है। इसकी लम्बाई जमीन से छाती तक होती है। इसका बीस मन तक होता है। एक-एक हाथ से दो-दो गदाएॅ उठायी जाती थी।

(11) मुग्दर -मंडलाकार मजबूत हत्थे से युक्त लगभग 4 फीट लम्बा एक भरी दण्ड।

(12) सीर -लोहे का बना हुआ दानों और से मुड़ा हुआ बाल्टी के आकार का शस्त्र।

(13) पुटि़टश -एक प्रकार का ताँबे अथवा लोहे का भाला।

(14) मुस्टिक -अंगुलियों में पहिने जाने वाली तेज चाकू या छोटी तलवार।

(15) परिध -एक लोहे की मूठ है। दूसरे रूप में यह लोहे की छड़ी भी होती है और तीसरे रूप के सिरे पर वजनदार मुँह बना होता है।

(16) शतध्नी -दुर्ग दीवार पर लगा गदा की भाँति का लगभग 6 फीट लम्बा अस्त्र जिसे लकड़ी की तोप भी कहा जाता है और जो एक बार में सौ व्यक्तियों को मारने में सक्षम होता था।

(स) भुक्तामुक्त शस्त्र -

इस प्रकार के हथियारों को कुछ भाग शत्रु पर फेका जाता था और कुछ हाथ में रखा जाता था। अन्य शब्दो में इन्हें फेंककर और हाथ मे पकड़े रहकर भी चलाया जा सकता था, जैसे- नालीक, धनुष-वाण, कृपाण, भाला, बल्लम आदि। प्रकाशिका में इस प्रकार के हथियार के दो वर्गो का उल्लेख मिलता है - सोंपसंहार, उपसंहार। शस्त्र छोड़ने की क्रिया को सोंपसंहार और उन्हें वापस करने की क्रिया को उपसंहार कहते थे। इस ग्रन्थ में इन दोनो के वर्गो के क्रमशः 44 और 55 शस्त्रों का उल्लेख है। [१०]

(द) मंत्रयुक्त (यंत्रयुक्त) हथियार -

इस वर्ग के हथियार यांत्रिक दृष्टि से पर्याप्त जटिल और अन्य वगार् के शस्त्रों की तुलना में पर्याप्त श्रेष्ठ होते थे। इनका प्रयोग सम्भवतः मन्त्रों का उच्चारण, वज्रासत्र तथा विष्णु चक्र आदि इस कोटि के शस्त्र है। नीति-प्रकाशिका में इस कोटि के शस्त्रों की संख्या 7 बताई गई है। अग्नि पुराण (249/2,3,4) में प्राचीन भारतीय शस्त्रास्त्रों के उपयुर्क्त वर्गीकरण में थोडा सा परिवर्तन निम्न प्रकार दिया गया है -

(1) परिणमुक्त शस्त्र -हाथ से फेके जाने वाले शस्त्र, जैसे शिला, तोमर आदि।

(2) मंत्रयुक्त शस्त्र -किसी मन्त्रादि की सहायता से प्रक्षेपित शस्त्र, जैसे - क्षेपणि, धनुष आदि।

(3) अमुक्त शस्त्र -हाथ में पकडे रहकर ही शत्रु पर प्रहारक शस्त्रु, जैसे - खड़क आदि।

(4) मुक्त संधारित शस्त्र -फेंककर पुनः वापस बुआ लिये जाने वाला शस्त्र जैसे - प्राश आदि।

(5) प्राकृतिक शस्त्र -द्वन्द्व युद्ध में प्रहारक रूप में प्रयुक्त शरीर के विभिन्न अंग, जैसे-हाथ, पैर, दाँत नाखून आदि।

भोज ने आपने ग्रन्थ ‘युक्ति कल्पतरू’ में इन शस्त्रास्त्रों को दो वर्गो में विभाजित किया जाता है। माथिकम् अर्थात शत्रु के अनजाने छल अथवा कपट युक्त शस्त्र जिन्हें उसने आगे चलकर आग्नेयास्त्रों (दहानादिकभ्) के रूप में स्पष्ट किया होने वाले शस्त्र (आग्नेयास्त्रो के अतिरिक्त) जिन्हें उस ने आगे चलकर तलवार आदि (खड़गादिकम्) के रूप में सम्बोधित किया है।

आचार्य कोटिल्य ने भी आपने अर्थशास्त्र (2/18) में गति तथा स्वरूप एवं आकार के आधार पर शस्त्रास्त्रों का वर्गीकरण किया है। गति के आधार पर उसने 10 प्रकार के स्थिर अंगो तथा 17 प्रकार के चल-यन्त्रों एवं स्वरूप के आधार पर 11 प्रकार के हलमुख (हल की भॉति नोंक वाले) शस्त्रों का विवरण दिया है जिन्हें संक्षेप मे निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है।[११]

स्थित यन्त्र

(1) सर्वताभद - सुरक्षा के समय (विशेषकर दुर्ग सुरक्षा हेतु) प्रयुक्त होने वाला यह एक ऐसा स्थिर यन्त्र होता था जो चारों और पत्थर फेकने में सक्षम होता था।

(2) जामदग्न्य - सुरक्षा हेतु अधिक उपयोगी यह एक ऐसा स्थिर यन्त्र होता था जो अपने बीच के छिद्र से बड़े-बड़े गोले अथवा बाण वर्षा करने में सक्षम होता था।

(3) बहु सुख- दुर्ग दीवारत एक विशेष स्थान जहांँ बैठकर यो़द्वा चतुर्दिक बाल वर्षा कर सकते है।

(4) विश्वासघाती - प्रवेश द्वारों पर तिरछा लगा हुआ एक ऐसा शस्त्र जिसके स्पर्श मात्र से ही शत्रु मर जाऐं।

(5) सघाती- किलों में आला लगाने में सक्षम अग्नियंत्र।

(6) यानक - रथों के पहियों आदि के ऊपर रखकर प्रयुक्त किया जाने वाला लम्बा शत्रु प्रहारक यंत्र ।

(7) पर्यन्यक- अग्निशमन यंत्र

(8) बाहु यंत्र- छोटे आकार (पर्जन्यक से आधा) का अग्निशयन यंत्र ।

(9) ऊध्वबाहु - प्रवेश द्वार पर रखी हुई एक ऐसी बहुत भारी लाट (थम्भ) जिसे शत्रु द्वारा प्रवेश करने के प्रयत्न पर उस पर खींचकर गिरा दि या जाता था।

(10) अद्वंबाहु - ऊर्ध्वबाहु से छोटा (लगभग आधा) किन्तु उसी के समान शत्रु प्रवेश में बाधक यंत्र ।

चल यंत्र :

(1) पचालिक - परकोटे के बाहर जल के बीच शत्रु को रोकने के लिये प्रयुक्त होने वाला पैना लकड़ी का यंत्र

(2) देवदण्ड - परकोटे के ऊपर रखा जाने वाला बड़ा भारी स्तम्भ ।

(3) सूकरिका - चमड़े की बनी सूकर को समान आक्रति वाली एक ऐसी भरीक जिसे अट्टालक के सुरक्षार्थ प्रयुक्त किया जाता है।

(4) मूसलयष्टि - खैर लकड़ी निर्मित मूसल के आकार का शूलयुक्त सुदृढ़ डंडा।

(5) हस्तिवारक - हाथी को मारने वाला (नियन्त्रित करने वाला) त्रिशूल।

(6) तालवृन्त - चतुर्दिक घूमने वाला यंत्र।

(7) द्रुधण - मुग्दर से मिलता जुलता शस्त्र ।

(8) स्पृतकला - कांटेदार गदा।

(9) आस्फोटिक - चमड़े के ढका चार कोणों वाला पत्थर के टुकड़े फेंकने वाला यंत्र।

(10) उत्पाटिम - खम्बे आदि को उखाडने में प्रयुक्त होने वाला यंत्र।

(11) उद्वाटिम - मुग्दर के आकार से मिलता जुलता यंत्र।

उपरोक्त के अतिरिक्त कौटिल्य ने त्रिशूल, चक्र, कुदाल, गदा तथा शत्धनी को भी यंत्र की श्रेणी में ही रखा है।

हलमुख शस्त्रास्त्र -

इसमें शक्ति, प्राप्त, कुन्त, भिण्डीपाल, तोमर, शूल (त्रिशूल), हाटक (तीन कांटो से युक्त कुन्त सदृश) कर्पण (तोमर सृदश) वराहकर्ण (सूअर के कान की आकृति वाला दुधारा) तथा कणय (बीच में मूठ लगा दोंनो ओर तीन-तीन कीलों वाला लौंह श़स्त्र) आदि आते हैं।

अन्य हथियार-

उपर्युक्त हथियारों के अतिरिक्त कोटिल्य ने 4 प्रकार के धनुषों (कार्मूक, कोदड धनु तथा द्रूण तथा द्रूण), 5 प्रकार के बाणों (वेणु, शर, शलाका, दण्डासन तथा नाराच),3 प्रकार की खड्क (निस्त्रिंश, मडलाग्र तथा असियष्टि), 7 प्रकार के क्षुर ( परशु, कुठार, पट्टस, खनित्र, कुदाल, क्रकच तथा काण्डच्छेदन) तथा 5 प्रकार के आयुद्वों (यंत्र, पाषाण, गोल्पण, मुष्टि पाषण, रोचनी, तथा इषद) का भी वर्णन किया है।

इस प्रकार उपर्युक्त वर्णन से यह पूर्ण रूप से स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन भारत में आक्रमणात्मक शस्त्रास्त अनेक प्रकार के थे और समय-समय पर अनेक विद्वानों ने उनको यथासम्भव वर्गीकृत करने का प्रयत्न भी किया। मारकण्डेय में ही 86 प्रकारके शस्त्रों और 84 प्रकार की गदाओं का उल्लेख इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करता है। इन शस्त्रास्त्रों में ‘धनुष-वाण’ सर्वाधिक महत्वपूर्ण हथियर समझा जाता था। तलवार (खड्ग), गदा,चक्र, परशु, वज्र, शक्ति, भिण्डीपाल, तोमर, त्रिशूल, कुन्त, प्राश तथा शतध्नी आदि अन्य महत्वपूर्ण आक्रमणात्मक हथियार थे।

सुरक्षात्मक शस्त्र[सम्पादन]

आक्रमणात्मक शस्त्रास्त्रों की भांति प्राचीन भारतीय सैनिक सुरक्षात्मक शस्त्रों के प्रयोग से भी परिचित थे, किन्तु वैदिक काल से पूर्व वे सम्भवतः सुरक्षात्मक साघनों का पृथक निर्माण नहीं करते थे। इसलिये सिन्धु घाटी की खुदाई से प्राप्त वस्तुओं में अनेक आक्रमणात्मक शस्त्रों के अवशेष तो मिले है किन्तु सुरक्षात्मक शस्त्रों के नहीं। इनका एक कारण यह भी हो सकता है कि उस समय के शस्त्रों की प्रद्वारक शक्ति अधिक न होने के कारण उनके वार को प्रहारक शस्त्रों से भी रोक दिया जाता होगा। किन्तु बाद में धातु के प्रयोग ने इस शस्त्रों की प्रहारक क्षमता को बढ़ा दिया होगा और जिससे बचाव हेतु मानव का ध्यान कवच की और गया होगा। शायद इसलिये, महाभारत काल में आक्रामक शस्त्रों के अधिकधिक विकास के कारण जहां और विनाशक शक्ति अधिक बढ़ी, वही दूसरी ओर उनके सुरक्षात्मक साधनों का विकास भी आवश्यम्भावी हो गया। परिणामस्वरूप , कवच और ढाल सैनिक के प्रमुख सुरक्षात्मक शस्त्र प्रमाणित हुए। सींग, लोहा, गैंप्र नील गाय, हाथ तथा बैल के चर्म, खुर तथा सूत आदि से निर्मित इन सुरक्षा आवरणों को आचार्य कौटिल्यश् ने निम्न प्रकार वर्णित किया है -

1. शिरस्त्राण-सिर की सुरक्षा करने वाला कवच।

2 कण्डस्त्राण- गले की सुरक्षा करने वाला कवच।

3 कृपा- आधी बाहों को ढकने वाला कवच।

4 कंचुक - घुटनों तक शरीर को ढकने वाला कवच।

5 बारवाण- पैर के टखने तक सम्पूर्ण शरीर को ढकने वाला कवच।

6 नागोदारिक- मात्र हाथ की उंगलियों का आरक्षक कवच।

7 लौहजाल - सिर से लेकर पूरे शरीर को ढकने वाला आवरण।

8 लौह जालिका - सिर को छोड़कर शेष शरीर को ढकने वाला आवरण।

9 लौह पट्ट - बाहों को छोड़कर शेष शरीर को ढकने वाली प्लेट।

10 लौह कवच - मात्र छाती और पीठ को ढकने वाला आवरण।

11 सूत्र कंकण - सूत द्वारा निर्मित कवच ।

इस प्रकार कवच लगभग सम्पूर्ण शरीर एवं महत्वपूर्ण कोमलांगों को शत्रु प्रहार से यथसंभव सुरक्षित रखता था। कवच के अतिरिक्त पेटी, चर्म, हसि् त, कर्ण, तालमूल धमनिका, कपाट, किटिका, अपतिहृत तथा वलाह, कान्त आदि अन्य रक्षात्मक साघनों का भी उल्लेख मिलता है जिन्हें डॉ . पी.सी. चक्रवर्ती ने ढालों के विभिन्न प्रकारों की संज्ञा दी है।

सैनिकों को अतिरिक्त शत्रु प्रहार से सुरक्षा हेतु ही हाथियों, घोड़ों तथा रथों को भी कवच पहनाये जाने का उल्लेख मिलता है। सुरक्षात्मक आवरणों की यह परम्परा सम्राट हर्ष के समय तक किसी न किसी रूप में विद्यमान रही। आक्रामक हाथियारों के रूप में कुछ सुरक्षात्मक हाथियार भी होते थे, जैसे अग्निवर्धक यंत्रों के जवाब में जलवर्षण करने वाला वरूणास्त्र । इस प्रकार शत्रु द्वारा संभावित पत्थर वर्षा से बचने के लिये एक चर्म निर्मित दीवाल, जिसे सुविधापूर्वक यथास्थान ले जाया जा सकता था, का भी प्रयोग होता था। हाथी स्वयं पैदल सैनिक की सुरक्षार्थ एक दीवार का काम करते थे।

आग्नेयास्त्र (Fire Arms)[सम्पादन]

भारत में आग्नेयास्त्रों के निर्माण के सम्बन्ध में विद्वानर एकमत नहीं है। जहां कुछ लोग भारत को ही बारूद का प्रथम जन्मदाता मानते है और ऋग्वेद में प्रमुख शब्द सूर्भी का अर्थ आग्नेयास्त्र से लगाते है, वही कुछ विद्वान बारूद को आविष्कार को 13वीं शताब्दी से जोड़कर इससे पूर्व भारत में बारूद से चलने वाले यंत्रों के प्रयोग की मान्यता प्रदान नहीं करते है और ‘शुक्रनीति’ में बर्णित नालक, बन्दुकों, ब्रन्नालक और तोपों के वर्णन को ऐतिहासिक फरेब मानते है। वे शुक्रनीति की प्राचीनता पर शंका प्रकट करते हुए यह मानते हैं कि यह ग्रंथ ईस्ट इंडिया कम्पनी के समय में लिखा गया था। अतः उसके आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयत्न अनुचित होगा कि कोटिल्य के युग में बारूद और तोपों तथ बन्दुकों का प्रयोग होता है। [१२]

किन्तु प्राचीन ग्रंथों और भारतीय शिल्पकला का गहन अध्ययन करने वाले डॉ. गस्टन ओपर्ट ने कार्तियस के लेखों के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि सिकन्दर को भारत में आग्नेयास्त्रों का भी सामना करना पड़ा था। झेलम युद्ध के कुछ ही समय बाद रचित अपने अर्थशास्त्र में कौटिल्य ने भी अग्निपूर्ण तैयार करने की विधियों का उल्लेख किया है, जिससे अग्निपूर्ण प्रयोग करने वाले यंत्रों के अस्तित्व का भी संकेत मिलता है। सम्भवतः इसलिये कुछ विद्वानों ने ‘शत्ध्नी’ नामक शस्त्र को आग्नेयास्त्र कहकर सम्बोधित किया है।

कामन्दीय नीतिसार में तो आग्नेशास्त्रों को अस्तित्वको स्वीकारा ही गया है, वैशम्पायन की नीति प्रकाशिका में भी लोहे व शीशे के यंत्रों और गोलियों को फेंकने का उल्लेख मिलता है। इतना ही नहीं प्राचीन शिल्पकला के प्रतीक मंदिरों आदि की मूर्तिया भी आग्नेशास्त्रों के अस्तित्व की और संकेत करती है।

इस प्रकार यदि हम शुक्रनीति के आग्नेयास्त्रों के उल्लेख को छोड़ भी दें तो भी ऐसे अनेक प्रमाण है जिनसे यह प्रमाणित हो सकता है कि प्राचीन भारत में आग्नेयास्त्र थे। यह और बात है कि धर्मयुद्धों की प्रधानता के कारण उस समय उनका खुलकर प्रयोग करना संभव न हो सका हो। यह भी संभव हैकि तत्कालीन आग्नेयास्त्र प्रचलन में कम आने के कारण आधुनिक आग्नेयास्त्र की भांति विकसित न रहे हो, फिर भी प्राचीन भारत में आग्नेयास्त्रों के उदय को आधुनिक काल के विकसित आग्नेयास्त्रों का प्रथम सोपान कहा जा सकता है।

सन्दर्भ[सम्पादन]

  1. अशोक कुमार सिंह : विश्व का सैन्य इतिहास, वर्ष 2002 पृ. 1
  2. J.F.C. fuller Armament & History, Page No. 22 - 24
  3. P. E. Cleator ; Weapons of war, Page. 42
  4. Haye's ; Element of Ordinance
  5. P.C. Chekravarty ; The Art of war in Ancient India
  6. Maxumdar ; Military System im Ancient India, Page No. 82
  7. विष्णु दत्ता शर्मा : रामचरित मानस मूल्याकन एवं युद्ध - पद्धति, पृष्ठ - 38 - 39
  8. बाबू रामण्डेय, एन.डी. चौबे : सैन्य अध्ययन, पृष्ठ - 74
  9. वैशम्पायन : नीति प्रकाशिका।
  10. विष्णु दत्ता शर्मा : रामचरित्र मानस मूल्याकन एवं युद्ध पद्धति, पृष्ठ - 39
  11. आर. शामशास्त्री, अर्थशास्त्र ऑफ कौटिल्य, तृतीय संस्करण पृष्ठ - 215 - 217
  12. त्रिपथगा (अस्त्र-शस्त्र विशेषांक) में प्रकाशित राघवेन्द्र वाजपेयी का लेख।

स्रोत[सम्पादन]