शासन : चुनौतियाँ और मुद्दे/नागरिक चार्टर

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नागरिक चार्टर के तहत विभिन्न सेवा प्रदाता अभिकरण, नागरिकों को सूचना मांगे बिना ही उन्हें प्रदत्त सेवाओं के संबंध में सूचनाएं उपलब्ध कराते हैं तथा प्रदत्त सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार करते हैं। नागरिक चार्टर सुशासन की अवधारणा से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। नागरिक चार्टर सबसे पहले यूनाइटेड किंगडम में जॉन मेजर द्वारा 1991 में लाया गया, जिसे टोनी ब्लेयर ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में ज्यादा प्रभावशाली बना दिया। इसके तहत सेवाओं की गुणवत्ता, विकल्प, प्रमाणिकता, मूल्य, जवाबदेही और पारदर्शिता को महत्त्व दिया गया।


भारत में नागरिक चार्टर का मुख्य उद्देश्य पारदर्शिता के माध्यम से सेवा की गुणवत्ता में सुधार करना है। संबंधित मंत्रालय और विभागों की वेबसाइट पर इससे संबंधित सूचनाएं उपलब्ध कराई जाती हैं, जिसके माध्यम से संबंधित अभिकरणों द्वारा प्रदत्त सेवाओं से संबंधित गुणवत्ता सुनिश्चित कर सकते हैं तथा उनका शिकायत निवारण भी किया जा सकता है। भारत में अभी तक नागरिक चार्टर अपने आप में कोई कानूनी अधिकार नहीं है; हालांकि, कार्मिक शिकायत निवारण एवं पेंशन मंत्रालय के प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग का इसकी जवाबदेही दी गई है। दिसंबर 2011 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने नागरिक चार्टर और शिकायत निवारण विधेयक लोक सभा में प्रस्तुत किकया। परंतु यह विधेयक पारित नहीं हो पाया।


जहां नागरिक चार्टर के तहत सेवा प्रदायगी के निकाय स्वतः सूचना प्रदान करते हैं, वहीं सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत नागरिकों को शासकीय नीतियों, परियोजनाओं, कार्यक्रमों एवं निर्णयों से संबंधित सूचना प्राप्त करने का अधिकार है। नागरिक चार्टर और सूचना के अधिकार द्वारा जन सेवा पदायगी में जवाबदेही सुनिश्चित की गई है। सूचना के अधिकार से मानवाधिकार की सुरक्षा सुनिश्चित की जा रही है, विकास की प्रक्रिया को सहभागी बनाया जा रहा है तथा लोक वित्त तथा लोक पदों से संबंधित भ्रष्टाचार को नियंत्रित किया जा रहा है। पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में ई-शासन व डिजिटल शासन भारतीय लोकतंत्र की नवीन शासकीय पहल है।