शासन : चुनौतियाँ और मुद्दे/भारत में विकास के बदलते आयाम

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भारत जैसे उत्तर-औपनिवेशिक राज्यों में राज्यतंत्र की प्रमुख जिम्मेदारी विकासात्मक गतिविधियों को कार्यान्वित करना है। जो उनकी वैधता का भी एक प्रमुख आधार है। परंतु विकास स्वयं में एक अतिभारित शब्द है, जिसकी व्याख्या आर्थिक वृद्धि जैसे संकीर्ण अर्थो से लेकर मानवीय विकास जैसे विस्तृत संदर्भ में की जा सकती है। अमत्त्य सेन जैसे विद्वान तो विकास की व्याख्या स्वतंत्रता (राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक) के बढ़ाने या घटाने के विशिष्ट संदर्भ में करके इसके आयाम को और विस्तार प्रदान करते हैं। स्पष्ट है कि विकास का आयाम अनिवार्य रूप से राज्य की प्रकृति और शासन के प्रकार अर्थात् लोकतंत्र आदि से जुड़ा हुआ है।

एक नवोदित भारतीय राज्य की विकासात्मक नीतियों की व्याख्या और मूल्यांकन कई अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों, राजनीतिविज्ञानियों और राजनीतिक अर्थशास्त्रियों द्वारा किया गया है। जिनका विश्लेषण काफी सारगर्भित है किंतु यह विश्लेषण इस अर्थ में एकांगी प्रतीत होता है कि विश्लेषण या तो आर्थिक या राजनीतिक सामाजिक पहलू को प्रमुखता प्रदान करता है, जबकि राज्य की विकासात्मक गतिविधि इन तीनों ही पक्षों के विश्लेषण और अंतरक्रिया की मांग करती है। लेखक द्वारा इस संतुलन को साधने का प्रयास किया गया है।

उपरोक्त संदर्भ में भारत में विकास के बदलते आयामों का परीक्षण निम्न प्रश्नों के तहत किया जा सकता है:

  • भारत द्वारा अपनाई गई विकासात्मक नीतियों को कहां तक उचित ठहराया जा सकता है?
  • इन नीतियों पर राज्य की प्रकृति और सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों का कितना प्रभाव है?
  • क्या आर्थिक विकास की नीतियां शासन तंत्र से प्रभावित होती हैं?
  • अपनाई गई आर्थिक नीतियों का मूल्यांकन किन पहलुओं से किया जा सकता है?


लेखक का मानना है भारतीय राज्य द्वारा अपनाई गई विकासात्मक नीतियां विशुद्ध रूप से आर्थिक विमर्श का परिणाम नहीं रही हैं, बल्कि उस पर ऐतिहासिक-सामाजिक और व्यक्तिगत प्राथमिकताओं का प्रभाव रहा है। सामाजिक दबावों और राजनीतिक गणित ने अपनाई गई नीतियों के पूर्णरूपेण क्रियान्वयन को रोका है, जिसका परिणाम विकृत विकास के रूप में सामने आया है। साथ ही एक प्रतिनिधि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीतियों के प्रति आवश्यक और पूर्णकालिक समर्थन के अभाव ने भी अपेक्षित परिणामों को रोका है।