शासन : चुनौतियाँ और मुद्दे/वैश्वीकरण, क्षेत्रीय एकीकरण, और राज्य

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वैश्वीकरण का विश्व पटल पर तेजी से विस्तार हो रहा है और व्यापक परिवर्तन भी हो रहे हैं। अन्य सभी शब्दों की तरह इसमें भी सुस्पष्टता का अभाव है। वैश्वीकरण को सूचना, तकनीकी, और पूंजी की व अन्य परिवर्तनों की परिघटना से जोड़ा जाता है। समीक्षा के लिए उदाहरणस्वरूप, दो प्रमुख सामाजिक वैज्ञानिकों के दो परस्पर-विरोधी कथन प्रस्तुत किए गए हैं:

1. संप्रभुता, सामाजिक रूप से निर्मित सिद्धांत है, व सदैव ही वास्तविकता के विभिन्न स्तर देखे गए हैं और वर्तमान दशकों में इसे घटते और बढ़ते भी देखा गया है। तब भी, यह अंतर-राज्य संबंधों का आधार है व इसे इसी रूप में वर्णित भी किया जाता है।

2. 'आर्थिक क्रियाओं के वास्तविक प्रवाह के रूप में, बर्तमान सीमाविहीन । विश्व में राष्ट्र-राज्य वैश्वक अर्थव्यवस्था में अपनी अर्थपूर्ण भागीदार इकाई की भूमिका खो चुके हैं।


वास्तविकता के विषय में यह कहा जा सकता है कि वह इस दो परस्पर-विरोधी कथनों के मध्य में कहीं अव्यवस्थित है। इसके अतिरिक्त, भारतीय राज्य के आंतरिक और बाह्य संदर्भों के अलावा वैश्वीकरण के प्रभाव की भी जांच आवश्यक है। भारत में लोकतांत्रिक विकासात्मक राज्य की शुरुआत 1950 में द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत किंसियन विचारधारा के वातावरण में की गई, जिसका उद्देश्य था-न्याय की वृद्धि करना व राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को स्वावलंबी बनाना।

1970 के दशक की शुरुआत तक, यद्यपि विकास की रणनीति संकट की स्थिति में थी और भारत के समक्ष चयन का प्रश्न था कि वह लोकतंत्र या विकास में से किसे प्राथमिकता दे। भारतीय विकास के मौलिक ढांचे में, लोकतंत्र और विकास को समान महत्त्व दिया गया था, किंतु पिछड़ी हुई अर्थव्यवस्था और राजनीतिक विवशताओं ने दोनों को एकसमान प्राथमिकता दिए जाने का अवसर नहीं दिया। दक्षिण कोरिया और कुछ पूर्वी-एशियाई देशों के विपरीत, जिनका ऊपर उल्लेख किया गया हैं, भारत लोकतंत्र के मार्ग पर चलता रहा, और विकासात्मक लक्ष्यों को एक हद तक दरकिनार कर दिया। भारत की तुलना में पूर्वी एशिया में गैर-लोकतांत्रिक हस्तक्षेप अधिक संभव हुआ है।'

इंदिरा गांधी के आपातकाल को दरकिनार कर दें तो भारत में निर्वाचक लोकतंत्र अविरल रहा है। 1990 के दशक के बाद का काल भारत सरकार की आर्थिक नीतियों में परिवर्तनकारी सिद्ध हुआ, और राष्ट्रीय वैश्विक पूंजी और तकनीक का द्वार खोला गया। नव-उदारवादी बदलाव ने भारतीय नीतियों को पश्चिम की ओर उन्मुख कर दिया।

यद्यपि भारतीय राज्य के वैश्वीकरण के साथ संबंधों के अध्ययन में भारत के विभिन्न लक्षणों का विशेष महत्त्व है। यह लक्षण भारतीय राज्य और अर्थव्यवस्था की प्रकृति का उल्लेख करते हैं, यथा भारत के पड़ोसी देशों और विश्व के साथ उसका संबंध, भू-राजनीतिक संदर्भ इत्यादि। इसकी शुरुआत भारत के "कमजोर-शक्तिशाली' राज्य के रूप के साथ ही भारत की अर्थव्यवस्था भी "कमजोर-शक्तिशाली" थी। राज्य और अर्थव्यवस्था दोनों का विकास विभिन्न संस्थाओं के ही अल्पविकास के दायरे में हुआ। क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर का विकास हुआ, यहां के बाजारों का विकास हुआ, व्यापारिक संगठन वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाने लगे। भारत-पाकिस्तान के तनाव/ विवाद, दक्षिण एशिया का पिछड़ापन, दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (साक, SAARC) जिसकी स्थापना 1985 में हुईं, वह विश्व में क्षेत्रीय स्तर पर सबसे शिथिल आर्थिक समूह के रूप में अस्तित्त्व में रहा समकालीन दक्षिण एशिया में भारत अध्ययन हेतु एक महत्त्वपूर्ण विषय बन सकता है। सार्क को इस रूप में देखा जा सकता कि किस प्रकार प्रतिस्पर्धी शक्तियां राष्ट्रवाद, क्षेत्रवाद और उदारवाद आदि कार्य करती हैं। कैकोविच्ज ने अवलोकन किया है कि यह तीनों शक्तियां 'एक-दूसरे से परस्पर संबंधित और अतिव्यापित हैं, कई बार यह विरोधी और कई बार यह एक दूसरे के प्रति सहयोगात्मक होती हैं, किंतु यह कभी एकसमान नहीं होती।

भारत अधि-राष्ट्रीय स्तर पर दक्षिण एशिया के साथ और वैश्विक पूंजीवाद के साथ पूर्णत: संबद्ध नहीं हुआ है। भारत क्षेत्रीय दक्षिण एशिया या एफ्रो-एशियाई विश्व की अपेक्षा वैश्विक अर्थव्यवस्था से अपेक्षाकृत ज्यादा समन्वित है। पांच इसके कारण हैं-प्रथम, प्रारंभ में भारत ने आत्मनिर्भरता के लिए आर्थिक राष्ट्रवाद और राज्य द्वारा देशी उद्योगों के प्रति संरक्षणवादी आर्थिक नीतियों के मिश्रण को अपनाया। इसके अंतर्गत राज्यवाद और राजनीतिक उदारवाद और लोकप्रियतावाद और व्यापारिक उदारवाद, बड़े घरेलू बाजार, निर्यात कंद्रित अर्थव्यवस्था के लिए विकास रणनीति बनाई। द्वितीय, भारत की व्यावहारिक गुटनिरपेक्षता जो सोविवन और पूर्वी यूरोपीय समाजवादी/साम्यवादी अर्थव्यवस्थाओं की ओर व्यापारिक संबंधों हेतु झुकी हुई थी. उसे पश्चिम में साम्यवाद के विखंडन के परिणामस्वरूप एक गहरा धक्का लगा। तृतीय, दक्षिण एशिया में सुरक्षा मुद्दे ने यथार्थवादी रूप लें लिया, जिससे क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण (regional economic integration) के विषय निष्प्रभ हो गए। भारत के विभाजन के पश्चात् ही सुरक्षा समस्या एक गहन विषय बन गया। भारत-पाकिस्तान और भारत-चीन प्रतिद्वंद्विता दक्षिण एशिया में भारत के क्षेत्रीय एकीकरण में बाधक बन गए, व अन्य छोटे देश इस भय में हैं। कि भारत अपनी अर्थव्यवस्था और सैन्य शक्ति का प्रयोग क्षेत्रीय एकीकरण के द्वारा अपने हित में करेगा चतुर्थ, क्षेत्र के यथार्थवादी सुरक्षा वातावरण ने भारत पर निरंतर यह दबाव बनाया कि यह अपने अल्प आर्थिक संसाधनों का प्रयोग अपनी सुरक्षा पर करे। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् से ही, भारत को पाकिस्तान और चीन के साथ युद्ध का सामना करना पड़ा, जैसे 1947, 1962, 1965 और 1999 के युद्ध। भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा पर 1971 के बांग्लादेश की आजादी और उसके उद्भव में सहायता प्रदान करने और उस समय शरणार्थियों की समस्या का बोझआ पड़ा और 1984 में श्रीलंका के निमंत्रण पर शांति-रक्षण हेतु हस्तक्षेप आदि प्रमुख हैं। पंचम्, भारत और इसके प्रमुख पड़ोसी देशों की यथार्थवादी सुरक्षा चिंता उस समय और बढ़ गई, जब 1998 में भारत और पाकिस्तान नाभिकीय अस्त्र संपन्न देश बन गए, और अल्प आर्थिक संसाधनों का प्रयोग विकास से सुरक्षा की ओर होने लगा। इन सभी कारणों से यह स्पष्ट है कि, भारत का क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण, वैश्विक एकीकरण से अपेक्षाकृत अभी बहुत पीछे है।


ढाका में 1985 में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन सार्क की स्थापना की गई, सार्क की अधि-संधीय संविदा के अनुच्छेद के अंतर्गत यह वर्णित किया गया कि द्विपक्षीय विवादित विषय इसके सम्मेलनों का भाग नहीं होंगे। यह इसकी दुर्बलता और शक्ति दोनों ही थी। कोलंबो सम्मलेन में व्यापार में उदारीकरण हेतु दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार समझौते साफ्टा की शुरुआत की गई, किंतु व्यापार अब भी द्विपक्षीय रूप से किए जाते हैं। एक समीक्षक के अनुसार, छोटे क्षेत्रीय राज्य इस भय में थे कि भारत को उनकी अर्थव्यवस्था पर प्रभुत्व का मौका मिल जाएगा, जबकि भारत का भय था कि अंतर्राष्ट्रीय निकाय के छोटे राज्य इसको भारत-विरोध के लिए प्रयोग में लाएंगे, और उन्हें भारत के बड़े बाजार तक पहुंचने में सरलता होगी"

1993 के सम्मलेन में आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने हेतु एक महत्त्वपूर्ण कदम उठाया गया, जिसे साप्टा कहा गया। इसका उद्देश्य सदस्य देशों के मध्य आपसी व्यापार को बढ़ावा देना होगा और आपसी सहमति द्वारा विभिन्न वस्तुओं पर दरों को कम किया जा सकेगा या उन्हें समाप्त कर दिया जाएगा चार कम विकसित देशों-बांग्लादेश, भूटान, मालदीव और नेपाल - को अधिक विकसित सदस्यों भारत, श्रीलंका, और पाकिस्तान - की तुलना में कुछ बस्तुओं पर विशेष व्यापार सुविधा अथवा छूट दी गई।

बहरहाल, एक क्षेत्रीय समूह के रूप में सार्क का प्रदर्शन सदैव निराशाजनक रहा है यह विश्व के निर्यात में 1.4 प्रतिशत भाग और आयात के 2.3 प्रतिशत भाग में साझीदार है, जो कि नाफ्टा (NAFTA) के 46 और 38 प्रतिशत और यूरोपीय यूनियन (ईयू. EU) के 44.4 और 44.7 प्रतिशत से बहुत कम है। अंतर-क्षेत्रीय व्यापार के क्षेत्र में भी इसका प्रदर्शन निराशाजनक है। सार्क का अंतर-क्षेत्रीय व्यापार 5 प्रतिशत है, जबकि नाफ्टा का 52.2 प्रतिशत और ईयू का 62.4 प्रतिशत है।