शासन : चुनौतियाँ और मुद्दे/शासन तंत्र और विकास: पारस्परिक प्रभाव

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विकास की प्रक्रिया के साथ जुड़ा एक महत्त्वपूर्ण विमर्श शासनतंत्र के प्रकारों से भी जुड़ा हुआ है। यह स्मरण रहे कि नवोदित तृतीय विश्व के लिए विकास की प्रक्रिया का चयन केवल एक आर्थिक प्रश्न नहीं था, बल्कि यह एक राजनीतिक पसंद का भी सवाल था और पूंजीवादी या समाजवादी विकास प्राथमिकता अपने साथ विचारों के एक ऐसे मॉडल को अपनाती थी जिसका विस्तार आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं तक था। भारत द्वारा एक स्वतंत्र विकल्प के रूप में मिश्रित आर्थिक मॉडल का चयन उन द्वंद्र और संदेहों को उजागर करता है, जो उपरोक्त मॉडलों के साथ जुड़े हुए थे, जिनका पारस्परिक प्रभाव आर्थिक के साथ-साथ राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं में अभिव्यक्त होना था। आर्थिक विकास के लोकतांत्रिक -खुले राज्यतंत्रों की बजाय सत्तावादी तंत्रों में अधिक सकारात्मक परिणामों की वकालत ने इस संबंध में भारत में भी अध्ययन को बढ़ावा दिया। रुडोल्फ और रुडोल्फ (1987 ), ने इसे "डिमांड पॉलिटी और कमांड पॉलिटी" के रूप में विश्लेषित किया है। डिमांड पॉलिटी में नीतियों का निष्कर्षण और निर्धारण मतदाताओं द्वारा शासन में हस्तक्षेपित होता है जो कि चुनावां, दवाव समूहों, सामाजिक आंदोलनों और उत्तेजक राजनीति द्वारा अभिव्यक्त होता है। आदर्श रूप में यह माना जाता है कि मतदाता प्रतियोगी बाजार व्यवस्था में एक संप्रभु उपभोक्ता के रूप में होता है, जिसकी पसंद या निर्णय बाजार या चुनाव में धन, शक्ति, सूचना आदि के असम्मित वितरण से विकृत नहीं होते। इसके विपरीत कमांड पॉलिटी में नीतियों का निष्कर्षण और निर्धारण सप्रभु राज्य द्वारा हस्तक्षेपित और अभिव्यक्त होता है, जिसमें राज्य विभिन्न वर्गों आर हितों में बड़ी चालाकी से हेर-फेर करता है। रुडोल्फ का मानना है कि भारत में डिमांड और कमांड पॉलिटी लोकतांत्रिक और सत्तावादी शासन कालों के साथ एक अंतर्क्रिया को अभिव्यक्त करती है जहां लोकतांत्रिक सरकारों के दौरान भी कमांड पॉलिटी के लक्षण दिखते हैं और सत्तावादी सरकार डिमांड पॉलिटी के प्रभावों को झेलते हुए दिखाई पड़ती है। इसके परिणामस्वरूप लोकतांत्रिक सरकारों के दौर में आर्थिक विकास की तीव्र दर प्राप्त की जा सकी । यह इस मिथक को तोड़ता है कि सत्तावादी सरकारे उच्च विकास दर को प्राप्त करने में ज्यादा सक्षम हैं। रुडोल्फ ने उपरोक्त विश्लेषण को भारत में 1950 से 80 के दौरान सरकारों के कामकाज पर लागू कर उन्हें चार तरह की शासन व्यवस्था और राजनीति में वर्गीकृत किया है।


1. 1956-57 से 1965-66: लोकतांत्रिक सरकार/कमांड पॉलिटिक्स (मुख्यत: नेहरु)

2. 1966-67 से 1974-75: लोकतांत्रिक सरकार/डिमांड पॉलिटिक्स (मुख्यत: इंदिरा गांधी)

3. 1975-76 से 1976-77: सत्तावादी सरकार / कमांड पॉलिटिक्स (आपातकाल का दौर)

4. 1977-78 से 1979-80: लोकतांत्रिक सरकार/डिमांड पॉलिटिक्स जनता सरकार)


भारत में विकासात्मक गतिविधियों और प्रांतीय स्तर की राजनीति के अध्ययन आधार पर अतुल कोहली (2012 ), ने लिखा है कि भारतीय राज्य की व्यवसाय हितों की ओर उन्मुख नीति उच्च स्तर पर प्रगतिशील गत्यात्मकता और भारत के अधिसंख्य वंचित समूहों को राजनीति और अर्थव्यवस्था में शामिल करने में विफलता दोनों के लिए जिम्मेवार है । राज्य का बड़े व्यावसायियों के साथ निकट संबंध आर्थिक विकास और इसके फलों के सीमित विस्तार का कारण है। भारतीय लोकतंत्र का एक छोटे से शासक वर्ग द्वारा प्रबंधन वंचित और संघर्षरत जनता को इसमें शामिल करने के लिए राजनीतिक चुनौती प्रस्तुत करता है। वर्तमान में भारतीय राजनीतिक दल समग्र रूप से अर्थव्यवस्था के वृहत पहलुओं पर सहमत दिखाई देते हैं। जैसे कि-आर्थिक विकास के प्रति निष्ठा और देशीय पूंजीवाद, वैश्विक ताकतों के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था का एक संकोचपूर्ण खुलापन, और गरीबों के प्रति कुछ हद तक जिम्मेदारी। कोई भी राजनीतिक दल समाजवाद की वकालत नहीं करता।


अतुल कोहली ने भारत में राज्यों को उनकी अर्थव्यवस्था के प्रबंधन और राजनीति के आधार पर तीन वर्गों में वर्गीकृत किया है- पहला , नव-विरासतवादी राज्य जो मुख्यत: हिंदी भाषी राज्य हैं जहां जाति आधारित आरोपित राजनीति और व्यक्तिगत तथा खंडीय लाभों की प्रधानता है। सामाजिक लोकतांत्रिक राज्य जैसे कि केरल और पश्चिम बंगाल। इन राज्यों ने काफी हद तक मानव विकास सूचकांक के मध्य से उच्च स्तर तक को प्राप्त करने में सफलता पाई है। तीसरा, विकासवादी राज्य जैसे कि गुजरात और अन्य दक्षिणपंथी राज्य जा नव-उदारवादी नीतियों की प्रधानता है। इन राज्यों में आर्थिक विकास के उच्च स्तर को प्राप्त किया है किंतु रोजगार रहित विकास भारत में एक प्रमुख समस्या रही है।


स्पष्ट रूप से यह कहा जा सकता है कि जहां एक तरफ राजनीतिक और आर्थिक आयामों के बीच एक करीबी अंतक्रिया है, वहीं दूसरी तरफ नव- उदारवादी ताकतों की प्रधानता भारतीय राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था को प्रमुखता से निर्धारित करती प्रतीत हो रही है जो राज्य की प्रकृति में भी परिलक्षित हो रही है। हाल ही में नीति आयोग द्वारा बारहवीं पंचवर्षीय योजना (2012- 17) को समीक्षा यह बताती है कि भारत में उद्योगों में विकास दर कभी भी 10-15 प्रतिशत नहीं रही, जिसके कारण बड़े पैमाने पर कृषि से अतिरिक्त मजदूरों को रोजगार मुहैया नहीं कराया जा सका। मोटर उद्योग, संचार वा सॉफ्टवेयर क्षेत्र में कम दक्ष मजदूरों को काम नहीं मिल सकता जिसके कारण आज भी मजदूर कृषि और असंगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं। जबकि चीन और ताइवान जैसे देश ऐसा करने में सफल हुए। परिणामत: भारत में आज भी गरीबी बड़े पैमाने पर विद्यमान है।


वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा आर्थिक मोर्चे पर कई महत्त्वपूर्ण प्रयास जैसे ज्यादातर जनसंख्या को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने (जन- धन खाते खोलना) और गरीबों को सब्सिडी रूपी आर्थिक सहायता सीधे उनके खातों में पहुंचाने, सब्सिडी को केवल जरूरतमंदों तक ही सीमित करने, तथा विमुद्रीकरण द्वारा काल धन की समानांतर अर्थव्यवस्था पर काबू पाने जैसे प्रयास सराहनीय प्रयासों में गिन जा सकते हैं, लेकिन गरीबी को दूर करने के लिए कई लक्षित प्रयासों की जरूरत