शासन : चुनौतियाँ और मुद्दे/समृद्धि, पर्यावरण शासन एवं सतत विकास

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उन्नीसवीं शताब्दी में औद्योगिक पूंजीवाद के प्रारंभ ने औद्योगिक जगत में संवृद्धि एवं औद्योगीकरण की होड़ का सूत्रपात किया। इसके परिणामस्वरूप साम्राज्यवादी पूंजीवाद द्वारा उपनिवेशित देशों के प्राकृतिक और भौतिक संसाधनों का निर्बाध दोहन किया गया| द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वि-उपनिवेशीकरण का दौर प्रारंभ हुआ, जिसके परिणामस्वरूप कई उपनिवेश स्वतंत्र हुए और लोकतंत्रीकरण एवं आर्थिक विकास को राष्ट्रीय नीति के केंद्र में स्थान दिया गया। लोकतंत्रीकरण के संदर्भ में, पार्थ चटर्जी के अनुसार, भारतीय उत्तर-औपनिवेशिक राज्य ने सरकार के प्रतिनिधि स्वरूप को अपनाया है जो सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार पर आधारित है; जबकि, भारत में योजनात्मक विकास का मूल उद्देश्य -संचयन और वैधीकरण था। आर्थिक विकास प्रतिमान में औद्योगीकरण को प्राथमिकता दी गई, जिससे प्रकृति का असीम और अबाधित दोहन किया जाने लगा।


लगातार हो रहे औद्योगीकरण और संवृद्धि की होड़ से बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पर्यावरण संकट तथा औद्योगिक एवं संवृद्धि जनित विस्थापन से संबंधित समस्याएं परिलक्षित हुई। इसलिए समकालीन समय में पर्यावरण संरक्षण के सार्वभौमिक लक्ष्य प्राप्ति के लिए राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर बल दिया गया और इस दिशा में कई पहल भी की गई। संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में स्टॉकहोम में 1972 में मानव पर्यावरण सम्मेलन में इन मुद्दों पर गतिविधियो की श्रृंखला शुरू की गई। परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम शुरू किया गया; जिसमें हरित अर्थव्यवस्थाओं को बढ़ावा देना, जन जागरूकता पैदा करना, आदि जैसे मुद्दे शामिल थे-जो प्राकृतिक संसाधनों, पारिस्थितिकी तंत्र और जैव-विविधता के संरक्षण के लिए सभी देशों द्वारा अधिनियमित पर्यावरण कानूनों के लिए गाइड के रूप में कार्य करता है।


ब्राजील के रियो दे जेनेरियो शहर में पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCED), 1992 का आयोजन किया गया, जिसे पृथ्वी सम्मेलन या रियो सम्मेलन के नाम से भी जाना जाता है। इसके द्वारा पारित एजेंडा-21 में इस बात की पुष्टि की गई है कि सतत विकास के आदर्श को पाने के लिए गैर-राजकीय कर्ताओं की प्रतिबद्ध तथा सक्रिय भागीदारी अति आवश्यक है। नागरिक समाज की विश्वसनीयता इनकी जिम्मेवार और रचनात्मक भूमिका के कारण है। एजेंडा-21 के कार्यान्वयन में औपचारिक तथा अनौपचारिक संस्थाएं जन-आंदोलन, मीडिया, पर्यावरण शोध संस्थान, आदि की मान्यता तथा हिस्सेदारी सुनिश्चित की गई है।


सतत विकास का अर्थ उस सामाजिक-पर्यावरणीय व्यवस्था से है जिसके तहत संसाधनों का इस्तेमाल इस प्रकार हो कि बिना प्रकृति के सौंदर्य, स्थिरता एवं संपूर्णता पर प्रतिघात किए हुए आने वाली मानव पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। 1987 में प्रस्तुत ब्रंटलैंड रिपोर्ट में सतत विकास को परिभाषित करते हुए कहा गया कि, 'मानवता के लिए यह संभव है कि वह विकास को सतत बना सके जिससे वह अपनी वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति इस प्रकार करे ताकि भविष्य की पीढ़ियों को किसी संकट का सामना न करना पड़े। सतत विकास की अवधारणा में यह निहित है कि सीमाएं निरपेक्ष नहीं हैं-सीमाएं निहित हैं-वर्तमान प्रौद्योगिकी में, हमारे सामाजिक संगठन में, तथा भू-जीवमंडल की मानवीय गतिविधियों को झेलने की क्षमता में। प्रौद्योगिकी तथा सामाजिक संगठन दोनों का प्रबंधन तथा संवर्धन संभव है जिससे हम आर्थिक सवृद्धि का एक नया अध्याय लिख सकते हैं।


सतत विकास की अवधारणा प्राकृतिक तंत्र की क्षमता तथा मानव द्वारा सामना किए जा रही सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक चुनौतियों के एकीकृत समाधान की दिशा ढूंढती है। सतत विकास के चार मुख्य स्तंभ हैं - पारिस्थितिकी (इकोलॉजी), आर्थिक, साम्य और लोक-संस्कृति संस्थाएं एवं शासन (गवर्नेस)। सतत विकास केवल मानवीय चिंताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सभी प्रजातियों का कल्याण सम्मिलित है। वैज्ञानिक नवोन्मेष एवं शोध सतत विकास-विमर्श के केंद्र में है। इसके तहत अर्थव्यवस्था को पर्यावरण संवेदी बनाने की आवश्यकता है। साथ ही, उद्योग-व्यवसाय, खासकर बहुराष्ट्रीय निगमों को पर्यावरण प्रबंधन तथा सतत विकास को अपने व्यावसायिक नीति के शीर्ष उद्देश्यों में शामिल करना होगा। इस प्रकार लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था ने औद्योगिक क्षेत्र को महत्त्वपूर्ण विधिगत दायित्वों से जोड़ दिया; जिसमें प्रथम दायित्व पर्यावरण संरक्षण से संबंधित था जबकि दूसरा दायित्व समाज के समावेशी विकास के प्रति । भारत में निगमों के पर्यावरण संरक्षण के दायित्व के तहत उनके उद्योगों को कानूनन जहरीली गैस, वायु प्रदूषण की मनाही है। अब उद्योगों पर वनीकरण, जल संरक्षण, अपशिष्ट प्रबंधन आदि का भी दायित्व है। इसके साथ ही, निगमों का सामाजिक दायित्व भी तय किया गया है।