शासन : चुनौतियाँ और मुद्दे/सरकार से शासन की ओर

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1973 में उत्तर कोरिया और यूरोप में वैश्विक तेल बाजार में मंदी का दौर देखा गया और विकसित औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं में कल्याणकारी राज्यों पर वित्तीय व्यय बहुत अधिक बढ़ गया, इस पर पुनर्विचार किया जाने लगा और 1980 के दौरान विकसित औद्योगिक लोकतंत्रों में किंसियन कल्याणकारी अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त होने लगी। 1990 के दशक में दक्षिण एशिया में भी विभिन्न आर्थिक परिवर्तन देखें गए, यह सभी घटनाए विश्व में नव-उदारीकरण की विचारधारा के प्रभुत्व के उदय का आधार बन गई। फलस्वरूप, द्वितीय विश्व बुद्ध के पश्चात् यूरोप और अन्य महाद्वीपों में क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण की प्रक्रिया मजबूत हुई।


वैश्वीकरण और क्षेत्रीय एकीकरण के साथ ही उससे संबंधित एक राजनीतिक विमर्श शुरू हुआ, जिसे सरकार से भिन्न शासनल कहा गया। राज्य और उसकी संस्था, सरकार, को यह आवश्यकता और वांछनीयता अनुभव हुई कि नागरिक समाज और बाजार की संस्थाओं को शासन की प्रक्रिया में शामिल किया जाए। नीति निर्माण व कार्यान्वयः में, पारदर्शिता, सूचना का अधिकार, अधिकारितांत्रिक राज्य से अलग स्वागर नियंत्रक निकाय, कानून का शासन और लोकतांत्रिक भागीदारी और सार्वजनिक जवाबदेयता जो राज्य के साथ नागरिक समाज और बाजार संस्थाओं के जाल की शुरुआत इस विकास के परिणामस्वरूप सामने आए।


भारतीय संदर्भ में सरकार से शासनत्व की ओर वैश्विक परिवर्तन के कारकों के रूप में नेहरूवादी समाजवाद की असफलता और इंदिरा गांधी के लोकरंजन के संकट को देखा जा सकता है। 1980 के अंत तक आर्थिक और राजनीतिक दोनों संकटों ने एक अरक्षणीय भुगतान असंतुलन की समस्या को जन्म दिया भारतीय समाजवाद के प्रतिमान से व्यापारिक उदारवाद के प्रतिमान में परिवर्तन आया, और 1991 में पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस अल्पमत की सरकार द्वारा वैश्वीकरण शुरू किया गया। सरकार से शासन की ओर परिवर्तन के संकेत 2002-2007 की पंचवर्षीय योजना में स्पष्ट थे, और उसके पश्चात् वर्ष 2014-2015 में नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार द्वारा योजना आयोग को नीति आयोग में बदल दिया गया। योजना आयोग, नेहरू के भारतीय समाजवाद का उपकरण था; जबकि नीति आयोग अपनी पूर्ववर्ती संस्था का ही नव-उदारवादी अवतार है।


सरकार से शासन की ओर प्रस्थापित होने में राज्य को प्रक्रिया और संस्था संबंधी बहुत-सी चुनौतियों का सामना करना पडता है। यद्यपि, निजीकरण, बाजारीकरण, गैर-सरकारी संगठनों के होने के बाद भी राज्य का भूमिका महत्त्वपूर्ण ही रहती है, पर कुछ रूपांतरण अवश्य हो जाता है। वास्तविक रूप से, राज्य की भूमिका विश्व के विभिन्न भागों जैसे-वैश्विक दक्षिण और उत्तर में, व्यापक रूप से अभी भी काफी मौजूद है। अन्य शब्दों में, यह सत्य है कि विश्व में राज्य समान रूप से कमजोर या गौण नहीं हो रहा। यह विकसित देशों की महान शक्तियों में अभी भी सुदढ है और विकासशील विश्व जगत में मध्यम शक्ति के राष्ट्रों में यह राष्ट्रीय सुरक्षा राज्य के रूप में विद्यमान है।


तुलनात्मक राजनीति के सामान्य सिद्धांत में, आशावादी विश्लेषक सु-शासनत्व को राजनीति विज्ञान में एक नए प्रतिमान के रूप में देखते हैं। यद्यपि, अधिक यथार्थवादी समीक्षक यह टिप्पणी करते हैं कि प्राप्त प्रमाण कुछ उभरती हुई प्रवृत्तियों को दर्शाते हैं। कुछ नई प्रवृत्तियां राज्य से शासनत्व में परिवर्तन की ओर संकेत करती हैं, किंतु राज्य की भूमिका और उसकी पहुंच अब भी प्रमुख रूप से धुंधली नहीं पड़ी है; यह भी है कि हम परिवर्तन से ज्यादा अनुकूलन देखते हैं, जो पूर्ववर्ती संस्थाओं व प्रक्रियाओं की अनुकृति में काफी हद तक मार्ग-निर्भरता के लक्षणों से युक्त है। भारत भी, जैसा कि पहले ही वर्णन किया गया है, इसका कोई अपवाद नहीं है।


सामान्य रूप से हमें भी यह स्मरण रखना चाहिए कि राज्य सर्वाधिक समावेशी विधिक-तार्किक संस्था है, जो सार्वभौमिक नागरिकता से युक्त है ना कोई बाजार ना ही नागरिक समाज ही पूर्णतः उसकी प्रतिकृति करने के योग्य है। कल्याणकारी राज्य के संकट, सामाजिक लोकतंत्र और साम्यवाद के पतन के बाद नव-उदारवाद, वैश्वीकरण और क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण समाधान के रूप में आए, लेकिन समाधान के बदले नए संकट सामने आते जा रहे हैं। उदाहरण हैं - 1997 में पूर्वी एशिया में वित्तीय संकट, लैटिन अमेरिका का वित्तीय संकट, और 2008-2009 में उत्तर अमेरिका और पश्चिमी यूरोप में आर्थिक महामंदी, 2016 का ब्रेक्सिट, 2017 के राष्ट्रपति के चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प की विजय, और संरक्षणवादी राष्ट्रवादियों ने मुक्त व्यापार और प्रवसन का विरोध वैश्विक उत्तर और दक्षिण में उभरते हुए वर्ग, क्षेत्रीय असमानता में अपार वृद्धि इत्यादि। विश्व में वैश्वीकरण के संकट सघन होते जा रहे है। अब चुनौती है कि एक नई समावेशी और सहभागी राजनीतिक और आर्थिक शासन की विचारधारा निर्मित की जाए जो समतावादी सहभाजनपूर्ण और संरक्षणीय पर्यावरणात्मक विकास पर आधारित हो।