शोध : प्रविधि और प्रक्रिया/शोध और आलोचना

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प्रायः शोध या अनुसंधान तथा आलोचना को एक ही समझा जाता है किंतु इनके मध्य सूक्ष्म अंतर भी है। इस बात को डॉ. नगेंद्र ने अपने निबंध ' अनुसंधान और आलोचना ' के माध्यम से स्पष्ट किया है। संस्कृत व्याकरण का उदाहरण देकर नगेंद्र 'अनुसंधान तथा आलोचना' दोनों शब्दों के मध्य स्थित अंतर को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि-"मनोविज्ञान से पुष्ट संस्कृत व्याकरण का यह नियम है कि कोई भी दो शब्द एक अर्थ का द्योतन नहीं करते—उनमें कुछ-न-कुछ भेद अवश्य होता है। अनुसंधान की मूल धातु 'धा' है, उसमें 'सम्' उपसर्ग लगाकर संधान शब्द बनता है जिसका अर्थ होता है लक्ष्य बांधना, निशाना लगाना, और आलोचना की मूल धातु है 'लोचृ' अर्थात् देखना। इसी मूल धात्वर्थ के आधार पर दोनों के रूढ़ अर्थ में आगे चलकर भेद हो जाता है—एक का अर्थ हो जाता है लक्ष्य बांध कर उसके पीछे बढ़ना और दूसरे का हो जाता है पूरी तरह से देखना परखना। यही दोनों के मौलिक भेद का आधार है।"[१]

नगेंद्र अनुसंधान के तीन तत्त्वों का उल्लेख करते हैं-

  1. पहला अनुपलब्ध तथ्यों का अन्वेषण या खोज
  2. दूसरा उपलब्ध तथ्यों या सिद्धांतों का नवीन आख्यान
  3. तीसरा ज्ञान-क्षेत्र का सीमा-विस्तार अथवा मौलिकता।

इन तीनों में से ज्ञान की वृद्धि को ही नगेंद्र अनुसंधान का उद्देश्य निर्धारित करते हैं। वे मानते हैं कि- "नवीन तथ्यों की उपलब्धि, उपलब्ध तथ्यों अथवा सिद्धांतों का नवीन आख्यान-ये दोनों तत्त्व इसी सिद्धि के साधन हैं।"[२] नगेंद्र अनुसंधान के पश्चात् आलोचना पर विचार करते हैं। वे मानते हैं कि आलोचना का शाब्दिक अर्थ है- सांगोपांग निरीक्षण। आलोचना के तीन कर्त्तव्य-कर्म प्रभाव ग्रहण, व्याख्या-विश्लेषण, मूल्यांकन या निर्णय माने जाते हैं। आलोचना और शोध पर बात करते हुए बैजनाथ सिंहल इन दोनों में निहित समानता तथा असमानताओं को रेखांकित करते हुए लिखते हैं कि- "आलोचना रचनागत जीवनानुभव का उद्घाटन करती है और शोध रचना तथा आलोचना में निहित और उद्घाटित इस जीवनानुभव को तथ्य-रूप में भीतर से पकड़कर रचना और आलोचना के मर्म और महत्त्व के बिंदुओं को उद्घाटित करता है।"[३]

समानता[सम्पादन]

  • साहित्यिक अनुसंधान तथा आलोचना की पद्धति लगभग समान है।
  • 'दोनों की प्रक्रिया में तथ्य संकलन-त्याग एवं ग्रहण, व्याख्यान-विश्लेषण तथा निष्कर्ष ग्रहण का उपयोग किया जाता है।'[४]

असमानता[सम्पादन]

  • आलोचना तथा अनुसंधान एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं। इसे और अधिक स्पष्ट करते हुए नगेन्द्र लिखते हैं कि- "धात्वर्थ के अनुरूप अनुसंधान में अन्वेषण पर अधिक बल रहता है और आलोचना में निरीक्षण-परीक्षण पर।"[५]
  • आत्माभिव्यक्ति आलोचना का एक गुण है किंतु अनुसंधान में इसका महत्त्व नगण्य या गौण समझा जाता है।
  • अनुसंधान के लिए वैज्ञानिक तटस्थता तथा वैज्ञानिक प्रविधि एवं प्रक्रिया अनिवार्य है किंतु आलोचना के लिए परिशिष्ट रूप में ही उसका महत्त्व है।
  • अनुसंधान का उद्देश्य ज्ञान की वृद्धि है तथा आलोचना के लिए मर्म की अनुभूति का सर्वाधिक महत्त्व है।

शोध के संदर्भ में उत्कृष्ट अनुसंधाता में आलोचनात्मक प्रतिभा का होना अति आवश्यक समझा जाता है।

संदर्भ[सम्पादन]

  1. नगेन्द्र, डॉ. (1980). आस्था के चरण (PDF). नयी दिल्ली: नेशनल पब्लिशिंग हाउस. पृ. ६२.
  2. डॉ. सावित्री सिन्हा तथा डॉ. विजयेन्द्र स्नातक(सं.)-अनुसंधान की प्रक्रिया, युगान्तर प्रेस, दिल्ली:१९६०, पृ.४३
  3. बैजनाथ सिंहल-शोध : स्वरूप एवं मानक व्यावहारिक कार्यविधि, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली:२०१७, पृ.५३
  4. डॉ. सावित्री सिन्हा तथा डॉ. विजयेन्द्र स्नातक(सं.)-अनुसंधान की प्रक्रिया, युगान्तर प्रेस, दिल्ली:१९६०, पृ.४७-४८
  5. डॉ. सावित्री सिन्हा तथा डॉ. विजयेन्द्र स्नातक(सं.)-अनुसंधान की प्रक्रिया, युगान्तर प्रेस, दिल्ली:१९६०, पृ.४८