शोध : प्रविधि और प्रक्रिया/शोध में तथ्य

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शोध में सत्य की खोज की जाती है किंतु इसमें तथ्य के विश्लेषण के आधार पर ही सत्य का पता लगाया जाता है। शोधार्थी जिस तरह के तथ्यों का संकलन करता है उसी के अनुरूप सत्य का स्वरूप निर्धारित होता है। शोध के अंतर्गत सत्य तथा तथ्य परस्पर पूरक माने जाते हैं। व्यावहारिक रूप से 'प्रमाण के द्वारा ज्ञात अर्थ का उसी प्रकार भाषण सत्य माना जाता है।'[१] शोध के अंतर्गत सत् का अर्थ होता है-अस्तित्ववान्।

शाब्दिक अर्थ[सम्पादन]

तथ्य तथा सत्य के शाब्दिक अर्थ पर विचार करते हुए उदयभानु सिंह 'अनुसंधान का स्वरूप' लेख में लिखते हैं कि- "तथ्य के अर्थ हैं-भौतिक वास्तविकता, यथार्थ घटना, प्रत्यक्षानुभव, वस्तुनिष्ठ यथार्थता पर आश्रित वृत्तांत या कथन। कल्पना, गप्प, मत, सिद्धान्त आदि से वह स्वभावतः भिन्न हैं। सत्य के अर्थ हैं-यथातथ्य, तथ्यानुरूपता, तथ्य या यथार्थ के अनुरूप अथवा प्रस्थापित तथ्यों के आधार पर आभासरहित तर्क द्वारा साधित निर्णय, प्रतिज्ञा, कथन या विचार करना, यथातथ्य अथवा स्वीकृत, अधीत या सिद्ध कथनों और प्रतिज्ञाओं का समुदाय।"[२] उदयभानु सिंह भौतिक जगत की यथार्थ घटनाओं और वृत्तांत को तथ्य मानते हैं तथा उसके आधार पर किए जाने वाले तर्कसंगत कथन अथवा निर्णय को सत्य मानते हैं। क्योंकि सत्य तथा तथ्य एक-दूसरे के पूरक हैं।

शोध में सत्य[सम्पादन]

डॉ. नगेंद्र 'अनुसंधान और आलोचना' निबंध में सत्य के संदर्भ में लिखते हैं कि- "सत्य-शोध के तीन संस्थान हैं-तथ्य-संग्रह, विचार और प्रतीति। उपलब्ध तथ्य को विचार में परिणत किये बिना ज्ञान की वृद्धि सम्भव नहीं है और विचार को प्रतीति में परिणत किये बिना सत्य की सिद्धि सम्भव नहीं।"[३]

संदर्भ[सम्पादन]

  1. डॉ. उमाकान्त गुप्त, डॉ. ब्रजरतन जोशी(सं.)-अनुसंधान: स्वरूप और आयाम, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली:२०१६, पृ.१४
  2. डॉ. उमाकान्त गुप्त, डॉ. ब्रजरतन जोशी(सं.)-अनुसंधान: स्वरूप और आयाम, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली:२०१६, पृ.१६-१७
  3. डॉ. सावित्री सिन्हा तथा डॉ. विजयेन्द्र स्नातक(सं.)-अनुसंधान की प्रक्रिया, युगान्तर प्रेस, दिल्ली:१९६०, पृ.५५