समसामयिकी 2020/कृषि संसाधन खाद्य सुरक्षा

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अखबार टीवी पेपर मीडिया व्हाट्एप यानि पूरे संचार तंत्र को लाक डाउन कोरोना समस्या का एक ही रास्ता है प्रश्न-पर्दा घूंघट परिपाटी क्या है? उत्तर - सेवानिवृत्त कार्यपालन अभि. स्व दुलारी प्रसाद की बहुओं को नोट खाकर पीएम द्वारा बके गए कोरोना अकाल में दहेज के काफिले को स्थिर रखने को घूंघट प्रथा कहते हैं जबकि पत्रकारों द्वारा छापे जाने वाले वोलवशिक क्रांति खूनी नक्सल सप्ताह में ११ नवंबर २०२० बर्थ डे धंधा को F२ में कैद कर देने को घूंघट परिपाटी कहा जाता हैं । इस कहानी से राजेन्द्र कुमार बताते है कि पुरातन काल से प्रबुद्धजनों के आतंक को नेस्तनाबूद करने के लिए डॉलर पर उनके घर जमाई की फोटु चिपकाना जरुरी है

Wednesday, 21 October 2020 डी के भाट धर्म परिवर्तन करना- चतुर चालाक इंसान लोगो ने पाया कि बालक में को सबसे ज्यादा सुख संभोग क्रिया से मिलता हैं और १८-२१ का कानून ओर ३१-३५ और तो और ब्रह्मचारी बनाकर इस सुख से वंचित कर दिया गया । दूसरा सुख चिकन बिरयानी पार्टी है , ऐसा कामता प्रसाद धूर्त ने बताया तो ब्राह्मणों को मांसाहार निषेध करवा दिया गया । मनुष्य की नारी प्रजाति को सबसे ज्यादा तकलीफ पत्थर के सामने नाचने मनोकामना मांगने और लौटने में होती है और नर समाज के लिए सबसे बड़ा कलंक तिहाड़ में यातना है । यही कारण है कि पत्रिका जगदलपुर ब्यूरो के बादल देवांगन की पगली संगीता ( चूत बढ़िया ✓ छेदे ४✓ पुदी✓बांगा✓गांड़✓स्क्रू X २✓) ने ०८ से २० नवंबर २०२० तक "वोलवेशिक क्रांति खूनी पखवाड़ा" छापने के लिए वन में आर्मी को इस साल फिर की से २२ से २४ जून तक कालकोठरी मे सड़ाने क प्रबंध किया है । › इस ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से सर्व साधारण को सूचित किया जाता हैं कि नक्सली दमन विरोधी सप्ताह आलरेडी ०६ से १२ मई और जून २०२० तक लॉकडाउन में मना... ›

इस ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से सर्व साधारण को सूचित किया जाता हैं कि नक्सली दमन विरोधी सप्ताह आलरेडी ०६ से १२ मई और जून २०२० तक लॉकडाउन में मना... 30 comments: › Home View web version Powered by Blogger.

कृषि विपणन सुधार(Agricultural Marketing Reform)[सम्पादन]

देश के दूरदराज के इलाकों में आपूर्ति श्रृंखला एवं माल परिवहन प्रबंधन प्रणाली से किसानों को जोड़ने के लिये नई दिल्ली स्थित सीएसआईआर-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CSIR-CRRI) ने किसान सभा एप (Kisan Sabha App) विकसित किया है। इसका लक्ष्य किसानों को सबसे किफायती एवं समय पर लॉजिस्टिक सहायता प्रदान करना तथा बिचौलियों के हस्तक्षेप को कम करके उनको सीधे संस्थागत खरीदारों के साथ जोड़कर उनके लाभ को बढ़ाना है। मुख्य बिंदु: यह निकटतम मंडियों में उपज मूल्यों की तुलना करके तथा सस्ती कीमत पर मालवाहक वाहन की बुकिंग करके फसलों की उचित मूल्य दर प्रदान करने में मदद करेगा जिससे किसानों को अधिकतम लाभ मिल सकेगा। यह पोर्टल किसानों, ट्रांसपोर्टरों, सेवा प्रदाताओं (जैसे- कीटनाशकों/उर्वरक/डीलरों, कोल्ड स्टोरेज़ और गोदाम मालिक), मंडी डीलरों, ग्राहकों (जैसे- बड़े खुदरा दुकानों, ऑनलाइन स्टोर, संस्थागत खरीदारों) और अन्य संबंधित संस्थाओं को समय पर प्रभावी समाधान के लिये आपस में जोड़ता है। किसान सभा में किसानों/मंडी डीलरों/ट्रांसपोर्टरों/मंडी बोर्ड के सदस्यों/सेवा प्रदाताओं/उपभोक्ताओं के लिये 6 प्रमुख मॉड्यूल हैं। अन्य सुविधाएँ: यह पोर्टल कृषि से संबंधित प्रत्येक इकाई के लिये एकल स्टॉप के रूप में कार्य करता है क्योंकि वे किसान जिन्हें फसलों की बेहतर कीमत की आवश्यकता है या मंडी डीलर जो अधिक किसानों एवं ट्रक ड्राइवरों से जुड़ना चाहते हैं, उन सबके लिये मददगार साबित होगा। यह उन लोगों के लिये भी एक मंच प्रदान करता है जो सीधे किसानों से उनकी उपज खरीदना चाहते हैं। यह एप कोल्ड स्टोरज़ या गोदाम कारोबार से जुड़े लोगों के लिये भी उपयोगी साबित होगा।

सीएसआईआर-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CSIR-CRRI):

सीएसआईआर-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CRRI) वर्ष 1952 में स्थापित एक प्रमुख राष्ट्रीय प्रयोगशाला है। यह वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (Council of Scientific and Industrial Research- CSIR) के एक घटक के रूप में सड़कों एवं रनवे के डिज़ाइन, निर्माण तथा रखरखाव, मेगा एवं मध्यम शहरों के यातायात और परिवहन की योजनाओं आदि पर अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं को पूरा करता है।

कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने COVID-19 की वजह से उत्पन्न परिस्थितियों के मद्देनज़र ‘ई-नाम (eNAM)’ पोर्टल में संशोधन किया है।[सम्पादन]

ई-नाम व्यापारियों को किसी दूरस्थ स्थान से बोली लगाने तथा किसानों को मोबाइल-आधारित भुगतान प्राप्त करने की सुविधा प्रदान करता है, जिससे व्यापारियों को मंडियों या बैंकों में जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। यह कृषि उपज बाज़ार समिति (Agricultural Produce Market Committee - APMC) में COVID-19 से सुरक्षा और सामाजिक दूरी (Social Distancing) को बनाए रखने में मदद प्रदान करेगा। संशोधन के पश्चात् पोर्टल में जोड़ी गईं विशेषताएँ COVID-19 से निपटने की दिशा में महत्त्वपूर्ण साबित होंगी जो इस संकट की घड़ी में किसानों को अपने खेत के पास से बेहतर कीमतों पर अपनी उपज बेचने में मदद प्रदान करेगी। मंडी अनाज, फल और सब्जियों की आपूर्ति श्रृंखला को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। COVID-19 के मद्देनज़र ई-नाम पोर्टल मंडियों में लोगों के आवागमन को कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। ई-नाम पोर्टल में संशोधन:

ई-नाम में गोदामों से व्यापार की सुविधा हेतु वेयरहाउस आधारित ट्रेडिंग मॉड्यूल: वेयरहाउसिंग विकास और विनियामक प्राधिकरण (Warehousing Development and Regulatory Authority- WDRA) से पंजीकृत वेयरहाउस में भुगतान की सुविधा शुरू की गई है। इस सुविधा से छोटे और सीमांत किसान अपने उत्पादों का व्यापार सीधे WDRA से पंजीकृत वेयरहाउस से कर सकेंगे। WDRA से पंजीकृत गोदामों में किसान अपने उत्पाद को रख सकेंगे। लाभ: जमाकर्ता लॉजिस्टिक खर्चों (Logistics Expenses) को बचा सकते हैं जिससे उनकी आय में वृद्धि होगी। किसान बेहतर मूल्य पाने हेतु देशभर में उत्पाद बेच सकते हैं तथा मंडी में जाने से बच सकते हैं। यदि आवश्यक हो तो किसान अपने उत्पाद को WDRA से पंजीकृत गोदामों में रखकर ऋण (Loan) प्राप्त कर सकते हैं। आपूर्ति और मांग के अनुसार, उत्पाद का मूल्य निर्धारित करने में आसानी होगी। किसान उत्पादक संगठन ट्रेडिंग मॉड्यूल: Farmer Producer Organisations Trading Module: ‘किसान उत्पादक संगठन ट्रेडिंग मॉड्यूल’ लॉन्च किया गया है ताकि FPO अपने संग्रह केंद्रों से उत्पाद और गुणवत्ता मानकों की तस्वीर अपलोड कर खरीददारों को बोली लगाने में मदद कर सकें। लाभ: यह न केवल मंडियों में लोगों के आवागमन को कम करेगा बल्कि मंडियों में परेशानी मुक्त व्‍यापार करने में लोगों की मदद करेगा। यह FPO को लॉजिस्टिक खर्च कम करने एवं मोल-भाव करने में सहायता करेगा। FPO को व्यापार करने में आसानी हेतु ऑनलाइन भुगतान की सुविधा प्रदान की गई है। लॉजिस्टिक मॉड्यूल: वर्तमान में ई-नाम पोर्टल व्यापारियों को व्यक्तिगत ट्रांसपोर्टरों की जानकारी प्रदान करता है। लेकिन व्यापारियों द्वारा लॉजिस्टिक की ज़रूरत के मद्देनज़र एक बड़ा लॉजिस्टिक एग्रीगेटर प्लेटफार्म बनाया गया है, जो उपयोगकर्त्ताओं को विकल्प प्रदान करेगा। लॉजिस्टिक एग्रीगेटर प्लेटफॉर्म के माध्यम से उपयोगकर्त्ताओं तक कृषि उत्पाद को शीघ्रता से पहुँचाया जा सकेगा। लाभ: यह दूर के खरीदारों के लिये ऑनलाइन परिवहन सुविधा प्रदान करके ई-नाम के तहत अंतर-राज्य व्यापार को बढ़ावा देगा।

  • प्रधानमंत्री द्वारा 12 मई, 2020 को भारत की जीडीपी के 10% के बराबर, 20 लाख करोड़ रुपए के विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणा की गई थी। इसी दिशा में वित्त मंत्री द्वारा कृषि विपणन सुधारों की दिशा में एक केंद्रीय कानून लाने की घोषणा की गई। ‘कृषि विपणन सुधार’ (Agricultural Marketing Reform) की दिशा में किसान को लाभकारी मूल्य पर अपनी उपज को बेचने के लिये पर्याप्त विकल्प उपलब्ध कराने; निर्बाध अंतर्राज्यीय व्यापार; कृषि उत्पादों की ई-ट्रेडिंग के लिये एक रूपरेखा बनाने की दिशा में केंद्रीय विपणन कानून का निर्माण किया जाएगा।

नवीन केंद्रीय कानून के निर्माण के बाद मौजूदा राज्य कृषि विनियमन कानून समाप्त हो जाएंगे।

वर्ष 2017 की 'डबलिंग फार्मर्स इनकम रिपोर्ट' के अनुसार APMC के तहत मौजूदा 6,676 प्रमुख बाज़ारो तथा उप-बाज़ारो में बुनियादी अवसंरचनों की कमी है तथा भारत में अभी भी 3,500 से अधिक अतिरिक्त थोक बाज़ारों की आवश्यकता है। 23,000 ग्रामीण आवधिक बाज़ार (या हाट) भी लंबे समय से उपेक्षा का सामना कर रहे हैं।
  • वित्त मंत्री द्वारा COVID-19 महामारी आर्थिक पैकेज के रूप में कृषि, मत्स्य पालन और खाद्य प्रसंस्करण के लिये कृषि अवसंरचना को मज़बूत करने तथा कृषि शासन संबंधी सुधारों के लिये अहम उपायों की घोषणा की गई थी। इस आर्थिक पैकेज के एक भाग के रूप में कृषि क्षेत्र में शासन एवं प्रशासन से संबंधित भी अनेक सुधारों की घोषणा की गई थी।
  1. 'आवश्यक वस्तु अधिनियम'-1955 में संशोधन;
  2. 'कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधा) अध्यादेश', (Farmers’ Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Ordinance)- 2020;
  3. कृषि उपज मूल्य निर्धारण और गुणवत्ता का आश्वासन;
  4. कृषि विपणन सुधार।

लगभग 85% किसान लघु(1से2 हेक्टेयरर के मध्य) तथा सीमांत (1 हेक्टेयर से कम भूमिवाले)जोतधारक हैं।

  • वित्त मंत्री ने COVID-19 महामारी आर्थिक पैकेज के रूप में कृषि, मत्स्य पालन और खाद्य प्रसंस्करण के लिये कृषि अवसंरचना को मज़बूत करने तथा कृषि शासन संबंधी सुधारों के लिये अहम उपायों की घोषणा की है। प्रधानमंत्री 12 मई, 2020 को भारत की जीडीपी के 10% के बराबर, 20 लाख करोड़ रुपये के विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणा की गई थी। इसी दिशा में वित्त मंत्री द्वारा कृषि क्षेत्र में सुधारों संबंधी आर्थिक पैकेज की घोषणा की गई।

कृषि संबंधी आर्थिक पैकेज में मुख्यत: 11 उपायों की घोषणा की गई है, जिसमें से 8 उपाय कृषि बुनियादी ढाँचागत सुविधाओं को बेहतर बनाने से संबंधित है जबकि 3 उपाय प्रशासनिक एवं शासन संबंधी सुधारों से संबंधित हैं।

  1. फार्म-गेट अवसंरचना (Farm-Gate Infrastructure)(कृषि द्वार) अवसंरचना के विकास के लिये 1 लाख करोड़ रुपये का ‘कृषि आधारभूत अवसंरचना कोष’ के निर्माण की घोषणा की गई।

फार्म-गेट और एकत्रीकरण बिंदुओं (प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों, किसान उत्पादक संगठनों, कृषि उद्यमियों, स्टार्ट-अप आदि) पर मौजूद ‘कृषि आधारभूत अवसंचना परियोजनाओं’ के वित्तपोषण के लिये 1,00,000 करोड़ रुपए की राशि उपलब्ध कराई जाएगी।

  1. सूक्ष्म खाद्य उपक्रमों (Micro Food Enterprises- MFE) का औपचारिक क्षेत्र में प्रवेश की दिशा में 10,000 करोड़ रुपए की सहायता राशि के साथ 'वैश्विक पहुँच वाली वोकल फॉर लोकल’ (Vocal for Local with Global Outreach) योजना शुरू की जाएगी। इससे ऐसे उद्यमियों को फायदा होगा जिनको खाद्य मानकों को हासिल करने, ब्रांड खड़ा करने और विपणन के लिये तकनीकी उन्नयन की ज़रूरत है।
  2. प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (Pradhan Mantri Matsya Sampada Yojana- PMMSY):-‘समुद्री और अंतर्देशीय मत्स्यन और जलकृषि’ (Marine, Inland fisheries and Aquaculture) के एकीकृत, सतत और समावेशी विकास के लिये ‘प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना’ शुरू की जाएगी। योजना के लिये 20,000 हजार करोड़ रुपए योगदान की घोषणा की गई।

राष्‍ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (National Animal Disease Control Program):‘खुरपका मुंहपका रोग’ (Foot and Mouth Disease- FMD) और ब्रुसेलोसिस के लिये ‘राष्‍ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम’ 13,343 करोड़ रुपये के कुल परिव्यय के साथ शुरू किया गया। इस कार्यक्रम को आगे और अधिक आर्थिक सहायता राशि प्रदान की जाएगी। पशुपालन बुनियादी ढाँचा विकास कोष

(Animal Husbandry Infrastructure Development Fund):

डेयरी प्रसंस्करण, मूल्यवर्द्धन एवं पशुचारा आधारित आधारभूत अवसंरचना क्षेत्र में निजी निवेश बढ़ाने के उद्देश्य से 15,000 करोड़ रुपए का ‘पशुपालन बुनियादी ढाँचा विकास कोष’ स्थापित किया जाएगा। विशिष्ट‍ उत्पादों के निर्यात हेतु संयंत्र स्थापित करने वाली इकाइयों को इस कोष के माध्यम से प्रोत्साहित किया जाएगा। औषधीय या हर्बल खेती को प्रोत्‍साहन (Promotion of Herbal Cultivation):

अगले दो वर्षों में 4,000 करोड़ रुपए के परिव्‍यय से हर्बल खेती के तहत 10,00,000 हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया जाएगा। औषधीय पौधों के लिये क्षेत्रीय मंडियों का नेटवर्क स्थापित किया जाएगा। ‘राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड’ (National Medicinal Plants Board) गंगा के किनारे 800 हेक्‍टेयर क्षेत्र में ‘औषधि गलियारा’ विकसित कर औषधीय पौधे लगाएगा। मधुमक्खी पालन संबंधी पहल (Beekeeping Initiatives):

500 करोड़ रुपए की सहायता राशि के माध्यम से मधुमक्खी पालन क्षेत्र में अनेक योजनाओं को प्रारंभ किया जाएगा। ‘टॉप’ टू ‘टोटल’ (TOP to TOTAL):

‘खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय’ (Ministry of Food Processing Industries-MOFPI) द्वारा संचालित 'ऑपरेशन ग्रीन्स'; जो वर्तमान में टमाटर, प्याज और आलू (Tomatoes, Onions and Potatoes-TOP) को कवर करता है, को सभी फलों एवं सब्जियों तक विस्तृत किया जाएगा। योजना के माध्यम से फसलों के परिवहन तथा भंडारण पर 50% सब्सिडी प्रदान की जाएगी। योजना को अगले 6 महीनों के लिये प्रायोगिक रूप में शुरू किया जाएगा तथा बाद में इसे आगे बढ़ाया एवं विस्तारित किया जाएगा। कृषि क्षेत्र में शासन एवं प्रशासन संबंधी सुधार:

‘आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन’ (Amendment in Essential Commodities Act): सरकार द्वारा 'आवश्यक वस्तु अधिनियम'-1955 में संशोधन किया जाएगा। अनाज, खाद्य तेल, तिलहन, दलहन, प्याज, आलू सहित कृषि खाद्य पदार्थों को नियंत्रण से मुक्त किया जाएगा। केवल असाधारण परिस्थितियों जैसे- राष्ट्रीय आपदा, कीमतों में अत्यधिक वृद्धि, अकाल आदि की स्थिति में भंडारण की सीमा पर प्रतिबंध लगाया जाएगा। इसके अलावा भंडारण सीमा संबंधी नियम ‘मूल्य श्रृंखला इकाइयों’ के भागीदारों पर लागू नहीं होगा। कृषि विपणन सुधार (Agricultural Marketing Reform): किसान को लाभकारी मूल्य पर अपनी उपज को बेचने के लिये पर्याप्त विकल्प उपलब्ध कराने; निर्बाध अंतरराज्यीय व्यापार; कृषि उत्पादों की ई-ट्रेडिंग के लिये एक रूपरेखा बनाने की दिशा में केंद्रीय विपणन कानून का निर्माण किया जाएगा। कृषि उपज मूल्य निर्धारण और गुणवत्ता का आश्वासन (Agricultural Yield Pricing and Quality Assurance): सरकार किसानों को उचित और पारदर्शी तरीके से कृषि समूहों, बड़े खुदरा विक्रेताओं, निर्यातकों आदि के साथ जुड़ने में सक्षम बनाने के लिये एक सुविधाजनक कानूनी संरचना का निर्माण करेगी।

असम के गुवाहाटी में उत्तर-पूर्वी क्षेत्रीय कृषि विपणन निगम (North-Eastern Regional Agricultural Marketing Corporation- NERAMAC) के परिसर की आधारशिला रखी जाएगी।[सम्पादन]

इसके परिसर का निर्माण दो चरणों में किया जाएगा। प्रथम चरण में ब्लॉक के तहत कार्यालय सह विपणन परिसर और दूसरे चरण में गेस्ट हाउस का निर्माण किया जाएगा। उत्तर-पूर्वी परिषद द्वारा इस परिसर का निर्माण उत्तर-पूर्व की कृषि और बागवानी उपज के विपणन समर्थन (Marketing Support Agri-Horti Produce in NE Region) योजना के तहत किया जाएगा। इस परिसर को ग्रीन बिल्डिंग के रूप में विकसित किया जाएगा साथ ही इसको कृषि और बागवानी उपज के हब के रूप में विकसित किया जाएगा, जहाँ उत्तर-पूर्व के किसान और उद्यमी अपने उत्पादों को बेच सकेंगे। इस परिसर के माध्यम से कृषि और बागवानी से जुड़े सभी सरकारी अधिकारियों तथा उत्पादकों को एक साथ लाया जाएगा। भारत सरकार के उपक्रम के रूप में NERAMAC Limited को वर्ष 1982 में स्थापित किया गया था। इसका पंजीकृत कार्यालय गुवाहाटी में स्थित है। यह उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के विकास मंत्रालय (Ministry of Development of North Eastern Region- DoNER) के प्रशासनिक नियंत्रण में संचालित है। NERAMAC अब अन्य सभी सुविधाओं के साथ अपने स्वयं के बुनियादी ढांँचे को विकसित करने के बाद अधिक स्थिरता प्राप्त करेगा। NERAMAC उत्तर-पूर्व क्षेत्र के किसानों के विकास और वर्ष 2022 के अंत तक उनकी आय को दोगुना करने के लिये निरंतर प्रयास कर रहा है, इस परिसर के निर्माण के माध्यम से इसके कार्यो में अधिक समग्रता आएगी।

पंजीकृत किसानों को SMS के माध्यम से विभिन्न फसल संबंधी मामलों पर सलाह भेजने के लिये mKisan पोर्टल (www.mkisan.gov.in) का विकास। किसानों को इलेक्ट्रॉनिक ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म प्रदान करने के लिये ई-राष्ट्रीय कृषि बाजार (e-National Agriculture Market- e-NAM) पहल की शुरूआत की गई है।

परंपरागत,जैविक,प्राकृतिक तथा शून्य बजट कृषि[सम्पादन]

मैलाथियान Malathion सार्वजनिक क्षेत्र की कीटनाशक विनिर्माता कंपनी एचआईएल (इंडिया) लिमिटेड ने टिड्डियों के खतरे को नियंत्रित करने में सहायता करने के लिये ईरान को लगभग 25 टन मैलाथियान (95% अल्ट्रा-लॉ वॉल्यूम- ULV) की आपूर्ति की है।

मैलाथियान एक रसायन है जिसका उपयोग मुख्य रूप से खाद्य उत्पादक पौधों को कीड़ों से बचाने के लिये किया जाता है। मैलाथियान कृषि, आवासीय भू-निर्माण, सार्वजनिक मनोरंजन क्षेत्रों और सार्वजनिक स्वास्थ्य कीट नियंत्रण कार्यक्रमों जैसे मच्छर उन्मूलन में व्यापक रूप से उपयोग किया जाने वाला कीटनाशक है। मैलाथियान एक ऑर्गनोफॉस्फेट कीटनाशक है जो मानव स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है क्योंकि ये अपरिवर्तनीय रूप से एक एंज़ाइम को अवरुद्ध करने का काम करते हैं जो कि कीड़ों और मनुष्यों दोनों में ही तंत्रिका तंत्र के कार्य के लिये महत्त्वपूर्ण है। इस प्रकार मानव तंत्रिका तंत्र पर इनका नकारात्मक प्रभाव अधिक देखने को मिलता है। टिड्डियों के संकट का सामना करने हेतु समन्वित प्रयास हॉर्न ऑफ अफ्रीका, पूर्वी अफ्रीका और अरब प्रायद्वीप में व्यापक स्तर पर फसलों को नुकसान पहुँचाने के बाद डेज़र्ट टिड्डों ने मार्च-अप्रैल में भारत में प्रवेश किया और राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, पंजाब और उत्तर प्रदेश में कृषि फ़सलों, बागवानी फ़सलों और अन्य वृक्षारोपण को प्रभावित किया। भारत ने टिड्डियों के प्रजनन स्थल पर ही इन्हे नियंत्रित करने के लिये पहल शुरू की है और समन्वित प्रयासों के तहत ईरान और पाकिस्तान से संपर्क किया था। ईरान ने इस प्रस्ताव पर अपनी इच्छा व्यक्त की थी। इसी के अनुपालन में विदेश मंत्रालय ने ईरान को 25 टन मैलाथियान 95% ULV के निर्माण और आपूर्ति के लिये HIL को आर्डर दिया था। खाद्य और कृषि संगठन (FAO) की रिपोर्टों के अनुसार, टिड्डे के हॉपर चरण की आबादी ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान क्षेत्र में बढ़ती जा रही है, जो आने वाले महीनों में भारत में फसल के नुकसान का कारण बन सकती है। एचआईएल देश में भी टिड्डी नियंत्रण कार्यक्रम के लिये मैलाथियान 95% ULV की आपूर्ति कर रहा है। वर्ष 2019 से अब तक, कंपनी ने इस कार्यक्रम के लिये 600 टन से अधिक मैलाथियान की आपूर्ति की है।

  • पंजाब, हरियाणा में COVID-19 महामारी के कारण श्रमिकों की कमी के बाद धान के बुवाई के लिये ‘पारंपरिक रोपण’ पद्धति के स्थान पर ‘चावल के प्रत्यक्ष बीजारोपण’ (Direct Seeding of Rice- DSR) पद्धति का व्यापक पैमाने पर प्रयोग किया गया। पंजाब में लगाये गए लगभग 27 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की फसल में से लगभग 6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ‘प्रत्यक्ष बीजारोपण की तकनीक’ को अपनाया गया है। विगत वर्ष लगभग 60,000 हेक्टेयर क्षेत्र में DSR पद्धति के तहत धान रोपण किया गया था।
DSR पद्धति में धान की बुवाई से पूर्व नर्सरी तैयार करने या रोपण की आवश्यकता नहीं होती है। किसानों को केवल अपनी भूमि को समतल बनाना होता है और धान की बुवाई से पूर्व एक बार सिंचाई की आवश्यकता होती है। धान का बीजारोपण अप्रैल-मई में तथा फसल की कटाई अगस्त-सितंबर में की जाती है।
चावल के प्रत्यक्ष बीजारोपण का महत्त्व:-
  1. श्रम लागत में कमी:-श्रम की लागत लगभग एक तिहाई तक रहती है। उदाहरणत: 8 एकड़ धान की पारंपरिक धान रोपण प्रक्रिया में श्रम लागत 30,000 रुपए तक होती है, वहीं चावल की प्रत्यक्ष बीजारोपण तकनीक में यह लागत केवल 10,000 रुपए तक होती है।
  2. जल की बचत:-कम सिंचाई की आवश्यकता होती है।
  3. अवशिष्ट दहन समस्या का समाधान:-सामान्यत धान की कटाई और अगली गेहूं की फसल की बुवाई के बीच 'विंडो पीरियड' (Window Period) 20-25 दिनों का होता है, अत: किसान अपने खेतों को साफ करने के लिये ‘फसल अवशेष दहन’ का सहारा लेते हैं। सामान्यत: एक फसल की कटाई तथा दूसरी फसल के बुवाई के बीच के समय को ‘विंडो पीरियड’ कहा जाता है। DSR तकनीक में फसल 10-11 दिन पहले परिपक्व हो जाती है।

पारंपरिक धान रोपाई में जहाँ 4-5 किग्रा./एकड़ बीज की आवश्यकता होती है वही DSR पद्धति में 8-10 किग्रा./एकड़ बीज आवश्यक होता है। अत: DSR पद्धति में बीज की लागत अधिक है।

  • पराली (Crop Stubble) को जलाने से न केवल पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर बल्कि मिट्टी की उर्वरता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

फसल अवशेष जलाए जाने पर वह मिट्टी के साथ मिश्रित हो मृदा जैविक कार्बन में वृद्धि करने के बज़ाय कार्बन डाइऑक्साइड में परिवर्तित हो जाते हैं। वर्तमान में एक ऐसी रणनीति की आवश्यकता है जो फसल अवशेषों के स्व-स्थाने और बाह्य-स्थाने (In-situ and Ex-situ) प्रबंधन पर केंद्रित हो। वर्तमान में हैप्पी सीडर, सुपर-स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम अटैचमेंट, मल्चर और चॉपर-श्रेडर जैसे उपकरणों पर सब्सिडी दिये जाने के प्रावधान से इस समस्या को हल करने की कोशिश की जा रही है।

कृषि में तकनीक[सम्पादन]

  • कृषक नवोन्मेष कोष (Farmers’ Innovation Fund) की स्थापना की घोषणा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा कृषि में वैज्ञानिक नवाचारों को बढ़ावा देने तथा कृषि को तकनीकी से जोड़ने के उद्येश्य की गई।

ICAR कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग, कृषि मंत्रालय, भारत सरकार के तहत एक स्वायत्तशासी संस्था है। 16 जुलाई, 1929 को इंपीरियल काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च नाम से स्थापित यह परिषद देश में बागवानी,मात्स्यिकी और पशु विज्ञान सहित कृषि के क्षेत्र में समन्वयन,मार्गदर्शन और अनुसंधान प्रबंधन तथा शिक्षा के लिये एक सर्वोच्च निकाय है। इसने देश में हरित क्रांति लाने तत्पश्चात अपने अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी विकास से देश के कृषि क्षेत्र के विकास में अग्रणी भूमिका निभाई है। इस कोष के अगले वित्तीय वर्ष तक सक्रिय हो जाने की संभावना है। इस योजना के अंतर्गत नई दिल्ली में एक नवोन्मेष केंद्र (Innovation Centre) की स्थापना की जाएगी। इस केंद्र पर कृषि नवाचारों को वैज्ञानिक वैधता प्रदान करने के साथ ही किसानों को शोध की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाएगी। वर्तमान में कृषि नवाचारों को कृषि विज्ञान केंद्रों पर अभिलिखित किया जा रहा है, प्रस्तावित तंत्र किसानों को उनके नवाचारों को आगे ले जाने के लिये प्रोत्साहित करेगा।

कृषि विज्ञान केंद्र, ग्रामीण स्तर पर कृषि में विज्ञान और तकनीकी को बढ़ावा देने के लिये भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की एक पहल है। वर्ष 1974 में तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय,कोयंबटूर के अंतर्गत पुद्दुचेरी में पहले कृषि विज्ञान केंद्र की स्थापना की गई थी। वर्तमान में भारत में लगभग 716 कृषि विज्ञान केंद्र हैं।

कृषि को विज्ञान से जोड़ना और विज्ञान आधारित कृषि को बढ़ावा देना इस योजना का प्रमुख उद्देश्य है। इस योजना के अंतर्गत कृषि क्षेत्र में तकनीकी को बढ़ावा देने के लिये किसानों और 105 स्टार्ट-अप के बीच संपर्क स्थापित करने की व्यवस्था की गई है। इसके साथ ही कृषि आय को बढ़ाने के लिये ICAR ने अलग-अलग कृषि जलवायु क्षेत्रों के अनुकूल 45 जैविक कृषि मॉडल तैयार किये हैं और 51 समायोजित कृषि तंत्रों को प्रमाणित किया है।

भंडारण की समस्या[सम्पादन]

  • भंडारण की पर्याप्त सुविधा न होने कारण भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ (National Agricultural Cooperative Marketing Federation of India- NAFED) द्वारा संग्रहीत प्याज़ का आधा स्टॉक व्यर्थ हो गया। वर्तमान में प्याज़ की भारी कमी के चलते भारत ने हज़ारों टन प्याज़ का आयात किया है।

केंद्रीय कटाई उपरांत अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (Central Institute of Post-Harvest Engineering & Technology- CIPHET) के अनुसार, भारत में कटाई के दौरान तथा कटाई उपरांत प्रमुख खाद्यान्न फसलों के कुल उत्पादन का 4.65% से 5.99% भाग व्यर्थ हो जाता है। अनाजों का अवैज्ञानिक संग्रहण एक बड़ा कारण है,जिसमें कीटों, चूहों तथा अन्य सूक्ष्म जीवों द्वारा इन खाद्यान्नों को नष्ट कर दिया जाता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, भारत में प्रतिवर्ष कटाई उपरांत होने वाले अनाज के नुकसान की मात्रा 12 से 16 मिलियन टन है।

फसलों की कटाई के उपरांत भारतीय किसानों को प्रतिवर्ष लगभग 92,651 करोड़ रुपए का नुकसान होता है जिसका मुख्य कारण कमज़ोर संग्रहण तथा यातायात व्यवस्था है।

अशोक दलवई समिति के अनुसार, भारत में अनाजों के भंडारण तथा यातायात संबंधी सुविधाओं को व्यवस्थित करने के लिये 89,375 करोड़ रुपए की आवश्यकता है जो कि प्रतिवर्ष कटाई उपरांत होने वाले नुकसान से भी कम है। वर्तमान में देश में खाद्यान्न संग्रहण क्षमता लगभग 88 मिलियन टन है।

कृषि अवसंरचना कोष[सम्पादन]

8 जुलाई, 2020 को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नई देशव्यापी केंद्रीय क्षेत्र योजना-कृषि अवसंरचना कोष (Central Sector Scheme-Agriculture Infrastructure Fund) को मंज़ूरी प्रदान की।

यह योजना ऋण अनुदान एवं वित्तीय सहायता के माध्यम से फसल कटाई के बाद बुनियादी ढाँचा प्रबंधन एवं सामुदायिक कृषि परिसंपत्तियों हेतु व्यवहारिक परियोजनाओं में निवेश के लिये मध्यम एवं दीर्घकालिक ऋण वित्तपोषण की सुविधा प्रदान करेगी। इस योजना के अंतर्गत बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों के द्वारा ऋण के रूप में एक लाख करोड़ रुपए की राशि ‘प्राथमिक कृषि साख समितियों’ (Primary Agricultural Credit Societies- PACS), विपणन सहकारी समितियों (Marketing Cooperative Societies), किसान उत्पादक संगठनों (Farmer Producers Organizations), स्वयं सहायता समूहों (Self Help Group), किसानों, संयुक्त देयता समूहों (Joint Liability Groups), बहुउद्देशीय सहकारी समितियों (Multipurpose Cooperative Societies), कृषि उद्यमियों, स्टार्ट-अप, एग्रीगेशन इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर्स (Aggregation Infrastructure Providers) और केंद्रीय/राज्य एजेंसियों या स्थानीय निकायों द्वारा प्रायोजित सार्वजनिक निजी भागीदारी परियोजनाओं को उपलब्ध कराई जाएगी। इस ऋण का वितरण आगामी 4 वर्षों में किया जाएगा। चालू वित्त वर्ष में 10,000 करोड़ रुपए और अगले क्रमशः तीन वित्तीय वर्ष में 30,000 करोड़ रुपए (अर्थात् प्रत्येक वर्ष के 30,000 करोड़ रुपए) की मंज़ूरी प्रदान की गई। इस वित्तपोषण सुविधा के तहत सभी प्रकार के ऋणों पर 2 करोड़ रुपए की सीमा तक ब्याज पर 3% प्रति वर्ष की छूट प्रदान की जाएगी। यह छूट अधिकतम 7 वर्षों के लिये उपलब्ध होगी। इसके अलावा 2 करोड़ रुपए तक के ऋण के लिये ‘क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट फॉर माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्राइजेज़’ (Credit Guarantee Fund Trust for Micro and Small Enterprises- CGTMSE) योजना के अंतर्गत इस वित्तपोषण सुविधा के माध्यम से पात्र उधारकर्त्ताओं के लिये क्रेडिट गारंटी कवरेज भी उपलब्ध होगा। इस कवरेज के लिये भारत सरकार द्वारा शुल्क का भुगतान किया जाएगा। किसान उत्पादक संगठनों के संदर्भ में कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग (Department of Agriculture, Cooperation & Farmers Welfare) की एफपीओ संवर्द्धन योजना (FPO promotion scheme) के अंतर्गत बनाई गई इस सुविधा से क्रेडिट गारंटी का लाभ प्राप्त किया जा सकता है। कृषि अवसंरचना कोष का प्रबंधन एवं निगरानी ‘ऑनलाइन प्रबंधन सूचना प्रणाली’ (Online Management Information System) प्लेटफॉर्म के माध्यम से की जाएगी। यह सभी योग्य संस्थाओं को फंड के अंतर्गत ऋण लेने के लिये आवेदन करने में सक्षम बनाएगा। यह ऑनलाइन प्लेटफॉर्म कई बैंकों द्वारा दी जाने वाली ब्याज दरों में पारदर्शिता, ब्याज अनुदान एवं क्रेडिट गारंटी सहित योजना विवरण, न्यूनतम दस्तावेज़, अनुमोदन की तीव्र प्रक्रिया के साथ-साथ अन्य योजना लाभों के साथ एकीकरण जैसे लाभ भी प्रदान करेगा। इस योजना की समय-सीमा वित्त वर्ष 2020 से वित्त वर्ष 2029 तक 10 वर्ष के लिये निर्धारित की गई है।

कृषि से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय पहल[सम्पादन]

  • यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी' तथा अन्य कुछ संस्थाओं के शोधकर्त्ता एक साथ मिलकर चावल के खेतों की 'वास्तविक-समय निगरानी मंच' के रूप में पैडी वॉच (Paddy watch) नामक एक एप (प्रथम एप) विकसित कर रहे हैं।

'गूगल अर्थ' और 'ग्रुप ऑन अर्थ ऑब्ज़र्वेशन'(GEO) के सहयोग से शुरू की गई यह परियोजना एप के विकास में भारत,चीन,मलेशिया,इंडोनेशिया और वियतनाम जैसे देश भी सहयोग कर रहे हैं।

  1. एप के माध्यम से धान की रोपाई और काटे गए धान के बारे में सटीक और नवीनतम जानकारी प्राप्त की जा सकती है। किसी फसल मौसम में चावल की फसल के अंतर्गत कितना कृषि क्षेत्र है,इसकी वास्तविक समय में निगरानी की जा सकेगी।
  2. 'गूगल अर्थ' और 'क्लाउड कंप्यूटिंग' तकनीक का उपयोग करके फसल की पैदावार और पानी की खपत का पूर्वानुमान किया जा सकेगा। संभावित उपज तथा जल उपयोग का पूर्वानुमान लगाने से ‘खाद्य सुरक्षा’ एवं ‘जल सुरक्षा’ का प्रबंधन करने में मदद मिलेगी। 'सतत विकास लक्ष्य'-2 अर्थात 'ज़ीरो हंगर' (Zero Hunger) को प्राप्त करने में मदद करेगा।
  3. धान के खेत मीथेन; जो की एक प्रमुख ग्रीनहाउस गैस है, के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। एप के माध्यम से इस ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन तथा प्रभाव की निगरानी करने में मदद मिलेगी
  4. डिजिटल कृषि (Digital Agriculture):-फसल की पैदावार और पानी की खपत का अनुमान लगाने के लिये एप द्वारा ‘डीप-लर्निंग तकनीक’ का प्रयोग किया जाएगा

पृथ्वी अवलोकन पर समूह (Group on Earth Observations- GEO) पृथ्वी अवलोकन की दिशा में कार्य करने वाला एक अद्वितीय वैश्विक नेटवर्क है, जो 100 से अधिक राष्ट्रीय सरकारों और 100 से अधिक संगठनों, संस्थानों, शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थानों, डेटा प्रदाताओं और वैज्ञानिकों को आपस में जोड़ता है। यह 'ग्लोबल अर्थ ऑब्जर्वेशन सिस्टम ऑफ सिस्टम्स ' (Global Earth Observation System of Systems- GEOSS) के निर्माण की दिशा में अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों में समन्वय करने का कार्य करता है। GEOSS एक स्वतंत्र पृथ्वी अवलोकन, सूचना और प्रसंस्करण प्रणालियों का एक समूह है जो सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में उपयोगकर्त्ताओं की व्यापक श्रेणी के लिये विविध जानकारी तक पहुँच और संपर्क प्रदान करता है।

  • 21 मई को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रथम अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस मनाया गया। इसका उद्देश्य दुनिया भर में चाय के लंबे इतिहास और गहरे सांस्कृतिक एवं आर्थिक महत्त्व के बारे में जागरूकता बढ़ाना है।

वर्ष 2015 में भारत ने मिलान (इटली) में खाद्य एवं कृषि संगठन’ (FAO) के अंतर सरकारी समूह की बैठक में 21 मई को दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव रखा था।

परिणामतः 15 दिसंबर, 2019 को संयुक्त राष्ट्र ने 21 मई को अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस के रूप घोषित किया।

अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस मनाने का संकल्प वर्ष 2019 में संयुक्त राष्ट्र के ‘खाद्य एवं कृषि संगठन’ द्वारा अपनाया गया था। वर्तमान में विश्व के 35 से अधिक देशों में चाय का उत्पादन होता है और विश्व भर में छोटे किसानों सहित इस क्षेत्र में 13 मिलियन लोग संबद्ध हैं। देश में 100 से अधिक किस्मों की खपत के साथ भारत चाय के शीर्ष चार उत्पादकों में शामिल है। चीन, भारत, केन्या और श्रीलंका के लगभग 90 लाख किसान आय के लिये चाय उत्पादन पर निर्भर हैं।

  • रोम में आयोजित इंटरनेशनल फंड फॉर एग्रीकल्चरल डेवलपमेंट(IFAD)की गवर्निंग काउंसिल की 43वीं बैठक में कृषि क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को संदर्भित किया गया। IFAD वर्ष 1977 में स्थापित संयुक्त राष्ट्र की एक विशिष्ट संस्था है। जिसका मुख्य उद्देश्य है।विकासशील राष्ट्रों में ग्रामीण क्षेत्रों की गरीबी का निवारण करना
IFAD के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण वर्ष 2030 तक लगभग 100 मिलियन लोग गरीबी से प्रभावित हो सकते हैं जिनमें से लगभग आधे लोग कृषि क्षेत्र से संबंधित होंगे। वैश्विक विकास और सरकार के प्रतिनिधियों द्वारा ग्रामीण विकास पर अधिक खर्च करने की अपील की गई,ताकि जलवायु आपातकाल से उत्पन्न होने वाली भयावह स्थिति से बचा जा सके।

कृषि से संबंधित केंद्र सरकार की पहल[सम्पादन]

PIB द्वारा प्रदत्त जानकारी के अनुसार 'मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना' के सकारात्मक परिणाम प्राप्त हो रहे हैं।[सम्पादन]

इसके दूसरे चरण में बीते दो वर्षों में कृषि मंत्रालय ने किसानों को 11.69 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड वितरित किये हैं।

केंद्र सरकार द्वारा मृदा स्वास्थ्य कार्ड वितरण के पहले चरण (वर्ष 2015 से 2017) में 10.74 करोड़ कार्ड और दुसरे चरण (वर्ष 2017-2019) में 11.69 करोड़ कार्ड वितरित किये गए हैं। इन कार्डों की सहायता से किसान अपने खेतों की मृदा के बेहतर स्वास्थ्य और उर्वरता में सुधार के लिये पोषक तत्त्वों का उचित मात्रा में उपयोग करने के साथ ही मृदा की पोषक स्थिति की जानकारी प्राप्त कर रहे हैं। राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद (National Productivity Council- NPC) द्वारा किये गए अध्ययन के अनुसार, मृदा स्वास्थ्य कार्ड पर सिफारिशों के तहत रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में 8 से 10 प्रतिशत तक की कमी आई है, साथ ही उपज में 5-6 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं की स्थापना हेतु इस योजना के तहत राज्यों के लिये अब तक 429 नई स्टेटिक लैब (Static Labs), 102 नई मोबाइल लैब (Mobile Labs), 8752 मिनी लैब (Mini Labs), 1562 ग्रामस्तरीय प्रयोगशालाओं की स्थापना और 800 मौजूदा प्रयोगशालाओं के सुदृढ़ीकरण को मंज़ूरी दी गई हैं। योजना के बारे में

19 फरवरी, 2015 को राजस्थान के श्रीगंगानगर ज़िले के सूरतगढ़ में राष्ट्रव्यापी ‘राष्ट्रीय मृदा सेहत कार्ड’ योजना का शुभारंभ किया गया। इस योजना का मुख्य उद्देश्य देश भर के किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड प्रदान किये जाने में राज्यों का सहयोग करना है। इस योजना की थीम है: स्वस्थ धरा, खेत हरा। इस योजना के अंतर्गत ग्रामीण युवा एवं किसान जिनकी आयु 40 वर्ष तक है, मृदा परीक्षण प्रयोगशाला की स्थापना एवं नमूना परीक्षण कर सकते हैं। प्रयोगशाला स्थापित करने में 5 लाख रूपए तक का खर्च आता हैं, जिसका 75 प्रतिशत केंद्र एवं राज्य सरकार वहन करती है। स्वयं सहायता समूह, कृषक सहकारी समितियाँ, कृषक समूह या कृषक उत्पादक संगठनों के लिये भी यहीं प्रावधान है। योजना के तहत मृदा की स्थिति का आकलन नियमित रूप से राज्य सरकारों द्वारा हर 2 वर्ष में किया जाता है, ताकि पोषक तत्त्वों की कमी की पहचान के साथ ही सुधार लागू हो सकें। इस योजना के लक्ष्य और उद्देश्य निम्नानुसार हैं :

देश के सभी किसानों को प्रत्येक 3 वर्ष में मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी करना, ताकि उर्वरकों के इस्तेमाल में पोषक तत्त्वों की कमियों को पूरा करने का आधार प्राप्त हो सके। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद/राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के संपर्क में क्षमता निर्माण, कृषि विज्ञान के छात्रों को शामिल करके मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं के क्रियाकलाप को सशक्त बनाना। राज्यों में मृदा नमूनों को एकीकृत करने के लिये मानकीकृत प्रक्रियाओं के साथ मृदा उर्वरता संबंधी बाधाओं का पता लगाना और विश्लेषण करना तथा विभिन्न ज़िलों में तालुका/प्रखंड स्तरीय उर्वरक संबंधी सुझाव तैयार करना। पोषक तत्त्वों का प्रभावकारी इस्तेमाल बढ़ाने के लिये विभिन्न ज़िलों में पोषण प्रबंधन आधारित मृदा परीक्षण सुविधा विकसित करना और उन्हें बढ़ावा देना। पोषक प्रबंधन परंपराओं को बढ़ावा देने के लिये ज़िला और राज्यस्तरीय कर्मचारियों के साथ-साथ प्रगतिशील किसानों का क्षमता निर्माण करना। आदर्श गाँवों का विकास नामक पायलेट प्रोजेक्ट

चालू वित्तीय वर्ष के दौरान आदर्श गाँवों का विकास नामक पायलेट प्रोजेक्ट के अंतर्गत किसानों की सहभागिता से कृषि जोत आधारित मिट्टी के नमूनों के संग्रहण और परीक्षण को बढ़ावा दिया जा रहा है। प्रोजेक्ट के कार्यान्वयन हेतु प्रत्येक कृषि जोत पर मिट्टी के नमूनों के एकत्रीकरण एवं विश्लेषण हेतु प्रत्येक ब्लॉक में एक-एक आदर्श गाँव का चयन किया गया है। इसके अंतर्गत किसानों को वर्ष 2019-20 में अब तक 13.53 लाख मृदा स्वास्थ्य कार्ड वितरित किये जा चुके हैं।

  • कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग (Department of Agriculture, Cooperation and Farmers Welfare) ने लॉकडाउन अवधि के दौरान किसानों और कृषि गतिविधियों की सुविधा के लिये कई उपायों की घोषणा की है।

विभाग द्वारा किये गए उपाय

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (National Food Security Mission-NFSM) के तहत राज्यों को बीज की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिये बीजों से संबंधित सब्सिडी 10 वर्ष की अवधि से कम वाले बीज के किस्मों के लिये होगी। साथ ही NFSM के तहत आने वाली सभी फसलों के लिये पूर्वोत्तर, जम्मू-कश्मीर और पहाड़ी क्षेत्रों में सब्सिडी वाले घटक हेतु ट्रुथ लेबल (Truthful Label) की अनुमति देने का भी निर्णय लिया गया है। 24 मार्च, 2020 से शुरू हुई लॉकडाउन अवधि के दौरान प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) योजना के तहत लगभग 8.31 करोड़ किसान परिवारों को लाभान्वित किया गया है और अब तक 16,621 करोड़ रुपए वितरित किये गए हैं। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना (PM-GKY) के तहत राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को वितरण के लिये लगभग 3,985 मीट्रिक टन दाल भेजी गई है। पंजाब में परंपरागत कृषि विकास योजना (Paramparagat Krishi Vikas Yojana-PKVY) के तहत विशेष रूप से डिज़ाइन की गई इलेक्ट्रिक वैन के माध्यम से घरों में जैविक उत्पादों (Organic Products) की डिलीवरी की जा रही है। महाराष्ट्र में 27,797 FPOs द्वारा 34 ज़िलों में ऑनलाइन तथा प्रत्यक्ष बिक्री माध्यम से 21,11,171 क्विंटल फल और सब्ज़ियाँ बेची गई हैं। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन

(National Food Security Mission-NFSM)

चावल, गेहूं और दालों के उत्पादन में बढ़ोतरी करने के लिये वित्तीय वर्ष 2007-08 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM) की शुरुआत की गई थी। इस मिशन का उद्देश्य निम्नलिखित माध्यमों से चावल, गेंहूँ और दाल के उत्पादन में वृद्धि करना है: उत्पादन क्षेत्र का विस्तार और उत्पादकता में वृद्धि मिट्टी की उर्वरता को बहाल करना रोज़गार के अवसर पैदा करना कृषि स्तर की अर्थव्यवस्था को बढ़ाना ध्यातव्य है कि मोटे अनाज को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत वर्ष 2014-15 में शामिल किया गया था। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN)

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) योजना एक केंद्रीय क्षेत्रक योजना है जिसकी शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 24 फरवरी, 2019 को लघु एवं सीमांत किसानों को आर्थिक सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी। इस योजना के तहत पात्र किसान परिवारों को प्रतिवर्ष 6,000 रुपए की दर से प्रत्यक्ष आय सहायता (Direct Income Support) उपलब्ध कराई जाती है। यह आय सहायता 2,000 रुपए की तीन समान किस्तों में लाभान्वित किसानों के बैंक खातों में प्रत्यक्ष रूप से हस्तांतरित की जाती है, ताकि संपूर्ण प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके। किसान उत्पादक संगठन (FPOs)

'किसान उत्पादक संगठनों’ का अभिप्राय किसानों, विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के समूह से होता है। इस प्रकार के संगठनों का प्रमुख उद्देश्य कृषि से संबंधित चुनौतियों के प्रभावी समाधान की खोज करना होता है। FPO प्राथमिक उत्पादकों जैसे- किसानों, दूध उत्पादकों, मछुआरों, बुनकरों और कारीगरों आदि द्वारा गठित कानूनी इकाई होती है। FPO को भारत सरकार तथा नाबार्ड जैसे संस्थानों से भी सहायता प्राप्त होती है।

  • 24 फरवरी, 2019 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में शुरू हुई महत्त्वाकांक्षी प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) योजना ने एक वर्ष पूरा कर लिया है।

प्रमुख बिंदु

इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री ने पीएम-किसान मोबाइल एप भी लॉन्च किया है। इस एप का उद्देश्य योजना की पहुँच को और अधिक व्यापक बनाना है। इस एप के माध्यम से किसान अपने भुगतान की स्थिति जान सकते हैं, साथ ही योजना से संबंधित अन्य मापदंडों के बारे में भी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। पीएम-किसान योजना की मौजूदा स्थिति

मौजूदा वित्तीय वर्ष के केंद्रीय बजट में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) योजना के लिये 75,000 करोड़ रुपए की राशि प्रदान की गई है, जिसमें से 50,850 करोड़ रुपए से अधिक की राशि जारी की जा चुकी है। आँकड़ों के अनुसार, अब तक 8.45 करोड़ से अधिक किसान परिवारों को इस योजना का लाभ पहुँचाया जा चुका है, जबकि इस योजना के तहत कवर किये जाने वाले लाभार्थियों की कुल संख्या 14 करोड़ है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री ने घोषणा की है कि पीएम-किसान योजना के सभी लाभार्थियों को किसान क्रेडिट कार्ड (Kisan Credit Card-KCC) प्रदान किया जाएगा, ताकि वे आसानी से बैंक से ऋण प्राप्त कर सकें। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) योजना एक केंद्रीय क्षेत्रक योजना है जिसकी शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 24 फरवरी, 2019 को लघु एवं सीमांत किसानों को आर्थिक सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी। इस योजना के तहत पात्र किसान परिवारों को प्रतिवर्ष 6,000 रुपए की दर से प्रत्यक्ष आय सहायता उपलब्ध कराई जाती है। यह आय सहायता 2,000 रुपए की तीन समान किस्तों में लाभान्वित किसानों के बैंक खातों में प्रत्यक्ष रूप से हस्तांतरित की जाती है, ताकि संपूर्ण प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके। आरंभ में यह योजना केवल लघु एवं सीमांत किसानों (2 हेक्टेयर से कम जोत वाले) के लिये ही शुरू की गई थी, किंतु 31 मई, 2019 को कैबिनेट द्वारा लिये गए निर्णय के उपरांत यह योजना देश भर के सभी किसानों हेतु लागू कर दी गई। इस योजना का वित्तपोषण केंद्र सरकार द्वारा किया जा रहा है। इस योजना पर अनुमानतः 75 हज़ार करोड़ रुपए का वार्षिक व्यय आएगा। योजना का उद्देश्य

इस योजना का प्राथमिक उद्देश्य देश के लघु एवं सीमांत किसानों को प्रत्यक्ष आय संबंधी सहायता प्रदान करना है। यह योजना लघु एवं सीमांत किसानों को उनकी निवेश एवं अन्य ज़रूरतों को पूरा करने के लिये आय का एक निश्चित माध्यम प्रदान करती है। योजना के माध्यम से लघु एवं सीमांत किसानों को साहूकारों तथा अनौपचारिक ऋणदाता के चंगुल से बचाने का प्रयास किया जा रहा है।

पश्चिम बंगाल अब तक इस योजना में शामिल नहीं हुआ है। आधिकारिक सूचना के अनुसार, पश्चिम बंगाल सरकार ने किसानों के डेटा को सत्यापित (Verified) नहीं किया है। अनुमानित आँकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में लगभग 70 लाख लोग योजना के लिये पात्र हैं।

पश्चिम बंगाल के कुल पात्र किसानों में से लगभग 10 लाख किसानों ने व्यक्तिगत रूप से ऑनलाइन आवेदन किया है, किंतु किसानों के संपूर्ण डेटाबेस का राज्य सरकार द्वारा सत्यापित किया जाना अभी शेष है। बिहार में लाभार्थियों की संख्या 158 लाख है, जबकि केवल 59.7 लाख किसानों का डेटा ही अपलोड किया गया है। राज्य ने लाभार्थी आवेदन के लिये अलग पद्धति अपनाई है जिसके कारण पहचान और डेटा अपलोड करने में देरी हो रही है।

  • प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ (Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana-PMFBY) और ‘पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना’ (Restructured Weather Based Crop Insurance Scheme-RWBCIS) दोनों में सुधार किये गए हैं।

फसल बीमा योजनाओं की मौजूदा सब्सिडी की प्रीमियम दर को (वर्ष 2020 के खरीफ फसल से) 50% से घटाकर सिंचित क्षेत्रों में 25% और असिंचित क्षेत्रों के लिये 30% तक कर दिया जाएगा। मौजूदा फसल ऋण वाले किसानों सहित सभी किसानों के लिये इन उपर्युक्त योजनाओं में नामांकन को स्वैच्छिक कर दिया है, जबकि 2016 में जब PMFBY योजना प्रारंभ की गई थी तब सभी फसल ऋण धारकों के लिये इस योजना के तहत बीमा कवर हेतु नामांकन करवाना अनिवार्य था। योजनाओं में अन्य बदलाव: बीमा कंपनियों इन योजनाओं में केवल तीन वर्ष तक व्यवसाय कर सकेगी। राज्यों/संघशासित राज्यों को अतिरिक्त जोखिम कवर/सुविधाओं के चयन का विकल्प प्रदान करने के साथ ही योजना को लागू करने में लचीलापन प्रदान किया जाएगा। उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिये प्रीमियम सब्सिडी दर को 90% तक बढ़ाया जाएगा। योजना के लिये आवंटित कुल राशि का कम-से-कम 3% खर्च प्रशासनिक कार्यों पर किया जाएगा।

सुधारों का संभावित प्रभाव:-सरकारी आँकड़ों के अनुसार PMFBY योजना के तहत फसल बीमा कवरेज केवल 30% है तथा इसके तहत नामांकित किसानों की इस संख्या में नवीन सुधारों के बाद और भी कमी आ सकती है। वर्तमान में केंद्र और राज्य के प्रीमियम योगदान का अनुपात 50:50 है, अत: इन सुधारों के बाद राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा।

  • भारत सरकार ने कृषि निर्यात नीति-2018 (Agri Export Policy-2018) के तहत आंध्र प्रदेश के अनंतपुर और कडप्पा ज़िलों को केला क्लस्टर के तौर पर अधिसूचित किया है। इस परिप्रेक्ष्य में हमने भारत में कृषि क्लस्टर से संबंधित सभी पक्षों का समग्रता से विश्लेषण किया है।

केला क्लस्टर से संबंधित मुख्य बिंदु: आंध्र प्रदेश सरकार, निर्यातक कंपनी तथा कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण इस पहल में एक साथ कार्य करेंगे। निर्यातक कंपनी द्वारा केला उत्पादन को बढ़ाने के लिये आंध्र प्रदेश के केला उत्पादकों को विशेषज्ञता एवं आधुनिक तकनीक प्रदान करने के साथ ही उन्हें विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जा रहा है। कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA)की स्थापना भारत सरकार द्वारा कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1985 के अंतर्गत ‘संसाधित खाद्य निर्यात प्रोत्साहन परिषद’ के स्थान पर की गई थी। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अधीन कार्यरत इस प्राधिकरण का मुख्यालय नई दिल्ली में है।

  • आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति' (Cabinet Committee on Economic Affair- CCEA) द्वारा विपणन वर्ष 2020-21 के लिये खरीफ फसलों के 'न्यूनतम समर्थन मूल्य' (Minimum Support Prices- MSPs) में वृद्धि को मंज़ूरी प्रदान की गई।

बजट 2018-19 में MSP को बढ़ाकर भारित औसत उत्पादन लागत (Cost of Production- CoP) का कम-से-कम 1.5 गुना निर्धारित करने की घोषणा की गई थी। CCEA द्वारा कृषि तथा संबद्ध गतिविधियों के 3 लाख रुपए तक के मानक अल्पकालिक ऋणों (Standard Short-Term) के पुनर्भुगतान की तारीख को 31 अगस्त, 2020 तक बढ़ा दिया गया है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP): ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ कृषि मूल्य में किसी भी प्रकार की तीव्र गिरावट के खिलाफ कृषि उत्पादकों को सुरक्षा प्रदान करने हेतु भारत सरकार द्वारा अपनाई जाने वाली बाज़ार हस्तक्षेप की एक प्रणाली है। ‘कृषि लागत और मूल्य आयोग’ की सिफारिशों के आधार पर कुछ फसलों की बुवाई के मौसम की शुरुआत में भारत सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की जाती है। अधिदिष्ट फसल (Mandated Crops): सरकार 22 अधिदिष्ट फसलों (Mandated Crops) के लिये ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ तथा गन्ने के लिये 'उचित और लाभकारी मूल्य' की घोषणा करती है। अधिदिष्ट फसलों में 14 खरीफ की फसल, 6 रबी फसल और दो अन्य वाणिज्यिक फसल शामिल हैं। सरकार इस सूची में समय-समय पर वृद्धि करती है। अधिदिष्ट फसलों के MSP में वृद्धि: धान की फसल के लिये MSP को 1,815 रुपए प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 1,868 रुपए कर दिया गया है। कपास की मध्यम रेशे वाली फसल के लिये MSP को 5,255 रुपए प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 5,515 कर दिया गया है। जबकि कपास की लंबे रेशे वाली फसल के लिये MSP को 5,550 रुपए प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 5,825 कर दिया गया है। MSP में अधिकतम वृद्धि नाइजरसीड (काला तिल) (755 रुपए प्रति क्विंटल), तिल (370 रुपए प्रति क्विंटल) तथा उड़द (300 रुपए प्रति क्विंटल) में की गई। उच्चतम प्रतिशत वृद्धि बाजरा (83%), उड़द (64%), तूर (58%) मक्का (53%) आदि में की गई है। कुछ फसलों का MSP: क्र.सं फसल संभावित लागत MSP MSP में वृद्धि लागत पर प्रतिफल (%) 1. धान 1,245 1,868 53 50 2. बाजरा 1,175 2,150 150 83 3. मक्का 1,213 1,850 90 53 4. उड़द 3,660 6,000 300 64 5. तिल 4,570 6,855 370 50 MSP निर्धारण का महत्त्व: देश में कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप फसल प्रतिरूप पद्धतियों को अपनाने के लिये किसानों को प्रोत्साहित करना। जैव विविधता का संरक्षण करते हुए सतत् कृषि प्रणालियों को अपनाना। कृषि उत्पादन को बढ़ावा देना। किसानों की आय सुरक्षा की दिशा में नीतियों को अपनाना। 'उत्पादन-केंद्रित दृष्टिकोण' (Production-Centric Approach) के स्थान पर 'आय-केंद्रित दृष्टिकोण' (Income-Focused Approach) को अपनाना। तिलहन, दलहन, मोटे अनाज जैसी फसलों के उत्पादन को बढ़ावा देकर मांग-आपूर्ति के मध्य असंतुलन में सुधार करना। क्षेत्र की भूजल स्थिति को ध्यान में रखकर विशिष्ट फसलों के उत्पादन को बढ़ावा देना। पोषण सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिये विशिष्ट फसलों जैसे मोटे अनाज की कृषि को बढ़ावा देना। MSP वृद्धि का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव:

MSP में वृद्धि के परिणामस्वरूप ‘उपभोक्ता मूल्य सूचकांक’ में वृद्धि होने की उम्मीद है। इससे लोगों को महँगाई का सामना करना पड़ सकता है। MSP में वृद्धि का देश की राजकोषीय स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि COVID-19 महामारी के कारण देश की अर्थव्यवस्था पहले ही खराब स्थिति में है।

किसानों की आय सुरक्षा की दिशा में अन्य पहल:
  • ‘प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान’ (Pradhan Mantri Annadata Aay SanraksHan Abhiyan- PM-AASHA) योजना का उद्देश्य किसानों को उनकी उपज के लिये उचित मूल्य दिलाना है, जिसकी घोषणा वर्ष 2018 के केंद्रीय बजट में की गई है। यह योजना किसानों को उनकी उपज का उचित प्रतिफल प्रदान करने में मदद करेगी।

‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि’ (PM-KISAN) योजना की शुरुआत लघु एवं सीमांत किसानों को आर्थिक सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी। COVID- 19 महामारी के तहत लगाए गए लॉकडॉउन अवधि के दौरान 'प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि' योजना के तहत लगभग 8.89 करोड़ किसान परिवारों को मई 2020 तक 17,793 करोड़ रुपए की आर्थिक सहायता प्रदान की जा चुकी है। ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना’ के तहत पात्र परिवारों को लगभग 1,07,077.85 मीट्रिक टन दाल की आपूर्ति की गई है।

  • प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में ‘आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति’ (Cabinet Committee on Economic Affairs- CCEA) ने वर्ष 2020-21 के लिये गैर-यूरिया उर्वरकों के लिये ‘पोषक तत्त्वों पर आधारित सब्सिडी’ (Nutrient Based Subsidy- NBS) दरों का निर्धारण किया है।

केंद्र सरकार ने वर्ष 2020- 21 के लिये गैर-यूरिया उर्वरक सब्सिडी में 3% की कटौती करके 22,186 करोड़ रुपये व्यय का लक्ष्य रखा है। वर्ष 2019-20 में गैर-यूरिया उर्वरक सब्सिडी की अनुमानित लागत 22,875 करोड़ रुपए थी। CCEA ने NBS योजना के तहत अमोनियम फॉस्फेट नामक मिश्रित उर्वरक को भी शामिल करने की मंज़ूरी दी। पोषक तत्त्वों पर आधारित सब्सिडी (NBS) योजना उर्वरक और रसायन मंत्रालय’ के उर्वरक विभाग द्वारा वर्ष 2010 से लागू की जा रही है। NBS नीति के तहत सरकार फॉस्फेट और पोटाश (P & K) उर्वरकों के प्रत्येक पोषक तत्त्व जैसे- नाइट्रोज़न (N), फॉस्फेट (P), पोटाश (K) और सल्फर (S) पर, सब्सिडी की एक निश्चित दर की घोषणा करती है। वर्ष 2020-21 के लिये प्रति किग्रा. सब्सिडी (रुपए में):

N (नाइट्रोजन) P (फॉस्‍फोरस) K (पोटाश) S (सल्फर) 18.789 14.888 10.116 2.374 उद्देश्य:

पर्याप्त मात्रा में P & K उपलब्धता। कृषि में उर्वरकों का संतुलित उपयोग सुनिश्चित करना। स्वदेशी उर्वरक उद्योग के विकास को बढ़ावा देना। सब्सिडी के बोझ को कम करना। गैर-यूरिया उर्वरक सब्सिडी का निर्धारण:

वार्षिक आधार पर सब्सिडी निर्धारित करते समय अंतर्राष्ट्रीय मूल्य, विनिमय दर, अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में गैस की कीमत सहित सभी प्रासंगिक कारकों को ध्यान में रखा जाता है। इस योजना के तहत किसानों को सस्ती कीमत पर फॉस्फेट और पोटाश उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिये की गई थी। उर्वरक कंपनियों को उपर्युक्त दरों के अनुसार सब्सिडी जारी की जाएगी, ताकि वे किसानों को सस्ते दामों पर उपलब्ध करा सके। NBS नीति के तहत कंपनियों को उर्वरकों की ‘अधिकतम खुदरा मूल्य’ (Maximum Retail Price- MRP) तय करने की अनुमति है। यूरिया के संबंध में सरकार की नीति:

यूरिया के संबंध में किसानों को वैधानिक रूप से अधिसूचित ‘अधिकतम खुदरा मूल्य’ (Maximum Retail Price- MRP) पर यूरिया उपलब्ध कराया जा रहा है। सरकार द्वारा यूरिया निर्माता/आयातक को; यूरिया इकाइयों द्वारा किसानों या फार्म गेट तक उर्वरक उपलब्ध कराने की लागत तथा MRP के बीच के मूल्य अंतर सब्सिडी के रूप में दी जाती है। लाभ:

यह उर्वरक निर्माताओं तथा आयातकों को आपूर्ति संबंधी अनुबंधों को पूरा करने में मदद करेगा तथा इससे वर्ष 2020-21 के लिये उर्वरक उपलब्धता सुनिश्चित हो सकेगी। निष्कर्ष:

NBS को शुरू करने के पीछे का उद्देश्य उर्वरक कंपनियों के बीच उचित मूल्य पर बाज़ार में विविध उत्पादों की उपलब्धता के लिये प्रतिस्पर्द्धा बढ़ाना था। हालांकि P & K उर्वरकों की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है। खाद्य, उर्वरक और ईंधन सब्सिडी बिल (करोड़ रुपए में):

खाद्य उर्वरक ईंधन कुल 1,15,569.68 71,309 40,915.21 2,27,793.89

कृषि से संबंधित राज्य सरकार तथा गैर सरकारी संगठनों की पहल[सम्पादन]

  • 6 अगस्त, 2020 को रॉकफेलर फाउंडेशन (Rockefeller Foundation) ने न्यूयॉर्क (संयुक्त राज्य अमेरिका) में घोषित फूड सिस्टम विज़न 2050 पुरस्कार (Food System Vision 2050 Prize) के लिये दुनिया के टॉप 10 विज़नरीज़ में से एक के रूप में हैदराबाद स्थित गैर-लाभकारी संगठन नंदी फाउंडेशन (Naandi Foundation) को चुना है।

इस पुरस्कार के रूप में नंदी फाउंडेशन को 200,000 डॉलर की पुरस्कार राशि प्रदान की गई है। नंदी फाउंडेशन को यह पुरस्कार अराकु, वर्धा और नई दिल्ली के क्षेत्रों में ‘अराकुनोमिक्स’ (Arakunomics) मॉडल की सफलता के कारण प्रदान किया गया है। नंदी फाउंडेशन पिछले लगभग 20 वर्षों से ‘अराकुनोमिक्स’ (Arakunomics) मॉडल के आधार पर अराकु (हैदराबाद) में आदिवासी किसानों के साथ कार्य कर रहा है।

‘अराकुनोमिक्स’ (Arakunomics) मॉडल एक नया एकीकृत आर्थिक मॉडल है जो पुनर्योजी कृषि (Regenerative Agriculture) के माध्यम से किसानों के लिये लाभ और उपभोक्ताओं के लिये गुणवत्ता सुनिश्चित करता है। इस आर्थिक मॉडल के आधार पर अराकु के आदिवासी किसानों ने अराकु क्षेत्र में विश्व स्तरीय काॅफी का उत्पादन किया जिसे वर्ष 2017 में पेरिस (फ्राॅन्स) में लॉन्च किया गया था। साथ ही अराकु के आदिवासी किसानों ने कार्बन अवशोषण के लिये 955 से अधिक गाँवों में 25 मिलियन पेड़ लगाए हैं।

अराकु में अराकुनोमिक्स की सफलता से प्रेरित होकर वर्धा के कृषि समुदायों ने और साथ ही नई दिल्ली में एक शहरी फार्म सह कार्यक्रम में इस मॉडल को अपनाया गया है। नंदी फाउंडेशन को सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट के रूप में 1 नवंबर, 1998 को स्थापित किया गया था। यह भारत में 19 राज्यों में कार्य करता है और अब तक 7 मिलियन लोगों को लाभान्वित कर चुका है।

  • भारत में केसर और हींग का उत्पादन बढ़ाने के लिये हिमाचल प्रदेश के पालमपुर स्थित ‘हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान’ (Institute of Himalayan Bioresource Technology-IHBT) और हिमाचल प्रदेश के ‘कृषि विभाग’ के मध्य साझेदारी की गई है। इसके तहत ‘हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान (IHBT) किसानों को तकनीकी जानकारी मुहैया कराने के साथ-साथ राज्य कृषि विभाग के अधिकारियों एवं किसानों को प्रशिक्षित भी करेगा। केसर और हींग को विश्व के सबसे मूल्यवान मसालों में गिना जाता है। भारत में सदियों से हींग और केसर का व्यापक रूप से उपयोग किया जा रहा है, किंतु इसके बावजूद देश में इन दोनों ही मसालों का उत्पादन काफी सीमित है। भारत में, केसर की वार्षिक माँग करीब 100 टन है, किंतु हमारे देश में इसका औसत उत्पादन लगभग 6-7 टन ही संभव हो पाता है, जिसके कारण प्रत्येक वर्ष बड़ी मात्रा में केसर का आयात करना पड़ता है। इसी प्रकार, भारत में हींग उत्पादन भी काफी सीमित है, किंतु इसके बावजूद भारत में प्रत्येक वर्ष विश्व में हींग के कुल उत्पादन के 40 प्रतिशत की खपत होती है, भारत अपनी इस आवश्यकता को पूरा करने के लिये प्रत्येक वर्ष लगभग 600 करोड़ रुपए मूल्य की तकरीबन 1200 मीट्रिक टन कच्ची हींग अफगानिस्तान, ईरान और उज्बेकिस्तान जैसे देशों से आयात करता है। इस साझेदारी के माध्यम से भारत की आयात निर्भरता में कमी की जा सकेगी। साथ ही यह हिमाचल प्रदेश में कृषि आय बढ़ाने, आजीविका में वृद्धि तथा ग्रामीण विकास के उद्देश्य को पूरा करने में सहायक सिद्ध होगी।
  • तमिलनाडु के मुख्यमंत्री द्वारा 9 फरवरी को किए गए घोषणा के अनुसार कावेरी डेल्टा क्षेत्र को संरक्षित विशेष कृषि क्षेत्र(Protected Special Agriculture Zone-PSAZ)के रूप में घोषित किया जाएगा।

इसके तहत कावेरी नदी के डेल्टा क्षेत्र में हाइड्रोकार्बन अन्वेषण जैसी परियोजनाओं के लिये मंज़ूरी प्रदान नहीं की जाएगी। केंद्र सरकार यहाँ कोई भी परियोजना शुरू कर सकती है परंतु राज्य सरकार के अनुमति पत्र के बिना उसे लागू नहीं किया जा सकेगा।

लाभ
  1. डेल्टाई क्षेत्रों की रक्षा और किसानों की समस्याओं को दूर करने के लिये कावेरी डेल्टाई क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ज़िलों जैसे-तंजावुर,तिरुवूर,नागप्पट्टिनम,पुदुकोट्टई,कुड्डलोर,अरियालुर और त्रिची के डेल्टाई क्षेत्रों को PSAZ के तौर पर शामिल किया जाएगा।
  2. राज्य की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी।
  3. खाद्य और पारिस्थितिक सुरक्षा के भविष्य को सुनिश्चित करने के लिये महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इससे खाद्य उत्पादकता में वृद्धि होगी।
  4. पेट्रोकेमिकल और हाइड्रोकार्बन से संबंधित उद्योग,जो पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं,पर रोक लगाए जाने से पर्यावरण की सुरक्षा होगी।

कृषि क्षेत्रक संबंधित विधेयक[सम्पादन]

  • कृषि से संबंधित विषय की संवैधानिक स्थिति

संविधान में कृषि को राज्य सूची (सूची II) के विषय के रूप में संदर्भित किया गया है। कृषि व उससे संबंधित विषय को राज्य सूची की (सूची II) प्रविष्टि 14 में सूचीबद्ध किया गया है। राज्य सूची की (सूची II) प्रविष्टि 26 ‘राज्य के भीतर व्यापार एवं वाणिज्य’ को संदर्भित करता है। राज्य सूची की (सूची II) प्रविष्टि 27 ‘माल के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण’ को संदर्भित करती है तो वहीं प्रविष्टि 28 ‘बाज़ार और मंडियों’ को संदर्भित करती है।

केंद्र के पास कृषि से संबंधित कानून बनाने का आधार

केंद्र सरकार ने समवर्ती सूची (सूची III) की प्रविष्टि 33 के आधार पर कृषि से संबंधित विषय पर कानून बनाया था। राज्य सूची की (सूची II) प्रविष्टि 26 और 27 को समवर्ती सूची (सूची III) की प्रविष्टि 33 के प्रावधानों के अधीन सूचीबद्ध किया गया है। समवर्ती सूची की प्रविष्टि-33 जहाँ एक ओर कृषि विषयों पर राज्यों की शक्ति को सीमित करती है वहीं दूसरी ओर केंद्र को यह अधिकार देते हुए शक्तिमय बनाती है कि वह कृषि उत्पादन, कृषि-व्यापार, खाद्यान्न वितरण और कृषि उत्पाद संबंधी मामलों पर विधि बना सकती है। केंद्र सरकार, समय-समय पर राज्य सरकारों को ऐसे निर्देश दे सकती है जिन्हें वह इस अधिनियम के प्रावधानों को प्रभावी ढंग से अमल में लाने के लिये आवश्यक समझती है, राज्यों को इन निर्देशों का पालन करना अनिवार्य होगा।

  • गुजरात में राज्य-संचालित कृषि उपज बाज़ार समितियों (Agricultural Produce Market Committees-APMCs) के ‘एकाधिकार’ को समाप्त करते हुए राज्य सरकार ने गुजरात कृषि उपज बाज़ार (संशोधन) अध्यादेश, 2020 को मंज़ूरी दे दी है। इस अध्यादेश के माध्यम से निजी संस्थाओं को अपनी बाज़ार समितियाँ स्थापित करने की अनुमति प्राप्त होगी, जो किसानों को उनकी उपज के लिये सर्वोत्तम संभव पारिश्रमिक पेश कर सकेंगी।

यह अध्यादेश बाज़ार समितियों के अधिकार क्षेत्र को उनकी भौतिक सीमाओं तक सीमित करता है। अब तक एक विशेष तालुका के किसानों को अपनी उपज को अपने संबंधित APMCs को ही बेचना पड़ता था। यहाँ तक ​​कि व्यापारी भी अपने स्वयं के तालुकों तक ही सीमित थे। APMCs द्वारा अपने क्षेत्राधिकार और उससे बाहर होने वाले सभी लेन-देन पर उपकर लगाया जाता था गत वित्तीय वर्ष में गुजरात के 24 APMCs ने मिलकर 35,000 करोड़ रुपए का लेनदेन किया और लेनदेन पर उपकर (0.5 प्रतिशत लेनदेन) के रूप में 350 करोड़ रुपए कमाए थे। उपकर के माध्यम से अर्जित किया गया अधिकांश लाभ ऐसे लेन-देनों से प्राप्त हुआ था, जो APMCs की भौतिक सीमा से बाहर किये गए थे। नए नियमों के अनुसार, अब APMCs केवल उन लेन-देनों पर उपकर लगा सकती हैं जो उनकी सीमाओं के भीतर होते हैं। नियमों के अनुसार, किसी भी निजी संस्था के स्वामित्त्व वाले कोल्ड स्टोरेज या गोदाम को निजी बाज़ार में परिवर्तित किया जा सकता है, जो कि मौजूदा APMCs के साथ प्रतिस्पर्द्धा कर सकते हैं और किसानों को सर्वोत्तम मूल्य प्रदान कर सकते हैं। इस अध्यादेश के तहत व्यापारियों को एक ‘एकीकृत एकल व्यापार लाइसेंस’ (Unified Single Trading Licence) भी प्रदान करने की व्यवस्था की गई है, जिसके माध्यम से वे राज्य में कहीं भी व्यापारिक गतिविधियों में भाग ले सकते हैं। महत्त्व

उल्लेखनीय है कि कई किसान निकायों ने राज्य के इस निर्णय का स्वागत किया है, क्योंकि इससे किसानों को उनकी उपज की गुणवत्ता के आधार पर उचित मूल्य प्राप्त करने में सहायता मिलेगी। अध्यादेश के माध्यम से जो आमूलचूल परिवर्तन किये गए हैं, वे न केवल APMCs को अधिक प्रतिस्पर्द्धी बनाएंगे, बल्कि राज्य संचालित APMCs के एकाधिकार को समाप्त करके एक बड़ा परिवर्तन लाएंगे। अब किसानों को केवल एक विशेष APMCs को अपना माल बेचने के लिये बाध्य नहीं होना पड़ेगा, जिससे किसानों को अपनी उपज का सही मूल्य प्राप्त हो सकेगा। यह अध्यादेश राज्य में APMCs के एकाधिकार को समाप्त कर देगा जो एक संघ बनाकर यह तय करते थे कि किसानों को उपज की क्या कीमतें प्रदान की जाए।

कृषि उपज बाज़ार समिति (Agricultural Produce Market Committees-APMCs) एक राज्य सरकार द्वारा गठित एक वैधानिक बाज़ार समिति होती है, जिसे कुछ अधिसूचित कृषि, बागवानी अथवा पशुधन उत्पादों में व्यापार के संबंध में गठित किया जाता है। भारतीय संविधान के तहत कृषि विपणन राज्य सूची का विषय है। इसीलिये कृषि बाज़ार अधिकांशतः राज्य APMC अधिनियमों के तहत स्थापित और विनियमित किये जाते हैं। इसीलिये कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अपने-अपने कानून अधिनियमित किये हुए हैं।

APMCs के प्रमुख कार्य मूल्य निर्धारण प्रणाली और बाज़ार क्षेत्र में होने वाले लेन-देन में पारदर्शिता सुनिश्चित करना; यह सुनिश्चित करना कि किसानों को उनकी उपज का भुगतान उसी दिन प्राप्त हो; कृषि प्रसंस्करण को बढ़ावा देना; बिक्री के लिये बाज़ार क्षेत्र में लाए गए कृषि उपज और उनकी दरों पर से संबंधित आँकड़ों को सार्वजनिक करना; कृषि बाजारों के प्रबंधन में सार्वजनिक निजी भागीदारी को बढ़ावा देना

केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा कीटनाशक प्रबंधन विधेयक,2020 को मंज़ूरी[सम्पादन]

वर्तमान समय में कीटनाशक व्यवसाय को कीटनाशक अधिनियम,1968 के नियमों द्वारा विनियमित किया जाता है। यह कानून अत्यंत पुराना हो गया है और इसमें तत्काल संशोधन की आवश्यकता है। कीटनाशक विधेयक, 2020 के मुख्य बिंदु

  1. कीटनाशक से संबंधित डेटा:- यह कीटनाशकों की ताकत और कमज़ोरी,जोखिम और विकल्पों के बारे में सभी प्रकार की जानकारी प्रदान करके किसानों को सशक्त करेगा। सभी जानकारियाँ डिजिटल प्रारूप में और सभी भाषाओं में डेटा के रूप में खुले तौर पर उपलब्ध होंगी।
  2. मुआवज़ा:-यह विधेयक नकली कीटनाशकों के प्रयोग से होने वाले नुकसान के संदर्भ में क्षतिपूर्ति का प्रावधान करता है। यह प्रावधान इस विधेयक का सबसे महत्त्वपूर्ण बिंदु है। यदि आवश्यक हुआ तो क्षतिपूर्ति के लिये एक केंद्रीय कोष भी बनाया जाएगा।
  3. कीटनाशक निर्माताओं का पंजीकरण:- इस विधेयक के पारित होने के बाद सभी कीटनाशक निर्माता नए अधिनियम के तहत पंजीकरण हेतु बाध्य होंगे। कीटनाशकों संबंधी विज्ञापनों को विनियमित किया जाएगा ताकि निर्माताओं द्वारा कोई भ्रम न फैलाया जा सके।
  4. यह विधेयक जैविक कीटनाशकों के निर्माण एवं उपयोग को भी बढ़ावा देता है।
भारत में कीटनाशकों का उपयोग:

एशिया में भारत कीटनाशकों के उत्पादन में अग्रणी है। घरेलू बाज़ार में महाराष्ट्र,उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा सबसे अधिक कीटनाशक खपत वाले राज्यों में शामिल हैं।

कीटनाशक अधिनियम,1968
  1. यह अधिनियम मनुष्यों और जानवरों के लिये जोखिम को रोकने के लिये कीटनाशकों के आयात,निर्माण,बिक्री,परिवहन,वितरण और उपयोग को विनियमित करने के दृष्टिकोण के साथ अगस्त, 1971 से लागू किया गया था।
  2. केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड इस अधिनियम की धारा 4 के तहत स्थापित किया गया था और यह कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के तहत काम करता है।
  3. यह बोर्ड केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को अधिनियम के प्रशासन में उत्पन्न तकनीकी मामलों और उसे सौंपे गए अन्य कार्यों को करने की सलाह देता है।

PIB के अनुसार,'मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना' के सकारात्मक परिणाम प्राप्त[सम्पादन]

  • उर्वरकों के उपयोग से मृदा में उपस्थित पोषक तत्त्वों में होने वाली कमी दूर करने के उद्देश्य से
  • राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद के अध्ययन के अनुसार,मृदा स्वास्थ्य कार्ड पर सिफारिशों के तहत रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में 8 से 10 प्रतिशत तक की कमी तथा उपज में 5-6 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है।
  • 19 फरवरी,2015 को राजस्थान के श्रीगंगानगर ज़िले के सूरतगढ़ में राष्ट्रव्यापी ‘राष्ट्रीय मृदा सेहत कार्ड’ योजना का शुभारंभ किया गया।
  • उद्देश्य देश भर के किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड प्रदान किये जाने में राज्यों का सहयोग करना है।
  • इस योजना की थीम है: स्वस्थ धरा, खेत हरा।
  • इस योजना के अंतर्गत ग्रामीण युवा एवं किसान जिनकी आयु 40 वर्ष तक है, मृदा परीक्षण प्रयोगशाला की स्थापना एवं नमूना परीक्षण कर सकते हैं।
  • प्रयोगशाला स्थापित करने में 5 लाख रूपए तक का खर्च आता हैं,जिसका 75 प्रतिशत केंद्र एवं राज्य सरकार वहन करती है। स्वयं सहायता समूह, कृषक सहकारी समितियाँ, कृषक समूह या कृषक उत्पादक संगठनों के लिये भी यहीं प्रावधान है।
  • योजना के तहत मृदा की स्थिति का आकलन नियमित रूप से राज्य सरकारों द्वारा हर 2 वर्ष में किया जाता है, ताकि पोषक तत्त्वों की कमी की पहचान के साथ ही सुधार लागू हो सकें।

योजना के लक्ष्य और उद्देश्य देश के सभी किसानों को प्रत्येक 3 वर्ष में मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी करना,ताकि उर्वरकों के इस्तेमाल में पोषक तत्त्वों की कमियों को पूरा करने का आधार प्राप्त हो सके। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद/राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के संपर्क में क्षमता निर्माण,कृषि विज्ञान के छात्रों को शामिल करके मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं के क्रियाकलाप को सशक्त बनाना। राज्यों में मृदा नमूनों को एकीकृत करने के लिये मानकीकृत प्रक्रियाओं के साथ मृदा उर्वरता संबंधी बाधाओं का पता लगाना और विश्लेषण करना तथा विभिन्न ज़िलों में तालुका/प्रखंड स्तरीय उर्वरक संबंधी सुझाव तैयार करना। पोषक तत्त्वों का प्रभावकारी इस्तेमाल बढ़ाने के लिये विभिन्न ज़िलों में पोषण प्रबंधन आधारित मृदा परीक्षण सुविधा विकसित करना और उन्हें बढ़ावा देना। पोषक प्रबंधन परंपराओं को बढ़ावा देने के लिये ज़िला और राज्यस्तरीय कर्मचारियों के साथ-साथ प्रगतिशील किसानों का क्षमता निर्माण करना। आदर्श गाँवों का विकास नामक पायलेट प्रोजेक्ट

  1. चालू वित्तीय वर्ष के दौरान इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत किसानों की सहभागिता से कृषि जोत आधारित मिट्टी के नमूनों के संग्रहण और परीक्षण को बढ़ावा दिया जा रहा है।
  2. प्रोजेक्ट के कार्यान्वयन हेतु प्रत्येक कृषि जोत पर मिट्टी के नमूनों के एकत्रीकरण एवं विश्लेषण हेतु प्रत्येक ब्लॉक में एक-एक आदर्श गाँव का चयन किया गया है। इसके अंतर्गत किसानों को वर्ष 2019-20 में अब तक 13.53 लाख मृदा स्वास्थ्य कार्ड वितरित किये जा चुके हैं।

केंद्र सरकार ने ड्रोन का प्रयोग कर फसलों पर रासायनिक छिड़काव करने की प्रक्रिया को अवैध बताया[सम्पादन]

कीटनाशी अधिनियम 1968 के प्रावधानों के अनुसार,कीटनाशकों के हवाई छिड़काव के लिये केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड के अनुमति की आवश्यकता होती है।

  • ड्रोन द्वारा हवाई छिड़काव कीटनाशकों की प्रभावकारिता को कम करते हुए एक बड़े क्षेत्र को विपरीत रूप से प्रभावित करता है।
  • याचिकाकर्त्ता ने कहा कि केरल के कासरगोड में 25 वर्ष से अधिक समय से एंडोसल्फान रसायन के ड्रोन द्वारा हवाई छिड़काव के कारण इस तरह के प्रभावों को देखा गया है।
  • किसानों या अन्य स्प्रेयर द्वारा प्रतिकूल मौसम और हवा की स्थिति को ध्यान में रखे बिना तथा सुरक्षा सावधानियों का पालन किये बिना छिड़काव किया जाता है।
  • अधिक मात्रा में छिड़काव खतरनाक रसायनों को उनकी अधिकतम निर्धारित सीमा से बाहर ले जा सकता है जो कि पर्यावरण तथा कृषि भूमि के लिये हानिकारक सिद्ध हो सकता है।
  • याचिकाकर्त्ता ने कहा कि अभी तक यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं हो पाया है कि कि ड्रोन सटीक छिड़काव में सहायता करते हैं।
  • ड्रोन और मानवरहित मशीनें कई तरह से खतरनाक रसायनों के छिड़काव के लिये हानिकारक उपकरण सिद्ध हो सकते हैं।
  • कीटनाशी अधिनियम,1968 भी फसलों में हवाई छिड़काव की अनुमति नहीं देता है।
  • ड्रोन निर्माताओं,आपूर्तिकर्त्ताओं को कृषि रसायनों के हवाई छिड़काव के लिये ड्रोन का उपयोग करने से बचना होगा।

केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड[सम्पादन]

  1. इसकी स्थापना कीटनाशी अधिनियम, 1968 की धारा 4 के तहत की गई है।
  2. इस बोर्ड द्वारा किये जाने वाले कार्य निम्नलिखित हैं-
  3. उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 के तहत कीटनाशकों के निर्माण के संदर्भ में केंद्र सरकार को सलाह देना।
  4. विषाक्तता के आधार पर कीटनाशकों का वर्गीकरण करते हुए उनके हवाई अनुप्रयोग के लिये उपयुक्त होने का उल्लेख करना।
  5. फसलों की कीटनाशकों के प्रति सहिष्णुता सीमा और कीटनाशकों के छिड़काव के बीच न्यूनतम अंतराल के संबंध में जानकारी देना।
  6. कीटनाशकों की जीवन के संदर्भ में प्रभावकारिता को निर्दिष्ट करना।
  7. अत्यधिक विषाक्त प्रकृति के कीटनाशकों में उचित सांद्रता के साथ मिश्रित रंगों का निर्धारण करना।
  8. ऐसे अन्य कार्यों को करना जो अधिनियम या नियमों द्वारा प्रदत्त किसी भी कार्य के पूरक,आकस्मिक या परिणामी प्रवृत्ति के हैं।

कपास उद्योग और बीटी-कपास[सम्पादन]

भारत में कपास उत्पादन का इतिहास भारत में ब्रिटिशों के आगमन से पूर्व कपास की विभिन्न किस्में स्वदेशी रूप से देश के विभिन्न भागों में उगाई जाती थीं, जिनमें से प्रत्येक किस्म स्थानीय मिट्टी, पानी और जलवायु के अनुकूल थी। अंग्रेज़ों ने भारत में उगाई जाने वाली कपास की किस्मों को निम्न स्तर का मानकर अमेरिका स्थित मिलों की आवश्यकता के अनुरूप वर्ष 1797 में बॉर्बन कपास के उत्पादन की शुरुआत की। बॉर्बन कपास ने कपास की उन किस्मों की उपेक्षा की जो कीट प्रतिरोधी और मौसम की अनियमितता से लड़ने में समर्थ थे, परिणामस्वरूप पारंपरिक बीज चयन, कपास की खेती का प्रबंधन और खेती के तरीके प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुए। कपास की नई किस्में लाभदायक तो थीं, किंतु मौसम और कीट जैसी समस्याओं से निपटने में सक्षम नहीं थीं। आज़ादी के बाद भी इसका उत्पादन जारी रहा। कीटों की समस्या को दूर करने के लिये काफी अधिक मात्रा में कीटनाशक का इस्तेमाल किया जा रहा था। अंततः इस समस्या को नियंत्रित करने के लिये सरकार ने वर्ष 2002 में बीटी-कपास की शुरुआत की।

बीटी (BT)
  1. बेसिलस थुरिनजेनेसिस (Bacillus Thuringiensis-BT) एक जीवाणु है जो प्राकृतिक रूप से क्रिस्टल प्रोटीन उत्पन्न करता है। यह प्रोटीन कीटों के लिये हानिकारक होता है।
  2. इसके नाम पर ही बीटी फसलों का नाम रखा गया है। बीटी फसलें ऐसी फसलें होती हैं जो बेसिलस थुरिनजेनेसिस (BT)नामक जीवाणु के समान ही विषाक्त पदार्थ को उत्पन्न करती हैं ताकि फसल का कीटों से बचाव किया जा सके।

बीटी कपास और भारत का कपास उद्योग[सम्पादन]

  1. वर्ष 2002 से 2008 के मध्य बीटी-कपास का उत्पादन करने वाले किसानों पर किये गए एक अध्ययन में निम्नलिखित तथ्य सामने आए थे:
  2. बीटी-कपास की उपज में पारंपरिक कपास की तुलना में 24 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसके परिणामस्वरूप मुनाफे में 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
  3. वर्ष 2006-08 के दौरान बीटी कपास को अपनाने वाले किसान परिवारों ने पारंपरिक खेती करने वाले परिवारों की अपेक्षा उपभोग पर 18 प्रतिशत अधिक खर्च किया, जिससे जीवन स्तर में सुधार के संकेत मिलते हैं। कीटों से होने वाले नुकसान को कम करने से किसानों को फायदा हुआ है।
  4. बीटी कपास के उपयोग के साथ कीटनाशकों के प्रयोग में भी कमी आई है।
  5. बीटी कपास की शुरुआत ने कपास उत्पादक राज्यों के उत्पादन में काफी वृद्धि की और जल्द ही बीटी कपास ने कपास की खेती के तहत अधिकांश ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया।
  6. आँकड़ों के मुताबिक जहाँ एक ओर वर्ष 2001-02 में कपास उत्पादन 14 मिलियन बेल्स (Bales) था, वहीं 2014-15 में यह 180 प्रतिशत बढ़कर 39 मिलियन बेल्स हो गया।
  7. साथ ही भारत के कपास आयात में गिरावट आई और निर्यात में बढ़ोतरी हुई।
  8. हालाँकि, भारत की उत्पादकता प्रति इकाई क्षेत्र में उपज के मामले में अन्य प्रमुख कपास उत्पादक देशों की तुलना में काफी कम है, जिसका अर्थ है कि भारत में कपास उत्पादन के लिये अन्य देशों की अपेक्षा बहुत बड़े क्षेत्र का उपयोग किया जाता है।
हाइब्रिड कपास नीति
भारत एकमात्र ऐसा देश है जो हाइब्रिड के रूप में कपास का उत्पादन करता है। हाइब्रिड्स को अलग-अलग आनुवंशिक गुणों वाले दो मूल उपभेदों के संगम से बनाया जाता है।

देश में बीटी कपास हाइब्रिड के वाणिज्यिक प्रयोग को सरकार द्वारा वर्ष 2002 में मंज़ूरी दी गई थी। इस प्रकार के पौधों में मूल उपभेदों की अपेक्षा अधिक पैदावार की क्षमता होती है। हाइब्रिड्स को उत्पादन के लिये उर्वरक तथा पानी की काफी अधिक आवश्यकता होती है। भारत के अतिरिक्त कपास का उत्पादन करने वाले अन्य सभी देश कपास के हाइब्रिड रूप का उत्पादन नहीं करते,बल्कि वे उन किस्मों का प्रयोग करते हैं जिनके लिये बीज स्व-निषेचन द्वारा उत्पादित किये जाते हैं।

  1. हाइब्रिड कपास नीति का भारतीय किसानों पर प्रभाव
  2. हाइब्रिड बीजों के माध्यम से उत्पादन करने के लिये किसानों को हर बार नया बीज खरीदना पड़ता है,इसलिये यह किसानों को आर्थिक रूप से काफी प्रभावित करता है।
  3. हाइब्रिड बीजों का उत्पादन केवल कंपनियों द्वारा ही किया जाता है,जिसके कारण मूल्य निर्धारित की शक्ति भी उन्ही के पास होती है, परिणामस्वरूप कीमतों पर नियंत्रण करना मुश्किल हो जाता है।
  4. राज्यसभा की 301वीं समिति की रिपोर्ट के अनुसार,कीटनाशकों के उपयोग से मूल्य और मात्रा दोनों में काफी वृद्धि हुई है।
  5. किसानों को बीटी कपास के बीज के लिये पारंपरिक बीजों की कीमत का लगभग तीन गुना भुगतान करने के लिये मजबूर किया गया,जिससे उनकी ऋणग्रस्तता और उपज पर निर्भरता काफी अधिक बढ़ गई।
  6. ऋणग्रस्तता में वृद्धि से किसानों की आत्महत्या दर में वृद्धि हुई।
  • महाराष्ट्र की कृषि व्यवसाय और ग्रामीण परिवर्तन परियोजना

Maharashtra’s Agribusiness and Rural Transformation Project हाल ही में केंद्र सरकार, महाराष्ट्र सरकार और विश्व बैंक (World Bank) ने महाराष्ट्र के छोटे किसानों को प्रतिस्पर्द्धी कृषि मूल्य शृंखलाओं में भाग लेने, कृषि-व्यवसाय में निवेश की सुविधा, बाज़ार तक पहुँच एवं उत्पादकता बढ़ाने के लिये और बाढ़ या सूखे की पुनरावृत्ति से फसलों को बचाने के लिये 210 मिलियन डॉलर के ऋण समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं।

मुख्य बिंदु: यह सतत् कृषि के माध्यम से राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बदलने और किसानों के सशक्तीकरण के माध्यम से उन्हें सीधे बाज़ारों से जोड़कर राज्य के कृषि निर्यात को दोगुना करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। यह परियोजना जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना (2008) के अनुरूप है। महाराष्ट्र की कृषि व्यवसाय और ग्रामीण परिवर्तन परियोजना से निम्नलिखित मदद मिलेगी- राज्य में जलवायु अनुकूल उत्पादन तकनीकों को अपनाने में। कृषि मूल्य शृंखलाओं में निजी क्षेत्र के निवेश को बढ़ाने में। उभरते घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुँचने के लिये उत्पादकों एवं उद्यमियों द्वारा बताई गई बाधाओं को दूर करने में। बाज़ारों में वस्तुओं के मूल्य में होने वाले उतार-चढ़ाव के बारे में समय पर सूचना प्रदान करने के लिये राज्य में सूचना तंत्र को विकसित करने में। महिला किसानों एवं महिला उद्यमियों पर विशेष ध्यान: इस परियोजना से संबंधित गतिविधियों में भाग लेने वालों में लगभग 43% महिला किसान एवं महिला खेतिहर मज़दूर शामिल हैं। इस परियोजना के माध्यम से किसान उत्पादक संगठनों में निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में महिलाओं की भागीदारी एवं महिलाओं के नेतृत्व वाले उद्यमों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय द्वारा हिंदुस्तान उर्वरक एवं रसायन लिमिटेड(HURL) का लोगो और सूत्र वाक्य‘अपना यूरिया सोना उगले’जारी किया गया[सम्पादन]

  • केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय ने जैविक सामग्री और सूक्ष्म पोषक तत्त्वों सहित उर्वरकों के संतुलित उपयोग पर ज़ोर दिया है।

HURL तथा यूरिया उत्पादन:

  • देश को यूरिया उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से सरकार ने वर्ष 2016 में गोरखपुर, सिंदरी और बरौनी में स्थित तीन रुग्ण यूरिया संयंत्रों के पुनरुद्धार की स्वीकृति दी।
  • इन तीनों रुग्ण यूरिया संयंत्रों के पुनरुद्धार का कार्य HURL द्वारा किया जा रहा है।
  • भारत के प्रधान मंत्री द्वारा कुल पाँच प्रमुख रुग्ण/बंद उर्वरक संयंत्रों का पुनरुद्धार किये जाने की बात कही गई थी जिनमें से तीन इकाइयों (गोरखपुर, सिंदरी और बरौनी) का पुनरुद्धार HURL द्वारा किया जा रहा है।
  • बाकी दो इकाइयों-रामागुंडम(तेलंगाना) और तालचर (ओडिशा) में भी जल्द परिचालन प्रारंभ होने की उम्मीद है।

रुग्ण इकाइयों का पुनरुद्धार:

  • वर्ष 2021 में तीन बंद इकाइयों में परिचालन प्रारंभ होने की संभावना के कारण यूरिया बाज़ार में HURL को एक प्रमुख उभरते हुए केंद्र के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि इन इकाइयों में प्रतिवर्ष नीम कोटेड यूरिया (Neem Coated Urea) की कुल स्थापित उत्पादन क्षमता 38.1 लाख मीट्रिक टन है।
  • HURL इन तीन स्थानों पर अत्याधुनिक, पर्यावरण के अनुकूल और ऊर्जा कुशल प्राकृतिक गैस आधारित नए उर्वरक परिसरों की स्थापना एवं संचालन करेगी जिनमें नीम लेपित यूरिया की वार्षिक स्थापित उत्पादन क्षमता 1.2 लाख मीट्रिक टन होगी।
  • HURL की इन तीन इकाइयों में से एक इकाई (गोरखपुर) की फरवरी 2021 में प्रारंभ होने की संभावना है जबकि दो इकाइयों (सिंदरी और बरौनी) मई 2021 से परिचालन शुरू हो सकता है।
  • इन संयंत्रों को प्राकृतिक गैस की आपूर्ति गेल द्वारा ‘पूल्ड प्राइस मैकेनिज्म’ के अंतर्गत की जाएगी।
  • अन्य दो इकाइयों में रामागुंडम इकाई का पुनरुद्धार ‘रामागुंडम फर्टिलाइज़र्स एंड केमिकल्स लिमिटेड’द्वारा राष्ट्रीय उर्वरक लिमिटेड,इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड और फर्टिलाइज़र कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के साथ संयुक्त रूप से किया जाएगा।
  • वहीं तलचर इकाई का पुनरुद्धार ‘तलचर फर्टिलाइज़र्स लिमिटेड’द्वारा राष्ट्रीय रसायन और उर्वरक लिमिटेड,कोल इंडिया लिमिटेड,GAIL और FCIL के संयुक्त प्रयास से किया जा रहा है।

संयंत्रों के पुनः प्रारंभ होने से लाभ:

  1. उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में स्थित तीन इकाइयों (गोरखपुर, सिंदरी और बरौनी) में परिचालन प्रारंभ होने से देश के पूर्वी क्षेत्र में आर्थिक व व्यावसायिक गतिविधियों का विस्तार होगा।
  2. इससे देश के पूर्वी भाग में आय और रोज़गार सृजन के नए मार्ग खुलेंगे।
  3. भारत का औसत यूरिया आयात 63.12 लाख मीट्रिक टन है क्योंकि देश में यूरिया का औसत उत्पादन लगभग 241 लाख मीट्रिक टन है और कुल खपत (बिक्री) लगभग 305.48 लाख मीट्रिक टन है।
  4. उत्पादन और खपत के बीच के इस अंतर की पूर्ति आयात के माध्यम से पूर्ण की जाती है।इन पाँच इकाइयों के प्रारंभ होने के बाद यूरिया का कुल उत्पादन प्रतिवर्ष लगभग 63.5 लाख मीट्रिक टन बढ़ जाएगा और भारत यूरिया के मामले में आत्मनिर्भर हो जाएगा।
  • महाराष्ट्र अपने भूमि रिकॉर्ड को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के वेब पोर्टल से एकीकृत करने वाला देश का पहला राज्य बना
  1. इसके माध्यम से ओवर इंश्योरेंस (Over-Insurance) (धारित भूमि से अधिक भूमि का बीमा) तथा अपात्र व्यक्तियों द्वारा उपयोग किये गए बीमा की जाँच में मदद मिलेगी।
  2. महाराष्ट्र को PMFBY के तहत दावों के भुगतान के मामले में देश के शीर्ष पाँच राज्यों में गिना जाता है।
  3. वित्तीय वर्ष 2018-19 के दौरान महाराष्ट्र के 1.39 करोड़ किसानों ने इस योजना को अपनाया तथा कुल 4,778.30 करोड़ रुपए की प्रीमियम राशि एकत्रित की गई।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरुआत वर्ष 2016 में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के द्वारा की गई। यह फसल के नष्ट होने की दशा में किसानों को व्यापक बीमा कवर प्रदान करती है तथा किसानों की आय को स्थिर बनाए रखने में मदद करती है। इसके तहत सभी खाद्यान्न,तिलहन,वाणिज्यिक तथा बागवानी फसलों को शामिल किया गया है। इसके तहत किसानों द्वारा भुगतान की जाने वाली प्रीमियम राशि खरीफ फसलों के लिये 2%, रबी की फसलों के लिये 1.5% तथा वार्षिक वाणिज्यिक तथा बागवानी फसलों पर प्रीमियम राशि 5% है। यह योजना उन किसानों के लिये अनिवार्य है जिन्होंने अधिसूचित फसलों के लिये फसल ऋण या किसान क्रेडिट कार्ड (Kisan Credit Card- KCC) के तहत ऋण लिया है, जबकि अन्य के लिये ये ऐच्छिक है। इस योजना का क्रियान्वयन सूचीबद्ध सामान्य बीमा कंपनियों द्वारा किया जाता है। क्रियान्वयन एजेंसी का चयन संबंधित राज्य सरकार द्वारा नीलामी द्वारा किया जाता है।

इसमें न सिर्फ खड़ी फसल बल्कि फसल पूर्व बुवाई तथा फसल कटाई के पश्चात् जोखिमों को भी शामिल किया गया है।

इस योजना के तहत स्थानीय आपदाओं की क्षति का भी आकलन किया जाएगा तथा संभावित दावों के 25 प्रतिशत का तत्काल भुगतान ऑनलाइन माध्यम से ही कर दिया जाएगा।

  • 3-7 जनवरी 2020 तक कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय बंगलूरू (कर्नाटक) में ‘107वीं भारतीय विज्ञान कॉन्ग्रेस’ का आयोजन हुआ।

थीम-‘विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी: ग्रामीण विकास’है। उद्देश्य:-विज्ञान संबंधी अभिनव कार्यों एवं अनुसंधान पर गहन विचार-विमर्श करने के लिये विश्‍व भर के विज्ञान समुदाय को एकजुट करना है। प्रमुख बिंदु बंगलूरू में नौवीं बार विज्ञान कॉन्ग्रेस का आयोजन हो रहा है। भारतीय विज्ञान कॉन्ग्रेस के 106वें अधिवेशन का आयोजन जालंधर (पंजाब) के लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (Lovely Professional University-LPU) में किया गया था। किसान विज्ञान कॉन्ग्रेस विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के ज़रिये ग्रामीण विकास पर फोकस करते हुए भारतीय विज्ञान कॉन्ग्रेस के इतिहास में पहली बार एक ‘किसान विज्ञान कॉन्ग्रेस’ का आयोजन किया जाएगा। इस दौरान एकीकृत कृषि के लिये किसानों की ओर से नवाचार एवं किसानों की आमदनी दोगुनी करने के लिये उद्यमिता, जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता, संरक्षण, पारिस्थितिकी से जुड़ी सेवाएँ एवं किसानों के सशक्तीकरण से लेकर कृषि क्षेत्र में गहराए संकट, ग्रामीण जैव-उद्यमिता एवं नीतिगत मुद्दों पर भी गहन चर्चा की जाएगी। इस आयोजन में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) एवं कृषि विज्ञान विश्‍वविद्यालय (UAS) के वैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों के साथ-साथ ऐसे किसान भी भाग लेंगे, जिनके अभिनव उपायों ने इस क्षेत्र के विकास में उल्‍लेखनीय योगदान दिया है। राष्‍ट्रीय किशोर वैज्ञानिक सम्‍मेलन 107वीं भारतीय विज्ञान कॉन्ग्रेस के एक भाग के रूप में 4-5 जनवरी, 2020 को दो दिवसीय ‘राष्‍ट्रीय किशोर वैज्ञानिक सम्‍मेलन’ आयोजित किया जाएगा। इस दौरान बच्‍चों को चयनित परियोजनाओं से अवगत होने और विद्यार्थियों के प्रतिनिधियों के साथ संवाद करने का अवसर मिलेगा। यही नहीं, बच्‍चों को जाने-माने वैज्ञानिकों और नोबेल पुरस्‍कार विजेताओं के विचारों को सुनने एवं उनसे संवाद करने का भी अवसर मिलेगा। महिला विज्ञान कॉन्ग्रेस महिला विज्ञान कॉन्ग्रेस का उद्देश्‍य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विभिन्‍न क्षेत्रों में कार्यरत महिलाओं को अपनी-अपनी उपलब्धियों को दर्शाने तथा अनुभवों को साझा करने के लिये एकल प्‍लेटफॉर्म मुहैया कराना है। इस दौरान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महिलाओं के लिये एक विज़न दस्‍तावेज़ या खाका (रोडमैप) भी तैयार किया जाएगा। इसी तरह विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं की क्षमता का पूर्ण उपयोग सुनिश्चित करने के साथ-साथ उनकी भूमिका बढ़ाने के लिये आवश्‍यक नीतियों की सिफारिश की जाएगी।

कृषि उत्पादों का निर्यात तथा कृषकों की दोगुनी आय[सम्पादन]

  • 23 अप्रैल, 2020 को केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री (Union Minister for Agriculture & Farmers Welfare) ने बताया कि कृषि कल्याण अभियान (Krishi Kalyan Abhiyaan) के तीसरे चरण में किसानों की आय दोगुनी करने हेतु विविध कृषि पद्यतियों के लिये लगभग 17 लाख किसानों को प्रशिक्षित करने की योजना बनाई गई है।

कृषि कल्याण अभियान को देश के 112 आकांक्षी ज़िलों में लागू किया जा रहा है। कृषि कल्याण अभियान के अब तक दो चरण पूरे हो चुके हैं जिसमें 11.05 लाख किसानों को कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) द्वारा प्रशिक्षित किया गया है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्‍याण मंत्रालय ने वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने तथा कृषि की तकनीकों में सुधार करने के लक्ष्य को ध्‍यान में रखते हुए वर्ष 2018 में कृषि कल्याण अभियान (Krishi kalyan Abhiyaan) की शुरूआत की थी। कृषि कल्‍याण अभियान आकांक्षी ज़िलों (Aspirational Districts) के 1000 से अधिक आबादी वाले प्रत्‍येक 25 गाँवों में चलाया जा रहा है। इन गाँवों का चयन ग्रामीण विकास मंत्रालय ने नीति आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार किया है। जिन ज़िलों में गाँवों की संख्‍या 25 से कम है, वहाँ के सभी गाँवों को (1000 से अधिक आबादी वाले) इस योजना के तहत कवर किया जा रहा है। एक ज़िले के 25 गाँवों में समग्र समन्वय और कार्यान्वयन उस ज़िले के कृषि विज्ञान केंद्र (Krishi Vigyan Kendra) द्वारा किया जा रहा है।

  • COVID-19 के मद्देनज़र राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन और हाल ही में आई कोलकाता में बाढ़ के कारण कांगड़ा चाय (Kangra Tea) का उत्पादन करने वाले किसानों को परिवहन लागत बढ़ने के कारण आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

कांगड़ा चाय (Kangra Tea) का उत्पादन हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले में किया जाता है। इसे अपने अनूठे रंग और स्वाद के लिये खास तौर से जाना जाता है। इसे भौगोलिक संकेत ( Geographical Indication-GI) टैग प्रदान किया गया है। इसमें एंटीऑक्सिडेंट जैसे- कैचिंस (Catechins) और पॉलीफिनोल्स (Polyphenols) की भरपूर मात्रा पाई जाती है। इसका उपयोग सेंनेटाइज़र, साबुन, सिरका, वाइन आदि बनाने में भी किया जाता है।

  • 07 अगस्त, 2020 को भारत की पहली साप्ताहिक 'किसान रेल' (Kisan Rail) को महाराष्ट्र के देवलाली से बिहार के दानापुर के लिये रवाना किया गया। इस किसान रेल के माध्यम से किसानों को बिना किसी देरी के अंतर्राज्यीय बाज़ारों में अपने खराब होने वाले कृषि उत्पादों को भेजने में मदद मिल सकेगी।

इस वर्ष के केंद्रीय बजट (वर्ष 2020-21) में सब्जियों एवं फलों की खेती करने वाले किसानों के लिये ‘किसान रेल’ की घोषणा की गई थी। इस रेल में 11 विशेष रूप से निर्मित पार्सल कोच हैं जो चलते-फिरते कोल्ड स्टोरेज़ के रूप में काम करते हैं। यह रेल नासिक रोड, मनमाड, जलगाँव, भुसावल, बुरहानपुर, खंडवा, इटारसी, जबलपुर, सतना, कटनी, मानिकपुर, प्रयागराज छेओकी, पंडित दीन दयाल उपाध्याय जंक्शन और बक्सर स्टेशनों पर रुकेगी। इससे पहले इन कृषि उत्पादों को अन्य राज्यों में ट्रकों से ले जाया जाता था किंतु अब किसान अपनी ज़रूरतों के अनुसार फसलों एवं कृषि उत्पादों को नुकसान के जोखिम के अनुसार ट्रेन के माध्यम से भेज सकते हैं। इस रेल के माध्यम से महाराष्ट्र के प्याज़, अंगूर एवं अन्य खराब होने वाले फलों एवं सब्जियों को जबकि बिहार के मखाना, मछली और सब्जियों को देश के अन्य बाज़ारों तक पहुँचाया जाएगा। यह रेल जल्द खराब होने वाले कृषि उत्पादों को निर्बाध आपूर्ति श्रृंखला प्रदान करेगी जिससे किसानों को अपने उत्पादों का उचित मूल्य मिल सकेगा।

  • कृषि निर्यात को दोगुना करने तथा भारतीय किसानों और कृषि उत्पादों को वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं से जोड़ने के लक्ष्य वाली कृषि निर्यात नीति, 2018 के अनुरूप प्रथम भारतीय अंतर्राष्ट्रीय सहकारी व्यापार मेला (India International Cooperatives Trade Fair- IICTF) का आयोजन नई दिल्ली के प्रगति मैदान में 11 से 13 अक्तूबर, 2019 तक किया जाएगा। NCDC द्वारा संचालित यह मेला कृषि सहकारी समितियों के विकास के एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन (Network for the Development of Agricultural Cooperatives- NEDAC), तीन मंत्रालयों, चार राज्य सरकारों और शीर्ष स्तर के भारतीय सहकारी संगठनों की सहायता से आयोजित किया जा रहा है।

इस व्यापार मेले का उद्देश्य ग्रामीण और कृषि समृद्धि में वृद्धि के लिये भारत और विदेशों में कोऑपरेटिव-टू-कोऑपरेटिव व्यापार (Cooperative to Cooperative Trade) को बढ़ावा देना है। इस मेले के दौरान सम्मेलनों, प्रदर्शनियों, बी टू बी बैठकों (B2B Meetings), सी टू सी बैठकों (C2C Meetings), बिक्री संवर्द्धन, विपणन और उत्पादों के प्रदर्शन के साथ व्यापार, नेटवर्किंग, नीति प्रचार आदि का आयोजन किया जाएगा। यह व्यापार मेला भारत और विदेश के उद्योगों तथा व्यापारिक घरानों का गठबंधन करने, बिज़नेस नेटवर्किंग, प्रोडक्ट सोर्सिंग और सबसे बढ़कर उत्पादों और सेवा प्रदाताओं की विस्तृत श्रृंखला के प्राथमिक उत्पादकों के साथ बातचीत करने का एक बड़ा अवसर प्रदान करता है। IICTF सहकारी समितियों द्वारा देश के सभी सदस्यों को प्रत्यक्ष लाभ पहुँचाने के साथ ही निर्यात को बढ़ावा देने हेतु प्रमुख मंच होगा जिसमें मुख्य रूप से किसान, कारीगर, महिलाएँ, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति लोग आदि शामिल होंगे।

  • भारत की पहली फ्रूट ट्रेन (Fruit Train) को आंध्र प्रदेश के अनंतपुर ज़िले में ताड़िपत्री (Tadipatri) रेलवे स्टेशन से जवाहरलाल नेहरू पोर्ट (मुंबई) के लिये रवाना किया गया। जहाँ से फलों की खेप को ईरान भेजा जाएगा। इस ट्रेन में वातानुकूलित कंटेनर का उपयोग किया गया है। इससे समय और ईंधन दोनों की बचत होगी क्योंकि अब तक 150 ट्रकों द्वारा कंटेनरों को सड़क के माध्यम से 900 किमी. से अधिक दूर जवाहरलाल नेहरू पोर्ट भेजा जाता था,जहाँ इन तापमान-नियंत्रित कंटेनरों को जहाज़ों पर लादा जाता था।
नवी मुंबई स्थित जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट को पूर्व में न्हावा शेवा बंदरगाह के नाम से जाना जाता था।

यह भारत का शीर्ष कंटेनर पोर्ट है जो भारत में सभी प्रमुख पोर्ट्स का 55 प्रतिशत कंटेनर कार्गों संचालित करता है। इसकी शुरुआत 26 मई, 1989 को हुई थी। सरकार ने आंध्र प्रदेश से 30,000 मीट्रिक टन फलों के निर्यात का लक्ष्य तय कर रखा है और स्थानीय किसानों के साथ मिलकर उत्पादकता बढ़ाने, उपज की गुणवत्ता, उपज का रखरखाव और पैकेजिंग तथा किसानों को बाज़ार से जोड़ने के लिये छह प्रमुख कॉर्पोरेट कंपनियों के साथ मिलकर काम कर रही है। इन कंटेनरों से केलों का निर्यात 'हैप्पी बनानास (Happy Bananas)' ब्रांड नाम से किया जा रहा है। आंध्र प्रदेश में अनंतपुर के पुटलूर क्षेत्र और कडप्पा ज़िले के पुलिवेंदुला क्षेत्र के किसान कई अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में ‘ग्रीन कैवेंडिश’ केले का निर्यात कर रहे हैं। विश्व में कैवेंडिश केलों का उत्पादन सबसे अधिक होता है, घरों में पीले रंग के जो केले आते हैं वे इसी प्रजाति के हैं। कुछ वर्ष पहले पनामा डिज़ीज़ नामक बीमारी ने कैवेंडिश केलों के उत्पादन को प्रभावित किया था। इस बीमारी की वजह से वर्ष 1950 में बिग माइक नामक केलों की प्रजाति विलुप्त हो चुकी है। यह बीमारी पेड़ की जड़ों में हमला करती है।

मत्सय पालन[सम्पादन]

  • 10 जुलाई को 17वाँ ‘नेशनल फिश फार्मर्स डे’ (National Fish Farmers Day)आईसीएआर-सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फ्रेश वाटर एक्वाकल्चर (ICAR-Central Institute of Freshwater Aquaculture) ने मनाया। यह दिवस वैज्ञानिकों डॉ. के. एच. अलीकुन्ही (Dr K H Alikunhi) और डॉ. एच. एल. चौधरी (Dr. H.L. Chaudhury) की याद में मनाया जाता है, जिन्होंने 10 जुलाई, 1957 में प्रेरित प्रजनन तकनीक (Induced Breeding Technology) का आविष्कार किया था।

प्रेरित प्रजनन तकनीक (Induced Breeding Technology)से परिपक्व मछली के प्रजनकों को कैद करके प्रजनन के लिये पिट्यूटरी हार्मोन (Pituitary Hormone) द्वारा उत्तेजित किया जाता है। यह उत्तेजना परिपक्व गोनाड्स (Ripe Gonads) से शुक्राणुओं एवं अंडों के सही समय पर निर्मुक्त होने को बढ़ावा देती है। हाइपोफिशेशन (Hypophysation) नाम से जानजानवाले इस तकनीक के कारण ही देश में नीली क्रांति (Blue Revolution) का उद्देश्य साकार हो सका।

इस अवसर पर राष्ट्रीय मत्स्यपालन विकास बोर्ड (National Fisheries Development Board- NFDB) के सहयोग से मत्स्य विभाग द्वारा एक वेबिनार आयोजित किया गया था, जिसमें केंद्रीय पशुपालन, डेयरी, एवं मत्स्य पालन मंत्री ने भाग लिया।

इस अवसर पर ‘राष्ट्र के मछली पालकों के लिये कृतज्ञतापूर्ण आभार’ (Gratitudinal Tribute to Fish Farmers of The Nation) विषय पर एक ऑनलाइन कविता एवं पोस्टर बनाने की प्रतियोगिता भी आयोजित की गई।

  • इंडिया इंटरनेशनल सीफूड शो- 2020(India International Seafood Show-IISS) के 22वें संस्करण का आयोजन 7-9 फरवरी को कोच्चि (केरल) में किया गया। समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (Marine Products Export Development Authority- MPEDA) द्वारा आयोजित किया जा रहा है,जो समुद्री खाद्य निर्यातक संघ (Seafood Exporters Association of India- SEAI) के साथ वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय (Ministry of Commerce and Industry) के अंतर्गत आता है।

2020 के सीफूड शो की थीम ‘नीली क्रांति- मूल्यवर्द्धन से परे उत्पादन’ (Blue Revolution- Beyond Production to Value Addition) है। यह भारतीय निर्यातकों और भारतीय समुद्री उत्पादों के विदेशी आयातकों के मध्य सहभागिता के लिये एक मंच प्रदान करता है।

इस द्विवार्षिक शो का आयोजन 12 वर्षों बाद कोच्चि में किया जा रहा है,जबकि इसका 21वाँ संस्करण जनवरी 2018 में गोवा में आयोजित किया गया था।

इंडिया इंटरनेशनल सीफूड शो विश्व के सबसे पुराने और सबसे बड़े सीफूड शो में से एक है। यह संयुक्त राज्य अमेरिका,यूरोपीय संघ,जापान,दक्षिण-पूर्व एशिया और अन्य देशों के प्रमुख बाज़ारों के समुद्री उत्पाद के व्यापारियों को आकर्षित करता है।

समुद्री खाद्य निर्यातक संघ(Seafood Exporters Association of India- SEAI)की स्थापना वर्ष 1973 में रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज़ एक्ट,1956 के तहत पंजीकृत संगठन के रूप की गई थी।

उद्देश्य: इसका उद्देश्य समुद्री खाद्य उद्योग के हितों की रक्षा करना एवं उनको बढ़ावा देना तथा भारत के समुद्री खाद्य का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार विकसित करना है।

भारत द्वारा समुद्री उत्पादों का निर्यात:-वर्ष 2018-19 के दौरान भारत ने 14,37,000 टन से अधिक समुद्री उत्पादों का निर्यात किया जो अंतिम आँकड़ों के अनुसार 6.70 बिलियन अमेरिकी डाॅलर का है।

लक्ष्य:-बहु-आयामी रणनीति के तहत समुद्री उत्पादों के निर्यात से अगले पाँच वर्षों में 15 बिलियन अमेरिकी डाॅलर का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

नीली क्रांति 2.0 फिशरीज़ के विकास एवं प्रबंधन पर केंद्रित है। इसमें अंतर्देशीय मछलीपालन, मछलीपालन, समुद्री मत्स्यपालन जिसमें गहरे समुद्र में मछली पकड़ना भी शामिल है तथा राष्ट्रीय मत्स्यपालन विकास बोर्ड द्वारा की जा रही अन्य सभी गतिविधियाँ शामिल हैं। राष्ट्रीय मत्स्यपालन विकास बोर्ड (NFDB) की स्थापना वर्ष 2006 में मत्स्यपालन विभाग, कृषि और कृषक कल्याण मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में एक स्वायत्त संगठन के रूप में हुई। इसका कार्य देश में मछली उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाना तथा एक एकीकृत एवं समग्र रूप से मत्स्यपालन विकास में समन्वय करना है। वर्तमान में यह बोर्ड मत्स्यपालन, पशुपालन और डेरी उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है। इसका लक्ष्य मछुआरों और मत्स्य फ़ार्मिंग करने वालों को आर्थिक रूप से समृद्ध बनाना है। यह कार्य संवहनीय रूप से मछलीपालन का विकास कर किया जाएगा जिसमें जैव सुरक्षा और पर्यावरण संबंधी चिंताओं को भी ध्यान में रखा जाएगा।

प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना का उद्देश्य समुचित नीति,विपणन और अवसंरचना सहायता द्वारा भारत को मछली और जलीय उत्पादों का उत्कृष्ट स्थान बनाना है। सभी मछुआरों को कृषक कल्याण योजना कार्यक्रमों और सामाजिक सुरक्षा योजना के अंतर्गत लाना है।

इसके तहत मत्स्यपालन मंत्रालय एक मजबूत फिशरीज़ प्रबंधन ढाँचा स्थापित करेगा जो मूल्य श्रृंखला जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों का समाधान करेगा,जिसमें अवसंरचना का आधुनिकीकरण,खोजने लगाने की योग्यता,उत्पादन,उत्पादकता,उत्पादन बाद का प्रबंधन और गुणवत्ता नियंत्रण शामिल हैं।

भारत अपने यहाँ ताज़े जल के मछलीपालन के लिये उपलब्ध पोखरों, तालाबों और अन्य जल निकायों का केवल 40 प्रतिशत का उपयोग करता है और खारे जल स्रोतों के केवल 15 प्रतिशत का। वर्तमान में अमेरिका भारतीय समुद्री खाद्य उत्पादों का सबसे बड़ा बाजार है और भारत के समुद्री उत्पादों के निर्यात में उसका हिस्सा 26.46% है। इसके बाद 25.71% के साथ पूर्वी एशियाई देशों तथा 20.08% के साथ यूरोपीय यूनियन के देशों की हिस्सेदारी है। फिशरीज़ भारत की GDP में लगभग 1 प्रतिशत का और कृषि GDP में 5 प्रतिशत का योगदान करता है।

भारत में नीली क्रांति:-

भारत में इसकी शुरुआत सातवीं पंचवर्षीय योजना से हुई थी जो वर्ष 1985 से वर्ष 1990 के बीच कार्यान्वित की गई। इस दौरान सरकार ने फिश फार्मर्स डेवलपमेंट एजेंसी (FFDA) को प्रायोजित किया। आठवीं पंचवर्षीय योजना (वर्ष 1992 से वर्ष 1997) के दौरान सघन मरीन फिशरीज़ प्रोग्राम शुरू किया गया जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों से सहयोग को प्रोत्साहित किया गया। कुछ समय बाद तूतिकोरिन, पोरबंदर, विशाखपत्तनम, कोच्चि और पोर्ट ब्लेयर में फिशिंग बंदरगाह स्थापित किये गए। उत्पादन बढ़ाने साथ ही साथ प्रजातियों में सुधार के लिये बड़ी संख्या में अनुसंधान केंद्र भी स्थापित किये गए।

पशुपालन[सम्पादन]

  • भारतीय कृषि जीडीपी में पशुधन की हिस्सेदारी 33% से अधिक है और तेजी से बढ़ रही है। खाद्य और कृषि संगठन के अनुसार, भारत में दुनिया की सबसे बड़ी पशुधन आबादी है, भैंस के माँस का सबसे बड़ा उत्पादक है और सालाना लगभग 100 बिलियन अंडे का उत्पादन करता है।
  • केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने 15000 करोड़ रुपए के पशुपालन अवसंरचना विकास कोष (Animal Husbandry Infrastructure Development Fund-AHIDF) के कार्यान्वयन संबंधी दिशा-निर्देश जारी किये हैं। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत घोषित प्रोत्साहन पैकेज के अंतर्गत 15000 करोड़ रुपए के पशुपालन अवसंरचना विकास कोष (AHIDF) की स्थापना की बात की गई थी।

इस कोष के अंतर्गत पात्र लाभार्थियों में, किसान उत्पादक संगठन (FPO), MSMEs, कंपनी अधिनियम की धारा 8 में शामिल कंपनियाँ, निजी क्षेत्र की कंपनियाँ और व्यक्तिगत उद्यमी शामिल होंगे। इस कोष (AHIDF) से संबंधित प्रावधान देश भर के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लागू होंगे। दूध और माँस प्रसंस्करण की क्षमता और उत्पाद विविधीकरण को बढ़ावा देना इसका प्रमुख उद्देश्य है,ताकि भारत के ग्रामीण एवं असंगठित दुग्ध और माँस उत्पादकों को संगठित दुग्ध और माँस बाज़ार तक अधिक पहुँच प्रदान की जा सके। उत्पादकों को उनके उत्पाद की सही कीमत प्राप्त करने में मदद करना। स्थानीय उपभोक्ताओं को गुणवत्तापूर्ण दुग्ध और माँस उपलब्ध कराना। देश की बढ़ती आबादी के लिये प्रोटीन युक्त समृद्ध खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करना और बच्चों में कुपोषण की बढ़ती समस्या को रोकना। देश भर में उद्यमिता को प्रोत्साहित करना और संबंधित क्षेत्र में रोज़गार सृजित करना। दुग्ध और माँस उत्पादों के निर्यात को प्रोत्साहित करना। पशुपालन अवसंरचना विकास कोष (AHIDF) के तहत सभी पात्र परियोजनाएँ अनुमानित परियोजना लागत का अधिकतम 90 प्रतिशत तक ऋण के रूप में अनुसूचित बैंकों से प्राप्त करने में सक्षम होंगी, जबकि सूक्ष्म एवं लघु इकाई की स्थिति में पात्र लाभार्थियों का योगदान 10 प्रतिशत, मध्यम उद्यम इकाई की स्थिति में 15 प्रतिशत और अन्य श्रेणियों में यह 25 प्रतिशत हो सकता है। पशुपालन अवसंरचना विकास कोष (AHIDF) के तहत 15000 करोड़ रुपए की संपूर्ण राशि बैंकों द्वारा 3 वर्ष की अवधि में वितरित की जाएगी। पशुपालन अवसंरचना विकास कोष (AHIDF) के तहत मूल ऋण राशि के लिये 2 वर्ष की ऋण स्थगन (Moratorium) अवधि और उसके पश्चात् 6 वर्ष के लिये पुनर्भुगतान अवधि प्रदान की जाएगी, इस प्रकार कुल पुनर्भुगतान अवधि 8 वर्ष की होगी, जिसमें 2 वर्ष की ऋण स्थगन (Moratorium) अवधि भी शामिल है। संबंधित दिशा-निर्देशों के अनुसार, अनुसूचित बैंक यह सुनिश्चित करेंगे कि ऋण के वितरण के पश्चात् पुनर्भुगतान अवधि 10 वर्ष से अधिक न हो, जिसमें ऋण स्थगन (Moratorium) अवधि भी शामिल है। इसके अलावा भारत सरकार द्वारा नाबार्ड (NABARD) के माध्यम से प्रबंधित 750 करोड़ रुपए के ऋण गारंटी कोष की भी स्थापना की जाएगी। इसके तहत उन स्वीकृत परियोजनाओं को ऋण गारंटी प्रदान की जाएगी जो MSMEs की परिभाषित सीमा के अंतर्गत आती हैं। ऋण गारंटी की सीमा उधारकर्त्ता द्वारा लिये गए ऋण के अधिकतम 25 प्रतिशत तक होगी। पशुपालन अवसंरचना विकास कोष का महत्त्व

आँकड़ों के अनुसार, भारत द्वारा वर्तमान में, 188 मिलियन टन दुग्ध उत्पादन किया जा रहा है और वर्ष 2024 तक दुग्ध उत्पादन बढ़कर 330 मिलियन टन तक होने की संभावना है। वर्तमान में केवल 20-25 प्रतिशत दूध ही प्रसंस्करण क्षेत्र के अंतर्गत आता है, हालाँकि सरकार ने इसे 40 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस कोष के माध्यम से बुनियादी ढाँचा तैयार होने के पश्चात् लाखों किसानों को इससे फायदा पहुँचेगा और दूध का प्रसंस्करण भी अधिक होगा। इससे डेयरी उत्पादों के निर्यात को भी बढ़ावा मिलेगा जो कि वर्तमान समय में नगण्य है। गौरतलब है कि डेयरी क्षेत्र में भारत को न्यूज़ीलैंड जैसे देशों के मानकों तक पहुँचने की आवश्यकता है। चूँकि, भारत में डेयरी उत्पादन का लगभग 50-60 प्रतिशत अंतिम मूल्य प्रत्यक्ष रूप से किसानों को वापस मिल जाता है, इसलिये इस क्षेत्र में होने वाले विकास से किसान की आय पर प्रत्यक्ष रूप से महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है। ध्यातव्य है कि भारत में प्रौद्योगिकी हस्तक्षेपों के माध्यम से पशुओं की नस्ल सुधार का कार्य तेज़ी से किया जा रहा है, आँकड़ों के अनुसार सरकार द्वारा 53.5 करोड़ पशुओं के टीकाकरण का निर्णय लिया गया है, वहीं 4 करोड़ पशुओं का टीकाकरण किया जा चुका है। हालाँकि अभी भी भारत प्रसंस्करण के क्षेत्र में काफी पीछे है, इस कोष के माध्यम से विभिन्न प्रसंस्करण संयंत्र भी स्थापित किये जाएंगे। इस कोष के माध्यम से भारत के किसानों की आय को दोगुना करने के लक्ष्य में मदद मिलेगी और यह 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था के सपने को साकार करने की दिशा में भी एक महत्त्वपूर्ण कदम होगा। अनुमान के अनुसार, सरकार द्वारा गठित इस कोष और इसके तहत स्वीकृति उपायों के माध्यम से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से 35 लाखों लोगों के लिये आजीविका का निर्माण होगा।

  • आईसीएआर और भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (Indian Veterinary Research Institute) ने क्लासिकल स्वाइन फीवर वैक्सीन (IVRI-CSF-BS) विकसित की। यह संक्रामक बुखार सुअरों के लिये जानलेवा साबित होता है, इसके कारण देश में सुअरों की संख्या में कमी आ रही है। इसकी वजह से देश को लगभग 4.299 बिलियन रुपए का वार्षिक नुकसान होता है।

भारत में इस बीमारी को नियंत्रित करने के लिये वर्ष 1964 से एक लैपिनाइज़्ड क्लासिकल स्वाइन फीवर वैक्सीन का उपयोग किया जा रहा है। जिसका निर्माण बड़ी संख्या में खरगोशों को मार कर किया जाता है। भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान ने पहले सेल कल्चर लैपिनाइज़्ड वैक्सीन वायरस को अपनाकर एक क्लासिकल स्वाइन फीवर वैक्सीन विकसित की थी। इसमें खरगोशों को मारना नहीं पड़ता था। नई वैक्सीन सुरक्षित एवं प्रभावशाली है, यह संक्रामक बुखार को दोबारा वापस आने से रोकती है। नई वैक्सीन भारत सरकार की ‘एक स्वास्थ्य पहल’ (One Health Initiative) का हिस्सा है।

  • वर्ष 1962 में पशु क्रूरता निवारण कानून, 1960 के खण्ड चार के तहत भारतीय पशु कल्याण बोर्ड का गठन किया गया था। AWBI बनाम ए. नागराज, 2014 मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के अनुसार बोर्ड उन सभी विभागों एवं संस्थाओं के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करेगा जो कि न्यायालय के निर्देशों एवं बोर्ड के परामर्श का पालन नहीं करेंगे।

बोर्ड पशु कल्याण से संबंधित कानूनों का देश में सख्ती से अनुपालन सुनिश्चित करता है और इस कार्य से जुड़ी संस्थाओं की मदद करता है तथा केंद्र और राज्य सरकारों को इस संबंध में परामर्श देता है। कानून के मुताबिक बोर्ड में 28 सदस्य हैं जिसमें 6 सांसद हैं (4 लोकसभा से और 2 राज्यसभा से)। बोर्ड का उद्देश्य है कि मनुष्यों को छोड़कर सभी प्रकार के जीवों की पीड़ा से बचाव करना। सरकार ने भारतीय पशु कल्याण बोर्ड (AWBI) का मुख्यालय चेन्नई, तमिलनाडु से हरियाणा के फरीदाबाद ज़िले के बल्लभगढ़ में स्थानांतरित कर दिया है।

कृषि ॠण माफी[सम्पादन]

हाल के वर्षो में कई राज्य सरकारों ने किसानों के कृषि ऋणों को माफ किया है, जिसके कारण ऋण माफी सदैव ही विशेषज्ञों के मध्य चर्चा का विषय रही है। ऋण माफी का इतिहास सर्वप्रथम वर्ष 1990 में वी.पी. सिंह की सरकार ने पूरे देश में किसानों का तकरीबन 10 हज़ार करोड़ रुपए का ऋण माफ किया था। जिसके बाद UPA सरकार ने भी वित्तीय वर्ष 2008-09 के बजट में करीब 71 हज़ार करोड़ रुपए की ऋण माफी का एलान किया। वर्ष 2014-15 से कई बार बाढ़ और सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं एवं विमुद्रीकरण से प्रभावित किसानों को राहत देने हेतु राज्य सरकारों द्वारा ऋण माफी की गई है। कई बार RBI तथा अन्य आर्थिक समीक्षकों ने वोट बटोरने के लिये ऋण माफी का प्रयोग न करने की चेतावनी दी है। राज्य के वित्त पर ऋण माफी का प्रभाव RBI के आंतरिक कार्य दल की रिपोर्ट बताती है कि सामान्यतः सभी राज्यों की ऋण माफी में एक ही प्रकार का पैटर्न देखा गया है। सभी राज्य ऋण माफी के तीन से चार वर्षों मे अपने राज्य बजट में उसे स्थान देना बंद कर देते हैं। वर्ष 2014-15 से वर्ष 2018-19 के बीच विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा घोषित कुल कृषि ऋण माफी 2.36 ट्रिलियन रुपए थी, जिसमे से केवल 1.5 ट्रिलियन रुपए का ऋण ही अब तक माफ किया गया है। बीते पाँच वर्षों में केवल कुछ ही राज्यों ने मिलकर वर्ष 2008-09 में केंद्र सरकार द्वारा माफ की गई राशि, जो कि 0.72 ट्रिलियन रुपए थी का तीन गुना माफ कर दिया है। वर्ष 2017-18 में ऋण माफी अपनी चरम सीमा पर थी और इसी दौरान राज्यों का राजकोषीय घाटा लगभग 12 प्रतिशत तक पहुँच गया था। ऋण माफी का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव संक्षेप में, कृषि ऋण माफी का अर्थ सरकार द्वारा उस निजी ऋण का निपटान करना है जो किसानों द्वारा बैंकों से लिया जाता है, लेकिन ऐसा करने से सरकार के संसाधनों में कमी आती है, जिसके प्रभाव से या तो संबंधित सरकार का राजकोषीय घाटा (अर्थात् बाज़ार से कुल उधारी) बढ़ जाता है या सरकार को व्यय में कटौती करनी पड़ती है। उच्च राजकोषीय घाटे का अर्थ यह कि है कि बाज़ार में निजी व्यवसायों को उधार देने के लिये उपलब्ध धनराशि कम होगी एवं ब्याज दर अधिक होगी जिससे बाज़ार में ऋण महंगा हो जाएगा और इसका स्पष्ट प्रभाव नई कंपनियों के निर्माण पर पड़ेगा तथा रोज़गार सृजन में कमी आएगी। यदि राज्य सरकार बाज़ार से पैसा उधार नहीं लेना चाहती है और अपने वित्तीय घाटे के लक्ष्य पर बनी रहती है, तो उसे खर्च में कटौती करने के लिये मज़बूर होना पड़ेगा। इस स्थिति में अधिकतर देखा गया है कि राज्य सरकारें राजस्व व्यय जैसे- वेतन और पेंशन आदि पर होने वाले व्यय के साथ पर पूंजीगत व्यय जैसे- सड़कें, भवन, स्कूल आदि के निर्माण पर किये जाने वाला व्यय में कटौती करती हैं। पूंजीगत व्यय में कटौती से भविष्य में उत्पादन को बढ़ाने की क्षमता कमज़ोर हो जाती है। कृषि ऋण माफी को कभी भी विवेकपूर्ण नहीं माना जा सकता है, क्योंकि इसके कारण अर्थव्यवस्था में ऋण संस्कृति पूर्णतः बर्बाद हो जाती है एवं समग्र आर्थिक विकास को चोट पहुँचती है, क्योंकि इससे डिफॉल्टर को प्रोत्साहन मिलता है और यह उन लोगों के लिये यह दंड के समान होता है जो अपने ऋण का भुगतान समय पर करते हैं। भारत की व्यापक आर्थिक स्थिति के लिये राज्य की अर्थव्यवस्था कितनी महत्त्वपूर्ण है? आमतौर पर जब भारतीय अर्थव्यवस्था का विश्लेषण किया जाता है तो केंद्र सरकार की वित्तीय स्थिति को ही ध्यान में रखा जाता है लेकिन वर्तमान स्थिति इसके काफी विपरीत है। राष्ट्रीय लोक वित्त एवं नीति संस्थान (National Institute of Public Finance and Policy-NIPFP) के आँकड़े बताते हैं कि देश की सभी राज्य सरकारें मिलकर एक साथ केंद्र से लगभग 30 प्रतिशत अधिक खर्च करती हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि भारत की व्यापक आर्थिक स्थिरता और भविष्य के आर्थिक विकास के लिये राज्य सरकार की वित्तीय स्थिति भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी की केंद्र सरकार की वित्तीय स्थिति।