समसामयिकी 2020/विज्ञान और प्रौद्दोगिक-विश्व

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कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में वैश्विक प्रतिभा[सम्पादन]

  • वैश्विक प्रतिभा प्रतिस्पर्द्धा सूचकांक-2020 को इनसीड (INSEAD) बिज़नेस स्कूल द्वारा गूगल (Google) और एडिको समूह (Adecco Group) के सहयोग से जारी किया गया है। वर्ष 2020 के वैश्विक प्रतिभा प्रतिस्पर्द्धा सूचकांक की थीम ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में वैश्विक प्रतिभा’ (Global Talent in the Age of Artificial Intelligence) है।

इसमें शीर्ष स्थान प्राप्त करने वाले 20 देशों में 13 यूरोपीय देश शामिल हैं। यह सूचकांक प्रतिस्पर्द्धा में यूरोपीय देशों की प्रतिभा के वर्चस्व को प्रदर्शित करता है। इस सूचकांक को 132 देशों की रैंकिंग के आधार पर जारी किया गया है।

इस सूचकांक में भारत को 40.42 के स्कोर के साथ 72वाँ स्थान प्राप्त हुआ है। वर्ष 2019 में जारी इस सूचकांक में भारत को 80वाँ स्थान प्राप्त हुआ था। भारत में अल्पसंख्यकों और महिलाओं के प्रति बढ़ती असहिष्णुता के संबंध में आंतरिक स्तर पर सुधार किये जाने की आवश्यकता है।

ब्रिक्स देशों में भारत की स्थिति:-अगर भारत के स्थान की ब्रिक्स (BRICS) देशों से तुलना की जाए तो निम्नलिखित तीन देशों ने भारत से बेहतर प्रदर्शन किया है- चीन- 42वाँ स्थान रूस- 48वाँ स्थान दक्षिण अफ्रीका- 70वाँ स्थान वहीं भारत ने ब्राज़ील (80वाँ स्थान) से बेहतर प्रदर्शन किया है। वैश्विक परिदृश्य:-इस सूचकांक में शीर्ष 5 स्थान प्राप्त करने वाले देश क्रमशः स्विट्ज़रलैंड, अमेरिका, सिंगापुर, स्वीडन तथा डेनमार्क हैं। इस सूचकांक में शीर्ष 25 देश उच्च आय समूह से संबंधित हैं, जिनमें से 17 यूरोपीय देश हैं। इस सूचकांक में अंतिम स्थान यमन (Yemen) को प्राप्त हुआ है लगभग सभी उच्च आय वाले देशों और विश्व के बाकी हिस्सों के बीच प्रतिभा प्रतिस्पर्द्धा के अंतर में वृद्धि हो रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) संबंधी दृष्टिकोण:-कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संबंध में भी विश्व के विभिन्न देशों तथा क्षेत्रों के बीच अंतर देखा जा सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अच्छे परिणाम प्राप्त करने के लिये एक सक्रिय सहकारी दृष्टिकोण संबंधी सोच विकसित करनी होगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता संबंधी प्रतिभा को उद्योगों, क्षेत्रों और राष्ट्रों में समान रूप से वितरित किया जाना चाहिये। विकासशील देशों की आधी से अधिक जनसंख्या अभी भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता संबंधी आधारभूत डिजिटल कौशल से वंचित है तथा विभिन्न देशों के बीच डिजिटल कौशल संबंधी योग्यता के अंतर में वृद्धि हुई है। कुछ विकासशील देश कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति कर रहे हैं परंतु अभी भी बहुत से विकासशील देश इस क्षेत्र में काफी पिछड़े हुए हैं।

वैश्विक प्रतिभा प्रतिस्पर्द्धा सूचकांक को नवंबर 2013 से इनसीड (INSEAD) बिज़नेस स्कूल द्वारा जारी किया जाता है।

इस सूचकांक के मापन के मुख्य पैमाने प्रतिभा विकास और प्रबंधन को केंद्रीय प्राथमिकता के रूप में शामिल करना, उद्यमी प्रतिभा के लिये खुलापन, खुली सामाजिक-आर्थिक नीतियाँ साथ ही नवाचार के लिये मज़बूत और जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र आदि होते हैं।

चंद्रमा अन्वेषण कार्यक्रम[सम्पादन]

  • द लांग मार्च 5बी (The Long March 5B) 5 मई, 2020 को चीन ने हैनान (Hainan) प्रांत के दक्षिणी द्वीप से एक अंतरिक्ष रॉकेट ‘द लांग मार्च 5बी’ (The Long March 5B) को सफलतापूर्वक लॉन्च किया।

यह प्रक्षेपण चीन के महत्त्वपूर्ण अंतरिक्ष कार्यक्रमों का एक अहम पड़ाव है। वर्ष 2022 तक चीन एक स्थायी अंतरिक्ष स्टेशन का संचालन करने तथा चंद्रमा पर 6 सदस्यों के एक दल को भेजने की योजना बना रहा है। उल्लेखनीय है कि संयुक्त राज्य अमेरिका एकमात्र ऐसा देश है जिसने सफलतापूर्वक मानव को चंद्रमा पर भेजा है।

  • 10 जनवरी, 2020 को भारतीय मूल के अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री राजा चारी को नासा के आर्टेमिस मिशन हेतु चुना गया। राजा चारी सहित नए अंतरिक्ष यात्रियों के इस समूह को अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (International Space Station- ISS), चंद्रमा और मंगल पर अंतरिक्ष मिशन में शामिल किया जा सकता है। NASA ने वर्ष 2030 तक मंगल पर मानव अन्वेषण मिशन को लक्षित किया है। वर्ष 2017 के अंतरिक्ष यात्री कैंडिडेट क्लास के लिये NASA द्वारा राजा चारी को चुना गया था।
आर्टेमिस चंद्रमा अन्वेषण कार्यक्रम के माध्यम से NASA वर्ष 2024 तक पहली महिला और अगले पुरुष को चंद्रमा पर भेजना चाहता है। इस मिशन का लक्ष्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव सहित चंद्रमा की सतह पर अन्य जगहों पर अंतरिक्ष यात्रियों को उतरना है। आर्टेमिस मिशन के लिये नासा के नए रॉकेट जिसे स्पेस लॉन्च सिस्टम (Space Launch System- SLS) कहा जाता है, को चुना गया है। यह रॉकेट ओरियन अंतरिक्ष यान (Orion Spacecraft) में सवार अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी से चंद्रमा की कक्षा में ले जाएगा।ओरियन अंतरिक्ष यान में सवार अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा के चारों ओर रहने और काम करने में सक्षम होंगे साथ ही चंद्रमा की सतह पर अभियान करने में भी सक्षम होंगे। ध्यातव्य है कि ओरियन अंतरिक्ष यान चंद्रमा की कक्षा के चारों ओर चक्कर लगाने वाला एक छोटा सा यान है।

आर्टेमिस मिशन के लिये जाने वाले अंतरिक्ष यात्रियों के लिये नए स्पेस-सूट डिज़ाइन किये गए हैं, जिन्हें एक्सप्लोरेशन एक्स्ट्रावेहिकुलर मोबिलिटी यूनिट (Exploration Extravehicular Mobility Unit) या xEMU कहा जाता है। इस स्पेस-सूट में उन्नत गतिशीलता और संचार तथा विनिमेय भागों (Interchangeable Parts) की सुविधा है, जिसे माइक्रोग्रैविटी में या ग्रहीय सतह पर स्पेसवॉक (Spacewalk) के लिये उपयुक्त आकर दिया जा सकता है। NASA और चंद्रमा से संबंधित तथ्य अमेरिका ने वर्ष 1961 की शुरुआत में ही मनुष्य को अंतरिक्ष में ले जाने की कोशिश शुरू कर दी थी। आठ वर्ष बाद 20 जुलाई, 1969 को नील आर्मस्ट्रांग अपोलो 11 मिशन के तहत चंद्रमा पर कदम रखने वाले पहले मानव बने। अपोलो 11 मिशन के अंतरिक्ष यात्रियों ने एक संकेत के साथ चंद्रमा पर एक अमेरिकी ध्वज छोड़ा था। अंतरिक्ष अन्वेषण के उद्देश्य के अलावा NASA द्वारा अमेरिकियों को फिर से चंद्रमा पर भेजने का प्रयास अंतरिक्ष के क्षेत्र में अमेरिकी नेतृत्व को प्रदर्शित करना और चंद्रमा पर एक रणनीतिक उपस्थिति स्थापित करना है। चंद्रमा पर अन्वेषण कार्यक्रम से संबंधित तथ्य वर्ष 1959 में सोवियत संघ का लूना (Luna) 1 और 2 चंद्रमा पर जाने वाला पहला रोवर बना। गौरतलब है कि तब से लेकर अब तक कुल सात देश यह कार्य करने में सफल हुए हैं। अमेरिका ने चंद्रमा पर अपोलो 11 मिशन भेजने से पहले वर्ष 1961 और 1968 के बीच रोबोटिक मिशन के तीन वर्ग भेजे थे। जुलाई 1969 के बाद और वर्ष 1972 तक 12 अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा की सतह पर गए, साथ ही अपोलो के अंतरिक्ष यात्रियों ने अध्ययन के लिये पृथ्वी पर 382 किलोग्राम चंद्रमा की चट्टान और मिट्टी लाये थे। फिर 1990 के दशक में अमेरिका ने रोबोट मिशन क्लेमेंटाइन (Robotic Missions Clementine) और लूनर प्रॉस्पेक्टर (Lunar Prospector) के साथ चंद्रमा पर अन्वेषण फिर से शुरू किया। वर्ष 2009 में, इसने लूनर रिकॉनाइसेंस ऑर्बिटर (Lunar Reconnaissance Orbiter- LRO) और लूनर क्रेटर ऑब्ज़र्वेशन एंड सेंसिंग सैटेलाइट (Lunar Crater Observation and Sensing Satellite- LCROSS) के प्रक्षेपण के साथ रोबोट लूनर मिशन की एक नई शृंखला की शुरूआत की। वर्ष 2011 में NASA ने पुनरुद्देशित अंतरिक्ष यान (Repurpose Spacecraft) का उपयोग करके आर्टेमिस मिशन (Acceleration, Reconnection, Turbulence, and Electrodynamics of the Moon’s Interaction with the Sun- ARTEMIS) की शुरुआत की और वर्ष 2012 में नासा के ग्रैविटी रिकवरी एंड इंटीरियर लेबोरेटरी (GRAIL) अंतरिक्ष यान ने चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण का अध्ययन किया। अमेरिका के अलावा, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी, जापान, चीन और भारत ने चंद्रमा पर अन्वेषण मिशन भेजे हैं। वर्ष 2019 में चीन ने दो रोवर्स को चंद्रमा की सतह पर उतारा है जिससे चीन चंद्रमा के दूरस्थ भाग पर ऐसा करने वाला पहला देश बन गया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने हाल ही में भारत के तीसरे चंद्र मिशन चंद्रयान -3 की घोषणा की है जिसमें एक लैंडर और एक रोवर शामिल होगा।

शनि मिशन[सम्पादन]

शनि ग्रह का घूर्णन बृहस्पति की भाँति यह भी एक विशाल गैसीय पिंड है तथा इसकी कोई ऊपरी ठोस सतह नहीं है। हालाँकि इसका कोर ठोस स्थिति में है परंतु इसकी बाहरी परत हाइड्रोजन, हीलियम तथा धूल कणों का मिश्रण है। यद्यपि बृहस्पति में घूर्णन अवधि की गणना उससे उत्सर्जित होने वाले रेडियो सिग्नलों की सहायता से की जाती है। इसके विपरीत शनि ग्रह से उत्सर्जित होने वाले रेडियो सिग्नल की आवृत्ति कम होती है जो पृथ्वी के वायुमंडल को भेद नहीं पाते इसकी वजह से इसके घूर्णन अवधि की गणना करना एक चुनौती रहा है। 1980 व 1981 में क्रमशः भेजे गए अंतरिक्ष मिशन वोयेगर-1 तथा वोयेगर-2 से प्राप्त आंकड़ों से ही पहली बार पता चल सका कि शनि ग्रह पर एक दिन की अवधि लगभग 10 घंटे 40 मिनट की है। 23 वर्षों के बाद कैसिनी स्पेसक्राफ्ट द्वारा भेजे गए आंकड़ों से पता चला कि शुक्र के घूर्णन काल में 6 मिनट की वृद्धि हुई है परंतु अनुमान के आधार पर इतनी वृद्धि में करोड़ों वर्ष लग सकते हैं।

मंगल मिशन कार्यक्रम[सम्पादन]

Covid-19 के कारण यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ने मंगल ग्रह पर भेजे जाने वाले एक्सोमार्स मिशन को वर्ष 2022 तक विलंबित/स्थगित करने की घोषणा की है। एक्सोमार्स (ExoMars) मिशन को यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और रूसी अंतरिक्ष एजेंसी ‘राॅसकाॅसमाॅस स्टेट कॉर्प’ (Roscosmos State Corp) के सहयोग से संचालित किया जा रहा है। इसके अंतर्गत रॉसलिंड फ्रेंक्लिन (Rosalind Franklin) नामक एक रोवर को मंगल ग्रह की सतह पर उतारा जाएगा।

इस मिशन का प्रक्षेपण पहले वर्ष 2018 में किया जाना प्रस्तावित था परंतु बाद में इसे बदलकर जुलाई 2020 कर दिया गया था। अब इस मिशन को अगस्त-अक्तूबर 2022 के बीच प्रक्षेपित किया जाएगा जब पृथ्वी और मंगल एक बार पुनः एक सीध में होंगे। यह खगोलीय घटना 26 माह में सिर्फ एक बार होती है। इस योजना के तहत रोवर अप्रैल-जुलाई 2023 के बीच मंगल की सतह पर पहुँचेगा।

इस मिशन के दो भाग हैं,इसके पहले हिस्से में वर्ष 2016 में ‘ट्रेस गैस ऑर्बिटर स्पेसक्राफ्ट’ को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया था। जिसका उद्देश्य मंगल ग्रह के वातावरण में मीथेन (CH4), नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2), एसीटिलीन (C2H2) और जलवाष्प का पता लगाना था।

रॉसलिंड फ्रैंकलिन (Rosalind Franklin) रोवर का नाम ब्रिटिश रसायनशास्त्री ‘रॉसलिंड फ्रैंकलिन ’ के नाम पर रखा गया है। उनके डीएनए (DNA) की खोज में उनके महत्त्वपूर्ण योगदान के लिये जाना जाता है। यह रोवर मंगल ग्रह की सतह पर 2 मीटर की गहराई तक खुदाई कर जाँच के लिये नमूने एकत्र कर सकेगा। इससे पहले नासा द्वारा मंगल ग्रह पर भेजे गए क्यूरियोसिटी रोवर की खुदाई क्षमता लगभग 2 इंच ही थी।
  • मंगल ग्रह पर जीवन की संभावना

NASA) के क्यूरियोसिटी रोवर (Curiosity Rover) यान ने 6 अगस्त, 2012 को मंगल ग्रह पर उतरने के कुछ समय बाद ही गोल आकार के पत्थरों (Rounded Pebbles) की खोज की, जो यह दर्शाता है कि लगभग तीन बिलियन वर्ष पहले इस ग्रह पर नदियाँ विद्यमान थीं। वर्ष 2019 में नासा के क्यूरियोसिटी रोवर यान द्वारा मंगल ग्रह की वायु में मीथेन की उच्च मात्रा संबंधी डेटा भेजा गया है। पृथ्वी पर यह गैस सामान्यतः जीवित जीवों द्वारा उत्सर्जित होती है। वैज्ञानिक इसे मंगल ग्रह पर सूक्ष्मजीवों की उपस्थिति का संकेत मान रहे हैं। वर्ष 2014 में क्यूरियोसिटी रोवर यान ने जीवन के आधारभूत तत्त्व जटिल कार्बनिक अणुओं की खोज की। वर्ष 2020 में अमेरिका द्वारा ‘मार्स, 2020’ (Mars, 2020) और यूरोप द्वारा ‘रोजालिंड फ्रैंकलिन रोवर्स’ (Rosalind Franklin Rovers) यानों को मंगल ग्रह पर सूक्ष्मजीवों की उपस्थिति की खोज के लिये लॉन्च किया जाएगा।

सूर्य मिशन[सम्पादन]

  • नासा (NASA) ने अपने PUNCH मिशन का नेतृत्व करने के लिये टेक्सास स्थित साउथवेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (Southwest Research Institute) का चयन किया है जो सूर्य को प्रतिबिंबित करेगा।

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स (Indian Institute of Astrophysics) के सौर भौतिक विज्ञानी दीपांकर बनर्जी को भी PUNCH मिशन के सह-अन्वेषक के रूप में चुना गया है। जो PUNCH मिशन के तहत सौर हवाओं की गति तेज़ होने के कारणों का अध्ययन करेंगे और इसके अलावा सूर्य के ध्रुवीय क्षेत्रों के बारे में अध्ययन करेंगे। यह एक महत्त्वपूर्ण मिशन है जो सूर्य के बाहरी कोरोना (corona) से परे के क्षेत्रों की छवि बनाएगा या उन्हें प्रतिबिंबित करेगा। PUNCH का पूरा नाम ‘Polarimeter to Unify the Corona and Heliosphere’ है। यह सूर्य के बाहरी कोरोना से सौर हवा में कणों के संक्रमण के अध्ययन पर केंद्रित है। PUNCH में सूटकेस-आकार के चार सूक्ष्म सेटेलाइट शामिल होंगे जो पृथ्वी की परिक्रमा करेंगे और अध्ययन करेंगे कि कोरोना, जो कि सूर्य का वातावरण है, अंतर-ग्रहीय माध्यम से किस प्रकार जुड़ा हुआ है। इसके अलावा PUNCH और भारतीय मिशन आदित्य (आदित्य) के संयुक्त निष्कर्षों के आधार पर सूर्य का अवलोकन करने की भी योजना बनाई जा रही है।

  • भारत सूर्य के कोरोना का अध्ययन करने के लिये आदित्य-एल 1 (Aditya L-1) नामक मिशन की योजना बना रहा है। सूर्य के वर्णमंडल के वाह्य भाग को किरीट/कोरोना (Corona) कहते हैं। पूर्ण सूर्यग्रहण के समय यह श्वेत वर्ण का होता है।किरीट अत्यंत विस्तृत क्षेत्र में पाया जाता है।
सौर पवन सौर कोरोनल पदार्थों की निरंतर धारा है जो सूरज से निकलती रहती है।

इंटरप्लेनेटरी मीडियम:यह पतले बिखरे हुए पदार्थ हैं जो ग्रहों और सौर मंडल के अन्य निकायों, साथ ही साथ बलों (जैसे, चुंबकीय और विद्युत) के बीच मौजूद होते हैं तथा अंतरिक्ष में व्याप्त रहते हैं। इसके भौतिक घटकों में उदासीन हाइड्रोजन, प्लाज्मा गैस शामिल होती है।

  • 30 मार्च, 2020 को नासा द्वारा घोषित सनराइज़ मिशन (SunRISE Mission) सूर्य की उत्पत्ति तथा सूर्य पर होने वाले विशाल मौसमी अंतरिक्ष तूफान जिन्हें ‘सौर कण तूफान’ कहा जाता है, के बारे में अध्ययन करेगा। इसका उद्देश्य सूर्य की उत्पत्ति तथा सौर कण तूफान (Solar Particle Storms) का अध्ययन करना। तथा सौर प्रणाली की क्रियाविधि से संबंधित जानकारी इकट्ठा करना।

सनराइज़ (SunRISE) का पूर्ण रूप ‘सन रेडियो इंटरफेरोमीटर स्पेस एक्सपेरिमेंट’ (Sun Radio Interferometer Space Experiment) है। सनराइज़ में छह क्यूबसैट (CubeSats) शामिल हैं जो एक बड़े रेडियो टेलीस्कोप के रूप में काम करेंगे। सनराइज़ सौर प्रणाली की क्रियाविधि से संबंधित जानकारी इकट्ठा करेगा। जिससे चंद्रमा एवं मंगल पर जाने वाले अंतरिक्ष यात्रियों की रक्षा करने में मदद मिल सकती है।

इस मिशन के लिये नासा ने $ 62.6 मिलियन के बजट की घोषणा की है।

इस मिशन का डिज़ाइन छह सौर-संचालित क्यूबसैट पर निर्भर करता है जो सौर गतिविधि से उत्सर्जित कम आवृत्ति वाले रेडियो चित्रों का निरीक्षण करता है और उन्हें नासा के डीप स्पेस नेटवर्क (NASA’s Deep Space Network) के माध्यम से साझा करता है। क्यूबसैट्स का समूह पृथ्वी के वायुमंडल के ऊपर एक दूसरे से 6 मील की दूरी पर उड़ेगा जहाँ रेडियो संकेतों को अवरुद्ध करके सनराइज़ द्वारा निरीक्षण किया जायेगा। जहाँ विशाल सौर कण उत्पन्न होते हैं उनके पिनपॉइंट के आधार पर छह क्यूबसैट एक साथ मिलकर 3D मैप विकसित करेंगे जिससे यह पता लगाया जा सके कि वे अंतरिक्ष में बाहर की ओर विस्तार करते हुए कैसे विकसित होते हैं। इसके अतिरिक्त छह व्यक्तिगत अंतरिक्ष यान भी मैपिंग के लिये मिलकर काम करेंगे। गौरतलब है कि नासा ने 11 महीने के अवधारणात्मक अध्ययन का संचालन करने के लिये अपने मिशन ऑफ ऑपर्च्युनिटी (Mission of Opportunity) कार्यक्रम के एक हिस्से के रूप में अगस्त 2017 में दो मिशन चुने थे। सनराइज़ उन दो मिशनों में से एक था।

आर्टेमिस मिशन के तहत नासा का लक्ष्य वर्ष 2024 तक चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव सहित चंद्रमा की सतह पर अन्य जगहों पर अंतरिक्ष यात्रियों को उतरना है।

19 अक्तूबर, 2017 को हवाई के माउ में ‘पैनोरमिक सर्वे टेलिस्कोप एंड रैपिड रिस्पांस सिस्टम’ (Pan-STARRS) के उपकरण 1 का संचालन करने वाले खगोलविदों ने पृथ्वी से 32 मिलियन किलोमीटर दूर नक्षत्र लाइरा से बाहर की तरफ किसी अज्ञात गंतव्य की ओर आते हुए एक असामान्य पिंड को देखा। इस पिंड की चमक नाटकीय ढंग से 7 से 8 घंटे के अंतराल पर परिवर्तित होती रहती है। सिगार जैसे आकार का यह पिंड 800 मीटर लंबा तथा 80 मीटर चौड़ा है। यह सौरमंडल में देखा गया पहला इंटरस्टेलर ऑब्जेक्ट है। वैज्ञानिकों ने इसका नाम ‘ओउमुआमुआ’ या ‘स्काउट’ (भेदिया) या ‘सुदूर से भेजा गया संदेश वाहक’ रखा है।

SpaceX द्वारा दुनिया में ‘वाणिज्यिक अंतरिक्ष यात्रा’ की शुरुआत[सम्पादन]

नासा द्वारा निजी कंपनी SpaceX के रॉकेट से दो अंतरिक्ष यात्रियों को 'अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन' (International Space Station- ISS) भेजने के साथ हीं इसकी शुरुआत हुई। अंतरिक्ष यात्री डग हार्ले (Doug Hurley) और बॉब बेनकेन (Bob Behnken) SpaceX के रॉकेट Falcon 9 की मदद से ‘अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन‘ पहुँचे हैं। यात्रियों को जिस क्रू कैप्सूल के माध्यम से ले जाया गया है उसे ‘क्रू ड्रैगन’ (Crew Dragon) नाम दिया गया है। अंतरिक्ष यान की यात्रा:-SpaceX का फाल्कन- 9 दो चरणों वाला रॉकेट है जिसने ‘फ्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर’ (Florida's Kennedy Space Center) से यात्रा प्रारंभ की। SpaceX के कैप्सूल को ISS के साथ 'डॉकिंग प्रक्रिया' को पूरा करने में 28,000 किमी. प्रति घंटे की गति से 19 घंटे का समय लगा। डॉकिंग प्रक्रिया में दो अलग-अलग स्वतंत्र रूप से अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले वाहनों को एक साथ जोड़ा जाता है। ISS पहुँचने के साथ ही यात्रा का प्रथम चरण पूरा हो गया है परंतु मिशन को तभी सफल घोषित किया जाएगा जब अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी पर सुरक्षित लौट आएंगे।

अंतरिक्ष यात्रा का शरीर पर प्रभाव:-पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की सीमा के ऊपर विकिरण के कारण कैंसर का खतरा बढ़ जाता है साथ में केंद्रीय तंत्रिका तंत्र और संज्ञानात्मक क्रियाएँ (पहचान संबंधी समस्याएँ) भी प्रभावित हो सकते हैं। एक लंबे समय तक एक छोटी सी जगह में लोगों के समूहों को रखा जाता है, तो उनके बीच व्यवहार संबंधी मुद्दे उभर आते हैं चाहे वे कितने भी प्रशिक्षित क्यों न हों।

एक अंतरिक्ष यात्री को संचार में देरी, उपकरणों की विफलता या चिकित्सा- आपातकाल जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। मानक गुरुत्वाकर्षण में कमी या वृद्धि का हड्डियों, मांसपेशियों, हृदय प्रणाली सभी पर प्रभाव पड़ता है। रॉकेट में यात्रियों के लिये आवश्यक तापमान, दबाव, प्रकाश, ध्वनि आदि को मानव आवश्यकता के अनुसार अनुकूलित करना होता है

रूस पर अमेरिका की निर्भरता:-नासा द्वारा वर्ष 2011 में 'अंतरिक्ष शटल कार्यक्रम’ (Space Shuttle Programme) समाप्त होने की घोषणा कर दी गई थी। इसके बाद से रूसी ‘सोयुज़’ एकमात्र ऐसे अंतरिक्ष यान हैं जो अंतरिक्ष यात्रियों को ISS में आवागमन की सुविधा देते हैं। NASA रूस के ‘सोयुज़ स्पेस शटल’ कार्यक्रम पर अपनी निर्भरता को कम करना चाहता है।

निजी क्षेत्र का सहयोग: नासा ने अपने 'वाणिज्यिक क्रू कार्यक्रम' (Commercial Crew Programme- CCP) के तहत निजी क्षेत्र की कंपनियों SpaceX और बोइंग (Boeing) के साथ अंतरिक्ष यान निर्माण के लिये समझौते किया था। अमेरिका द्वारा भविष्य में अंतरिक्ष यान का उपयोग करने के लिये लगभग 7 बिलियन डॉलर का अनुबंध किया गया था। लेकिन बोइंग कंपनी, विगत वर्ष किये गए परीक्षण के असफल रहने के बाद SpaceX कंपनी से अलग हो गई।

वर्ष 2019 में स्पेसएक्स (SpaceX) के अन्य कार्य[सम्पादन]

  • अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) और स्पेस एक्स कंपनी (SpaceX) ने कहा है कि COVID-19 जैसी स्थिति के बावजूद 27 मई, 2020 को डेमो-2 मिशन (Demo-2 Mission) के तहत अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष मे भेजने हेतु लॉन्च किया जाएगा।

इस मिशन में फाल्कन-9 (Falcon-9) रॉकेट का उपयोग किया जायेगा। इसके माध्यम से अंतरिक्ष यात्रियों को अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर विस्तारित प्रवास के लिये भेजा जाएगा। इस मिशन को स्पेस एक्स (SpaceX) द्वारा लॉन्च किया जायेगा। यह एलन मस्क स्पेस कंपनी (Elon Musk Space Company) का पहला क्रू लॉन्च है। बेहनकेन (Behnken) और हर्ले (Hurley) जिन्हें ‘डेमो -2’ मिशन के लिये प्रशिक्षित किया जा रहा है, अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (International Space Station) पर पहुँचकर एक से चार महीने तक वहाँ रहेंगे। अंतरिक्ष यात्रियों को अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन भेजने वाले नासा के इस मिशन को ‘वाणिज्यिक क्रू कार्यक्रम’ (Commercial Crew Programme) नाम दिया गया है। डेमो-1 मिशन (Demo-1 Mission): नासा के डेमो-1 मिशन को स्पेस एक्स ने लॉन्च किया था। डेमो-1 अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में लॉन्च की जाने वाली पहली नान-क्रू (मानवरहित) परीक्षण उड़ान थी। वर्तमान में स्पेस एक्स (SpaceX) और बोईंग (Boeing) कंपनी नासा के अंतरिक्ष टैक्सी प्रदाता हैं। वाणिज्यिक क्रू कार्यक्रम’ (Commercial Crew Programme): ‘वाणिज्यिक क्रू कार्यक्रम’ को संयुक्त राज्य अमेरिकी सरकार द्वारा वित्त पोषित किया गया था। और इसका प्रशासनिक कार्यान्वयन नासा की देखरेख में हुआ था। इस कार्यक्रम के तहत निजी विक्रेता अंतरिक्ष यात्रियों को अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक ले जाने के लिये क्रू वाहनों का संचालन करेंगे।

  • स्पेसएक्स (SpaceX) ने स्पेस इंटरनेट (Space Internet) की सुविधा मुहैया कराने के लिये 60 सैटेलाइटों के एक समूह को निम्न भू-कक्षा (Low Earth Orbit-LEO) में स्थापित किया। स्पेसएक्स की इस महत्त्वाकांक्षी परियोजना का नाम स्टारलिंक नेटवर्क (Starlink Network) है। इसके माध्यम से यह कंपनी वर्ष 2020 तक संयुक्त राज्य अमेरिका तथा कनाडा में स्पेस इंटरनेट की सुविधा देना प्रारंभ कर देगी। वर्ष 2021 तक इसका लक्ष्य पूरी पृथ्वी पर कम कीमत में नॉन-स्टॉप स्पेस इंटरनेट की सुविधा प्रदान करना है। इस परियोजना के पहले चरण में 12,000 सैटेलाइटों को निम्न भू-कक्षा (Low Earth Orbit) में स्थापित किया जाएगा। इसके बाद दूसरे चरण में 30,000 सैटेलाइटें भी इसी कक्षा में स्थापित की जाएंगी।
  • स्पेसएक्स (Spacex) ने 24 प्रायोगिक उपग्रहों के साथ अपने शक्तिशाली ‘फॉल्‍कन हेवी’ रॉकेट को पुनः लॉन्च किया है। इसके नीतभार/पेलोड्स को विभिन्न सहयोगियों के माध्यम से संकलित किया गया है, जिसमें विश्वविद्यालय अनुसंधान परियोजनाओं के अलावा राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन (National Oceanic and Atmospheric Administration-NOAA) और नासा (NASA) शामिल हैं।

फॉल्‍कन हेवी, को अमेरिकी स्पेसएक्स कंपनी दुनिया का सबसे शक्तिशाली परिचालन रॉकेट मानती है। क्योंकि यह दो दर्ज़न अंतरिक्ष यानों को अंतरिक्ष के तीन अलग-अलग कक्षाओं में ले जाने में सक्षम है। कंपनी एक साथ फॉल्‍कन हैवी के दो बूस्टरों को पृथ्वी पर वापस लाने का प्रयास करेगी। रॉकेट के पहले चरण के अंतर्गत समुद्र में एक ड्रोन जहाज़ पर उतारेगा, जो इसके प्रक्षेपण स्थल से लगभग 770 मील की दूरी पर स्थित है। स्पेसएक्स ने पहली बार फरवरी 2018 में 230-फुट लंबे (70-मीटर) फॉल्‍कन हैवी को अंतरिक्ष में भेजा था। इसके पश्चात वर्ष 2019 के अप्रैल माह में, उसने अपने पहले ग्राहक, सऊदी अरब के वाणिज्यिक उपग्रह ऑपरेटर अरबसैट (Arabsat) के लिये फॉल्‍कन हैवी लॉन्च किया। स्पेसएक्स एक निजी कंपनी है,जिसकी स्थापना वर्ष 2002 में एलन मस्क ने की थी। इसका मुख्यालय हॉथोर्न, कैलिफोर्निया (U.S.A) में स्थित है।

  • 4 अगस्त 2020 को स्पेसएक्स कंपनी के SN5 स्टारशिप प्रोटोटाइप (SN5 Starship Prototype) द्वारा अपनी पहली परीक्षण उड़ान पूरी की गई। इस प्रोटोटाइप ने 60 सेकंड से भी कम समय में 500 फीट से अधिक की ऊँचाई तक सफलतापूर्वक उड़ान भरी। यह स्पेसएक्स कंपनी के बिना चालक दल वाले ‘मार्स शिप’ (Mars ship) का हिस्सा है, यह एक स्टेनलेस स्टील परीक्षण वाहन है जिसे SN5 कहा जाता है। यह परीक्षण उड़ान संयुक्त राज्य अमेरिका में दक्षिणी टेक्सास के बोका चिका (Boca Chica) नामक स्थान से की गई थी जो अंतरिक्ष यान के कक्षीय मिशन के लिये डिज़ाइन किया गया स्पेसएक्स का व्यावसायिक स्थल है।
स्पेसएक्स द्वारा डिज़ाइन किया गया ‘स्टारशिप’ (Starship) एक अंतरिक्ष यान एवं सुपर-हैवी बूस्टर रॉकेट है जो पृथ्वी की कक्षा, चंद्रमा एवं मंगल पर चालक दल एवं कार्गो के लिये पुन: प्रयोज्य परिवहन प्रणाली के रूप में कार्य करेगा। स्पेसएक्स ने स्टारशिप को ‘दुनिया का सबसे शक्तिशाली प्रक्षेपण वाहन’ के रूप में वर्णित किया है जिसमें पृथ्वी की कक्षा में 100 मीट्रिक टन से अधिक भार ले जाने की क्षमता है।

स्टारशिप की विशेषताएँ: स्टारशिप अंतरिक्ष यान 7.5 किमी. प्रति सेकंड की गति से मंगल ग्रह के वायुमंडल में प्रवेश करेगा। स्पेसएक्स कंपनी वर्ष 2022 तक मंगल ग्रह के लिये अपने पहले कार्गो मिशन की योजना बना रही है और वर्ष 2024 तक कंपनी दो मालवाहक एवं दो चालक दल सहित चार जहाज़ों को मंगल ग्रह पर भेजना चाहती है। स्टारशिप स्पेसएक्स के फाल्कन प्रक्षेपण वाहन की तुलना में कम लागत में तथा अधिक दूरी तक प्रक्षेपित कर सकता है तथा यह चालक दलों एवं आवश्यक वस्तुओं दोनों को, अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) तक पहुँचा सकता है। स्टारशिप मानव की अंतरिक्ष यात्रा के विकास एवं अनुसंधान के लिये चंद्रमा तक विभिन्न उपकरणों एवं अन्य वस्तुओं के ले जाने में सहायक होगा। इस अंतरिक्ष यान को चंद्रमा से परे, अंतर-ग्रहीय अभियानों (Interplanetary Missions) के लिये चालक दल एवं अन्य वस्तुओं को ले जाने के लिये डिज़ाइन किया जा रहा है। गौरतलब है कि हाल ही में स्पेसएक्स कंपनी का क्रू ड्रैगन (Crew Dragon) कैप्सूल अंतरिक्ष की यात्रा करने के बाद मैक्सिको की खाड़ी में बहामास के पास उतरा था।

क्वांटम उपग्रह आधारित संचार प्रणाली[सम्पादन]

चीनी वैज्ञानिकों के एक अध्ययन दल ने ‘मिसियस’ (Micius) क्वांटम उपग्रह का प्रयोग कर विश्व में पहली बार ‘क्वांटम इंटेंगलमेंट’ (Quantum Entanglement) पर आधारित लंबी दूरी के बीच ‘क्वांटम क्रिप्टोग्राफी’ (Quantum Cryptography) को सफलतापूर्वक स्थापित किया गया है, जो क्वांटम दूरसंचार के व्यावहारिक इस्तेमाल में एक महत्त्वपूर्ण प्रगति माना जा रहा है।

पान जियान-वी (Pan Jian-Wei), जिन्हें चीन में 'क्वांटम तकनीक का पिता' माना जाता है, के नेतृत्त्व वाली ऑपरेटिंग टीम ने क्वांटम तकनीक की दिशा में कई सफलताओं को प्राप्त किया है।

मिसियस उपग्रह के माध्यम से मूल ग्राउंड स्टेशन जो एक-दूसरे से 1,200 किमी. की दूरी पर स्थित थे, के मध्य इंटैंगलमेंट क्वांटम क्रिप्टोग्राफी को सफलतापूर्वक स्थापित किया गया है। इंटैंगलमेंट फोटॉन आपस में संबंधित हल्के कण होते हैं जिनके गुण आपस में संबंधित रहते हैं। यदि किसी एक फोटॉन में हेराफेरी की जाती है, तो इसका प्रभाव दूसरे फोटॉन पर भी होता है। क्वांटम संचार: क्वांटम क्रिप्टोग्राफी या क्वांटम कुंजी वितरण (Quantum Key Distribution- QKD) सुरक्षित संचार के लिये ‘सममित कूटबद्ध कुंजी’ (Symmetric Encoded Key) के वितरण को सुरक्षित करने की एक तकनीक है। इसमें संचार के लिये फोटॉन जो कि 'क्वांटम कण है, का प्रयोग किया जाता है। विभिन्न QKD प्रोटोकॉल को यह सुनिश्चित करने के लिये डिज़ाइन किया गया है कि संचार में काम आने वाले फोटॉनों में किसी प्रकार की हेराफेरी संपूर्ण संचार प्रणाली को रोक दे। क्वांटम संचार उपग्रह मिसियस (Micius): मिसियस (Micius) विश्व का प्रथम क्वांटम संचार उपग्रह है, जिसे वर्ष 2016 में लॉन्च किया गया था। उपग्रह का नाम प्राचीन चीनी दार्शनिक मोज़ि (Mozi) के नाम पर रखा गया है।

क्वांटम दूरसंचार में चुनौतियाँ: ऑप्टिकल आधारित QKD का उपयोग कर केवल कुछ किलोमीटर की दूरी तक संचार स्थापित किया जा सकता है, अत: इस समस्या का समाधान करने के लिये उपग्रह आधारित क्वांटम संचार प्रणाली पर कार्य किया जा रहा है। लंबी दूरी के लिये संचार स्थापित करना: अब तक ऑप्टिकल आधारित QKD का उपयोग कर केवल 100 किलोमीटर तक ही सुरक्षित संचार स्थापित किया गया है। हालाँकि रिपीटर (Repeater) के प्रयोग से क्वांटम दूरसंचार की लंबाई बढ़ाई जा सकती है। उदाहरण के लिये विश्व में पहली क्वांटम गोपनीय दूर संचार लाइन पेइचिंग-शांगहाई की लंबाई 2000 किमी. है, जिसमें 32 रिपीटरों का प्रयोग किया गया है। रिपीटर एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है जो संकेत प्राप्त करता है और इसे आगे पहुँचाता है। ट्रांसमीटरों का विस्तार करने के लिये रिपीटर का उपयोग किया जाता है ताकि सिग्नल लंबी दूरी को कवर कर सके। सुरक्षा का मुद्दा: जब रिपीटर का प्रयोग क्वांटम संचार दूरी बढ़ाने में किया जाता है तो इस रिपीटर की सुरक्षा मानव द्वारा सुनिश्चित की जाती है अत: सूचनाओं के लीक होने का खतरा रहेगा। शोध का महत्त्व: क्वांटम उपग्रह आधारित लंबी दूरी की संचार तकनीक 'क्वांटम इंटरनेट' की दिशा में प्रमुख कदम होगा। क्वांटम तकनीक के राजनीतिक और सैन्य निहितार्थ हैं जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता है। वर्ष 2013 में एडवर्ड स्नोडेन द्वारा पश्चिमी सरकारों द्वारा की जाने वाली इंटरनेट निगरानी के खुलासे के बाद संचार को अधिक सुरक्षित बनाने के लिये चीन जैसे देशों ने क्वांटम क्रिप्टोग्राफी में अनुसंधान बढ़ाने को प्रोत्साहित किया है।

कुइझोउ-11 (Kuaizhou-11) नाम का चीनी रॉकेट उड़ान के दौरान आई खराबी के कारण विफल हो गया जिसके कारण अंतरिक्ष में ले जाए जा रहे दो उपग्रह भी नष्ट हो गए।[सम्पादन]

चीनी भाषा में कुइझोउ (Kuaizhou) का अर्थ ‘तेज़ जहाज़’ (Fast Ship) होता है। यह एक कम लागत वाला ठोस ईंधन वाहक रॉकेट है। इस चीनी रॉकेट का वाणिज्यिक लॉन्च ‘फर्म एक्सपेस’ (Firm Expace) द्वारा संचालित किया गया था। गौरतलब है कि इसे वर्ष 2018 में लॉन्च करने की योजना बनाई गई थी। इसे KZ-11 के रूप में भी जाना जाता है। इसमें 70.8 टन की वहनीय भार क्षमता थी और इसे पृथ्वी की निचली एवं सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा के उपग्रहों को लॉन्च करने के लिये डिज़ाइन किया गया था। चीन के अन्य महत्त्वपूर्ण मिशन: तियानवेन-1 (Tianwen-1): चीन का यह मंगल मिशन जुलाई, 2020 तक शुरू किया जाएगा। चीन का पिछला यिंगहुओ-1 (Yinghuo-1) मंगल मिशन जिसे रूस द्वारा समर्थन दिया गया था, वर्ष 2012 में विफल हो गया था। तियानवेन-1 में लॉन्ग मार्च 5 रॉकेट (Long March 5 Rocket) का प्रयोग किया जाएगा। लॉन्ग मार्च 5 रॉकेट (Long March 5 Rocket): इसे एक स्थायी अंतरिक्ष स्टेशन का संचालन करने तथा चंद्रमा पर अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने के लिये चीन के सफल कदम के रूप में माना जाता है। तियांगोंग (Tiangong): वर्ष 2022 तक चीन अपना स्पेस स्टेशन (तियांगोंग) बनाने का कार्य पूरा कर लेगा। चीनी भाषा में तियांगोंग (Tiangong) का अर्थ 'हैवेनली पैलेस' (Heavenly Palace) है। महत्त्व: यद्यपि यह प्रक्षेपण विफल रहा किंतु यह चीन में तेज़ी से बढ़ते वाणिज्यिक अंतरिक्ष उद्योग (Commercial Space Industry) को दर्शाता है। विश्लेषक बताते है कि वाणिज्यिक प्रक्षेपण चीन में एक उभरता हुआ उद्योग है। चीनी सरकार द्वारा वर्ष 2014 में अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी निवेश के लिये आसान बनाये गए नियमों के बाद अस्तित्त्व में आई एक्सपेस (Expace), आईस्पेस (iSpace) और लैंडस्पेस (Landspace) जैसी कंपनियाँ अपने पारंपरिक लॉन्च ऑपरेशन के लिये प्रक्रिया क्षमताओं का तीव्र विकास करने पर ज़ोर दे रही हैं। इसने चीनी सरकार एवं वाणिज्यिक ग्राहकों दोनों के लिये अधिक लाभ प्रदान किया है। अंतरिक्ष का व्यावसायीकरण एवं भविष्य में भारत और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा की संभावना: कम लागत वाले वाहक रॉकेटों के विकास को इस पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिये कि चीन ‘वैश्विक अंतरिक्ष प्रक्षेपण बाज़ार’ को आकर्षित करने हेतु भारत के साथ प्रतिस्पर्द्धा करने के लिये तैयार है। वर्ष 2017 में चीनी मुख्य पत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, चीन का वाणिज्यिक अंतरिक्ष उद्योग भारत से पीछे है। गौरतलब है कि भविष्य में चीनी रॉकेटों को उपग्रह बाज़ार में अपने लिये एक जगह बनानी होगी जहाँ भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (Indian Space Research Organisation- ISRO) पहले ही एक मुकाम हासिल कर चुका है। इसरो के प्रयासों एवं विश्वसनीय ‘ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान’ (Polar Satellite Launch Vehicle- PSLV) से अब तक 297 विदेशी उपग्रहों को लॉन्च किया गया है और इसके विभिन्न संस्करण हैं जो विभिन्न आकार के पेलोड और भिन्न-भिन्न कक्षाओं में उपग्रहों को ले जाने की क्षमता रखते हैं। लघु उपग्रह क्रांति (Small Satellite Revolution): गौरतलब है कि इस समय वैश्विक स्तर पर ‘लघु उपग्रह क्रांति’ (Small Satellite Revolution) चल रही है जिसके तहत वर्ष 2020 और वर्ष 2030 के बीच 17000 छोटे उपग्रहों को लॉन्च किये जाने की उम्मीद है। अंतरिक्ष पर्यटन एवं भारत: अंतरिक्ष पर्यटन क्या है? अंतरिक्ष पर्यटन मनोरंजक उद्देश्यों के लिये मानव की अंतरिक्ष यात्रा से संबंधित है। अंतरिक्ष पर्यटन के कई अलग-अलग प्रकार हैं जिसमें कक्षीय (Orbital), उप-कक्षीय (Suborbital) और चंद्र अंतरिक्ष पर्यटन (Lunar Space Tourism) शामिल हैं। वर्तमान में कक्षीय (Orbital) अंतरिक्ष पर्यटन के लिये केवल रूसी अंतरिक्ष एजेंसी ही कार्य कर रही है। भारत के लिये अवसर: आर्थिक तौर पर कुशल लॉन्च वाहनों के अलावा भारत को निजी क्षेत्र की भागीदारी के माध्यम से अंतरिक्ष पर्यटन के क्षेत्र में भी संभावनाओं की तलाश करनी चाहिये। इस क्षेत्र में निजी भागीदारी को आकर्षित करने के लिये एक नीतिगत ढाँचा भारत सरकार द्वारा तैयार किया जाना चाहिये। अंतरिक्ष पर्यटन के क्षेत्र में भारत यदि नीतिगत दृष्टिकोण से आगे बढ़ता है तो यह क्षेत्र आने वाले समय में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये एक अहम क्षेत्र साबित होने के साथ-साथ भारत को ‘वैश्विक/क्षेत्रीय सामरिक भागीदारी’ में बढ़त दिला सकता है। अंतरिक्ष क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा: संयुक्त राज्य अमेरिका: हाल ही में स्पेसएक्स (SpaceX) ‘मानव स्पेसफ्लाइट’ को अंतरिक्ष में लॉन्च करने वाली पहली निजी कंपनी बन गई। अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) में नासा के अंतरिक्ष यात्रियों को सफलतापूर्वक ले जाने के लिये अंतरिक्ष यान क्रू ड्रैगन (Crew Dragon) का उपयोग किया गया। सिंगापुर: यह पूर्वी एशियाई देश अपने वैध वातावरणीय क्षेत्र, कुशल जनशक्ति की उपलब्धता एवं भूमध्यरेखीय स्थान की अनुकूलता के आधार पर अंतरिक्ष उद्यमिता के एक केंद्र के रूप में खुद को पेश कर रहा है। न्यूज़ीलैंड: यह प्रशांत महासागरीय देश निजी रॉकेट लॉन्च के लिये सटीक अवस्थिति होने के कारण स्वयं को वैश्विक स्तर पर आगे कर रहा है। भारत द्वारा अंतरिक्ष उद्यमिता के लिये उठाए गए कदम: भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्द्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (Indian National Space Promotion and Authorization Centre- IN-SPACe) द्वारा निजी कंपनियों को अवसर प्रदान करने के लिये स्वीकृति देना। ‘न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड’ (New Space India Limited- NSIL), भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (Indian Space Research Organisation) की नव निर्मित दूसरी वाणिज्यिक शाखा है। यह ‘एंट्रिक्स कॉर्पोरेशन’ के बाद इसरो की दूसरी व्यावसायिक शाखा है। एंट्रिक्स कॉर्पोरेशन को मुख्य रूप से वर्ष 1992 में इसरो के विदेशी उपग्रहों के वाणिज्यिक प्रक्षेपण की सुविधा हेतु स्थापित किया गया था। इसरो वैश्विक स्तर पर कई मोर्चों में अंतरिक्ष मिशनों के लिये कम लागत में मिशन पूरा करने वाला अग्रणी संस्थान है। लागत-प्रभावशीलता ने इसे उपग्रह प्रक्षेपण सेवाओं के वाणिज्यिक क्षेत्र में एक अलग बढ़त दी है। देश के भीतर विशेषज्ञता के ऐसे मूल्यवान आधार के साथ एक निजी अंतरिक्ष उद्योग के उद्भव की उम्मीद करना स्वाभाविक है जो वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्द्धी साबित हो सकता है।

अंतरिक्ष विज्ञान[सम्पादन]

  • नासा (NASA) ने चेतावनी जारी की है कि एक विशाल ‘क्षुद्रग्रह 2020 एनडी’ (Asteroid 2020 ND) 24 जुलाई,2020 को पृथ्वी के नज़दीक से होकर गुजरेगा। लगभग 170 मीटर लंबा यह क्षुद्रग्रह पृथ्वी से 0.034 खगोलीय इकाई (5086328 किलोमीटर) के करीब होगा और यह 48,000 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से यात्रा कर रहा है।

पृथ्वी से इस क्षुद्रग्रह की दूरी के कारण इसे ‘संभावित खतरनाक’ (Potentially Dangerous) श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया है। संभावित खतरनाक क्षुद्रग्रह (Potentially Hazardous Asteroids- PHAs): नासा के अनुसार, ‘संभावित खतरनाक क्षुद्रग्रह (PHAs) वर्तमान में उन मापदंडों के आधार पर परिभाषित किये गए हैं जो क्षुद्रग्रह की क्षमता को मापते हैं और पृथ्वी के करीब आने पर खतरनाक साबित हो सकते हैं। विशेष रूप से 0.05 खगोलीय इकाई (AU) या उससे कम की ‘मिनिमम ऑर्बिट इंटरसेक्शन डिस्टेंस’ (Minimum Orbit Intersection Distance- MOID) वाले सभी क्षुद्रग्रहों को संभावित खतरनाक क्षुद्रग्रह (PHAs) माना जाता है।’ नासा (NASA) इन वस्तुओं (जैसे- क्षुद्रग्रह) को ‘नियर-अर्थ ऑब्जेक्ट’ (NEO) के रूप में वर्गीकृत करता है क्योंकि वे अन्य ग्रहों के गुरुत्त्वाकर्षण बल से प्रभावित होते हैं जिसके परिणामस्वरूप हमारी सौर प्रणाली से उनकी निकटता होती है। फिर भी यह आवश्यक नहीं है कि PHAs के रूप में वर्गीकृत क्षुद्रग्रह पृथ्वी को प्रभावित करेंगे। नियर-अर्थ ऑब्जेक्ट (NEO): NEO धूमकेतु एवं क्षुद्र ग्रह हैं जो पास के ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा कक्षाओं में प्रवेश कर जाते हैं जो उन्हें पृथ्वी के आस-पास की कक्षाओं में प्रवेश करने की अनुमति देता है। ये NEO ज्यादातर बर्फीले जल के साथ धूल कणों से निर्मित होते हैं और कभी-कभी ये पृथ्वी के करीब पहुँचते हैं।

  • चीन ने औपचारिक रूप से अपने बाइडू-3 नेवीगेशन सैटेलाइट सिस्टम (BeiDou-3 Navigation Satellite System) की वैश्विक सेवाओं की शुरुआत की है। चीन के दावे के अनुसार, चीन का यह घरेलू नेवीगेशन सैटेलाइट सिस्टम उपग्रहों के एक व्यापक नेटवर्क का उपयोग करते हुए लगभग दस मीटर के अंदर सटीक अवस्थिति बता सकता है। अमेरिका का ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS) 2.2 मीटर के अंदर अवस्थिति की सटीकता प्रदान करता है।

चीन का बाइडू नेवीगेशन सैटेलाइट सिस्टम सटीक स्थिति, सटीक नेवीगेशन और सटीक समय के साथ-साथ छोटे संदेशों के संचार की सेवाएँ प्रदान करता है। इस प्रणाली का उपयोग चीन के विभिन्न क्षेत्रों जैसे-रक्षा, परिवहन, कृषि, मत्स्यपालन और आपदा राहत आदि में किया जा रहा है। चीन का बाइडू-3 नेवीगेशन सैटेलाइट सिस्टम अमेरिका के GPS, रूस के ग्लोनास (GLONASS) और यूरोपीय संघ (EU) के गैलीलियो (Galileo) के बाद चौथा वैश्विक उपग्रह नेवीगेशन सिस्टम होगा।

  • नासा दिसंबर 2023 में स्ट्रैटोस्फियर के लिए अंटार्कटिका से ASTHROS मिशन लॉन्च करेगा। यह मिशन तीन सप्ताह महाद्वीप के ऊपर हवा की धाराओं को देखने के लिए खर्च करना है।ASTHROS मिशन स्ट्रैटोस्फियर में एक फुटबॉल स्टेडियम के आकार के गुब्बारे भेजेगा। गुब्बारा पृथ्वी से अदृश्य प्रकाश की तरंग दैर्ध्य का निरीक्षण करेगा। गुब्बारे में एक दूरबीन, उप प्रणालियाँ, विज्ञान उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली और शीतलन प्रणाली होती है। बैलून को हीलियम से फुलाया जाना है। सुपरकंडक्टिंग डिटेक्टरों को -268.5 डिग्री सेल्सियस पर रखने के लिए एक क्रायोकूलर को गुब्बारे के साथ जोड़ा जाना है।
ASTHROS is Astrophysics Stratospheric Telescope for High Spectral Resolution Observation as Sub millimetre wavelengths. The mission is operated by Jet Propulsion Laboratory of NASA.

The ASTHROS Mission of NASA aims to create a 3D map of density, motion, and speed of gas. मिशन को मिल्की वे गैलेक्सी में विशाल सितारों की अनसुलझी पहेलियों और उनके निर्माण के बारे में जवाब मिलेंगे। पहली बार मिशन दो विशिष्ट प्रकार के नाइट्रोजन आयनों की उपस्थिति का पता लगाएगा और मैप करेगा। ये आयन उन स्थानों को प्रकट करने में मदद करेंगे जहां सुपरनोवा विस्फोटों से बड़े पैमाने पर तारों ने गैस के बादलों को फिर से जमाने में मदद की।

  • NASA ने चार आगामी मिशनों का प्रस्ताव रखा है जिनमें से दो मिशनों को शुक्र ग्रह और एक-एक मिशन का प्रस्ताव बृहस्पति के उपग्रह आयो (Io) और वरुण के उपग्रह ट्राइटन (Triton) के परीक्षण के लिये रखा है।

इन मिशनों का अंतिम चयन वर्ष 2021 में किया जाएगा। NASA के प्रस्तावित अंतरिक्ष अनुसंधान मिशन:

  1. डेविंसी प्लस (DAVINCI+) का उद्देश्य शुक्र ग्रह पर उपस्थित नोबल गैसों, इसके रासायनिक संगठन, इमेजिंग प्लस (दृश्यों के माध्यम से शुक्र की आतंरिक सतह का परीक्षण) तथा वायुमंडलीय सर्वेक्षण करना है।

इस मिशन के माध्यम से शुक्र के वायुमंडल तथा इसके गठन और विकास का विश्लेषण किया जाएगा तथा इस ग्रह पर पूर्व में महासागर की उपस्थिति की जाँच की जाएगी। यह मिशन स्थलीय ग्रहों के गठन की समझ को विकसित करने में सहायता करेगा। आयो वॉल्केनो ऑब्ज़र्वर (Io Volcano Observer-IVO): NASA द्वारा प्रस्तावित IVO मिशन का उद्देश्य बृहस्पति के उपग्रह आयो का परीक्षण करना है, जिस पर कई सक्रिय ज्वालामुखी उपस्थित हैं। इस मिशन के माध्यम से यह पता लगाने की कोशिश भी की जाएगी कि ज्वारीय बल ग्रहों की आकृति को किस प्रकार प्रभावित करते हैं। इस मिशन द्वारा प्राप्त निष्कर्षों से सौरमंडल में चट्टानों, स्थलीय निकायों और बर्फीले महासागरों के गठन और विकास के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त की जा सकेगी। ट्राईडेंट (TRIDENT): इसका उद्देश्य वरुण ग्रह के बर्फीले उपग्रह ट्राइटन (Triton) का अवलोकन करना है ताकि वैज्ञानिक सौरमंडल में रहने योग्य ग्रहों के विकास को समझ सकें। वेरिटस (VERITAS): इस मिशन का विस्तृत नाम ‘वीनस एमिसिविटी, रेडियो साइंस, इनसार, टोपोग्राफी एंड स्पेक्ट्रोस्कोपी’ (Venus Emissivity, Radio Science, InSAR, Topography, and Spectroscopy) है। इस मिशन का उद्देश्य शुक्र ग्रह की सतह का अध्ययन करके यह पता लगाना है कि शुक्र ग्रह की विशेषताएँ पृथ्वी से अलग क्यों हैं। संभावित लाभ: इन अभियानों से सौरमंडल के कुछ सबसे सक्रिय और जटिल तथ्यों के बारे में मानव समझ को बढ़ाने में सहायता मिलेगी। नासा ने चार मिशनों में से प्रत्येक मिशन के लिये $ 3 मिलियन का प्रावधान किया है जो सौरमंडल के अनुसंधान संबंधी मानवीय स्वप्नों को वास्तविकता प्रदान करेंगे।

  • ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय के खगोलविदों द्वारा 17 नए ग्रहों की खोज की गई है, जिनमें से एक पृथ्वी के समान रहने योग्य दुर्लभ ग्रह ‘KIC-7340288b’ भी शामिल है। नास की सेवानिवृत्त केप्लर अंतरिक्ष दूरबीन द्वारा इन ग्रहों की खोज की गई। नासा के चार वर्षीय केप्लर मिशन द्वारा पारगमन विधि (Transit Method) के प्रयोग से लगभग दो लाख तारों का अध्ययन किया गया है। इन नए ग्रहों की खोज गोल्डीलॉक ज़ोन (Goldilock Zone) में की गई है जहाँ ग्रहों की चट्टानी सतह पर पानी की मौजूदगी का अनुमान भी लगाया जा रहा है।

सबसे छोटा ग्रह पृथ्वी के आकार का दो- तिहाई है जो केप्लर द्वारा ज्ञात ग्रहों में अब तक का सबसे छोटा ग्रह भी हैI अन्य ग्रहों का आकार पृथ्वी के आकार की तुलना में लगभग आठ गुना तक अधिक हैI केप्लर अंतरिक्ष दूरबीन- नासा द्वारा इस दूरबीन को वर्ष 2008 में लाॅन्च किया गया थाI इसका प्रयोग पृथ्वी के आकार के ग्रहों की खोज करने के उद्देश्य से किया गया I केप्लर अंतरिक्ष दूरबीन का नाम खगोलविद जोहान्स केपलर के नाम पर रखा गयाI नासा द्वारा केप्लर अंतरिक्ष दूरबीन को वर्ष 2009 में प्रयोग में लाया गया तथा अक्टूबर 2018 में इसे सेवानिवृत्त कर दिया गया हैI पारगमन विधि- एक तारे और पृथ्वी के बीच एक ग्रह के गुजरने को पारगमन (Transit) कहा जाता है। प्रकाश वर्ष- यह एक खगोलीय माप हैI इसका प्रयोग अंतरिक्ष में तारों और ग्रहों के बीच की दूरी का आकलन करने के लिये किया जाता है। KIC-7340288b: खोजे गए ग्रहों में KIC-7340288b एक अत्यंत दुर्लभ ग्रह हैI यह ग्रह पृथ्वी के आकार का लगभग डेढ गुना है जो सौर प्रणाली के अन्य ग्रहों की तरह ही छोटी-छोटी चट्टानों से मिलकर बना हैI यह ग्रह पृथ्वी से एक हजार प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित हैI इस ग्रह का एक वर्ष की अवधि 143.3 दिनों के बराबर होती हैI यह ग्रह 0.444 खगोलीय इकाइयों (Astronomical Units) में अपने तारे की परिक्रमा करता है। सौर मंडल में इस ग्रह की कक्षा (Orbit) बुध ग्रह की कक्षा से बड़ी है। पृथ्वी के समान ही यह सूर्य से लगभग एक तिहाई प्रकाश प्राप्त करता है।

  • सेरेस (Ceres) जो मंगल एवं बृहस्पति ग्रह के बीच क्षुद्रग्रह की बेल्ट में सबसे बड़ा पिंड है, एक ‘महासागरीय दुनिया’ (Ocean World) है जिसमें इसकी सतह के नीचे नमकीन पानी का एक बड़ा भंडार है। सेरेस (Ceres) एक बौना ग्रह (Dwarf Planet) है। नासा (NASA) के डॉन अंतरिक्ष यान द्वारा प्राप्त आँकड़ों के आधार पर हाल ही में प्रकाशित शोध में सेरेस से संबंधित एक नई जानकारी प्रदान की गई है। डॉन अंतरिक्ष यान ने वर्ष 2018 में सेरेस की सतह का अध्ययन किया था।

सेरेस की सतह के अध्ययन के निष्कर्षों में लवण-युक्त जल के उपसतही भंडार की उपस्थिति की पुष्टि की गई है जो धीरे-धीरे जम चुके हैं। सेरेस (Ceres) का व्यास लगभग 590 मील (950 किमी.) है। वैज्ञानिकों ने सेरेस के उत्तरी गोलार्द्ध में लगभग 22 मिलियन वर्ष पहले निर्मित हुए 92 किमी. चौड़े ओक्काटर क्रेटर (Occator Crater) का विश्लेषण किया। जहाँ चमकीले क्षेत्रों की उपस्थिति दर्ज की गई। जो तरल पदार्थ के वाष्पीकरण के कारण छोड़े गए साल्ट क्रस्ट हैं। यह तरल सतह के लगभग 25 मील (40 किमी.) नीचे सैकड़ों मील चौड़े एक जलाशय में उत्पन्न हुआ है जिसके प्रभाव से खारे जल को निकलने का रास्ता मिल गया। सेरेस से संबंधित इस शोध को ‘नेचर एस्ट्रोनॉमी’ (Nature Astronomy), ‘नेचर जियोसाइंस’ (Nature Geoscience) और ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ (Nature Communications) नामक पत्रिकाओं में प्रकाशित किया गया है।

  • 31 मई, 2020 को स्पेस एक्स (SpaceX) के नए क्रू ड्रैगन (Crew Dragon) में अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के लिये उड़ान भरने वाले अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री बॉब बेहेनकेन (Bob Behnken) और डौग हर्ले (Doug Hurley) दो महीने की यात्रा के बाद 02 अगस्त, 2020 को वापस आ गए।

स्पेसएक्स (SpaceX) का यह कैप्सूल मैक्सिको की खाड़ी में उतरा। यह पिछले नौ वर्ष में संयुक्त राज्य अमेरिका की धरती से लॉन्च किया गया, नासा (NASA) का पहला क्रू मिशन था। इस लैंडमार्क मिशन को नासा के ‘कैनेडी स्पेस सेंटर’ से 31 मई, 2020 को लॉन्च किया गया था। वर्ष 2011 में नासा के शटल कार्यक्रम के सेवानिवृत्त होने के बाद पहली बार अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ने अमेरिकी धरती से अंतरिक्ष यात्रियों को लॉन्च किया। वर्ष 2011 के बाद से संयुक्त राज्य अमेरिका अपने अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष स्टेशन में लॉन्च करने के लिये रूस के अंतरिक्ष कार्यक्रम पर निर्भर था। स्पेसएक्स कंपनी के ड्रैगन नाम के कैप्सूल से दोनों अंतरिक्ष यात्रियों की वापसी मैक्सिको की खाड़ी में हुई। उल्लेखनीय है कि 45 वर्ष में ऐसा पहली बार हुआ है जब नासा का कोई अंतरिक्ष यात्री समुद्र में उतरा हो।

  • वैज्ञानिकों ने उच्च तप्त एक्सोप्लैनेट डब्लूएएसपी-76बी (WASP-76b) पर तरल लौह वर्षा (Liquid Iron Rain) का पता लगाया है। वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि तरल लौह वर्षा का कारण एक्सोप्लैनेट WASP-76b पर खराब मौसम की स्थिति उत्पन्न होना है। WASP-76b ग्रह हमारे सौरमंडल में लगभग 390 प्रकाशवर्ष की दूरी पर स्थित है।

WASP-76b जुपिटर के समान एक विशालकाय गैसीय ग्रह है किंतु अपने तारे के चारों ओर बहुत छोटी कक्षा (दो दिनों से भी कम) में चक्कर लगाता है। यह ग्रह अपने तारे के चारों ओर इतने करीब से परिक्रमा करता है कि दिन में तापमान रात की तुलना में 1000 डिग्री सेल्सियस अधिक होता है और दिन में तापमान लगभग 2400 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है।

  • जुलाई में नासा के टेलीस्कोप द्वारा खोजा गया धूमकेतु ‘सी/2020 एफ3’ (C/2020 F3) जिसे नियोवाइज़ (NEOWISE) के नाम से भी जाना जाता है, 22 जुलाई, 2020 को पृथ्वी के सबसे निकट पहुँचेगा। इसे अपनी कक्षा के चारों ओर एक चक्कर पूरा करने में 6800 वर्ष लगते हैं, पृथ्वी की बाहरी कक्षा को पार करते समय 64 मिलियन मील या 103 मिलियन किलोमीटर की दूरी पर होगा।
3 जुलाई, 2020 को यह धूमकेतु सूर्य से 43 मिलियन किमी. की दूरी पर था। और यह धूमकेतु बुध की कक्षा में चक्कर लगा रहा था और सूर्य से निकटता के कारण इसकी बाहरी परत बर्फीली सतह से गैस एवं धूल एक वातावरण बना रही थी,जिसे कोमा (Coma) के रूप में संदर्भित किया गया था। यह वातावरण कभी-कभी मलबे के एक चमकदार सिरे (छोर) का निर्माण करता है जो हज़ारों या लाखों किलोमीटर तक फैल सकता है।
धूमकेतु अपनी चौड़ाई में कुछ मील से लेकर हज़ार मील तक विस्तृत हो सकते हैं। जैसे ही वे सूर्य के निकट आते हैं वे गर्म होते हैं और धूल एवं गैसों के मलबे को छोड़ते हैं जो एक ‘चमकते हुए सिर’ के आकार में बनता है। इस मलबे का आकार अक्सर एक ग्रह से बड़ा हो सकता है।

सूर्य और पृथ्वी से निकटता क्यों? अन्य ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण धूमकेतु को कभी-कभी सूर्य और पृथ्वी के पास की कक्षाओं में धकेल दिया जाता है। कुछ धूमकेतुओं की उपस्थिति अर्थात् जो सूर्य से परिक्रमा करने में 200 वर्ष से कम का समय लगाते हैं, उनका पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। इन्हें लघु-अवधि के धूमकेतु के रूप में संदर्भित किया जा सकता है और ये कुइपर बेल्ट (Kuiper Belt) में पाए जा सकते हैं जहाँ कई धूमकेतु प्लूटो की परिधि में सूर्य की परिक्रमा करते हैं। और कभी-कभी इनको उन कक्षाओं में धकेल दिया जाता है जो उन्हें सूर्य के निकट लाते हैं। सबसे प्रसिद्ध लघु-अवधि वाले धूमकेतुओं में से एक धूमकेतु हैली (Halley) है जो 76 वर्षों के अंतराल में एक बार दिखाई देता है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2062 में हैली पुनः दिखाई देगा। कम-पूर्वानुमान योग्य धूमकेतु (Less-Predictable Comets), ओर्ट क्लाउड (Oort Cloud) में पाया जा सकता है जो सूर्य से लगभग 100000 खगोलीय इकाई (Astronomical Unit-AU) की दूरी पर है। इस ओर्ट क्लाउड (Oort Cloud) में धूमकेतु को सूर्य के चारों ओर एक चक्कर पूरा करने में अनुमानतः 30 मिलियन वर्ष तक का समय लगता है। धूमकेतु ‘सी/2020 एफ3’ का अध्ययन क्यों? खगोलविद इस धूमकेतु का अध्ययन इसलिये कर रहे हैं क्योंकि वे मानते हैं कि इससे सौर मंडल के गठन के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है और यह भी संभव है कि धूमकेतु पर जल एवं अन्य कार्बनिक यौगिक विद्यमान हों जो पृथ्वी पर जीवन के निर्माण खंड हैं।

  • जून में नासा द्वारा की गई घोषणा के अनुसार ‘163348(2002 NN4)’ नामक विशाल क्षुद्रग्रह के पृथ्वी (सुरक्षित दूरी पर) से गुजरने की उम्मीद है। जुलाई 2002 में इसकी खोज की गई थी। इसे ‘संभावित खतरनाक क्षुद्रग्रह’ (Potentially Hazardous Asteroid- PHA) और ‘नीयर अर्थ ऑब्जेक्ट (Near Earth Object)’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

नासा की ‘जेट प्रोपल्शन लैबोरेटरी’के अनुसार इस क्षुद्रग्रह का व्यास 250-570 मीटर के बीच हो सकता है। इसके घूर्णन का अवलोकन किया गया है। यह प्रत्येक 14.50 दिनों में अपनी धुरी पर एक चक्कर पूरा करता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह क्षुद्रग्रह 5.2 किमी प्रति सेकंड या 11,200 मील प्रति घंटे की गति से पृथ्वी की कक्षा के पास से गुजरेगा। इसके पृथ्वी से 5.1 मिलियन किलोमीटर दूरी से गुजरने का अनुमान है।

संभावित खतरनाक क्षुद्रग्रह ऐसे क्षुद्रग्रह होते हैं जिनके पृथ्वी के करीब से गुजरने से पृथ्वी पर खतरा उत्पन्न होने की संभावना बनी रहती है। इस श्रेणी में उन क्षुद्रग्रह को रखा जाता है जिनकी ‘मिनिमम ऑर्बिट इंटरसेक्शन डिस्टेंस’ (Minimum Orbit Intersection Distance- MOID) 0.05AU या इससे कम हो। साथ ही ‘एब्सोल्यूट मैग्नीट्यूड’ (Absolute Magnitude-H) 22.0 या इससे कम हो। पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी को AU से इंगित करते हैं।

‘नियर अर्थ ऑब्जेक्ट’ ऐसी पिंड/क्षुद्रग्रह या धूमकेतु होते हैं जो पृथ्वी पर खतरा उत्पन्न करते हुए उसकी कक्षा के करीब से गुजरते हैं। ये क्षुद्रग्रह ज्यादातर बर्फ और धूल के कण से मिलकर बने होते हैं। पृथ्वी पर जीवन के विलुप्त होने के उन सभी कारणों में से एक पृथ्वी से क्षुद्रग्रह का टकराना माना जाता है।

क्षुद्रग्रह (Asteroid)सूर्य की परिक्रमा करने वाले छोटे चट्टानी पिंड होते हैं। क्षुद्रग्रह द्वारा सूर्य की परिक्रमा ग्रहों के समान ही की जाती है लेकिन इनका आकार ग्रहों की तुलना में बहुत छोटा होता है।

हमारे सौरमंडल में बहुत सारे क्षुद्रग्रह हैं। उनमें से ज़्यादातर क्षुद्रग्रह मुख्य क्षुद्रग्रह बेल्ट (Main Asteroid Belt) में पाए जाते हैं। यह मुख्य क्षुद्रग्रह बेल्ट मंगल और बृहस्पति ग्रहों की कक्षाओं के बीच के क्षेत्र में स्थित है। वैज्ञानिकों के अनुसार, अगले 100 वर्षों तक 140 मीटर से बड़े किसी भी क्षुद्रग्रह के पृथ्वी से टकराने की संभावना नहीं है।

  • मई में नासा (NASA) के ‘अंटार्कटिक इंपल्सिव ट्रांज़िएंट एंटीना’ (ANtarctic Impulsive Transient Antenna- ANITA) ने अंटार्कटिका में न्यूट्रिनो की असामान्य ऊर्ध्व गति का पता लगाया है। ANITA उपकरण एक रेडियो टेलीस्कोप है जिसका उपयोग अंटार्कटिका के ऊपर उड़ने वाले वैज्ञानिक गुब्बारे से ‘अल्ट्रा-हाई एनर्जी कॉस्मिक-रे न्यूट्रिनो’ का पता लगाने के लिये किया जाता है। इसे नासा (NASA) द्वारा डिज़ाइन किया गया है।

ANITA किसी भी प्रकार के न्यूट्रिनो का पता लगाने के लिये नासा की पहली वेधशाला है। इसमें हीलियम बैलून से जुड़ी रेडियो एंटीना की एक सारणी/व्यूह रचना शामिल है जो अंटार्कटिक क्षेत्र में बर्फ की सतह से 37,000 मीटर की दूरी पर उड़ती है। न्यूट्रिनों (Neutrinos) में 1018 eV के क्रम में ऊर्जा होती है और वे ‘आस्कार्यन प्रभाव’ (Askaryan Effect) के कारण बर्फ में रेडियो तरंगों को उत्पन्न करने में सक्षम हैं। आस्कार्यन प्रभाव (Askaryan Effect) वह घटना है जहाँ एक सघने डाईइलेक्ट्रिक (जैसे- नमक, बर्फ या चंद्र रेगोलिथ) में प्रकाश के चरण वेग की तुलना में तेज़ी से यात्रा करने वाला एक कण माध्यमिक आवेशित कणों की एक बौछार उत्पन्न करता है। जब न्यूट्रीनो एक परमाणु में टूटते हैं तो वे पता लगाने योग्य माध्यमिक कणों की बौछार उत्पन्न करते हैं। ये पता लगाने योग्य माध्यमिक कण हमें यह जाँचने की अनुमति देते हैं कि वे ब्रह्मांड में कहाँ से आए थे? न्यूट्रीनो उच्च-ऊर्जा वाले कण हैं जो मानव शरीर के लिये अधिक खतरनाक नहीं होते हैं और बिना किसी को पता चले ये अधिक ठोस वस्तुओं से भी गुजरते हैं। न्यूट्रीनो की पृथ्वी पर लगातार बौछार होती है और जैसा कि अध्ययनों से पता चला है कि 100 ट्रिलियन न्यूट्रिनो मानव शरीर से प्रत्येक सेकंड गुजरते हैं।

  • 22 अप्रैल, 2020 को ईरान ने अपने पहले सैन्य उपग्रह नूर (Noor) का प्रक्षेपण ईरान के मध्य रेगिस्तान (Central Desert) से किया। मध्य रेगिस्तान (Central Desert) को फारसी भाषा में दश्त-ए-काविर (Dasht-e-Kavir) भी कहा जाता है। ईरान द्वारा किया गया यह प्रक्षेपण अमेरिका और ईरान के मध्य परमाणु समझौते और जनवरी, 2020 में अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे गए सैन्य जनरल कासिम सुलेमानी को लेकर दोनों देशों के मध्य बढ़ते तनाव के बाद किया गया है।
  • हैबिटेबल ज़ोन प्लैनेट फाइंडर (Habitable-zone Planet Finder- HPF) ने G9-40b नामक अपने पहले ग्रह (एक्सोप्लैनेट- Exoplanet) होने की पुष्टि की है जो 6 दिनों (1 दिन = 24 घंटा) की कक्षीय अवधि में कम द्रव्यमान वाले चमकीले तारे एम-ड्वार्फ (M-dwarf) की परिक्रमा करता है जो कि पृथ्वी से 100 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है।

इससे पहले नासा के केपलर मिशन (Kepler Mission) ने मेजबान तारे के प्रकाश का पता लगाया था और यह बताया था कि ग्रह अपनी कक्षा में परिक्रमण के दौरान तारे के सामने से होकर गुज़रता है। G 9-40b शीर्ष 20 निकटतम पारगमन ग्रहों में से एक है।

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हैबिटेबल ज़ोन प्लैनेट फाइंडर एक खगोलीय स्पेक्ट्रोग्राफ है जिसे पेन स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा बनाया गया है और यह हाल ही में अमेरिका में स्थित मैकडॉनल्ड ऑब्ज़र्वेटरी में हॉबी-एबरली टेलीस्कोप पर स्थापित किया गया है।

HPF डाॅप्लर प्रभाव (Doppler Effect) का उपयोग करके एक्सोप्लैनेट की खोज करता है।

डाॅप्लर प्रभाव:-जब किसी ध्वनि स्रोत और श्रोता के बीच आपेक्षिक गति होती है तो श्रोता को जो ध्वनि सुनाई पड़ती है उसकी आवृत्ति मूल आवृत्ति से कम या अधिक होती है। इसी को डॉप्लर प्रभाव (Doppler effect) कहते हैं।

यही प्रभाव प्रकाश स्रोत और प्रेक्षक के बीच आपेक्षिक गति के कारण भी होता है, जिसमे प्रेक्षक को प्रकाश की आवृत्ति में परिवर्तन का अनुभव नही होता है क्योंकि प्रकाश की गति की तुलना में उन दोनों की आपेक्षिक गति बहुत ही कम होती है।

स्पेक्ट्रोग्राफ एक ऐसा उपकरण है जो प्रकाश को उसके घटक तरंग दैर्ध्य में विभाजित करता है। वैज्ञानिक स्पेक्ट्रम के एक विशिष्ट हिस्से पर प्रकाश के गुणों को मापते हैं और प्राप्त परिणामों का विश्लेषण करते हैं।

HPF आस-पास के कम-द्रव्यमान वाले तारों से आ रही अवरक्त किरणों के संकेतों की स्पष्ट माप प्रदान करता है। HPF को वासयोग्य क्षेत्र (Habitable-Zone) में ग्रहों का पता लगाने और उन्हें चिह्नित करने के लिये डिज़ाइन किया गया है जिसे गोल्डीलॉक्स ज़ोन के रूप में भी जाना जाता है। यह तारे के आसपास का क्षेत्र है जहाँ किसी ग्रह पर जल की उपस्थिति का पता लगा है। HPF वर्तमान में निकटतम कम-द्रव्यमान वाले तारों का सर्वेक्षण कर रहा है जिन्हें एम-ड्वार्फ भी कहा जाता है। एक्सोप्लैनेट (Exoplanet) या एक्स्ट्रासोलर ग्रह सौरमंडल के बाहर का ग्रह है। पहली बार वर्ष 1992 में इसकी पुष्टी हुई। एक्सोप्लैनेट को दूरबीन से देखना बहुत कठिन है। ये उन तारों की तेज़ चमक के कारण दिखाई नहीं देते हैं जिनकी वे परिक्रमा करते हैं। इसलिये खगोलविदों ने एक्सोप्लैनेट का पता लगाने और अध्ययन करने के लिये अन्य तरीकों का उपयोग किया है जैसे कि इन ग्रहों का उन तारों पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करके।

नासा द्वारा हमारे सौरमंडल से बाहर के जीवन का पता लगाने के लिये वर्ष 2018 में कैपलर के उत्तरवर्ती (Successor) मिशन ‘टेस’ (The Transiting Exoplanet Survey Satellite-TESS) लॉन्च किया गया था।

जैव प्रौद्योगिकी:

  • बेटेल्गेयूज़ (Betelgeuse) तारे की उत्पत्ति लाखों वर्ष पहले एक सुपर स्टार के रूप में हुआ था। खगोलविदों ने फरवरी माह में यूरोपियन स्पेस ऑर्गेनाइज़ेशन के वेरी लार्ज टेलीस्कोप (Very Large Telescope- VLT) का उपयोग करके पता लगाया है कि पिछले छह महीनों से बेटेल्गेयूज़ नाटकीय एवं रहस्यमय तरीके से धुँधला हो रहा है।

बेटेल्गेयूज़ नक्षत्र मंडल (Constellation) में एक लाल महाकाय तारा है जो सूर्य से 20 गुना बड़ा है। यह नक्षत्र मंडल सितारों का एक समूह है जो एक पैटर्न या चित्र बनाता है,जैसे- ओरियन द ग्रेट हंटर (Orion the Great Hunter), लियो द लायन (Leo the Lion) या टाॅरस द बुल (Taurus the Bull)। पूर्णिमा के दौरान सबसे चमकने वाले तारों में बेटेल्गेयूज़ तारा 10वें स्थान पर होता है जबकि दिसंबर, 2019 के अंतिम हफ्ते में अध्ययन करने पर यह 21वें स्थान पर पहुँच गया। इस बेटेल्गेयूज़ तारे का व्यवहार सामान्य से अलग है किंतु इसका मतलब यह नहीं है कि इस तारे में कोई सुपरनोवा विस्फोट (अंतरिक्ष में होने वाला सबसे बड़ा विस्फोट) होने वाला है क्योंकि खगोलविदों ने अगले 1 लाख वर्षों के बाद तारे में विस्फोट होने की भविष्यवाणी की है।

  • राष्ट्रीय वैमानिकी एवं अंतरिक्ष प्रशासन (NASA) और यूरोपियन अंतरिक्ष एजेंसी (European Space Agency-ESA) ने सूर्य के ध्रुवों के मापन के लिये एक नए सोलर ऑर्बिटर प्रोब 9 फरवरी, 2020 को फ्लोरिडा के केप कैनेवरल स्पेस सेंटर (Cape Canaveral Space Center) से लॉन्च किया गया।

इस मिशन का उद्देश्य सूर्य की सतह पर लगातार उड़ने वाले आवेशित कणों, सौर हवा, सूर्य के अंदर के चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन करना है।

सौर हवा (Solar Wind) आवेशित कणों का मिश्रण है जो हमारे सौरमंडल के माध्यम से ध्रुवों और बीम पर अत्यधिक केंद्रित है।

यह पृथ्वी पर उपग्रहों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को प्रभावित करती है। यह ऑर्बिटर सूर्य के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव की तस्वीरों को पृथ्वी पर भेजेगा। पृथ्वी और शुक्र से गुरुत्वाकर्षण प्रभाव का उपयोग करके या सूर्य और पृथ्वी के बीच की 95% दूरी का उपयोग करके यह ऑर्बिटर सूर्य के ध्रुवों की जाँच करेगा।

  • पृथ्वी पर सबसे पुराना पदार्थ:- वैज्ञानिकों ने मुर्चिसन उल्कापिंड (Murchison Meteorite) से सिलिकन कार्बाइड (Silicon Carbide- SiC) के 4.6-7 बिलियन साल पुराने प्रीसोलर (Presolar) कण खोजे हैं। मुर्चिसन उल्कापिंड वर्ष 1969 में ऑस्ट्रेलिया में गिरा था।
सिलिकन कार्बाइड के प्रीसोलर ग्रेन अब तक मिले सबसे पुराने ठोस पदार्थ हैं। ये कण सौरमंडल के निर्माण से पहले बने थे, इसलिये इन्हें प्रीसोलर कण कहा जाता है।

ये कण दुर्लभ होते हैं और पृथ्वी पर गिरे केवल 5% उल्का पिंडों में ही पाए जाते हैं। इन कणों की खोज से आकाशगंगा में तारों के निर्माण की घटना के बारे में पता लगाया जा सकता है। साथ ही उल्कापिंड में सिलिकन कार्बाइड की उपस्थिति से स्टारडस्ट (Stardust) का भी पता चला है। ये कण हमारी आकाशगंगा में तारों के निर्माण की दर के बारे में भी संकेत देते हैं।

स्टारडस्ट का निर्माण तारों से निकले पदार्थों से होता है,इन पदार्थों को तारकीय हवाओं (Stellar Winds) द्वारा इंटरस्टेलर स्पेस (Interstellar Space) में ले जाया जाता है।

तारकीय हवा एक तारे के ऊपरी वायुमंडल से निकली गैस का प्रवाह है। इंटरस्टेलर स्पेस चुंबकीय क्षेत्र से बाहर का वह हिस्सा है जो सूर्य से दूर लगभग 122 खगोलीय इकाई (Astronomical Unit-AU) में फैला हुआ है। सौरमंडल के निर्माण के दौरान स्टारडस्ट को ग्रहों एवं सूर्य सहित सभी खगोलीय पिंडों में शामिल किया गया था किंतु अब यह केवल क्षुद्रग्रहों और धूमकेतुओं में ही पाई जाती है।

सिलिकन कार्बाइड सिलिकन और कार्बन का एक यौगिक है,जिसे कार्बोरंडम (Carborundum) भी कहा जाता है,

सिलिकन कार्बाइड एक अर्द्धचालक पदार्थ है,इसका उपयोग अर्द्धचालक उपकरणों के निर्माण में किया जाता है। यह सबसे महत्त्वपूर्ण औद्योगिक सिरेमिक पदार्थों में से एक है। इसे व्यापक रूप से अपघर्षक, इस्पात योज्य और संरचनात्मक सिरेमिक के रूप में उपयोग किया जाता है।

  • खगोलशास्त्रियों के अनुसार इस वर्ष 7 अप्रैल को आकाश में पिंक सुपरमून (Pink Supermoon) घटना देखी जा सकेगी जो वर्ष 2020 की सबसे बड़ी एवं सबसे चमकदार पूर्णिमा होगी।
सुपरमून:-नासा के अनुसार जब एक पूर्ण चंद्रमा पृथ्वी के सबसे करीब होता है,तब एक सुपरमून कहलाता है।

जब पूर्ण चंद्रमा पृथ्वी से निकटतम बिंदु पेरिजी (Perigee) पर दिखाई देता है तो यह एक नियमित पूर्णिमा की तुलना में अधिक उज्जवल एवं बड़ा होता है। जिसे ‘सुपरमून’ कहा जाता है। पृथ्वी से सबसे दूर बिंदु को अपोजी (Apogee) कहा जाता है।यह पृथ्वी से लगभग 405,500 किलोमीटर दूर है। वहीं पेरिजी (Perigee) पृथ्वी से लगभग 363,300 किलोमीटर दूर है। इस वर्ष का पहला सुपरमून 9 मार्च को हुआ था और अंतिम 7 मई, 2020 को होगा।

पिंक सुपरमून:-चंद्रमा मूल रूप से गुलाबी रंग का नहीं होता है। इसे पिंक सुपरमून नाम पिंक वाइल्डफ्लावर (Pink Wildflowers) से मिला है जो उत्तरी अमेरिका में वसंत ऋतु में खिलते हैं।

इसे पास्कल मून (Paschal Moon) भी कहा जाता है क्योंकि ईसाई कैलेंडर में ईस्टर (Easter) के लिये तारीख की गणना करने में इसका उपयोग किया जाता है। पास्कल मून के बाद पहला रविवार ईस्टर रविवार है।

खगोलविदों की अंतर्राष्ट्रीय टीम द्वारा एक आकाशगंगा XMM-2599 की खोज[सम्पादन]

आकार में असामान्य रूप से बड़ी यह आकाशगंगा लगभग 12 अरब वर्ष पूर्व अस्तित्व में थी। इसके अस्तित्त्व के समय ब्रह्मांड महज़ 1.8 बिलियन वर्ष पुराना था। बिग बैंग की घटना (जो कि 13.8 बिलियन वर्ष पूर्व हुई) और 12 बिलियन वर्ष के मध्य किसी समय इसमें तीव्र विस्फोट हुआ और तारों का तीव्र गति से निर्माण हुआ लेकिन यह विकास प्रक्रिया अचानक से बंद हो गई। इस परिघटना के पीछे की वज़हें अब भी अस्पष्ट हैं। आकाशगंगा XMM-2599 ने ब्रह्माण्ड की आयु 1 अरब वर्ष होने से पूर्व ही 300 बिलियन तारों (सोलर मास) का विकास कर लिया था और ब्रह्माण्ड की आयु 1.8 अरब वर्ष होने तक यह निष्क्रिय भी हो गई। खगोलविदों ने कुछ वर्ष पूर्व ZF-COSMOS-20115 नामक एक अन्य विशालकाय आकाशगंगा की भी खोज की थी जिसकी उत्पत्ति ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के 1.7 अरब वर्ष बाद हुई थी किंतु अचानक इसमें तारों का निर्माण बंद हो गया। हालाँकि ZF-COSMOS-20115 में XMM-2599 के सोलर मास की तुलना में केवल 170 अरब सोलर मास मौजूद थे। वर्ष 2008 में EQ J100054+023435 नामक एक आकाशगंगा की खोज की गई थी जिसमें तारों का निर्माण प्रतिवर्ष 1,000 से अधिक सोलर मास की दर से हुआ था। आकर में यह आकाशगंगा XMM-2599 से बहुत छोटी है जिसमें केवल 10 अरब सोलर मास हैं। अवलोकनों से यह निष्कर्ष निकाला गया है कि विशाल आकार प्राप्त करने हेतु इस आकाशगंगा में 500 मिलियन वर्षों तक लगभग 1,000 सौर द्रव्यमान प्रतिवर्ष की दर से तारों का निर्माण हुआ होगा। हमारी आकाशगंगा मंदाकिनी (Milky Way) में प्रतिवर्ष 3 से 4 सौर द्रव्यमान ही निर्मित होते हैं।

अब तक के शोध से विपरीत परिघटना:-खगोलविदों के मध्य अब तक यह मान्यता थी कि शुरुआती ब्रह्माण्ड में इतनी बड़ी आकाशगंगा का निर्माण नहीं हुआ होगा। हालाँकि हमारी तकनीक के उन्नत होने और दिक्-काल के दूरगामी क्षेत्रों में पहुँच स्थापित होने के साथ ही इन धारणाओं को चुनौती मिल रही है।

इस खोज से यह पता चला है कि प्रारंभिक ब्रह्मांड में बड़े पैमाने पर सोलर मास निर्मित हो रहे थे जो ब्रह्मांड संबंधी हमारे मॉडल से अलग है। संख्यात्मक (Numerical) मॉडल अब XMM-2599 जैसी विशाल आकाशगंगाओं की गणना कर सकते हैं किंतु शुरुआती चरण में तारों का तीव्रता से निर्माण और फिर इस प्रक्रिया के अचानक से रुक जाने की परिघटना शोध और आश्चर्य का विषय बनी हुई है।

  • नासा द्वारा आयनमंडल के अध्ययन के लिये लॉन्च किया गया ‘आइकॉन’ उपग्रह ( Satellite -ICON) निर्धारित समय से दो वर्ष की देरी से कक्षा में पहुँचा। रेफ्रिजरेटर के आकार का यह उपग्रह आयनमंडल में उपस्थित गैसों से बनने वाले हवा के प्रकाशीय पुंजों का अध्ययन करेगा और अंतरिक्षयान के चारों ओर आवेशित वातावरण की माप भी करेगा जो पृथ्वी की सतह से 580 किलोमीटर की ऊँचाई पर है।
आयनमंडल मध्यमंडल के ऊपर 80 से 400 किलोमीटर के बीच स्थित होता है। पृथ्वी द्वारा भेजी गई रेडियो तरंगें इस संस्तर द्वारा वापस पृथ्वी पर लौट आती हैं। यहाँ पर ऊँचाई बढ़ने के साथ ही तापमान में वृद्धि शुरू हो जाती है।

यह वह क्षेत्र है जिसके माध्यम से रेडियो संचार और GPS तरंगें संचार करती हैं।

जीव विज्ञान[सम्पादन]

  • 6 अक्तूबर, 2020 को हेपेटाइटिस सी वायरस (Hepatitis C Virus) की खोज के लिये अमेरिकी वैज्ञानिक हार्वे जे ऑल्टर (Harvey J Alter) एवं चार्ल्स एम राइस (Charles M Rice) और ब्रिटिश वैज्ञानिक माइकल ह्यूटन (Michael Houghton) को मेडिसिन या फिजियोलॉजी के लिये नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।

हेपेटाइटिस सी रक्तजनित वायरस के कारण उत्पन्न होता है, जो यकृत को प्रभावित करता है। यह इंजेक्टेबल दवाओं, असुरक्षित स्वास्थ्य देखभाल आदि के माध्यम से फैल सकता है। WHO के अनुसार, यह यौन गतिविधियों द्वारा संक्रमित हो सकता है, किंतु ऐसे मामले बहुत कम देखने को मिलते हैं। स्टॉकहोम (स्वीडन) में पुरस्कार की घोषणा करते हुए नोबेल समिति ने कहा कि तीनों वैज्ञानिकों के कार्य ने रक्तजनित हेपेटाइटिस (Blood-Borne Hepatitis) के एक प्रमुख स्रोत की व्याख्या करने में मदद की जिसे हेपेटाइटिस ए एवं बी वायरस द्वारा समझाया नहीं जा सकता है। इस खोज ने हेपेटाइटिस सी पर निर्देशित एंटीवायरल दवाओं के तेज़ी से विकास को भी गति दी है। WHO का अनुमान है कि दुनिया भर में 70 मिलियन से अधिक लोग हेपेटाइटिस से प्रभावित हैं और प्रत्येक वर्ष इससे 400,000 मौतें होती हैं। यह एक पुरानी बीमारी है जो यकृत की सूजन एवं कैंसर का एक प्रमुख कारण है।

नेशनल वायरल हेपेटाइटिस कंट्रोल प्रोग्राम(National Viral Hepatitis Control Programme- NVHCP):- वर्ष 2018 में प्रारंभ इस कार्यक्रम का लक्ष्य वर्ष 2030 तक हेपेटाइटिस सी बीमारी को समाप्त करना है। वर्ष 2018 के बाद से हेपेटाइटिस सी से प्रभावित लगभग 50,000 लोगों का इलाज किया जा चुका है। वैज्ञानिकों के अनुसार, देश की आबादी के अनुमानित 0.5-1% (या 10-13 मिलियन लोग) हेपेटाइटिस सी से पीड़ित हैं।
‘नेशनल वायरल हेपेटाइटिस कंट्रोल प्रोग्राम’ की तरह पंजाब में भी वर्ष 2016 में इसी प्रकार का कार्यक्रम शुरू किया गया था।

पंजाब ने वर्ष 2016 से अब तक हेपेटाइटिस सी से प्रभावित 87,000 रोगियों की रिपोर्ट दर्ज की जिनमें से 93% ठीक हो चुके हैं। चूँकि पंजाब ने अपना कार्यक्रम राष्ट्रीय कार्यक्रम से पहले शुरू किया था, इसलिये उनके आँकड़े NVHCP डेटा में शामिल नहीं हैं। कारण: नशीली दवाओं के अधिक सेवन और इंजेक्शन आधारित नशीली दवाओं के उपयोग के कारण पंजाब में यह बीमारी अधिक लोगों को प्रभावित कर रही है। पंजाब में COVID-19 से पहले प्रत्येक महीने 900-1100 नए मामले दर्ज किये जा रहे थे।

  • 5 जुलाई, 2020 को चीनी क्षेत्र ‘इनर मंगोलिया’ के बयान नूर (Bayan Nur) शहर में स्थानीय अधिकारियों ने बूबोनिक प्लेग का मामला सामने आने के बाद एक चेतावनी जारी की। यद्यपि बूबोनिक प्लेग कोई नई बीमारी नहीं है किंतु यदि इसका इलाज़ न किया जाए तो यह खतरनाक सिद्ध होता है।

14वीं शताब्दी में बूबोनिक प्लेग के कारण केवल यूरोप में लगभग 50 मिलियन मौतें हुई थीं।

बूबोनिक प्लेग जिसे ‘प्लेग बेसिलस’ (Plague Bacillus) या ‘येर्सिनिया पेस्टिस’ भी कहा जाता है, लसिका पर्व (Lymph Nodes) पर हमला करता है जिससे सूजन, दर्द एवं मवाद बनता है। मानव शरीर में प्रतिरक्षा प्रणाली का एक हिस्सा ‘लसीका प्रणाली’ (Lymphatic System) को प्रभावित करके यह लिम्फ नोड्स या लसिका पर्व में सूजन का कारण बनता है और शरीर के अन्य भागों में फैल सकता है।

यह सेप्टिकैमिक प्लेग (Septicaemic Plague) एवं न्यूमोनिक प्लेग (Pneumonic Plague) जो गंभीर निमोनिया का कारण बनता है, से भिन्न होता है। सेप्टिकैमिक प्लेग (Septicaemic Plague) का प्रभाव यदि मनुष्य के शरीर में रक्तप्रवाह पर पड़ता है तो यह मेनिन्जाइटिस (Meningitis) और एंडोटॉक्सिक (Endotoxic) शॉक का कारण बन सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation) का कहना है कि शीघ्र एवं प्रभावी उपचार के बिना बूबोनिक प्लेग के 50-60% मामले खतरनाक हैं। किंतु यह बीमारी पूरी तरह से इलाज योग्य है।

बूबोनिक प्लेग बैक्टीरिया यर्सिनिया पेस्टिस (Yersinia Pestis) के कारण होने वाला एक जीवाणुकारी संक्रमण है।

बूबोनिक प्लेग एक संक्रमित पिस्सू ज़ेनोसेल्ला चेओपिस (Xenopsylla Cheopis) के काटने से उत्पन्न होता है जिसे ‘रैट पिस्सू’ भी कहा जाता है। सामान्य लक्षण: बुबोनिक प्लेग का सबसे सामान्य संकेत एक या अधिक बढ़े हुए एवं दर्दनाक ‘लिम्फ नोड्स’ होते हैं जिन्हें बूबोएस (Buboes) के रूप में जाना जाता है। बुबोनिक प्लेग से संबंधित बूबोएस आमतौर पर मानव शरीर में काँख (Armpits), ऊपरी ऊरु (Upper Femoral), कमर एवं गर्दन के क्षेत्र में पाए जाते हैं।

  • COVID-19 से संक्रमित व्यक्तियों में साइटोकिन स्टॉर्म (Cytokine Storm) की संभावना सबसे अधिक है। इसमें प्रतिरक्षी कोशिकाओं एवं उनके सक्रिय यौगिकों (साइटोकिन्स) का अति उत्पादन होता है,जो फ्लू संक्रमण में अक्सर फेफड़ों में सक्रिय प्रतिरक्षी कोशिकाओं के बढ़ने से संबंधित होता है। व्यक्ति एक सेकेंड्री बैक्टीरियल निमोनिया से ग्रसित हो सकता है। जिससे अक्सर रोगी की मृत्यु हो जाती है।
साइटोकिन स्टॉर्म किसी संक्रमण, ऑटो-इम्यून स्थिति या अन्य बीमारियों के कारण हो सकता है। इसके प्रारंभिक संकेतों एवं लक्षणों में तेज़ बुखार, शरीर में सूजन एवं लालिमा, गंभीर थकान एवं मितली (Nausea) आदि शामिल हैं।

साइटोकिन स्टॉर्म कोरोनोवायरस संक्रमित रोगियों में कोई विशेष लक्षण नहीं हैं। यह एक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया है जो अन्य संक्रामक एवं गैर-संक्रामक रोगों के दौरान भी हो सकती है।

प्रतिरक्षा प्रणाली में साइटोकिन्स की भूमिका:-साइटोकिन्स प्रोटीन को संकेत देते हैं जो स्थानीय उच्च सांद्रता (Local High Concentrations) में कोशिकाओं द्वारा जारी किये जाते हैं। साइटोकिन स्टॉर्म या साइटोकिन स्टॉर्म सिंड्रोम में प्रतिरक्षा कोशिकाओं के अति उत्पादन संबंधी विशेषता होती है और इस प्रक्रिया में शिथिलता का कारण स्वयं साइटोकिन्स होते हैं।

एक तीव्र प्रतिरक्षा अभिक्रिया (Severe Immune Reaction) जो रक्तप्रवाह में बहुत अधिक साइटोकिन्स के स्राव के लिये अग्रणी होती है, हानिकारक हो सकती है क्योंकि प्रतिरक्षी कोशिकाओं की अधिकता स्वस्थ ऊतक पर भी हमला कर सकती है। साइटोकिन स्टॉर्म के पूर्व उदाहरण:-इसे वर्ष 1918-20 में ‘स्पैनिश फ्लू’ महामारी के दौरान रोगी की मृत्यु होने के संभावित प्रमुख कारणों में एक माना जाता है। इस महामारी से विश्व भर में 50 मिलियन से अधिक लोगों की मृत्यु हुई थी। और हाल के वर्षों में H1N1 ‘स्वाइन फ्लू’ व H5N1 ‘बर्ड फ्लू’ के मामलों में भी इसके लक्षण देखने को मिले थे।

  • एक समुद्री सायनोबैक्टीरियम को सफलतापूर्वक स्यनेचोकॉकस एसपी. पीसीसी 7002 (Synechococcus sp. PCC 7002) विधि से निर्मित किया है। इनमें उच्च विकास दर तथा शुगर (ग्लाइकोजन-Glycogen) प्राप्ति की संभावना अधिक होती है। हवा की उपस्थिति में इनकी विकास दर दोगुनी हो गई जबकि इनकी कोशिकाओं में ग्लाइकोजन की मात्रा में लगभग 50% की वृद्धि हुई। ग्लाइकोजन ग्लूकोज़ की बहुशाखा वाला एक पॉलीसेकेराइड है जो जीव-जंतुओं, कवक एवं बैक्टीरिया में ऊर्जा भंडारण के रूप में कार्य करता है। पॉलीसेकेराइड संरचना जीवों के शरीर में ग्लूकोज़ के मुख्य भंडारण का प्रतिनिधित्व करती है।जेनेटिक इंजीनियरिंग और जैव प्रौद्योगिकी के लिये अंतर्राष्ट्रीय केंद्र द्वारा इसका विकास किया गया है।
सायनोबैक्टीरिया (जिसे नीले-हरे शैवाल के रूप में भी जाना जाता है) भी प्रकाश संश्लेषण कर सकते हैं और वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का स्थिरीकरण करके शुगर का उत्पादन कर सकते हैं। इससे प्राप्त शुगर की मात्रा भूमि आधारित फसलों की तुलना में बहुत अधिक हो सकती है। इसके अलावा यह बायोमास प्रोटीन के रूप में एक नाइट्रोजन स्रोत प्रदान करता है। यह ताज़े एवं खारे जल दोनों में पाए जाते हैं। समुद्री साइनोबैक्टीरिया का उपयोग करना बेहतर हो सकता है क्योंकि ताज़े जल के स्रोतों में तेज़ी से कमी हो रही है। हालाँकि समुद्री सायनोबैक्टीरिया आधारित शुगर उत्पादन की आर्थिक व्यवहार्यता में सुधार हेतु उनकी विकास दर एवं शुगर प्राप्ति में उल्लेखनीय सुधार करने की आवश्यकता है।

जेनेटिक इंजीनियरिंग और जैव प्रौद्योगिकी के लिये अंतर्राष्ट्रीय केंद्र(International Centre for Genetic Engineering and Biotechnology- ICGEB) एक विशिष्ट अंतर सरकारी संगठन है जिसे शुरुआत में संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन (United Nations Industrial Development Organization- UNIDO) की विशेष परियोजना के रूप में स्थापित किया गया था। किंतु वर्ष 1994 के बाद यह पूरी तरह से स्वायत्त हो गया। इसकी इटली, भारत और दक्षिण अफ्रीका में 46 अत्याधुनिक प्रयोगशालाएँ हैं और 65 से अधिक सदस्य देशों के साथ एक परस्पर संवादात्मक नेटवर्क बनाता है। यह विश्व भर में सतत् वैश्विक विकास की सफलता में योगदान करने हेतु उद्योगों के लिये जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र में अनुसंधान, प्रशिक्षण एवं प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के तहत कार्य करता है।

  • कनाडा के मैकमास्टर विश्वविद्यालय में वैज्ञानिकों द्वारा एंटीबायोटिक दवाओं का एक नया समूह खोजा गया जो प्रतिसूक्ष्मजीवी प्रतिरोध (Antimicrobial Resistance- AMR) से निपटने में सहायक हो सकता है।

कॉर्बोमाइसिन और कॉम्पलेस्टिन बैक्टीरियल वाल (Bacterial Wall) को क्षतिग्रस्त होने से बचाने का काम करते हैं इस प्रकार बैक्टीरियल कोशिकाओं का विभाजन रोका जाता है।

यह पेनिसिलिन जैसे पुराने एंटीबायोटिक्स के विपरीत काम करती है जो बैक्टीरियल वाल को पहले ही स्थान पर बनने से रोककर बैक्टीरिया को मारती है।

अपने शोध के लिये वैज्ञानिकों ने ग्लाइकोपेप्टाइड्स (Glycopeptides) नामक एंटीबायोटिक दवाओं के एक वर्ग का अध्ययन किया जो मिट्टी में पाए जाने वाले बैक्टीरिया द्वारा निर्मित होते हैं। सेल इमेजिंग तकनीक (Cell Imaging Technique) का उपयोग करके वैज्ञानिकों ने पाया कि एंटीबायोटिक्स बैक्टीरियल सेल वाल (Bacterial Cell Wall) पर हमला करने के बाद कार्य करते हैं। शोधकर्त्ताओं ने बताया कि ये एंटीबायोटिक्स (स्टैफिलोकोकस ऑरियस (Staphylococcus Aureus)) चूहों में संक्रमण को रोकने में सक्षम हैं। स्टैफिलोकोकस ऑरियस (Staphylococcus Aureus) दवा प्रतिरोधी बैक्टीरिया का एक वर्ग है। बैक्टीरिया के इस वर्ग को गंभीर संक्रमण का कारक माना जाता है। प्रतिसूक्ष्मजीवी प्रतिरोध(Antimicrobial Resistance- AMR): AMR एक वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार मनुष्यों, जानवरों और जलीय कृषि में एंटीबायोटिक दवाओं का दुरुपयोग AMR में योगदान देता है। इसके अलावा इस समस्या का कारण खेतों, कारखानों, मेडिकल एवं घरेलू अपशिष्टों का खराब प्रबंधन है। 26 जुलाई, 2019 को AMR का प्रबंधन करने हेतु एक कार्ययोजना विकसित करने में केरल के बाद मध्य प्रदेश भारत का दूसरा राज्य बन गया। AMR से निपटने के तरीकों का पता लगाने के लिये 10 अफ्रीकी देशों के विशेषज्ञों ने 22-24 जनवरी, 2020 को ज़ाम्बिया के लुसाका में मुलाकात की। एंटीबायोटिक दवाओं के नए वर्ग की खोज से संबंधित अध्ययन का निष्कर्ष 12 फरवरी, 2020 को ‘नेचर’ पत्रिका में प्रकाशित किया गया था।

  • चीन ने संयुक्त राज्य अमेरिका की एक एंटीवायरल प्रायोगिक दवा रेम्डेसिविर (Remdesivir) पर पेटेंट के लिये आवेदन किया है, यह दवा नॉवेल कोरोनावायरस (nCoV-2019) के इलाज में मदद कर सकता है।

रेम्डेसिविर एक प्रायोगिक दवा है और वैश्विक स्तर पर कहीं भी इसका लाइसेंस या अनुमोदन नहीं किया गया है। अभी तक यह साबित नहीं हो पाया है कि इसका उपयोग सुरक्षित या प्रभावी है या नहीं। इसे वर्तमान में इबोला वायरस से संक्रमण के उपचार के लिये विकसित किया जा रहा है। रेम्डेसिविर और क्लोरोक्वीन (Chloroquine) में हाल ही में उभरे नॉवेल कोरोनावायरस (nCoV-2019) को प्रभावी ढंग से रोकने की क्षमता है। क्लोरोक्वीन एक व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाने वाला मलेरिया-रोधी और स्व-प्रतिरक्षित रोग की दवा है जो हाल ही में एक संभावित एंटीवायरल दवा के रूप में प्रकाश में आई है। गौरतलब है कि अब तक नॉवेल कोरोनावायरस के लिये कोई ज्ञात उपचार नहीं है और इसके लिये एक उपयुक्त एंटीवायरल दवा की आवश्यकता होती है।

कोरोनावायरस[सम्पादन]

  • चीन के वुहान में कोरोना वायरस के फैलने की वजह से इस विषय पर बहस छिड़ गई है कि हाल के वर्षों में कई नए घातक वायरस चीन में ही क्यों उत्पन्न हुए हैं? हाल के वर्षों में चीन ‘गंभीर तीव्र श्वसन सिंड्रोम’ (Severe Acute Respiratory Syndrome- SARS), बर्ड फ्लू (Bird Flu) और वर्तमान में प्रभावी ‘नोवेल कोरोनावायरस’ (Novel Coronavirus- nCOV) जैसे वायरस के अधिकेंद्र के रूप में उभर कर सामने आया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation- WHO) का अनुमान है कि प्रत्येक वर्ष विश्व स्तर पर ज़ूनोसिस (Zoonoses) से लगभग एक बिलियन रोगियों तथा लाखों अन्य व्यक्तियों की मौत से संबंधित मामले सामने आते हैं।

ज़ूनोसिस एक बीमारी या संक्रमण का प्रभाव है जिसका स्थानांतरण स्वाभाविक रूप से कशेरुकीय जानवरों से मनुष्यों में होता है। ज़ूनोसिस बैक्टीरियल, वायरल या परजीवी हो सकता है या ऐसे रोगों से संबंधित होता है जो पारपंरिक रूप से प्रचलन में नही हैं।

ऐतिहासिक रूप से ऐसी कई घटनाएँ प्रकाश में आई हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि जूनोटिक रोगाणुओं की वजह से वैश्विक महामारी की स्थिति कोई नई समस्या नहीं है। ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो निम्नलिखित जूनोसिस संक्रमण संबंधी बीमारियों के बारे में जानकारी मिलती है-

  1. जस्टीनियन प्लेग (Justinian Plague): 541-542 AD में चिह्नित
  2. द ब्लैक डेथ (The Black Death): इसका संक्रमण पहली बार वर्ष 1347 में यूरोप में देखा गया।
  3. यलो फीवर (Yellow Fever): इसका संक्रमण पहली बार 16वीं शताब्दी में दक्षिण अमेरिका में देखा गया।
  4. वैश्विक इन्फ्लूएंज़ा महामारी (Global Influenza Pandemic): वर्ष 1918
  5. आधुनिक महामारियाँ जैसे- एचआईवी/एडस, SARS और H1N1 इन्फ्लूएंज़ा में एक लक्षण समान है कि इन सभी मामलों में वायरस का संचरण पशुओं से मानव में हुआ।

WHO के अनुसार, विश्व में नई उभरती संक्रामक बीमारियों में 60% बीमारियों का कारण जूनोसिस संक्रमण होता है। पिछले तीन दशकों में 30 से अधिक नए मानव रोगाणुओं में से 75% का संक्रमण जानवरों से हुआ। कोरोनावायरस सामान्यतः निम्नलिखित चार प्रकार के होते हैं-

  1. 229E अल्फा कोरोनावायरस (Alpha Coronavirus)
  2. NL63 अल्फा कोरोनावायरस (Alpha Coronavirus)
  3. OC43 बीटा कोरोनावायरस (Beta Coronavirus)
  4. HKU1 बीटा कोरोनावायरस (Beta Coronavirus

चार सामान्य कोरोनावायरस के अतिरिक्त निम्नलिखित दो विशिष्ट कोरोनावायरस होते हैं- कोरोनावायरस- मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (Middle East Respiratory Syndrome-MERS) कोरोनावायरस- सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (Severe Acute Respiratory Syndrome- SARS) कोरोनावायरस मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (Middle East Respiratory Syndrome- MERS CoV): पहली बार MERS Cov का संक्रमण वर्ष 2012 में सऊदी अरब में देखा गया था। इस कारण इस वायरस को मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम कोरोनावायरस (MERS CoV) कहा जाता है। MERS Cov से प्रभावित अधिकतर रोगियों में बुखार, जुकाम और श्वसन समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं। सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम कोरोनावायरस (Severe Acute Respiratory Syndrome- SARS CoV): SARS CoV से पहली बार वर्ष 2002 में दक्षिण चीन के ग्वांगडोंग प्रांत (Guangdong Province) में मानव में संक्रमण पाया गया। SARS CoV से प्रभावित अधिकतर रोगियों में इन्फ्लूएंज़ा, बुखार, घबराहट, वात-रोग, सिरदर्द, दस्त, कंपन जैसी समस्याएँ पाई जाती हैं।

भौतिक एवं रासायनिक विज्ञान[सम्पादन]

  • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत एक स्वायत्त संगठन ‘इंटरनेशनल एडवांस्ड रिसर्च सेंटर फॉर पाउडर मेटलर्जी एंड न्यू मैटेरियल्स’ (International Advanced Research Centre for Powder Metallurgy and New Materials- ARCI) के वैज्ञानिकों ने औद्योगिक अपशिष्ट कपास से एक कम लागत वाला, पर्यावरण अनुकूल एवं टिकाऊ सुपरकैपेसिटर इलेक्ट्रोड का निर्माण किया है जिसे ‘एनर्जी हारवेस्टर स्टोरेज़ डिवाइस’ (Energy Harvester Storage Device) के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

पहली बार प्राकृतिक समुद्री जल को पर्यावरण अनुकूल, लागत प्रभावी, मापनीय एवं वैकल्पिक जलीय इलेक्ट्रोलाइट (Aqueous Electrolyte) के रूप में खोजा गया है जो सुपरकैपेसिटर के आर्थिक निर्माण के लिये मौज़ूदा जलीय-आधारित इलेक्ट्रोलाइट्स (Aqueous-Based Electrolytes) की जगह ले सकता है।

सुपरकैपेसिटर नई पीढ़ी के ऊर्जा भंडारण उपकरण हैं जो उच्च शक्ति घनत्व कैपेसिटर, लंबे समय तक स्थायित्त्व एवं पारंपरिक कैपेसिटर की तुलना में अल्ट्राफास्ट चार्जिंग एवं लिथियम-आयन बैटरी जैसे गुणों के कारण व्यापक अनुसंधान के लिये महत्त्वपूर्ण हैं।

सुपरकैपेसिटर के चार मुख्य घटकों इलेक्ट्रोड, इलेक्ट्रोलाइट, सेपरेटर और करेंट कलेक्टर में से पहले दो (इलेक्ट्रोड और इलेक्ट्रोलाइट) प्रमुख घटक हैं जो तत्काल सुपरकैपेसिटर के विद्युत रासायनिक व्यवहार को निर्धारित करते हैं। परिणामतः इलेक्ट्रोड सामग्री और इलेक्ट्रोलाइट्स के निर्माण की लागत को कम किया जाना चाहिये क्योंकि ये दो घटक ही उपकरण निर्माण लागत के मामले में महत्त्वपूर्ण हैं। वहनीय सुपरकैपेसिटर उपकरण बनाने हेतु एक लागत प्रभावी सामग्री के लिये ARCI के वैज्ञानिकों ने ‘औद्योगिक अपशिष्ट कपास’ (कचरे) को ‘अत्यधिक महीन कार्बन फाइबर’ में बदलकर ‘सुपरकैपेसिटर इलेक्ट्रोड’ का निर्माण किया है। हाल ही में एनर्जी टेक्नोलॉजी (Energy Technology) में प्रकाशित हुए शोध में बताया गया कि ARCI के वैज्ञानिकों ने जलीय-आधारित सुपरकैपेसिटर उपकरणों के निर्माण के लिये समुद्री जल को प्राकृतिक इलेक्ट्रोलाइट के रूप में उपयोग किया। इस शोध में पाया गया कि प्राकृतिक समुद्री जल-आधारित सुपरकैपेसिटर ने 1 Ag-1 के धारा घनत्व (Current Density) पर अधिकतम धारिता का प्रदर्शन किया। इसके अलावा समुद्री जल-आधारित सुपरकैपेसिटर 99% कैपेसिटेंस रिटेंशन (Capacitance Retention) और 99% कूलम्बिक दक्षता (Coulombic Efficiency) के साथ 10,000 चार्ज-डिस्चार्ज चक्रों पर बेहतर परिणाम देता है। कूलम्बिक दक्षता (Coulombic Efficiency): इसे फैराडिक दक्षता (Faradaic Efficiency) या धारा दक्षता (Current Efficiency) भी कहा जाता है। यह आवेश दक्षता को संदर्भित करती है जिसके द्वारा इलेक्ट्रॉनों को बैटरी में स्थानांतरित किया जाता है।

  • जेजीआर सॉलिड अर्थ (JGR Solid Earth) पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार,पृथ्वी का आंतरिक कोर छोटे लौह कणों से निर्मित बर्फ से बना है जिसका घनत्व पृथ्वी की सतह पर मौजूद बर्फ की तुलना में अधिक है। पृथ्वी के बाह्य कोर (Outer Core) से लौह बर्फ पिघलकर आतंरिक कोर (Inner Core) में जमा हो जाती है, जिसकी मोटाई 320 मीटर है। भूकंपीय तरंगों के विश्लेषण के आधार पर यह खोज की गई है। जब भूकंपीय तरंगें बाह्य कोर से गुज़रती हैं तो इनकी गति धीमी हो जाती है।

पहले के अध्ययनों में बताया गया है कि आंतरिक और बाह्य कोर के बीच लौह बर्फ की परत मौजूद है। अतः नवीनतम जानकारी पृथ्वी के कोर से जुटाए गए पहले की सूचना को प्रमाणित करती है। यहाँ पर क्रिस्टलीकरण संभव है और निचली बाह्य कोर का लगभग 15% हिस्सा लौह आधारित क्रिस्टल (बर्फ) से बना हो सकता है।

लेज़र इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल-वेव ऑब्जर्वेटरी (LIGO) में स्थित गुरुत्वाकर्षण तरंग वेधशालाओं के द्वारा दो असमान-द्रव्यमान वाले ब्लैक होल के विलय का पहली बार पता लगाया गया है। इस घटना को GW190412 नाम दिया गया है। इस घटना का पता वर्ष 2019 में लगाया गया था। लगभग 5 वर्ष पहले LIGO स्थित गुरुत्त्वाकर्षण वेधशाला ने पहली बार गुरुत्वाकर्षण तरंगों का पता लगाया था। इन दोनों ब्लैक होल का द्रव्यमान क्रमशः 8 सौर द्रव्यमान (Solar Mass) और 30 सौर द्रव्यमान (2×10³⁰ किलोग्रा०) था। सौर द्रव्यमान खगोल विज्ञान में द्रव्यमान की एक मानक इकाई है। दोनों ब्लैक होल के विलय की खोज लगभग 2.5 बिलियन प्रकाश वर्ष की दूरी पर की गई। खोज का महत्त्व: इससे कई और चीजों का पता लगाना संभव हो जाएगा। जैसे- घटना से दूरी का अधिक सटीक निर्धारण। अधिक द्रव्यमान वाले ब्लैक होल की कोणीय गति, आदि सामान्य सापेक्षता की भविष्यवाणी के साथ सत्यापन:-यह अवलोकन एक बार फिर आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत की पुष्टि करता है, जो उच्च आवर्ती के हार्मोनिक्स (Harmonics) के अस्तित्व की भविष्यवाणी करता है। यह वर्ष 1915 में अल्बर्ट आइंस्टीन द्वारा प्रकाशित गुरुत्वाकर्षण का ज्यामितीय सिद्धांत है। समान द्रव्यमान और असमान द्रव्यमान के द्विआधारी ब्लैक होल के मध्य अंतर: गुरुत्त्वाकर्षण तरंगों का प्रमुख उत्सर्जन समान द्रव्यमान के द्विआधारी (Binary) ब्लैकहोल की कक्षीय आवृत्ति से दोगुना होता है और यह नगण्य है। असमान द्रव्यमान वाले द्विआधारी ब्लैकहोल में उत्सर्जन एक आवृत्ति पर होता है जो कक्षीय आवृत्ति का तीन गुना होता है। कक्षीय आवृत्ति, घूर्णन दर (Rotation Rate) का मापक होता है। इसके अलावा, असमान ब्लैक होल के विलय में, अधिक बड़े ब्लैक होल का चक्रण (Spin) सिग्नल तरंग में अतिरिक्त सुविधाओं से निर्धारित किया जा सकता है। भारी ब्लैक होल का चक्रण, द्विआधारी की गतिशीलता में एक प्रमुख भूमिका निभाता है। लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल-वेव ऑब्ज़र्वेटरी (LIGO): LIGO दुनिया की सबसे बड़ी गुरुत्त्वाकर्षण तरंग वेधशाला है।

संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थापित LIGO के दो व्यापक अलग-अलग इंटरफेरोमीटर हैं - एक हैनफोर्ड, वॉशिंगटन में और दूसरा लिविंगस्टन, लुइसियाना में - जो गुरुत्त्वाकर्षण तरंगों का पता लगाने के लिये संयुक्त रूप से संचालित होते हैं।

इसके माध्यम से वैज्ञानिक अंतरिक्ष में दिक्-काल आयाम में पदार्थों की गति को भी समझ पाते हैं, जो अंतरिक्ष के क्षेत्र में अनुसंधान में सहायक होगा। भविष्य में पृथ्वी से संबंधित समस्याओं का समाधान भी किया जा सकता है। ब्लैक होल (Black Hole): ब्लैक होल शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले अमेरिकी भौतिकविद् जॉन व्हीलर ने 1960 के दशक के मध्य में किया था। ब्लैक होल्स अंतरिक्ष में उपस्थित ऐसे छिद्र हैं जहाँ गुरुत्त्व बल इतना अधिक होता है कि यहाँ से प्रकाश का पारगमन नहीं होता। चूँकि इनसे प्रकाश बाहर नहीं निकल सकता, अतः हमें ब्लैक होल दिखाई नहीं देते, वे अदृश्य होते हैं। हालाँकि विशेष उपकरणों से युक्त अंतरिक्ष टेलिस्कोप की मदद से ब्लैक होल की पहचान की जा सकती है। ये उपकरण यह बताने में भी सक्षम हैं कि ब्लैक होल के निकट स्थित तारे अन्य प्रकार के तारों से किस प्रकार भिन्न व्यवहार करते हैं।

सन्दर्भ[सम्पादन]