सिविल सेवा मुख्य परीक्षा विषयवार अध्ययन/औद्योगिक क्षेत्रक

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वस्त्र उद्योग, मूल्य के रूप में उद्योग के आउटपुट में 7 प्रतिशत, भारत की जीडीपी में 2 प्रतिशत तथा देश की निर्यात आय में 12 प्रतिशत का योगदान देता है। वस्त्र उद्योग कृषि के बाद प्रत्यक्ष रूप से 10 करोड़ से अधिक लोगों को रोज़गार प्रदान करता है। नीति आयोग के विज़न डॉक्यूमेंट के अनुसार अगले 7 वर्षों में यह क्षेत्र 130 मिलियन रोज़गार मुहैया करा सकता है। वस्त्र उद्योग ऐसा क्षेत्र है, जो कृषि और उद्योग के बीच सेतु का कार्य करता है। कपास की खेती हो या रेशम का उत्पादन, इस उद्योग पर बहुत कुछ निर्भर करता है।

  • प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना खनन संबंधी कार्यों से प्रभावित क्षेत्रों और लोगों के कल्याण हेतु खनन मंत्रालय द्वारा चलाई जा रही योजना।
  • कपड़ा मंत्रालय ने पावरटेक्स इंडिया की शुरुआत 2017 में की थी। यह देश के पावरलूम क्षेत्र के विकास पर केंद्रित त्रि-वर्षीय समावेशी योजना है।

यह योजना पावर लूम टेक्सटाइल्स में ब्रांडिंग, सब्सिडी, नए बाजार, नए अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देकर पावरलूम श्रमिकों के लिये कल्याणकारी योजनाओं को समाहित करती है।

  • स्टार्टअप से जुड़ी पहलों के आधार पर राज्यों की रैंकिंग का संस्करण उद्योग संवर्द्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (DPIIT) द्वारा लॉन्च।

यह भारत में संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन (United Nations Industrial Development Organization-UNIDO) के कार्यक्रमों को लागू करने के लिये एक नोडल विभाग है। UNIDO संयुक्त राष्ट्र की एक विशेष एजेंसी है जो गरीबी कम करने, समावेशी वैश्‍वीकरण और पर्यावरण की संवहनीयता के लिये औद्योगिक विकास को बढ़ावा देती है।।

  • ‘स्वायत्त’ पहल वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय (Ministry of Commerce & Industry) द्वारा शुरू की गई है।

SWAYATT, गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस पर ई-हस्तांतरण (e-Transactions) के माध्यम से स्टार्ट-अप, महिला और युवाओं को बढ़ावा देने के लिये शुरू की गई एक पहल है। यह भारतीय उद्यमशीलता पारिस्थितिकी तंत्र के प्रमुख हितधारकों को राष्ट्रीय उद्यम पोर्टल गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस के साथ जोड़ने का काम करेगी

1950-90 तक[सम्पादन]

  • भारतीय अर्थव्यवस्था को समाजवाद के पथ पर अग्रसर करने के लिए द्वितीय पंचवर्षीय योजना में यह निर्णय लिया गया कि सरकार अर्थव्यवस्था में बड़े तथा भारी उद्योग का नियंत्रण करेगी निजी क्षेत्र की नीतियां सार्वजनिक क्षेत्र की नीतियों की अनुपूरक होगी और सार्वजनिक क्षेत्र अग्रणी भूमिका निभाएगा।
  • औद्योगिक नीति प्रस्ताव 1956 भारी उद्योगों पर नियंत्रण रखने के उद्देश्य से इस नीति को अंगीकार किया गया।द्वितीय योजना 1956 से 17 में समाजवादी स्वरूप का आधार तैयार करने का प्रयास किया गया जिसके तहत उद्योगों को 3 वर्गों में वर्गीकृत किया गया प्रथम वर्ग में शामिल उद्योग पर राज्य का स्वामित्व था निजी क्षेत्रक सरकारी क्षेत्र के साथ मिलकर प्रयास कर सकते थे इस बार के उद्योग क्षेत्र के अंतर्गत आते थे।
  • यद्यपि निजी क्षेत्रक में आने वाले उद्योगों का भी एक वर्ग था लेकिन इस क्षेत्र को लाइसेंस पद्धति के माध्यम से राज्य के नियंत्रण में रखा गया इस नीति का प्रयोग पिछड़े क्षेत्रों में उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए किया गया पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग लगाने पर लाइसेंस प्राप्त करना आसान था इसके अतिरिक्त उनको कुछ रियायत जैसे कर लाभ तथा कम प्रसंग पर बिजली दी गई इस नीति का उद्देश्य क्षेत्रीय समानता को बढ़ावा देना था।
  • लघु उद्योग 1955 में ग्राम तथा लघु उद्योग के लिए बनी कार्यसमिति ने इस बात की संभावना पर विचार किया कि ग्राम विकास को प्रोत्साहित करने के लिए लघु उद्योगों का प्रयोग किया जाए।
  • 1950 में लघु औद्योगिक इकाई उसे कहा जाता था जो 500000 का अधिकतम निवेश करती थी इस समय एक करोड़ का अधिकतम निवेश किया जा सकता है लघु उद्योग श्रम प्रधान होते हैं इसलिए इसे बड़ी फर्म के प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए अनेक उत्पादों को लघु उद्योग के लिए आरक्षित किया गया इसके अलावा उन्हें अन्याय भी दी गई जैसे उत्पाद शुल्क तथा कम ब्याज दरों पर बैंक।

औद्योगिक विकास पर इन नीतियों का प्रभाव[सम्पादन]

  • दूरसंचार उद्योग को सार्वजनिक क्षेत्र में आरक्षण प्रदान करने के कारण उन्हें सन 90 के अंत तक प्रतिस्पर्धा नहीं होने के कारण व्यक्ति को टेलीफोन कनेक्शन लेने के लिए लंबे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती थी।
  • मॉडर्न ब्रेड की स्थापना सार्वजनिक क्षेत्र के अंतर्गत की गई परंतु 2001 में इसे निजी क्षेत्र को बेच दिया गया।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा तथा होटलों की व्यवस्था सार्वजनिक के अंतर्गत की गई।
  • बड़े फर्मट ने नए प्रत्याशियों को रोकने के लिए लाइसेंस प्राप्त कर लेते थे।परमिट लाइसेंस राज के अत्यधिक नियमन के कारण कुछ फर्मे कार्यकुशल में उत्पाद के विषय में विचार करने की अपेक्षा लाइसेंस प्राप्त करने की कोशिश में और संबंधित मंत्रालय में समय व्यतीत करते थे।
  • आयात पर प्रतिबंध लगने के कारण भारतीय उपभोक्ताओं को उन वस्तुओं को खरीदना पड़ता था जिनका उत्पादन भारतीय उत्पादक करते थे आसानी से विशाल बाजार के विस्तृत होने के कारण निम्न गुणवत्ता वाली वस्तुओं को ऊंची कीमतों पर बेची जाती।
  • सार्वजनिक क्षे का प्रयोजन लाभ कमाना नहीं बल्कि राष्ट्र के कल्याण को बढ़ावा देना है।
  • सरकारी नियमन के कारण उद्यम वृत्ति अवरुद्ध हो गई।

वस्त्र उत्पादन में प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के लिये पहल / योजनाएँ: ‘साथी’ पहल (Sustainable and Accelerated Adoption of efficient Textile technologies to Help Small Industries Initiative-SAATHI): इस पहल के तहत ऊर्जा दक्षता सेवा लिमिटेड ( Energy Efficiency Services Limited- EESL) थोक में ऊर्जा कुशल पावरलूम, मोटर्स और रैपियर किट ( Rapier Kits) का अधिग्रहण करेगी तथा उन्हें छोटे और मध्यम पावरलूम इकाइयों को प्रदान करेगी। पॉवर टेक्स इंडिया (Power Tex India): यह पावरलूम क्षेत्र के विकास के लिये एक व्यापक योजना है। मर्चेंडाइज़ एक्सपोर्ट्स फ्रॉम इंडिया स्कीम (Merchandise Exports from India Scheme- MEIS): इसका उद्देश्य विभिन्न पारंपरिक और उभरते बाज़ारों में भारत से कपड़ा निर्यात की वृद्धि को प्रोत्साहित करना है। वस्त्रोद्योग क्षेत्रक MEIS के सबसे बड़े लाभार्थियों में से एक है। वस्त्रोद्योग के लिये संशोधित प्रौद्योगिकी उन्नयन कोष योजना (Amended Technology Upgradation Fund Scheme for textiles industry- ATUFS): यह उद्यमियों और व्यवसाय के मालिकों को प्रौद्योगिकियों के उन्नयन हेतु प्रोत्साहन प्रदान करती है। एकीकृत कौशल विकास योजना (Integrated Skill Development Scheme- ISDS) : वर्तमान में कपड़ा बुनकरों और श्रमिकों को नवीनतम तकनीक के उपयोग जानकारी कम होने का कारण उनको औपचारिक प्रशिक्षण न मिल पाना है जिससे बेहतर नौकरी और उच्च मज़दूरी प्राप्त करने के अवसर कम हो जाते हैं। इस योजना के माध्यम से 1.5 मिलियन लोगोंं को प्रशिक्षण प्रदान किया गया है। स्कीम फॉर इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल पार्क ( Scheme for Integrated Textile Park-SITP): इस योजना के तहत सरकार बुनियादी सुविधाओं और इमारतों ( डिज़ाइन और प्रशिक्षण केंद्र, गोदाम, कारखानों और संयंत्र) के लिये वित्तीय सहायता प्रदान करेगी।

सूक्ष्‍म,लघु एवं मझोले उद्यम (MSMEs) सेक्‍टर[सम्पादन]

2 नवंबर, 2018 को प्रधानमंत्री ने सूक्ष्‍म, लघु एवं मझोले उद्यम (MSMEs) सेक्‍टर के लिये एक ऐतिहासिक सहयोग एवं संपर्क कार्यक्रम की शुरुआत की। इस कार्यक्रम के तहत 12 महत्त्वपूर्ण घोषणाएँ की गई हैं जिनसे देश भर में MSMEs के विकास और विस्‍तार के साथ-साथ उन्‍हें सहूलियतें देने में मदद मिलेगी।

सहयोग एवं संपर्क कार्यक्रम के अंतर्गत घोषणाएँ

  1. MSMEs को आसानी से ऋण उपलब्‍ध कराने के लिये एक लोन पोर्टल लॉन्च करने की घोषणा की गई। इस पोर्टल के ज़रिये सिर्फ 59 मिनट में एक करोड़ रुपए तक के ऋणों को सैद्धांतिक मंज़ूरी दी जा सकती है। GST पोर्टल के ज़रिये इस पोर्टल का एक लिंक उपलब्‍ध कराया जाएगा।
  2. सभी GST पंजीकृत सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिये दो प्रतिशत ब्याज सब्सिडी देने की घोषणा। शिपमेंट से पूर्व और बाद की अवधि में ऋण लेने वाले निर्यातकों के लिये ब्याज में छूट तीन प्रतिशत से बढ़ाकर पाँच प्रतिशत करने की घोषणा की गई।
  3. पाँच सौ करोड़ रुपए से अधिक टर्नओवर वाली सभी कंपनियों को आवश्यक रूप से व्यापार प्राप्तियाँ ई-डिस्काउंटिंग प्रणाली (TREDS) पोर्टल में शामिल किया जाए। इस घोषणा में शामिल होने से उद्यमी अपनी आगामी प्राप्तियों के आधार पर बैंकों से ऋण ले सकेंगे। इससे उनके नकदी चक्र की समस्याएँ हल हो जाएंगी।
  4. सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को अब 20 प्रतिशत की बजाय अपनी कुल खरीदारी में से 25 प्रतिशत खरीदारी MSMEs से करने के लिये कहा गया है।
  5. पाँचवी घोषणा महिला उद्यमियों से संबंधित है। MSMEs से की गई आवश्यक 25 प्रतिशत खरीदारी में से 3 प्रतिशत खरीदारी अब महिला उद्यमियों के लिये आरक्षित की गई है।
  6. केंद्र सरकार के सभी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को अब आवश्यक रूप से GeM (Government e-Market place) का हिस्सा होना चाहिये। उन्हें अपने सभी विक्रेताओं को GeM से पंजीकृत कराया जाना चाहिये।
  7. पूरे देश में स्थित टूल रूम्स अब उत्पाद डिज़ाइन के महत्त्वपूर्ण हिस्से हैं। पूरे देश में इससे संबंधित 22 केंद्र बनाए जाएंगे और टूल रूम के रूप में 100 स्पोक्स स्थापित किये जाएंगे।
  8. फार्मा क्षेत्र के सूक्ष्‍म, लघु एवं मध्‍यम उद्योगों के लिये क्‍लस्‍टर बनाए जाएंगे। इन क्‍लस्‍टर के निर्माण की लागत का 70 प्रतिशत केंद्र सरकार वहन करेगी।
  9. 9वीं घोषणा सरकारी प्रक्रियाओं के सरलीकरण के बारे में है। इस घोषणा के तहत आठ श्रम कानूनों और 10 केंद्रीय नियमों के अंतर्गत अब साल में एक ही बार रिटर्न फाइल किये जाएंगे।
  10. 10वीं घोषणा यह है कि अब प्रतिष्‍ठानों का निरीक्षक द्वारा किये जाने वाला दौरा कंप्‍यूटर आधारित औचक आवंटन के जरिये तय किया जाएगा। इकाई स्‍थापित करने के संबंध में उद्यमियों को दो क्‍लीयरेंस की ज़रूरत होती है- पर्यावरण क्‍लीयरेंस और इकाई स्‍थापित करने की रजामंदी।
  11. 11वीं घोषणा के अंतर्गत वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण नियमों के तहत इन दोनों क्‍लीयरेंस को एकल अनुमति में समाविष्‍ट कर दिया गया है। अब रिटर्न, स्व–प्रमाणीकरण के ज़रिये स्‍वीकार किया जाएगा।
  12. एक अध्‍यादेश लाया गया है, जिसके तहत कंपनी अधिनियम के संबंध में मामूली उल्‍लंघनों के लिये उद्यमी को अदालतों के चक्‍कर नहीं लगाने होंगे। उन्‍हें आसान प्रक्रियाओं के तहत दुरुस्‍त कर लिया जाएगा।