सिविल सेवा मुख्य परीक्षा विषयवार अध्ययन/कृषि क्षेत्रक

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2016 की शुरुआत में सिक्किम को भारत का पहला पूर्ण जैविक राज्य घोषित किया गया था। आंध्र प्रदेश ज़ीरो बजट नेचुरल फार्मिंग करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है। राजस्थान में सीकर ज़िले के एक प्रयोगधर्मी किसान कानसिंह कटराथल ने अपने खेत में नेचुरल फार्मिंग विधि अपनाकर उत्साहवर्धक सफलता हासिल की है। सूखा प्रवण रायलसीमा क्षेत्र (आंध्र प्रदेश) में ZBNF के अनुपालन से काफी आशाजनक बदलाव देखने को मिले हैं, जिसने इस संभावना को और भी प्रबल बना दिया है।

  • नेचुरल फार्मिंग के सूत्रधार महाराष्ट्र के सुभाष पालेकर की बात मानें तो ज्ञात होता है कि जैविक खेती रासायनिक खेती से भी अधिक हानिकारक, विषैली और खर्चीली साबित होती है।

श्री पालेकर के अनुसार, वैश्विक तापमान वृद्धि में रासायनिक खेती एवं जैविक खेती एक महत्त्वपूर्ण यौगिक के रूप में प्रस्तुत होती है। जैविक व रासायनिक खेती प्राकृतिक संसाधनों के लिये निरंतर खतरा बनती जा रही है। इससे मिट्टी का पीएच मानक लगातार बढ़ रहा है, जिसके परिणामस्वरूप अधिक लागत पर ज़हरीला अनाज पैदा हो रहा है जो कैंसर जैसी बीमारियों के पैदा होने का कारण बन रहा है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार फसल की बुवाई से पहले खेत में वर्मी कम्पोस्ट और गोबर खाद को डाला जाता है। इस खाद में निहित 46 प्रतिशत उड़नशील कार्बन (नायट्रस, आक्साइडस, मिथेन आदि) 36 से 48 डिग्री सेल्सियस तापमान के दौरान वायुमंडल में मुक्त हो जाता है जो कि ग्रीन हाउस गैसों के निर्माण में सहायक होता है।

  • श्री पालेकर के अनुसार, वर्मी कम्पोस्ट खाद के निर्माण में इस्तेमाल किये जाने वाले आयातित केंचुएँ भूमि के उपजाऊपन के लिये हानिकारक होते हैं। इसका कारण यह है कि ये जीव देशी केंचुआ न होकर आयसेनिया फिटिडा नामक एक जंतु होता है, जो भूमि में उपस्थित काष्ट पदार्थ और गोबर को भोजन के रूप में ग्रहण करता है।

जैविक कृषि[सम्पादन]

2 जनवरी 2018 को भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण द्वारा जारी नोटिफिकेशन के अनुसार, जैविक खाद्य उत्पादों की बिक्री करने वाली कंपनियों को अपने उत्पादों को प्रमाणित करवाना अनिवार्य होगा। प्रमाणन के लिये निम्नलिखित दो प्राधिकरणों को नामित किया गया है-

  1. जैविक उत्पादन हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रम ( National Programme for Organic Production-NPOP)।
  2. भारत के लिये सहभागिता गारंटी प्रणाली (Participatory Guarantee System for India- PGS-I)।

इसके अतिरिक्त अपने उत्पाद को 'कार्बनिक उत्पाद' दर्शाने वाली कंपनियाँ स्वैच्छिक रूप से FSSAI से ‘जैविक भारत’ (JAIVIK BHARAT) का लोगो भी प्राप्त कर सकती हैं, जिसे हाल ही में FSSAI द्वारा जारी किया गया है।

जैविक उत्पादन हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रम (NPOP)

भारत वर्ष में राष्ट्रीय स्तर पर जैविक खेती के केन्द्रित व सुव्यवस्थित विकास हेतु भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय द्वारा सन 2001 में अपने उपक्रम कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के माध्यम से जैविक प्रमाणीकरण की प्रक्रिया को नियंत्रित करने के लिये NPOP की शुरुआत की गई। इस प्रमाणीकरण व्यवस्था के तहत NPOP द्वारा सफल प्रसंस्करण इकाइयों, भंडारों और खेतों को ‘इंडिया ऑर्गेनिक’ का लोगो प्रदान कराया जाता है। एपीडा द्वारा जैविक उत्पादों का प्रमाणीकरण विश्व के सभी देशों में मान्य है।

“भारत की सहभागिता प्रतिभूति प्रणाली” (पीजीएस-इंडिया) एक विकेंद्रीकृत जैविक कृषि प्रमाणन प्रणाली है।

इसे घरेलू जैविक बाजार के विकास को बढ़ावा देने तथा जैविक प्रमाणीकरण की आसान पहुँच के लिये छोटे एवं सीमांत किसानों को समर्थ बनाने के लिये प्रारम्भ किया गया है। इसे कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के कृषि एवं सहकारिता विभाग द्वारा क्रियान्वित किया जा रहा है। यह प्रमाणीकरण प्रणाली उत्‍पादकों / किसानों, व्‍यापारियों सहित हितधारकों की सक्रिय भागीदारिता के साथ स्‍थानीय रूप से संबद्ध है। इस समूह प्रमाणीकरण प्रणाली को परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) का समर्थन प्राप्‍त है। एक प्रकार से यह जैविक उत्‍पाद की स्‍वदेशी मांग को सहायता पहुँचाती है और किसान को दस्‍तावेज़ प्रबंधन और प्रमाणीकरण प्रक्रिया से जुड़ी अन्‍य आवश्‍यकताओं से संबंधित प्रशिक्षण देती है।

विषय से संबंधित कुछ सांविधानिक प्रावधान-

अनुच्छेद 21- प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण।

अनुच्छेद 39 (क)- सभी नागरिकों को आजीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार, (ख)- सामूहिक हित के लिये समुदाय के भौतिक संसाधनों का समान वितरण।

अनुच्छेद 47- पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा उठाने तथा लोक स्वास्थ्य में सुधार करने का राज्य का कर्त्तव्य

अनुच्छेद 48- कृषि और पशुपालन हेतु संगठन।

अनुच्छेद 48 (क)- पर्यावरण का संरक्षण और संवर्द्धन तथा वन तथा वन्यजीवों की रक्षा। अनुच्छेद 51 (क) VII- प्राकृतिक पर्यावरण, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्यजीव आते हैं, की रक्षा करें और उसका संवर्द्धन करें तथा प्राणिमात्र के प्रति दया भाव रखें।

जैविक खेती से होने वाले लाभ

कृषकों की दृष्टि से लाभ भूमि की उपजाऊ क्षमता में वृद्धि हो जाती है। सिंचाई अंतराल में वृद्धि होती है। रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होने से लागत में कमी आती है। फसलों की उत्पादकता में वृद्धि। मिट्टी की दृष्टि से लाभ जैविक खाद का उपयोग करने से भूमि की गुणवत्ता में सुधार आता है। भूमि की जल धारण क्षमता बढ़ती है। भूमि से पानी का वाष्पीकरण कम होगा। पर्यावरण की दृष्टि से लाभ भूमि के जल स्तर में वृद्धि होती है। मिट्टी, खाद्य पदार्थ और ज़मीन में पानी के माध्यम से होने वाले प्रदूषण मे कमी आती है। कचरे का उपयोग खाद बनाने में होने से बीमारियों में कमी आती है। फसल उत्पादन की लागत में कमी एवं आय में वृद्धि । अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार स्पर्द्धा में जैविक उत्पाद की गुणवत्ता का खरा उतरना।

सरकारी प्रयास[सम्पादन]

कुसुम योजना (KUSUM Scheme) नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय द्वारा शुरू की गई योजना है। इस योजना का पूरा नाम ‘किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान’ (Kisan Urja Suraksha evam Utthaan Mahabhiyan-KUSUM) है। इस योजना लक्ष्य ग्रामीण इलाकों में नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना करना है। प्रस्तावित योजना के अंतर्गत निम्नलिखित कार्यों का प्रावधान किया गया है- ग्रामीण इलाकों में 500KW से 2 MW तक की क्षमता वाले ग्रिड से जुड़े नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना। ऐसे किसानों, जो किसी भी ग्रिड से नहीं जुड़े हैं, की सिंचाई संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु एकल आधार वाले (stand alone) ऑफ-ग्रिड सौर जल पंपों की स्थापना। किसानों को ग्रिड से की जाने वाली आपूर्ति से मुक्त करने के लिये विद्यमान ग्रिड-कनेक्टेड कृषि पंपों का सौरीकरण (Solarization) तथा उत्पादित अधिशेष सौर ऊर्जा की बिक्री वितरण कंपनियों (Distribution Companies-DISCOM) को करना और अतिरिक्त आय प्राप्त करना।

  • कुसुम योजना के अंतर्गत ग्रामीण इलाकों में 500KW से 2 MW तक की क्षमता वाले ग्रिड से जुड़े नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्रों और ऐसे किसानों जो किसी ग्रिड से नहीं जुड़े हैं, की सिंचाई संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु एकल आधार वाले (stand alone) ऑफ-ग्रिड सौर जल पंपों की स्थापना का प्रावधान है।

प्रत्येक किसान को नए और बेहतर सौर ऊर्जा संचालित पंपों पर सब्सिडी मिलेगी। सौर पंप प्राप्त करने और उसे लगाने के लिये किसानों को कुल लागत का 10% खर्च करना होगा। केंद्र सरकार 60% लागत प्रदान करेगी, जबकि शेष 30% क्रेडिट के रूप में बैंक द्वारा दिया जाएगा।

  • प्रधान मंत्री किसान सम्मान निधि ((PM-KISAN) के तहत अब सभी किसानों को 6000 रुपए वार्षिक दिये जाएंगे। अब 2 हेक्टेयर ज़मीन की सीमा लागू नहीं होगी तथा दो करोड़ अतिरिक्त किसान भी योजना के दायरे में आ जाएंगे।
  • यह योजना तेलंगाना की रायथु बंधु योजना की तर्ज पर है, जिसके तहत सभी किसानों को प्रतिवर्ष 10 हज़ार रुपये प्रति एकड़ दिये जाते हैं, इसमें बंटाईदार किसान शामिल नहीं हैं।
  • ओडिशा की आजीविका और आय संवर्धन के लिये कृषक सहायता (KALIA-कालिया) योजना भी इसी प्रकार की है, जो लघु और सीमांत किसानों के लिए पांच सत्रों में एक कृषि परिवार के लिए 25 हज़ार रुपये का प्रत्यक्ष लाभ नकद हस्तांतरण प्रदान करती है।यह योजना वित्त मंत्रालय द्वारा शुरू की गई है।
  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड (SHC) योजना कृषि मंत्रालय द्वारा 5 दिसंबर, 2015 को प्रारंभ।

इस मुद्रित रिपोर्ट के अंतर्गत कृषि क्षेत्र की मृदा में 12 पोषक तत्त्वों की स्थिति शामिल है- pH, विद्युतीय चालकता (EC), ऑर्गेनिक कार्बन (OC), नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P), पोटेशियम (K), सल्फर (S) , जिंक (Zn), बोरॉन (B), आयरन (Fe), मैंगनीज (Mn), कॉपर (Cu)। मृदा में सूक्ष्मजीव/माइक्रोबियल गतिविधि, नमी प्रतिधारण गतिविधि आवश्यक तो हैं, किंतु ये SHC में शामिल नहीं हैं

  • पशुओं के खुरपका और मुखपका रोग के टीकाकरण के लिये अब पूरा पैसा केंद्र सरकार देगी। पहले केंद्र और राज्य सरकारें 60:40 के अनुपात।

तमिलनाडु सरकार द्वारा पारित कृषि उपज एवं पशुधन अनुबंध कृषि व सेवा (संवर्द्धन और सुविधा) अधिनियम[सम्पादन]

  • केंद्र सरकार की मॉडल अनुबंध कृषि अधिनियम, 2018 की तर्ज पर अनुबंध कृषि पर कानून बनाने वाला तमिलनाडु देश का पहला राज्य बन गया है।
  • अनुबंध कृषि के अंतर्गत खरीदारों (खाद्य प्रसंस्करण इकाई व निर्यातक) तथा उत्पादकों के मध्य फसल-पूर्व समझौते या अनुबंध किये जाते हैं जिसके आधार पर कृषि उत्पादन (पशुधन व मुर्गीपालन) किया जाता है।
  • अनुबंध कृषि को समवर्ती सूची के तहत शामिल किया गया है, जबकि कृषि राज्य सूची का विषय है।
  • सरकार ने अनुबंध कृषि में संलग्न फर्मों को आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के अंतर्गत खाद्य फसलों की भडारण सीमा एवं आवाजाही पर मौजूदा लाइसेंसिंग और प्रतिबंध से छूट दे रखी है।
  • भारत में इससे संबंधित कानून:
  • कृषि मंत्रालय ने मॉडल कृषि विपणन समिति अधिनियम, 2003 का मसौदा तैयार किया था जिसमें प्रायोजकों के पंजीकरण, समझौते की रिकॉर्डिंग, विवाद निपटान तंत्र आदि के प्रावधान हैं।
  • फलस्वरूप कुछ राज्यों ने इस प्रावधान के अनुसरण में अपने APMC अधिनियमों में संशोधन किया परंतु पंजाब में अनुबंध कृषि पर अलग कानून है।
  • केंद्र सरकार मॉडल अनुबंध कृषि अधिनियम 2018 के माध्यम से राज्य सरकारों को इस मॉडल अधिनियम के अनुरूप स्पष्ट अनुबंध कृषि कानून अधिनियमित करने हेतु प्रोत्साहित कर रही है।
  • इसे एक संवर्द्धनात्मक एवं सुविधाजनक अधिनियम के रूप में तैयार किया गया है तथा यह विनियामक प्रकृति का नहीं है।
  1. लाभ:-किसानों के हितों की रक्षा:-यह किसानों को उनकी उपज के लिये एक आश्वासन वाला बाज़ार मुहैया कराती है तथा बाज़ार की कीमतों में उतार-चढ़ाव से उन्हें सुरक्षित करके उनके जोखिम को कम करती हैं।

पूर्व निर्धारित कीमतें,फसल कटाई के बाद होने वाली क्षति के मामले में प्रतिपूर्ति करने का अवसर प्रदान करती है।

  1. कृषि में निजी भागीदारी:राष्ट्रीय कृषि नीति द्वारा परिकल्पित,यह अवधारणा कृषि में नई प्रौद्योगिकी, विकासशील बुनियादी ढाँचे आदि को बढ़ावा दे सकेगी।
  2. किसानों की उत्पादकता में सुधारयह बेहतर आय, वैज्ञानिक पद्धति एवं क्रेडिट सुविधाओं तक पहुँच बढ़ाकर कृषि क्षेत्र की उत्पादकता व दक्षता को बढ़ाती है जिससे किसान की आय में वृद्धि के साथ-साथ रोज़गार के नए अवसर एवं खाद्य सुरक्षा प्राप्त होती है।
  3. बेहतर मूल्य की खोज: यह APMC के एकाधिकार को कम कर कृषि को एक संगठित गतिविधि बनाती है जिससे गुणवत्ता व उत्पादन की मात्रा में सुधार होता है।
  4. निर्यात में वृद्धि: यह किसानों को खाद्य प्रसंस्करण उद्योग द्वारा आवश्यक फसलों को उगाने एवं भारतीय किसानों को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं से विशेष रूप से उच्च मूल्य वाले बागवानी उत्पादन से जोड़ने के लिये प्रोत्साहित करती है तथा खाद्यान्न की बर्बादी को काफी कम करती है।
  5. उपभोक्ताओं को लाभ: विपणन दक्षता में वृद्धि, बिचौलियों का उन्मूलन, विनियामक अनुपालन में कमी आदि से उत्पाद के कृत्रिम अभाव को कम करके, खाद्य मूल्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित किया जा सकता है।

अनुबंध कृषि की चुनौतियाँ: अनुबंध कृषि के मामले में आवश्यक उपजों के प्रकार, स्थितियों आदि के संदर्भ में राज्यों के कानून के मध्य एकरूपता या समरूपता का अभाव है। राजस्व की हानि की आशंका के चलते राज्य सुधारों को आगे बढ़ाने के प्रति अनिच्छुक रहे हैं।

  1. क्षेत्रीय असमानता को बढ़ावा: वर्तमान में यह कृषि विकसित राज्यों (पंजाब, तमिलनाडु आदि) में प्रचलित है,जबकि लघु एवं सीमांत किसानों की उच्चतम सघनता वाले राज्य इसका लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।
  2. भू-जोतों का आकार: उच्च लेन-देन एवं विपणन लागत के कारण खरीदार लघु एवं सीमांत किसानों के साथ अनुबंध कृषि को वरीयता नहीं देते हैं। साथ ही इस हेतु उन्हें कोई विशेष प्रोत्साहन नहीं मिलता है। इससे सामाजिक-आर्थिक विकृतियों को बढ़ावा मिलता है एवं बड़े किसानों के लिये वरीयता की स्थिति पैदा होती है।

वर्ष 2015-16 की कृषि संगणना के अनुसार, 86 प्रतिशत भू-जोतों का स्वामित्व लघु एवं सीमांत किसानों के पास था तथा भारत में भू-जोतों का औसत आकार 1.08 हेक्टेयर था।

  1. यह निवेश के लिये कॉर्पोरेट जगत पर किसानों की निर्भरता को बढ़ाता है जिससे वे कमज़ोर होते हैं।
  2. पूर्व निर्धारित मूल्य,किसानों को उपज के लिये बाज़ार में उच्च मूल्यों के लाभ से वंचित कर सकते हैं।
  3. कृषि के लिये पूंजी गहन एवं कम संधारणीय पैटर्न: यह उर्वरकों एवं पीड़कनाशियों के बढ़ते उपयोग को बढ़ावा देता है जो प्राकृतिक संसाधनों, पर्यावरण, मनुष्यों व जानवरों पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं।
  4. एकल कृषि को प्रोत्साहन: यह न केवल मृदा की सेहत को प्रभावित करता है अपितु खाद्य सुरक्षा के लिये भी खतरा उत्पन्न करता है एवं खाद्यान्नों के आयात को बढ़ावा देता है।

आगे की राह:

  • अनुबंध कृषि में सम्मिलित खाद्य संसाधनों को कर में छूट दी जा सकती है जिसके बदले में उन्हें ग्रामीण अवसंरचना,किसान कल्याण आदि में निवेश करने के लिये प्रेरित किया जा सकता है।
  • इसके लिये आयात किये जा रहे कृषि उपकरणों पर लगने वाले शुल्क को हटाया जा सकता है।
  • सरकार को किसानों एवं खरीदारों के मध्य प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देकर और सूचना विषमता को कम करके एक सक्षम वातावरण प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये।
  • सभी राज्यों को किसानों के लिये एक सामान सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु मॉडल अनुबंध कृषि अधिनियम को अपनाना एवं कार्यान्वित करना चाहिये। साथ ही खरीदारों के लिये एक सक्षम पारिस्थितिकी तंत्र की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिये।

किसानों की समस्या[सम्पादन]

बीटी कपास और भारत का कपास उद्योग वर्ष 2002 से 2008 के मध्य बीटी-कपास का उत्पादन करने वाले किसानों पर किये गए एक अध्ययन में निम्नलिखित तथ्य सामने आए थे: बीटी-कपास की उपज में पारंपरिक कपास की तुलना में 24 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसके परिणामस्वरूप मुनाफे में 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई। वर्ष 2006-08 के दौरान बीटी कपास को अपनाने वाले किसान परिवारों ने पारंपरिक खेती करने वाले परिवारों की अपेक्षा उपभोग पर 18 प्रतिशत अधिक खर्च किया, जिससे जीवन स्तर में सुधार के संकेत मिलते हैं। विदित है कि कीटों से होने वाले नुकसान को कम करने से किसानों को फायदा हुआ है। बीटी कपास के उपयोग के साथ कीटनाशकों के प्रयोग में भी कमी आई है। बीटी कपास की शुरुआत ने कपास उत्पादक राज्यों के उत्पादन में काफी वृद्धि की और जल्द ही बीटी कपास ने कपास की खेती के तहत अधिकांश ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया। आँकड़ों के मुताबिक जहाँ एक ओर वर्ष 2001-02 में कपास उत्पादन 14 मिलियन बेल्स (Bales) था, वहीं 2014-15 में यह 180 प्रतिशत बढ़कर 39 मिलियन बेल्स हो गया। साथ ही भारत के कपास आयात में गिरावट आई और निर्यात में बढ़ोतरी हुई। हालाँकि, भारत की उत्पादकता प्रति इकाई क्षेत्र में उपज के मामले में अन्य प्रमुख कपास उत्पादक देशों की तुलना में काफी कम है, जिसका अर्थ है कि भारत में कपास उत्पादन के लिये अन्य देशों की अपेक्षा बहुत बड़े क्षेत्र का उपयोग किया जाता है।

भारत एकमात्र ऐसा देश है जो हाइब्रिड के रूप में कपास का उत्पादन करता है।

देश में बीटी कपास हाइब्रिड के वाणिज्यिक प्रयोग को सरकार द्वारा वर्ष 2002 में मंज़ूरी दी गई थी। हाइब्रिड्स को उत्पादन के लिये उर्वरक तथा पानी की काफी अधिक आवश्यकता होती है।

भारत के अतिरिक्त कपास का उत्पादन करने वाले अन्य सभी देश कपास के हाइब्रिड रूप का उत्पादन नहीं करते, बल्कि वे उन किस्मों का प्रयोग करते हैं जिनके लिये बीज स्व-निषेचन (Self-Fertilization) द्वारा उत्पादित किये जाते हैं।

हाइब्रिड कपास नीति का भारतीय किसानों पर प्रभाव चूँकि हाइब्रिड बीजों के माध्यम से उत्पादन करने के लिये किसानों को हर बार नया बीज खरीदना पड़ता है, इसलिये यह किसानों को आर्थिक रूप से काफी प्रभावित करता है। हाइब्रिड बीजों का उत्पादन केवल कंपनियों द्वारा ही किया जाता है, जिसके कारण मूल्य निर्धारित की शक्ति भी उन्ही के पास होती है, परिणामस्वरूप कीमतों पर नियंत्रण करना मुश्किल हो जाता है।

क्या भारतीय किसानों के लिये लाभकारी है BT कपास?
  1. इस विषय पर विभिन्न विश्लेषकों का अलग-अलग मत है। निश्चित रूप से बड़े किसानों और कॉरपोरेट क्षेत्र को बीटी-कपास की शुरुआत से लाभ हुआ है, किंतु देश के मध्यम और छोटे किसानों को बीटी-कपास के कारण नुकसान का सामना करना पड़ता है।
  2. राज्यसभा की 301वीं समिति की रिपोर्ट के अनुसार, कीटनाशकों के उपयोग से मूल्य और मात्रा दोनों में काफी वृद्धि हुई है।
  3. किसानों को बीटी कपास के बीज के लिये पारंपरिक बीजों की कीमत का लगभग तीन गुना भुगतान करने के लिये मजबूर किया गया, जिससे उनकी ऋणग्रस्तता और उपज पर निर्भरता काफी अधिक बढ़ गई।
  4. ऋणग्रस्तता में वृद्धि से किसानों की आत्महत्या दर में वृद्धि हुई।
  • पिछले कार्यकाल में मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, ई-नैम, नीम कोटेड यूरिया जैसी तमाम हितकारी योजनाओं की शुरुआत की थी.

पुरानी कृषि नीतियों में क्या रही है खामी? पूर्व की कृषि नीतियां उत्पादन और उत्पादकता केंद्रित हुआ करती थीं. उसी का परिणाम था कि भारत कृषि उत्पादों का बहुत बड़ा केंद्र बनकर तो उभरा, पर बदलते आर्थिक परिवेश में हमारे नीति निर्माताओं ने कृषि उत्पादों के बाजारीकरण जैसे प्रमुख पहलू पर ध्यान नहीं दिया. पिछले 10 वर्षों में कृषि नीति को बाजार केंद्रित न कर पाने की वजह से ही किसान आय और अपने उत्पादों के लिए बाजार तलाशने को तरसता रहा है।

  • प्रधानमंत्री कृषि सम्मान के जरिये किसानों को ₹6000 का भुगतान तो किया गया पर, किसानों की मूल समस्या का पूरा हल नहीं निकाला।
  • आज भी गांव के किसान अपने उत्पादों के लिए बाजार की कमी को झेल रहे हैं. इसके चलते बिचौलिए कम दामों पर उनका अनाज खरीद अधिक लाभ कमा रहे हैं. सरकार के ही अधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2002-03 से 2017-18 तक भारत में 134 करोड़ टन गेहूं पैदा हुआ. जबकि सरकारी खरीद महज 35.88 करोड़ टन की ही हुई

उठाने होंगे कई बड़े कदम

  • वर्तमान समय में सरकार को चरणबद्ध तरीके से कृषि संकट से निपटना होगा. इसके लिए सिंचाई व्यवस्था में सुधार करने के साथ शुरुआत करनी होगी।
  • आर्थिक सर्वेक्षण- 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 14.2 करोड़ हेक्टेयर कृषि योग्य जमीन पर खेती होती है. लेकिन, ज्यादातर हिस्सा बारिश के पानी पर निर्भर है. आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, देश का 52 फीसदी हिस्सा अनियमित सिंचाई और मानसून पर निर्भर है।
  • बाढ़ के समय अतिरिक्त जल को नहरों के माध्यम से कम पानी वाले क्षेत्रों में पहुंचाना होगा।साथ ही सरकार को बढ़ते जल संकट के विषय में भी तेजी से काम करना होगा।
  • ऑर्गेनाइजेश फॉर इकनामिक कॉपरेशन एंड डेलवमेंट (OECD-ICAIR) की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2000 से साल 2017 के बीच किसानों को कृषि उत्पादों की कम कीमत मिलने से किसानों को करीब 45 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।
  • किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए गठित स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक, हर पांच किलोमीटर पर एक मंडी होनी चाहिए. लेकिन, वर्तमान में यह दूर की कौड़ी है।
  • कृषि क्षेत्र में आई निराशा की वजह से मजदूर किसान गांव से निकलकर शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं. भारत की 2011 की जनगणना के मुताबिक, साल 2001 से 2011 के बीच 86 लाख किसान कम हो गए थे. सरकार को गांव में ही रोजगार के संसाधन उपलब्ध कराने होंगे ताकि बड़े स्तर पर हो रहे ग्रामीण पलायन को रोक जा सके।