सिविल सेवा मुख्य परीक्षा विषयवार अध्ययन/जनजातियाँ

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संवैधानिक प्रावधान[सम्पादन]

छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के लिये इन राज्यों में जनजातीय लोगों के अधिकारों की रक्षा का प्रावधान करती है। अनुच्छेद 244(2)और अनुच्छेद 275(1)के तहत यह विशेष प्रावधान किया गया है। 1949 में संविधान सभा द्वारा पारित छठी अनुसूची को पूर्वोत्तर के जनजातीय क्षेत्रों में सीमित स्वायत्तता प्रदान करने के लिये तैयार किया गया था। यह संविधान सभा द्वारा गठित बारदोलोई समिति की रिपोर्टों पर आधारित थी। समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रशासन की एक ऐसी प्रणाली की आवश्यकता थी जो जनजातीय क्षेत्रों को विकसित करने की अनुमति दे। रिपोर्ट में मैदानी इलाकों के लोगों द्वारा इन जनजातीय क्षेत्रों के शोषण से सुरक्षा एवं इनके विशिष्ट सामाजिक रीति-रिवाजों को संरक्षित करने के लिये भी कहा गया है। यह एक स्वायत्त क्षेत्रीय परिषद और स्वायत्त ज़िला परिषदों (ADCs) के माध्यम से आदिवासियों को विधायी एवं कार्यकारी शक्तियों का प्रयोग करने की स्वतंत्रता देता है। स्वायत्त ज़िला परिषद राज्य के अंदर ऐसे ज़िले हैं जिन्हें केंद्र सरकार ने राज्य विधानमंडल के अंतर्गत स्वायत्तता अलग-अलग रूप में प्रदान किया गया है।

छठी अनुसूची में निहित प्रशासन की विभिन्न विशेषताएँ इस प्रकार हैं:-

राज्यपाल को स्वायत्त ज़िलों को गठित करने और पुनर्गठित करने का अधिकार है। अतः राज्यपाल इनके क्षेत्रों को बढ़ा या घटा सकता है या इनका नाम परिवर्तित कर सकता है अथवा सीमाएँ निर्धारित कर सकता है इत्यादि। यदि एक स्वायत्त ज़िले में अलग-अलग जनजातियाँ हैं, तो राज्यपाल ज़िले को कई स्वायत्त क्षेत्रों में विभाजित कर सकता है। संविधान की छठी अनुसूची (भाग 10 और अनुच्छेद 244) में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों के लिये विशेष प्रावधानों का वर्णन किया गया है। प्रत्येक स्वशासी ज़िले के लिये एक 30 सदस्यीय ज़िला परिषद होगी जिसके 4 सदस्य राज्यपाल द्वारा नामित किये जाएंगे जबकि 26 सदस्यों का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होगा। निर्वाचित सदस्य पाँच साल के कार्यकाल के लिये पद धारण करते हैं (यदि परिषद को इससे पूर्व भंग नहीं किया जाता है) और मनोनीत सदस्य राज्यपाल के इच्छानुसार समय तक पद पर बने रहते हैं। प्रत्येक स्वायत्त क्षेत्र में भी एक अलग क्षेत्रीय परिषद होती है। ज़िला और क्षेत्रीय परिषदें अपने अधिकार क्षेत्र के तहत क्षेत्रों का प्रशासन करती हैं। वे भूमि,वन, नहर के जल, स्थानांतरित कृषि, ग्राम प्रशासन, संपत्ति का उत्तराधिकार, विवाह एवं तलाक, सामाजिक रीति-रिवाजों जैसे कुछ निर्दिष्ट मामलों पर कानून बना सकती हैं लेकिन ऐसे सभी कानूनों के लिये राज्यपाल की सहमति आवश्यक है। अपने क्षेत्रीय न्यायालयों के अंतर्गत ज़िला और क्षेत्रीय परिषदें जनजातियों के मध्य मुकदमों एवं मामलों की सुनवाई के लिये ग्राम परिषदों या अदालतों का गठन कर सकती हैं। वे उनकी अपील सुनते हैं। इन मुकदमों और मामलों पर उच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र राज्यपाल द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है। ज़िला परिषद ज़िले में प्राथमिक स्कूलों, औषधालयों, बाज़ारों, मत्स्य पालन क्षेत्रों, सड़कों आदि की स्थापना, निर्माण या प्रबंधन कर सकती है। यह गैर आदिवासियों द्वारा ऋण एवं व्यापार के नियंत्रण के लिये नियम भी बना सकता है लेकिन ऐसे नियमों के लिये राज्यपाल की सहमति की आवश्यकता होती है। ज़िला एवं क्षेत्रीय परिषदों के पास भू राजस्व का आकलन एवं संग्रहण करने एवं कुछ निर्दिष्ट कर लगाने का अधिकार है। संसद या राज्य विधायिका के अधिनियम स्वायत्त ज़िलों और स्वायत्त क्षेत्रों पर लागू नहीं होते हैं या निर्दिष्ट संशोधनों और अपवादों के साथ लागू होते हैं। राज्यपाल स्वायत्त ज़िलों या क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित किसी भी मामले की जाँच और रिपोर्ट करने के लिये एक आयोग नियुक्त कर सकते हैं। वह आयोग की सिफारिश पर ज़िला या क्षेत्रीय परिषद को भंग कर सकता है।

ज़िला परिषद अपने अधीन क्षेत्रों के लिये भूमि, वन, नहर, कृषि, ग्राम प्रशासन, विवाह, तलाक और सामाजिक रुढ़ियों से संबंधित विधि बना सकती है। इसके साथ ही ज़िला परिषदें अपने अधीन क्षेत्रों में जनजातियों के आपसी मामलों के निपटारे हेतु ग्राम परिषद या न्यायालयों का गठन कर सकती हैं।

निर्वाचित सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष का होगा। सामान्यतः संसद या राज्य विधानमंडल के अधिनियम इन स्वशासी ज़िलों पर लागू नहीं होते हैं। अगर ये अधिनियम लागू होते हैं तो इसमें विशेष अपवाद और उन क्षेत्रों के लिये प्रथमिकताएँ जुड़ी होती हैं। इसके अतिरिक्त ज़िला परिषदों को भू-राजस्व का आकलन व संग्रहण करने का अधिकार है।

जबकि PESA पाँचवीं अनुसूची के तहत वर्णित क्षेत्रों में ज़मीनी स्तर की संस्था (ग्राम सभा) के जनादेश में सुधार से संबंधित है। राज्यों में PESA के कार्यान्वयन के लिये पंचायती राज मंत्रालय नोडल मंत्रालय है। PESA ने इसके उद्देश्य को साकार करने हेतु ग्राम सभाओं को सशक्त बनाया है ,जिसमें 18 वर्ष से ऊपर के प्रत्येक व्यक्ति (मतदाता सूची में शामिल) को शामिल किया गया है। राज्य विधानमंडल को भी भारतीय संविधान के भाग IX में निहित त्रि-स्तरीय शासन प्रणाली के सिद्धांत तथा प्रथागत कानून, सामाजिक एवं धार्मिक प्रथाओं तथा सामुदायिक संसाधनों के पारंपरिक प्रबंधन की प्रथाओं के अनुरूप होना था और यह सुनिश्चित करना था कि ग्राम सभा का जनादेश सशक्त हो। पंचायती राज संस्थाओं को दिये गए कार्यकारी प्रकार्यों में सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिये योजनाओं, कार्यक्रमों और परियोजनाओं के अनुमोदन तथा पंचायत द्वारा धनराशि के उपयोग हेतु प्रमाण-पत्र जारी करना शामिल हैं। वनोपज, मादक द्रव्यों की बिक्री, ग्रामीण हाट-बाज़ारों के संगठन और खान क्षेत्रों के विनियमन आदि मामले ग्राम सभाओं और पंचायतों के अंतर्गत आते हैं।

  • प्रधानमंत्री कार्यालय ने वर्ष 2013 में प्रो. वर्जिनियस शाशा (Prof. Virginius Xaxa) की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति (HLC) का गठन किया। समिति को जनजातीय समुदायों की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और स्वास्थ्य स्थिति की जाँच करने और उनमें सुधार के लिये उपयुक्त हस्तक्षेपकारी उपायों की सिफारिश करने का कार्यभार सौंपा गया। समिति ने मई 2014 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
अनुशंसाएँ
  1. छठी अनुसूची के प्रारूप का विस्तार पाँचवीं अनुसूची क्षेत्रों में स्वायत्त परिषदों के रूप में करने की तत्काल आवश्यकता है, जैसा प्रावधान पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 में किया गया है।
सार्वजनिक नीति और अभ्यास को नियामगिरि के अनुभव और सलवा जुडूम के प्रतिकूल सबक के आधार पर तैयार किया जाना चाहिये।
  1. राज्य के एक उपकरण के रूप में आपराधिक कानून का उपयोग असहमति को दबाने के लिये किया जा रहा है।

आदिवासियों और उनके प्रतिरोध के समर्थकों के विरुद्ध दर्ज मामलों की जाँच के लिये न्यायिक आयोग की नियुक्ति करने की आवश्यकता है। केवल ऐसा करके ही उन चिंताओं को संबोधित किया जा सकता है, जो राज्य द्वारा आपराधिक कानून के दुरुपयोग के बारे में बढ़ी हैं।

  1. विमुक्त जनजातियाँ माँग करती रही हैं कि उनके जीवन से कलंक और पूर्वाग्रह को दूर करने के लिये कदम उठाए जाएँ। वर्ष 1871 के आपराधिक जनजाति अधिनियम को वर्ष 1952 में निरस्त तो कर दिया गया, लेकिन इसके स्थान पर आदतन अपराधी अधिनियम (हैबिटेड ऑफेंडर्स एक्ट) लागू कर दिया गया। इस अधिनियम के अंतर्गत जनजातियों को कलंकित किया जाना जारी है। आदतन अपराधी अधिनियम को निरस्त किया जाना चाहिये और विमुक्त व खानाबदोश जनजातियों का पुनर्वास करना चाहिये।
  2. भिक्षुक विरोधी कानून करतब और कलाबाजी जैसी उनकी प्रतिभाओं को एक दंडनीय आचरण में बदल देता है। महिलाओं का पूरा समुदाय विकल्पहीनता की स्थिति में वेश्यावृत्ति की ओर धकेला जाता है। ऐसे कानूनों को निरस्त किया जाना चाहिये।
  3. बंधुआ मज़दूरी और जनजातीय क्षेत्रों की महिलाओं की बड़े पैमाने पर मानव तस्करी पर रोक के लिये ठोस प्रयास की आवश्यकता है।
उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में लगभग 12 प्रतिशत, दक्षिणी क्षेत्र में लगभग 5 प्रतिशत और उत्तरी राज्यों में लगभग 3 प्रतिशत जनजातीय आबादी निवास करती है।

राजनीतिक और प्रशासनिक इतिहास

  1. वर्ष 1833 के रेगुलेशन XIII ने गैर-विनियमित (नॉन-रेगुलेशन) प्रांतों का निर्माण किया,जिन्हें नागरिक (सिविल) एवं आपराधिक न्याय, भू-राजस्व के संग्रह और एवं अन्य विषयों में विशेष नियमों द्वारा शासित किया जाना था। इसने सिंहभूमि क्षेत्र में प्रशासन की एक नई प्रणाली की शुरुआत की।
  2. पूर्वोत्तर क्षेत्र में अंग्रेजों ने वर्ष 1873 में आंतरिक रेखा विनियमन (Inner LIne Regulation) को उस बिंदु के रूप में लागू किया जिसके पार उपनिवेश के लिये प्रचलित सामान्य कानून लागू नहीं होते थे और इस क्षेत्र के बाहर रहने वाले शासितों (Subjects) का यहाँ प्रवेश करना सख्त वर्जित था।
  3. भारत सरकार अधिनियम,1935 के अनुसार, गवर्नर जनजातीय क्षेत्रों में प्रत्यक्ष रूप से या अपने अभिकर्त्ताओं के माध्यम से नीति निर्धारित कर सकता था।
  4. स्वतंत्रता के उपरांत, वर्ष 1950 में संविधान (अनुच्छेद 342) के अंगीकरण के बाद ब्रिटिश शासन के दौरान जनजातियों के रूप में चिह्नित व दर्ज समुदायों को अनुसूचित जनजाति के रूप में पुन: वर्गीकृत किया गया।

जिन क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियाँ संख्यात्मक रूप से प्रभावी हैं, उनके लिये संविधान में पाँचवीं और छठी अनुसूचियों के रूप में दो अलग-अलग प्रशासनिक व्यवस्थाओं का प्रावधान किया गया है। संविधान के अंतर्गत ‘पाँचवीं अनुसूची के क्षेत्र’ (Fifth Schedule Areas) ऐसे क्षेत्र हैं, जिन्हें राष्ट्रपति आदेश द्वारा अनुसूचित क्षेत्र घोषित करे। वर्तमान में 10 राज्यों - आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान और तेलंगाना में पाँचवीं अनुसूची के तहत क्षेत्र विद्यमान हैं। पाँचवीं अनुसूची के प्रावधानों को ‘पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996’ के रूप में और विधिक व प्रशासनिक सुदृढ़ीकरण प्रदान किया गया, ताकि लोकतंत्र और आगे बढ़े। छठी अनुसूची के क्षेत्र (Sixth Schedule areas) कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जो पूर्ववर्ती असम और अन्य जनजातीय बहुल क्षेत्रों में भारत सरकार अधिनियम, 1935 से पहले तक बाहर रखे गए थे तथा बाद में अलग राज्य बने। इन क्षेत्रों (छठी अनुसूची) को संविधान के भाग XXI के तहत भी विशेष प्रावधान दिए गए हैं। क्षेत्र प्रतिबंध (संशोधन) निरसन अधिनियम, 1976 ने अनुसूचित जनजातियों की पहचान में क्षेत्र प्रतिबंध की समाप्ति की और सूची को राज्यों के भीतर प्रखंडों और ज़िलों के बजाय पूरे राज्य पर लागू किया। ऐसे क्षेत्र जहाँ अनुसूचित जनजातियाँ संख्यात्मक रूप से अल्पसंख्यक हैं, वे देश के सामान्य प्रशासनिक ढाँचे का हिस्सा हैं। शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण के माध्यम से देश भर में अनुसूचित जनजातियों को कुछ अधिकार प्रदान किए गए हैं। पाँचवीं और छठी अनुसूचियों के दायरे से बाहर जनजातीय स्वायत्त क्षेत्रों के निर्माण के लिये संसद और राज्य विधानसभाओं को शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। उदाहरण के लिये- लेह स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद, कारगिल स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद, दार्जिलिंग गोरखा हिल परिषद।

अनुच्छेद 366 (25) के अनुसार “अनुसूचित जनजातियों का अर्थ ऐसी जनजातियों या जनजातीय समुदायों के अंदर कुछ हिस्सों या समूहों से है, जिन्हें इस संविधान के उद्देश्यों के लिये अनुच्छेद 342 के तहत अनुसूचित जनजाति माना जाता है।”

अनुच्छेद 340 के तहत भारत के राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त पहला पिछड़ा वर्ग आयोग (काका कालेलकर आयोग, 1953) ने अनुसूचित जनजातियों को इस रूप में परिभाषित किया है: “वे एक अलग अनन्य अस्तित्व रखते हैं और लोगों की मुख्य धारा में पूरी तरह से आत्मसात् नहीं किए गए हैं। वे किसी भी धर्म के हो सकते हैं।” एलविन कमेटी (1959) का गठन सभी जनजातीय विकास कार्यक्रमों के लिये बुनियादी प्रशासनिक इकाई ‘बहु-उद्देश्यीय विकास खंड’ (मल्टी-पर्पज डेवलपमेंट ब्लॉक) के कार्यकरण की जाँच के लिये किया गया था। यू.एन. ढेबर आयोग का गठन वर्ष 1960 में जनजातीय क्षेत्रों में भूमि अलगाव के मुद्दे सहित जनजातीय समूहों की समग्र स्थिति को संबोधित करने के लिये किया गया था।

  1. लोकुर समिति (1965) का गठन अनुसूचित जनजातियों को परिभाषित करने के मानदंड पर विचार करने के लिये किया गया था। समिति ने उनकी पहचान के लिये पाँच मानदंडों - आदिम लक्षण, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव, बड़े पैमाने पर समुदाय के साथ संपर्क में संकोच और पिछड़ापन - की सिफारिश की।

शीलू ओ समिति, 1966 ने एल्विन समिति की ही तरह जनजातीय विकास और कल्याण के मुद्दे को संबोधित किया। 1970 के दशक में गठित कई समितियों की सिफारिशों पर सरकार का जनजातीय उप-योजना दृष्टिकोण सामने आया।

  1. दिलीप सिंह भूरिया समिति(1991) की रिपोर्ट के आधार पर, संसद ने संविधान के भाग IX (यानी पंचायत) को कुछ संशोधनों और अपवादों के साथ पाँचवी अनुसूची के क्षेत्रों में विस्तारित करने के लिये पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) को अधिनियमित किया। भूरिया आयोग (2002-2004) ने पाँचवीं अनुसूची से लेकर जनजातीय भूमि व वन, स्वास्थ्य व शिक्षा, पंचायतों के कामकाज और जनजातीय महिलाओं की स्थिति जैसे कई मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया।
  2. बंदोपाध्याय समिति (2006) ने वामपंथी चरमपंथ प्रभावित क्षेत्रों में विकास और शासन पर विचार किया।
  3. मुंजेकर समिति (2005) ने प्रशासन और शासन के मुद्दों का परीक्षण किया। जिन मुद्दों पर उपर्युक्त समितियों ने विचार किया, उन्हें मुख्यतः दो श्रेणियों में रखा जा सकता है: विकास और संरक्षण, फिर भी इन दोनों ही विषयों में जनजातीय समुदायों के लिये प्राप्त परिणाम मिश्रित ही रहे हैं।

अध्ययन और विश्लेषण पाँच महत्त्वपूर्ण मुद्दों: (1) आजीविका व रोज़गार, (2) शिक्षा, (3) स्वास्थ्य, (4) अनैच्छिक विस्थापन और प्रवासन, और (5) विधिक एवं संवैधानिक मामलों का अध्ययन शाशा समिति द्वारा किया गया है। इन पाँच मुद्दों में से, पहले तीन मुद्दे ऐसे विषयों से संबंधित हैं जो जनजातियों के लिये उत्तर-औपनिवेशिक राज्य के विकास एजेंडे के मूल में रहे हैं: आजीविका व रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य।

विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह (Particularly Vulnerable Tribal Groups- PVTGs) PVTGs (पूर्व में आदिम जनजातीय समूह/PTG के रूप में वर्गीकृत) भारत सरकार द्वारा किया जाने वाला वर्गीकरण है जो विशेष रूप से निम्न विकास सूचकांकों वाले कुछ समुदायों की स्थितियों में सुधार को सक्षम करने के उद्देश्य से सृजित किया गया है। इसका सृजन ढेबर आयोग की रिपोर्ट (1960) के आधार पर किया गया था, जिसमें कहा गया था कि अनुसूचित जनजातियों के विकास दर में असमानता थी। ऐसे समूह की प्रमुख विशेषताओं में एक आदिम-कृषि प्रणाली का प्रचलन, शिकार और खाद्य संग्रहण का अभ्यास, शून्य या नकारात्मक जनसंख्या वृद्धि, अन्य जनजातीय समूहों की तुलना में साक्षरता का अत्यंत निम्न स्तर आदि शामिल है। 1000 से कम व्यक्तियों की आबादी वाले PVTGs हैं: बिरजिया (बिहार), सेंटीनलीज़, ग्रेट अंडमानी, ओंगे, बिरहोर (मध्य प्रदेश), असुर (बिहार), मनकीडिया (ओडिशा), जरावा, चोलानैक्कन (केरल), शोम्पेन, सावर (बिहार), राजी (उत्तराखंड), सौरिया पहाड़िया (बिहार), बिरहोर (ओडिशा), कोरवा (बिहार), टोडा (तमिलनाडु), कोटा (तमिलनाडु), राजी (उत्तर प्रदेश)।

सलवा जुडूम (जिसे शांति मार्च अथवा शुद्धिकरण शिकार के रूप में अनुवादित किया जाता है) बस्तर क्षेत्र में कार्यान्वित एक सरकारी पहल थी। इसका गठन वर्ष 2005 में किया गया था, ताकि क्षेत्र में नक्सलियों की उपस्थिति का मुकाबला किया जा सके। इसका मुख्य आधार SPO (विशेष पुलिस अधिकारी) थे, जो स्थानीय जनजातीय युवा थे (16 वर्ष के किशोरों तक को इसमें शामिल किया गया), उन्हें भर्ती किया गया, उन्हें भुगतान किया जाता था, उन्हें हथियार दिए गए और नक्सलियों से लड़ने का काम सौंपा गया। इसके परिणामस्वरूप एक नागरिक संघर्ष का जन्म हुआ जिसने पूरे ग्राम के विस्थापन, बलात्कारों, शक्ति के दुरुपयोग, हत्याओं और घरों को जलाने जैसे दृश्य उत्पन्न किए।
नियामगिरी की पहाड़ियों में विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह ‘डोंगरिया खोंड’ का निवास है। डोंगरिया खोंड ने क्षेत्र में वेदांता एल्युमिनियम लिमिटेड द्वारा बॉक्साइट के खनन का पुरजोर विरोध किया। 18 अप्रैल, 2013 को सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि प्रस्तावित खनन से प्रभावित होने वाले अधिकारों पर ग्राम सभा का परामर्श व सहमति आवश्यक है।

इस प्रस्तावित खनन को क्षेत्र की सभी ग्राम सभाओं द्वारा स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया गया।