सिविल सेवा मुख्य परीक्षा विषयवार अध्ययन/भारतीय दर्शन का विकास

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भारतीय दार्शनिकों ने संसार को माया समझा तथा आत्मा और परमात्मा के बीच के संबंधों की गंभीर विवेचना की। वास्तव में इस विषय पर जितना गहन चिंतन भारतीय दार्शनिकों ने किया है , उतना किसी अन्य देश के दार्शनिकों ने नहीं। प्रख्तात जर्मन दार्शनिक शोपेनहावर ने अपनी दार्शनिक विचारधारा में वेदों और उपनिषदों को भी स्थान दिया है। वह कहा करते थे कि उपनिषदों ने उन्हें इस जन्म में दिलासा दी है और मृत्यु के बाद भी देती रहेगी|प्राचीन भारत दर्शन और अध्यात्म के क्षेत्र में अपने योगदान के लिये प्रसिद्ध माना जाता है, परन्तु भारत में जगत के विषय में आध्यात्मिकता के साथ भौतिकवादी विचारधारा भी विकसित हुई है। मोक्ष भारतीय दर्शन का मुख्य विषय रहा है,जिसका अर्थ है जन्म और मृत्यु के चक्र से उद्धार।मोक्ष का सबसे पहले उपदेश महात्मा बुद्ध ने दिया, हालाँकि बाद में अन्य ब्राह्मणपंथी दार्शनिकों ने भी इसे आगे बढ़ाया।

भारत में उदित छः दार्शनिक पद्धतियों के बीच भौतिकवादी दर्शन के तत्त्व सांख्य में मिलते हैं। भौतिकवादी दर्शन को ठोस बनाने का श्रेय चार्वाकों को है। सांख्य दर्शन के मूल प्रवर्तक कपिल मुनि के अनुसार मानव का जीवन प्रकृति की शक्ति द्वारा रूपायित होता है, न कि दैवीय शक्ति द्वारा।

  • सांख्य की व्युत्पत्ति संख्या शब्द से हुई है। यह सर्वाधिक प्राचीन दर्शन माना जाता है।
  • इसके अनुसार जगत की उत्पत्ति ईश्वर से नहीं अपितु प्रकृति से होती है।सत्व,रज & तम प्रकृति के तीन निर्णायक घटक जिनके गुणों में परिवर्तन से वस्तुओं में परिवर्तन होता है।
  • चौथी सदी में प्रकृति के साथ पुरुष नामक उपादान जोड़े गए और इस नवीनतम मत के अनुसार प्रकृति और पुरुष दोनों के मेल से जगत की सृष्टि होती है।
  • यह अपने आरंभ काल में भौतिकवादी था फिर आध्यात्मिकता की ओर मुड़ गया।
  • इसके अनुसार मोक्ष यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति से हो सकता है अर्थात् आत्मज्ञान से और मोक्ष प्राप्त होने पर मानव दुख से हमेशा के लिए छुटकारा पा लेता है यह यथार्थ ज्ञान प्रत्यक्ष अनुमान और शब्द से हो सकता है।

योग दर्शनके अनुसार मोक्ष ध्यान और शारीरिक साधना से अर्थात् दैहिक व्यायाम और प्राणायाम (श्वास के व्यायाम) से मिलता है।ज्ञानेंद्रियों और कर्म इंद्रियों का निग्रह योग मार्ग का मूल आधार है। ऐसा माना जाता है कि इससे चित्त (मन) में एकाग्रता आती है और सांसारिक मोह से दूर हो जाता है। इसका मूल आधार ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियों की एकाग्रता है।

योग साधना में सांसारिक समस्याओं से भागने की प्रवृत्ति भी दिखाई देती है।

न्याय दर्शन-न्याय या विश्लेषण पद्धति का विकास तर्कशास्त्र के रूप में हुआ। इसके अनुसार मोक्ष ज्ञान की प्राप्ति से हो सकता है। तार्कशास्त्र के प्रयोग से किसी प्रतिज्ञा या कथन की सत्यता की जांच अनुमान शब्द और उपमान द्वारा किया जाने लगा।

  1. उदाहरण-पर्वत अग्नि युक्त है।
  2. क्योंकि वहां धुआँ है।
  3. जहां-जहां धुंआँ रहता है वहां वहां आग रहती है।

वैशेषिक दर्शन[सम्पादन]

  • यह द्रव्य अर्थात भौतिक तत्वों के विवेचन का महत्व देते हुए सामान्य और विशेष के बीच अंतर करता है।पृथ्वी जल तेज वायु और आकाश के मेल से नई वस्तुएं बनती हैं।
  • इसने परमाणुवाद की स्थापना की जिसके अनुसार भौतिक वस्तुएँ परमाणुओं के संयोजन से बनी हैं।
  • इसने भारत में भौतिक शास्त्र का आरंभ किया परंतु ईश्वरवादी और अध्यात्मवाद में फंसने के कारण स्वर्ग और मोक्ष इसमें भी समाहित हो गए।

मीमांसा दर्शन[सम्पादन]

  • तर्क करने और अर्थ लगाने की कला मीमांसा का मूल अर्थ है।परंतु इसमें तर्क का प्रयोग विविध कर्मों के अनुष्ठानों का औचित्य सिद्ध करने के लिए किया गया।
  • इसके अनुसार मोक्ष इन्हीं वेद-विहित कर्मों के अनुष्ठान से प्राप्त होता है।वेद में कही गई बातें सदा सत्य होती है।
  • स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति इस दर्शन का मुख्य लक्ष्य है।
  • मनुष्य तब तक स्वर्ग सुख पाता रहता है जब तक उसका संचित पुण्य शेष रहता है। पुण्य समाप्त होते ही वह धरती पर आ जाता है।
  • इसके अनुसार मोक्ष पाने के लिए य करना चाहिए तथा पुरोहितों को दान-दक्षिणा का लाभ मिलता था साथ ही विविध वर्गों के बीच सामाजिक स्वरभेद को मान्यता मिलती थी।

वेदांत दर्शन[सम्पादन]

बादरायण का ब्रह्मसूत्र इस दर्शन का मूल ग्रंथ है।9वीं सदी में शंकर ने तथा 12 वीं सदी में रामानुज ने इस ग्रंथ पर भाष्य लिखा। द्वैतवाद के प्रवर्तक रामानुज के अनुसार भक्ति ही मोक्ष का सर्वोत्तम साधन है। इनके अनुसार ब्रह्म सगुण है। ध्यातव्य है कि अद्वैतवाद के प्रवर्तक शंकराचार्य बह्म को निर्गुण मानते हैं और मोक्ष का साधन ज्ञान मार्ग को बताया है। शंकर ब्रह्म को निर्गुण बताते हैं किंतु रामानुज सगुण।शंकर ज्ञान को मोक्ष का मुख्य कारण मानते हैं किंतु रामानुज भक्ति को मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताते हैं।

  • इसका मूल आरंभिक उपनिषदों में पाया जाता है,जिसके अनुसार ब्रह्म ही सत्य है।अन्य हर वस्तु माया है। आत्मा और ब्रह्म में अभेद है।अत:आत्मज्ञान के पश्चात हीं ब्रह्म और मोक्ष की प्राप्ति संभव है।
  • ब्रह्म और आत्मा दोनों शाश्वत और अविनाशी है ऐसा मत स्थायित्व और अपरिवर्तनीयता की भावना जगाता है।
  • आध्यात्मिक दृष्टि से जो सत्य है वह उस व्यक्ति की अपनी सामाजिक और भौतिक परिस्थिति में भी सत्य हो सकता है।
  • कर्मवाद भी वेदांत के साथ जुड़ गया।इसका अर्थ है कि मनुष्य को पूर्व जन्म में किए गए कर्मों का परिणाम भुगतना पड़ता है।पुनर्जन्म वेदांत के अलावे कई हिंदू दर्शनों का महत्वपूर्ण उपादान बन गया।

शंकराचार्य और रामानुजन वेदांत से संबंधित हैं। यह दर्शन उपनिषदों में वर्णित जीवन-दर्शन की पुष्टि करता है। वेदांत दर्शन का मुख्य और प्राचीन ग्रन्थ बादरायण द्वारा रचित ब्रह्मसूत्र है। वेदांत दर्शन के अनुसार, ब्रह्मा जीवन की वास्तविकता है और बाकी सब कुछ असत्य या माया है।

शंकराचार्य का अद्वैतवाद सिद्धांत, 9वीं शताब्दी ईस्वी में विकसित वेदांत दर्शन का भाग है।इसके अनुसार, ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है और यह जगत मिथ्या (ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या) है। इसमें कहा गया है कि व्यक्तिगत आत्मा और ब्रह्मा दोनों एक ही हैं, अलग नहीं है। लेकिन इसका अज्ञान ही बंधन का कारण है। बंधन के मूल कारण को अविद्या कहा गया है। इस अविद्या का निराकरण ब्रह्मज्ञान से संभव है। केवल ब्रह्मा के सत्य और पारमार्थिक ज्ञान से ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। इसलिये शंकराचार्य ज्ञान मार्ग को मोक्ष प्राप्ति हेतु स्वीकार करते है, न कि भक्ति मार्ग को।

रामानुजन द्वारा प्रतिपादित विशिष्टाद्वैत का सिद्धांत-विशिष्टाद्वैत विशिष्ट प्रकार का अद्वैतवाद है, जहाँ केवल ब्रह्मा ही सत्य हैं, लेकिन आत्मा की बहुलता भी इसमें स्वीकार की गई है अर्थात् ब्रह्म एक होने पर भी अनेक हैं। यह अद्वैत और द्वैत दर्शन के बीच का मार्ग है, जहाँ ब्रह्मा और व्यक्तिगत आत्मा अग्नि एवं चिंगारी की तरह अविभाज्य हैं। इसमें ब्रह्मा को कुछ विशेषताओं का अधिकारी माना गया है जबकि शंकराचार्य के अद्वैतवाद में ब्रह्मा को सभी गुणों और विशेषताओं से रहित माना गया है। वह श्रद्धा, आस्था और भक्ति के माध्यम से मोक्ष प्राप्ति को स्वीकार करता है।


लोकायत दर्शनकी नींव बृहस्पति द्वारा रखी गयी।

  • भौतिकवादी दर्शन के प्रमुख प्रवर्तक चार्वाक हुए इसे लोकायत भी कहा गया जिसका अर्थ है सामान्य लोगों से प्राप्त विचार।इसमें लोक(दुनिया)को महत्व दिया गया तथा परलोक में अविश्वास व्यक्त किया गया है।
  • वह मोक्ष की कामना का विरोध विरोधी था तथा किसी देवी या अलौकिक शक्ति का अस्तित्व नहीं मानता था वह उन्हीं वस्तुओं की सत्ता/यथार्थता स्वीकार करता था जिन्हें मानव की बुद्धि और इंद्रियों द्वारा अनुभव किया जा सके।

जीवन के प्रति भौतिकवादी दृष्टि[सम्पादन]

  • सांख्य दर्शन के मूल प्रवर्तक कपिल के अनुसार मानव का जीवन प्रकृति की शक्ति द्वारा रूपायित होता है,न कि किसी दैवी शक्ति के द्वारा।

5वीं आते-आते भौतिकवादी दर्शन को प्रत्ययवादी दार्शनिकों ने दबा दिया।