सिविल सेवा मुख्य परीक्षा विषयवार अध्ययन/भारतीय स्वतंत्रता संग्राम 1920 से 1930 तक

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असहयोग आंदोलन(1920-22)[सम्पादन]

सितंबर 1920 में कलकत्ता में संपन्न भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में महात्मा गांधी ने असहयोग के प्रसताव को प्रस्तावित किया था जिसका सी.आर.दास ने विरोध किया था। दिसंबर 1920 में नागपुर में संपन्न कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में असहयोग प्रस्ताव पर व्यापक चर्चा हुई तथा इसका अनुसमर्थन किया गया। नागपुर अधिवेशन में असहयोग प्रस्ताव सी.आर.दास ने ही प्रस्तावित किया था। गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन 1 अगस्त 1920 को प्रारंभ किया गया। पश्चिम भारत,बंगाल तथा उत्तरी भारत में असहयोग आंदोलन को अभूतपूर्व सफलता मिली। इस आंदोलन के दौरान ही मोतीलाल नेहरू,लाला लाजपत राय ,सरदार वल्लभभाई पटेल,जवाहरलाल नेहरू तथा राजेंद्र प्रसाद न्यायालय का बहिष्कार कर आंदोलन में कूद पड़े थे।5 नवंबर 1920 को ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन में गांधीजी ने असहयोग आंदोलन शुरू होने के एक वर्ष के भीतर स्वराज प्राप्त करने का नारा दिया। इसके साथ ही सरकारी उपाधि,स्कूल न्यायालय तथा विदेशी सामानों का पूर्णत: बहिष्कार की योजना भी थी।

आंदोलन की अनेक सफलताएं हैं। इसी आंदोलन ने पहली बार देश की जनता को इकट्ठा किया। अब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर कोई यह आरोप नहीं लगा सकता था कि वह कुछ मुट्ठी भर लोगों का प्रतिनिधित्व करती है।इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उसने जनता को आधुनिक राजनीति से परिचय कराया,उनमें आजादी की भूख जगाई।मालाबार की घटनाओं के बावजूद इस आंदोलन में बड़े पैमाने पर मुसलमानों की भागीदारी और सांप्रदायिक एकता आंदोलन की कोई छोटी उपलब्धि नहीं थी। साथ ही इस आंदोलन से जनता के मन में ब्रिटिश शक्ति का भय हट गया। जिस समय गांधीजी भारत आए(1915),उस समय प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था।

उन्होंने सरकार के युद्ध प्रयासों में मदद की जिसके लिए सरकार ने उन्हें कैसर ए हिंद सम्मान से सम्मानित किया,जिसे उन्होंने असहयोग आंदोलन में वापस कर दिया। जमनालाल बजाज ने अपनी रायबहादुर की उपाधि वापस कर दी। बाल गंगाधर तिलक ने असहयोग आंदोलन को समर्थन दिया परंतु इस आंदोलन के प्रथम दिन 1 अगस्त 1920 को उनकी मृत्यु हो जाने के कारण वह इसका परिणाम नहीं दे सके। चौरी-चौरा कांड की वास्तविक स्थिति 5 फरवरी 1922 है। इस दिन संयुक्त प्रांत के गोरखपुर जिले में चौरी-चौरा नामक स्थान पर किसानों के एक जुलूस पर गोली चलाए जाने के कारण क्रुद्ध भीड़ ने थाने में आग लगा दी,जिससे 21 सिपाहियों की मृत्यु हो गई। यह घटना इतिहास में चौरी चौरा कांड के नाम से प्रसिद्ध है।

इस घटना से क्षुब्ध होकर महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। 12 फरवरी 1922 को कांग्रेस की बारदोली बैठक में आंदोलन स्थगित करने का निर्णय लिया गया। इस घटना के समय गांधीजी गुजरात के बारदोली में सामूहिक सत्याग्रह द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने की तैयारी कर रहे थे। 24 फरवरी 1922 को आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की दिल्ली बैठक में ऐसी सभी गतिविधियों पर रोक लगा दी गई जिससे कानून का उल्लंघन होता है। इस अधिवेशन में असहयोग आंदोलन वापस लेने के कारण डॉ.मुंजे के द्वारा गांधीजी के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाया गया।

रविंद्रनाथ टैगोर आंदोलन एवं विरोध प्रदर्शन के विपरीत रचनात्मक कार्यक्रम को विशेष महत्व प्रदान करते थे जिसके कारण उन्होंने विदेशी वस्त्रों की होली जलाने के विपरीत गांधीजी को रचनात्मक कार्यक्रम अपनाने की बात अपने पत्र में कही। असहयोग आंदोलन के दौरान रविंद्रनाथ टैगोर ने विदेशी वस्त्रों को जलाए, जाने को अविवेकी या निष्ठुर बर्बादी कहा था।असहयोग आंदोलन के दौरान बिहार विद्यापीठ, काशी विद्यापीठ बनारस में 1920 में,गुजरात विद्यापीठ अहमदाबाद में 1920 में तथा जामिया मिलिया इस्लामिया (राष्ट्रीय मुस्लिम विश्वविद्यालय) अलीगढ़ में 1920 में जो बाद में दिल्ली ले जाया गया,स्थापित हुए।मदन मोहन मालवीय ने 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की थी और 1919 से 1938 तक वे इसके कुलपति बने रहे। काशी विद्यापीठ और गुजरात विद्यापीठ की स्थापना हुई। जामिया मिलिया बाद में दिल्ली स्थानांतरित हो गया।

चरखा नहीं बल्कि खादी असहयोग आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता का प्रतीक बन गई थी।

स्वराज पार्टी का गठन(मार्च 1923)[सम्पादन]

1919 के भारतीय शासन अधिनियम द्वारा स्थापित केंद्रीय तथा प्रांतीय विधान मंडलों का कांग्रेस ने गांधी जी के निर्देशानुसार बहिष्कार किया था और 1920 के चुनावों में भाग नहीं लिया असहयोग आंदोलन की समाप्ति और गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद देश के वातावरण में एक अजीब निराशा का माहौल बन गया था।ऐसी स्थिति में मोतीलाल नेहरू तथा सी आर दास ने एक नई विचारधारा को जन्म दिया मोतीलाल नेहरू तथा कांग्रेस को विधान मंडलों के भीतर प्रवेश कर अंदर से लड़ाई लड़ने का विचार प्रस्तुत किया तथा 1923 के चुनावों के माध्यम से विधानमंडल में पहुंचने की योजना बनाई। किंतु 1922 में कांग्रेस के गया अधिवेशन में बहुमत के साथ इस योजना को अस्वीकार कर दिया गया।

सी.आर.दास(इस दौरान वह कांग्रेस के अध्यक्ष थे) ने कांग्रेस की अध्यक्षता से त्यागपत्र दे दिया और मार्च 1923 में मोतीलाल नेहरू के साथ मिलकर स्वराज पार्टी की स्थापना की।इस पार्टी का मुख्य उद्देश्य चुनावों के माध्यम से काउंसिलों में प्रवेश कर तथा उन्हें काम न करने देकर उन्हें 1919 के भारत शासन अधिनियम का उच्छेदन करना था। सी.अर.दास स्वराज पार्टी के अध्यक्ष तथा मोतीलाल नेहरू इसके महासचिव थे। श्रीनिवास आयंगर(मद्रास प्रांत स्वराज पार्टी के संस्थापक) तथा एन.सी. केलकर स्वराज दल के अन्य प्रमुख नेता थे। 1925 में विट्ठलभाई पटेल का सेंट्रल लेजिस्लेटिव(केंद्रीय विधान मंडल) असेम्बली का अध्यक्ष चुना जाना स्वराजियों की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। नवंबर 1923 के चुनावों में स्वराजवादियों को अच्छी सफलता मिली। केंद्रीय एवं प्रांतीय विधानमंडलों में स्वराज पार्टी द्वारा बड़े महत्त्वपूर्ण कार्य किये गए। विट्ठलभाई पटेल को सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली का अध्यक्ष बनवाना तथा 1919 के अधिनियम की जाँच करने के लिये मुडीमैन समिति की नियुक्ति स्वराज पार्टी की एक महत्त्वपूर्ण सफलता थी। इन्होंने दमनात्मक कानूनों को निरस्त करने के लिये भी संघर्ष किया।

चितरंजन दास को देशबंधु के नाम से जाना जाता था। देशबंधु का तात्पर्य है-The Friend of Nation।चितरंजन दास इंग्लैंड से वकालत की पढ़ाई करने के बाद स्वदेश आकर बैरिस्टर हो गए तथा वकील के रूप में इनकी सेवा बड़ी सफलता अलीपुर बमकांड केस में अरविंद घोष का बचाव करना था। इन्होंने कहा था-"स्वराज आम जनता के लिए होना चाहिए केवल वर्गों के लिए नहीं।" 16 दिसंबर 1922 को इंडिपेंडेंट पार्टी बनाने का निर्णय मदन मोहन मालवीय तथा मोतीलाल नेहरू ने लिया था। मदन मोहन मालवीय हिंदू महासभा के संस्थापक सदस्य थे तथा 1916 में इन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की।

क्रांतिकारी आंदोलन का दूसरा चरण[सम्पादन]

देश में उचित ढंग से क्रांतिकारी आंदोलन का संचालन करने के उद्देश्य से अक्टूबर 1924 में युवा क्रांतिकारियों ने कानपुर में सम्मेलन बुलाया था।

तथा हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन नामक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना संस्थापक संस्थापक सचिंद्र सान्याल अध्यक्ष राम प्रसाद बिस्मिल जोगेश चंद्र चटर्जी तथा चंद्रशेखर आजाद इस संस्था द्वारा

9 अगस्त उत्तर रेलवे के लखनऊ सहारनपुर समभाव से काकोरी नामक स्थान पर 8 जून सहारनपुर लखनऊ पैसेंजर ट्रेन डकैती डालकर सरकारी खजाना लूटा गया।

यह घटना का होली कौन से प्रसिद्ध हुए इस काम में 29 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया गया जिसमें राम प्रसाद बिस्मिल अशफाक उल्लाह

रोशन लाल तथा राजेंद्र बिहारी को फांसी हुई जबकि चंद्रशेखर आजाद फरार हो गए।

भारत में 1925 में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई। इसके अलावा देश के अनेक भागों में मज़दूर-किसान पार्टियाँ बनीं। इन पार्टियों और समूहों ने मार्क्सवादी और कम्युनिस्ट विचारों का प्रचार किया।

नेहरू रिपोर्ट (अगस्त 1928)[सम्पादन]

सभी महत्त्वपूर्ण भारतीय नेताओं और दलो ने परस्पर एकजुट होकर तथा संविधानिक सुधारों की एक वैकल्पिक योजना बनाकर साइमन कमीशन की चुनौती का जवाब देने का प्रयास किया। इसका परिणाम नेहरू रिपोर्ट के रूप में सामने आया। इसे अगस्त 1928 में अंतिम रूप दिया गया। दुर्भाग्य से कलकत्ता में 1928 में आयोजित सर्वदलीय सम्मेलन नेहरू रिपोर्ट को स्वीकार न कर सका। मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा और सिख लीग जैसे सांप्रदायिक रुझान वाले संगठन के नेताओं ने इसका विरोध किया।

साइमन कीशन(नवंबर 1927 गठन,3फरवरी 1928 को मुंबई पहुंचा)[सम्पादन]

1919 ई.के मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड एक्ट में 10 वर्ष पर इसकी समीक्षा हेतु एक संवैधानिक आयोग के गठन का प्रावधान था।आयोग को यह देखना था कि यह अधिनियम व्यवहार में कहां तक सफल रहा तथा उत्तरदायी शासन की दिशा में कहां तक प्रगति करने की स्थिति में है। नवंबर 1927 में साइमन कमीशन अथवा भारतीय सांविधिक आयोग की नियुक्ति तत्कालीन कंजरवेटिव ब्रिटिश प्रधानमंत्री स्टेनली बाल्डविन द्वारा की गई। जॉन साइमन की अध्यक्षता में गठित इस आयोग में कुल 7 सदस्य थे। चूंकि इसमें सभी सदस्य अंग्रेज है तथा कोई भी भारतीय सदस्य नहीं था इसलिए भारतीय ने इसे कमीशन का कर इसका बहिष्कार एवं विरोध किया कमिशन 3 फरवरी 1928 को मुंबई पहुंचा। भारतीयों को सबसे अधिक इस बात का क्रोध था कि कमीशन में एक भी भारतीय को नहीं रखा गया था और इसके पीछे यह धारणा काम कर रही थी कि स्वशासन के लिये भारतीयों की योग्यता-अयोग्यता का फैसला विदेशी करेंगे।

साइमन कमीशन के अध्यक्ष उदारवादी दल के सदस्य थे जबकि भारत की स्वतंत्रता के समय ब्रिटिश प्रधानमंत्री कमीशन श्रमिक दल के सदस्य के रूप में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

1927 में कांग्रेस ने मद्रास अधिवेशन में घोषणा की कि वह ‘हर कदम पर और हर रूप में इस कमीशन के बहिष्कार’ का निर्णय करती है। मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा ने भी कांग्रेस के फैसले का समर्थन किया। 3 फरवरी 1958 कमीशन मुंबई पहुंचा और उस दिन देशव्यापी हड़ताल का आयोजन हुआ पूर्ण हड़ताल रखी गई तथा साइमन कमीशन वापस जाओ के नारे के साथ जुलूस निकाले लाहौर में साइमन कमीशन जुलूस का नेतृत्व करते समय पुलिस के लाठीचार्ज लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए पुलिस द्वारा की गई इस बर्बरता पूर्वक पिटाई के कारण है।

साइमन कमीशन के साथ सहयोग करने के लिये बनाई गई कमेटी में डॉ. भीमराव अम्बेडकर भी एक सदस्य के रूप में शामिल थे।

लार्ड इरविन की घोषणा(31 अक्टूबर 1929)[सम्पादन]

"महारानी की ओर से मुझे स्पष्ट रूप से यह करने का आदेश हुआ है कि सरकार के निर्म में 1917 की घोषणा में यह बात निहित है कि भारत के विकास के स्वाभाविक मुद्दे उसमें दिये गये हैं,उनमें डोमीनियन स्टेट्स (अधिशासित स्वराज्य)की प्राप्ति जुड़ी हुई है"

लार्ड इरविन ने यह भी वायदा किया कि जैसे ही साइमन कमीशन अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर देगा,एक गोलमेज सम्मेलन बुलाया जायेेगा।

दिल्ली घोषणा-पत्र(2 नवंबर1929)[सम्पादन]

देश के प्रमुख नेताओं के बुलाये गए इस सम्मेलन में तैयार किये गए घोषणा पत्र को ‘दिल्ली घोषणा-पत्र’ के नाम से जाना जाता है। इसमें मांग रखी गयी कि

  1. गोलमेज सम्मेलन का उद्देश्य इस बात पर विचार-विमर्श करना नहीं होगा कि किस समय डोमिनयन स्टेट्स दिया जाये बल्कि इस बैठक में इसे लागू करने की योजना बनायी जानी चाहिए।
  2. इस बैठक में कांग्रेस का बहुमत में प्रतिनिधित्व होना चाहिए।
  3. राजनीतिक अपराधियों को क्षमादान दिया जाये ।

कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन(31 दिसंबर 1929) और पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव[सम्पादन]

1921 के अहमदाबाद अधिवेशन में मौलाना हसरत मोहानी ने प्रस्तावित किया कि स्वराज को सभी प्रकार के विदेशी नियंत्रण से मुक्त संपूर्ण स्वतंत्रा यह संपूर्ण स्वराज के रूप में परिभाषित किया जाए और इसे कांग्रेस का लक्ष्य माना जाए और इसे कांग्रेस का लक्ष्य माना जाए।सी.आर.दास इसके अध्यक्ष चुने गए,किंतु उनके जेल में होने के कारण हकीम अजमल खां ने इस अधिवेशन की अध्यक्षता की थी। कांग्रेस के कलकता अधिवेशन (1928) में ब्रिटिश सरकार को यह अल्टीमेटम दिया गया कि वह एक वर्ष में नेहरू रिपोर्ट स्वीकार कर ले या कांग्रेस द्वारा प्रारंभ किए जान वाले जनांदोलन का सामना करे। निर्धारित समय सीमा में सरकार द्वारा कोई निश्चित उत्तर न मिलने की स्थिति में दिसंबर 1929 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पूर्ण स्वराज का लक्ष्य घोषित किया। जैसे ही 31 दिसंबर 1929 को मध्यराघत्रिर का घंटाबजा,कांग्रेस अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लाहौर में रावी के तट पर भारती स्वतंत्रता का झंडा फहराया । कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा 2 जनवरी 1930 की अपनी बैठक में यह निर्णय लिया गया कि 26 जनवरी 1930 का दिन पूर्ण स्वराज दिवस के रूप में मनायका जाएगा तथा 26 जनवरी को प्रत्येक वर्ष पूर्ण स्वाधीनता दिवस के रूप में। अपने अध्यक्षीय भाषण के दौरान उन्होंने कहा था कि आज हमारा सिर्फ एक लक्ष्य है,स्वाधीनता का लक्ष्य।हमारे लिए स्वाधीनता है-पूर्ण स्वतंत्रता। इस दौरान घोषित संकल्प में स्पष्ट किया गया कि-

  1. गोलमेज सम्मेलन से कोई लाभ नहीं है।
  2. नेहरू कमेटी की डोमिनियन राज्य के दर्जे की योजना समाप्त की जाती है।
  3. शब्द स्वराज्य का अर्थ है पूर्ण स्वतंत्रता तथा
  4. अखिल भारतीय कांग्रेस जह उचित समझेेगी नागरिक अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करेगी।
  5. 26 जनवरी, 1930 को पहला स्वाधीनता दिवस घोषित किया गया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन(12 मार्च 1930)[सम्पादन]

1929 के लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस कार्यकारिणी को प्रारंभ करने का अधिकार दिया गया। फरवरी 1930 में साबरमती आश्रम में हुई कांग्रेस कार्यकारिणी की दूसरी बैठक में महात्मा गांधी को इस आंदोलन का नेतृत्व सौंपा गया। महात्मा गांधी ने 12 मार्च,1930 को अपना प्रसिद्ध दांडी मार्च शुरू किया।उन्होंने साबरमती आश्रम(अहमदाबाद)से 78 चुने हुए साथियों के साथ सत्याग्रह के लिए कूच किया। 24 दिनों की लंबी यात्रा के बाद उन्होंने 6 अप्रैल 1930 को दांडी (नवसारी जिला,गुजरात) में सांकेतिक रूप से नमक कानून भंग किया और इस प्रकार नमक कानून तोड़कर उन्होंने औपचारिक रूप से सविनय अवज्ञा आंदोलन का शुभारंभ किया।दांडी आए सभी देशी व विदेशी पत्रकारों को संबोधित करते हुए गांधीजी ने कहा कि"शक्ति के विरुद्ध अधिकार की इस लड़ाई में मैं विश्व की सहानुभूति चाहता हूं। "

सुभाष चंद्र बोस ने गांधीजी के इस अभियान की तुलना नेपोलियन के एल्बा से पेरिस की ओर किए जाने वाले अभियान से की थी एक अंग्रेज समाचार संवाददाता ने खिल्ली उड़ाई और कहा कि क्या सम्राट को एक केतली में पानी उबालने से हराया जा सकता है। इसके उत्तर में गांधीजी ने कहा-" गांधी महोदय समुद्री जल को तब तक उबाल सकते हैं जब तक कि डोमिनियन स्टेट्स नहीं मिल जाता।"

गांधीजी के नेतृत्व में यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया।इस दांडी मार्च में सम्मिलित होनवाले सत्याग्राहियों की सर्वाधिक संख्या गुजरात (31) में थी। अन्य राज्यों में सम्मिलित सत्याग्रहियों की संख्या है।-महाराष्ट्र-13,उ.प्र.-8,कच्छ-6। इस आंदोलन के दौरान धरसना नमक गोदाम पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं के धावे से पूर्व महात्मा गांधी को 5 मई 1930 को शोलापुर से गिरफ्तार कर यरवदा जेल भेज दिया गया। उनके स्थान पर अब्बास तैयबजी आंदोलन के नेता हुए। उनकी गिरफ्तारी के बाद श्रीमती सरोजिनी नायडू ने 21 मई 1930 को धरसना नमक गोदाम पर धावे का नेतृत्व किया था। इस लोमहर्षक घटना का विवरण अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर ने प्रस्तुत किया है।

इस आंदोलन के दौरान पेशावर में गढ़वाल रेजीमेंट के सिपाहियों में चंद्रसिंह गढ़वाली के नेतृत्व में निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने से इंकार कर दिया था। साथ हीं मणपुर की जनजातियों ने भी सक्रिय भागीदारी दिखाई यहां पर आंदोलन का नेतृत्व नगा जनजाति की महिला गैडिन्ल्यू ने किया।इसे जियातरंग आंदोलन कहा जाता है। दसंबर 1930 में उत्तरी बिहार के सारण जिले में बिहोर नामक स्थान पर चौकीदारी टैक्स के विरोध में प्रदर्शन हुआ और प्रदर्शनकारियों ने बंदूक से 27 बर छर्रे दागे जाने की परवाह की। सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान महाराष्ट्र, कर्नाटक और मध्य भारत में लोगों ने जंगल कानून तोड़कर अपना विरोध प्रदर्शित किया।

इस आंदोलन की असफलता के बाद गांधीजी ने रचनात्मक कार्यक्रम को महत्व दिया। अक्टूबर 1934 में गांधीजी ने अपना पूरा समय हरिजनोत्थान में लगाने के लिए सक्रिय राजनीति से स्वंय को हटाने का निश्चय किया। सितंबर 1932 में गांधीजी ने हरिजन कल्याण हेतु अखिल भारतीय छुआछूत विरोधी लीग की स्थापना की तथा हरिजन नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन किया।

आचार्य विनोबा भावे इस आंदोलन में भाग लेने के दौरान प्रथम बार गिरफ्तार हुए।
[I.A.S-2015]प्रश्न-तमिलनाडु में गांधीवादी नेता सी.राजगोपालाचारी न तिरुचेनगोड आश्रम से त्रिचरापल्ली के वेदारण्यम तक नमक यात्रा की (तंजौर के समुद्री तट पर)।
[I.A.S-2002]प्रश्न-भारतीय स्वाधीनता संघर्ष के दौरान रेड शर्टस के नाम से भी पहचाने जान वाले खुदाई खिदमतगारों ने आह्वान किया-
  1. उत्तर-पश्चिमी के पख्तून जनजातीय क्षेत्रों को अफगानिस्तान के साथ मिलकर एक करने का।
  2. उपनिवेशीय शासकों को आतंकित करने और अंत में उन्हें हटा देने के लिए आतंकवादी युक्तियों और तरीकों को अपनाने का।
  3. राजनैतिक और सामाजिक सुधार के लिए साम्यवादी क्रांतिवादी विचारधारा अपनाने का।
  4. पठान क्षेत्रीय राष्ट्रवादी एकता का और उपनिवेशवादी के विरुद्ध संघर्ष का। उत्तर-(3)

लाहौर कॉन्ग्रेस द्वारा दिये गए जनादेश को आगे बढ़ाने के लिये महात्मा गांधी ने सरकार के समक्ष ग्यारह मांगें प्रस्तुत की तथा इन मांगों को स्वीकार या अस्वीकार करने के लिये सरकार को 31 जनवरी, 1930 तक का समय दिया। ये माँगें इस प्रकार थीं- सिविल सेवाओं तथा सेना के व्यय में 50 प्रतिशत की कमी की जाए। मादक पदार्थों के विक्रय पर पूर्णतः प्रतिबंध लगाया जाए। आपराधिक गुप्तचर विभाग पर सार्वजनिक नियंत्रण हो या उसे समाप्त कर दिया जाए। शस्त्र अधिनियम में परिवर्तन कर भारतीयों को आत्मरक्षा हेतु हथियार रखने का लाइसेंस दिया जाए। डाक आरक्षण बिल पास किया जाए। रुपए की विनिमय दर को घटाकर रुपए और स्टर्लिंग के बीच के अनुपात को 1 शिलिंग 4 पेंस किया जाए। वस्त्र उद्योग को संरक्षण प्रदान करना। भारतीयों के लिये तटीय यातायात का आरक्षण। लगान में 50 प्रतिशत की कमी की जाए। नमक कर एवं नमक पर सरकारी एकाधिकार को समाप्त किया जाए। सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा किया जाए। भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस ने 19 दिसंबर, 1929 को लाहौर अधिवेशन में 'पूर्ण स्वराज' (पूर्ण स्वतंत्रता) का घोषणा पत्र तैयार कर इसे कॉन्ग्रेस का मुख्य लक्ष्य घोषित किया। इन मांगों के संबंध में सरकार से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया न मिलने के कारण कॉन्ग्रेस कार्यसमिति की बैठक में यह निर्णय गांधीजी पर छोड़ दिया गया कि सविनय अवज्ञा आंदोलन किस मुद्दे को लेकर, कब और कहाँ से शुरू किया जाए।