सिविल सेवा मुख्य परीक्षा विषयवार अध्ययन/भारतीय स्वतंत्रता संग्राम 1931 से 1941

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1935 के भारत सरकार कानून के संघीय पक्ष को कभी लागू नहीं किया गया, पर प्रांतीय पक्ष जल्द ही लागू कर दिया गया। 1935 के नए कानून का कड़ा विरोध करने के वावजूद कांग्रेस ने इसके अंतर्गत होने वाले चुनावों में भाग लेने का निर्णय किया हालाँकि गांधीजी ने एक भी चुनाव-सभा को संबोधित नहीं किया। फरवरी 1937 में हुए चुनावों में कांग्रेस ने अधिकांश प्रांतों में भारी जीत हासिल की। ग्यारह में से सात प्रांतों में जुलाई 1937 में कांग्रेसी मंत्रिमंडल बने। बाद में कांग्रेस ने दो प्रांतों में साझी सरकारें भी बनाई। इस तरह कांग्रेस ने कुल 9 प्रांतों में अपनी सरकार बनाई जिसमें से उसे 7 प्रांतों में पूर्ण बहुमत हासिल था।

गांधी-इरविन समझौता(5मार्च 1931/दिल्ली समझौता)[सम्पादन]

सविनय अवज्ञा आंदोलन के विस्तारित होते स्वरूप को देखते हुए वायसराय लॉड इर्विन ने देश में सौहार्द्र का वातावरण उत्पन्न करने के उद्देश्य से 26 जनवरी 1931 को गांधीजी को जेल से रिहा कर दिया। तेज बहादुर सप्रू तथा एम.आर.जयकर के प्रयत्नों से गांधी एवं इर्विन के मध्य फरवरी 1931 में दिल्ली में वार्ता आरंभ हुई। 5 मार्च 1931 को दोनों के मध्य एक समझौता हुआ जो गांधी इरविन समझौता के नाम से जाना जाता है। इस समझौते के परिप्रेक्ष्य में सरोजिनी नायडू ने गांधी और इर्विन को दो महात्मा की संज्ञा दी थी।इस समझौते के अनुसार-

  1. गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित करने के लिए तैयार हो गई।
  2. सभी युद्ध बंदियों जिनके विरुद्ध हिंसा का आरोप नहीं था, को रिहा करने का आदेश।
  3. विदेशी कपड़ों और शराब की दुकानों पर शांतिपूर्ण धरना देने का अधिकार।
  4. समुद्र तटीय प्रदेशों में बिना नमक कर दिए नमक बनाने की अनुमति।
  5. कांग्रेस द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए तैयार हो गई।

परंतु इस समझौते ने जनता को निराश किया क्योंकि भगत सिंह,सुखदेव एवं राजगुरु को फांसी(23 मार्च,1931/लाहौर षड्यंत्र कांड) न दिए जाने की जनता की मांग को इसमें सम्मिलित नहीं किया गया था। इर्विन के जीवनीकार,एलन कैम्पबेल जॉनसन ने गांधी इर्विन समझौता में महात्मा गांधी के लाभों को सांत्वना पुरस्कार(Consolation prizes) और इर्विन के एकमात्र आत्मसमर्पण के रूप में बातचीत के लिए सहमत होने को कहा था।


25 जनवरी, 1931 को महात्मा गांधी तथा कॉन्ग्रेस कार्यकारिणी समिति (Congress Working Committee- CWC) के अन्य सभी सदस्यों को बिना शर्त कारावास से रिहा कर दिया गया। कॉन्ग्रेस कार्यकारिणी समिति ने गांधी को वायसराय से चर्चा करने के लिये अधिकृत किया। इन चर्चाओं के परिणामस्वरूप 14 फरवरी, 1931 को दिल्ली में ब्रिटिश भारत सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले वायसराय और भारतीय लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले गांधी के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर किये गए। इस समझौते को ‘दिल्ली समझौता’ तथा ‘गांधी-इरविन समझौता’ के रूप में भी जाना जाता है। इस समझौते ने कॉन्ग्रेस को सरकार के साथ समान स्तर पर रखा तथा इरविन सरकार की तरफ से निम्नलिखित शर्तों को मानने पर सहमत हुआ- हिंसात्मक अपराधियों के अतिरिक्त अन्य सभी राजनीतिक अपराधियों को रिहा कर दिया जाएगा। अतः कथन 1 सही नहीं है। सभी प्रकार के जुर्माने की वसूली को स्थगित कर दिया जाएगा। ऐसी सभी भूमियों को वापिस किया जाएगा जिसे तीसरे पक्ष को नहीं बेचा गया हो। सरकारी सेवाओं से त्यागपत्र दे चुके भारतीयों के मुद्दे पर सहानुभूति पूर्वक विचार विमर्श किया जायेगा। तटीय गाँवों में निश्चित सीमा के भीतर नमक तैयार करने की अनुमति दी जाएगी (व्यक्तिगत उपभोग के लिये न कि बिक्री के लिये)। शांतिपूर्ण और गैर-आक्रामक प्रदर्शन की आज्ञा दी जाएगी। आपातकालीन अध्यादेशों को वापस ले लिया जाएगा। यद्यपि वायसराय ने गांधी की निम्नलिखित दो मांगों को अस्वीकार कर दिया- पुलिस द्वारा किये गए अत्याचारों की सार्वजनिक जाँच। अतः कथन 2 सही नहीं है। भगत सिंह तथा उनके साथियों की फाँसी की सज़ा को उम्रकैद में परिवर्तित करना।

कांग्रेस का कराची अधिवेशन(29 मार्च 1931)[सम्पादन]

गांधी इरविन समझौते (दिल्ली समझौते) को मंजूरी देने के लिए सरदार बल्लभ भाई पटेल की अध्यक्षता में 29 मार्च,1931 को कांग्रेस का कराची अधिवेशन हुआ। इसी अधिवेशन में पहली बार कांग्रेस ने मौलिक अधिकारों और राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रमों से संबद्ध प्रस्ताव पारित किए। इसी अधिवेशन में कुछ लोगों के विरोध करने पर गांधी जी ने कहा था। "गांधी मर सकता है,गांधीवाद नहीं।" यह पहला अवसर था जब पूर्ण स्वराज्य को कांग्रेस द्वारा परिभाषित किया गया। सुभाष चंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कराची अधिवेशन को महात्मा गांधी की लोकप्रियता और सम्मान की पराकाष्ठा है।

इस अधिवेशन में पारित मूल अधिकारों तथा आर्थिक कार्यक्रम पर संकल्प पंडित जवाहरलाल नेहरू ने प्रारूपित किया था। तथा एमएन रॉय ने इसमें सहयोगी की भूमिका निभाई थी।[I.A.S-2010&05]

गोलमेज सम्मेलन(1st-नवं1930,2nd-7सि से 1दिसं 1931,3rd-17नवं से24दि 1932)[सम्पादन]

27 मई 1930 को साइमन कमीशन की रिपोर्ट प्रकाशित हुई। राजनीतिक संगठनों ने कमीशन की सिफारिशों को अस्वीकार कर दिया। ब्रिटिश सरकार द्वारा लंदन में भारतीय नेताओं और सरकारी प्रवक्ताओं का पहला गोलमेज़ सम्मेलन आयोजित किया। इसका उद्देश्य साइमन कमीशन की रिपोर्ट पर विचार करना था। कांग्रेस के प्रमुख नेता जेल में थे ब्रिटिश सरकार ने निराशा एवं असंतोष के वातावरण में नवंबर 1930 में लंदन में प्रथम गोलमेज सम्मेलन बुलाया इस सम्मेलन में 89 भारतीय प्रतिनिधियों ने भाग लिया किंतु कांग्रेस ने भाग नहीं लिया। इस सम्मेलन में भाग लेने वालों में प्रमुख थे तेज बहादुर सप्रू,श्रीनिवास शास्त्री,मोहम्मद अली मोहम्मद शफी,आगा खां, फजलुल हक,मोहम्मद अली जिन्ना,होमी मोदी,एम.आर जयकर.मुंजे,भीमराव अंबेडकर तथा सुंदर सिंह मजीठिया आदि। इस सम्मेलन में ईसाइयों का प्रतिनिधित्व के.टी.पाल ने किया था। इस सम्मेलन का उद्घाटन ब्रिटिश सम्राट ने किया तथा इसकी अध्यक्षता ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनॉल्ड ने की थी।

7 सितंबर से 1 दिसंबर 1931 दिसंबर तक चले द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में महात्मा गांधी ने कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में हिस्सा लिया, इनके अलावा सरोजनी नायडू तथा मदन मोहन मालवीय ने भी इस सम्मेलन में हिस्सा लिया। एनी बेसेंट ने भी इस सम्मेलन में भाग लिया था। गांधीजी एस.एस.राजपूताना नामक जलपोत से लंदन पहुंचे तथा वे लंदन के किंग्सले हॉल में ठहरे थे । गतिरोधों के कारण सम्मेलन 1 दिसंबर को समाप्त घोषित कर दिया गया एवं गांधीजी को लंदन से खाली हाथ वापस आना पड़ा। स्वदेश पहुंचने पर गांधीजी ने कहा,"यह सच है कि मैं खाली हाथ लौटा हूं,किंतु मुझे संतोष है कि जो ध्वज मुझे सौंपा गया था, उसे नीचे नहीं होने दिया और उसके सम्मान के साथ समझौता नहीं किया।" द्वितीय गोलमेज सम्मेलन संप्रदायिक समस्या पर विवाद के कारण पूरी तरह असफल रहा। दलित नेता भीमराव अंबेडकर ने दलितों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की मांग की जिसे गांधजी ने अस्वीकार कर दिया। डॉ.भीमराव अंबेडकर तीनो गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने वाले भारतीय प्रतिनिधि थे। लंदन में तीसरा गोलमेज सम्मेलन 17 नवंबर 1932 से 24 दिसंबर 1932 तक चला,कांग्रेस ने इस सम्मेलन का बहिष्कार किया।

[I.A.S-1996],प्रश्न-1930-32 की अवधि में भारत और ब्रिटेन के राजनेताओं की लंदन में हुई बैठकों का प्राय: प्रथम,द्वितीय,तृतीय गोलमेज सम्मेलन के रूप में उल्लेख किया जाता है।उनका उसी रूप में उल्लेख गलत होगा,क्योंकि-
(a)इनमें से दो में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भाग लिया
(b)भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को छोड़कर जिन भारतीय दलों ने भाग लिया उन्होंने पूरे भारत का नहीं,वर्गीय हितों का प्रतिनिधित्व किया था।
(c)ब्रिटेन की लेबर पार्टी सम्मेलन के बीच में ही हट गई थी।
(d)ये तीन अलग-अलग सम्मेलन नहीं थे,अपितु यह एक ही सम्मेलन की अवस्था थी जो तीन सत्रों में संपन्न हुई थी।

ANS-(D) [I.A.S-2005]प्रश्न-निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

  1. प्रथम गोलमेज सम्मेलन में डॉ.अम्बेडकर ने दलित वर्ग के लिए अलग निर्वाचक मंडल की मांग रखी।
  2. पूना पैक्ट में स्थानीय निकायों तथा सिविल सेवाओं मेंदलित वर्गों के प्रतिनिधित्व के लिए विशेष उपबंध रखे गए थे।
  3. तृतीय गोलमेज सम्मेलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भाग नही लिया था।

उपरोक्त कथनों में से कौन से सही हैं? उतर-(D)-1,2,और 3

सांप्रदायिक पंचाट एवं पूना पैक्ट(24 सितंबर 1932)[सम्पादन]

द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में विभिन्न संप्रदायों एवं दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल के विषय पर कोई सहमति नहीं बन पाई थी अतः सम्मेलन ने इस समस्या के निदान के लिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनॉल्ड को प्राधिकृत किया। तदनुसार 16 अगस्त 1932 को रैम्जे मैकडोनॉल्ड ने अपने सांप्रदायिक अधिनिर्णय की घोषणा की,जिसे सांप्रदायिक पंचाट(कम्युनल अवार्ड) कहा गया। इसके अंतर्गत प्रत्येक अल्पसंख्यक समुदाय के लिए विधानमंडलों में कुछ सीटें सुरक्षित कर दी गई जिनके सदस्यों का चुनाव पृथक निर्वाचन मंडलों द्वारा किया जाना था। मुसलमान और सीख तो पहले से ही अल्पसंख्यक माने जाते थे। अब इस नए कानून के अंतर्गत दलित वर्ग को भी अल्पसंख्यक मानकर हिंदुओं से अलग कर दिया गया। इसके तहत मुसलमानों,ईसाइयों,सिक्खों,आंग्ल भारतीयों तथा अन्य के लिए पृथक निर्वाचन पद्धति की सुविधा प्रदान की गई। जो केवल प्रांतीय विधान मंडलों पर ही लागू थी। गांधीजी ने इसके विरोध स्वरूप 20 सितंबर,1932 को यरवदा जेल में रहते हुए,अपना पहला आमरण अनशन प्रारंभ किया था। [I.A.S-2012] जो कि 24 सितंबर 1932 को अंबेडकर और गांधीजी के अनुयायियों के मध्य हुए पूना समझौते(शनिवार के दिन सांय 5:00 बजे) के बाद समाप्त हुआ। गांधीजी ने पूना समझौता पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। दलित वर्ग की ओर से डॉक्टर अंबेडकर ने तथा हिंदू जाति की ओर से पंडित मदन मोहन मालवीय ने इस पर हस्ताक्षर किए।एम.एम.जयकर,देवदास गांधी,विश्वास,राजभोज,पी.बालू,गवई,ठक्कर,सोलंकी,तेज बहादुर सप्रू,जी.डी.बिड़ला,राजगोपालाचारी,डॉ.राजेंद्र प्रसाद राव बहादुर श्री निवास,एम.सी.राजा,सी.वी.मेहता,बाखले एवं कॉमत हस्ताक्षरकर्ता थे।

इसके तहत प्रांतीय विधानमंडलों में दलितों के लिए सुरक्षित सीटों की संख्या 71 से थी जिसे पुना पैक्ट में बढ़ाकर 148(मद्रास-30 सिंध सहित बंबई-15,पंजाब -8, बिहार और उड़ीसा-18,मध्य प्रांत 20,असम-7 बंगाल 30 एवं संयुक्त प्रांत-20) कर दिया गया। कुछ पुस्तकों में यद्यपि यह संख्या 147 मिलती है। साथ ही केंद्रीय विधान मंडल में सामान्य वर्ग की सीटों में से 18% सीटें दलित वर्गों के लिए आरक्षित की गई। इस समझौते के बाद महात्मा गांधी की रुचि सविनय अवज्ञा आंदोलन में नहीं रही,अब वह पूरी तरह अस्पृश्यता विरोधी आंदोलन में रुचि लेने लगे तथा इस प्रकार अखिल भारतीय अस्पृश्यता विरोधी लीग(ऑल इंडिया एंटी अनटचेबिलिटी लीग) की स्थापना हुई, जिसका नाम परिवर्तित कर हरिजन सेवक संघ कर दिया गया। घनश्याम दास बिड़ला इसके प्रथम अध्यक्ष थे। 1920 में डॉ बी आर अंबेडकर द्वारा दि ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लास फेडरेशन(दलित वर्गों का संघ) की स्थापना की गई थी। 1924 में डॉक्टर अंबेडकर ने बंबई में दलित वर्ग संस्थान (बहिष्कृत हितकारिणी सभा) की स्थापना की। तीन वर्ष बाद 1927 में उन्होंने मराठी पाक्षिक 'बहिष्कृत भारत' का प्रकाशन प्रारंभ किया तथा इसी वर्ष सवर्ण हिंदुओं तथा अछूतों में सामाजिक समानता के सिद्धांत का प्रचार करने हेतु उन्होंने समाज समता संघ स्थापित किया ।जीवन के अंतिम समय में इन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया था। 14 अगस्त 1931 को बंबई में महात्मा गांधी से वार्ता के दौरान डॉ.बी.आर अंबेडकर ने कहा था "इतिहास बताता है कि महात्मा गांधी क्षणिक भूत की भांति उठाते हैं,लेकिन असर नहीं उठाते।"

कांग्रेस समाजवादी पार्टी 1934[सम्पादन]

अक्तूबर 1934 में जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव और मीनू मसानी के नेतृत्व में बॉम्बे में कॉन्ग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (CSP) का गठन किया गया था। शुरुआत से ही सभी समाजवादियों द्वारा चार बुनियादी प्रस्तावों पर सहमति दी गई: भारत में प्राथमिक संघर्ष स्वतंत्रता और राष्ट्रीयता के लिये राष्ट्रीय संघर्ष था। समाजवादियों को राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के भीतर रहकर काम करना चाहिये क्योंकि यह राष्ट्रीय संघर्ष का नेतृत्व करने वाला प्राथमिक निकाय था। उन्हें कॉन्ग्रेस और राष्ट्रीय आंदोलन को एक समाजवादी दिशा देनी चाहिये। उन्हें श्रमिकों और किसानों को संगठित करना चाहिये तथा उनकी आर्थिक मांगों के लिये संघर्ष करते हुए उन्हें राष्ट्रीय संघर्ष का सामाजिक आधार बनाना चाहिये। इस प्रकार, कॉन्ग्रेस सोशलिस्ट पार्टी कभी भी ब्रिटिश डोमिनियन के तहत स्वशासन नहीं बल्कि पूर्ण स्वतंत्रता चाहती थी। इसके अलावा, वे भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के अंदर रहते हुए इसके आंदोलनों को एक नई समाजवादी दिशा देना चाहते थे। कॉन्ग्रेस सोशलिस्ट पार्टी विकेन्द्रीकृत समाजवाद की समर्थक थी जिसमें सहकारी समितियों, ट्रेड यूनियनों, स्वतंत्र किसानों और स्थानीय अधिकारियों के पास आर्थिक शक्ति का पर्याप्त हिस्सा हो। कॉन्ग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने स्वतंत्र भारत के लिये समाजवादी दृष्टिकोण एवं वर्तमान आर्थिक मुद्दों पर एक अधिक उग्र श्रमिक और किसान समर्थक रुख अपनाने के लिये कॉन्ग्रेस को सहमत करने का कार्य किया।


मई 1934 में पटना में कांग्रेस महासमिति की बैठक के दौरान ही इन सदस्यों की एक अलग बैठक हुई जिसमें अखिल भारतीय समाजवादी दल की स्थापना को औपचारिक मान्यता दी गई तथा अक्टूबर-नवंबर के दौरान बंबई में इसकी नीतियां एवं कार्य प्रणालियां तय की गई ।वर्ष 1934 में में पटना में अखिल भारतीय कांग्रेस समाजवादी पार्टी के संयोजक जयप्रकाश नारायण थे। जयप्रकाश नारायण को पार्टी का महासचिव तथा आचार्य नरेंद्र देव को अध्यक्ष चुना गया था।इन नेताओं ने युवा वर्ग को कम्युनिस्ट पार्टी की ओर जाने से रोकने के लिए कांग्रेस समाजवादी पार्टी की स्थापना की थी इससे अन्य सदस्य अशोक मेहता,अच्युत पटवर्धन,मीनू मसानी,डॉ राममनोहर लोहिया,पुरुषोत्तम विक्रम दास,यूसुफ मेहराले,गंगा शरण सिंह तथा कमलादेवी चट्टोपाध्याय आदि। जयप्रकाश नारायण बिहार सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े थे।1931 में बिहार सोशलिस्ट पार्टी का गठन गंगाशरण सिंह,रामवृक्ष बेनीपुरी और रामानंद मिश्र आदि ने किया था।श्री नरसिंह नारायण समाजवादी थे। वे बिहार सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े थे। जयप्रकाश नारायण को लोकनायक के नाम से भी जाना जाता है। 1942में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान इन्होंने डॉ राममनोहर लोहिया तथा अरूणा आसफ अली के साथ मिलकर गुप्त रूप से भारतीय जनता को संगठित किया था। इन्होंन 5 जून 1974 को पटना के गांधी मैदान पर संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया 1998 में मरणोपरांत इन्हें भारत रत्न प्रदान किया गया। अप्रैल 1946 में जयप्रकाश नारायण की रिहाई के लिए जयप्रकाश दिवस मनाया गया। पटना के बांकीपुर मैदान में एक जनसभा हुई जिसमें राजनीतिक बंदियों को जेल में रखने की सरकारी नीति की आलोचना प्रकाश की रिहाई की मांग की गई। 20 मई 1936 को बंबई के 21 उद्योगपतियों ने बंबई मेनिफेस्टो पर हस्ताक्षर किए यह मेनिफेस्टो प्रत्यक्ष रूप से समाजवादी आदेशों के प्रतिपादन का विरोधी था जैसा कि नेहरू ने लखनऊ अधिवेशन में कहा था।

[I.A.S-2015]प्रश्न1-कांग्रेस समाजवादी पार्टी के संदर्भ में,निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-
  1. इसने ब्रिटिश माल के बहिष्कार और रकरों के अपवंचन (इवेजन) की वकालत की।
  2. यह सर्वहारा-वर्ग का अधिनायकत्व स्थापित करना चाहती थी।
  3. इसने अल्पसंख्यकों तथा दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन-क्षेत्र की वकालत की। उपर्युक्त कथनों में कौन-सा सही है।
उतर-कोई भी कथन सी नहीं है।[व्याख्या-इस पार्टी ने ब्रिटिश उत्पादों तथा करो के बहिष्कार का समर्थन किया ना कि करों के अपवर्जन का। यह पार्टी समानता के आधार पर समाजवादी समाज की स्थापना करना चाहते थे। सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्त्व स्थापित करना इनका लक्ष्य नहीं था यह मार्क्सवाद का लक्ष्य था। इसने अल्पसंख्यकों तथा दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र की वकालत नहीं की।]
प्रश्न2-निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-
  1. 1936 में हस्ताक्षरित "बंबई मेनिफेस्टो" प्रत्यक्ष रूप से समाजवादी आदर्शों के प्रतिपादन का विरोधी था।
  2. इसको समस्त भारत से वृहद व्यापारिक समुदाय का सहयोग मिला था। उपर्युक्त कथनों में से कौन सा कथन सही है?

उतर-1और2 दोनों सही है?

कांग्रेसका त्रिपुरी संकट(1939)[सम्पादन]

वर्ष 1938 के कांग्रेस के हरीपुरा(गुजरात)अधिवेशन में सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के पहली बार अध्यक्ष(निर्विरोध)बने थे।वर्ष 1939 के त्रिपुरी(मध्य प्रदेश)अधिवेशन में गांधी जी द्वारा समर्थित पट्टाबी सीता रमैया को पराजित कर कांग्रेस के दूसरी बार अध्यक्ष बने परंतु कार्यकारिणी के गठन के प्रश्न पर गांधी जी से मतभेद के कारण उन्होंने त्यागपत्र दे दिया जिसके बाद डाक्टर राजेंद्र प्रसाद कांग्रेस के अध्यक्ष बने वर्ष में संचालित में त्रिपुरी संकट के बाद कांग्रेस की अध्यक्षता से जाग पत्र के पश्चात सुभाष चंद्र बोस ने फारवर्ड ब्लाक की स्थापना की यह संगठन वामपंथी विचारधारा पर आधारित था जब वित्तीय विश्वयुद्ध के बाद बादल यूरोप में मंडरा रहे थे सुभाष चंद्र बोस ने समय का लाभ उठाना चाहा और ब्रिटेन तथा जर्मनी के युद्ध का लाभ उठाकर एक प्रहार करके भारत की स्वाधीनता चाहिए उनका विश्वास आयरलैंड की पुरानी कहावत पर था इंग्लैंड की आवश्यकता आयरलैंड के लिए अवसर है उन्होंने गांधीजी तथा अन्य कांग्रेसी नेताओं को इस नीति पर लाना चाहा कि भारत की स्वतंत्रता के लिए इंग्लैंड के दुश्मनों की सहायता ली जाए।द्वितीय विश्व युद्ध वर्ष 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ हुआ कांग्रेस ने युद्ध में समर्थन देने के बदले भारत को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किए जाने का प्रस्ताव रखा तत्कालीन वायसराय लॉर्ड ललित होने भारतीय विधान मंडलों की सहमति के बिना भारत को युद्ध में शामिल कर लिया साथ ही देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई कांग्रेस कार्यसमिति ने युद्ध के उद्देश्यों की घोषणा करने की मांग की भी मांग की कि युद्ध के बाद भारत को स्वतंत्र कर दिया जाए विश्व युद्ध के दौरान कांग्रेस द्वारा स्वीकृत प्रस्ताव में पोलैंड पर हमले तथा नाजीवाद और फासीवाद की भर्त्सना की गई लेकिन यह भी घोषित किया गया कि भारत से युद्ध में शामिल नहीं हो सकता जो लोकतांत्रिक स्वाधीनता की रक्षा के लिए लड़ा जा रहा है जबकि खुद उसे स्वाधीनता से वंचित रखा जा रहा हो ललित बोले 17 अक्टूबर 1939 को भारत को जर्मनी के विरुद्ध युद्ध ग्रस्त घोषित कर दिया भारतीय विधान मंडलों की सहमति के बिना युद्ध घोषित करने के कारण सभी प्रांतों में कांग्रेस विधान मंडलों ने त्यागपत्र दे दिया वित्तीय विश्वयुद्ध 1 सितंबर 1940 को जर्मनी के पोलैंड पर आक्रमण के साथ प्रारंभ हुआ था जो कि 6 वर्षों बाद जापान के हिरोशिमा एवं नागासाकी पर अमेरिका द्वारा परमाणु बम गिराए जाने के बाद अगस्त 1945 में समाप्त हुआ विंस्टन चर्चिल द्वितीय विश्व युद्ध 1939 से 45 के दौरान ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे उनका कार्यकाल 940 से 45


फरवरी 1938 में गुजरात के हरिपुरा में आयोजित कॉन्ग्रेस अधिवेशन में सुभाष चंद्र बोस को सर्वसम्मति से सत्र का अध्यक्ष चुना गया था। अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने प्रांतों के कॉन्ग्रेसी मंत्रिमंडलों में अपार क्रांतिकारी क्षमता होने की बोस ने नियोजन आधारित आर्थिक विकास की भी बात की और बाद में एक राष्ट्रीय योजना समिति की स्थापना में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अतः कथन 2 सही है। इस अधिवेशन में रियासतों में चले रहे प्रजामंडल आंदोलनों को नैतिक समर्थन देने का एक संकल्प पारित किया गया। इस अधिवेशन के कुछ दिन बाद अंतर्राष्ट्रीय स्थिति अत्यधिक संकटपूर्ण हो गई तथा यह स्पष्ट हो गया कि यूरोप युद्ध में उलझने वाला है। वर्ष 1939 में आयोजित त्रिपुरी अधिवेशन (न कि हरिपुरा अधिवेशन) में भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस ने चीन से संबंधित एक प्रस्ताव पारित किया: इसमें निर्मम एवं अमानवीय साम्राज्यवाद के खिलाफ चीनी लोगों के संघर्ष के प्रति सहानुभूति व्यक्त की गई और उनके साहसिक प्रतिरोध की प्रशंसा की गई। कॉन्ग्रेस ने अपनी ओर से चीन में एक मेडिकल मिशन भेजने को अपनी स्वीकृति दी और यह विश्वास दिलाया कि इस मिशन को पूर्ण समर्थन प्राप्त होता रहेगा, ताकि वह प्रभावी ढंग से अपने काम को आगे बढ़ा सके और चीन के साथ भारतीय एकजुटता का एक सफल प्रतीक बन सके।

भारत सरकार अधिनियम, 1935 अधिनियम की विशेषताएँ[सम्पादन]

इसने एक अखिल भारतीय संघ के निर्माण का प्रस्ताव दिया था, जिसमें प्रांतों और रियासतों को इकाइयों के रूप में शामिल किया गया था। लेकिन, यह संघ कभी अस्तित्व में नहीं आ पाया क्योंकि रियासतें इसमें शामिल नहीं हुईं। अधिनियम ने केंद्र और घटक इकाइयों के बीच शक्तियों को तीन सूचियों में विभाजित किया- संघीय सूची, प्रांतीय सूची और समवर्ती सूची। हालाँकि अवशिष्ट शक्तियाँ गवर्नर-जनरल को दी गईं। इसने प्रांतों में द्वैध शासन की व्यवस्था को समाप्त कर दिया और प्रांतीय स्वायत्तता प्रदान की। इसने केंद्र में द्वैध शासन व्यवस्था की शुरुआत की। इसने दलित वर्गों, महिलाओं और श्रमिकों तक सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत का विस्तार किया। इसने ग्यारह में से 6 प्रांतों - बंगाल, बॉम्बे, मद्रास, बिहार, असम और संयुक्त प्रांत में द्विसदनीयता व्यवस्था का प्रावधान किया।

1938 के कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन-योजना आयोग का विचार पहली बार सामने आया।

पाकिस्तान की मांग (23 मार्च 1940)[सम्पादन]

मुस्लिमों के लिए एक पृथक देश की प्रथम बार एक निश्चित अभिव्यक्ति वर्ष 1930 के मुस्लिम लीग के इलाहाबाद अधिवेशन के इकबाल के अध्यक्षीय भाषण में हुई थी। जबकि कैंब्रिज विश्वविद्यालय के एक छात्र चौधरी रहमत अली ने वर्ष 1933 में पाकिस्तान शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग नाउ और नेवर; आर. वी टू लिव ऑर पेरिश फॉरेवर?" नाम से वितरित अपने पैम्फलेट में किया था। ब्रिटिश भारत की पांच उत्तरी राजनीतिक इकाइयों के नामों के अंग्रेजी प्रथमाक्षरों को मिलाकर यह नाम बनाया गया था। यह इकाइयां थी- पंजाब,नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्राविंस,कश्मीर,सिंध और बलूचिस्तान।

23 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन की अध्यक्षता मोहम्मद अली जिन्ना ने की जिसमें भारत से अलग एक मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान की मांग की गई। जिन्ना ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा था कि वे एक अलग मुस्लिम राष्ट्र के अतिरिक्त और कुछ स्वीकार नहीं करेंगे। सरोजनी नायडू ने मोहम्मद अली जिन्ना को हिंदू मुस्लिम एकता का दूत कहा था। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया के पृष्ठ 352 पर उल्लेख किया है कि मुहम्मद इकबाल ने उनसे मुलाकात के दौरान कहा था कि "आप(नेहरू) एक राष्ट्रभक्त हैं,जबकि जिन्ना एक राजनीतिज्ञ हैं।" मार्च में लाहौर में आयोजित मुस्लिम लीग के वार्षिक अधिवेशन में जिन्ना के द्विराष्ट्र सिद्धांत को मान्यता दी गई थी। इससे संबंधित प्रस्ताव का प्रारूप सिकंदर हयात खान ने तैयार किया था और उसे फजलुल हक ने 23 मार्च 1940 को प्रस्तुत किया था। इसी तिथि की स्मृति में 23 मार्च,1943 को मुस्लिम लीग द्वारा 'पाकिस्तान दिवस' मनाया गया।

व्यक्तिगत सत्याग्रह(1940)[सम्पादन]

अगस्त प्रस्ताव को पूरी तरह अस्वीकार करते हुए कांग्रेस ने गांधीजी के नेतृत्व में व्यक्तिगत सत्याग्रह शुरू किया। यह सत्याग्रह ब्रिटिश सरकार की भारत नीति के प्रति नैतिक विरोध की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति थी। व्यक्तिगत सत्याग्रह की शुरुआत 17 अक्टूबर 1940 को हुई। बिनोवा भावे प्रथम सत्याग्रही थे तथा पंडित जवाहरलाल नेहरु दूसरे। सर्वोदय शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम महात्मा गांधी ने किया था विनोवा भावे द्वारा गांधीजी के आदर्शो के प्रचार के लिए सर्वोदय समाज की स्थापना की गई थी।

क्रिप्स मिशन(मार्च 1942)[सम्पादन]

द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की बढ़ती हुई शक्ति को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय विशेषकर अमेरिका,चीन एवं ऑस्ट्रेलिया ने ब्रिटेन पर भारत को स्वतंत्र करने के लिए दबाव बढ़ाया जिसके परिणामस्वरूप स्टैफोर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में मिशन भारतीय नेताओं से वार्ता हेतु मार्च,1942 में भारत आया। इस मिशन ने एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिसकी प्रमुख शर्तें इस प्रकार थीं।-

  1. युद्ध के बाद भारत को डोमिनियन राज्य का दर्जा दिया जाएगा जो किसी बाहरी सत्ता के अधीन नहीं होगा।
  2. भारतीयों को अपना संविधान निर्मित करने का अधिकार दिया जाएगा जिसके लिए युद्ध के बाद एक संविधान निर्मात्री परिषद बनेगी जिसमें ब्रिटिश भारत के प्रांतों के निर्वाचित सदस्य और देशी रजवाड़ों के प्रतिनिधि शामिल होंगे।
  3. ब्रिटिश भारत का कोई प्रांत यदि नए संविधान को स्वीकार न करना चाहे तो उसे वर्तमान संवैधानिक स्थिति बनाए रखने का अधिकार होगा। नए संविधान को न स्वीकार करने वाले प्रांतों को अपना अलग संविधान बनाने की आज्ञा होगी।
  4. युद्ध के दौरान ब्रिटिश वायसराय की एक नई कार्यकारी परिषद का गठन किया जाएगा जिसमें भारतीय जनता के प्रमुख वर्ग के प्रतिनिधि शामिल होंगे।

लेकिन रक्षा मंत्रालय ब्रिटिश नेतृत्व के पास होगा। महात्मा गांधी ने इसे उत्तर तिथीय चेक(Post-Dated cheque) की संज्ञा दी। क्रिप्स मिशन के साथ कांग्रेस के आधिकारिक वार्ताकार पंडित जवाहरलाल नेहरू एवं मौलाना आजाद थे।