सिविल सेवा मुख्य परीक्षा विषयवार अध्ययन/संघवाद

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दसवीं अनुसूची[सम्पादन]

  • जून 2020 में मणिपुर में सत्ताधारी गठबंधन सरकार गहरे राजनीतिक संकट में फँस गई है। बीते दिनों मणिपुर विधानसभा अध्यक्ष द्वारा कॉंग्रेस के टिकट पर निर्वाचित एक सदस्य को अयोग्य करार दिया गया है। चुनावी लोकतंत्र का यह घटनाक्रम स्पष्ट तौर पर दल-बदल विरोधी कानून में बदलाव की ओर इशारा करता है, क्योंकि इस घटनाक्रम ने चुनावी दलों के समक्ष दल-बदल विरोधी कानून के दुरुपयोग का एक उदाहरण प्रस्तुत किया है और संभव है कि ऐसी घटनाएँ भविष्य में भी देखने को मिलें। मणिपुर में दलबदल की यह राजनीति अनोखी नहीं है, इससे पूर्व कर्नाटक, मध्य प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड राज्य भी दल-बदल विरोधी कानून के प्रत्यक्षदर्शी रह चुके हैं।

इस आलेख में दल-बदल विरोधी कानून, इसकी आवश्यकता, कानून के अपवाद, दल-बदल विरोधी कानून की समस्याएँ तथा इसकी प्रासंगिकता के पक्ष व विपक्ष में प्रस्तुत तर्कों का परीक्षण किया जाएगा।

वर्ष 2003 का 91वां संविधान संशोधन व्यक्तिगत ही नहीं बल्कि सामूहिक दल-बदल को भी असंवैधानिक करार दिया गया।91वां संविधान संशोधन अधिनियम,2003

इस संशोधन के तहत मंत्रिमंडल का आकार भी 15 फीसदी सीमित कर दिया गया। हालाँकि, किसी भी कैबिनेट सदस्यों की संख्या 12 से कम नहीं होगी। इस संशोधन के द्वारा 10वीं अनुसूची की धारा 3 को खत्म कर दिया गया, जिसमें प्रावधान था कि एक-तिहाई सदस्य एक साथ दल-बदल कर सकते थे।

  • जनवरी 2020 में घोषित कर्नाटक विधानसभा उप-चुनाव के नतीजो के साथ ही दल-बदल विरोधी कानून की प्रासंगिकता पर भी प्रश्नचिह्न लगता दिखाई दे रहा है। बीते दिनों कर्नाटक विधानसभा अध्यक्ष द्वारा अयोग्य करार दिये गए लगभग सभी विधायक हालिया उप-चुनावों में जीत कर मंत्री पद प्राप्त करने वाले हैं। चुनावी लोकतंत्र का यह घटनाक्रम स्पष्ट तौर पर दल-बदल विरोधी कानून में बदलाव की ओर इशारा करता है, क्योंकि इस घटनाक्रम ने चुनावी दलों के समक्ष दल-बदल विरोधी कानून के दुरुपयोग का एक उदाहरण प्रस्तुत किया है और संभव है कि ऐसी घटनाएँ भविष्य में भी देखने को मिलें।

वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन के माध्यम से देश में ‘दल-बदल विरोधी कानून’ पारित किया गया। साथ ही संविधान की दसवीं अनुसूची में इस कानून को शामिल किया गया ।

सदन का अध्यक्ष बनने वाले सदस्य को इस कानून से छूट प्राप्त है।

आज़ादी के कुछ ही वर्षों के भीतर यह महसूस किया जाने लगा कि राजनीतिक दलों द्वारा अपने सामूहिक जनादेश की अनदेखी की जाने लगी है। विधायकों और सांसदों के जोड़-तोड़ से सरकारें बनने और गिरने लगीं।

1960-70 के दशक में ‘आया राम गया राम’ की राजनीति देश में काफी प्रचलित हो चली थी। दरअसल अक्तूबर 1967 को हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने 15 दिनों के भीतर 3 बार दल-बदलकर इस मुद्दे को राजनीतिक मुख्यधारा में ला खड़ा किया था।

इसी के साथ जल्द ही दलों को मिले जनादेश का उल्लंघन करने वाले सदस्यों को चुनाव में भाग लेने से रोकने तथा अयोग्य घोषित करने की ज़रूरत महसूस होने लगी। विभिन्न समितियाँ

  1. दिनेश गोस्वामी समिति

वर्ष 1990 में चुनावी सुधारों को लेकर गठित दिनेश गोस्वामी समिति ने कहा था कि दल-बदल कानून के तहत प्रतिनिधियों को अयोग्य ठहराने का निर्णय चुनाव आयोग की सलाह पर राष्ट्रपति/राज्यपाल द्वारा लिया जाना चाहिये। संबंधित सदन के मनोनीत सदस्यों को उस स्थिति में अयोग्य ठहराया जाना चाहिये यदि वे किसी भी समय किसी भी राजनीतिक दल में शामिल होते हैं।

  1. विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट:

वर्ष 1999 में विधि आयोग ने अपनी 170वीं रिपोर्ट में कहा था कि चुनाव से पूर्व दो या दो से अधिक पार्टियाँ यदि गठबंधन कर चुनाव लड़ती हैं तो दल-बदल विरोधी प्रावधानों में उस गठबंधन को ही एक पार्टी के तौर पर माना जाए। राजनीतिक दलों को व्हिप (Whip) केवल तभी जारी करनी चाहिये, जब सरकार की स्थिरता पर खतरा हो। जैसे- दल के पक्ष में वोट न देने या किसी भी पक्ष को वोट न देने की स्थिति में अयोग्य घोषित करने का आदेश।

  1. चुनाव आयोग का मत:

इस संबंध में चुनाव आयोग का मानना है कि उसकी स्वयं की भूमिका व्यापक होनी चाहिये। अतः दसवीं अनुसूची के तहत आयोग के बाध्यकारी सलाह पर राष्ट्रपति/राज्यपाल द्वारा निर्णय लेने की व्यवस्था की जानी चाहिये।

किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू(Kihoto Hollohan vs Zachillhu)

वर्ष 1993 के किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू वाद में उच्चतम न्यायालय ने फैसला देते हुए कहा था कि विधानसभा अध्यक्ष का निर्णय अंतिम नहीं होगा। विधानसभा अध्यक्ष का न्यायिक पुनरावलोकन किया जा सकता है। न्यायालय ने माना कि दसवीं अनुसूची के प्रावधान संसद और राज्य विधानसभाओं में निर्वाचित सदस्यों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन नहीं करते हैं। साथ ही ये संविधान के अनुच्छेद 105 और 194 के तहत किसी तरह से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन भी नहीं करते।

विधानसभा अध्यक्ष का निर्णय दुर्भावना, दुराग्रह, संवैधानिक जनादेश और प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध पाए जाने की स्थिति में न्यायिक पुनरावलोकन किया जा सकता है।

9वीं अनुसूची[सम्पादन]

  • जून 2020 को सर्वोच्च न्यायालय ने एक आरक्षण संबंधी मामले में अनुच्छेद-32 के तहत दायर याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि आरक्षण एक मौलिक अधिकार नहीं है। याचिका में तमिलनाडु में मेडिकल पाठ्यक्रमों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के अभ्यर्थियों को 50% आरक्षण नहीं देने के केंद्र सरकार के निर्णय को चुनौती दी गई थी।

याचिका में तमिलनाडु के शीर्ष नेताओं द्वारा वर्ष 2020-21 के लिये ‘राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा’ (National Eligibility Cum Entrance Test- NEET) में राज्य के लिये आरक्षित सीटों में से 50% सीटें ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ (OBC) हेतु आरक्षित करने के लिये केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की गई थी।

सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद आरक्षण संबंधी प्रावधानों को संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल करने से संबंधित मांग की जा रही है, ताकि उन्हें न्यायिक समीक्षा से संरक्षण प्रदान किया जा सके।

वर्तमान में संविधान की 9वीं अनुसूची में कुल 284 कानून (केंद्र और राज्य कानूनों)शामिल हैं, जिन्हें न्यायिक समीक्षा संरक्षण प्राप्त है अर्थात इन्हें अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है।

9वीं अनुसूची को वर्ष 1951 में प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से भारतीय संविधान में शामिल कर कुल 13 कानून उसी वर्ष शामिल किये गए थे। इन कानूनों को संविधान के अनुच्छेद 31B के तहत संरक्षण प्राप्त होता है।

9वीं अनुसूची प्रकृति में पूर्वव्यापी (Retrospective) है,अर्थात न्यायालय द्वारा असंवैधानिक घोषित होने के बाद भी यदि किसी कानून को नौवीं अनुसूची में शामिल किया जाता है तो वह उस तारीख से संवैधानिक रूप से वैध माना जाएगा। 9वीं अनुसूची की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भारतीय संविधान की 9वीं अनुसूची ऐतिहासिक रूप से भारत में हुए भूमि सुधार कानूनों से जुड़ी हुई है। भूमि सुधार शुरू हुए तो उन्हें मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के न्यायालयों में चुनौती दी गई, जिसमें से बिहार में न्यायालय ने इसे अवैध घोषित कर दिया था। इस विषय परिस्थिति से बचने और भूमि सुधारों को जारी रखने के लिये सरकार ने प्रथम संविधान संशोधन करने का फैसला किया। 8 मई, 1951 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने अनंतिम संसद में प्रथम संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया, जिसके पश्चात् 16 मई, 1951 को यह विधेयक चयन समिति को भेज दिया गया। चयन समिति की रिपोर्ट के बाद 18 जून, 1951 को राष्ट्रपति की मंज़ूरी के साथ ही यह विधेयक अधिनियम बन गया।

समीक्षा के दायरे में नौवीं अनुसूची

24 अप्रैल, 1973 को सर्वोच्च न्यायालय के केशवानंद भारती मामले में आए निर्णय के बाद संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल किये गए किसी भी कानून की न्यायिक समीक्षा हो सकती है। न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि नौवीं अनुसूची के तहत कोई भी कानून यदि मौलिक अधिकारों या संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन करता है तो उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकेगी। इस संविधान पीठ ने व्यवस्था दी कि किसी भी कानून को बनाने और इसकी वैधानिकता तय करने की शक्ति किसी एक संस्था पर नहीं छोड़ी जा सकती। संसद द्वारा बनाए गए कानूनों की व्याख्या न्यायपालिका को करनी है और उनकी वैधानिकता की जाँच संसद के बजाय न्यायालय ही करेगा। हालाँकि न्यायिक समीक्षा तभी संभव है जब कोई कानून मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करेगा या फिर संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन करता हो।

COVID-19 और संघवाद[सम्पादन]

आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 जिसके तहत केंद्र द्वारा राज्यों को COVID-19 संबंधी दिशा-निर्देश जारी किये जा रहे हैं, केंद्र सरकार के लिये राज्यों के साथ परामर्श को अनिवार्य करता है। किंतु केंद्र के हालिया कई निर्णयों में इस बाध्यता का पालन नहीं किया गया है। आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 11 के तहत एक 'राष्ट्रीय योजना' बनाने की परिकल्पना की गई है, साथ ही अधिनियम की धारा 11 (2) इस 'राष्ट्रीय योजना' को तैयार करने से पूर्व राज्य के परामर्श को अनिवार्य करता है। हालाँकि, केंद्र सरकार ने अभी तक ‘राष्ट्रीय योजना’ तैयार नहीं की है, इसके स्थान पर COVID-19 का मुकाबला करने के लिये केंद्र सरकार राज्यों को ‘तदर्थ बाध्यकारी दिशा-निर्देशों’ (Ad Hoc Binding Guidelines) जारी कर रही है। इस प्रकार के दिशा-निर्देश राज्य के परामर्श के विधायी जनादेश को दरकिनार करते हैं। केंद्र सरकार ने घोषणा की है कि वे निगम जिन्होंने PM-CARES फंड में दान दिया है, CSR छूट का लाभ उठा सकते हैं, किंतु मुख्यमंत्री राहत कोष में दान देने वाले लोग इसका लाभ प्राप्त नहीं कर सकते हैं। इस प्रकार यह निर्णय मुख्यमंत्री राहत कोष में दान को हतोत्साहित करता है और राज्यों को वित्तीय सहायता के लिये केंद्र पर और अधिक निर्भर बनाता है। इसके अतिरिक्त देश में लंबे समय तक शराब बिक्री पर रोक लगी रही, जिसके कारण राज्यों का राजस्व काफी कम हो गया है। हालाँकि अब देश भर के विभिन्न क्षेत्रों में शराब पर प्रतिबंध हटा दिये गए हैं। वहीं पेट्रोल और डीज़ल की शून्य बिक्री के कारण भी राज्यों को राजस्व की कमी का सामना करना पड़ रहा है। इन सभी कारणों के परिणामस्वरूप राज्यों के लिये वेतन, पेंशन और कल्याणकारी योजनाओं के खर्चों को उठाना अपेक्षाकृत काफी मुश्किल हो गया है।

संघवाद का अर्थ[सम्पादन]

संघवाद (Federalism) शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द ‘Foedus’ से हुई है जिसका अर्थ एक प्रकार के समझौते या अनुबंध से होता है। वास्तव में महासंघ दो तरह की सरकारों के बीच सत्ता साझा करने और उनके संबंधित क्षेत्रों को नियंत्रित करने हेतु एक समझौता होता है। संघवाद सरकार का वह रूप है जिसमें देश के भीतर सरकार के कम-से-कम दो स्तर मौजूद हैं- पहला केंद्रीय स्तर पर और दूसरा स्थानीय या राज्यीय स्तर पर।भारत की स्थिति में संघवाद को स्थानीय, केंद्रीय और राज्य सरकारों के मध्य अधिकारों के वितरण के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के संविधान विशेषज्ञ के. सी. व्हेअर (K.C. Wheare) के अनुसार, संघवाद पारंपरिक रूप से क्षेत्र विशिष्ट में एक देश की संघ और राज्य सरकारों की स्वतंत्रता का प्रतीक है।
सहकारी संघवाद में केंद्र व राज्य एक-दूसरे के साथ क्षैतिज संबंध स्थापित करते हुए एक-दूसरे के सहयोग से अपनी समस्याओं को हल करने का प्रयास करते हैं। सहकारी संघवाद की इस अवधारणा में यह स्पष्ट किया जाता है कि केंद्र और राज्य में से कोई भी किसी से श्रेष्ठ नहीं है।

यह राष्ट्रीय नीतियों के निर्माण और कार्यान्वयन में राज्यों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिये एक महत्त्वपूर्ण उपकरण है। संघ और राज्य संवैधानिक रूप से संविधान की 7वीं अनुसूची में निर्दिष्ट मामलों पर एक-दूसरे के साथ सहयोग करने हेतु बाध्य हैं।

प्रतिस्पर्द्धी संघवाद में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के मध्य संबंध लंबवत होते हैं जबकि राज्य सरकारों के मध्य संबंध क्षैतिज होते हैं। इसकी अवधारणा को देश में 1990 के दशक के आर्थिक सुधारों के बाद से महत्त्व प्राप्त हुआ।

प्रतिस्पर्द्धी संघवाद में राज्यों को आपस में और केंद्र के साथ लाभ के उद्देश्य से प्रतिस्पर्द्धा करनी होती है। सभी राज्य धन और निवेश को आकर्षित करने के लिये एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्द्धा करते हैं, ताकि विकास संबंधी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा सके है। सामान्यतः निवेशक अपने पैसे का निवेश करने के लिये अधिक विकसित राज्यों को पसंद करते हैं। उल्लेखनीय है कि प्रतिस्पर्द्धी संघवाद भारतीय संविधान की मूल संरचना का हिस्सा नहीं है।

आजादी के उपरांत से लेकर अब तक भारतीय संघवाद का स्वरूप बदलता रहा है। भारतीय राजनीति में कई ऐसे परिवर्तन हुए जिसने संघीय प्रणाली को कई स्तरों पर प्रभावित किया है इसके कारण देश में संघवाद के अलग-अलग चरण देखने को मिलते हैं।
  1. 1950 से 1967 तक लगभग पूरे देश में कांग्रेस का शासन रहा। योजना आयोग और राष्ट्रीय विकास परिषद जैसे संस्थानों ने केंद्र का महत्त्व बढ़ा दिया। इस समय एकदलीय आधिपत्य ने शक्ति के केंद्रीकरण को बहुत ज्यादा बढ़ा दिया, इसलिये इसे केंद्रीकृत संघवाद का काल कहा जाता है।
  2. 1967 से 1971 तक का काल कमज़ोर केंद्र, कमजोर राज्यों वाले संघ का चित्र प्रस्तुत करता है, क्योंकि केंद्र में बँटी कांग्रेस सशक्त नेतृत्व की तलाश में थी तो राज्यों में साझा सरकारें जीवित रहने के लिये प्रयासरत थी। केंद्र और राज्यों के बीच विभिन्न विवादों के बावजूद दोनों ही अपनी-अपनी कमजोरियों और मजबूरियों के कारण एक-दूसरे से टक्कर लेने की स्थिति में नहीं थीं। अतः इस काल को कुछ लोगों ने सहयोगी संघवाद की संज्ञा दी।
  3. 1971 से 1977 तक के काल को ‘एकात्मक संघवाद’ का काल कहा जाता है। 1971 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में देश में कांग्रेस पार्टी का राजनीतिक एकाधिकार स्थापित हो गया। इस समय न्यायपालिका की शक्ति में कमीं का प्रयास व राज्य सरकारों का इच्छानुसार गठन व पुनर्गठन किया गया।
  4. 1996 से 2014 तक होने वाले आम चुनावों से भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन आया और इन चुनावों के बाद के काल को सौदेबाजी वाली संघ व्यवस्था की संज्ञा दी गई।

संवैधानिक प्रावधान- केंद्र और राज्य संबंध केंद्र और राज्यों के बीच संबंधों का उल्लेख संविधान के भाग XI और XII में विधायी, प्रशासनिक तथा वित्तीय संबंधों के तहत किया गया है।

विधायी संबंध:-
  1. संघ सूची में 100 विषय शामिल हैं और यह तीनों सूचियों में सबसे बड़ी है। इस सूची से संबंधित विषयों पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र के पास होता है। रक्षा, रेलवे, पोस्ट और टेलीग्राफ, आयकर, कस्टम ड्यूटी, आदि इस सूची में शामिल कुछ महत्त्वपूर्ण विषय हैं।
  2. राज्य सूची में 61 विषय शामिल हैं। राज्यों के मध्य व्यापार, पुलिस, मत्स्य पालन, वन, स्थानीय सरकारें, थिएटर, उद्योग आदि और राज्यों के पास इन विषयों पर कानून बनाने की शक्ति है।
  3. समवर्ती सूची में 52 विषय शामिल हैं। स्टाम्प ड्यूटी, ड्रग्स एवं ज़हर, बिजली, समाचार पत्र, आपराधिक कानून, श्रम कल्याण जैसे कुल और संसद तथा राज्य विधानसभा दोनों इस सूची में शामिल विषयों पर कानून बना सकते हैं। परंतु किसी विषय पर संघ और राज्य के कानून के बीच टकराव की स्थिति में संघ के कानून को सर्वोपरि माना जाएगा।
प्रशासनिक संबंध:-संविधान के अनुच्छेद 256-263 तक केंद्र तथा राज्यों के प्रशासनिक संबंधों की चर्चा की गई है। प्रशासनिक संबंधों से तात्पर्य केंद्र व राज्यों की सरकारों के कार्यपालिका संबंधी तालमेल से होता है।
वित्तीय संबंध:-भारतीय संविधान के अनुच्छेद 268-293 तक केंद्र एवं राज्यों के मध्य वित्तीय संबंधों की व्याख्या की गई है। साथ ही संघ एवं राज्यों के मध्य वित्तीय संसाधनों का विभाजन किया गया है, जो कि भारत शासन अधिनियम, 1935 पर आधारित हैं।

अरुणाचल प्रदेश में जनवरी 2016 में राष्ट्रपति शासन लागू करने (जबकि राज्य में एक निर्वाचित सरकार थी) को भारत के संवैधानिक इतिहास में एक विचित्र घटना माना जाता है।

वर्तमान मुद्दे: वस्तु और सेवा कर के क्रियान्वयन के पश्चात् राज्यों ने अप्रत्यक्ष करों को लगाने की अपनी शक्तियाँ खो दीं है। इसके अतिरिक्त भारत में राज्य सरकार के पास आयकर और बिक्री कर लगाने की कोई शक्ति नहीं है। वर्तमान में केंद्र सरकार कुल कर राजस्व पूल का 52% अपने रखता है और शेष 48% सभी राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों को वितरित करता है।

सरकार के द्वारा राजकोषीय संघवाद के सुधार हेतु प्रयास[सम्पादन]

  • नीति आयोग के गवर्निंग काउंसिल में सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और संघशासित प्रदेशों के लेफ्रिटनेंट गवर्नर शामिल होते हैं। नीति आयोग न तो राज्यों से बिना पूछे योजनाओं का निर्माण करता है और न ही उन्हें राज्यों के ऊपर थोपने का काम करता है।

योजना आयोग की समाप्ति तथा इसके स्थान पर नीति आयोग का गठन। नीति आयोग राज्यों के प्रदर्शन हानि को मापने के लिये (स्वास्थ्य, शिक्षा और जलप्रबंधन) एक सूचकांक लेकर आया है ताकि राज्यों के सामाजिक कार्यक्रमों के परिणामों को जानने, एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्द्धा करने और नवाचारों को साझा करने में मदद मिल सके।

  • केंद्र-राज्य संबंधों को ध्यान में रखकर GST परिषद का गठन:-जी-एस-टी- भी राज्यों की राजकोषीय स्थिति पर बहुत अंतर डालेगा। जी.एस.टी. के बाद टैक्स वे राज्य सरकारें वसूल करेंगी जहाँ उत्पाद की खपत होती है। इसलिये उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे कम विकसित राज्यों को अधिक संसाधन मिलेंगे, क्योंकि वहाँ उपभोक्ताओं की बड़ी संख्या है। राज्य सरकारों के राजस्व के लिये अहम माने जाने वाले ईंधन, रीयल एस्टेट और आबकारी विभाग इससे अलग हैं। सरकार ने रॉयल्टी भुगतान के नियम भी बदले हैं। राज्यों को मिलने वाला वैट, मनोरंजन कर, लक्जरी टैक्स, लॉटरी टैक्स, एंट्री टैक्स, चुंगी इत्यादि अब समाप्त हो जाएंगे।

राजकोषीय विकेंद्रीकरण के उद्देश्य से राज्यों के खर्च पर केंद्र का नियंत्रण कम करना। 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों को लागू करना। ध्यातव्य है कि भारत में उपर्युक्त प्रयास ऐसे समय में किये जा रहे हैं जब भारत में मज़बूती से राजनीतिक केंद्रीकरण हो रहा है तथा विभिन्न क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की स्थिति कमज़ोर हुई है।

FRBM के बारे में एन.के. सिंह समिति ने एक राजकोषीय परिषद के गठन का सुझाव दिया है जो की एक स्वतंत्र निकाय होगा।
वैश्विक परिदृश्य:-
  1. भारत के विपरीत संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे बड़े लोकतांत्रिक देशों में राज्य सरकारों के साथ-साथ स्थानीय सरकारों को भी आयकर लगाने का अधिकार है।
  2. संयुक्त राज्य अमेरिका के अतिरिक्त ब्राज़ील, जर्मनी जैसे देश भी राज्य और स्थानीय स्तर पर आयकर एकत्र करते हैं।
14वें वित्त आयोग की सिफ़ारिश पर केंद्रीय करों के पूल से राज्यों को निधियों का हस्तांतरण 32 प्रतिशत से बढ़कर 42 प्रतिशत हो गया।

चौदहवें वित्त आयोग ने राजस्व-वितरण के फार्मूले में भी संशोधन का सुझाव दिया। जहाँ तेरहवें वित्त आयोग ने राजस्व वितरण में जनसंख्या का 25% भारांश दिया, वहीं 14वें वित्त आयोग ने इसे बढ़ाकर 27.5% कर दिया। 13वें वित्त आयोग ने 1971 की जनसंख्या को राजस्व वितरण का आधार बनाया, जबकि 14वें वित्त आयोग ने 17.5% भारांश 1971 की जनसंख्या को तथा 10%, 2011 की जनसंख्या को दिया, इसका फायदा उत्तर प्रदेश, बिहार सहित उन राज्यों को मिलेगा जहाँ की जनसंख्या अधिक है और जहाँ 1971-2011 के बीच जनसंख्या वृद्धि दर भी अन्य राज्यों के मुकाबले अधिक रही है। तेरहवें वित्त आयोग ने क्षेत्रफल को 10% भारांश दिया, जबकि 14वें वित्त आयोग 15% भारांश, इसका फायदा उन राज्यों को होगा जो बड़े आकार वाले हैं। तेरहवें वित्त आयोग ने राजकोषीय अनुशासन को 17.5 प्रतिशत भारांश दिया था लेकिन चौदहवें वित्त आयोग ने राजकोषीय अनुशासन की जगह वन-क्षेत्रों के विस्तार को 7.5% भारांश दिया जो सतत् विकास के प्रति उसकी आग्रहशीलता को प्रदर्शित करती थी। इसका लाभ आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक तथा जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों को मिलेगा।