सिविल सेवा मुख्य परीक्षा विषयवार अध्ययन/संसद और राज्य विधायिका

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विपक्ष का नेता[सम्पादन]
  • इसका मुख्य कार्य सरकार की नीतियों की रचनात्मक आलोचना करना और एक वैकल्पिक सरकार प्रदान करना है।
  • संसद में विपक्ष के नेता का वेतन और भत्ता अधिनियम, 1977 में इस पद को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि यह सरकार के विपक्ष में संख्यात्मक रूप से सबसे बड़े दल का नेता होता है जिसे स्पीकर/अध्यक्ष द्वारा मान्यता प्राप्त है।
  • भारतीय संसद के सदनों में विपक्ष का नेता एक वैधानिक पद होता है।
  • संसदीय प्रक्रिया के अनुसार, विपक्ष के नेता को जी.वी. मावलंकर द्वारा निर्धारित 10% नियम के अनुसार नियुक्त किया जाता है।
  • मावलंकर नियम के अनुसार, सदन की कुल सीटों के कम-से-कम 1/10 सीटों वाले सबसे सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को उस सदन में विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दी जाती है।
  • भारत के संविधान में विपक्ष का नेता पद का उल्लेख नहीं है। अतः कथन 2 सही नहीं है।
  • संसद में विपक्ष के नेता का वेतन और भत्ता अधिनियम, 1977 के अनुसार, उसे कैबिनेट मंत्री के समान वेतन, भत्ते और अन्य सुविधाएँ प्राप्त होती हैं। लेकिन उसे कैबिनेट मंत्री का दर्ज़ा नहीं दिया जाता।

सामूहिक उत्तरदायित्व यह सरकार की संसदीय प्रणाली का विशिष्ट सिद्धांत है। मंत्रिगण संसद, विशेष रूप से लोकसभा के प्रति (अनुच्छेद 75) सामूहिक रूप से उत्तरदायी होते हैं। सामूहिक उत्तरदायित्त्व के सिद्धांत का तात्पर्य है कि लोकसभा अविश्वास प्रस्ताव पारित कर मंत्रिपरिषद को हटा सकती है। संसद प्रश्नकाल, चर्चा, स्थगन प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव आदि जैसे विभिन्न उपकरणों के माध्यम से मंत्रियों पर नियंत्रण रखती है। संसद के निचले सदन (लोकसभा) को प्रधानमंत्री की सिफारिश के बाद राष्ट्रपति द्वारा भंग किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में मंत्रिपरिषद का कार्यकाल पूर्ण होने से पूर्व प्रधानमंत्री नए चुनाव के लिये राष्ट्रपति से लोकसभा भंग करने की सिफारिश कर सकता है। इसका अर्थ है कि संसदीय प्रणाली में विधायिका को भंग करने का अधिकार कार्यपालिका को प्राप्त है।भारत में सरकार की संसदीय प्रणाली काफी हद तक ब्रिटिश संसदीय प्रणाली (सरकार का वेस्टमिंस्टर स्वरूप) पर आधारित है। हालाँकि यह पूर्णत: ब्रिटिश प्रणाली की नकल नहीं है। ब्रिटिश संसदीय प्रणाली ‘संसदीय संप्रभुता’ के सिद्धांत पर आधारित है, जबकि भारत में संसद सर्वोच्च नहीं है क्योंकि यहाँ लिखित संविधान, संघीय प्रणाली, न्यायिक समीक्षा और मौलिक अधिकार जैसी विशेषताएँ इसकी शक्तियों को सीमित करती हैं।


  • अविश्वास प्रस्ताव: संसदीय प्रणाली में अविश्वास प्रस्ताव का निहितार्थ है कि सरकार अब पद पर बने रहने के लिये उपयुक्त नहीं है।

प्रक्रियाओं के अनुसार, एक अविश्वास प्रस्ताव केवल लोकसभा (या राज्य विधानसभा) में ही लाया जा सकता है। इसे राज्यसभा (या विधान परिषद) में नहीं लाया जा सकता है। लोकसभा में कार्य संचालन एवं आचरण नियमों के तहत नियम-198 के अनुसार, सदन का कोई भी सदस्य अविश्वास प्रस्ताव पेश कर सकता है। इसे पूरे मंत्रिपरिषद के विरूद्ध लाया जाता है न कि व्यक्तिगत रूप से किसी मंत्री या निजी सदस्य के विरूद्ध।

  1. विशेषाधिकार प्रस्ताव: यह किसी मंत्री द्वारा संसदीय विशेषाधिकारों के उल्लंघन से संबंधित है।

किसी सदस्य द्वारा इसे तब पेश किया जाता है जब उसे लगता है कि किसी मंत्री ने गलत तथ्य या सूचना देकर सदन या सदन के एक या एक से अधिक सदस्यों के विशेषाधिकार का उल्लंघन किया है। इसका उद्देश्य संबंधित मंत्री की निंदा करना है। संविधान के अनुच्छेद 105 में दो विशेषाधिकारों का उल्लेख किया गया है- संसद में भाषण देने की स्वतंत्रता और इसकी कार्यवाही के प्रकाशन का अधिकार। लोकसभा नियमावली के अध्याय 20 में नियम संख्या 222 तथा राज्यसभा नियमावली के अध्याय 16 में नियम 187 विशेषाधिकार को नियंत्रित करते हैं। कोई भी सदस्य, अध्यक्ष की अनुमति से किसी सदस्य या सदन या इसकी समिति के विशेषाधिकार के हनन से संबंधित प्रश्न उठा सकता है।

  1. स्थगन प्रस्ताव: स्थगन प्रस्ताव एक असाधारण प्रक्रिया है जो किसी गंभीर और महत्त्वपूर्ण समस्या पर चर्चा के लिये सदन में लाया जाता है। इस पर चर्चा करने के लिये सदन की समस्त नियमित कार्यवाही रोक दी जाती है यानी स्थगित कर दी जाती है।

सदन में नियमित कार्यवाही के स्थगन का प्रस्ताव लाने का अधिकार निम्नलिखित प्रतिबंधों के अधीन है- इसके माध्यम से ऐसे मुद्दों को उठाया जा सकता है जो कि निश्चित, तथ्यात्मक, अत्यंत ज़रूरी और लोक महत्त्व के हों। इसमें एक से अधिक मामलों को शामिल नहीं किया जाना चाहिये। इसके माध्यम से वर्तमान घटनाओं के किसी विशिष्ट विषय को ही उठाया जा सकता है न कि साधारण महत्त्व के विषय को। इसके माध्यम से विशेषाधिकार के प्रश्न को नहीं उठाया जा सकता है। इसके माध्यम से ऐसे किसी विषय पर चर्चा नहीं की जा सकती जिस पर उसी सत्र में चर्चा हो चुकी है। इसके द्वारा न्यायालय में विचाराधीन मामले को नहीं उठाया जा सकता। इसे किसी भी अलग प्रस्ताव के माध्यम से उठाए गए विषयों को पुन: उठाने की अनुमति नहीं होती है। चूँकि इसमें सरकार की निंदा का एक तत्त्व भी शामिल है, इसलिये राज्यसभा को इस प्रकार के प्रस्ताव का उपयोग करने की अनुमति नहीं है।

  1. निंदा प्रस्ताव: निंदा तीव्र असहमति अथवा कठोर आलोचना की अभिव्यक्ति को दर्शाता है। लोकसभा में इसे स्वीकार करने के कारण बताना अनिवार्य है। यह किसी एक मंत्री या मंत्रियों के समूह या पूरे मंत्रिपरिषद के विरुद्ध लाया जा सकता है।

यह मंत्रिपरिषद की कुछ नीतियों या कार्यों के खिलाफ निंदा के लिये लाया जाता है। यदि यह लोकसभा में पारित हो जाए तो मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना आवश्यक नहीं है।लोकसभा या राज्य विधान सभा में लाया जा सकता है। संसद में दो सदनों की आवश्यकता संसद के प्रत्येक निर्णय पर दूसरे सदन में पुनर्विचार हो जाता है। एक सदन द्वारा लिया गया प्रत्येक निर्णय दूसरे सदन के निर्णय के लिए भेजा जाता है अर्थात प्रत्येक विधेयक और नीति पर दो बार विचार होता है। इससे हर मुद्दे को दो बार जांचने का मौका मिलता है।यदि एक सदन जल्दबाजी में कोई निर्णय ले लेता है तो दूसरे सदन में बहस के दौरान उस पर पुनर्विचार संभव हो पाता है।[१] "...उच्च सदन पुनर्विचार करने के उपयोगी काम को अंजाम दे सकता है।और ...इसके विचारों का तो महत्व हो सकता है पर मतों का नहीं.. जो लोग सक्रिय राजनीति की उठा-पटक से दूर हैं वे.. निचले सदन को सलाह दे सकते हैं।"[२]


लोकसभा के 543 निर्वाचन क्षेत्र हैं यह संख्या 1971 से चली आ रही है।

राज्यसभा[सम्पादन]

निम्नलिखित पाँच असाधारण परिस्थितियों में संविधान संसद को राज्य सूची के विषय पर कानून बनाने की शक्ति देता है:

  • अनुच्छेद-249 के तहत राज्यसभा उपस्थित एवं मत देने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन से संकल्प पारित कर दे कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक है कि संसद, राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बनाए। इस तरह पारित कोई संकल्प 1 वर्ष तक प्रभावी रहेगा और इसे असंख्य बार आगे बढ़ाया जा सकता है लेकिन एक बार में एक वर्ष से अधिक के लिये आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। संकल्प के

प्रवृत्त न होने पर ऐसा निर्मित कोई कानून छह माह तक प्रभावी रहेगा।

  • अनुच्छेद 252 (राज्यों के अनुरोध की अवस्था में) के तहत यदि दो या अधिक राज्यों (एक राज्य नहीं) के विधानमंडल प्रस्ताव पारित करें कि राज्य सूची के मामले पर कानून बनाया जाए तब संसद उस विषय के संबंध में कानून बना सकती है। इस तरह के कानून में संशोधन या निरसन संसद द्वारा ही किया जा सकता है, न कि संबंधित राज्य के विधानमंडल द्वारा।
  • अनुच्छेद 253 के तहत अंतर्राष्ट्रीय संधि या समझौतों को लागू करने के लिये संसद राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बना सकती है।
  • अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान संसद राज्य की सूची से संबंधित मामलों पर कानून बना सकती है किंतु वित्तीय आपातकाल के दौरान नहीं।
  • अनुच्छेद 356 के तहत जब किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो तो संसद को संबंधित राज्य के लिये राज्य सूची पर कानून बनाने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। राष्ट्रपति शासन के उपरांत भी संसद द्वारा बनाया गया कानून प्रभावी रहता है।

संदर्भ[सम्पादन]

  1. पृ-104,भारत का संविधान सिद्धांत और व्यवहार
  2. पूर्णिमा बनर्जी, संविधान सभा वाद-विवाद, खंड 9,पृष्ठ 33