सिविल सेवा मुख्य परीक्षा विषयवार अध्ययन/स्थानीय शासन

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पेसा अधिनियम, 1996 ‘भूरिया समिति’ की सिफारिशों के आधार पर संसद में वर्ष 1996 में ‘पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रोंं का विस्तार) विधेयक’ प्रस्तुत किया गया। दिसंबर 1996 में दोनों सदनों से पारित होने के उपरांत 24 दिसंबर को राष्ट्रपति की सहमति के पश्चात् ‘पेसा अधिनियम’ अस्तित्व में आया।

  1. पेसा अधिनियम द्वारा ग्राम सभा एवं पंचायतों को प्रदत्त शक्तियाँ
  2. भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और विस्थापित व्यक्तियों के पुनर्वास में अनिवार्य परामर्श का अधिकार।
  3. एक उचित स्तर पर पंचायतों को लघु जल निकायों की योजना और प्रबंधन का कार्य सौंपा गया।
  4. एक उचित स्तर पर ग्राम सभा एवं पंचायतों द्वारा खान और खनिजों के लिये संभावित लाइसेंस, पट्टा, रियायतें देने के लिये अनिवार्य सिफारिशें करने का अधिकार।
  5. मादक द्रव्यों की बिक्री/खपत को विनियमित करने का अधिकार।
  6. लघु वनोपज का स्वामित्व।
  7. भूमि हस्तांतरण को रोकना और हस्तांतरित भूमि की बहाली।
  8. ग्रामीण हाट-बाजारों का प्रबंधन।
  9. अनुसूचित जनजाति को दिये जाने वाले ऋण पर नियंत्रण।

सरकार द्वारा ई-ग्राम स्वराज पोर्टल का शुभारंभ एक सराहनीय प्रयास है। अनुच्छेद-40 के अंतर्गत गांधी जी की कल्पना के अनुसार ही ग्राम पंचायतों के संगठन की व्यवस्था की गई।

24 अप्रैल-पंचायती राज दिवस

पंचायती राज व्यवस्था में विकास का प्रवाह निचले स्तर से ऊपरी स्तर की ओर करने के लिये वर्ष 2004 में पंचायती राज को अलग मंत्रालय का दर्ज़ा दिया गया। वर्तमान स्थिति

केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय ने वर्ष 2015-2016 में विकेंद्रीकृत रिपोर्ट जारी की थी जिसके अनुसार, देश में कोई भी ऐसा राज्य नहीं है जिसे पंचायतों को सशक्त करने के लिये100 अंक प्रदान किये जाएँ।

अधिकतर ग्राम पंचायतों के पास उनके अपने कार्यभवन नहीं हैं एवं कर्मचारियों का भी अभाव है। कुछ राज्यों जैसे-केरल, कर्नाटक में 11वीं अनुसूची के अंतर्गत शामिल 29 विषयों में लगभग 22-27 विषयों का हस्तांतरण पंचायतों को किया गया है लेकिन कुछ राज्यों जैसे-उत्तर प्रदेश में केवल 4-7 विषयों का हस्तांतरण किया गया है। राज्य सरकारों में पंचायतों को मज़बूत करने की राजनैतिक दृढ़ता का अभाव है

73वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में 11वीं अनुसूची जोड़ी गई और इसके तहत पंचायतों के अंतर्गत 29 विषयाें की सूची की व्यवस्था की गई।

पृष्ठभूमि

‘लाॅर्ड रिपन’ को भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक माना जाता है। वर्ष 1882 में उन्होंने स्थानीय स्वशासन संबंधी प्रस्ताव दिया जिसे स्थानीय स्वशासन संस्थाओं का ‘मैग्नाकार्टा’ कहा जाता है। वर्ष 1919 के भारत शासन अधिनियम के तहत प्रांतों में दोहरे शासन की व्यवस्था की गई तथा स्थानीय स्वशासन को हस्तांतरित विषयों की सूची में रखा गया।

स्वतंत्रता के पश्चात् वर्ष 1957 में योजना आयोग (अब नीति आयोग) द्वारा सामुदायिक विकास कार्यक्रम (वर्ष 1952) और राष्ट्रीय विस्तार सेवा कार्यक्रम (वर्ष 1993) के अध्ययन के लिये ‘बलवंत राय मेहता समिति’ का गठन किया गया। नवंबर 1957 में समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसमें त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था- ग्राम स्तर, मध्यवर्ती स्तर एवं ज़िला स्तर लागू करने का सुझाव दिया।
वर्ष 1958 में राष्ट्रीय विकास परिषद ने बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशें स्वीकार की तथा 2 अक्तूबर, 1959 को राजस्थान के नागौर ज़िले में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा देश की पहली त्रि-स्तरीय पंचायत का उद्घाटन किया गया।

वर्ष 1993 में 73वें व 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से भारत में त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्ज़ा प्राप्त हुआ।

भारत में त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम पंचायत (ग्राम स्तर पर), पंचायत समिति (मध्यवर्ती स्तर पर) और ज़िला परिषद (ज़िला स्तर पर) शामिल हैं।

74वें संविधान संशोधन अधिनियम की विशेषताएँ भारतीय संविधान में 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा दिया गया तथा इस संशोधन के माध्यम से संविधान में ‘भाग 9 क’ जोड़ा गया एवं यह 1 जून, 1993 से प्रभावी हुआ। अनुच्छेद 243त (243P) से 243यछ (243ZG) तक नगरपालिकाओं से संबंधित उपबंध किये गए हैं। संविधान के अनुच्छेद 243 (थ) में नगरपालिकाओं के तीन स्तरों के बारे में उपबंध हैं, जो इस प्रकार हैं- नगर पंचायत- ऐसे संक्रमणशील क्षेत्रोंं में गठित की जाती है, जो गाँव से शहरों में परिवर्तित हो रहे हैं। नगरपालिका परिषद- छोटे शहरों अथवा लघु नगरीय क्षेत्रोंं में गठित किया जाता है। नगर निगम- बड़े नगरीय क्षेत्रोंं, महानगरों में गठित की जाती है। इसके द्वारा संविधान में 12वीं अनुसूची जोड़ी गई जिसके अंतर्गत नगरपालिकाओं को 18 विषयों की सूची विनिर्दिष्ट की गई है। नगरपालिका की सभी सीटों को नगरपालिका निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन से चुने गए व्यक्तियों द्वारा भरा जाएगा। प्रत्येक नगरपालिका में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिये सीटें आरक्षित की जाएंगी। आरक्षित सीटों की संख्या एक-तिहाई से कम नहीं होगी। राज्य का विधानमंडल विधि द्वारा नगरपालिकाओं को कर लगाने और ऐसे करों, शुल्कों, टोल और फीस इत्यादि को उचित तरीके से एकत्र करने के लिये प्राधिकृत कर सकता है।

  1. 243-परिभाषाएं
  2. 243-A-ग्राम सभा
  3. B-पंचायतों का संविधान
  4. C-पंचायतों का गठन
  5. D-सीटों का आरक्षण
  6. E-पंचायतों का कार्यकाल
  7. F-सदस्यता से अयोग्यता
  8. G-पंचायतों की शक्तियाँ,प्राधिकार तथा उत्तरदायित्व
  9. H-पंचायतों की करारोपण की शक्ति
  10. I-वित्तीय स्थिति की समीक्षा के लिए वित्त आयोग का गठन
  11. J-पंचायतों के लेखा का अंकेक्षण
  12. K-पंचायतों का चुनाव
  13. L-संघीय पर लागू होना
  14. M-कतिपय मामलों में इस भाग का लागू नहीं होना
  15. N-पहले से विद्यमान कानूनों एवं पंचायतों का जारी रहना
  16. o-चुनावी मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप पर रोक

संविधान के अनुच्छेद-243K में पंचायतों के निर्वाचन के लिये एक राज्य निर्वाचन आयुक्त का प्रावधान है। यह भारत के चुनाव आयुक्त की तरह स्वायत्त एवं स्वतंत्र है। संविधान के अनुच्छेद-243 (I) में एक राज्य वित्त आयोग का प्रावधान है। राज्य का राज्यपाल प्रत्येक पाँच वर्ष पर एक राज्य वित्त आयोग का गठन करेगा। राज्य वित्त आयोग प्रदेश ओर स्थानीय शासन तथा ग्रामीण एवं शहरी शासन संस्थाओं के बीच राजस्व के बँटवारे का पुनरावलोकन करेगा।

भारत में स्थानीय शासन का विकास[सम्पादन]

  • 1882 के बाद अस्तित्व में आए स्थानीय शासन के निर्वाचित निकाय को उस समय मुकामी बोर्ड कहा जाता था लॉर्ड रिपन इस के जनक थे। गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1919 के बनने पर अनेक प्रांतों में ग्राम पंचायत बने।
  • भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में महात्मा गांधी ने जोर देकर कहा था कि आर्थिक और राजनीतिक सत्ता का विकेंद्रीकरण होना चाहिए इसके लिए ग्राम पंचायतों को मजबूत बनाना कारगर साधन है।
  • महात्मा गांधी का कथन भारत की आजादी का मतलब होना चाहिए समूचे भारत की आजादी ..आजादी की शुरुआत सबसे नीचे से होनी चाहिए। इस तरह हरगांव एक गणराज्य होगा..इसका मतलब यह कि हर गांव को आत्मनिर्भर और अपने मामलों को खुद निपटाने में काबिल होना पड़ेगा।अनगिनत गांव से बने इस ढांचे में आगे की ओर फैलते और ऊपर चढ़ते दायरे होंगे। जीवन एक पिरामिड की तरह होगा जिसमें सिर्फ आधार पर टिका होगा।
  • संविधान निर्माण के समय स्थानीय शासन को यथोचित महत्त्व नहीं मिला इसके कई कारण थे।पहला देश विभाजन की खलबली के कारण संविधान का झुकाव केंद्र को मजबूत बनाने का रहा। नेहरू खुद अति-स्थानीयता को राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए खतरा मानते थे।
  • दूसरा संविधान सभा में डॉक्टर बी.आर अंबेडकर के नेतृत्व में एक मजबूत आवाज उठ रही थी।जिसके अनुसार ग्रामीण भारत में जाति-पांति और आपसी फूट का बोलबाला है।स्थानीय शासन का उद्देश्य तो बड़ा अच्छा है लेकिन ग्रामीण भारत के ऐसे माहौल में यह उद्देश्य ही मटिया मेट हो जाएगा।
  • अनंतशयनम अयंगर, संविधान सभा वाद-विवाद,खंड 8 पृष्ठ 428,- लोकतंत्र के हक में गाँव को स्वशासन, यहां तक की स्वायत्तता हासिल करने की कला में प्रशिक्षित किया जा सकता है.. हमारे लिए जरूरी है कि हम गांव को सुधारने और वहाँ शासन के लोकतांत्रिक सिद्धांतों की जड़ जमाने में समर्थ हो..[१]

स्वतंत्र भारत में स्थानीय शासन[सम्पादन]

यद्यपि 73वें और 74 वें संशोधन के बाद स्धानीय शासन को मजबूत आधार मिला तथापि इससे पूर्व भी स्थानीय निकाय बनने के प्रयास हो चुके थे।सामुदायिक विकास कार्यक्रम (1952) और राष्ट्रीय विस्तार सेवा (1953) के कार्यकरण की जाँच करने और उनके बेहतर संचालन हेतु उपायों के संबंध में सुझाव देने के लिये भारत सरकार ने जनवरी 1957 में बलवंत राय मेहता की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की। समिति ने नवंबर 1957 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और 'लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण' को मूर्त रूप प्रदान करने हेतु पंचायती राज व्यवस्था या स्थानीय स्वशासन इकाईयों की स्थापना का सुझाव दिया।

1989 में बनी थुंगन समिति ने स्थानीय शासन व्यवस्था को संवैधानिक दर्ज़ा प्रदान करने की सिफारिश की। अतः 73वें और 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 एवं 1993 के द्वारा इसे संवैधानिक दर्ज़ा प्रदान किया गया। इन संस्थाओं को 1993 में संवैधानिक दर्ज़ा प्रदान किया गया। गाँव व ज़िला स्तर के शासन को स्थानीय शासन कहते हैं। स्थानीय हित और स्थानीय ज्ञान लोकतांत्रिक फैसला लेने के अनिवार्य घटक हैं। जीवंत और मज़बूत स्थानीय शासन सक्रिय भागीदारी और उद्देश्यपूर्ण जवाबदेहिता को सुनिश्चित करता है।
पंचायती राज प्रणाली का सबसे मूल उद्देश्य विकास और लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण में लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना है। वित्तीय संग्रहण पंचायती राज का मूल उद्देश्य नहीं है, हालाँकि इसमें स्थानीय सरकार को वित्त और संसाधन हस्तांतरित करने की व्यवस्था की गई है। पंचायती राज संस्थाओं की स्थापना से स्वतः राजनीतिक जवाबदेही नहीं आती।

73वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992 ग्रामीण स्थानीय शासन से संबंधित है, जबकि 74वां संविधान संशोधन अधिनियम 1993 शहरी स्थानीय शासन से संबंधित है। ये दोनों अधिनियम सन् 1993 में लागू हुए। पंचायती राज-व्यवस्था का ढाँचा त्रि-स्तरीय है, ग्राम पंचायत, मण्डल/तालुका पंचायत और ज़िला पंचायत। जो प्रदेश आकार में छोटे हैं वहाँ मण्डल या तालुका पंचायत यानी मध्यवर्ती स्तर की आवश्यकता नहीं होती।मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत का गठन नहीं हो सकता यदि उस राज्य की जनसंख्या 20 लाख से कम हो संविधान के 73वें संविधान संशोधन के द्वारा ग्राम पंचायत को बनाना अनिवार्य कर दिया गया है। पंचायती हलके में मतदाता के रूप में पंजीकृत हर वयस्क व्यक्ति ग्राम सभा का सदस्य होता है।


पंचायत के तीनों स्तर के चुनाव सीधे जनता करती है। हर पंचायती निकाय की अवधि पाँच साल की होती है। यदि सरकार पंचायत को भंग कर देती है तो 6माह के भीतर पुनः चुनाव करवाना अनिवार्य है। 73वें संविधान संशोधन से पहले कई प्रदेशों में ज़िला पंचायती निकायों के चुनाव अप्रत्यक्ष रीति से होते थे।

संविधान का अनुच्छेद 243(D) पंचायत व्यवस्था में आरक्षण से सम्बंधित है। सभी पंचायत संस्थाओं में सामान्य श्रेणी के साथ-साथ अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में भी एक-तिहाई सीट महिलाओं के लिये आरक्षित की गई हैं।

11वीं अनुसूची में 29 विषय सम्मिलित हैं?

  1. लघु सिंचाई, जल प्रबन्धन एवं जल संचय का विकास
  2. पेयजल
  3. गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम
  4. शिक्षा (प्राथमिक तथा माध्यमिक स्तर की)
  5. तकनीकी प्रशिक्षण एवं व्यावसायिक शिक्षा
  6. लघु उद्योग (खाद्य-प्रसंस्करण सहित)
  7. स्वास्थ्य और साफ-सफाई, इसमें अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र शामिल हैं।
  8. परिवार-नियोजन, महिला एवं बाल विकास
  9. सामाजिक कल्याण
  10. कमज़ोर तबके का कल्याण


संघ एवं राज्य लोक सेवा आयोग में पूछे गए प्रश्न[सम्पादन]

  1. सुशिक्षित और व्यवस्थित स्थानीय स्तर शासन व्यवस्था की अनुपस्थिति में पंचायतें और समितियां मुख्यतः राजनीतिक संस्थाएं बनी रही हैं,न कि शासन के प्रभावी उपकरण।समालोचनापूर्वक चर्चा कीजिए।(200शब्द,12.5अंक)सिविल सेवा परीक्षा2015।
  2. भारतीय संविधान के 73 वाँ संशोधन की माता पर प्रकाश डालिए। [सिविल सेवा परीक्षा 1998]


संदर्भ[सम्पादन]

  1. भारत का संविधान सिद्धांत और व्यवहार 11वीं NCERT,पृ-179-181