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हमारा पर्यावरण/मानवीय पर्यावरण

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मनवीय पर्यावरण:बस्तियाँ,परिवहन एवं संचार

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बस्तियाँ,वे स्थान हैं जहाँ लोग अपने लिए घर बनाते हैं। परिवहन दक्षिणी अफ़ीका के ऐंडीज पर्वत के क्षेत्र में लामा का उपयोग उसी तरह होता है,जैसे तिब्बत में याक का उपयोग होता है। जा़यनिंग से ल्हासा के बीच चलने वाली रेलगाड़ी समुद्रतल से 4000 मीटर की ऊँचाई पर चलती है।ट्रांससाइबेरियन रेलमार्ग विश्व में सबसे लंबा रेलमार्ग है,जिसका सबसे ऊँचा बिंदु समुद्र तल से 5072 मीटर है।,जो पश्चिमी रूस में सेट पीटर्सबर्ग से प्रशांत महासागरीय तट पर स्थिर ब्लादिबोस्टक तक। अंतर्देशीय जलमार्ग के उदाहरण-गंगा-ब्रह्णपुत्र नदी तंत्र,उतरी अमेरिका में ग्रेट लेक एवं अफ्रीका में नील नदी तंत्र।

मानव-पर्यावरण अन्योन्यक्रिया:उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्ण प्रदेश

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आमेजन बेसिन में जीवन
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आमेजन नदी 10° उत्तर से 10° दक्षिण के मध्य भाग में स्थित भूमध्यरेखीय प्रदेश से होकर बहती है।यह पश्चिम में पर्वतों से निकलकर पूर्व में अंधमहासागर में पहुँचती है। जिस स्थान पर कोई नदी किसी अन्य जल राशि में मिलती है उसे नदी का मुहाना कहते हैं।आमेजन नदी में बहुत सारी सहायक नदियाँ मिलकर अमेजन बेसिन का निर्माण करती हैं,जो ब्राजील,पेरू,बोलीविया,इक्वाडोर,कोलंबिया तथा वेनेजुएला के छोटे भाग से अपवाहित होती है।

जलवायु भूमथ्य रेखा के आस-पास फैले अमेजन बेसिन में पूरे वर्ष गर्म एवं नम जलवायु रहती है।यहाँ का मौसम दिन एवं रात दोनों हीं समय लगभग समान रूप से गर्म एवं आर्द्र होता है।तथा शरीर में चिपचिपाहट महसूस होती है।इस प्रदेश में लगभग प्रतिदिन वर्षा बिना किसी पूर्व चेतावनी के होती है।दिन का तापमान उच्च एवं आर्द्रता अति उच्च होती है।रात के समय तापमान कम हो जाता है लेकिन आर्द्रता वैसी ही बनी रहती है।

वर्षा वन अत्यधिक वर्षा के कारण यहाँ की भूमि पर सघन वन उग जाते हैै।वनों के अत्यधिक सघनता के कारण पत्तियों तथा शाखाओं से छत सी बन जाती है जिसके कारण सूर्य का प्रकाश धरातल तक नहीं पहुँच पाता है।यहाँ की भूमि प्रकाश रहित एवं नम बनी रहती है। यहाँ केवल वही वनस्पति पनप सकती है जिसमें छाया में बढ़ने की क्षमता हो।परजीवी पौधों के रूप में यहाँ आर्किड एवं ब्रोमिलायड पैदा होते हेैं।वर्षा वन में प्राणिजात की प्रचुरता होती है।टूकन,गुंजन पक्षी ,रंगीन पक्षित वाले पक्षी एवं भोजन के लिए बड़ी चोंच वाले विभिन्न प्रकार के पक्षी जो भारत में पाए जानेवाले सामान्य पक्षियों से भिन्न होते हैं यहाँ पाए जाते हैं।प्राणियों में बंदर,स्लॉथ एवं चीटीें खाने वाले टैपीर भी यहाँ पाए जाते हैं।मगर,साँप,अजगर तथा एनाकोंड़ा एवं बोआ जैसे प्रजातियाँ हैं। मांस खानेवाले पिरान्या मत्स्य समेत मछलियों की विभिन्न प्रजातियाँ भी यहाँ पाई जाती हैं। वर्षावन के निवासी यहाँ के पुरुष शिकार तथा नदी में मछली पकड़ते हैं।जबकि महिलाएँ फसलों का ध्यान रखती हैं।वे मुख्यत:टेपियोका,अनन्नास एवं शकरकंद "कर्तन एवं दहन कृषि पद्धति" से उगाते हैं।क्योंकि मछली या शिकार मिलना अनिश्चित होता है ऐसे में महिलाएँ ही अपनी उगाई शाक-सब्जियों से अपने परिवार का भरण करती हैं। मोनियोक इनका मुख्य आहार है,जिसे कसावा भी कहते हैं। यह आलू की तरह जमीन के अंदर पैदा होता है। ये चींटियों की रानी एवं अंडकोष भी खाते हैं। कॉफी,मक्का एवं कोको जैसी नगदी फसल भी उगाई जाती हैं।

ये मधुमक्खी के छत्ते के आकार वाले छप्पर के घरों में रहते हैं।जबकि कुछ लोग 'मलोका' कहे जाने वाले बड़े अपार्टमेंट जैसे घरों में रहते हैं जिनकी छत तीव्र ढलान वाली होती हैं।यहाँ के लोगों का जीवन धीरे -धीरे बदल रहा है।पुराने समय में वन के अंदर पहुँचने के लिए नदी मार्ग ही एकमात्र उपाय था।1970 में ट्रांस अमेजन महामार्ग बनने से वर्षावन के सभी भागों तक पहुँचना संभव हो गया। अब अनेक स्थानों तक पहुँचने के लिए हवाईजहाजों तथा हेलीकॉप्टरों का उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया के फलस्वरूप वहाँ के मूल आबादी को उस क्षेत्र से बाहर निकलकर नए क्षेत्र में बसना पड़ा जहाँ वे अपने पौराणिक तरीके से खेती करते रहे हैं।

गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन में जीवन
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यह 10° उत्तर से 10°दक्षिण अक्षांश के मध्य स्थित है।घाघरा,सोन,चंबल,गंडक,कोसी जैसी गंगा एवं ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियाँ इसमें अपवाहित होती हैं। गंगा एवं ब्रह्मपुत्र के मैदान,पर्वत एवं हिमालय के गिरिपाद तथा सुंदरवन डेल्टा इस बेसिन की मुख्य विशेषताएँ हैं।मैदानी क्षेत्र में अनेक चापझील पाई जाती हैं।यहाँ की जलवायु मुख्यत:मानसूनी हैं।मानसून में मध्य जून से मध्य सितंबर के बीच वर्षा होती है।ग्रीष्म ऋतु में गर्मी एवं शीत ऋतु में ठंड होती है।तीव्र ढ़ालवाले पर्वतीय क्षेत्र बसने के लिए प्रतिकूल हैं,जबकि मैदानी क्षेत्र मानव प्रवास के लिए सबसे उपयुक्त है।धान यहाँ की मुख्य फसल।गेहूँ,मक्का,ज्वार,चना एवं बाजरा यहाँ की अन्य प्रमुख फसल।गन्ना एवं जूट जैसी नगदी फसलें तथा केले के बागान भी उगायी जाती हैं।।पश्चिम बंगाल एवं असम में चाय के बागान।बिहार एवं असम के कुछ भागों में सिल्क के कीड़ों का संवर्धन कर सिल्क का उत्पादन किया जाता है।मंद ढ़ाल वाले पर्वतों एवं पहाड़ियों पर वेदिकाओं में फसलें उगायी जाती हैं। गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदानों में सागवान,साखू एवं पीपल के साथ उष्णकटिबंधीय पर्णपाती पेड़ भी पाए जाते हैं।घने बाँस के घने झुरमुट तथा मैंग्रोव वन पाए जाते हैं।उत्तराखंड,सिक्किम एवं अरुणाचल प्रदेश की ठंडी जलवायु एवं तीव्र ढ़ाल वाले भागों में चीड़,देवदार एवं फर जैसे शंकुधारी पेड़ पाए जाते हैं।

डेल्टा क्षेत्र में बंगाल टाइगर,मगर एवं घड़ियाल पाए जाते हैं।रोहू,कतला एवं हिलसा मछलियों की सबसे लोकप्रिय प्रजातियाँ हैं। मछली एवं चावल इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों का मुख्य आहार है। इलाहाबाद,कानपुर,वाराणसी ,लखनऊ,पटना एवं कोलकाता जैसे 10लाख से अधिक आबादी वाले शहर गंगा नदी के तट पर स्थित हैं। कोलकाता हुगली नदी पर स्थित एक महत्वपूर्ण पत्तन हैं।


महत्वपूर्ण तथ्य
जब स्पेन के अन्वेषकों ने इस नदी की खोज की तब सिर पर सुरक्षा कवच एवं घास के स्कर्ट पहने कुछ स्थानीय आदिवासियों ने उन पर आक्रमण किया।इन आक्रमणकारियों ने उन्हें प्राचीन रोमन साम्राज्य के अमेजोंस नामक महिला योद्धाओं के आक्रामक समूह की याद दिला दी।इस प्रकार यहाँ का नाम अमेज़न पड़ा।
ब्रोमिलायड'एक विशेष प्रकार का पौधा है जो अपनी पत्तियों में जल को संचित रखता है।मेढ़क जैसे प्राणी इन जल के पॉकेट का उपयोग अंड़ा देने के लिए करते हैं।
'कर्तन एवं दहन पद्धति' में वृक्षों एवं झाड़ियों के जलाने से पोषक तत्व मिट्टी में मिल जाते हैं।परंतु जमीन के इस टुकड़े के बार-बार प्रयोग से मिट्टी में पोषक तत्वों का अभाव हो जाता है।
वेदिकाओं का निर्माण खड़ी ढलानों पर समतल सतह बनाकर कृषि करने के लिए होता है।ढ़लान को इसलिए हटाया जाता है कि जल का प्रवाह तीव्रता से न हो।
गंगा एवं ब्रह्मपुत्र नदी के अलवण जल में अंधी डॉल्फिन(सुसु) पाई जाती है।इसकी उपस्थिति से जल की शुद्धता का पता चलता है।रसायन की अत्यधिक मात्रा वाले गैर उपचारित औद्योगिक एवं शहरी गंदगी इन प्रजातियों को नष्ट कर रहे हैं।
सार्वभौमिक स्वच्छता कवरेज प्राप्त करने और स्वच्छता पर ध्यान केंद्रित करने के प्रयासों में तेजी लाने के लिए 2 अक्टूबर 2014 को'स्वच्छ भारत मिशन'का शुभारंभ किया।