हिंदी 'ख' गद्य का उद्भव और विकास/अंधेर नगरी

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अंधेर-नगरी

चौपट्ट राजा टके सेर भाजी टके सेर खाजा

पहला अंक[सम्पादन]

स्थान––बाह्य प्रांत (महंतजी दो चेलों के साथ गाते हुए आते हैं)

सब––राम भजो राम भजो राम भजो भाई।
राम के भजे से गनिका तर गई,
राम के भजे से गीध गति पाई।
राम के नाम से काम बनै सब,
राम के भजन बिनु सबहि नसाई।
राम के नाम से दोनों नयन बिनु,
सूरदास भए कविकुल-राई॥
राम के नाम से घास जंगल की,
तुलसीदास भए भजि रघुराई॥

महँत––बच्चा नारायणदास, यह नगर तो दूर से बड़ा सुंदर दिखलाई पड़ता है! देख, कुछ भिच्छा-उच्छा मिले तो ठाकुरजी को भोग लगै। और क्या।

नारायण॰––गुरुजी महाराज, नगर तो नारायण के आसरे से बहुत ही सुंदर है जो है सो, पर भिच्छा सुंदर मिले तो बड़ा आनंद होय।

महंत––बच्चा गोबरधनदास, तू पच्छिम की ओर से जा और नारायणदास पूरब की ओर जायगा। देख, जो कुछ सीधा-सामग्री मिले तो श्रीशालग्रामजी का बालभोग सिद्ध हो।

गोबरधन॰––गुरुजी, मैं बहुत सी भिच्छा लाता हूँ। यहाँ के लोग तो बड़े मालवर दिखलाई पड़ते हैं। आप कुछ चिंता मत कीजिए ।..

महंत––बहुत लोभ मत करना। देखना, हाँ––

लोभ पाप को मूल है, लोभ मिटावत मान।
लोभ कभी नहिं कीजिए, यामैं नरक निदान॥

(गाते हुए सब जाते हैं)

दूसरा अंक[सम्पादन]

स्थान—बाजार

कबाबवाला––कबाब गरमागरम मसालेदार––चौरासी मसाला बहत्तर आँच का––कबाब गरमागरम मसालेदार––खाय सो होंठ चाटै, न खाय सो जीभ काटै। कबाब लो, कबाब का ढेर––बेचा टके सेर।

घासीराम––चने जोर गरम––

चने बनावै घासीराम। जिनकी झोली में दूकान॥
चना चुरमुर चुरमुर बोले। बाबू खाने को मुंह खोलै॥
चना खाधैं तौकी, मैना। बोलैं अच्छा बना चबैना॥
चना खायँ गफूरन, मुन्ना। बोलैं और नहीं कुछ सुन्ना॥
चना खाते सब बंगाली। जिनकी धोती ढीली-ढाली॥
चना खाते मियाँ जुलाहे। डाढ़ी हिलती गाह बगाहे॥
चना हाकिम सब जो खाते। सब पर दूना टिकस लगाते॥

चने जोर गरम-टके सेर।

नरंगीवाली––नरंगी ले नरंगी––सिलहट की नरंगी, बुटवल की नरंगी। रामबाग की नरंगी, आनंदबाग की नरंगी। भई नीबू से नरंगी। मैं तो पिय के रंग न रंगी। मैं तो भूली लेकर संगी। नरंगी ले नरंगी। कँवला नीबू, मीठा [  ]नीबू, रंगतरा, संगतरा। दोनों हाथों लो––नहीं पीछे हाथ ही मलते रहोगे। नरंगी ले नरंगी। टके सेर नरंगी।

हलवाई––जलेबियाँ गरमागरम। ले सेव इमरती लड्डु, गुलाब जामुन खुरमा बुंदिया बरफी समोसा पेड़ा कचौड़ी दालमोट पकौड़ी घेघर गुपचुप। हलुबा ले हलुा मोहनभोग। मोयनदार कचौड़ी कचाका हलुआ नरम चभाका। घी में गरक चीनी में तरातर चासनी में चभाचभ। ले भूर का लड्डु। जो खाय सो भी पछताय। जो न खाय सो भी पछताय। रेवड़ी कड़ाका। पापड़ पड़ाका। ऐसी जात हलवाई जिसके छत्तिस कौम हैं भाई। जैसे कलकत्ते के विलसन मंदिर के भितरिए, वैसे अंधेर-नगरी के हम। सब सामान ताजा। खाजा ले खाजा। टके सेर खाजा।

कुँजडिन––ले धनिया मेथी सोप्रा-पालक चौराई बथुषा करेमू नोनियाँ कुलफा कसारी चना सरसों का साग। मरसा ले मरसा। ले बैगन लौना कोहड़ा आलू अरुई बंडा नेनुऑ सूरन रामतरोई तरोई मुरई। ले आदी मिरचा लहसुन पियाज टिकोरा। ले फालसा खिरनी आम अमरूत निबुधा मटर होरहा। जैसे काजी वैसे पाजी। रैयत राजी टके सेर भाजी। ले हिंदुस्तान का मेवा फूट और बैर। [ ६४८ ]मुगल––बादाम पिस्ते अखरोट अनार बिहीदाना मुनक्का किश मिश अंजीर श्राबजोश पालूबोखारा चिलगोजा सेब नाशपाती बिही सरदा अंगूर का पिटारी। प्रामारा ऐसा मुल्क जिसमें अँगरेज का भी दॉत कट्टा औ गया। नाहक को रुपया खराब किया बेवकूफ बना*‌।हिंदोस्तान का आदमी लक-लक हमारे यहाँ का आदमी बुंबक बुंबक। लो सब मेवा टके सेर।

पाचकवाला––

चूरन अलमबेद का भारी। जिसको खाते कृष्ण मुरारी॥
मेरा पाचक है पचलोना। जिसको खाता श्याम सलोना॥
चूरन बना मसालेदार। जिसमें खट्टे की बहार॥
मेरा चूरन जो कोइ खाय। मुझको छोड़ कहीं नहिं जाय॥
हिंदू चूरन इसका नाम। बिलायत पूरन इसका काम॥
चूरन जब से हिंद में पाया। इसका धन बल सभी घटाया॥
चूरन ऐसा हट्टा-कट्टा। कीना दॉत सभी का खट्टा॥
चूरन चला डाल की मंडी। इसको खाएँगी सब रंडी॥
चूरन अमले सब जो खावै। दूनी रिशवत तुरत पचावै॥
चूरन नाटकवाले खाते। इसकी नकल पचाकर लाते॥
चूरन सभी महाजन खाते। जिससे जमा हजम कर जाते॥
चूरन खाते लाला लोग । जिनको अकिल अजीरन रोग॥
चूरन खावै एडिटर जात। जिनके पेट पचै नहिं बात॥
चूरन साहेब लोग जो खाता। सारा हिंद हजम कर जाता॥
चूरन पूलिसवाले खाते। सब कानून हजम कर जाते॥

ले चूरन का ढेर, बेचा टके सेर।

मछलीवाली––मछरी ले मछरी।

मछरिया एक टके कै बिकाय।
लाख टका कै बाला जोबन, गॉहक सब ललचाय॥
नैन-मछरिया रूप-जाल में, देखत ही फँसि जाय।
बिनु पानी मछरी सो बिरहिया, मिले बिना अकुलाय॥

जातवाला (ब्राह्मण)––जात ले जात, टके सेर जात। एक टका दो, हम अभी अपनी जात बेचते है। टके के वास्ते ब्राह्मण से धोबी हो जायँ और धोबी को ब्राह्मण कर दें, टके के वास्ते जैसी कहो वैसी व्यवस्था दें। टके के वास्ते झूठ को सच करें। टके के वास्ते ब्राह्मण से मुसलमान, टके के वास्ते हिंदू से क्रिस्तान। टके के वास्ते धर्म और प्रतिष्ठा दोनों बेचें, टके के वास्ते झूठी गवाही दें। टके के वास्ते पाप को पुण्य माने, टके के वास्ते नीच को भी पितामह बनायें। वेद धर्म कुल-मरदी सचाई-बड़ाई सब टके सेर। लुटाय दिया अनमोल माल। ले टके सेर।

बनियाँ––आटा दाल लकड़ी नमक घी चीनी मसाला चावल ले टके सेर। [ ६५० ](बाबाजी का चेला गोबरधनदास पाता है और सब बेचनेवालों की आवाज सुन-सुनकर खाने के आनंद में बडा प्रपन्न होता है)

गोबरधन०––क्यों भाई बनिये, आटा कितने सेर?

बनियाँ––टके सेर।

गोबरधन०––औ चावल?

बनियाँ––टके सेर।

गोबरधन०––औ चीनी?

बनियाँ––टके सेर।

गोबरधन०––औ धी?

बनिया––टके सेर।

गोबरधन––सब टके सेर! सचमुच।

बनियाँ––हॉ महाराज, क्या झूठ बोलूँगा?

गोबरधन०––(कुंजड़िन के पास जाकर) क्यो माई, भाजी क्या भाव?

कुंजडिन––बाबाजी, के सेर। निनुआ मुरई धनियाँ मिरचा साग सब टके सेर।

गोबरधन०––सब भाजी टके सेर! वाह-वाह! बड़ा आनंद है। यहाँ सभी चीज टके सेर। (हलवाई के पास जाकर) क्यों भाई हलवाई! मिठाई कितने सेर?

हलवाई––बाबाजी! लडुआ हलुआ जलेबी गुलाबजामुन खाजा सब टके सेर। [ ६५१ ]गोबरधन०––वाह! वाह!! बड़ा आनंद है। क्यों बच्चा, मुझसे मसखरी तो नहीं करता? सचमुच सब टके सेर?

हलवाई––हाँ बाबाजी, सचमुच सब टके सेर। इस नगरी की चाल ही यही है। यहाँ सब चीज टके सेर बिकती है।

गोबरधन०––क्यों बच्चा! इस नगरी का नाम क्या है? हलवाई-अंधेरनगरी।

गोबरधन०––और राजा का क्या नाम है?

हलवाई––चौपट्ट राजा।

गोबरधन०––वाह! वाह! अंधेर नगरी चौपट्ट राजा, टका सेर भाजी टका सेर खाजा। ( यही गाता है और प्रानंद से बगल बजाता है)

हलवाई––तो बाबाजी, कुछ लेना-देना हो तो लो-दो।

गोबरधन०––बच्चा, भिक्षा मांगकर सात पैसे लाया हूँ, साढ़े तीन सेर मिठाई दे दे, गुरु-चेले सब आनंदपूर्वक इतने में छक जायँगे।

(हलवाई मिठाई तौलता है––बाबाजी मिठाई लेकर खाते हुए और अंधेरनगरी गाते हुए जाते हैं)

(जवनिका गिरती है)

तीसरा अंक[सम्पादन]

स्थान-जंगल

(महंतजी और नारायणदास एक ओर से "राम भनो" इत्यादि गाते हुए आते हैं और दूसरी ओर से गोबरधनदास 'अधेरनगरी' गाते हुए आते हैं) महंत––बच्चा गोबरधनदास! कह, क्या भिक्षा लाया? गठरी तो भारी मालूम पड़ती है।

गोबरधन०-बाबाजी महाराज! बड़े माल लाया हूँ, साढ़े तीन सेर मिठाई है।

महंत––देखू बच्चा! (मिठाई की झोली अपने सामने रखकर खोलकर देखता है) वाह! वाह! बच्चा! इतनी मिठाई कहाँ से लाया? किस धर्मात्मा से भेंट हुई?

गोबरधन०––गुरुजी महाराज! सात पैसे भीख में मिले थे, उसी से इतनी मिठाई मोल ली है।

महंत––बच्चा! नारायणदास ने मुझसे कहा था कि यहाँ सब चीज टके सेर मिलती है, तो मैंने इसकी बात का विश्वास नहीं किया। बच्चा, यह कौन सी नगरी है और इसका कौन सा राजा है, जहाँ टके सेर भाजी और टके ही सेर खाजा है? [ ६५३ ]गोबरधन०––अंधेरनगरी चौपट्ट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा।

महंत––तो बच्चा! ऐसी नगरी में रहना उचित नहीं है, जहाँ टके सेर भाजी और टके ही सेर खाजा हों।

दोहा

सेत सेत सब एक से, जहाँ कपूर कपास।
ऐसे देस कुदेस में, कबहुँ न कीजै बास॥
कोकिल बायस एकसम, पंडित मूरख एक।
इंद्रायन दाडिम विषय जहाँ न नेकु बिबेक॥
बसिए ऐसे देस नहि, कनक-वृष्टि जो होय।
रहिए तो दुख पाइए, प्रान दीजिए रोय॥

सो बच्चा चलो यहाँ से। ऐसी अंधेरनगरी में हजार मन मिठाई मुरू को मिले तो किस काम की? यहाँ एक छन नहीं रहना।

गोबरधन०––गुरुजी, ऐसा तो संसार भर में कोई देस ही नहीं है। दो पैसा पास रहने ही से मजे में पेट भरता है। मैं तो इस नगर को छोड़कर नहीं जाऊँगा। और जगह दिन भर मॉगो तो भी पेट नहीं भरता। वरंच बाजे-बाजे दिन उपास करना पड़ता है। सो मैं तो यहीं रहूँगा।

महंत––देख बच्चा, पीछे पछतायगा। [ ६५४ ]गोबरधन०––आपकी कृपा से कोई दुख न होगा; मैं तो यही कहता हूँ कि आप भी यहीं रहिए।

महंत––मैं तो इस नगर में अब एक क्षण भर नहीं रहूँगा। देख, मेरी बात मान, नहीं पीछे पछताएगा। मैं तो जाता हूँ, पर इतना कहे जाता हूँ कि कभी संकट पड़े तो हमारा स्मरण करना।

गोबरधन०––प्रणाम गुरुजी, मैं आपका नित्य ही स्मरण करूँगा। मैं तो फिर भी कहता हूँ कि आप भी यहीं रहिए।

(महंतनी नारायणदास के साथ जाते हैं, गोबरधनदास बैठकर मिठाई। खाता है)

(जवनिका गिरती है)

चौथा अंक[सम्पादन]

स्थान––राजसभा (राजा, मंत्री और नौकर लोग यथास्थान स्थित है)

एक सेवक––(चिल्लाकर) पान खाइए, महाराज।

राजा––(पीनक से चौंक के घबड़ाकर उठता है) क्या कहा? सुपनखा आई ए महाराज। (भागता है)।

मंत्री––(राजा का हाथ पकड़कर) नहीं नहीं, यह कहता है कि पान खाइए महाराज।

राजा––दुष्ट लुच्चा पाजी। नाहक हमको डरा दिया। मंत्री इसको सौ कोड़े लगें। मंत्री-महाराज! इसका क्या दोष है? न तमोली पान लगाकर देता, न यह पुकारता।

राजा––अच्छा, तमोली को दो सौ कोड़े लगें।

मंत्री––पर महाराज, आप पान खाइए सुनकर थोड़े ही डरे हैं, आप तो सुपनखा के नाम से डरे हैं, सुपनखा की सजा हो।

राजा––(घबड़ाकर) फिर वही नाम? मंत्री तुम बड़े खराब आदमी हो। हम रानी से कह देंगे कि मंत्री बेर-बेर तुमको सौत बुलाने चाहता है। नौकर! नौकर! शराब–– [ ६५६ ]दूसरा नौकर––(एक सुराही में से एक गिलास में शराब उमलकर देता है) लीजिए महाराज। पीजिए महाराज।

राजा––(मुँह बना-बनाकर पीता है) और दे।

(नेपथ्य में––'दुहाई है दुहाई का शब्द होता है)

कौन चिल्लाता है-पकड़ लाभो। (दो नौकर एक फर्यादी को पकड़ लाते हैं)

फ०––दोहाई है महाराज दोहाई है। हमारा न्याव होय।

राजा––चुप रहो। तुम्हारा न्याव यहाँ ऐसा होगा कि जैसा जम के यहाँ भी न होगा––बोलो क्या हुआ?

फ०––महाराज! कल्लू बनियाँ की दीवार गिर पड़ी सो मेरी बकरी उसके नीचे दब गई। दोहाई है महाराज, न्याव हो।

राजा––(नौकर से) कल्लू बनिये की दीवार को अभी पकड़ लाओ।

मंत्री––महाराज, दीवार नहीं लाई जा सकती।

राजा––अच्छा, उसका भाई, लड़का, दोस्त, प्राशना जो हो उसको पकड़ लाओ।

मंत्री––महाराज! दीवार ईट-चूने की होती है, उसको भाई बेटा नहीं होता।

राजा––अच्छा, कल्लू बनिये को पकड़ लाभो। (नौकर [ ६५७ ]लोग दौड़कर बाहर से बनिये को पकड़ लाते हैं) क्यों बे बनिये! इसकी लरकी, नहीं बरकी क्यो दबकर मर गई?

मंत्री––बरकी नहीं महाराज, बकरी।

राजा––हॉ हॉ, बकरी क्यो मर गई––बोल, नहीं अभी फॉसी देता हूँ।

कल्लू––महाराज! मेरा कुछ दोष नहीं। कारीगर ने ऐसी दीवार बनाई कि गिर पड़ी।

राजा––अच्छा, इस मल्लू को छोड़ दो, कारीगर को पकड़ लायो। (कल्लू जाता है, लोग कारीगर को पकड़कर लाते है) क्यो बे कारीगर! इसकी बकरी किस तरह मर गई?

कारीगर––महाराज, मेरा कुछ कसूर नहीं, चूनेवाले ने ऐसा बोदा चूना बनाया कि दीवार गिर पड़ी।

राजा––अच्छा, इस कारीगर को बुलाओ, नहीं नहीं निकालो, उस चूनेवाले को बुलायो। (कारीगर निकाला जाता है, चूनेवाला पकड़कर लाया जाता है) क्यों बे खैर-सुपाड़ी चूनेवाले! इसकी कुबरी कैसे मर गई?

चूनेवाला––महाराज! मेरा कुछ दोष नहीं; भिश्ती ने चूने में पानी ढेर दे दिया, इसी से चूना कमजोर हो गया होगा। [ ६५८ ]राजा––अच्छा, चुन्नीलाल को निकालो, भिश्ती को पकड़ो (चूनेवाला निकाला जाता है, भिश्ती लाया जाता है) क्यों बे भिश्ती! गंगा-जमुना की किश्ती! इतना पानी क्यो दिया कि इसकी बकरी गिर पड़ी और दीवार दब गई?

भिश्ती––महाराज! गुलाम का कोई कसूर नहीं, कस्साई-मसक इतनी बड़ी बना दी कि उसमें पानी जादे आ गया।

राजा––अच्छा, कस्साई को लाआ, भिश्ती निकालो। (लोग भिश्ती को निकालते हैं कस्साई को लाते हैं) क्यो बे कस्साई, मशक ऐसी क्यो बनाई कि दीवार लगाई बकरी दबाई?

कस्साई––महाराज! गँड़ेरिया ने टके पर ऐसी बड़ी भेड़ मेरे हाथ बेची कि उसकी मशक बड़ी बन गई।

राजा––अच्छा कस्साई को निकालो, डँगेरिए को लाओ। (कस्साई निकाला जाता है, गड़ेरिया आता है) क्यों बे ऊख पौंड़े के गँड़ेरिये, ऐसी बड़ी भेड़ क्यों बेचा कि बकरी मर गई?

गो गॅडेरिया––महाराज! उधर से कोतवाल साहब की सवारी ॐ आई, सो उसके देखने में मैंने छोटी बड़ी भेड़ का खयाल नहीं किया, मेरा कुछ कसूर नहीं।

.ना०-३६ [ ६५९ ]राजा––अच्छा, इसको निकालो, कोतवाल को अभी सरब-मुहर पकड़ लायो। (गँड़ेरिया निकाला जाता है, कोत-वाल पकड़ा आता है) क्यो बे कोतवाल! तैने सवारी ऐसी धूम से क्यों निकाली कि गॅड़ेरिए ने घबड़ाकर बड़ी भेड़ बेची, जिससे बकरी गिरकर कल्लू बनियाँ दब गया?

तवाल––महाराज महाराज! मैंने तो कोई कसूर नहीं किया, मैं तो शहर के इंतजाम के वास्ते जाता था।

(आप ही आप) यह तो बड़ा गजब हुआ, ऐसा न हो कि यह बेवकूफ इस बात पर सारे नगर को फूँक दे या फॉसी दे। (कोतवाल से) यह नहीं, तुमने ऐसे धूम से सवारी क्यो निकाला?

राजा––हाँ हाँ, यह नहीं, तुमने ऐसे धूम से सवारी क्यों निकाला कि उसकी बकरी दबी?

कोतवाल––महाराज महाराज––

राजा––कुछ नहीं, महाराज महाराज ले जाओ, कोतवाल को अभी फॉसी दो। दरबार बरखास्त।

(लोग एक तरफ से कोतवाल को पकडकर ले जाते हैं, दूसरी ओर से मंत्री को पकडकर राजा जाते हैं)

(जवनिका गिरती है)

पाँचवाँ अंक[सम्पादन]

स्थान––अरण्य

(गोबरधनदास गाते हुए आते हैं) (राग काफी)

अंधेर नगरी अनबूझ राजा। टका सेर भाजी टका सेर खाजा॥
नीच ऊँच सब एकहि ऐसे। जैसे भँडुए पंडित तैसे॥
कुल-मरजाद न मान बड़ाई। सबै एक से लोग-लुगाई॥
जात-पॉत पूछै नहिं कोई। हरि को भजै सो हरि का होई॥
बेश्या जोरू एक समाना। बकरी गऊ एक करि जाना॥
साँचे मारे मारे डोलैं। छली दुष्ट सिर चढ़ि चढ़ि बोले॥
प्रगट सभ्य अंतर छलधारी। साई राजसभा बल भारी॥
साँच कहैं ते पनही खावै। झूठे बहु बिधि पदवी पावैं॥
छलियन के एका के आगे। लाख कहै एकहु नहिं लागे॥
भीतर होइ मलिन की कारो। चहिए बाहर रँग चटकारो॥
धर्म अधर्म एक दरसाई। राजा करे सो न्याष सदाई॥
भीतर स्वाहा बाहर सादे। राज करहिं अमले अरु प्यादे॥
अंधाधुंध मच्यौ सब देसा। मानहुँ राजा रहत बिदेसा॥
गो द्विज श्रुति आदर नहिं होई। मानहुँ नृपति विधर्मी कोई॥
ऊँच नीच सब एकहि सारा। मानहुँ ब्रह्म-ज्ञान विस्तारा॥
अंधेर नगरी अनबूझ राजा। टका सेर भाजी टका सेर खाजा॥

(बैठकर मिठाई खाता है)

––गुरुजी ने हमको नाहक यहाँ रहने को मना किया था। माना कि देस बहुत बुरा है, पर अपना क्या? अपने किसी राजकाज में थोड़े हैं कि कुछ डर है, रोज मिठाई चाभना, मजे में आनंद से रामभजन करना।

(मिठाई खाता है चार प्यादे चार ओर से आकर उसको पकड लेते हैं)

प० प्या०––चल बे चल, बहुत मिठाई खाकर मुटाया है। आज पूरी हो गई।

दू० प्याo––बाबाजी चलिए, नमोनारायन कीजिए।

गोबरधन०––(घबड़ाकर) हैं! यह आफत कहाँ से आई! अरे भाई, मैने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है जो मुझको, पकड़ते हो?

प० प्या०––आपने बिगाड़ा है या बनाया है इससे क्या मतलब, अब चलिए। फॉसी चढ़िए।

गोबरधन०––फॉसी! अरे बाप रे बाप फॉसी! मैंने किसकी जमा लूटी है कि मुझको फॉसी! मैंने किसके प्राण मारे कि मुझको फाँसी!

दू० या––आप बड़े मोटे हैं, इस वास्ते फॉसी होती है।

गोबरधन०––मोटे होने से फॉसी? यह कहाँ का न्याय है! अरे, हँसी फकीरों से नहीं करनी होती। [ ६६२ ]प० प्या०––जब सूली चढ लीजिएगा तब मालूम होगा कि हँसी है कि सच। सीधी राह से चलते है। कि घसीट कर ले चलें?

गोबरधन०––अरे बाबा, क्यो बेकसूर का प्राण मारते हो? भग वान के यहाँ क्या जवाब दोगे?

प० प्या०––भगवान को जवाब राजा देगा। हमको क्या मतलब। हम तो हुक्मी बंदे हैं।

गोबरधन०––तब भी बाबा बात क्या है कि हम फकीर आदमी को नाहक फॉसी देते हो?

प० प्याo-बात यह है कि कल कोतवाल को फॉसी का हुकुम हुआ था। जब फॉसी देने को उसको ले गए, तो फॉसी का फंदा बड़ा हुआ, क्योंकि कोतवाल साहब दुबले है। हम लोगो ने महाराज से अर्ज किया, इस पर हुक्म हुअा कि एक मोटा आदमी पकड़ कर फॉसी दे दो, क्योकि बकरी मारने के अपराध में किसी न किसी को सजा होनी जरूर है, नहीं तो न्याय न होगा। इसी वास्ते तुमको ले जाते हैं कि कोतवाल के बदले तुमको फॉसी दें।

गोषरधन०––तो क्या और कोई मोटा आदमी इस नगर भर में नहीं मिलता जो मुझ अनाथ फकीर को फाँसी देते हैं?

प० प्या०––इसमें दो बात है––एक तो नगर भर में राजा के [ ६६३ ]न्याव के डर से कोई मुटाता ही नहीं, दूसरे और किसी को पकड़ें तो वह न-जानें क्या बात बनावे कि हमीं लोगों के सिर कहीं न घहराय और फिर इस राज में साधू महात्मा इन्हीं लोगो की तो दुर्दशा है, इससे तुम्ही को फांसी देंगे।

गोबरधन०––दुहाई परमेश्वर की, अरे मैं नाहक मारा जाता हूँ! अरे यहाँ बड़ा ही अंधेर है, अरे गुरुजी महाराज का कहा मैंने न माना उसका फल मुझको भोगना पड़ा। गुरुजी कहाँ हो! आओ, मेरे प्राण बचाओ, अरे मैं बेअपराध मारा जाता हूँ। गुरुजी गुरुजी––

(गोबरधनदास चिल्लाता है, प्यादे उसको पकडकर ले जाते हैं)

(जवनिका गिरती हैं)

छठा अंक[सम्पादन]

स्थान––श्मशान

(गोबरधनदास को पकड़े हुए चार सिपाहियों का प्रवेश)

गोबरधन०––हाय बाप रे! मुझे बेकसूर ही फॉसी देते हैं। अरे भाइयो, कुछ तो धरम बिचारो! अरे मुझ गरीब को फॉसी देकर तुम लोगों को क्या लाभ होगा? अरे मुझे छोड़ दो। हाय! हाय! (रोता है और छुड़ाने का यत्न करता है)

प० सिपाही––अबे, चुप रह––राजा का हुकुम भला कहीं टल सकता है? यह तेरा आखरी दम है, राम का नाम ले–– बेफाइदा क्यो शोर करता है? चुप रह––

गोबरधन०––हाय! मैंने गुरुजी का कहना न माना, उसी का यह फल है। गुरुजी ने कहा था कि ऐसे नगर में न रहना चाहिए, यह मैंने न सुना! अरे! इस नगर का नाम ही अंधेरनगरी और राजा का नाम चौपट्ट है, तब बचने की कौन आशा है। अरे! इस नगरी में ऐसा कोई धर्मात्मा नहीं है जो इस फकीर को बचावे। गुरुजी कहाँ हो? बचाओ-बचाओ––गुरुजी––गुरुजी–– [ ६६५ ]गोबरधन०––नहीं गुरुजी, हम फाँसी पड़ेंगे।

गुरु––नहीं बच्चा हम। इतना समझाया नहीं मानता, हम बूढ़े भए, हमको जाने दे।

गोबरधन०––स्वर्ग जाने में बूढा जवान क्या? आप तो सिद्ध हो, आपको गति-अगति से क्या? मैं फॉसी चढूँगा।

(इसी प्रकार दोनों हुज्जत करते हैं––सिपाही लोग परस्पर चकित होते हैं)

प० सिपाही––भाई! यह क्या माजरा है, कुछ समझ नहीं पड़ता।

दू० सिपाही––हम भी नहीं समझ सकते कि यह कैसा गबड़ा है।

(राजा, मंत्री, कोतवाल आते हैं)

राजा––यह क्या गोलमाल है?

प० सिपाही––महाराज! चेला कहता है मैं फाँसी पडूॅगा, गुरु कहता है मैं पडूँगा, कुछ मालूम नहीं पड़ता कि क्या बात है।

राजा––(गुरु से) बाबाजी! बोलो। काहे को आप फाँसी चढ़ते हैं?

गुरु––राजा! इस समय ऐसी साइत है कि जो मरेगा सीधा बैकुंठ जायगा।

मंत्री––तब तो हमीं फाँसी चढेंगे। [ ६६६ ]गोबरधन॰––हम हम। हमको तो हुकुम है।

कोतवाल––हम लटकेंगे। हमारे सबब तो दीवार गिरी।

राजा––चुप रहो, सब लोग। राजा के आछत और कौन बैकुंठ जा सकता है! हमको फाँसी चढ़ाओ, जल्दी, जल्दी।

गुरु––जहाँ न धर्म्म न बुद्धि नहिं नीति न सुजन-समाज। ते ऐसहि आपुहि नसै, जैसे चौपटराज॥

(राजा को लोग टिकठी पर खड़ा करते हैं) (पटाक्षेप)