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हिंदी उपन्यास/जैनेन्द्र

विकिपुस्तक से

परिचय- जैनेन्द्र हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कथाकार उपन्यासकार तथा निबंधकार थे । ये हिंदी उपन्यास के इतिहास में मनोविश्लेषणात्मक परम्परा के प्रवर्तक के रूप में मान्य है । जैनेन्द्र अपने पात्रों की सामान्यगति में सूक्ष्म संकेतों की निहिति की खोज करके बड़े कौशल में प्रस्तुत करते हैं । उनके पात्रों की चारित्रिक विशेषताएं इसी कारण से संयुक्त होकर उभरती हैं । जैनेन्द्र कुमार का जन्म 2 फरवरी 1905 ई. को कौडियागंज , जिला अलीगढ़ उत्तरप्रदेश में हुआ। जैनेंद्र हिंदी साहित्य के विशिष्ट रचनाकार हैं उन्होंने साहित्य की आंतरिक गहराइयों को अभिव्यक्त की हिंदी में दर्शन मनोविज्ञान और अध्यात्म को कल चेतना के साथ संयुक्त करने का श्रेय जैनेंद्र को प्राप्त है वह गंभीर विचारक और समर्पित लेखक हैं उन्होंने निबंध कहानी उपन्यास संस्मरण जीवन तथा आलोचना आदि कई गद्य उपन्यासों का समृद्ध क्रिया साहित्यकार के रूप में जैनेंद्र को सर्वाधिक प्रसिद्ध उनके उपन्यासों के कारण प्राप्त हुई है जैनेंद्र मनोवैज्ञानिक यथार्थ के उपन्यासकार हैं वे प्रेमचंद की तरह समाज या व्यक्ति को बदलने का प्रयास नहीं करते हैं बल्कि व्यक्ति के अंतर्मन तथा उसे प्रभावित करने वाली घटनाओं का सूचना विश्लेषण करते हैं उनके पत्र समाज में काम अपने आप से अधिक लड़ते हैं उनमें स्थल सामाजिक नैतिक संघर्ष के स्थान पर आत्म संघर्ष और जटिल मानसिकता मिलती है जैनेंद्र के उपन्यासों में घटनाएं viral है इसीलिए चिंतन और विश्लेषण गहरा हो जाता है मां की भीतरी संरचनाओं में छिपे शक्तियों को व्यक्त करने के प्रयास में उनकी भाषा की बेहद प्रतिरात्मक हो जाती है उन पर फ्राइड और गांधी दोनों का प्रभाव है यह मार्क्स वह प्राइवेट को मिलने की बाद भी कहते हैं पर उनके चिंतन में मार्च के प्रति प्राय अपेक्षा है उन्होंने परख सुनीता त्यागपत्र कल्याणी विवृत सुखद व्यतीत जयवर्धन muktibodh ityadi upnyason ki rachnaen ki जैनेंद्र कुमार के उपन्यासों का परिचय १. परख-परख जैनेंद्र का पहला उपन्यास है जो 1929 में प्रकाशित हुआ इस उपन्यास में कुल चार पात्र हैं सत्यधान कट्टू गरिमा बिहारी. सत्य धन एक शिक्षित किंतु शांति प्रिया आडंबर हैं जीवन में विश्वास करने वाला आदर्शवादी युवक है वह अपनी जिम्मेदारी के एक गांव में आकर रहने लगता है काटो उसी गांव की एक विधवा लड़की है वह पढ़ने के लिए सत्यधान के पास आया जाया करती थी दोनों के बीच प्रेम विकसित होने लगता है बिहारी सत्यधान का मित्र था गरिमा बिहारी की बहन है बिहारी के पिता गरिमा का विवाह सत्यधान से करना चाहते हैं सत्यधान के प्रति कट्टू की प्रति गहरी है बुद्धि से प्रेरित होकर सत्यधान गरिमा से विवाह कर लेता है कट्टो का विवाह बिहारी बिहारी से हो जाता है कट्टो बिहार में वही सात्विकता और आत्मिक गहराई पाती है जो उसमें है इसलिए वह उसके साथ एकात्मक हो जाती है दोनों का संबंध दहिक से ऊपर उठकर आत्मिक हो जाता है बिहारी के पिता अपनी संपत्ति उसके नाम छोड़कर स्वर्ग सुधार जाते हैं सत्यधान किराए का एक छोटा सा मकान लेकर अलग रहने लगता है काटो उसे घर लौटने का आग्रह करती है और 40000 के नोट उसे शॉप देती है कट्टो का त्याग देखकर सत्यधान अपनी हीनता से विचलित हो जाता है और आत्मिक संबंध में बंधे हुए कट्टू और बिहारी अलग रहने लगते हैं कटु अपने गांव में लड़कियों को पटाने का काम करने लगती है और बिहार सामान्य कृषक का कार्य व्यतीत करने लगता है और दूसरे गांव में चला जाता है इस कथा के माध्यम से लेखक अपने प्रेम के दर्शन को प्रतिष्ठित करना चाहता है लेखक के अनुसार प्रेम आत्मदन हम का विसर्जन है बिहारी और काटो के माध्यम से लेखक ने इसी हम के विसर्जन के दर्शन को प्रतिष्ठित किया है

साहित्यिक परिचय

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लेखक के रूप में हिंदी जगत को जैनेन्द्र ने उल्लेखनीय योगदान दिया है । ‘ फांसी ' इनका पहला कहानी संग्रह था , जिसने इनको प्रसिद्ध कहानीकार बना दिया । सन् 1929 में ' परख ' उपन्यास से इनकी पहचान बनी । ' सुनीता ' का प्रकाशन 1935 में हुआ । ' त्यागपत्र ' 1937 और ' कल्याणी ' 1939 में प्रकाशित हुए । 1929 में पहला कहानी संग्रह छपा । इसके बाद सन् 1930 में ' वातायन ' 1933 में ' नीलम देश की राजकन्या ' , 1934 में ' एक रात ' , 1935 में ' दो चिड़ियाँ ' , 1942 में ' पाजेब ' का प्रकाशन हुआ । वर्तमान समय में उनकी कहानियाँ सात भागों में उपलब्ध हैं ।

साहित्य जगत में योगदान और पुरस्कार

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हिंदी साहित्य जगत को दिए अपने अमूल्य योगदान के लिए जैनेन्द्र को अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया ।

1. भारत सरकार शिक्षा मंत्रालय ( प्रेम में भगवान , 1952 )
2. साहित्य अकादमी पुरस्कार ( मुक्तिबोच , 1965 )
3. हस्तीमल डालमिया पुरस्कार ( समय और हम , 1970 ) उत्तर प्रदेश राज्य सरकार
4. पद्मभूषण ( भारत सरकार , 1971 )
5. मानद की डी.लिट्.उपाधि ( दिल्ली विश्वविद्यालय , 1973 )
6. हिंदुस्तानी अकादमी पुरस्कार , इलाहाबाद ( परख , 1929 )
7. साहित्य अकादमी फैलोशिप ( 1974 )
8. भारत - भारती एवं तुलसी नैतिक पुरस्कार , उत्तरप्रदेश
9. हिंदी साहित्य सम्मेलन , प्रयाग ( साहित्य याचस्पति , 1973 )
10. भारतीय लेखक परिषद् की अध्यक्षता
11. हिंदी प्रादेशिक हिंदी साहित्य सम्मेलन का सभापति

जैनेन्द्र कुमार व्यक्तिवादी और मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार हैं । इन्होंने हिंदी उपन्यास को नया मोड़ दिया । अपने उपन्यासों के द्वारा नैतिकता के परम्परागत तथा प्रचलित चौखटे को तोड़ा । नये कथ्य और शिल्प को अपनाया । एक ओर व्यक्तिवादी दर्शन तथा दूसरी ओर आधुनिक मनोविज्ञान से प्रभावित होकर अनेक उपन्यास लिखे यथा परख , सुनीता , त्यागपत्र , कल्याणी , सुखदा , विवर्त , व्यतीत आदि ।