हिंदी कविता (आदिकालीन एवं भक्तिकालीन) सहायिका/उद्धव संदेश/(२)अति मलीन वृषभानु कुमारी।

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सन्दर्भ[सम्पादन]

प्रस्तुत पद महाकवि सूरदास द्वारा रचित 'सूरसागर' से संगृहीत है। कृष्ण को आधार बनाकर काव्य-रचना करने वाले वल्लभ संप्रदाय का यह मूर्धन्य कवि हैं।

प्रसंग[सम्पादन]

सूर का संयोग-वर्णन जितना विस्तृत व पूर्ण है उनका वियोग-वर्णन भी उतना ही विस्तृत है। वियोग की जितनी भी दशाएं हो सकती हैं, वे सब सूर के वियोग-वर्णन में पाई जाती हैं। राधा कृष्ण के विरह में अत्यंत व्याकुल है। यही स्थिति-जन्य गोपियों की भी है। कोई गोपी राधा और उसके माध्यम से अन्य ब्रज-वनिताओं की विरह स्थिति प्रकट करते हुए कह रही हैं-

व्याख्या[सम्पादन]

अति मलीन वृषभानु कुमारी।........ब्रज बनिता बिन स्याम दुखारी॥

कृष्ण के विरह में वृषभानु की पुत्री राधा अत्यंत उदास और व्यथित हैं। संयोग काल कृष्ण के साथ काम-क्रीड़ाएं करते हुए उन्हें पसीना आया था। उस कारण उनका हृदय और शरीर भीगा हुआ है। उन स्वेद कणों की गंध कहीं समाप्त न हो जाए इसलिए वह अपनी साड़ी भी नहीं धुलवाती है वे मुख नीचा किए बैठी रहती है और ऊपर की ओर भी नहीं देखती। यानी कृष्ण के खयाल में खोई रहती है। उनकी यह स्थिति ऐसी लगती है जैसे कोई जुए में सारी संपत्ति हार बैठा हो। कृष्ण के द्वारा भेजे योग-संदेश से तो वह मृत्यु के समान हो गई है। वह एक तो विरहिणी थी दूसरे भ्रमर-रूपी उद्धव ने भी उसे योग-संदेश देकर अर्थात् सुनाकर जला दिया है। कृष्ण से प्रेम करने वाली ब्रज-वनिता विरह में जी रही है।

विशेष[सम्पादन]

यहां काव्यलिंग, उत्प्रेक्षा और उपमा अलंकार है। विरह के अंतर्गत प्रोषत पतिका नायिका की करुण-दशा का यथार्थ-चित्रण है। इसी से राधा यहां सुरति दुखिया नायिका प्रतीत होती है।

शब्दार्थ[सम्पादन]

मलिन = व्यथित। स्त्रम जल = काम-क्रीड़ाओं से उत्पन्न पसीना। अंतर - हृदय। सारी = साड़ी। अधोमुख - मुख नीचा किए हुए। उरघ - ऊपर, सामने। गथ - पूंजी। चिहुर= केश। नलिनी = कमलिनी। हिमकर = पाला। अलि = भ्रमर, उद्धव।