हिंदी कविता (आदिकालीन एवं भक्तिकालीन) सहायिका/कव्वाली

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कव्वाली
खुसरो/

सन्दर्भ[सम्पादन]

प्रस्तुत 'कव्वाली' खड़ी बोली के प्रवर्तक आदिकालीन कवि अमीर खुसरो द्वारा रचित है।

प्रसंग[सम्पादन]

इस कव्वाली में खुसरो अपने गुरु की ही वंदना कर रहे हैं, जिनके कारण ही उनका परमात्मा से मिलन हुआ। वे कहते हैं कि

व्याख्या[सम्पादन]

"छाप-तिलक तज दीन्हीं रे--------मोसे नैना मिला के।।"

मेरे निज़ामुद्दीन औलिया जिस दिन से तुमने मुझे ज्ञान देकर मुझे परमात्मा से मिलाया है, उस दिन से तुमने मेरा तिलक-छाप आदि बाह्याडंबर छुड़वा दिए अर्थात् परमात्मा से अंदर ही अंदर मिलन होते ही छापा, तिलक, माला आदि छूट जाते हैं। वे कहते हैं मेरे गुरु निज़ाम ने मुझपर कृपा करके मुझे प्रेम की बूटी का रस पिलाया है अर्थात् परमात्मा का प्रेम दिलाया है। प्रेम की बूटी का यह रस पीकर मुझे मतवाला कर दिया। वे अपने गुरु निज़ाम पर बार-बार बलिहारी जाना चाहते हैं क्योंकि उन्होंने ही खुसरो (जीवात्मा) को परमात्मा से मिलकार सुहागन कर दिया है।

विशेष[सम्पादन]

1. खड़ी बोली है।

2. उर्दू के शब्द भी आए हैं।

3. गुरु निजामुद्दीन औलिया की वंदना की है।

4. रहस्य-भावना है।

5. अद्वैत-भावना है।

6. अमीर निर्गुणोपासक हैं।

7. प्रसाद गुण है।

8. लयात्मकता है।

9. बाह्याडंबर का विरोध किया है।

10. साधना की परमावस्था है जहाँ साधक 'सुहागन' होता है।

11. 'प्रेम-बूटी'-रूपक अलंकार है।

12. 'बलि बलि'-पुनरुक्ति अलंकार है।

शब्दार्थ[सम्पादन]

तज = त्यागना। नैना = नेत्र। बटी = बूटी। मदवा = पेय पदार्थ। मतवारी = मदमस्त। निजाम = निजामुद्दीन औलिया। बलि = बलिहारी। मोहे = मुझे। मोसे = मुझसे