हिंदी कविता (आदिकालीन एवं भक्तिकालीन) सहायिका/गोकुल लीला/(१)जसोदा हरि पालनै झुलावै।

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सन्दर्भ[सम्पादन]

प्रस्तुत पद महाकवि सूरदास द्वारा रचित है। यह पद उन्हीं की विख्यात रचना 'सूर सागर' से संगृहीत है। कृष्ण को आधार बनाकर काव्य-रचना करने वाले वल्लभ संप्रदाय का यह मूर्धन्य कवि हैं।

प्रसंग[सम्पादन]

श्रीकृष्ण का जन्म हो चुका है। यशोदा श्रीकृष्ण को पालने में सुला रही है। कवि यहां यशोदा की मातृ-सुलभ चेष्टाओं का वर्णन कर रहा है-

व्याख्या[सम्पादन]

जसोदा हरि पालनै झुलावै......सो नंद भामिनि पावै।

यशोदा अपने बेटे बालक कृष्ण को पालने में झुला रही है। कभी कृष्ण को पालने में बुलाकर हिलाती है तो कभी वात्सल्य में भरकर दुलार करती है। कभी स्नेहपूवर्क थपथपाती है। कभी उसे देखते हुए लोरी गाने लगती है गीत में लोरी गाते हुए कहती है कि हे नींद। तू मेरे कृष्ण के पास आ जा। तू जल्द आकर उसे सुला क्यों नहीं देती? तुझे तो कृणा बुलते रहते हैं। इधर, श्रीकृष्ण अर्ध-निंद्रा में डूबे है। ये कभी अपने पलक बंद कर लेते हैं और कभी खोल लेते हैं। कभी अपने ओठ फड़फड़ाने लगते हैं यशोदा को लगता है कि श्रीकृष्ण अब सो गए हैं। वे भी उसे झुलाना छोड़कर अपने घर के काम निपटाने में लग जाती है। आस-पास मौजुद लोगों को इशारों से बुलती है कि वे शोर न करें, क्योकि कृष्ण अभी-अभी सोए हैं। लेकिन अभी कुछ क्षण भी नहीं बीते है कि कृष्ण व्याकुल होकर उठ पड़ते हैं। बालक को उठे देख यशोदा फिर पलना झुलाने और फिर लोरी सुनाने लगी है। महाकवि सूर कहते हैं कि जो सुख देवताओं के लिए दुर्लभ है, नंद की भामिनी अर्थात यादा प्राप्त कर रही हैं इसके लिए उसने कोई तपस्या नहीं की है। यह सुख उसे अनायास प्राप्त हो रहा है।

विशेष[सम्पादन]

  1. इस पद में महाकवि सूर ने यशोदा की मातृ-सुलभ चेष्टाओं का अत्यंत मनोवैज्ञानिक चित्रण स्वाभाविक और यथार्थ है।
  2. इस पद में महाकवि सूर ने यशोदा की मातृ-सुलभ चेष्टाओं का अत्यंत मनोवैज्ञानिक चित्रण स्वाभाविक और यथार्थ है।
  3. इस पद का भाव अत्यंत गहन और सूक्ष्म है। इसका प्रमाण यह पंक्ति है-
    कबहूँ पतक हरि मूंद लेत हैं कबहू अधर फरकावै ,पंक्ति विशेष महत्त्वपूर्ण है।
  1. कवि ने बाल-चेष्टाओं का इतना मनोहर और हृदय हारी वर्णन किया है कि यह सोचने पर विवश होना पड़ता है कि सूर जन्म से नेत्रहीन हो सकते हैं, क्योंकि नेत्रहीन बाल-सुलभ चेष्टाओं का इतना मोहक वर्णन नहीं कर सकता है।
  2. यहां कवि ने लोकगीत शैली अपनाई है। शब्द-चयन मनोहर और सटीक है।
  3. निद्रा में मानवीकरण अलकार है और 'करि-करि' में पुनरुक्प्रिकाश अलंकार है
  4. शब्दों का सरल और सरस अपभ्रंश रूप कवि के जन-जीवन ज्ञान का साक्षी है।
  5. यह छंद राग धनाश्री के अनुकूल है।

शब्दार्थ[सम्पादन]

जसोदा - यशोदा। हलरावै - हिला रही है। मल्हावै - स्नेहपूर्वक थपथपाती है। जोई - देखना। सोई - वह। निंदरिया- नींद। आनि- आ कर। बेगहि- जल्दी से। फरकावै - फड़कना। सैन - संकेत। इहि अंतर - इसी बीच। भामिनी = पत्नी। अमर - देवता।