हिंदी कविता (आदिकालीन एवं भक्तिकालीन) सहायिका/भेष कौ अंग/(२)कबीर केसों कहा बिगाड़िया......

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सन्दर्भ[सम्पादन]

प्रस्तुत 'दोहा' कबीरदास द्वारा रचित है। यह उनके 'कबीर ग्रंथावली' के 'मेष कौ अंग' से अवतरित है।

प्रसंग[सम्पादन]

समें कबीर जी कहते हैं कि केशों को क्यों मूडता है? उसकी कोई गलती नहीं है। जो भी गलती है वह इस मन की है जो तूझे मूड़ता रहता है। उन्होंने मन को ही दोषी मानते हुए कहा है-

व्याख्या[सम्पादन]

कबीर केसों कहा बिगाड़िया......जामै बिषै विकार॥

इन केशों की कोई गलती नहीं है। उन्होंने तेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ा है। इन केशों को तू सौ-सौ बार मूड़ता रहता है। अच्छा हो यदि तू इन्हें मुड़ा ले। केशों को जबरदस्ती क्यों मुडता है? जो कुछ भी किया है वह इस मन ने किया है। मन के चलते ही तू गलती पर गलती करता रहता है। इन केशों ने कुछ भी तेरा नहीं बिगाड़ा है। अर्थात् तू अपने मन पर नियंत्रण कर। तभी तेरी शंकाएँ मिटेंगी।

विशेष[सम्पादन]

इसमें 'मन' को कबीर ने दोषी माना है। केशों को नहीं। मन की गति चलायमान होती है। बाह्याडंबर का विरोध है। बाह्य की अपेक्षा आंतरिकता पर बल दिया गया है। सधुक्कडी भाषा है। भाषा में स्पष्टता है। व्यंग्यात्मकता पाई जाती है। उपदेशात्मक शैली है। विम्बात्मकता है। 'दोहा' छंद है। आचरण की शुद्धता पर बल दिया गया है।

शब्दार्थ[सम्पादन]

कर = हाथ, हस्त। परक - पकड़ना। अंगुरी = उँगली। गिनै = गिनना गणना। धावै = दौड़ता है। चहुँ - चारों ओर। जाहि जिसको। फिराया - फिराया छोड़ना। हरि भगवान्। सो गया = हो भया। काठ = माला को। ठौर = ठिकाना, कठोरता के समान।