हिंदी कविता (आदिकालीन एवं भक्तिकालीन) सहायिका/माई साँवरे रंग राँची

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माई साँवरे रंग राँची
मीराबाई/

सन्दर्भ[सम्पादन]

प्रस्तुत 'पद' मीराबाई द्वारा रचित है।

प्रसंग[सम्पादन]

इसमें मीरा ने अपने आराध्य-देव कृष्ण के प्रति आत्म-निवेदन तथा भक्ति-मार्ग में आने वाली कठिनाइयों का वर्णन किया है। वह कृष्ण के अतिरिक्त किसी और को अपनी मन में स्थान नहीं दे पायी है। वे उन्हीं के रंग, भक्ति-गान तथा भजन-कीर्तन में निमग्न हो गयी है। वह हर समय उनकी भक्ति में खोई रहती है। वह इसी संबंध में कहती है-

व्याख्या[सम्पादन]

''माई सावरे रंग रांची।।टेक।।

साज सिंगार बांध पग घुंघुर लोकजाल तज णाची।

गया कुमत लया साधा श्याम प्रीत जग सांची।।

गाया गाया हरि गुण निसदिन, काल ब्याल री बांची।

स्याम वीणा जग खारा लागा,जगरी बाता कांची।

मीरा सिरी गिरधर नट नगर भगति रसीली जाची।।''


व्याख्या-मैं तो अब साँवले रंग वाले कृष्ण के प्रेम में डूब गयी हूँ। वह अपने मन में उन्हें स्थान दे चुकी है। वह उनके रंग में रंग गई है। अर्थात् वह उनमें ही पूर्ण रूप से खो गयी है। वे ही उसके सब कुछ हैं। वह अपने को सजा-संवार कर और पैरों में घूँघरू बाँधकर उनकी भक्ति में घर से बाहर निकल चुकी है। उसे अब समाज की तथा लोगों की तनिक भी परवाह नहीं। अब वह निडर है। उसने सारा संसार ही छोड़ दिया है। जहाँ मेरी बुद्धि मुझे ले जाएगी मैं वहीं जाऊँगी। जब तक मुझ में साँसें हैं तब तक में उन्हीं में लीन रहूँगी उनके साथ रहूँगी। मुझे संसार में श्याम के लिए पीले वस्त्र धारण करने पडते हैं तो वहीं पहनूँगी। यही मेरा संसार श्याम तक सीमित है। मैं रात-दिन भगवान के गुणों तथा भजन-कीर्तन गाकर ही जीवन जीयूँगी। दीपक की लौ की बत्ती की तरह मैं भी उनके गुणगान में जलती रहूँगी। यह संसार मुझे कृष्ण के बिना खारे जल के समान लगता है। सारी बातें झूठी हैं बस केवल कृष्ण नाम ही सच्चा है। मीरा कहती है कि मैं पर्वत उठाने वाले कृष्ण, जो नट नगर हैं, की भक्ति में ही जीवन को व्यतीत कर दूँगी। मुझे उनके नाम लेने में जीवन का रस आता है, जो मुझे रूचता है। वही मेरे सब कुछ हैं।

विशेष[सम्पादन]

इसमें मीरा ने कृष्ण की भक्ति, नाम, भजन, कीर्तन तथा पूजा-पाठ में जीवन व्यतीत करने का निश्चय किया है। राजस्थानी भाषा है। माधुर्य गुण है। पद में गेयात्मकता है। पद में लयात्मकता है। श्रीकृष्ण ही उसके सब कुछ हैं। इसमें कृष्ण के प्रति मीरा की अनन्य भक्ति के दर्शन होते हैं।

शब्दार्थ[सम्पादन]

रंग = रग में। राँची = रचना, बसना। साज श्रृंगार = सजावट की चीजें, शृंगार प्रसाधन। पग = रास्ता। घुंघुर = पायल, घुंघरु । तप = त्याग। कुमत = बुरी बुद्धि, बातें। संगत साथ। श्याम = कृष्ण। प्रीत = प्रेम। जग = संसार। निस-दिन = रात-दिन। ब्याल = दीपक की बत्ती। बिणा = बिना। खाराँ = कसैला। भगति = भक्ति। रसीली = रस से युक्त। नागर - नगर। नट = खेल दिखाने वाला। गिरधर = पर्वत धारण करने वाले कृष्ण। जाँची - जँचना। मीरा = मीरा। बाँत्ती - बत्ती, लो।