हिंदी कविता (आदिकालीन एवं भक्तिकालीन) सहायिका/राधा कृष्ण

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राधा कृष्ण
सूरदास/

सन्दर्भ[सम्पादन]

प्रस्तुत पद भक्तिकालीन सगुण काव्यधारा की कृष्ण-भक्ति शाखा के प्रवर्तक भक्त कवि सूरदास द्वारा रचित 'सूरसागर' के 'शृंगार' खंड से अवतरित है।

प्रसंग[सम्पादन]

श्रीकृष्ण की विभिन्न झाँकियाँ को प्रस्तुत करने वाले सूर ने इस पद में कृष्ण और राधा के प्रथम परिचयात्मक मिलन का वर्णन किया है। इमें श्रीकृष्ण के चातुर्य का वर्णन किया है।

व्याख्या[सम्पादन]

खेलत हरि निकसे ब्रज-खोरी......नैन-नैन मिलि परी ठगोरी॥

सूरदास कहते हैं कि श्री कृष्ण अपने सखाओं के साथ खेलने के लिए ब्रज की गलियों में निकले। श्रीकृष्ण ने अपनी कमर पर पीले रंग का कमरबंध बाँधा हुआ है। और हाथ में लटट और उसे चलाने वाली डोरी है। उन्होंने मोर पंख का मुकुट पहना हुआ है और कानों में कुंडल पहने हुए हैं. उनके सुदंर-सुदंर दांत बिजली की भांति चमक रहे हैं सूर कहते हैं ऐसी वेष-भूषा धारण किए श्रीकृष्ण खेलनं के लिए यमुना के किनारे चले गए। श्रीकृष्ण ने अपने श्याम-मुख पर जो चंदन का तिलक लगा रखा था वह बहुत सुंदर लग रहा था इसी बीच श्रीकृष्ण ने अचानक ही राधा को वहां देखा जिसके नेत्र बड़े-बड़े थे और माथे पर रोली का तिलक था। राधा ने नीले रंग का लंहगा पहना हुआ था और उनकी वेणी उनकी कमर पर डोल रही थी। ऐसी सुंदर राधा सखियों के साथ कृष्ण की ओर ही आ रही थी राधा गौर वर्ण की थी, जिसपर चार दिन पहले आया यौवन सहज ही देखा जा सकता था। सूरदास कहते हैं ऐसी राधा और ऐसे श्रीकृष्ण जब आपस में मिले तो रीझने लगे अर्थात् खुश हुए। दोनों के नैन आपस में मिलकर ठगे से रह गए।

विशेष[सम्पादन]

1. ब्रज भाषा है।

2. पद में लयात्मकता है।

3. पद में बिंबात्मकता है।

4. पद में रसात्मकता है।

5. पद में श्रीकृष्ण की उपासना की गई है।

6 कोमलकांत पदावली है।

7. भक्ति रस की प्रधानता है।

8. यह पद सरस राग में लिखा गया है।

9. राग रागनियों के अंदर आबद्ध होने के कारण सूर के पदों में संगीतात्मकता का गुण है।

10. सूर सगुण-भक्त कवि है।

11. सूर सगुणोपासक हैं लेकिन उनकी भावभिव्यक्ति निर्गुण-रूप में जान पड़ती है।

12. श्रीकृष्ण और राधा का प्रेम पश्चिम से प्रारंभ होता है।

13. सूर के वर्णन में सहजता, मुलाकात है।

14. वर्णनात्मक शैली है।

15. 'दसन दमक दमिनी' अनुप्रास अलंकार है।

शब्दार्थ[सम्पादन]

खोरी-गली। करि = कमर। कछनी- कमरबंध। भौंरों - लट्टू। स्रवननि - कानों। बर = श्रेष्ठ। छोटी सुंदर। रवि तनया - यमुना। लसति - सुशोभित होना। भाल - माथा। छोरी - तिलक। रोली = रोली। फरिया = लहंगा। रुलति = डोलना। लरिकिनी के। ठंगोरी - ठगी स्त्री।