हिंदी कविता (आदिकालीन एवं भक्तिकालीन) सहायिका/रामचरितमानस/(२)मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा।

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सन्दर्भ[सम्पादन]

प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि तुलसीदास द्वारा रचित हैं। यह उनके 'रामचरितमानस' से अवतरित हैं।

प्रसंग[सम्पादन]

इसमें कवि ने हनुमान की शक्ति प्रदर्शन के बाद की स्थिति का वर्णन किया है। अब दोनों हाथ जोड़कर हनुमान माता सीता के सम्मुख खड़े हैं। वे राम की निशानी देते हैं और सीता भी उन्हें निशानी देती हैं। सीता हनुमान से अपनी आपबीती तथा दुखड़ा सुनाती हैं वे राम से जल्दी आने की बात कहती हैं। अगर वे जल्दी नहीं आए तो वे उन्हें जीवित नहीं पाएंगे। उनके बिना एक पल भी नहीं रह सकती हैं। हनुमान को वे अपनी बातें बता रही हैं। वे कहती हैं-

व्याख्या[सम्पादन]

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा जैसे रघुनायक मोहि दीन्हा।।

चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ।।

कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा।।

दीन दयाल बिरिदु संभारी हरहु नाथ मम संकट भारी॥

तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समझाएं॥

मास दिवस महुँ नाथु न आवा तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥

कह कपि केहि बिधि राखे प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना।।

तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहँ सोइ दिनु सो राती।।


दोहा-जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।

चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह॥


हे माता! मुझे कोई अपनी निशानी दीजिए, जिस तरह से भगवान् राम ने मुझे दी थी। वह मैंने आप को दी। उसी प्रकार आप भी कोई निशानी मुझे दे दो। तब सीता जी ने अपनी कलाई से चूडामणि उतार कर हनुमान को दे दी। बड़ी ही खुशी के साथ हनुमान ने वह निशानी स्वीकार की। अर्थात् खुशी से ली। सीताजी ने हनुमान से कहा कि तुम स्वामी जी को मेरी और से प्रणाम कहना। सब प्रकार से भगवान् कार्य पूर्ण करेंगे। दीनों पर दया करने वाले भगवान् बिगडे काम बनाएँगे। वे ही कष्ट दूर करेंगे मेरे स्वामी ही मेरे सारे दुख दूर करेंगे। वे ही मेरी रक्षा करेंगे। ऐसी मुझे पूर्ण आशा है। बेटे तुम जाकर उन्हें सारी स्थिति-परिस्थिति की कहानी जाकर सनाना तथा उन्हें अपनी वाणी से सब कुछ समझाने का प्रयास करना।

जो कुछ भी तुमने यहाँ देखा एवं पाया है। उनसे कहना कि वे अब जल्दी से आकर मुझे ले जाएँ। दिन महीने में यदि स्वामी नहीं आए तो तब वे मुझे दुबारा जीवित नहीं पाएंगे। अर्थात् वे मुझे मरा हुआ पाएंगे। तुम वानर उनसे कहना कि वे कोई भी उपाय करके मुझे यहाँ से ले जाएँ और मेरे प्रणों की रक्षा करें। तुम ही बेटे पेरी ओर से यह बात जाकर उनसे कहना। तुझे देखकर मेरी छाती में शौति एवं ठंडक पैदा हो गयी है। मैं दुबारा तुमसे कहती हूँ कि दिन रात मैं उन्हीं का स्मरण करती रहती है। जनक की पुत्री ने हनुमान को बहुत तरीके से सारी बातें समझाई और धैर्य धारण करने को कहा। उन्हें धैर्य बँधाया। अर्थात् अनुमान ने भी माता सीता को तरह-तरह से धीरज धारण करने के लिए कहा और निराश न होने की बात कही। माता के कलम-रूपी चरणों में सिर नवाकर-प्रणाम किया और वे राम के पास जाने के लिए मुडे। अपना रूख राम की ओर किया।

विशेष[सम्पादन]

इसमें कवि तुलसी ने हनुमान और माता सीता के बीच होने वाले वार्तालाप को दर्शाया है। दोनों की भेंट तथा निशानी का लेना-देना ही पूरे पद में हुआ है। सीता जी ने राम के लिए कुछ बातें कहीं हैं कि वे उनके प्राणों की रक्षा करें और यहाँ से ले जाएँ अवधी भाषा है। भाषा चित्रात्मक है। भावों में सात्विक एवं उत्कर्ष प्रवाहभयता है। वाद-सौंदर्य हैं आलंकारिक भाषा है। अनुप्रास अलंकार है। सीता जी की मन की पीड़ा व्यक्त हुई है।

शब्दार्थ[सम्पादन]

मोहि - मुझे। कछु -कुछ। चीन्हा - निशाना। दीन्हा - दिया। हरष - हर्ष, खुशी। लयऊ - लिया। पवनसुत - पवन के पुत्र। तात-बेटा। कहेहु - कहकर। मोर -मेरा। पूरनकामा - सब प्रकार से काम पूर्ण किया। बिरिदु - विगड़े काम। हरहु - हरेंगे, दूर करेंगे। यम = मेरे। बान प्रताप- शक्ति का वर्णन। समझाए हू - यह कह कर समझाया। महुँ - मुझे। नाथ - स्वामी। तौ - तब। मोहि- मुझे। जिअत - जिन्दा। पावा पाएँगे। विधि- उपाय से। तुम्हहू - तुम्ही । सीतलि - शाँति, ठंडक। मो- मैं। कीन्ह किया। गवनु - जाने के लिए। पहिं - मुड़ना।