हिंदी कविता (आदिकालीन एवं भक्तिकालीन) सहायिका/रामचरितमानस/(३)चलत महाधुनि गर्जेसि भारी।

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सन्दर्भ[सम्पादन]

प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि तुलसीदास द्वारा रचित हैं। यह उनके महाकाव्य 'रामचरितमानस' से अवतरित है।

प्रसंग[सम्पादन]

इसमे हनुमान प्रभु के कार्य को पूर्ण करके वापिस आ गए हैं। यह जानकर सभी वानर तथा महाराज सुग्रीव बड़े ही प्रसन्ना हो गए। वे सभी नई बातें जानने को उत्सुक थे। उन्होंने वहाँ का सबको हाल बताया। उसी का वर्णन कवि ने यहाँ किया है-

व्याख्या[सम्पादन]

चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥

नदी सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा॥

हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाने॥

मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा॥

मिले सकल अति भए सुखारी, तलफत मीन पाव जिमि बारी॥

चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा॥

तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए।।

रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे।।


दोहा-जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।

सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज॥


हनुमान राम के पास जाने की धुन में खो गए। वे अपने में खोये हुए थे कि उन्होंने राम के काम को पूर्ण कर दिया। राक्षसों की गर्भवती स्त्रियों ने हनुमान को सुना और देखा तो वे खुश हो उठीं। उन्होंने ने सागर को पार करते हुए आकाश उन्हें उड़ते हुए देखा। उनके मुख से निकलने वाले शब्दों को भी सुनना शुरू कर दिया। वे वानर की आवाज में किलकारियाँ मार रहीं थीं। वे भी अपनी वाणी में उन्हें कुछ सुनाना चाहती थीं वे सभी स्त्रियाँ हनुमान को अपनी आँखों से देखकर मन-ही-मन हर्ष का अनुभव कर रही थीं। उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि वानर को देखने से उन्हें नया जन्म मिल गया हो। अर्थात् वे हनुमान को देखकर नये जीवन को पाने का आनंद ले रहीं थी। उनका जन्म धन्य हो गया है। उनके मुख पर प्रसन्नता थी और शरीर में आज उत्पन्न हो गया हो। अर्थात् शरीर में तेजी पैदा हो गई थी। हनुमान ने भी ऐसा ही अनुभव उस समय किया था। वे इस बात से प्रश्न है कि उन्होंने राम के आवश्यक कार्य को पूर्ण कर दिया है।

जिस उद्देश्य से वे यहाँ आए थे वह पूर्ण हो गया है। इसी खुशी के साथ वापिस राम के पास लौट रहे थे। जब वे अपने स्थान पर आ गए तो वहाँ मौजूद सभी वानर अति प्रसन्न हो गए। सभी ने खुशी को अनुभव किया। जैसे मछली की तड़पन पानी पीकर शांत हो जाती है वैसी ही स्थिति वहाँ थी। वे खुशी के साथ भगवान राम के पास पहुँचे। जिसने जो कुछ पूछा उन्होंने वैसे ही सारी घटना सुना दी। माने वे पूरा इतिहास सुना रहे हों। वे वन में आए और सभी ने मीठे फलों को खाया। अंगद और सभी ने मीठे फल खाए। वहाँ के रखवाले जब उथल-पुथल करने लगे तो उन्हें मुट्टी के प्रहार से भगाया गया और सभी भागे।

हनुमान ने सभी को पुकारा और युवराज को सभी बातें बतलाई। सुग्रीव सुनकर बहुत खुश हुए। उनके पास जितने भी बंदर थे वे भी कथा सुनकर मन में प्रसन्न हुए। उन्हें कार्य के पूर्ण होने की बहुत खुशी हो रही थी। भगवान राम का कार्य पूरा हो गया।

विशेष[सम्पादन]

इसमें कवि ने हनुमान के राम के पास लौटने का वर्णन किया है। सभी वानर इस बात से प्रसन्न थे कि भगवान राम का कार्य पूर्ण हो गया है। युवराज सुग्रीव भी बहुत खुश थे। भाषा अवधी है। भाषा में प्रवाह है। नाद-सौंदर्य है। भाषा में चित्रात्मकता है। वर्णनात्मक भाषा है। आलंकारिकता है। सभी के मन प्रसन्न हैं। वर्णन में सहज स्वाभाविकता है।

शब्दार्थ[सम्पादन]

महाधुनि = अपनी धून में। गर्जेसि = सर्जन करना। निसिचर = राक्षस। गर्भ - प्रसब धारण करने वाली स्त्रियां। पार ही = पार करना। सबद = शब्द। कपिन्ह = वानर। हरेष खुशी होना। बिलोकि - देखकर। नूतन - नया। तन - शरीर। बिराजा = विराजमान होना। कीन्हेसि = किया। काजा = कार्य करना। सकल = सभी। अति - बहुत भए = हो गए। सुखारी = सुखी होना। तलफल - तड़पना। मीन = मछली। पाव = पाकर। पासा = पास पहुंचना। पूँछत = पूछा। नबल - नयी बातें। मधुबन वन में मधु - मीठे। भजन = बाँटना। मुष्टि = मुट्ठी। प्रहार = चोट मारना। जाइ = जाकर के। हरष = खुश। कपि - बंदर। काज = काम।