हिंदी कविता (आदिकालीन एवं भक्तिकालीन) सहायिका/रामचरितमानस/(४)जौं न होति सीता सुधि पाई।

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सन्दर्भ[सम्पादन]

जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई॥

एहि बिधि पन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा।।

आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिले सब नहीं अति प्रेम कपीसा॥

पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी।।

नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपन्हि के प्राणी॥

सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेउ॥

राम कपिन्ह जब आवत देखा। कि काजल मन हरष बिसेषा।।

फटिक सिला बैठे दवौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई ॥


दोहा-प्रेम सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज॥

पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज।


प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि तुलसीदास द्वारा रचित हैं। यह उनके महाकाव्य 'रामचरित मानस' से अवतरित है।

प्रसंग[सम्पादन]

इसमें हनुमान की प्रशसा हुई है कि उन्होंने राम के कार्य को कुशलतापूर्वक करके दिखा दिया है। यह जान कर सभी वानर समाज मन ही मन में खुश हैं। बाद में सभी ने उनकी गले से लगाया। राम ने भी हनुमान से कुशल समाचार पूँछे। उसी का वर्णन इसमें हुआ है। कवि कहता है-

व्याख्या[सम्पादन]

व्याख्या-सभी उपस्थित वानर समाज अपने मन में सोच रहे हैं कि यदि हनुमान ने सीता जी का पता नहीं लगाया होता तो हम सब इस वन के मीठे फल नहीं खा सकते थे। यह हनुमान की कृपा से ही यह सब संभव हुआ है। जो हम सभी ने फल खाए हैं। राजा सुग्रीव भी मन में यही विचार करते हुए सोच रहे हैं। वे खुश हैं कि राम का कार्य संभव हो गया है वहाँ के सभी वानर समाज आकर इकटठे हो गए। सभी साथ में थे। सभी ने हनुमान के चरणों में सीस झकाया और प्रणाम किया। सभी वानर आपस में मिलने लगे। उनके मन में अपार प्रेम एवं खुशी व्याप्त थी।

वे मन में प्रसन्न थे। वे हनुमान की प्रशंसा कर रहे थे। सभी ने माता सीता तथा वहाँ के हाल-चाल पूछे। सभी ने कुशलता पूछी। राम की दया से यह विशेष कार्य पूर्ण हुआ। यह उनकी विशेष कृपा को दर्शाता है। हनुमान ने भगवान राम का कार्य को पूर्ण करके महान् कार्य किया। सभी ने यह भी जाना कि उन्होंने यह कार्य किस प्रकार से सम्पन्न किया। हनुमान ने सभी के प्राणों की रक्षा की है। सुग्रीव तो यह जानकर बड़े ही प्रसन्न हुए और उन्होंने हनुमान को तरह-तरह से बार-बार गले लगाया। उसके बाद पूरा वानर-समाज भगवान राम के पास चलने को तैयार हो गया। राम ने हनुमान तथा सारे वानरों को अपनी और आते हुए देखा तो उनके मन में एक विशेष प्रकार की खुशी अनुभव हुई। दोनों भाई पत्थर की शिला पर बैठे थे और पूरा वानर समाज उनके चरणों के नीचे बैठ गया।

सभी आपस में बड़े ही प्रेम से मिले और मन में खुश हुए। राम जो करुणा के भंडार उन्होंने हनुमान को गले से लगाया ओर प्रेम-प्रदर्शन किया तब स्वामी राम ने वहाँ के कुशल समाचार जानें। सीताजी के बारे में भी उन्होंने हनुमान से पूछा। कुशलता पूछते हुए उनको मन कमल की तरह खिला उठा।

विशेष[सम्पादन]

विशेष-इसमें कवि ने हनुमान की प्रशंसा कराई है कार्य की पूर्णता पर सभी वानर समाज हर्षित हुआ। एक -दूसरे ने कुशल समाचार पूछे। अवधी भाषा है। नाद-सौंदर्य है। भाषा में चित्रात्मकता है। शब्दों में अर्थगंभीरता है। भाषा में वर्णनात्मकता है आलंकारिक भाषा है। प्रवाह है। भावों में उत्कर्ष है।

शब्दार्थ[सम्पादन]

जौंन = यदि। सुधि - पता लगना। सकहिं - सकता। सहि = यही। बिधि = उपाय,विचार। कपि - बंदर। सहित = साथ में। सबन्हि = सभी ने। नावा = नवाया, झूकाया सिर। कपीसा - बंदर। मिलेउ = मिले आपस में। कुशल - सही सलामती. हालचाल। बिसेकी- विशेष रूप से। भा - भी। काजु- कार्य। नाथ - स्वामी। कीन्हेनु - किया। सकल- सभी। प्राना - प्राण-रक्षा। बहुरि - बहुत बार। तेहि- तरह से। पहि- की ओर। रघुपति - राम के लिए। आवत-आते हुये। हरष - खुशी। फटिक = पत्थर की शिला पर तुरंत। दावौ -दोनों। चरनिन्ह - चरनो में। जाई - जाकर बैठ गए। प्रीति - प्रेम करना। पुंज = दया के सागर।