हिंदी कविता (आदिकालीन एवं भक्तिकालीन) सहायिका/रामचरितमानस/(६)चलत मोहि चूड़ामणि दीन्ही।

विकिपुस्तक से
Jump to navigation Jump to search

सन्दर्भ[सम्पादन]

प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि तुलसी द्वारा रचित हैं। यह उनके महाकाव्य 'रामचरितमानस' से अवतरित है।

प्रसंग[सम्पादन]

इसमें हनुमान राम को सीता की चूड़ामणि देते हैं। राम को सीता जी को सारी कथा सुनाते हैं। उनसे उनके प्राणों की रक्षा करने की गुहार लगाते हैं। राम सीता जी की याद में आँखों में आँसू भर लाते हैं। इस हृदय विदारक दृश्य का कवि ने इस प्रकार वर्णन किया है-

व्याख्या[सम्पादन]

चलत मोहि चूड़ामणि दीन्ही। रघुपति हृदय लाइ सोइ लीन्ही॥

नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनक कुमारी॥

अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दान बंधु प्रनतारति हरना॥

मन क्रम बचन चरम अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी॥

अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥

नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा॥

बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥

नयन स्ववहि जलु निज हित लागी। करै न पाव देह बिरहागी॥

सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला॥


दोहा-निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।

बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति॥


हनुमान जी राम से कहते हैं कि जब मैं वहाँ से चला तो माता सीता ने मुझे अपनी कलाई से चूडामणि कंगन उतर कर निशानी के रूप में दिया। तब राम ने उसे लेकर अपने हृदय के पास लाकर छुआ और उसे लेकर अपने पास बड़े प्रेम से ले लिया। उनकी दोनों आँखें में आँसू भर आए। वे भावों की नदी में मानों डूब गए हों। तब उन्होंने पूछा कि जानकी ने और कुछ क्या कहला भिजवाया है ? अर्थात् उन्होंने और क्या कहा था। तब हुनमान ने कहा-उन्होंने छोटे भाई तथा स्वामी के चरणों में प्रणाम कहा है वे दीन बंधु हैं लोगों पर दया करने वाले हैं। वे दूसरी के दुखों को हरने वाले हैं। वे प्राणों की रक्षा करने वाले हैं तुम उनको मेरा प्रणाम कहना। मैं अपने स्वामी की मन, वचन और कर्म से सेविका हूँ।

मेरे मन में वे ही वसे हुए हैं। अगर मुझसे कोई गलती हो गई हो और उन्होंने मुझे त्यागा हो तो वे मुझे क्षमा करें। अपने से दूर न करें में अपनी एक गलती मानती हूँ। मगर मुझे अपने प्राणों से दूर न करें। अर्थात् मुझे अपने नजदीक ही रखें। वे मुझे अपने नयनों से दूर न करें। मेरी आँखों में वे ही है। उनकी निगाह में मेरा अपराध हुआ है तो वे मुझे क्षमा करें। मेरे प्राण निकलने वाले हैं मैंने अपने प्राणों को जबरदस्ती रोक रखा है। ये कभी-भी निकल जाएँगें। मेरा शरीर उनके विरह की आग में जल रहा है। शरीर क्षीण हो गया है। ये प्राण कभी निकल सकते हैं। इन साँसों ने मेरे शरीर को जलाने में कमी नहीं छोड़ रखी है। अर्थात् साँसें मेरे प्राणों को जला रही है। मेरी आँखों से आँसू निकलते रहते हैं। आँखों का पानी रोते-रोते ख़त्म हो रहा है। मैं सिर से पाँव तक विरह में जल रही हूँ। सीता की विपत्ति को जल्दी खत्म कर दो। स्वामी के बिना यह जीवन जीना नहीं कहा जा सकता है। पति के बिना इस शरीर का कोई अर्थ नहीं है। दीनों पर दया करने वाले मुझे यहाँ से ले जाओ। मेरे प्राणों की रक्षा करो।

हनुमान जी कहते हैं कि माता सीता हर समय रोती रहती हैं। काई-न-कोई कारण उनकी आँसुओं का बन जाता है। उनका जीवन कलपने में बीत रहा है। जल्दी चलिए प्रभ उनको लाने के लिए। वे कहती हैं कि स्वामी अपनी भुजाओं की ताकत से दुश्मनों को पराजित करके उन्हें ले जाएँ।

विशेष[सम्पादन]

लोचन - आँखें। बारी - पानी से। अनुज - छोटे भाई। समेत - साथ में। चरण - चरणों में नमस्कार। अनुरागी - से विका। गुन = दोष। बिधुरत - दूर रहता, विछोह। पयाना - अपने से। निसरत निकलने। हठि = ज़िद, कठिनता से। स्वास - साँस। जरह - जलना। माहिं - मेरा। तनु - शरीर। अगिनि = आग में। आनिअ = आकर। भुज = बाजुओं। खल = दुश्मन। सम - समान। कलप - रोते हुए।